Monday, June 1, 2026

137. सुमन कल्याणपुर

सुमन कल्याणपुर का 31 मई 2026 को मुम्बई में देहान्त हो गया। बांग्लादेश के ढाका में 28 जनवरी 1937 को इनका जन्म हुआ था। इनके पिता कर्णाटक के मैंगलोर से थे और ढाका में बहुत समय तक पदस्थापित रहे। इनका परिवार वर्ष 1943 में मुम्बई आ गया। चित्रकला और संगीत में इन्हें शुरू से रूचि थी। इन्होंने बड़े-बड़े गुरु से शास्त्रीय गायन सीखा। वर्ष 1954 में सर्वप्रथम उन्होंने हिन्दी सिनेमा के लिए गाने गाए। उन्होंने 857 हिन्दी गाने गाये हैं। समकालीन सभी गायकों के साथ उन्होंने युगल गीत गाए हैं। मोहम्मद रफ़ी के साथ लगभग 140 युगल गीत गाए हैं।  इनकी आवाज़ लता मंगेशकर से काफ़ी मिलती है, जिससे कई गाने में लोगों को भ्रम होता है कि लता ने गया या सुमन ने। इन्होने हिन्दी के अलावा मराठी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, पंजाबी, राजस्थानी, ओड़िया, गुजराती, असमिया, कन्नड़ इत्यादि कई भाषाओं में गाने गाए हैं। इन्हें गायकी के लिए पद्म भूषण तथा अन्य कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। 

''शराबी-शराबी ये सावन का मौसम, ख़ुदा की कसम ख़ूबसूरत ना होता, अगर इसमें रंग-ए-मुहब्बत न होता'', ''न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें, मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया'', ''बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दीये जलाके'', 'यूँ ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना, तेरी याद तो बन गई एक बहाना'', ''दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो, मुमकिन है इसके बाद कोई इम्तेहाँ न हो'', ''मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा'', ''जो हम पे गुज़रती है, तनहा किसे समझाएँ'' इत्यादि गाना उस ज़माने से मुझे पसन्द है जब न गीत के बोल जानती-समझती थी न उसके माने न मायने। जब तक मेरे पापा जीवित रहे तब तक हर दिन रेकॉर्ड प्लेयर पर सभी गायकों के गाने बजते रहते थे। मुझे सबसे ज़्यादा मोहम्मद ऱफी और सुमन कल्यानपुर को सुनना अच्छा लगता था। 

मैं 12 वर्ष की थी जब पापा का देहान्त हो गया। घर में चुप्पी छा गई। भाई जब गाँव से आता तब घर गुलज़ार होता और रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर बजता था। एक साल बाद जब मैं थोड़ा सामान्य हुई तब मैं फिर से गाना सुनने लगी। गाना सुनना मेरे परिवार के जींस में है शायद। वैसे तो सभी रेकॉर्ड मैं बजाती थी; लेकिन सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी के गाने रिपीट कर-करके सुनती थी। बाद में मीना कुमारी और ग़ुलाम अली की गज़लें भी ख़ूब सुनने लगी। रिकॉर्ड से कैसेट-वाकमैन का ज़माना और फिर मोबाइल-कम्प्यूटर के ज़माने में मैं पहुँची। अब सुमन कल्याणपुर के वे सभी गाने जो मुझे पसन्द हैं, एक जगह रिकॉर्ड कर ली। शाम को टहलते हुए भी सुमन कल्याणपुर को ही अधिकतर सुनती रही हूँ। 

न जाने सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में क्या जादू है कि मुझे लता जी और आशा जी के गाने से ज़्यादा पसन्द इनके गाने लगते हैं। मुझे बचपन से ही उदासी भरे गीत पसन्द आते हैं, इसका कारण नहीं मालूम। हालाँकि मेरे घर में सभी मिज़ाज के गीत के रेकॉर्ड थे। सुमन कल्याणपुर के कुछ गीत हल्के-फुल्के मिजाज़ वाले भी हैं; लेकिन मुझे नहीं भाते। यू ट्यूब पर सुनते समय वैसे गाने आ गए, तो सुन लेती हूँ और पसन्द का आ जाए तो फिर रिपीट कर-करके सुनती रहती हूँ। 

गाना सुनना मेरा बचपन से शौक़ है। जैसे-जैसे बड़ी होती गई, सभी गायक-गायिकाओं को सुनने लगी। लेकिन सुमन कल्याणपुर के गाए कुछ गाने मुझमें इस तरह समाहित हैं, जिसे अपने मन की किसी भी अवस्था में सुनकर सुखद महसूस करती हूँ। सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं; परन्तु उनके गाये गीत मेरे जीवन का हिस्सा हैं। समय और उम्र के बदलाव ने मेरी पसन्द को बदल नहीं सका। अंतर बस यह आया कि बचपन में गीत के बोल समझ नहीं आने पर अपने शब्द भर देती थी; पर अब हर शब्द को समझकर गाना सुनती हूँ। 

सुमन कल्याणपुर का जाना संगीत जगत की ही नहीं; बल्कि श्रोताओं की भी क्षति है। हालाँकि फ़िल्म 'नसीब' (1981) का गाना ''ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, लोगों की जान लेती है'' उनका अन्तिम हिन्दी गाना है। फिर भी उनके गाए सभी गीत उनके चाहने वालों के दिलों में सदा के लिए जीवित रहेंगे और सुमन कल्याणपुर मेरी सबसे पसन्दीदा गायिका रहेंगी। सुमन कल्याणपुर को हार्दिक श्रद्धांजलि!

-जेनी शबनम (1.6.2026) 
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