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Thursday, August 20, 2015

52. सावन में बरसाती टोटके


बरसात का मौसम, सावन-भादो का महीना और ऐसे में बारिश! चारों तरफ़ हरियाली, बाग़ों में बहार, मन में उमंग, जाने क्या है इस मौसम में। रिमझिम बरसात! अहा! मन भींगने को करता है। बरसात के मौसम में उत्तर भारत में कजरी गाने की परम्परा रही है। 

सावन ऐ सखी सगरो सुहावन 
रिमझिम बरसेला मेघ रे 
सबके बलमउआ त आबेला घरवा 
हमरो बलम परदेस रे  

सावन के महीने में कई-कई दिन लगातार बारिश हो, सूर्य कई दिनों तक नहीं दिखे, तो इसे कहते हैं झपसी (लगातार मूसलाधार वर्षा) लगना।शहरी जीवन में ऐसे मौसम में लोग चाय के साथ पकौड़ी खाना, लिट्टी चोखा खाना, लॉन्ग ड्राइव पर जाना, पसन्दीदा पुस्तक पढ़ना या गीत सुनना आदि पसन्द करते हैं। ग्रामीण परिवेश में यह सब बदल जाता है। यों अब पहले की तरह गाँव नहीं रहे, अतः काफ़ी कुछ शहरों का देखा-देखी होने लगा है।पहले चूल्हा में लकड़ी ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता था, अतः बरसात में मेघौनी लगते ही जरना (जलावन की लकड़ी) एकत्रित कर लिया जाता है।बूँदा-बाँदी में भी खेती के सारे काम होते हैं; क्योंकि इसमें नियत समय पर सब कुछ करना है। पशु-पक्षी की देखभाल, उनके चारा का इंतिज़ाम आदि सब पहले से कर लेना होता है। बाज़ार-हाट का काम और खेती का काम भींगते हुए करना होता है। गाँव में कभी भी कोई असुविधा महसूस नहीं होती है। जब जो है उसमें ही जीवन को भरपूर जिया जाता है।  

यों तो परम्पराएँ गाँव हो या शहर दोनों जगह के लिए बनी हुई हैं; लेकिन कुछ परम्पराएँ गाँवों तक सिमट गई हैं। गाँवों में जब मूसलाधार बारिश हो और पानी बरसते हुए कई दिन निकल जाए, तो एक तरह का टोटका किया जाता है, जिससे बारिश बंद हो और उबेर (बारिश बंद होकर सूरज निकलना) हो जाए।   

बिहार के सीतामढ़ी ज़िले में झपसी लगने पर एक अनोखी परम्परा है। कपड़े का दो पुतला (गुड्डा-गुड़िया) बनाते हैं, एक भाहो (छोटे भाई की पत्नी) और एक भैंसुर (पति का बड़ा भाई)। दोनों को छप्पर (छत) पर एक साथ रख देते हैं। फिर अक्षत और फूल चढ़ाकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि भाहो और भैंसुर का सम्बन्ध ऐसा है, जिसमें दूरी अनिवार्य है। इसलिए भाहो-भैंसुर का एक साथ होना और पानी में भींगना बहुत बड़ा पाप और अन्याय है। अतः भगवान इस अन्याय को देखें और पानी बरसाना बंद करें। इस गुड्डा-गुड़िया को बनाकर वही लड़की पूजा करती है, जिसको एक भाई होता है। 

इससे मिलती-जुलती ही बिहार के छपरा ज़िला की परम्परा है। इस टोटका में कपड़े से कनिया और दूल्हा (पति और पत्नी) बनाते हैं। फिर दूल्हा के कन्धा पर एक गमछा (तौलिया) रख दिया जाता है, जिसके एक छोर में खिचड़ी का सामान बाँध दिया जाता है। एक छोटा ईंट रखकर उस पर एक दीया जला देते हैं और उससे सटाकर कनिया व दूल्हा को खड़ा कर दिया जाता है। कनिया और दूल्हा भगवान से कहते हैं कि हमें परदेस जाना है, दिन-रात पानी बरस रहा है, चारों तरफ़ अन्हरिया (अँधेरा) है, हे भगवान! उबेर कीजिए, जिससे हमलोग खाना बनाकर खाएँ और फिर परदेस जाएँ ताकि कमा सकें। मान्यता है कि जिस बच्ची का जन्म ननिहाल में होता है, वही यह गुड्डा-गुड़िया बनाती है और पूजा करती है। 

अब इन टोटकों से क्या होता है, यह तो नहीं पता; लेकिन सुना है कि टोटका करने के बाद पानी बरसना बंद होकर उबेर हो जाता है, भले थोड़ी देर के लिए सही। टोटका कहें, मान्यता या मन बहलाव का साधन, गाँव के लोग हर परिस्थिति का सामना अपने-अपने तरीक़े से करते हैं। प्रकृति के हर नियम के साथ ताल-मेल मिलाकर जीते हैं। यह सब होता है या नहीं, यह तो मालूम नहीं; लेकिन है बड़ा अनूठा और दिलचस्प टोटका।  

-जेन्नी शबनम (20.8.2015)
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Friday, January 7, 2011

16. काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया


आज के हिन्दुस्तान में स्त्री एक वस्तु मानी जाती है समय बदला, संस्कृति बदली, पीढ़ियाँ बदलीं; लेकिन स्त्री जहाँ थी वहीं है, जिसे हर कोई अपनी पसन्द के अनुरूप जाँचता-परखता है फिर अपनी सुविधा के हिसाब से चुनता है; यह हर स्त्री की नियति है आज के सन्दर्भ में स्त्री वस्तु के साथ-साथ एक विषय भी है, जिसपर जब चाहे जहाँ चाहे विस्तृत चर्चा हो सकती है चर्चा में उसके शरीर से लेकर उसके कर्त्तव्य, अधिकार और उत्पीड़न की बात होती है अपनी सोच और संस्कृति के हिसाब से सभी अपने-अपने पैमाने पर उसे तौलते हैं यह भी तय है कि मान्य और स्थापित परम्पराओं से स्त्री ज़रा भी विलग हुई कि उसकी कर्तव्यपरायणता ख़त्म और समाज को दूषित करने वाली मान ली जाती है युग परिवर्तन और क्रान्ति का परिणाम है कि स्त्री सचेत हुई है; लेकिन अपनी पीड़ा से मुक्ति कहाँ ढूँढे? किससे कहे अपनी व्यथा? युगों-युगों से भोग्या स्त्री आज भी महज़ एक वस्तु ही है, चाहे जिस रूप में इस्तेमाल हो  
 
कभी रिश्तों की परिधि तो कभी प्रेम-उपहार देकर उस पर एहसान किया जाता है कि देखो तुम किस दुर्गति में रहने लायक थी, तुमसे प्रेम या विवाह कर तुमको आसमान दिया है लेकिन आज़ादी कहाँ? आसमान में उड़ा दिया और डोर हाथ में थामे रहा कोई पुरुष, जो पिता हो सकता या भाई या फिर पति या पुत्र जब मन चाहा आसमान में उड़ाया, जब चाहा ज़मीन में ला पटका कि देख तेरी औक़ात क्या है स्त्री की प्रगति की बात कर समाज में पुरुष प्रतिष्ठा पाता है कि वह प्रगतिवादी है क्या कभी कोई पुरुष स्त्री की मनःस्थिति को समझ पाया कि उसे क्या चाहिए? अगर स्त्री अपना कोई स्थान बना ले, अलग अस्तित्व बना ले, फिर भी उसकी अधीनता नहीं जाती है।  
 
यों स्त्री-विमर्श और स्त्री के बुनियादी अस्तित्व पर गहन चर्चा तो सभी करते हैं, पर मैं यहाँ इन सब पर कोई चर्चा नहीं करना चाहती मैं बस स्त्री की पीड़ा व्यक्त करना चाहती हूँ, जो एक गीत के माध्यम से है एक भोजपुरी लोकगीत जो मेरे मन के बहुत क़रीब है, जिसमें एक स्त्री अपने जन्म से लेकर विवाह तक की पीड़ा अभिव्यक्त करती है वह अपने पिता से कुछ सवाल करती है कि उसके और उसके भाई के पालन-पोषण और जीवन में इतना फ़र्क़ क्यों किया, जबकि वह और उसके भाई ने एक ही माँ के कोख से जन्म लिया है भाई-बहन के पालन-पोषण की विषमता से आहत मन का करुण-क्रन्दन एक कचोट बनकर दिल में उतरता है, जिसे तमाम उम्र वह सहती और जीती है।  
 
इस गीत में पुत्री, जो अब ब्याहता स्त्री है, अपने पिता से पूछती है कि क्यों उसके और उसके भाई के साथ दोहरी नीति अपनाई गई, जबकि एक ही माँ ने दोनों को जन्म दिया 
 
एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया
दुरंग नीतिया
(काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया) - 2  
 
बेटा के जनम में त सोहर गवइल अरे सोहर गवइल
हमार बेरिया (काहे मातम मनइल हमार बेरिया) - 2
दुरंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया  
 
बेटा के खेलाबे ला त मोटर मंगइल अरे मोटर मंगइल
हमार बेरिया (काहे सुपली-मऊनीया हमार बेरिया) - 2
दुरंग नीतिया 
काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया  
 
बेटा के पढ़ाबे ला स्कूलिया पठइल अरे स्कूलिया पठइल
हमार बेरिया (काहे चूल्हा फूँकवइल हमार बेरिया) - 2
दुरंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया  
 
बेटा के बिआह में त पगड़ी पहिरल अरे पगड़ी पहिरल
हमार बेरिया (काहे पगड़ी उतारल हमार बेरिया) - 2
दुरंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया  
 
एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया
दुरंग नीतिया
काहे कइल हो बाबू जी दुरंग नीतिया  
 
(अज्ञात लेखक)
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दुरंग नीतिया - दोहरी नीति
काहे कइल - क्यों किए
गवइल - गाना गवाना
हमार बेरिया - हमारी बारी में
खेलाबे ला - खेलने के लिए
सुपली-मऊनी - सुप और डलिया
पढ़ाबे ला - पढ़ाने के लिए
स्कूलिया - स्कूल
पठइल - भेजना
पहिरल - पहनना
उतारल - उतारना 
 
-जेन्नी शबनम (7.1.2011)
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Friday, December 17, 2010

15. लुप्त होते लोकगीत

हमारी लोक-संस्कृति हमेशा से हमारी परम्पराओं के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होती रही है कुछ दशक पूर्व तक आम भारतीय इसकी क़ीमत भी समझते थे और इसको संजोकर रखने का तरीक़ा भी जानते थे लेकिन आज ये चोटिल है, आर्थिक उदारवाद से उपजे सांस्कृतिक संक्रमण ने सब कुछ जैसे ध्वस्त कर दिया है हम नक़ल करने में माहिर हो चुके हैं, वहीं अपनी स्वस्थ परम्परा का निर्वहन करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं आश्चर्य की बात है कि हर व्यक्ति यही कहता है कि हमारी संस्कृति नष्ट हो गई है, उसे बचाना है, पाश्चात्य संस्कृति ने इसे ख़त्म कर दिया हैलेकिन शायद लोक-परम्पराओं के इस पराभव में वे ख़ुद शामिल हैं कौन है जो हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा है? हमारी ही संस्कृति क्यों प्रभावित हो रही है, दूसरे देशों की क्यों नहीं? आज भी दुनिया के तमाम देश अपनी लोक-परम्पराओं को जतन से संजोकर रखे हैं दोष हर कोई दे रहा; लेकिन इसके बचाव में कोई क़दम नहीं, बस दोष देकर कर्त्तव्य की इतिश्री 
  
लोक-संस्कृति के जिस हिस्से ने सर्वाधिक संक्रमण झेला है, वह है लोकगीत आज लोकगीत गाँव, टोलों, कस्बों से ग़ायब हो रहे हैं कान तरस जाते हैं नानी-दादी से सुने लोकगीतों को दोबारा सुनने के लिए। 
 
हमारे यहाँ हर त्योहार और परम्परा के अनुरूप लोकगीत रहे हैं और आज भी ग्रामीण और छोटे शहरी क्षेत्रों में रहने वाले बड़े-बुज़ुर्गों में इनकी अहमियत बनी हुई है विवाह के अवसर पर राम-सीता और शिव-पार्वती के विवाह-गीत के साथ ही हर विधि के लिए अलग-अलग गीत, शिशु जन्म पर सोहर, बिरहा, कजरी, सामा-चकवा, तीज, भाई दूज, होली पर होरी, छठ पर्व पर छठी मइया के गीत, रोपाई-बिनाई के गीत, धान कूटने के गीत, गंगा स्नान के गीत आदि सुनने को मिलते थे जीवन से जुड़े हर शुभ अवसर तथा महत्वपूर्ण अवसर के साथ ही रोज़मर्रा के कार्य के लिए भी लोकगीत रचे गए हैं  
 
एक प्यारे से गीत के बोल याद आ रहे हैं, जो अपने गाँव में बचपन में सुनी हूँ…
चूए ओठ से पानी ललन सुखदायी
पुआ के बड़ाई अपन फुआ से कहिय
ललन सुखदायी
चूए ओठ से पानी ललन सुखदायी
कचौड़ी के बड़ाई अपन भउजी से कहिय
ललन सुखदायी…
खाना पर बना यह गीत मुझे बड़ा मज़ा आता था सुनने में इसमें सभी नातों और भोजन को जोड़कर गाते हैं, जिसमें दूल्हा अपने ससुराल आया हुआ है और उसे कहा जा रहा कि यहाँ जो कुछ भी स्वागत में खाने को मिला है वह सभी इतना स्वादिष्ट है कि अपने घर जाकर अपने सभी नातों से यहाँ के खाने की बड़ाई करना।  
 
एक और गीत है जिसे भाई दूज के अवसर पर गाते हैं इसमें पहले तो बहनें अपने भाई को शाप देकर मार देती हैं फिर जीभ में काँटा चुभाकर स्वयं को कष्ट देती हैं कि इसी मुँह से भाई को शाप दिया और फिर भाई की लम्बी आयु के लिए आशीष देती हैं...
जीय जीय ...(भाई का नाम) भइया लाख बरीस
...(बहन का नाम लेकर) बहिनी देलीन आसीस हे…
मुझे याद है गाँव में आस-पास की सभी औरतें इकठ्ठी हो जाती थीं और सभी मिलकर एक-एककर अपने-अपने भाइयों के लिए गाती थीं मैंने तो कभी यह किया नहीं; लेकिन मेरे बदले मेरे भाई के लिए मेरी मइया (बड़ी चाची) शुरू से करती थीं अब तो सब विस्मृत हो चुका है, मेरे ज़ेहन से भी और शायद इस लोकगीत को गाने वाले लोगों की पीढ़ी के ज़ेहन से भी
पारम्परिक लोकगीत न सिर्फ़ अपनी पहचान खो रहा है; बल्कि मौजूदा पीढ़ी इसके सौंदर्य को भी भूल रही है हर प्रथा, परम्परा और रीति-रिवाज के अनुसार लोकगीत होता है और उस अवसर पर गाया जाने वाला गीत न सिर्फ़ महिलाओं को बल्कि पुरुष को भी हर्षित और रोमांचित करता रहा है लेकिन जिस तरह किसी त्योहार या प्रथा का पारम्परिक स्वरूप बिगड़ चुका है, उसी तरह लोकगीत कहकर बेचे जाने वाले नए उत्पादों में न तो लोकरंग नज़र आता है न गीत जहाँ सिर्फ़ लोकगीत होते थे, वहाँ उनकी जगह अब फ़िल्मी धुन पर बने अश्लील गीत ले चुके हैं अब सरस्वती पूजा हो या दुर्गा पूजा, पंडाल में सिर्फ़ फ़िल्मी गीत ही बजते हैं होली पर गाया जाने वाला होरी तो अब सिर्फ़ देहातों तक सिमट चुका है गाँव में भी रोपनी या कटनी के समय अब गीत नहीं गूँजते सोहर, विरही, झूमर, आदि महज़ टी.वी. चैनल के क्षेत्रीय कार्यक्रम में दिखता है विवाह हो, शिशु जन्म हो या कोई अन्य ख़ुशी का अवसर, फ़िल्मी गीत और डी.जे. का हल्ला गूँजता है यहाँ तक कि छठ पूजा, जो बिहार का सबसे बड़ा पर्व माना जाता, उसमें भी लाउड-स्पीकर पर फ़िल्मी गाना बजता है यों औरतें अब भी छठी मइया का पारम्परिक गीत गातीं हैं अब तो आलम ये है कि भजन भी अब किसी प्रचलित फ़िल्मी गाना की धुन पर लिखा जाने लगा है किसी के पास इतना समय नहीं कि सम्मिलित होकर लोकगीत गाएँ विवाह भी जैसे निपटाने की बात हो गई है पूजा-पाठ हो या कोई त्योहार, करते आ रहे हैं इसलिए करना है जिसका जितना बड़ा पंडाल, जितना ज़्यादा ख़र्च वह सबसे प्रसिद्ध लोकगीतों का वक़्त अब टी.वी. ने ले लिया है गाँव-गाँव में टी.वी. पहुँच चुका है; भले ही कम समय के लिए बिजली रहे, पर जितनी देर रहे लोग एक साथ होकर भी साथ नहीं होते, उनकी सोच पर टी.वी. हावी रहता है कुछ आदिवासी क्षेत्रों को छोड़ दें, तो कहीं भी हमारी पुरानी परम्परा नहीं बची है, न पारम्परिक लोकगीत अब अगर जो बात की जाए कि कोई लोकगीत सुनाओ, तो बस भोजपुरी अश्लील गाना सुना दिया जाता है, जैसे यह लोकगीत का पर्याय बन चुका हो
नहीं मालूम लोकगीत का पुनरागमन होगा कि नहीं, लेकिन पूर्वी भारत में लोकगीतों का लुप्त होना इस सदी का सबसे बड़ा सांस्कृतिक क्षय है; क्योंकि परिवार और समाज की टूटन कहीं-न-कहीं इससे प्रभावित हैगाँव से पलायन, शहरीकरण और औद्योगीकरण इस सांस्कृतिक ह्रास का बहुत बड़ा कारण है हम किसी संस्कृति को दोष नहीं दे सकते कि उसके प्रभाव से हमारी संस्कृति नष्ट हुई है; बल्कि हम स्वयं इन सबको छोड़ रहे हैं और ज़िन्दगी को जीने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा में झोंक रहे हैं पारम्परिक लोकगीत गाने वाले अब बहुत कम लोग बचे हैं और आज की पीढ़ी सीखना भी नहीं चाहती है ऐसे में लोकगीत का भविष्य क्या होगा? क्या यों ही अपनी पहचान खोकर कहीं किसी कोने में पड़े-पड़े अपने ही लिए गाए शोक-गीत?
 
-जेन्नी शबनम (17.12.2010)
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Wednesday, January 20, 2010

3. छोटी बात, जात और मैं

चित्र- गूगल से साभार

लोकसभा की अध्यक्ष मीरा कुमार पर कुछ नेताओं द्वारा की गई जातिसूचक टिप्पणी ने मुझे बहुत दुःख पहुँचाया है। मेरा बीता हुआ कल किसी सिनेमा के फ्लैश बैक की तरह मेरी आँखों के सामने है। मुझे याद आता है जाड़े की दुपहरी का एक ठिठुरता-सा वह दिन जब नर्म धूप खिली थी घर की छत पर मैं गुनगुनी धूप को सज़दा करते हुए चाय की चुस्कियों के साथ कोई पुराना गाना सुन रही थी। कुछ ही देर बीते होंगे कि तक़रीबन 40-45 वर्ष की एक महिला आई और चुपचाप खड़ी हो गई। पूछने पर उसने अपना नाम बताया और कहा ''हम आपके यहाँ साफ़-सफ़ाई का काम करते हैं, पर... जाति के नहीं हैं।'' फिर उसने कहा ''हम आपके साथ दिल्ली जाएँगे मेरी जात... है।'' मैंने कहा ''अपना नाम और उम्र मेरे स्टाफ को लिखा दो, टिकट में जाति नहीं लिखना होता है।'' फिर वह काम पर चली गई, और मेरे ज़ेहन में जाति का वह सवाल छोड़ गई, जो अमूमन हर जगह ढूँढा जाता है।शायद रूढ़ियों से हमारे मन में यह बस चुका है और ज़िन्दगी के हर क्षेत्र से जुड़ चुका है। चाहते हुए भी इससे परे कोई नहीं जा पाता है।  
 
मुझे अपना बचपन याद आता है जिसकी गोद में मैं पली थी, वह मेरे गाँव का निम्न जाति का था। हमारे खेत में जो काम करता था, वह भी उसी निम्न जाति का था जब हमलोग गाँव जाते, अपने पिता के साथ उसके घर जाते और भैंस का बिना उबला हुआ ताज़ा दूध उसके घर में उसके लोटा में पीते थे। हालाँकि उन दिनों गाँव में मेरे पिता की आलोचना भी होती रही और काफ़ी लोग उनके इस सोच से सहमत भी होते रहे। जब भी मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो पाती हूँ कि जाति-बिरादरी के इस दुष्चक्र ने हमसे और इस देश की जनता से कितना कुछ छीना है; लेकिन ये सिलसिला कब ख़त्म होगा, समझ नहीं पाती हूँ।  
 
मुझे याद है मेरी एक फुफेरी बहन की शादी, जो मेरे पिता ने करवाई थी और शादी मेरे ही घर से हो रही थी, शायद 1974-75 की बात होगी। मेरे पिता गांधीवादी और साम्यवादी विचारधारा के थे उनके एक मित्र के बेटे से बिना दहेज मेरी बहन की शादी हो रही थी। रात में शादी थी और बारात दिन में बुला लिया गया था; क्योंकि गाँव में अँधेरा जल्दी हो जाता है। दिन के भोज में रिश्तेदारों के अलावा बहुत सारे गाँव वाले आमंत्रित थेबाराती, रिश्तेदार और गाँव वाले सभी लोग एक साथ खाने के लिए पंक्ति में बैठे थे।अचानक किसी एक रिश्तेदार ने उठकर कहा कि कोई खाना न खाओ, खाना बनाने वाली ... जाति की है। कुछ लोग उठकर चले गए कि धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, नहीं खाएँगे। फिर दीदी के होने वाले ससुर, जो मेरे पिता की सोच और जीवन शैली से बहुत प्रभावित थे, ने कहा ''चाहे जो भी खाना बनाए हम तो खाएँगे, जिसे जाना हो जाए।'' खाना बनाने वाली उसी गाँव की थी चूँकि शादी की बात थी इसलिए गाँव की मानसिकता को सोचकर मेरी दादी ने उसे बुलाया था, जिसका बनाया सभी खा सकें। वह हंगामा उस वक़्त बड़ा मज़ेदार लगा था मुझे। यह समझ नहीं आया था कि जिसका बनाया हुआ हम खाते हैं, सभी लोग खाएँगे तो क्या होगा। बाद में भी मेरे गाँव से निम्न जाति की लड़की काम करने आई। परन्तु मेरे घर में किसी ने नहीं पूछा कि वह काम करने वाली किस जाति की है; क्योंकि मेरे घर आने वाले सभी लोग मेरे पिता के विचार से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे।  
 
मुझे याद आई मेरी शादी के बाद की एक घटना वर्ष 1992 में दिल्ली में यूनिटेक कंस्ट्रक्शन कम्पनी में लॉ असिस्टेंट (law assistant) के पद पर मैंने नौकरी शुरू की थी। पहली तनख़्वाह मिली तो मेरे नाम में मेरे पति का उपनाम (surname) जोड़कर चेक मिला। मैंने पूछा कि मेरे नाम में उपनाम क्यों जोड़ा गया, सभी प्रमाणपत्रों में तो मेरा यही नाम है। मुझे कहा गया कि शादी के बाद अपने-आप जुड़ जाता है, अगर आपको नहीं जोड़ना तो आप शपथ-पत्र (affidavit) दीजिए या समाचारपत्र में प्रकाशित कराइए, तभी उपनाम नहीं जोड़ेंगे। मुझे बेहद ग़ुस्सा आया। मैंने कहा कि किसी क़ानून में नहीं है कि पति का उपनाम जोड़ा जाए, ये महज़ परम्परा है। अंत में मुझे अख़बार में निकलवाना पड़ा कि मेरा नाम यही है और यही रहेगा; तब मुझे तनख़्वाह मिली।  
 
कुछ लोग कहते हैं कि मेरी जाति का पता कैसे चलेगा, जब धर्म का ही पता नहीं चलता है। अक्सर मैं हँस पड़ती हूँ और सोचती हूँ कि लोगों को क्यों फ़र्क़ पड़ता है कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए कौन-सा रास्ता कौन अपनाता है या ईश्वर को नहीं मानता है। कोई यह तो किसी के बारे में नहीं पूछता कि अमुक खाना ही क्यों पसन्द है अमुक क्यों नहीं, यह रंग ही क्यों पसन्द है कोई दूसरा क्यों नहीं, यह सिनेमा ही क्यों पसन्द है दूसरा क्यों नहीं, यह कपड़ा ही क्यों पसन्द है कुछ और क्यों नहीं। जबकि यह सब तो हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं और हमारी पहचान में शामिल हैं।  
 
ग्रामीण परिवेश में छुआछुत की भावना तो अब ज़्यादा न रही, लेकिन जातिवाद और धर्म से जुड़ी मानसिकता गाँव के विघटन के रूप में सामने आ रही है। शहरों में छुपी हुई जातिवाद की भावना दिखती है, जिसका घृणित और विकृत रूप हम अख़बार में पढ़ते हैं, चाहे राजनीति, शादी-विवाह या कोई कर्म-काण्ड हो। वर्ण-व्यवस्था जब क़ायम हुई होगी, तब सामजिक कर्त्तव्यों के निर्वहन की सुविधा को ध्यान में रखा गया होगा। जो जिस क्षेत्र में पारंगत होगा, उसे उस हिसाब से उस वर्ण में शामिल किया गया होगा कालान्तर में सब कुछ ऊँच-नीच जाति में बँट गया। जिन कामों में ज़्यादा शारीरिक श्रम वह काम नीचा है, ऐसा क्यों हुआ? कोई तथ्यपूर्ण जवाब नहीं मिलता है मुझे। मेरे अपने विचार से इन सब के जड़ में कहीं-न-कहीं पूँजीवादी व्यवस्था और आधिपत्य बनाए रखने की साजिश थी, जिसका कुपरिणाम आज जाति-भेद का भयंकर और विकराल रूप हम आए दिन देख रहे हैं। हमारे रक्त में जैसे ये ज़हर की तरह घुल गया है। इससे परे अब न इंसान की सोच रह गई है, न उसकी पहचान, न उसका अपना कोई परिचय। धर्म और जाति का सामजिक जीवन से क्या सरोकार? सच कहूँ तो आज तक समझ न आया कि लोगों को इंसान से ज़्यादा उसकी जाति या धर्म में दिलचस्पी क्यों होती है

-जेन्नी शबनम (20.1.2010)
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