Showing posts with label अमृता प्रीतम. Show all posts
Showing posts with label अमृता प्रीतम. Show all posts

Friday, December 22, 2023

109. माझा का इमरोज़

इमरोज़ चले गए। आज वे अपनी अमृता से मिलेंगे। निश्चित ही जाते वक़्त वे बहुत ख़ुश रहे होंगे कि वे अपनी माझा के पास जा रहे हैं। यों वे दूर हुए ही कब थे! इमा के लिए उनकी माझा सदा साथ रही, जो अपने कमरे में बैठी नज़्म लिखती रहती है और उनके द्वारा बनाई चाय पीती रहती है। 

इमरोज़ जी से कुछ कुछ सालों से मिलना नहीं हुआ। इधर वे लगातार अस्वस्थ रह रहे थे। एक दो बार फ़ोन पर बात हुई, लेकिन पहले की तरह बात नहीं कर पा रहे थे। एक दो मित्र ने मुझसे कहा था कि जब भी इमरोज़ जी से मिलने जाऊँ तो उन्हें भी साथ ले चलूँ। मैंने कह दिया था कि अब शायद उनसे कभी मिल नहीं पाऊँगी। जाने क्यों मुझे लगने लगा था कि मैं उनसे नहीं मिल पाऊँगी। आज अतीत की कितनी यादें एक साथ मेरी आँखों के सामने से गुज़र रही हैं। 

अमृता जी को जब से मैंने पढ़ना शुरू किया, तब से वे मेरी प्रिय लेखिका रही हैं। उनकी लगभग सारी किताबें मैंने पढ़ी। अधिकतर किताबें मैं आज भी सहेज कर रखी हूँ। मुझे पता चला कि मेरे घर के नज़दीक उनका घर है। संयोग से 1998 में मुझे अमृता जी का फ़ोन नंबर मिला। मैंने फ़ोन किया तो इमरोज़ जी ने उठाया। मैंने मिलने की इच्छा जताई, तो उन्होंने कहा कि अमृता जी अभी बीमार हैं, कुछ दिन बाद मैं आऊँ। मैं अपने घर में व्यस्त हो गई। 2005 में एक दिन फिर मिलने की इच्छा जागी। मैंने फ़ोन किया तो इमरोज़ जी ने आने को कहा। मैं अपने बच्चों के साथ मिलने गई। गेट के भीतर ठीक सामने एक कमरा था, जो शायद गैरेज होगा, जिसमें अमृता प्रीतम की किताबें, चित्र व इमरोज़ जी की पेंटिंग थी। मैं अपलक निहारती रही, मानो ख़ज़ाना मेरे हाथ लगा हो। मैं बहुत रोमांचित महसूस कर रही थी।
इमरोज़ जी और मैं
इमरोज़ जी ने दरवाज़ा खोला और मुझे गले से लगा लिया। हमें लेकर वे पहली मंजिल पर गए। मेरे बच्चों को दुलार किया। हम चाय पी रहे थे तभी आवाज़ आई- इमा-इमा। इमरोज़ जी तेज़ी से एक कमरे की तरफ़ गए। फिर लौटे और कहा कि अमृता को खिलाना है, अभी आता हूँ। उनकी बहु ने कटोरे में कुछ दिया, जिसे लेकर वे खिलाने गए। वापस आकर उन्होंने कहा कि अमृता बहुत बीमार है। फिर मुझे लेकर सामने वाले कमरे में गए, जहाँ अशक्त अमृता लेटी हुईं थीं। अमृता जी को देखा तो मेरी आँखें भर आईं।

1986 में अमृता प्रीतम को पहली बार मैंने देखा था, जब नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन के कॉन्फ़्रेंस में वे आई थीं। जितना ख़ूबसूरत व्यक्तित्व, उतना ही शानदार वक्तव्य। मैं अपलक उनको देखती-सुनती रह गई। उनके साथ फ़ोटो खिंचवाना भी याद न रहा। वही ओजस्वी अमृता आज सिकुड़ी-सिमटी हुई असमर्थ बिस्तर पर लेटी हैं। ख़ुद से करवट भी बदल नहीं पा रही थीं। इमरोज़ जी ने उनके सिर पर हाथ फेरा, जैसे किसी बच्चे को पुचकारते हैं।

इमरोज़ जी ने पूरा घर घुमाया, फोटो व पेंटिंग दिखाई, कुछ फोटो से जुड़ी कहानी सुनाई। अमृता से उनकी मुलाक़ात और साथ बीती ज़िन्दगी की कहानी सुनाई। मेरे बताने पर कि मैं कविता लिखती हूँ, वे बहुत ख़ुश हुए और कहा कि जब भी दोबारा आऊँ तो अपनी कविताएँ लेकर आऊँ।
दुबारा उनसे मिलने गई तब अमृता जी का देहान्त हो चुका था। वे मुझे उसी तरह गले मिले और ऊपर ले गए। जाड़े का दिन था, तो हम छत पर बैठे। फिर चाय पीते हुए बातचीत होती रही। बीच में वे ऊपर की छत पर कबूतर को दाना डालने भी गए। मुझसे मेरी कविताएँ सुनी। मेरी किताब के बारे में पूछा। मैंने कहा- “मैं कविता लिखती हूँ यह किसी को नहीं पता है। मुझे झिझक होती है बताने में कि मैं लिखती हूँ। पता नहीं कैसा लिखती हूँ।” वे मुस्कुराए और कहने लगे- ''तुम जो भी लिखती हो जैसा भी लिखती हो मानो कि अच्छा लिखती हो। कोई क्या सोचेगा, यह मत सोचो। अपनी किताब छपवाओ।” यह सुनकर मुझमें जैसे साहस आया। उसके बाद अपनी कविताओं को मैं बेहिचक सार्वजनिक करने लगी।  

मैं अक्सर इमरोज़ जी से मिलने जाती थी। कभी फ़ोन पर बात हो जाती। जब भी जाती 2-3 घंटे बैठती और इमरोज़ जी चाय बनाकर पिलाते। वे अपनी नज़्में सुनाते। उनमें गज़ब की ऊर्जा, स्फूर्ति, तेज़ और शालीनता थी। उन्होंने अपनी किताब, कैलेण्डर और कुछ अनछपी कविताएँ भी दीं। मैं कोई-न-कोई उनके क़िस्से उनसे पूछती रहती। वे सहज रूप से सारे क़िस्से सुनाते। किसी भी सवाल पर वे बुरा नहीं मानते थे, भले कितना ही निजी सवाल पूछूँ। कुछ कवयित्री उन्हें हिन्दी में लिखी हुई रचनाएँ भेजती थीं, वे मुझसे कहते कि पढ़ दो। वे पंजाबी और उर्दू लिखना पढ़ना जानते थे, हिन्दी नहीं।
इमरोज़ जी और मैं
एक दिन मैं उनके घर जा रही थी, तो वे बोले कि अमुक जगह रुको मैं आ रहा हूँ। वे आए और बोले कि पास में बाज़ार है, वहाँ चलो कॉफ़ी पिएँगे। हम लोग पास ही एस.डी.ए. मार्केट में गए कॉफ़ी पीने। कॉफ़ी के साथ मेरी कविता और अमृता की बातें होती रहीं। अमृता जी की बेटी का घर पास में ही है, जहाँ वे बाद में चले गए। 

जब भी मिली उन्हें कभी नाख़ुश नहीं देखा। हर परिस्थिति में वे मुस्कुराते रहते, जैसे मुस्कराहट का मौसम उनपर आकर ठहर गया हो। यहाँ तक कि जब ग्रीन पार्क का घर बिक गया, तो मैं बहुत दुःखी थी। मैंने उनसे पूछा कि आपने क्यों नहीं रोका मकान बेचने से, आपको बहुत दुःख हुआ होगा। वे मुस्कुराने लगे। मुझे लगा कि अपने मन की पीड़ा वे बताते नहीं हैं, अपनी मुस्कराहट में सब छुपा जाते हैं।
 
जब तक वे हौज़ ख़ास वाले घर में रहे, मैं अक्सर चली जाती थी। एक सुकून-सा मिलता था उनसे बातें करके। जब वे ग्रेटर कैलाश के मकान में चले गए, तब भी गई। नया घर भी बहुत क़रीने से था, जहाँ अमृता उनके साथ जी रही थीं। 
आईने में हमारी छवि - इमरोज़ जी और मैं
मेरी किताब अब तक छपी न थी। 2013 में एक दिन इमरोज़ जी का फ़ोन आया। उन्होंने एक नंबर देकर कहा कि यह प्रकाशक है, इससे बात करो और किताब छपवाओ। संयोग से प्रकाशक को मैं पहले से जानती थी। मैंने बताया कि मैं इन्हें जानती हूँ और इनसे ही मेरी पहली किताब छपेगी। किन्हीं कारणों से मेरी किताब छपने में बहुत देर हुई। मेरी इच्छा थी कि इमरोज़ जी की पेंटिंग मेरी किताब का आवरण चित्र हो। लेकिन जब किताब छपने का समय आया तो इमरोज़ जी दिल्ली से बाहर थे। बिना उनकी अनुमति के मैं चित्र का उपयोग नहीं कर सकती थी; हालाँकि मेरे पास उनकी पेंटिंग थी। किताब छपी, इमरोज़ जी को बताया। बहुत ख़ुश थे वे। परन्तु ऐसा संयोग रहा कि मैं अपनी किताब के साथ उनसे मिल न सकी।

इमरोज़ जी के लिए मेरे जैसी हज़ारों प्रशंसक है; परन्तु मेरे लिए इमरोज़ जी जैसा कोई नहीं। मुझमें साहस व हिम्मत उनके कारण आया, जिससे मैं अपनी लेखनी को सार्वजनिक कर सकी। इमरोज़ जी के साथ मेरी ढेरों यादें हैं। विगत 2 साल से मैं मिलने का प्रयास कर रही थी, लेकिन उनके अस्वस्थ होने के कारण मिल न सकी। इस वर्ष भी उनके जन्मदिन 26 जनवरी को फ़ोन पर बात न हो सकी। अब न कभी मुलाक़ात होगी न बात होगी
।
इमरोज़ चले गए। पर वे अकेले नहीं गए, अमृता को साथ ले गए। जब तक इमरोज़ रहे, अमृता को जीवित रखा। कहते हैं कि शरीर मृत्यु के बाद पंचतत्व में मिल जाता है, लेकिन आत्मा नहीं मिटती। शायद अमृता-इमरोज़ की रूहें फिर से मिली होंगी। मुमकिन है कोई और दुनिया हो, जहाँ रूहें रहा करती हैं। उस संसार में अमृता-इमरोज़ अपनी-अपनी कलाओं में व्यस्त होंगे। इमा-माझा साथ-साथ चाय पिएँगे और अपने-अपने क़िस्से सुनाएँगे। 

प्रेम के बारे में बहुत पढ़ा-सुना; लेकिन प्रेम क्या होता है, यह मैंने इमरोज़ जी से जाना, समझा और देखा। इमरोज़ का प्रेम ऐसा है, जिसमें न कोई कामना है, न कोई अपेक्षा। इमरोज़ का अस्तित्व ही प्रेम है। इमरोज़ प्रेम के पर्याय हैं। इमरोज़-सा न कोई हुआ है न होगा।  
 
अलविदा इमरोज़!
अलविदा इमा-माझा!

- जेन्नी शबनम (22.12.2023)
____________________

Saturday, March 8, 2014

47. तेरे शाह की कंजरी (व्यथा-कथा)

''ओ अमृता! देख, तेरे शाह की कंजरी मेरे घर आ गई है। तेरी शाहनी तो ख़ुश होगी न! उसका शाह अब उसके पास वापस जो आ गया। वह देख उस बदज़ात को, तेरे शाह से ख़ूब ऐंठे और अब मेरे शाह की बाँहें थाम ली है। नहीं-नहीं तेरी उस कंजरी का भी क्या दोष, मेरे शाह ने ही उसे पकड़ लिया है। वह करमजली तो तब भी कंजरी थी जब तेरे शाह के पास थी, अब भी कंजरी है जब मेरे शाह के पास है।'' 
 
झिंझोड़ते हुए मैं बोल पड़ी ''क्या बकती है? कुछ भी बोलती है। तेरा शाह ऐसा तो नहीं। देख तेरे लिए क्या-क्या करता है। गाड़ी-बँगला, गहना-ज़ेवर, नौकर-चाकर... फिर भी ऐसा बोलती है तू।'' ''ज़रूर तुझे कुछ ग़लतफ़हमी हुई है। अमृता को पढ़ते-पढ़ते कहीं तू उनकी कहानियों को अपने जीवन का हिस्सा तो नहीं मान रही है। किसी झूठ को सत्य मानकर अपना ही जी जला रही है तू। वह कहानी है पगली, तेरी ज़िन्दगी नहीं।''
 
फफककर रो पड़ी वह। कहने लगी, ''तू तो बचपन से जानती है न मुझे। जब तक कुछ पक्का न जान लूँ तब तक यक़ीन नहीं करती। और यह सब बोलूँ भी तो किससे?'' ''जानती हूँ वह कंजरी मेरा घर-बार लूट रही है; लेकिन मैं कुछ बोल भी नहीं सकती। कोई शिकायत न करूँ इसलिए पहले ही मुझ पर ऐसे-ऐसे आरोप मढ़ दिए जाते हैं कि जी चाहता है ख़ुदकुशी कर लूँ।'' ''तू नहीं जानती उस कंजरी के सामने कितनी जलील हुई हूँ। वह उसका ही फ़ायदा उठा रही है। पर उसका भी क्या दोष है। मेरी ही तक़दीर... अपना ही सिक्का खोटा हो तो...।'' 
 
मैं हतप्रभ! मानों मेरे बदन का लहू जम गया हो। यों लगा जैसे कोई टीस धीरे-धीरे दिल से उभरकर बदन में पसर गई हो। न कुछ कहते बना न समझते न समझाते। दिमाग मानो शून्य हो गया। मैं तो तीनों को जानती हूँ, किसे दोष दूँ? अपनी उस शाहनी को जिसे बचपन से जानती थी, उसके शाह को या उसके शाह की उस कंजरी को?  
 
याद है मुझे कुछ ही साल पहले सुबह-सुबह वह मेरे घर आई थी। उसके हाथ में अमृता प्रीतम की लिखी कहानियों का एक संग्रह था, जिसकी एक कहानी 'शाह की कंजरी' पढ़ने के लिए वह मुझे बार-बार कह रही थी और मैं बाद में पढ़ लूँगी कहकर उस किताब को ताखे पर रखकर भूल गई। एक दिन फिर वह सुबह-सुबह मेरे घर आई, और उस कहानी का ज़िक्र किया कि मैंने पढ़ी या नहीं। मेरे न कहने के बाद वह रुआँसी हो गई और कहने लगी कि अभी-के-अभी मैं वह कहानी पढूँ, तब तक वह रसोई का मेरा काम सँभाल देगी। मुझे भी अचरज हुआ कि आख़िर ऐसा भी क्या है उस कहानी में। यों अमृता को काफ़ी पढ़ा है मैंने और उन्हें पढ़कर लिखने की प्रेरणा भी मिली है; पर इस कहानी में ऐसा क्या है कि मुझे पढ़ाने के लिए वह परेशान है। मुझे लगा कि शायद कुछ अच्छा लिख सकूँ, इसलिए पढ़ने के लिए वह मुझे इतना ज़ोर दे रही है।  
 
कहानी जब पढ़ चुकी, तो उसने पूछा कि मुझे कैसी लगी कहानी। मैंने कहा कि बहुत अच्छी लगी 'शाह की कंजरी'। उसकी आँखों में पानी भर आया और बिलख-बिलखकर रोने लगी। मैं भी घबरा गई कि बात-बेबात ठहाके लगाने वाली को क्या हो गया है। अपने शाह और उसकी कंजरी के लिए जीभरकर अपना भड़ास निकालने के बाद वह अपनी तक़दीर को कोसने लगी। अब तक मैं भी अपने को सँभाल चुकी थी। उसे जीभरकर रोने दिया; क्योंकि रोने के अलावा न वह कुछ कर सकती थी, न मैं कोई झूठी तसल्ली दे सकती थी। 
 
सोचती हूँ, तक़दीर भी कैसा खेल खेलती है। अमृता को पढ़ते-पढ़ते जैसे वह उसकी कहानी की पात्र ही बन गई। अमृता की शाहनी तो पूरे ठसक से अपने घर में रहती थी और कंजरी शाह के पैसे से होटल में। पर मेरी यह शाहनी अपने घर में रहकर भी घर में नहीं रहती; क्योंकि उसके घर पर उसका मालिकाना तो है, मगर उसके शाह पर कंजरी का मालिकना है और कंजरी पूरे हक़ और निर्लज्जता से उसी घर में रहती है। शाह ने वह सारे अधिकार उस कंजरी को दे दिए हैं, जिसे सिर्फ़ शाहनी का होना था। जब उसका मालिक ही बन्धक हो तो... उफ़! सच, कितनी बदनसीब है वह। 
 
मेरा मन करता है कि चीख-चीखकर कहूँ ''ओ अमृता! तू अपने शाह से कह कि अपनी कंजरी को लेकर दूर चला जाए; मेरी शाहनी को ऐसा शाह मंज़ूर नहीं।'' ''भले वह नसीबोंवाली नहीं, पर इतनी बे-ग़ैरत भी न बना उसे। उसके शाह ने एक-एक कर सारे पर कतर दिए और अब कहता है कि उसके पर नहीं, इसलिए उसे परों वाली कंजरी चाहिए।''  
 
 
-जेन्नी शबनम (8.3.2014)
__________________

Thursday, June 21, 2012

38. क्योंकि वह ताजमहल नहीं था

साइनबोर्ड 
एक बार फिर रोई अमृता, फूट-फूटकर रोई। इमरोज़ के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़कर झिंझोड़कर पूछा- ''क्यों नहीं बचाया मेरा घर? क्यों नहीं लड़ सके तुम मेरे लिए?'' ''बोलो इमा, क्यों नहीं रोका तुमने उन लोगों को, जो मेरी ख़्वाहिशों को उजाड़ रहे थे, हमारे प्रेम के महल को ध्वस्त कर रहे थे? हर एक कोने में मैं जीवित थी तुम्हारे साथ, क्यों छीन लेने दिया मेरा संसार?'' 
इमरोज़ जी
इमरोज़ निःशब्द! इमरोज़ बेबस! ख़ामोशी से अपनी माझा को रोते हुए देखते रहे। आँखें भीग गईं, फिर तड़पकर कहा- ''माझा, मैं क्या करता, मेरा हक़ तो सिर्फ़ तुम पर था न, उस घर पर नहीं। मैं कैसे रोकता उन्हें?'' ''माझा! मैं घर को बचा नहीं सका, मैं किसके पास जाकर गिड़गिड़ाता? जिन लोगों ने तुमको इतना सम्मान दिया, पुरस्कृत किया, उन लोगों में से कोई भी तुम्हारे धरोहर को बचाने नहीं आया।'' ''माझा! उस घर को मैं अपने सीने में समेट लाया हूँ। हमारे घर के ऊपर बने विशाल बहुमंजिली इमारत में वे ईंटें दफ़्न हैं, जिन्हें तुमने जोड़ा था और मैंने रंगों से सजाया था।'' ''ये देखो माझा! हमारी वह तस्वीर ले आया, जब पहली बार तुम मेरे लिए रोटी सेंक रही थी, तुम्हें कितना अच्छा लगता था मेरे लिए खाना बनाना। ये देखो! वह कप भी मैं ले आया हूँ, जिसमें हर रात मैं तुमको चाय देता हूँ; रात में तुम अब भी लिखते समय चाय पीना चाहती हो न। वह देखो! उस तस्वीर में तुम कितनी सुन्दर लग रही हो, जब पहली बार हम मिले थे। वह देखो! हमारे घर का नेम-प्लेट 'अमृता प्रीतम, के-25', और देखो वह तस्वीर जिसे बनाने में मुझे पाँच साल लगे थे, जिसे तुम्हारे कहने पर मैंने बनाया था 'वुमेन विद माइंड'।'' ''माझा, मैं अपनी तक़लीफ़ किसे दिखाऊँ? मेरी लाचारी तुम समझती हो न! तुम तो चली गई, मुझे अकेला छोड़ गई। सभी आते हैं और मुझमें तुमको ढूँढते हैं, पर मैं तुमको कहाँ ढूँढूँ?'' ''माझा!  मेरा मन बस अब तुम्हारा घर है, क्योंकि अब तुम सीधे मेरे पास आती हो, पहले तो तुम जीवन के हर खट्टे-मीठे अनुभव के बाद मुझ तक आई थी। तुम्हारी यादें और मैं अब मेरा घर है।''     
बिकने के बाद टूटकर बन रहा k-25
किसी जीवित घर का मिटाया जाना विधि का विधान नहीं, न नियति का क्रूर मज़ाक है; बल्कि मनुष्य के असंवेदनशील होने का प्रमाण है। उस घर का बाशिंदा कितना तड़पा होगा, जब उससे वह घर छीन लिया गया होगा, जिसमें उसकी प्रियतमा की हर निशानी मौजूद है। ये सब अतीत की कथा नहीं बल्कि उसका वर्तमान जीवन है। कितना रोया होगा वह। कितना पुकारा होगा वह अपनी प्रियतमा को, जिसने अकेला छोड़ दिया यादों के सहारे जीने के लिए। पर उसने सदैव उसे अपने साथ महसूस किया है, उसे सोचा नहीं; बल्कि उसके साथ जी रहा है। कितनी बेबस हुई होगी उस स्त्री की आत्मा जब उसके सपनों का घर टूट रहा होगा और उसका हमसफ़र उसकी निशानियों को चुन-चुनकर समेट रहा होगा। तोड़ दिया गया प्रेम का मन्दिर। फफक पड़ी होंगी दीवार की एक-एक ईंटें। चूर हो गया किसी स्त्री की ख़्वाहिशों का संसार। कैसे दिल न पिघला होगा उसका, जिसने इस पवित्र घर को नष्ट कर दिया। क्या ज़रा भी नहीं सोचा कि अमृता की आत्मा यहाँ बसती है? अमृता को उसके ही घर से बेदख़ल कर दिया गया और उसकी निशानियों को सदा के लिए मिटा दिया गया। 
कुछ यादें- अमृता-इमरोज़
हौज़ ख़ास के मकान नम्बर k-25 के गेट में घुसते ही सामने खड़ी मारुती कार, जिसे अमृता-इमरोज़ ने साझा खरीदा था, अब कभी नहीं दिखेगी। घंटी बजाने पर कुर्ता-पायजामा और स्पोर्ट्स शू पहने ज़ीने से उतरकर दरवाज़ा खोलते हर्षित इमरोज़, जो बहुत ख़ुश होकर पहली मंजिल पर ले जाते और सामने लगी खाने की मेज़-कुर्सी पर बिठाते हुए कहते हैं- ''देखो वहाँ अमृता अभी सो रही है'', साथ लगी उस रसोई में ख़ुद चाय बनाते, जिस रसोई में न जाने कितनी बार अमृता ने रोटी पकाई होगी; अब कभी न दिखेगी। रसोई में रखी काँच की छोटी-छोटी शीशियाँ भी उस वक़्त की गवाह हैं, जब अमृता रसोई में अपने हाथों से कुछ पकाती थीं और इमरोज़ उसे निहारते थे। अमृता का वह कमरा जहाँ अमृता ने कितनी रचनाएँ गढ़ीं, जहाँ इमरोज़ की गोद में अन्तिम साँस ली; अब कभी नहीं दिखेगा। कैनवस पर चित्रित अमृता-इमरोज़ की साझी ज़िन्दगी का इन्द्रधनुषी रंग जो उस घर के हर हिस्से में दमकता था, अब कभी नहीं दिखेगा। सफ़ेद फूल जो अमृता को बहुत पसन्द है, इमरोज़ हर दिन लाकर सामने की मेज़ पर सजा देते थे; अब उस मेज़ की जगह बदल चुकी है। अमृता की रूह शायद अब भी उस जगह भटक रही होगी; मेज़, फूल और फूलदान को तलाश रही होगी। छत के पास अब भी पंछी आते होंगे कि शायद इमरोज़ आ जाएँ और दाना-पानी दे जाएँ, पर अब जब छत ही नहीं रहा तो पखेरू दर्द भरे स्वर में पुकारकर लौट जाते होंगे। 
साहिर-अमृता
अमृता का जीवन, अमृता का प्रेम, अमृता की रचनाएँ, अमृता के बच्चों की किलकारियाँ, अमृता के हमसफ़र की जुम्बिश, चाय की प्याली, कैनवस पर इमरोज़ का जीवन- अमृता, रसोईघर में चाय बनाते इमरोज़, रोटी सेंकती अमृता, बच्चों को स्कूटर पर स्कूल छोड़ते इमरोज़, हर शाम पंछियों को दाना-पानी देते इमरोज़, पूरी दुनिया में अपनी रचनाओं के द्वारा सम्मानित अमृता जो अपने बिस्तर पर लाचार पड़ी है - वृद्ध अशक्त अमृता का सहारा बनते इमरोज़, हर एक तस्वीर जिसमें अमृता है का विस्तृत विवरण देते इमरोज़; अमृता और अमृता का साझा-संसार जो उनके मन में सिमट गया है। इमरोज़ जो बिना थके कई बार नीचे दरवाज़ा खोलने, कभी छत पर पौधों में पानी डालने, कभी सबसे ऊपर की छत पर पंछियों का कलरव देखने आते जाते रहते। इमरोज़ के माथे पर न शिकन न शिकायत, बदन में इतनी स्फूर्ति मानो अमृता ने अपनी सारी शक्ति सहेजकर रखी हो और विदा होते वक़्त अन्तिम आलिंगन में सौंप दिया हो और चुपके से कहा हो ''मेरे इमा, मैं इस शरीर को छोड़कर जा रही हूँ, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी, तुम कभी थकना नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूँ, पग-पग पर, पल-पल में, वक़्त के उस आख़िरी छोर तक जब तक तुम इस शरीर में हो, सामने वाले कमरे में बैठी मैं हर रात तुम्हारे लिए गीत रचूँगी और जिसे तुम अपने हाथों से नज़्म का रूप दोगे। मैं तुम्हारी माझा, तुम्हारे लिए सदैव वर्तमान हूँ, यों भी तुम इमरोज़ हो जिसका अर्थ है आज, तुम मेरे आज हो, मेरी ख़्वाहिशों को तुम पालना, हमारे इस घर में मैं हर जगह मौजूद रहूँगी, तुम जीवन का जश्न जारी रखना, तुम्हारे कैनवस पर और तुम्हारी नज़्मों में मैं रहूँगी, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।'' 
मुश्किलों से जूझती अमृता का 'अमृता प्रीतम' बनना इतना सहज नहीं हुआ होगा। पति से अलग हुई एक आम औरत जिसके दो छोटे बच्चे, जीवन सरल नहीं रहा होगा। टूटी-हारी 40 वर्षीया अमृता को इमरोज़ का साथ और फिर समाज की मान्यताओं और प्रतिमानों से जूझना बेहद कठिन हुआ होगा। रेडियो स्टेशन में कामकर घर चलाती अमृता ने कैसे-कैसे दिन देखे होंगें, ये तो बस वे जानती हैं या इमरोज़। अमृता का सम्पूर्ण अस्तित्व जो उस एक घर में बना, पसरा, फिर सिमटा, कितनी क्रूरता से मिटा दिया गया।इमरोज़ के लिए नहीं, तो कम-से-कम उस औरत, जिसकी हर ख़्वाहिशें और ज़िन्दगी यहाँ मौजूद थी, पर तो रहम किया होता। प्रेम की दुहाई देने वाले और अमृता-इमरोज़ के प्रेम की मिसाल देने वाले कहाँ गए? क्या जीवन के बाद ऐसे ही भुला दिया जाता है उसकी हस्ती को, जिसने समाज को एक नई सोच और दिशा दी, जिसने स्त्री होने के अपराधबोध से ग्रस्त होना नहीं सीखा और स्त्री को गौरव प्रदान किया, पुरुष को सिर्फ़ एक मर्द नहीं, बल्कि एक इंसान और सच्चे साथी के रूप में समझा।   
नए फ्लैट का एक कोना
अब कहाँ ढूँढूँ उस घर को? प्रेम के उस मन्दिर को? वह घर टूटकर बहुमंजिली इमारत में तब्दील हो चुका है। अमृता बहुत रो रही थी और अपने इमरोज़ को समझा रही थी- ''वह सिर्फ़ एक मकान नहीं था इमा, हमारा प्रेम और संसार बसता था वहाँ। मेरे अपनों ने मुझे मेरे ही घर से बेदख़ल कर दिया। हाँ इमा! जानती हूँ तुम्हारी बेबसी, मेरे घर के कानूनी हक़दार तुम नहीं हो न! दुनिया के रिवाज से तुम मेरे कोई नहीं, ये बस मैं जानती हूँ कि तुम मेरे सब कुछ हो, जानती हूँ तुम यहाँ मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहे होगे पर कानून... उफ़!''
नए घर के एक आईने में मैं और इमरोज़ जी
इमरोज़ जी से पूछने पर कि उस घर को क्यों बेच दिया गया, वे कहते हैं- ''जीवन में 'क्यों' कभी नहीं पूछना, हर 'क्यों' का जवाब भी नहीं होता है, जो होता है ठीक ही होता है।'' ''अगर अमृता होती तो उनको कैसा लगता?'' पूछने पर बहुत संजीदगी से मुस्कुराते हुए कहते हैं- ''अगर अमृता होती तो वह घर बिकता ही नहीं।'' ''ये घर भी बहुत बड़ा है और बच्चों को जो पसन्द मुझे भी पसन्द, अपने बच्चों के साथ ही मुझे रहना है।'' 
विस्तार से घर दिखाते इमरोज़ जी और मैं
इमरोज़ के साथ अमृता अब नए घर में आ चुकी है। अमृता के परिवार के साथ दूसरे मकान में शिफ्ट होते समय इमरोज़ जी ने अमृता की हर निशानी को अपने साथ लाया है और पुराने मकान की तरह यहाँ भी सजा दिया है।हर कमरे में अमृता, हर जगह अमृता। चाहे उनके पेंटिंग करने का कमरा हो या उनका शयन कक्ष, गैलरी, भोजन कक्ष, या फिर अन्य कमरा। अमृता को देखना या महसूस करना हो, तो हमें के-25 या एन-13 नहीं बल्कि इमरोज़ से मिलना होगा। इमरोज़ जी के साथ अमृता हर जगह हैं, चाहे वे जहाँ भी रहें। 
इमरोज़ जी और मैं
-जेन्नी शबनम (21.6.2012)
___________________