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Thursday, July 18, 2024

112. भगदड़

उत्तर प्रदेश राज्य के हाथरस ज़िला में सिकंदराराव के गाँव फुलरई में 2 जुलाई 2024 को सत्संग के बाद हुई भगदड़ में 121 लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें 113 महिलाएँ हैं। यह भगदड़ कथावाचक भोले बाबा उर्फ़ सूरज पाल उर्फ़ नारायण साकार विश्व हरि के सत्संग के बाद हुई। कथावाचन के बाद बाबा के आदेशानुसार वापस जाते समय अनुयायी बाबा का आशीर्वाद व चरण-रज लेने के लिए दौड़ पड़े, जिससे भगदड़ मच गई। 

वर्ष 2013 में 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन' में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में 79% भगदड़ धार्मिक सभाओं और तीर्थयात्राओं के कारण होती है। यह भी पाया गया कि ये धार्मिक सामूहिक आयोजन अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में किए जाते हैं, जहाँ बुनियादी सुविधाएँ नहीं होने के कारण ख़तरा बना रहता है।  

वैज्ञानिकों ने एक डाटाबेस तैयार किया है, जिसके आँकड़े के अनुसार भारत और पश्चिमी अफ्रीका भगदड़ की दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है। सबसे ज़्यादा खेल और धार्मिक आयोजनों में ऐसी दुर्घटनाएँ होती हैं।

भीड़ पर से नियंत्रण ख़त्म हो जाए या भीड़ प्रबन्धन असफल हो जाए तो भगदड़ मच जाती है; भीड़ के एकत्रित होने का कारण कुछ भी हो सकता है। न सिर्फ़ भारत में बल्कि विदेशों में भी ऐसी कई दुर्घटनाएँ हुईं हैं। न सिर्फ़ धार्मिक आयोजन बल्कि अन्य कार्यक्रम जहाँ भीड़ बहुत होती है, ऐसे हादसे होते हैं। 

वर्ष 1989 में ब्रिटैन के शेफील्ड के एक स्टेडियम में एक मैच के दौरान प्रशंसकों की भीड़ अनियंत्रित हो गई, जिसमें 96 लोग मारे गए। वर्ष 2001 में अफ्रीका के अकरा के एक स्टेडियम में अनियंत्रित प्रशंसको पर पुलिस द्वारा आँसू-गैस छोड़े जाने पर भगदड़ हो गई, जिसमें 126 लोग मारे गए। वर्ष 2022 में इंडोनेशिया के एक स्टेडियम में भगदड़ के कारण 125 लोग मारे गए। 

अंतरजाल पर मिली सूचनाओं के अनुसार भारत और विदेशों की भगदड़ की बड़ी दुर्घटनाओं का विवरण निम्न है- 

*वर्ष 2003 में महाराष्ट्र के नासिक ज़िले सिंहस्थ कुम्भ मेले में पवित्र स्नान के दौरान हुए भगदड़ में 39 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में मंधारदेवी मन्दिर में वार्षिक तीर्थयात्रा के दौरान 340 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2008 में हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले के नैना देवी मन्दिर में चट्टान खिसकने की अफ़वाह से मचे भगदड़ में 162 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2008 में राजस्थान के जोधपुर में चामुण्डा देवी मन्दिर में बम विस्फोट की अफ़वाह के भगदड़ में 250 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2010 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में राम जानकी मन्दिर में कृपालु महाराज द्वारा दान दिए जा रहे खाना व कपड़ा लेने के दौरान मची भगदड़ में 63 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2011 में केरल के इडुक्की ज़िले में सबरीमाला मन्दिर से दर्शन कर लौट रहे लोगों से एक जीप के टकरा जाने के बाद मची भगदड़ में 104 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2011 में उत्तराखण्ड में हरिद्वार के हर की पौड़ी के भगदड़ में 20 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2012 में बिहार के पटना में गंगा नदी के घाट पर छठ पूजा के दौरान अस्थायी पुल के ढहने से हुई भगदड़ में 20 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2013 में मध्य प्रदेश के दतिया ज़िले में रतनगढ़ मन्दिर के पास नवरात्र उत्सव के दौरान पुल टूटने की अफ़वाह से मची भगदड़ में 115 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2014 में बिहार के पटना के गाँधी मैदान में दशहरा समारोह की समाप्ति के तुरन्त बाद मची भगदड़ में 32 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2015 में आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी ज़िले में पुष्करम उत्सव के दिन गोदावरी नदी के तट के स्नान स्थल पर भगदड़ में 27 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2022 में जम्मू-कश्मीर के माता वैष्णो देवी मन्दिर में भीड़ के कारण हुई भगदड़ में 12 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2023 में इंदौर के बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मन्दिर में रामनवमी के अवसर पर आयोजित हवन कार्यक्रम के दौरान बावड़ी का स्लैब ढह जाने से 36 लोगों की मौत हुई। 

*वर्ष 1990 में सऊदी अरब के मक्का के अल-मुआइसम सुरंग में ईद-उल-अजहा के मौक़े पर हज यात्रा के दौरान भगदड़ में 1426 लोगों की मौत हुई।
*वर्ष 1994 सऊदी अरब के मक्का के पास जमरात पुल के पास शैतान को पत्थर मारने के हज-रस्म के दौरान हुए भगदड़ में 270 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2004 में ही जमारात ब्रिज के पास शैतान को पत्थर मारने के हज-रस्म के भगदड़ में 251 लोगों की मौत हुई। 
*वर्ष 2022 में दक्षिण कोरिया के सियोल में हैलोवीन समारोह की भगदड़ में 151 लोगों की मौत हुई। 

इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत हो या विदेश हर जगह हीरो-वर्शिप (Hero-worship) की जाती है; चाहे वह खेल का मैदान हो या किसी बाबा या ईश्वर के लिए अंधभक्ति। पूजा, प्रेम, भक्ति, आदर, सम्मान, अनुराग, आराधना, सम्मान, पसन्द इत्यादि होना ग़लत नहीं है। ग़लत तो तब होता है जब इनमें से किसी की भी अति हो, और इसी अति का दुष्परिणाम है ऐसा हादसा।  

धर्म के नाम पर न जाने कितनी सदियों से अत्याचार हो रहे हैं और यह सब जानकर भी लोग इसमें फँस जाते हैं। चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय की बात क्यों न हो। ईसाई समाज के बाबा दूर खड़े मंत्र पढ़ते हैं और लोग गिरने लगते हैं। हर रविवार को विशेष प्रार्थना के लिए हर ईसाई का चर्च में जाना अनिवार्य है। ऐसे ही मुस्लिम समाज में मुल्ला-मौलवी ने जो कह दिया वह पत्थर की लकीर है। मक्का-मदीना जाना है तो जाना है, भले शरीर से लाचार हो। हिन्दू देवी-देवताओं के अधिकतर मशहूर मन्दिर पहाड़ों पर या ऊँचे स्थानों पर बने हुए हैं; भले जान चली जाए पर वहाँ जाना ही है। 

बेहद आश्चर्य होता है कि आज का सभ्य और शिक्षित समाज ऐसे बाबाओं के चक्कर में कैसे फँस जाता है; गाँव हो या शहर। स्त्रियाँ इन बाबाओं के चंगुल में ज़्यादा फँसती हैं और अपना सर्वस्व लुटा बैठती हैं, चाहे वे शिक्षित हों या अशिक्षित। कुछ दशक पहले तक बहुत कम लोग अंधभक्त होते थे। नित्य-क्रिया की तरह पूजा-पाठ, वंदना, नमाज़ या प्रार्थना किया करते थे। जिस ख़ास दिन पर कोई उत्सव हो वह मनाया करते थे। परन्तु अब यह सब फ़ैशन की तरह हो गया है। उस पर से हर कुछ दिन में एक नया बाबा आ जाता है और लोग पुण्य कमाने उसके पास दौड़ पड़ते हैं। सोच, समझ, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक सबको पछाड़ दे रहा है यह बाबा-मुल्ला समाज। इनके तर्कहीन, अवैज्ञानिक और अनर्गल बातों पर विशवास कर लोग इनका अनुसरण और अनुकरण करते हैं और किसी-न-किसी हादसे के शिकार हो जाते हैं। राम रहीम, निर्मल बाबा, आसाराम, सूरज पाल या अन्य बाबा; इन सभी ने स्त्रियों पर अत्याचार किया और कितनों की जान ले चुके हैं। 

निःसन्देह बाबा-मुल्ला दोषी है; लेकिन हमारा अशिक्षित समाज ज़्यादा दोषी है। धन, सुख, पद, प्रतिष्ठा, संतान, मनोकामना इत्यादि का लोभ और ईश्वर का डर मनुष्य को इन पाखण्डियों के नज़दीक ले जाता है और फिर वे इसका फ़ायदा उठाते हैं। हर धर्म-ग्रन्थ में प्रेम, दया, अहिंसा, मर्यादा, मोक्ष की बातें बताई गई हैं; परन्तु लोग इसे न अपनाकर मन्दिर-मस्जिद-चर्च में भटक रहे हैं और बाबाओं, मुल्लों, पादरियों के चक्कर में पड़ रहे हैं।      

जान-बूझकर पाप करना ही क्यों, जो पुण्य के चक्कर में मन्दिर-मस्जिद भटकना पड़े, बाबाओं या पंडितों से निदान का उपाय करवाना पड़े। जो भी संत, महात्मा, फ़क़ीर या गुरु होते हैं, वे भीड़ जुटाकर लोगों को बरगलाकर जबरन अपनी प्रतिष्ठा नहीं करवाते, न तो वे चमत्कार दिखाते हैं, न अनुयायियों की संख्या बढ़ाते हैं। लेकिन पाखण्डी जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, तरह-तरह के अनुष्ठान क्रिया आदि करके लोगों के दिमाग़ को क़ैद कर लेते हैं और इसका दुरूपयोग कर अपना धन-बल बढ़ाते हैं।    

निःसन्देह हमारी शिक्षा सही नहीं है, हमारे संस्कार सही नहीं है। अन्यथा लोग वर्तमान जीवन का कर्म छोड़कर मृत्यु टालने और मृत्यु के बाद के सुख के लोभ में न पड़ते, न ऐसे पाखण्डी बाबाओं के चक्कर में पड़कर जान गँवाते। जो बाबा आपसी भाईचारा मिटा रहा है, समाज में आपस में दूरी बढ़ा रहा है, अमीर-ग़रीब का दो समाज बाँट रहा है, शिक्षित को भी अंधविश्वास के कुँआ में धकेल रहा है, अशिक्षित को और भी पिछड़ा बना रहा है; ऐसा बाबा हो मुल्ला हो या पादरी या अन्य कोई भी धर्म का ठेकेदार हमें उससे दूर रहना होगा ताकि उसका धर्म का धंधा बंद हो सके। 

धार्मिक आयोजन या यात्राओं में जितने भी भगदड़ हुए हैं, इन सभी के दोषी हम सब हैं, हमारा शिक्षित समाज है और हमारी सरकार। अपने-अपने धर्म, सम्प्रदाय और नियम का पालन लोग अपने-अपने घरों में करें। सरकार को चाहिए कि सार्वजनिक जगह पर सार्वजनिक रूप से धार्मिक आयोजन को बंद करवाए। जिसे प्रार्थना, नमाज़, पूजा-पाठ या कोई ख़ास अनुष्ठान करना है, वह अपने-अपने घरों में करे या फिर जो भी मन्दिर-मस्जिद-गिरजाघर पहले से है, वहाँ जाकर करे। सभी पाखण्डी बाबाओं, मुल्लों, पादरियों व नक़ली धर्म गुरुओं को कठोर दण्ड मिलना चाहिए ताकि आगे कोई बाबा बनने की हिम्मत न करे। अन्यथा लोग ऐसे ही अंधभक्ति में पड़कर जान-माल गँवाते रहेंगे, बाबा बेफ़िक्र रहकर नया-नया अनुयायी बनाता रहेगा, सरकार मुआवज़ा देती रहेगी। अगर कोई ईश्वर कहीं होता होगा, तो मनुष्य के इस गँवारूपन पर हँसता ही होगा। 

- जेन्नी शबनम (18.7.2024)

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Saturday, May 8, 2010

8. ईश्वर के होने और न होने के बीच

चित्र- गूगल से साभार
''नास्तिकता सहज है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। आस्तिकता हम सिखाते हैं, जन्मजात कोई भी आस्तिक नहीं होता।'' आज सुबह मैंने अपना मेल-बॉक्स खोला, तो एक मित्र द्वारा 'नास्तिकों का एक ब्लॉग' पर एक लेख में यह पढ़ने को मिला। पसन्द का विषय देख सारा काम छोड़ मैं पूरा लेख पढ़ गई, फिर लोगों की प्रतिक्रिया, उत्तर-प्रत्युत्तर भी पढ़ गई। मुझे लगा इस बात पर विचार ज़रूर करना चाहिए कि कहीं हमारी आस्तिकता हमें ज़िन्दगी को पुरज़ोर तरीक़े से जीने में बाधा तो नहीं बन रही है।

मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जिससे मेरी अपनी सोच विकसित हो सकी और मुझ पर कभी कोई विचार प्रभावी न हो सका। मेरे विचार या सोच सही हैं या ग़लत, यह मैं नहीं जानती; लेकिन मेरे लिए यह उपयुक्त है और यह मेरी अपनी समझ से विकसित हुई है। ऐसा नहीं कि मैं अपनी सोच के प्रति कट्टर हूँ; लेकिन किसी को आहत किए बिना अपनी सोच पर क़ायम रहती हूँ। धर्म से जुड़े विषय पर सभी को पढ़ती और समझने का प्रयत्न करती हूँ, जहाँ जो विचार मेरे तर्क की कसौटी पर खरे लगे ख़ुद के जीवन में अपना लेती हूँ। हालाँकि इसे लेकर अक्सर मेरी आलोचना होती है तथा मुझे अपरिपक्व, अधार्मिक और ग़ैर-सामाजिक होने का ख़िताब भी मिलता है। आलोचना हो या प्रशंसा मैं इस पर ज़्यादा नहीं सोचती; लेकिन यह उम्मीद ज़रूर रहती है कि कोई तर्क से मुझे समझाए कि मैं क्यों ग़लत हूँ। सदैव लोगों के पास तर्क नहीं होते, महज़ परम्पराओं, प्रथाओं और तथाकथित आदर्श में गूँथे नियम-क़ानून होते हैं, जो कभी मुझे स्वीकार्य नहीं हुए।  
 
मेरे बचपन की कुछ बातें हैं जो आज यह सब लिखते-लिखते याद आ गईं, जो शायद इस सन्दर्भ में लिखना उचित भी हो; क्योंकि मेरी सोच को परिष्कृत करने में ये सहायक रहे हैं। मेरे बचपन की बातें जो बहुत हल्की-सी याद है और कुछ बातें बाद में मेरी माँ से मुझे पता चलीं। विजयवाड़ा के एक बहुत बड़े नास्तिक थे 'प्रोफ़ेसर गोरा' (गोपाराजू रामचन्द्र राव) जिनका पूरा नाम तब नहीं जानती थी, जिनकी एक पत्रिका निकलती थी 'atheist', मेरे पिता के वे बहुत घनिष्ट मित्र थे; यों वे उम्र में काफ़ी बड़े थे, पर सोच की समानता उनके घनिष्टता की वजह थी। मैं एक वर्ष की थी, तब अपने माता-पिता के साथ विजयवाड़ा उनके घर 15 दिन रही थी। मैं लगभग 2-3 साल की, तब वे भागलपुर (बिहार) मेरे घर आए थे। मेरे पिता की मृत्यु 1978 में हो गई, फिर सभी से धीरे-धीरे सम्पर्क टूटता चला गया और एल्बम में सँजोए प्रोफ़ेसर गोरा और उनके परिवार की तस्वीरों से ही मैंने यह सब जाना और समझा।  
 
मैं, मेरी मम्मी, मेरा भाई, प्रो. गोरा (भागलपुर)
मुझे याद है बचपन में विजयवाड़ा नाम मुझे अटपटा-सा लगता था। मेरे भाई और मैंने जाने कहाँ से कहना सीख लिया था ''अट्टा-पट्टा विजय-वाड़ा'' और अक्सर हम यह कहते रहते और हाथ पटक-पटककर खेलते थे। पापा अक्सर यह कहकर हमें चिढ़ाया करते थे।  
 
अट्टा-पट्टा विजय-वाड़ा के साथ गोरा जी कब हमारे खेल से मेरे ज़ेहन में उतर गए, मुझे भी पता नहीं चला। मेरे पिता के विचार और जीवन जीने का तरीक़ा आम लोगों से अलग था। जब कुछ समझने लायक हुई, तो न पिता रहे न गोरा जी और न उनसे सम्बन्धित कोई सम्पर्क ही रह गया। लेकिन नास्तिकता-आस्तिकता की बात ज़रूर सोचने और समझने लगी।  
 
मेरे पिता नास्तिक थे, तो घर में कोई भी धार्मिक क्रिया-कलाप नहीं होता था। शायद मेरे ज़ेहन में भी नास्तिकता उन्हें देखकर बैठ गई हो। पिता काफ़ी पहले चल बसे, तो मन में होता था कि कहीं वे नास्तिक थे इसलिए तो नहीं ऐसा हुआ। जिन लोगों को हर वक़्त ईश्वर में लिप्त देखी, वे भी असामयिक मौत मरे, बहुत पीड़ा से गुज़रे, विपदाओं में घिरे। जब मेरी अपनी समझ बढ़ी, तब भी ईश्वर के प्रति न मेरी आस्था जागी, न कोई रुझान।  
 
अपने बचपन से अपनी दादी द्वारा धार्मिक ग्रंथों की कहानियाँ सुनती रही हूँ। मेरी दादी नास्तिक नहीं थीं। वे धार्मिक पुस्तकें बहुत पढ़ती थीं, ईश्वर में आस्था थी उनकी; लेकिन धार्मिक क्रिया-कलाप में उन्होंने कभी हिस्सा नहीं लिया। दादी की मृत्यु 102 वर्ष की अवस्था में 2 साल पहले हुई है।  
 
मैं नहीं जानती कि कोई ईश्वर कहीं है या था; अगर कभी हुआ भी हो, तो अब तक तो ज़िन्दा न होगा। सम्भव है कि कुछ पुराने वृक्ष की तरह सैकड़ों साल जिया हो, या मुमकिन है कि ऐसा कुछ न हुआ हो। प्रकृति की हर बात में या जीवन के हर कार्य में जब हम तर्क ढूँढते हैं, तो ईश्वर के सम्बन्ध में तर्क ढूँढना भी जायज़ है।  
 
अगर ईश्वर ने सब बनाया फिर उसे किसने बनाया? अगर ईश्वर ने ख़ुद को बना लिया फिर इस दुनिया की रचना की, तो इस दुनिया की रचना का औचित्य क्या? अगर कोई औचित्य हो जो ईश्वर ही जानता हो, तो दुनिया विनाश की तरफ़ क्यों बढ़ रही है? अगर सब ईश्वर की इच्छा से होता है तो दुनिया में इतना वर्ग-भेद, वर्ग-संघर्ष, क्लेश, अशांति क्यों? बहुत सारे प्रश्न हैं। बहुत प्रश्न ऐसे भी हैं जो किसी के मन में न आए हों, पर कभी-न-कभी आएँगे ज़रूर।  
 
मैं नास्तिक हूँ, लेकिन परिवार के साथ धार्मिक स्थल जाती हूँ। वहाँ आस्था के माहौल में उपजी शान्ति देखती हूँ, लोगों का अंधविश्वास देखती हूँ, धर्म के नाम पर लोगों का पागलपन देखती हूँ, आस्था के नाम पर डर देखती हूँ। लोग अपने सुख-समृधि के लिए अपनी हैसियत से ज़्यादा चढ़ावा चढ़ाते यानी कि ईश्वर को घूस देते हैं। मन्नत माँगने कहाँ-कहाँ की ख़ाक नहीं छानते हैं। कभी भूखे रहकर, तो कभी व्रत-अनुष्ठान करके अपना कोई फ़ायदा (सुख) माँगते हैं। कोई मुराद पूरी हो, तो उसके लिए चादर चढ़ाते हैं, फिर कोई नई कामना या मनौती तैयार हो जाती है ईश्वर से माँगने के लिए।  
 
आख़िर ये ग़रीब और कट्टर धार्मिक लोग क्यों नहीं अपनी दशा सुधार पाते है, जबकि वे सारा समय ईश्वर का नाम और माला जपते रहते हैं। हालाँकि इसका भी जवाब उनके पास है कि यह पिछले जन्म का फल है, जो इस जन्म में भुगत रहे हैं। हर मनुष्य किसी-न-किसी धर्म (सम्प्रदाय) में विश्वास रखता है, फिर क्या वजह है कि 21वीं सदी तक भी पाप चल रहा है। क्यों नहीं ग़रीबी दूर होती, क्यों समाज में आज भी जाति और वर्ग भेद है?  
 
आज सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद के अलग-अलग संगठन से तबाह है, जो किसी ख़ास धर्म या सम्प्रदाय के नुमाइन्दे हैं। देश के भीतर सांप्रदायिक दंगा या फिर कोई क्रूरतम अपराध आख़िर क्यों है? क्यों नहीं इन आस्तिकों को ख़ौफ़ होता है?  
 
धर्म में पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का डर एक ऐसा मूल-मंत्र है, जो हर लोगों को डरा देता है। साथ ही इससे पार पाने के उपाय भी किए गए हैं, ताकि लोग पाप करें और पुण्य के लिए हमारे पण्डित, पादरी, मुल्ला बैठे हैं, जो उनके पाप को पुण्य में बदलने के लिए ईश्वर तक पहुँच रखते हैं; जैसे दलाली या बिचौलिया का धंधा होता है। सभी धार्मिक स्थल के बाहर भिखारियों की बड़ी जमात होती है, जो भीख माँगते हैं और ईश्वर-ईश्वर का जाप करते हैं। लेकिन न जाने क्यों ईश्वर की कृपा-दृष्टि उनकी तरफ़ होती ही नहीं, न तो खाना-कपड़ा ही मुहैया होता है, घर और नौकरी तो दूर की बात है। शायद इसलिए भी कि अगर ग़रीब न हो, तो फिर पुण्य पाने के लिए दान किसे किया जाएगा। ईश्वर के नाम पर बिना मेहनत गुज़ारा हो जाता है, तो यह धंधा भी अच्छा है।  
 
नास्तिकों के पास पाप करके पुण्य में बदलने का उपाय या विकल्प नहीं होता है; इसलिए वे इस एक जीवन को अपनी सोच और समझ से जीते हैं। न पाप करते हैं, न पुण्य के लिए दर-दर की ख़ाक छानते हैं। इंसानियत ही एक जाति और धर्म होता है, यही इनकी पहचान होती है। अपवाद एक अलग बात है।  
 
मैं न आस्तिकता को उचित मानती हूँ, न नास्तिकता को; क्योंकि 'कुछ है' तभी तो हम उसके पक्ष या विपक्ष में हैं या ख़ुद को नास्तिक या आस्तिक मान रहे हैं। मेरा स्वभाव है कि मैं किसी भी लकीर पर नहीं चल सकती।बिना अपने अनुभव किसी के कहे को सत्य नहीं मानती हूँ। जो उचित लगता है वही करती हूँ; समाज की नज़र में पाप हो या पुण्य।
 
नास्तिकता को एक नई परिभाषा की ज़रूरत है, जिसमें आस्तिकता के विपरीत न बहस हो न सोच। बल्कि एक ऐसी वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण अकाट्य सोच हो, जिसमें किसी से तुलना या सार्थकता पर बहस न होकर सिर्फ़ इंसानियत की बात हो, प्रकृति की बात हो, उत्थान की बात हो, जीवन की बात हो, प्रेम की बात हो, और यही नास्तिकता की नई परिभाषा हो।


-जेन्नी शबनम (8.5.2010)
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Sunday, December 6, 2009

1. राम जन्मभूमि : बाबरी मस्जिद