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Sunday, November 12, 2023

106. 'टाइगर 3'

पोस्टर के साथ मैं
''वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में।'' - यह बहुत बड़ा सच है। यह पंक्ति सलमान खान और कैटरीना कैफ़ अभिनीत फ़िल्म 'टाइगर 3' का डायलॉग है। फ़िल्म के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि जीवन के सन्दर्भ में यह बहुत बड़ा सच है। वक़्त कितनी तेज़ी से बदलता है, आश्चर्य होता है जब पीछे मुड़कर देखती हूँ। यों लगता है मानो पलक झपका और मैं कहाँ-से-कहाँ पहुँच गई। अपने जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव वक़्त के साथ मैंने देखा। हाँ, सिनेमा भी बहुत देखती रही, जब से सिनेमा देखने की उम्र हुई। सिनेमा की शौक़ीन मैं, अब भी ख़ूब मन से सिनेमा देखती हूँ। 

मैं फ़िल्म समीक्षक नहीं हूँ, तो उस दृष्टि से सलमान-शाहरुख की फ़िल्में नहीं देखती। मनोरंजन के लिए देखती हूँ, क्योंकि ये दोनों मेरे पसन्दीदा अभिनेता हैं। इनकी फ़िल्मों में मुझे न फ़िल्म की पटकथा से मतलब होता है, न कहानी से, न व्यर्थ के दिमाग़ी घोड़े दौड़ाने से। बस सिनेमा इंजॉय करती हूँ, भले अकेली जाऊँ, पर देखती ज़रूर हूँ। सलमान-शाहरुख की फ़िल्म पहले दिन देखना हमेशा से मेरे लिए ख़ुशी का दिन होता है। 

फ़िल्म 'टाइगर 3' आज दीपावली के दिन सिनेमा हॉल में रिलीज़ हुई। जैसे ही सलमान पर्दे पर आए, तालियाँ और सीटियाँ बजनी शुरू हो गईं। अब अपनी उम्र के लिहाज़ से मैं तो ऐसा नहीं कर सकती थी, पर तालियों-सीटियों को ख़ूब इंजॉय किया। सलमान के एक डायलॉग ''जब तक टाइगर मरा नहीं, तब तक टाइगर हारा नहीं'' पर पूरा सिनेमा हॉल तालियों से गूँज गया। सलमान के हर एक्शन सीन पर तालियाँ बजती रहीं। फ़िल्म में जब शाहरुख खान (छोटी भूमिका) सलमान की मदद के लिए आते हैं, तब भी सीटी और तालियों की गड़गड़ाहट गूँजने लगी। मुझे याद आया शाहरुख खान की फ़िल्म 'पठान' में सलमान (छोटी भूमिका) शाहरुख की मदद के लिए आते हैं, तो ऐसे ही हॉल में सीटी और तालियाँ गूँजी थीं। 

'टाइगर 3' की कहानी के अन्त में जब यह पता चलता है कि पकिस्तानी प्रधानमंत्री को उनके अपने ही लोग हत्या करने वाले होते हैं, तो हिन्दुस्तान के रॉ एजेन्ट अर्थात सलमान उनको बचाते हैं, तब पाकिस्तानी छात्राओं द्वारा हिन्दुस्तान का राष्ट्रगान 'जन गण मन' का धुन बजाया जाता है। राष्ट्रगान का धुन शुरु होते ही सिनेमा हॉल का हर दर्शक खड़ा हो गया। यह सचमुच बहुत सुखद लगा। काश! हर देश एक दूसरे का सच में ऐसे ही सम्मान करे और कहीं कोई युद्ध न हो।  

मैं सोच रही हूँ कि अगर हर देश और वहाँ का हर देशवासी, चाहे राजनेता हो या आम नागरिक, अमन की चाह रखे तो कभी दो देश के बीच युद्ध नहीं होगा। परन्तु यह सम्भव ही नहीं। सिनेमा देखकर भले हम ताली बजाएँ या सीटी, लेकिन देश की सीमा पर हर दिन जवान मारे जा रहे हैं। कितने ही रॉ एजेन्ट मारे जाते हैं, जिन्हें अपना देश स्वीकार नहीं करता है। अमन की बात करने वाला भी अपने अलावा दूसरे धर्म को प्रेम से नहीं देखता है। आज जिस तरह कई देश आपस में युद्ध कर रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब तीसरा विश्व युद्ध शुरु हो जाएगा। फिर न धर्म बचेगा न देश न दुनिया।

सलमान-शाहरुख मेरे हमउम्र हैं। इन्हें हीरो के रूप में देखकर लगता है कि वे अभी भी युवाओं को मात देते हैं, जबकि मुझ जैसे आम स्त्री-पुरुष इस उम्र में जीवन के अन्तिम पल की गिनती शुरु कर देते हैं। इन अभिनेताओं से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए और जीवन को भरपूर जीना चाहिए। इन्हें देखकर लगता है मानो वक़्त बढ़ता रहा, पर इनकी उम्र ठहर गई; अजर अमर हैं ये। युवा सलमान-शाहरुख से उम्रदराज़ सलमान-शाहरुख को देख रही हूँ। बढ़ती उम्र के साथ ये और भी आकर्षक लगने लगे हैं। इनका न सिर्फ़ सुन्दर व्यक्तित्व है, बल्कि बहुत उम्दा अभिनेता भी है। निःसंदेह सलमान-शाहरुख की बढ़ती उम्र उनकी फ़िल्मों और प्रशंसकों में कमी नहीं ला सकती। 

'टाइगर 3' हिट होगी या फ्लॉप मुझे नहीं मालूम, पर मेरे लिए सलमान-शाहरुख की हर फ़िल्म हिट होती है। मुझे सलमान-शाहरुख-सा कोई अभिनेता नहीं लगता। हालाँकि ढेरों अभिनेता हैं, जो बेहतरीन अभिनय करते हैं, लेकिन इन दोनों की बात ही और है मेरे लिए। इस वर्ष दीपवाली के अवसर पर टाइगर 3 का तोहफ़ा मिला है। उम्मीद है अगले साल ईद के अवसर पर 'टाइगर 4' ईदी के रूप में मिलेगा। 

सलमान की ऊर्जा यूँ ही अक्षुण्ण रहे और लगातार फ़िल्में करते रहें। टाइगर 3 के लिए बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ! 

- जेन्नी शबनम (12.11.2023)
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Friday, July 21, 2017

57. ट्यूबलाइट फ्लॉप पर सलमान सुपरहिट


''मैं अपने यक़ीन से अपने भाई को भी वापस ले आऊँगा।'' वास्तविक जीवन में हमेशा जीतने वाला, कई विवादों में उलझा हुआ, बार-बार प्रेम में पड़ने वाला, लड़कियों का क्रश, लड़कों के लिए मसल्स मैन, फ़िल्म निर्माताओं के लिए पैसा कमाने की मशीन 'सलमान खान' ट्यूबलाइट में जब यह डाॅयलाग बोलता है, तब यक़ीन उसके चेहरे पर दिखाई देता है। फ़िल्म फ्लॉप हुई है, मगर तेज़ी से बढ़ती उम्र के सलमान की यह फ़िल्म ग़ौर करने लायक़ है।  

ट्यूबलाइट के रिलीज होने से पहले फ़िल्म प्रेमियों में हलचल थी।सलमान की लगभग सभी फ़िल्में हिट होती हैं, भले वे किसी भी भूमिका में हों। अमूमन उनका चरित्र संवेदनशील होता है और अगर मारधाड़ है, तो वह कहानी के अनुरूप आवश्यक होता है। उनकी सभी फ़िल्में दर्शकों के अनुकूल होती हैं और सपरिवार देखी जा सकती है। उनकी फ़िल्मों में न नंगापन होता है, न फूहड़पन। फ़िल्म में अगर आइटम सॉन्ग है, तो वह फूहड़ न लगकर मज़ेदार लगता है।  

ट्यूबलाइट के रिलीज होने के दिन फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने से ख़ुद को रोक न सकी। सुबह साढ़े नौ बजे का शो था; मुमकिन है इस कारण भीड़ बहुत नहीं थी, हॉल में कुछ सीटें ख़ाली थीं। सलमान के स्क्रीन पर आते ही हमेशा की तरह युवा दर्शकों ने ताली बजाए और ख़ुश होकर शोर भी किया। फ़िल्म आलोचक को पढ़ने से पता चला कि इस फ़िल्म को दर्शकों का उतना प्यार नहीं मिला, जितना सलमान खान के नाम से मिलता है। मैं कारण नहीं समझ पाई, इस फ़िल्म के पसन्द न किए जाने के पीछे की वज़ह क्या है। फ़िल्म का चित्रांकन, कहानी, पटकथा, लोकेशन, साज-सज्जा सभी बहुत आकर्षक और कहानी के अनुरूप है। कहानी बहुत छोटी है; लेकिन बेहद प्रभावशाली है। मैं सलमान के सभी फ़िल्मों में सबसे ऊपर का स्थान इस फ़िल्म को दूँगी; सलमान की भावनात्मक अदाकारी और मासूमियत के कारण।
 

ट्यूबलाइट युद्ध ड्रामा फ़िल्म है, जिसे कबीर खान ने लिखा और निर्देशित किया है। इसमें एक भोले-भाले बच्चे लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) की कहानी है, जो शारीरिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ है; लेकिन मंदबुद्धि है। कोई भी बात वह थोड़ी देर से समझता है और किसी भी चुनौती से घबरा जाता है, इसलिए सभी उसे ट्यूबलाइट कहते हैं। लक्ष्मण अपने भाई भरत (सुहेल खान) के साथ कुमाऊँ की एक शहरनुमा बस्ती जगतपुर में रहता है।वे अनाथ हैं अतः एक बुज़ुर्ग, जिन्हें वे बन्नी चाचा (ओम पुरी) कहते हैं, उनकी परवरिश करते हैं। कहानी में आज़ादी से पूर्व का भारत दिखाया गया है, जब गांधी जी लक्ष्मण के शहर आते हैं और लक्ष्मण उस समय स्कूल का विद्यार्थी है। गांधी जी द्वारा कही गई बात वह मन में बैठा लेता है कि ''यक़ीन रखने से सब कुछ होता है, ख़ुद पर यक़ीन हो तो चट्टान भी हिलाई जा सकती है और यह यक़ीन दिल में होता है।'' लक्ष्मण के यक़ीन को पहली बार बल तब मिलता है जब शहर में एक जादूगर (शाहरुख खान) आता है।जादू दिखाने के दौरान जादूगर लक्ष्मण से एक बोतल को दूर से हिलाने लिए कहता है। दर्शक इस बात पर ट्यूबलाइट कहकर लक्ष्मण का मज़ाक उड़ाते हैं। काफ़ी कोशिश के बाद बोतल हिल जाता है। यों यह जादूगर के हाथ की सफ़ाई है; लेकिन जादूगर कहता है कि उसने अपने यक़ीन की ताक़त से बोतल को हिलाया है। इसके बाद लक्ष्मण में आत्मविश्वास जागता है और कुछ भी कर सकने का यक़ीन उसमें प्रबल हो जाता है। उसकी आँखों में अपनी पहली सफलता पर विश्वास के आँसू आ जाते हैं और वह कहता है कि वह ट्यूबलाईट नहीं है। 

वर्ष 1962 में भारत-चीन के युद्ध की पृष्ठभूमि पर फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है। भरत का चयन युद्ध में सैनिक के रूप में हो जाता है; परन्तु लक्ष्मण का नॉक-नी (knock knee) के कारण चयन नहीं हो पाता। लक्ष्मण का ख़ुद पर से यक़ीन न टूटे इसलिए भरत कहता है कि उसे जगतपुर का कप्तान बनाया गया है, जिसका काम है इलाक़े की हर ख़बर रखना और जानकारी देना। युद्ध छिड़ चुका है और भरत जंग में शामिल होने चला जाता है। एक चीनी बच्चा अपनी माँ के साथ जगतपुर में रहने के लिए आता है।लक्ष्मण सबको सचेत करने के लिए बताता है कि चीनी आ गए हैं। फिर उसे पता चलता है कि उस चीनी स्त्री के परदादा चीन से आकार भारत में बस गए थे, अतः वह भी सबकी तरह भारतीय है। पर बस्ती के लोग माँ-बेटे को परेशान करते हैं और लक्ष्मण उन्हें बचाता है; क्योंकि वह उस बच्चे से प्यार करने लगता है। गांधी जी की कही हुई बात पर उसे यक़ीन है कि ''अगर दिल में ज़रा भी नफ़रत रहेगी, तो तुम्हारे यक़ीन को खा जाएगी।''

युद्ध के दौरान भरत की मृत्यु की सूचना आती है; लेकिन लक्ष्मण को यक़ीन है कि युद्ध ख़त्म होगा और भाई लौटेगा। लक्ष्मण कहता है ''मैं अपने यक़ीन से अपने भाई को भी वापस ले आऊँगा।'' बन्नी चाचा से वह पूछता है कि और यक़ीन उसे कहाँ मिलेगा; क्योंकि भाई को लाने के लिए उसे बहुत यक़ीन चाहिए। बन्नी चाचा जानते हैं कि यक़ीन से कोई चमत्कार नहीं होता है। फिर भी मासूम लक्ष्मण का हौसला बढ़ाने के लिए कहते हैं ''गांधी जी के क़दमों पर चलो यक़ीन आएगा।'' गांधी जी के आदर्शों की फ़ेहरिस्त बनाकर बन्नी चाचा उसे देते हैं, ताकि उसका ख़ुद पर यक़ीन और बढ़ जाए। 
 
इसी बीच एक संयोग होता है। लक्ष्मण पूरे यक़ीन से एक चट्टान को खिसकाने की कोशिश करता है। गांधी जी की बात को सच मानता है और उसे यक़ीन है कि वह चट्टान को खिसका देगा। उसके इस कोशिश के दौरान भूकम्प आ जाता है और ज़मीन-चट्टान सब काँपने लगते हैं। बस्ती वाले भी यक़ीन करने लगते हैं कि लक्ष्मण अपने यक़ीन से चट्टान को खिसका दिया है। किसी ग़लतफ़हमी के कारण भरत की मृत्यु की ग़लत सूचना आ गई थी। अब भरत वापस लौटता है। लक्ष्मण को पूर्ण विश्वास है कि उसके यक़ीन के कारण ही उसका भाई वापस लौटा है। 
 
आज जो परिस्थितियाँ हैं उसके सन्दर्भ में यह फिल्म प्रासंगिक है। भारत-चीन युद्ध के दौरान जिस तरह से सभी चीनी को सन्देह की दृष्टि से देखा जाता था, अब वही स्थिति पुनः बन गई है। कोई भी जो यहाँ जन्म लिया है वह भारतीय है, उस पर सन्देह नहीं करना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो; एक तरह से इस फ़िल्म का सन्देश यह भी है।  

हमारा समाज किसी फ़िल्म में क्या देखना चाहता है; इस विषय पर बहुत गम्भीर सोच और बहस की ज़रूरत है। फ़िल्म का हीरो कभी हार नहीं माने, दस-दस गुंडों से अकेले भीड़ जाए, तो दर्शक सीटी बजाते हैं। अगर वही हीरो विवश या असहाय दिखता है, तो आज का दर्शक उसे अस्वीकार कर देता है। भले हीरो के उस किरदार में भावुकता और संवेदनाएँ भरी हुई हों अथवा उस फ़िल्म की कहानी की माँग हो। आज के दर्शक हीरोइज्म में यक़ीन करते हैं और शारीरिक रूप से दबंग हीरो को देखने की चाह रखते हैं। मुमकिन है बजरंगी भाई जान की तरह इस फ़िल्म में सलमान चीन की सरहद पार कर जाते या चीनियों से युद्ध करके भाई को छुड़ाकर ले आते, तो शायद यह भी हिट फ़िल्मों में शुमार हो जाती।  

ट्यूबलाइट का फिल्मांकन बेजोड़ है, कलाकारों का अभिनय भी बहुत उम्दा है। सुहेल खान ने अपनी भूमिका बख़ूबी निभाई है। सलमान खान के चेहरे पर इतनी मासूमियत और सौम्यता है कि किसी का भी दिल जीत ले।भावुकता और भोलापन सलमान के अभिनय में कहीं से भी जबरन नहीं लगता, बल्कि सहज लगता है। सुहेल खान पहली बार इस फ़िल्म में मुझे अच्छे लगे हैं। सलमान और सुहेल असल ज़िन्दगी में भी भाई हैं, शायद इस कारण भाइयों के आपसी रिश्तों का दृश्य बहुत जानदार और भावुक बन गया है। शाहरुख खान ने अपनी छोटी-सी भूमिका में अच्छा प्रभाव छोड़ा है। ओमपुरी यों भी एक उम्दा अभिनेता हैं, चाहे जिस भी चरित्र में हों। चीनी माँ-बेटे का किरदार दोनों कलाकारों ने बहुत अच्छा निभाया है।
 

आजकल अच्छी और प्रेरक कहानियों पर फ़िल्में बन रही हैं और उसे दर्शकों से सराहना भी मिल रही है। साथ ही मारधाड़ की फ़िल्में भी ख़ूब नाम कमा रही हैं। इसलिए दर्शकों की नब्ज़ को पहचानना कई बार फ़िल्म निर्माता के लिए कठिन होता है। बहरहाल ट्यूबलाइट भले ही बॉक्स ऑफ़िस पर असफल कहलाए या सलमान के हिट फ़िल्मों में इसका नाम शामिल न हो, भले ही सफलता की दौड़ में सलमान खान एक बार हार गए हों; लेकिन सलमान के अभिनय के लिए निश्चित ही यह फ़िल्म याद रखी जाएगी। ट्यूबलाइट भले फ्लॉप हुई, पर सलमान सुपरहिट हैं।    

-जेन्नी शबनम (17.7.2017)
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Thursday, January 30, 2014

46. 'जय हो' की जय हो!


सलमान खान के फ़िल्मों की एक ख़ास विशेषता है कि इसे हर आम व ख़ास आदमी अपने परिवार के साथ देख सकता है। सलमान द्वारा अभिनीत हर फ़िल्म से हमें उम्मीद होती है- धाँसू डायलॉग, हँसते-गुदगुदाते डायलॉग, ज़ोरदार एंट्री, ज़बरदस्त फाइट, नायिका के साथ स्वस्थ प्रेम-दृश्य, डांस में कुछ ख़ास नया स्टेप्स, गीत के बोल और धुन ऐसे जो आम आदमी की ज़बान पर चढ़ जाए। सोहेल खान ने अपनी फ़िल्म 'जय हो' में लगभग इन सभी बातों का ध्यान रखा है।

'जय हो' का नायक जय एक ईमानदार, संजीदा और भावुक इंसान है। उसका सामना सामाजिक व्यवस्था के ऐसे क्रूर और संवेदनहीन स्वरूप से बार-बार होता है, जिससे आम आदमी त्रस्त है। उसकी सेना की नौकरी सिर्फ़ इसलिए चली जाती है; क्योंकि आतंकवादियों द्वारा बंधक बनाए गए बच्चों को छुड़ाने के लिए वह अपने उच्च अधिकारियों के आदेश की अवहेलना करता है। नौकरी छूट जाने के बाद वह मोटर गैराज में काम करता है। आसपास हो रहे घटना क्रम के कारण उसे समाज, गुंडा, आतंकवादी, नेता, मंत्री, भ्रष्ट सरकारी तंत्र आदि से उलझना पड़ता है और बार-बार मारपीट करनी होती है। उसका परिवार और उसके मित्र सदैव उसका साथ देते हैं। जय के अपने कुछ नैतिक सिद्धांत और विचार हैं, जिन्हें वह अमल में लाता है और सभी को इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित भी करता है। अंत में पापियों का नाश होता है और सत्य की जीत होती है।

जय का विचार है कि किसी एहसान के बदले में थैंक यू न बोलकर तीन आदमी की मदद करो, और उन तीनों से आग्रह करो कि उस मदद के बदले वे भी अन्य तीन की मदद करें, फिर वे तीन अन्य तीन की। इस तरह इंसानियत का यह सिलसिला एक शृंखला बनकर पूरी दुनिया को बदल देगा। यह एक बहुत बड़ा विचार और सन्देश है, जो 'जय हो' फ़िल्म का सबसे सकारात्मक पक्ष है।

सच है ''थैंक यू'' शब्द जितना छोटा है, उसका एहसास भी उतना ही छोटा लगता है। किसी एहसान के बदले में ''थैंक यू'' शब्द बोलकर या सुनकर ऐसा महसूस होता है जैसे एहसान का बदला चुकता कर दिया गया, मानो ''थैंक यू'' शब्द एहसान की क़ीमत हो। यों लगता है मानो ''थैंक यू'' कहना मन की भावना नहीं, बल्कि औपचारिक-सा एक शब्द है जिसे बोलकर एहसानों से मुक्ति पाई जा सकती है। सचमुच, जय के इस विचार को सभी अपना लें, तो एहसानों से वास्तविक मुक्ति मिल सकती है और समाज में इंसानियत और संवेदनशीलता का प्रसार हो सकता है।
 
इस फ़िल्म में सलमान खान न सिर्फ़ बलिष्ठ और ताक़तवर इंसान हैं; बल्कि बेहद भावुक और संवेदनशील इंसान भी हैं। उनके लिए अपना-पराया जैसी कोई बात नहीं। हर लोगों की मदद के लिए वे तत्पर रहते हैं। दूसरों की मदद करने पर ''थैंक यू'' के बदले तीन इंसान की मदद का वादा लेना, और जब उन तीनों द्वारा किसी की मदद के लिए आगे न आने पर जय जिस पीड़ा से गुज़रता है, सलमान ने बहुत अच्छी तरह से अभिव्यक्त किया है। सलमान की संवेदनशीलता उनकी आँखों में दिखती है। सलमान की भावप्रवण आँखें और निश्छल हँसी किसी का भी दिल जीतने के लिए काफ़ी है। चेहरे पर जो मासूमियत है, निःसंदेह सलमान के वास्तविक चरित्र का द्योतक है।
फ़िल्म का हर दृश्य और पटकथा मानो सलमान को सोचकर ही लिखी गई हो। फाइट सीन में कहीं से भी नहीं लगता कि यह बेवजह हो, कथा-क्रम का हिस्सा लगता है। हाँ, इतना ज़रूर है कि मार-पीट और ख़ून-ख़राबे का दृश्य बहुत ज़्यादा है। एक अकेला इंसान कितना भी हौसले वाला या बलशाली हो, बार-बार इतने लोगों से अकेला मारकर जीत नहीं सकता। मार-पीट के लिए गुंडों की फ़ौज पर फ़ौज आती है और अकेला जय सब पर भारी पड़ता है। बस यहीं पर चूक हो गई है फ़िल्म निर्देशक से। ख़ून-ख़राबा के अतिरेक को नज़रअंदाज़ कर दें, तो 'जय हो' एक अच्छी फ़िल्म है।

सलमान के साथ डेजी शाह की जोड़ी ख़ास नहीं जमी है। शायद अब तक सलमान की सभी नायिकाएँ बेहद ख़ूबसूरत रही हैं, इस लिहाज़ से साधारण चेहरे वाली डेजी शाह कुछ ही दृश्यों में ठीक लगी है। सलमान खान की विशेषता है कि नए चेहरों को काम और पहचान दोनों देते हैं; शायद इसीलिए डेजी शाह को लिया हो। टी.वी. के अलावा कई अन्य फ़िल्मी कलाकार जिनकी पहचान ख़त्म हो रही थी, को इस फ़िल्म में बहुत अच्छा मौक़ा मिला है। जितने भी पात्र इसमें शामिल किए गए हैं, सभी कथा-क्रम का हिस्सा लगते हैं, किसी की उपस्थिति जबरन नहीं लगती।

सलमान के फ़िल्मों की एक ख़ासियत यह भी है कि उसके कुछ गीत इतने मधुर और मनमोहक होते हैं कि सहज ही सबकी ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं। डांस के कुछ स्टेप्स ऐसे होते हैं, जो आम लोगों को बहुत अच्छे लगते हैं। सलमान की फ़िल्मों में नैना वाले गीत ख़ूब सराहे जाते हैं, जैसे- तेरे नैना मेरे नैनों की क्यों भाषा बोले, तेरे मस्त मस्त दो नैन, तेरे नैना दगाबाज़ रे इत्यादि। इस फ़िल्म में एक और नैना पर गीत- तेरे नैया बड़े क़ातिल, मार ही डालेंगे। नैना वाले सभी गीतों के साथ सलमान के स्टेप्स... सच बड़े क़ातिल होते हैं।

यह फ़िल्म सिर्फ़ मनोरंजन या सलमान को देखने के लिए, सलमान की दबंग वाली छवि देखने के लिए या सलमान के धाँसू डायलॉग के लिए ही नहीं; बल्कि सलमान की भावुकता, गम्भीरता और संवेदनशीलता को देखने के लिए भी देखा जाना आवश्यक है। तीन इंसान की मदद करने के सन्देश को आत्मसात करने और उसे जीवन में उतारने के लिए भी यह फ़िल्म देखनी चाहिए। मुमकिन है इस फ़िल्म को देखकर कुछ लोग ही सही कम-से-कम किसी एक की मदद तो ज़रूर करेंगे, और वे कुछ अन्य की।

धाँसू डायलॉग- ''आम आदमी सोता हुआ शेर है, उँगली मत कर, जाग गया तो, चीर-फाड़ देगा।'' गुंडों से भिड़ते हुए जब जय के पास और कोई उपाय नहीं बचता तब चिंघाड़ते हुए वह अपने दाँतों का इस्तेमाल करता है। अहा! क्या चीर-फाड़... बस कमाल है! जय हो!

सन्देशप्रद, स्वस्थ, मनोरंजक, जोशीले फ़िल्म के लिए सोहेल, सलमान, और 'जय हो' की पूरी टीम बधाई के पात्र हैं। 

-जेन्नी शबनम (30.1.2014)
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