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Thursday, January 1, 2026

131. नए वर्ष का तोहफ़ा

समय की बीतना, मानो सूरज का रोज़ उगना और ढलना। भोर से साँझ, रात, फिर भोर अनवरत। इसी तरह हमारा जीवन चलता रहता है अनवरत। बीच-बीच में कुछ ख़ास दिन याद दिलाता है कि हमारी यात्रा कहाँ तक पहुँची है, कब-कब हमें ठहरना है, रुकना है, चलना है, किधर जाना उचित किधर जाना अनुचित है, कब कौन सा त्योहार है, कब हमें क्या करना है, अन्तिम मक़ाम तक पहुँचने की सही राह कौन सी है इत्यादि। 


नव वर्ष भी ऐसे ही एक ख़ास दिन है जब पूरी दुनिया पुराने साल को अलविदा कहती है और नए का स्वागत करती है। हर जगह त्योहार का माहौल। जाड़े की रात भी मदहोशी के आलम में डूबी हुई चहकती और जगमग करती रहती है। हर एक व्यक्ति के मन में उत्साह रहता है। जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुँचती है जश्न में डूबी रात ज़ोर से खिलखिलाती है और तमाम दुनिया के लोग मस्ती में झूमने लगते हैं। कहीं आतिशबाज़ी तो कहीं मदमस्तों की टोली अपने अपने मन के अनुसार नाचते-गाते हैं। रात जागती रहती है और यूँ खिली रहती है मानो दीवाली की रात हो। जगमगाती, खिलखिलाती, नाचती, गाती, रोमांटिक मनोदशा में होती है। 

बहुत बचपन का नव वर्ष तो याद नहीं। स्कूल के दिनों का याद है जब 19 दिसम्बर से बड़े दिन की छुट्टी शुरू हो जाती थी और शायद तीन-चार जनवरी को स्कूल खुलता था। उस ज़माने में न फ़ोन, न टी.वी. न रात में जश्न मनाने के लिए बिजली। जो करना है दिन में ही करना है। इसलिए 31 दिसम्बर के दिन या रात में कुछ भी ख़ास नहीं होता था, सिर्फ़ नए साल में ख़ास कार्यक्रम की की रूपरेखा तैयार होती थी। पहली जनवरी की भोर में पहला काम होता था कि उठते ही जो भी घर में है उसे हैप्पी न्यू ईयर बोलना। दुसरा काम घर के सभी कैलेण्डर को फाड़कर फेंकना। तीसरा काम अपनी कॉपी में पहली जनवरी की तारीख डालना। पिछले दिन तय किए हुए कार्यक्रम का क्रियान्वयन करना। सिनेमा जाना, किसी रेस्तरां में खाना, किसी के घर लोगों के सामूहिक भोजन में हिस्सा लेना (कभी कभी मेरे घर भी होता था) इत्यादि।

विवाहोपरान्त जीवन की दिशा बदल गई। विवाह के बाद मेरे घर में बहुत लोग रहते थे, अतः कोई भी कार्यक्रम हो तो सभी उसमें रहते थे। बच्चों के होने के बाद थोड़ा बदलाव आया। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए बहुत बदलाव आया। वर्ष 2011 तक मेरे पति के संस्थान में नव वर्ष के अवसर पर बहुत बड़ा आयोजन होता था। धीरे-धीरे वह कम हो गया। बच्चे बड़े हुए तो वे अपने मित्रों के साथ नया साल मनाने लगे। साथ कोई न भी जाए तो मैं अक्सर सिनेमा देखने जाती थी। 

इस वर्ष का नया साल आजीवन मुझे याद रहेगा। मेरे निवास से नज़दीक आज़ाद अपार्टमेन्ट में मेरे एक बुज़ुर्ग मित्र एम. एस. आज़ाद जी से मिलने मैं 22 दिसंबर को गई। लौटते समय हल्का अँधेरा हो गया था। आज़ाद जी समतल रास्ते से मुझे छोड़ने आ रहे थे और मैं शॉर्टकट के लिए एक ऊँचे चबूतरे पर चढ़कर आ रही थी। जैसे मैं नीचे उतरने लगी, पाँव मुड़ गया और मैं धड़ाम से नीचे। नई-नई चप्पल का उद्घाटन हो गया। आज़ाद जी मुझे उठाने लगे। दाएँ पाँव का घुटना छिल गया। धीरे-धीरे मैं उठी; परन्तु बाएँ पाँव में भयंकर दर्द होने लगा और तुरत सूज गया। मुझे लगा कि गिर गई थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा। मैंने आज़ाद जी से कहा कि जब वे मेरे घर आये थे तो वापसी में सिद्दी से वे गिर गए थे, तो मैंने उन्हें सँभाल लिया था, इस लिए बदले में आज उनके घर गिरकर मेरी बराबरी हो गई। 

पहला दिन 
मैं किसी तरह घर आई। बेइन्तहाँ दर्द के कारण डॉक्टर को दिखने पंचशील मैक्स हॉस्पिटल गई, लेकिन डॉक्टर छुट्टी पर थे। फिर मैं नेहरू प्लेस में फोर्टिस हॉस्पिटल गई, वहां डायबिटिज के लिए जाती रहती हूँ। काफी इंतज़ार के बाद डॉक्टर ने फ़ोन पर कहा की पहले एक्स रे करवाऊं। फिर डॉक्टर ने कहा कि फ्रैक्चर है और प्लास्टर किया, पांच सप्ताह तक प्लास्टर रहेगा। हालाँकि बेटी ने फ़ोन कर कहा भी था कि आजकल घर पर एक्सरे भी हो जाता है और डॉक्टर भी आ जाता है; लेकिन मुझे लगा कि घर पर यह ठीक नहीं होगा, इसलिए हॉस्पिटल गई। बेटी तीसरे दिन आई तो प्लास्टर पर अपनी कलाकारी की। बेटा भी इस दिन आया। बच्चों के आने से दर्द भी कुछ देर के लिए भूल गई। 

दूसरा दिन 
अब पाँव में प्लास्टर है और बच्चे भी साथ नहीं। तो यूँ भी कोई प्लान नए साल के लिए नहीं था। सिनेमा तो जा सकती थी, वह भी नहीं जा सकी पाँव के कारण। रहा-सहा कसर पूरा हुआ कि मैं आज बाथरूम में फिसल कर गिर गई। टेल बोन पर ज़ोर की चोट लगी। दर्द इतना है कि हिलने में भी दर्द हो रहा है। सूजी का हलवा मुझे बेहद पसंद है, सुबह शाम बेहिचक खाया। इतनी चोट में डाइबिटीज भी याद रखूँ, अब यह तो न होने वाला। बेटी ने रात 12 बजे विश किया था। जब गिर गई उसके तुरत बाद बेटी ने फिर से नया साल विश किया तो मैंने बताया की अभी गिर गई हूँ, बाद में फ़ोन करती हूँ। उसने अपने पापा को बताया कि मम्मी गिर गई जल्दी जाकर देखो। 
तीसरा दिन 
उम्र के साथ याददाश्त कमज़ोर पड़ रही है। चोट या दर्द के दवा का नाम याद ही नहीं आ रहा था। अंततः केमिस्ट से पूछा और उसने दवा भेज दी। दर्द के कारण अब भी हिल नहीं पा रही हूँ। किसी के गिरने पर सभी को बहुत हँसी आती है, जानती हूँ की यह गलत है। पर मुझे बेहद हँसी आई। क्या लाजवाब नया वर्ष आया मेरा। जितना ही इस दिन को उत्साह से मनाती थी, उतना ही इस वर्ष सब गड़बड़ हो गया।  फिर भी एक बेहतरीन फ़िल्म 31 दिसंबर की रात और पहली जनवरी के पहले पहर में देखी। वर्ष का पहला दिन गिर पड़ी, अब बचपन की मान्यताओं के अनुसार साल भर गिरती पड़ती रहूँगी; क्योंकि बच्चपन में हम बच्चों की मान्यता थी कि साल के पहले दिन जो होता है वही सालभर होगा। 

अब देखना है कि नया साल 2026 मेरे लिए क्या-क्या लेकर आता है। सभी को नव वर्ष की मंगलकामनाएँ ! 

-जेन्नी शबनम (1.1.2026)
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