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| गूगल से साभार |
भरत का लाइव विडियो जब से देखी हूँ, मन व्यथित है, बेचैन है। हर थोड़ी देर में उसका कोई-न-कोई लाइव वीडियो देख रही हूँ। लगातार उसके बारे में पढ़ रही हूँ, सुन रही हूँ, देख रही हूँ। उसके पुराने सभी वीडियो देख गई हूँ। लोगों के विचार पढ़ और सुन रही हूँ। भरत की हँसती हुई तस्वीर, उसकी निडरता, बेख़ौफ़ आवाज़, समाज के प्रति भावना, वंचितों के प्रति करूणा, उसकी माँग इत्यादि देखकर, सुनकर, पढ़कर मेरा मन विह्वल हो जाता है। भरत के माता-पिता की पीड़ा मैं महसूस कर रही हूँ। उसका वीडियो देखकर आँखें भर आती हैं। बेहद मर्माहत हूँ। भरत का पूरा परिवार अपने जवान और जाँबाज़ पुत्र के बिना कैसे जीवन व्यतीत करेगा, सोचकर मेरा मन बैठ जाता है। भरत ने जिस तरह अपना बलिदान दिया है, मैंने अपने जीवन में ऐसा नहीं देखा। आज 20 दिन हो गए भरत को गए हुए; परन्तु भरत को न्याय नहीं मिला। मेरे मन में ढेरों सवाल हैं, जो मुझे विचलित कर रहे हैं।
सोशल मीडिया के कारण हमलोग भरत की हत्या का सारा सच देख सके। अगर भरत ने फेसबुक लाइव न किया होता, तो पुलिस और सरकार द्वारा भरत को अपराधी, मानसिक विक्षिप्त, सनकी, पागल इत्यादि न जाने कितने आरोप लगाकर इनकाउंटर को सही ठहराया जाता। देश की जनता भी सारा सच नहीं जान पाती। जो चश्मदीद गवाह हैं, वे तो पहले से सरकार द्वारा प्रताड़ित हैं, जिनके जीवन का कोई मूल्य नहीं; शायद उन्हें गवाही देने भी नहीं दिया जाता। ऐसे में एक क्रांतिकारी को सदा के लिए अपराधी घोषित कर दिया जाता।
बिहार के भोजपुर ज़िले के आरा सदर अनुमण्डल के शाहपुर प्रखण्ड के बिलौटी गाँव का रहने वाला 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी समाज सेवा में संलग्न रहकर जन-कल्याण के हर मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाता रहता था। लाइव वीडियो बनाकर भ्रष्टाचार को उजागर करता रहता था।जवाइनियाँ गाँव का अधिकांश हिस्सा गंगा के भयंकर कटाव के कारण गंगा में समा चुका है। जवनइयाँ गाँव के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा बिलौटी गाँव में ज़मीन आवंटित हुआ। जिस क्षेत्र को उन्हें घर बनाने के लिए दिया गया, वह 8-10 फ़ीट गड्ढे में है। इन विस्थापितों की बुनियादी सुविधाओं के लिए भरत ने काफ़ी भाग-दौड़ कर उस क्षेत्र में बिजली लगवाई, रोड बनवाया, चापाकल गड़वाया। गड्ढे को भरवाने के लिए वह लगातार संघर्ष कर रहा था। सभी सम्बंधित अधिकारियों को उसने इस कार्य के लिए आवेदन दिया, निवेदन किया। नौकरशाही, माफ़ियाओं और भ्रष्ट तंत्र के कारण उसके आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई; परन्तु उसने अन्तिम क्षण तक हार नहीं मानी और अपनी पूरी क्षमता से लड़ता रहा। मानो उसने अपने सिर पर कफ़न बाँध लिया हो।
भरत को प्रशासन द्वारा लगातार परेशान किया जा रहा था। वह जान चुका था कि कितनी भी कोशिश कर ले, विस्थापितों को न न्याय नहीं दिला सकेगा, न भ्रष्टाचारियों का चेहरा समाज के सामने ला सकेगा। वह जानता था कि किसी भी समय प्रशासन द्वारा उसका इनकाउंटर किया जा सकता है। भरत ने लाइव वीडियो में स्पष्ट रूप से कहा था कि अगर उसकी माँग नहीं मानी गई, तो वह अपना बलिदान दे देगा। अंततः हथियार उठाने के लिए वह विवश हो गया। अपने गले का चेन बेचकर उसने पिस्तौल ख़रीदी। भरत ने किसी भी पुलिसकर्मी पर गोली नहीं चलाई, सिर्फ़ हवाई फायरिंग करता रहा। वह सोचा होगा कि पिस्तौल लहराने से शायद प्रशासन जागेगी और उसकी कुछ माँगें पूरी होंगी, भले ही इस कारण उसका इनकाउंटर हो जाए। मुमकिन है उसके बलिदान से विस्थापितों को न्याय मिले और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द हो। उसने एक फेसबुक लाइव में कहा भी है कि ये देश मेरे बलिदान को जाया नहीं जाने देगा।
17 जून 2026 को सुबह पाँच बजे भरत के घर को पुलिस ने चारों तरफ़ से घेर लिया। नौ बजे भरत स्वयं जवइनियाँ गाँव पहुँचा।अनेक पुलिसकर्मी और कमाण्डों थोड़ी दूरी पर चारों तरफ़ से उसे घेरे हुए थे। गाँव वालों को लाठी से मारकर और धमकाकर भगा दिया गया। यहाँ तक कि भरत की माँ को भी लाठी से मारा गया। भरत पिस्तौल लिए फेसबुक पर लाइव था। पुलिस उसे सरेण्डर करने के लिए दबाव बना रही थी। भरत अपनी माँग पूरी करवाने के लिए अड़ा हुआ था। अंत में पुलिस ने उसकी माँग पूरी होने का आश्वासन दिया। आश्वासन मिलने के बाद भरत अपनी पिस्तौल पुलिस वालों की तरफ़ फेंक दिया और उनकी तरफ़ आराम से चल दिया। एक पुलिसकर्मी तुरन्त पिस्तौल उठा लिया और आठ-दस पुलिसकर्मी उसे घेरकर थोड़ा आगे ले गए और उसके पाँव में तीन गोली मार दी। फिर उसे घसीटकर गाड़ी में डाला गया और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, शाहपुर ले जाया गया। हालत बिगड़ने पर सदर अस्पताल, भोजपुर रेफर किया गया। फिर भारत को इलाज के लिए पटना पी. एम. सी. एच. पटना लाया गया। रास्ते में उसे और दो गोली मारकर हत्या कर दी गई। बिहार पुलिस और भ्रष्ट अधिकारियों के छल का शिकार भरत हुआ। उसे छल से मारने की साज़िश पहले से रची गई थी; क्योंकि सरेण्डर करने के बाद उसे गोली मारी गई।
भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध भरत का आक्रोश, विवशता, पीड़ा, निराशा, आशंका इत्यादि उसके वीडियो में हम सभी देख चुके हैं। अपने आख़िरी फेसबुक लाइव में पुलिस को वह बेख़ौफ़ होकर ललकारते हुए कहता है कि सीने पर गोली मारो। सरेण्डर करने से पूर्व उसने अपनी माँगें दोहराई, जो उसकी अन्तिम आवाज़ है। उसने कहा-
''इस देश में आज के बाद कोई भी नेता, मंत्री, विधायक या कोई अधिकारी समाज के साथ देश के साथ खिलवाड़ नहीं करेगा और चुनाव के समय या कभी भी कोई वादा नहीं करेगा झूठा। अगर करेगा तो उसको पूरा करना पड़ेगा, अगर नहीं करेगा तो ये युद्ध क्रांतिकारी युद्ध होगा। माँग पूरी होगी तो हथियार डाल दिया जाएगा''
''इस पूरे समाज में और पूरे देश में जितना भी कार्य है, सामजिक कार्य, गाँव, गली, मोहल्ला, समाज, शहर, महानगर जितना भी कार्य होना चाहिए, नाली-गली-सड़क का, बिजली पानी का वह सभी कार्य अच्छे से बिना भ्रष्टाचार के हो।''
इन सभी माँगों में एक भी माँग ऐसी नहीं है, जिससे आम जनता का सरोकार न हो। उसने अपने या अपने परिवार के लिए कुछ माँगा ही नहीं।
भरत फेसबुक लाइव पर अपनी हर बात कहता था। भरत ने लाइव वीडियो में कहा- ''समाज में देश में बदलाव ऐसे नहीं आता।'' ''क्रांतिकारियों की शान गोली खाने और खिलाने में है। फाँसी के फंदे पर लटक जाने में है।''
''ये सिर्फ़ बिहार के सिस्टम की लड़ाई नहीं है, पुरे देश की लड़ाई है। ये जंग सिर्फ़ बिहार की नहीं, पुरे देश में बदलाव लाने वाली जंग है।''
''ये जो तुम्हारी जंग है, वो किसी चोर, उचक्के, लफंगे, बदमाश, गुण्डे, मवाली,उग्रवादी या आतंकवादी से नहीं है। सबसे अगर कोई भारी पड़ता है, तो वो सच्चा देश प्रेमी, सच्चा राष्ट्रभक्त होता है। वही अकेला सब पर भारी पड़ता है।''
''दोबारा कुछ कमा सकता है, हर चीज़ दोबारा आ सकता है। मगर किसी का जान-प्राण दोबारा नहीं आ सकता है।'' सब कुछ जानते और समझते हुए समाज के लिए उसने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया था। उसने सचमुच अपने रक्त से क्रान्ति की मशाल जला दी।
भारत ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा था- ''सत्य और धर्म के रास्तों पर भी जब तक शांति के सारे रास्ते ख़त्म न हो जाएँ तब तक युद्ध को टालते रहना चाहिए।'' ''युद्ध का पहला नियम निवेदन करें, विनती करें, अपने समाज के हक़ में माँगें, तो ये सभी नियम मैंने पूरा कर दिया है, तो आगे चलकर ये नहीं बोल पाएँगे कि मैंने उनसे ऐसा कुछ नहीं बोला।'' ''दूसरा नियम युद्ध ना हो इसके लिए आगे वाले को warning दें ताकि वहाँ तक भी वो सँभल सके।'' ''तीसरा नियम और जब युद्ध के सिवा कोई विकल्प ही न बचे तो रणभूमि में कूद जाएँ, युद्ध कई प्रकार के होते हैं जिसके अंत में या तो आप बचते हैं या सामने वाला; लेकिन ऐसे युद्ध में मैं किसी को मारूँगा थोड़ी ना''
भरत ने अपने फेसबुक लाइव में अपनी प्रेमिकाओं को आज़ाद करने की बात कही थी कि वह अपनी प्रेमिका से मिलना चाहता है; लेकिन उनके साले उससे मिलने नहीं देते हैं। उसके साले अर्थात् भ्रष्ट नेता, मंत्री, विधायक और अधिकारी। देश का विकास, राज्य का विकास, गाँव का विकास, बिजली-पानी-सड़क की समस्या इत्यादि उसकी प्रेमिकाएँ थीं। 28 वर्ष के एक युवा की ऐसी महान सोच से सचमुच आश्चर्य होता है। भरत ने विवाह नहीं करने का संकल्प लिया था। उसने अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया था। उसने स्वयं अपना पिंडदान भी कर दिया था। भरत अपने परिवार की परवाह न करके समाज सेवा में ऐसा लीन हुआ कि उसने समाज और राष्ट्र के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर दिया।
भरत ने फेसबुक लाइव में कहा था कि अगर वह मारा जाता है, तो उसका शरीर दान कर दिया जाए। उसका मोबइल उसके परिवार को दे दिया जाए। निश्चित ही उसके मोबइल में कुछ ऐसे राज़ हैं, जिसके कारण भरत की हत्या कर पुलिस ने मोबाइल ज़ब्त कर लिया। आज तक उसके परिवार को वह मोबाइल नहीं दिया गया। कहा जा रहा है कि भरत के मोबाइल में 1400 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का सबूत था। अगर निष्पक्ष जाँच हो, तो सारा सच सामने आ जाएगा, जिसकी सम्भावना नहीं दिख रही।
भरत की हत्या के बाद विभिन्न पार्टियों के नेता उसके घर मातमपुर्सी के लिए गए। बड़े-बड़े अधिकारी, ढेरों पत्रकार, सामजिक कार्यकर्त्ता उसके घर गए। उसकी तेरहवीं पर हज़ारों लोगों ने भोजन किया। उसकी याद में स्मारक बन रहे हैं। बिहार ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान में भरत की हत्या पर आक्रोश दिख रहा है। समाज सेवा की उसकी मुहीम किस मुकाम तक पहुँचेगी, यह आने वाला समय बताएगा। इतना ज़रूर है की भरत ने वैचारिक क्रान्ति का अलख जगा दिया है।
सरकार के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हज़ारों आंदोलन हुए; किन्तु हर आंदोलन में संगठित क्रांतिकारियों का समूह होता है। सभी मिलकर संघर्ष करते हैं। लेकिन भरत ऐसा योद्धा था, जिसने अकेले ही युद्ध का मोर्चा सँभाला और हँसते-हँसते अपना बलिदान दे दिया। भरत ने जिस तरह मौत को गले लगाया, मानवीय संवेदना का बहुत बड़ा उदहारण है। भरत को जिस तरह मारा गया है, भ्रष्ट प्रशासन और निरंकुश सत्ता की क्रूरता का अक्षम्य अपराध है।
जब भी कोई हक़ के लिए सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाता है, तो उसे अपराधी करार कर जेल भेज दिया जाता है या हत्या कर दी जाती है, जिसके अनेकों उदहारण हम देख चुके हैं। चाहे वह पत्रकार हो, छात्र हो, नेता हो, समाज सेवक हो, दलित हो, ग़रीब हो, किसान हो या आम आदमी। जबकि भ्रष्ट नेता चुनाव जीतता है। बड़ा-बड़ा माफ़िया, भ्रष्टाचारी, बलात्कारी, हत्यारा, अपराधी खुले-आम घूमता है। आज के हिन्दुस्तान का यही सच है और यह सच मीडिया और सोशल मीडिया के कारण हम तक पहुँच पा रहा है।
हम बेहद ख़तरनाक आपराधिक समय से गुज़र रहे हैं। संवेदनशीलता ख़त्म हो चुकी है। हर तरफ़ हिंसा का राज है। सामाजिक व्यवस्थाएँ ढह चुकी हैं। राजनीतिक पार्टियाँ को किसी भी क़ीमत पर सत्ता हथियाना है। हत्याएँ इस तरह हो रही हैं जैसे जीवन कोई खेल हो। क्रूरता, हिंसा, दुश्मनी, दुर्भावना, घृणा, दुराचार, बलात्कार, जातिवाद, धार्मिक उन्माद इत्यादि बढ़ते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच चुका है। यदि कोई सचमुच ईमानदार है, तो वह हँसी का पात्र बनता है या दुत्कारा जाता है या षड़यंत्र का शिकार होता है, जो भरत हुआ। आम आदमी की आवाज़ भरत की आवाज़ की तरह ख़ामोश दी जाती है। परन्तु भरत के विचार व कार्य से प्रेरित होकर आज जन मानस अपनी आवाज़ उठा रहा है और भरत के लिए न्याय माँग रहा है।
नफ़रत और स्वार्थ से भरे समाज में हज़ारों ऐसे देशभक्त हैं जिन्होंने अपनी परवाह न कर समाज और देश के लिए से स्वयं को मिटा दिया। स्वतंत्रता आंदोलन में हज़ारों लोग शहीद हुए। हिन्दुस्तान स्वतंत्र हैं; परन्तु आंतरिक रूप से हम आज भी आज़ाद नहीं हैं। पहले अंग्रेज़ों के ग़ुलाम थे अब सत्ता के भ्रष्ट तंत्र के ग़ुलाम हैं। ग़रीब को तो इंसान समझते ही नहीं हैं सत्ताधारी; चाहे जिसकी भी सरकार हो। वे सिर्फ़ वोट बैंक हैं। चुनाव समाप्त वोट बैंक की ज़रुरत समाप्त।
भरत सच्चा और वीर क्रांतिकारी था। ग़रीबों की पीड़ा उसे उद्वेलित करती थी। वह धर्म या जाति में विश्वास नहीं रखता था; किन्तु हिन्दू राष्ट्र चाहता था। यह सोच शायद उसकी राजनितिक पार्टी की सम्बद्धता के कारण आई होगी। यद्यपि एक वीडियो में वह पद यात्रा के दौरान कुछ मुस्लिम से मिलता है और उनके साथ भी भाईचारे का सम्बन्ध बनाता है। वह बेहद धार्मिक प्रवृत्ति का था, इसलिए सामाजिक सद्भावना उसमें भरी हुई थी।
भरत के लिए लोगों ने मुआवज़ा की माँग की है। कितनी भी बड़ी रक़म सरकार दे, भरत वापस नहीं आएगा। उसके बलिदान के बदले में पैसे का मुआवज़ा माँगना भरत के बलिदान का अपमान है। उसे पैसे की भूख होती, तो वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठाता; बल्कि भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर करोड़ों कमा लेता और जीवित भी रहता।
भरत के फेक इनकाउंटर की निष्पक्ष जाँच हो और हत्यारों को फाँसी हो। सम्पूर्ण देश का विकास और भ्रष्टाचार का खात्मा हो, यही भरत के लिए सच्ची श्रद्धांजलि और मुवाअज़ा है। भरत का संघर्ष समाज के वंचितों, उपेक्षितों, दलितों के अधिकार के लिए था। वह भा. ज. पा. का समर्थक था, फिर भी अपनी ही पार्टी के सरकार द्वारा वह मारा गया। उसकी हत्या में लिप्त पुलिसकर्मी या अधिकारी को सज़ा मिल पाएगी, यह कहना कठिन है; क्योंकि उसकी हत्या सोच समझकर की गई है।
जवइनियाँ क्षेत्र के विस्थापितों और चश्मदीदों ने सोचा नहीं होगा कि जब भरत हथियार फेंककर स्वयं आगे जाकर समर्पण किया, ऐसे में पुलिस उसे मार देगी। अन्यथा वे सारे एक साथ हमला कर देते, तो भरत बच जाता और अनेकों भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध कर रहा होता। देश में क्रान्ति तभी आएगी जब किसी की मृत्यु के बाद उसे देवता न बनाकर उसके जीवित रहते एकजुट होकर क़दम-से-क़दम मिलाकर युद्ध का हिस्सा बने। यह सच है कि जवइनियाँ के लोगों के लिए भरत उसके भगवान की तरह है। उनके लिए नाउम्मीदी का बहुत बड़ा सहारा था भरत। वे लोग भरत का मन्दिर बनवाना चाहते हैं, पूजते हैं। निश्चित ही शहीद होकर भरत ने भ्रष्ट तंत्र के ख़िलाफ़ एक चिनगारी तो सुलगा ही दिया है।
भरत की हत्या का फेसबुक लाइव देखकर जवइनियाँ गाँव में जन सैलाब उमड़ पड़ा। भरत न अपराधी था न आतंकवादी; परन्तु जिस तरह घेराबंदी करके उसे छल के द्वारा मारा गया, यह किसी के गले से नहीं उतर रहा। यहाँ तक कि बिहार सरकार के कई मंत्रियों, अधिकारियों और भाजपाइयों ने भी इसे ग़लत माना। सरकार की निरंकुशता के ख़िलाफ़ हर तरफ़ से आवाज़ें उठने लगीं हैं।
जिस जवइनियाँ गाँव के विकास के लिए भरत लड़ रहा था, उस गाँव का हर वह कार्य सरकार द्वारा तेज़ी से हो रहा है, जो भरत चाहता था। गड्ढे को भरा जा रहा है, ताकि बाढ़ से वे प्रभावित न हों। बोरिंग हो रहा है, ताकि पानी की सुविधा मिले। ईंट के घर लोगों के लिए बन रहे हैं। हर तरह से विकास कार्य ज़ोरों पर है; परन्तु अपने सपने को पूरा होते हुए देखने के लिए आज भरत नहीं है। भरत जीते-जी जो काम न करा सका, अपनी जान देकर करवा लिया। फेसबुक लाइव में भरत ने कहा भी था कि वह बलिदान देगा और उसका बलिदान जाया नहीं जाएगी। सचमुच भरत की शहादत जाया नहीं गई।
भरत जिन वंचितों की लड़ाई लड़ रहा था, उनके लिए वह भगवान् है। ऐसे युवा क्रांतिकारी शहीद की स्मृतियाँ, कार्य, विचार, सामाजिक समर्पण सदैव लोगों को प्रेरणा देता रहेगा। निःसंदेह युवाओं में चेतना जागृत होगी और भरत के इस युद्ध को आगे बढ़ाएँगे, ऐसा मुझे विश्वास है। भरत की शहादत के कारण जवइनियाँ गाँव का विकास हो रहा है, किन्तु सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में ऐसे कई जवइनियाँ गाँव हैं, जिनका विकास ज़रूरी है। आज भरत जैसे साहसी और वैचारिक युवाओं की देश को सख़्त ज़रुरत है, जो निःस्वार्थ भाव से देश के विकास में आगे आएँ।
भरत को न्याय मिले, इस उम्मीद के साथ क्रांतिकारी भरत को सलाम!
-जेन्नी शबनम (7.7.2027)
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