Saturday, August 15, 2026

140. इलाहाबाद बनाम प्रयागराज

गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती के संगम पर बसा हुआ ऐतिहासिक और धार्मिक शहर का प्राचीन नाम प्रयाग है। मुग़ल सम्राट अकबर ने वर्ष 1575 में संगम के पास क़िला बनवाया और वर्ष 1583 में इसका नाम इलाहाबास रखा, जिसका अर्थ है 'अल्लाह का शहर'। शाहजहाँ के शासनकाल में इसका नाम इलाहाबाद कर दिया गया। चूँकि यह धार्मिक तीर्थ स्थल है, इसलिए पुराने ज़माने से इस शहर को प्रयाग जी कहा जाता था। वर्ष 2018 में इसका नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया। यहाँ विश्वप्रसिद्ध कुम्भ मेला लगता है।
इलाहाबाद का नाम अब प्रयागराज हो गया परन्तु मुझे इलाहाबाद नाम ही पसन्द है। जिन नामों के साथ बचपन बीता हो, उसका नाम बदलना मुझे अच्छा नहीं लगता है। जैसे बम्बई बदलकर मुम्बई, कलकत्ता बदलकर कोलकाता, मद्रास बदलकर चेन्नई, बैंगलोर बदलकर बेंगलुरु, गुड़गाँव बदलकर गुरुग्राम इत्यादि। मैं आज भी इन सभी जगहों को पुराने नाम से ही बोलती हूँ। बदले हुए नाम से नई पीढ़ी बोलेगी; क्योंकि उन्होंने पुराने नाम के साथ बचपन नहीं बिताया है। बहरहाल मेरे लिए प्रयागराज आज भी इलाहबाद है और इलाहाबाद का मतलब मेरे लिए आनन्द भवन और चंद्रशेखर आज़ाद का शहीद स्थल है। 

23 जुलाई 2026 को 30 वर्ष बाद अपनी बेटी के साथ इलाहाबाद जाने का अवसर मुझे मिला। एयरपोर्ट से सिविल लाइन्स, जहाँ हमारा होटल था, का रास्ता बहुत ख़ूबसूरत है। कुछ स्थान पर ख़ूब हरियाली, तो कुछ रास्ते संकरा और गन्दगी से भरा हुआ। पान-गुटका की गन्दगी हर तरफ़ दिखती है। मुझे तो लगता है गुटका पर पूरे देश में पाबन्दी होनी चाहिए। पान हो, तो सिर्फ मीठा पान, ताकि उसे खाकर लोग निगल जाएँ, रास्ते को साफ़ रहने दें। यहाँ सवारी के लिए टोटो हर जगह उपलब्ध है। यह बहुत सस्ती सवारी है, जो ऑनलाइन भी बहुत आराम से मिल जाती है। 

रुद्राक्ष होटल पहुँचकर हमें तुरन्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय जाना था। न्यायालय की इमारत बहुत भव्य और बड़ी है। परन्तु वहाँ पान और गुटका के कारण अत्यन्त गन्दगी थी। बरसात बहुत तेज़ होने लगी। हर तरफ़ पानी से लबालब कीचड़ और गन्दगी। लोग उसी स्थिति में काम कर रहे थे। वहाँ एक सरकारी सुरक्षाकर्मी से मैं बैठकर बात करने लगी। पता चला कि सरकार द्वारा हर वर्ष सफाई के लिए पैसा आता है; लेकिन काम नहीं होता। उन्होंने बहुत सही कहा कि पान और गुटका हर कोई खाकर थूक रहा है, तो कौन किसे रोके।         
दूसरे दिन सबसे पहले हम आनन्द भवन गए; क्योंकि इसे देखने की हसरत बहुत ज़माने से थी, जो इस यात्रा में पूरी हुई। टिकट लेकर गेट के अन्दर जाते ही आनन्द भवन और स्वराज भवन को देखकर मैं अत्यंत उत्साहित हो गई। बहुत ख़ूबसूरत और विशाल परिसर में यह स्थित है। यह भवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहा है। मोतीलाल नेहरू ने इस भवन का निर्माण कराया था, जिसे उन्होंने कांग्रेस को दे दिया और नाम 'स्वराज भवन' रखा गया। वर्ष 1942 के आंदोलन में ब्रिटिश सरकार ने स्वराज भवन को ज़ब्त कर लिया और देश आज़ाद होने के बाद ही मुक्त हो सका था।


मोतीलाल नेहरू ने परिवार के रहने के लिए नया भवन बनवाया जिसका नाम रखा 'आनन्द भवन' रखा गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद वर्ष 1970 में इंदिरा गांधी ने आनन्द भवन को जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि को सौंप दिया। वर्ष 1971 में आनन्द भवन को एक स्मारक और संग्रहालय के रूप में दर्शकों के लिए खोल दिया गया। हमने साथ-साथ ही स्वराज भवन और आनन्द भवन के दर्शन किए।  
आनन्द भवन जाना मेरे लिए अत्यन्त रोमांचकारी अनुभव रहा। इस भवन में हमारी प्रिय प्रधानमंत्री आयरन लेडी स्वर्गीय इंदिरा गांधी का जन्म और विवाह हुआ था। यहाँ राजीव गांधी की तस्वीरों को देखकर मन हर्षित हो गया। यों मैं कांग्रेसी नहीं हूँ; लेकिन इंदिरा गांधी मेरे लिए एक स्त्री और प्रधानमंत्री पद की रोल मॉडल रही हैं। राजीव गांधी से ख़ूबसूरत मुझे अब तक कोई नहीं लगता। वे मेरे हीरो रहे हैं। मैं सोचती रही कि कैसे हत्यारे की आत्मा नहीं काँपी राजीव जी की हत्या करने में। वर्ष 1989 में भागलपुर में उन्हें बस एक झलक मैं देख सकी और उनकी ख़ूबसूरती पर फ़िदा हो गई। हालाँकि वोट मैं अपनी पार्टी को ही देती रही। सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी भी मुझे बेहद पसन्द आते हैं। अब तो मैं राहुल गांधी की बहुत बड़ी प्रशंसक बन चुकी हूँ। 



आनन्द भवन को निहारते हुए मुझे यह सोचकर बेहद अफ़सोस हो रहा था कि इस भवन के वारिस के दो पूर्वज देश के लिए मारे गए, उसी परिवार का अगला वंश इस भवन को अपना नहीं कह सकता; क्योंकि यह अब इस परिवार की निजी संपत्ति नहीं रही। जिस जगह इंदिरा जी का बचपन बीता, विवाह हुआ, गांधी जी जहाँ आया करते थे; यह सब अब उस परिवार का नहीं है। कितनी राजशाही ज़िन्दगी को त्यागकर इस नेहरू परिवार ने अपना सब कुछ दान में दे दिया। मेरा भवन होता तो शायद कुछ हिस्सा अपने लिए ज़रूर रख लेती, ताकि जब तक जियूँ अपनी यादों को उन जगहों पर जी सकूँ। मोतीलाल नेहरू से लेकर इनका पूरा वंश देश के लिए जितना त्याग और बलिदान दिया है, शायद इतना किसी ने नहीं किया होगा। 



इलाहबाद में मेरे भ्रमण का दूसरा पड़ाव 
अल्फ्रेड पार्क था, जहाँ चन्द्रशेखर आज़ाद का शहीद स्थल है। गेट से घुसते ही उनकी बड़ी-सी प्रतिमा दिखती है। इसी स्थल पर उन्होंने 27 फरवरी 1931 को गोली मारकर अपनी शहादत दी थी। पार्क बहुत बड़ा है; लेकिन मुझे सिर्फ़ वह स्थान देखना था, जहाँ वे शहीद हुए थे। उनकी प्रतिमा को सैल्यूट और प्रणाम कर मैं लौट आई।
अल्फ्रेड पार्क के बाद हमलोग संगम गए। नाव से हमलोग नदियों के धार के उस स्थान के थोड़ा समीप गए, जहाँ से गंगा और यमुना की दोनों धाराएँ अलग-अलग दिखती हैं। सरस्वती नदी तो विलुप्त हो चुकी है। इसके बाद हम अकबर का क़िला बाहर से देखे और वहीं अक्षयवट वृक्ष भी हमने देखा, जो अत्यंत प्राचीन काल से है। वहाँ से नागवासुकि मन्दिर गए, जिसकी सीढ़ियाँ चढ़ने की मेरी हिम्मत नहीं रही। घाट किनारे शाम की आरती देखकर हमलोग होटल लौट आए। एक ही दिन में इतने जगह जाकर बहुत थकान हो गई और हमलोग होटल लौट आए। पूरा इलाहाबाद एक दिन में देखना सम्भव नहीं है, फिर भी प्रमुख स्थलों को हमने देख लिया। शहर में अमिताभ बच्चा के नाम पर किसी संस्था का नाम पढ़ने को मिला। एअरपोर्ट पर हरिवंश राय बच्चन जी की रचना की कुछ पंक्तियों के साथ उनकी तस्वीर की बहुत सुन्दर चित्रकारी की गई है। 




रुद्राक्ष होटल में हमारी दो दिन की ही बुकिंग थी। ब्रिटिश कोठी नाम के एक होटल में हम शिफ्ट कर गए। यह कोठी ब्रिटिशकाल की है, जिसे कुम्भ मेला के समय होटल में परिवर्तित किया गया। आधुनिक होटल की तरह यहाँ सुविधा नहीं है। पुराने कोठी में रहने के मज़े लेने हों, तो ही यहाँ जाया जा सकता है। 26 जुलाई को हमलोग दिल्ली लौट आए। 
मैं कहीं भी जाती हूँ तो ढेरों तस्वीरें खिंचवाती हूँ; क्योंकि यह सोचकर जाती हूँ कि यहाँ अब दोबारा नहीं आना है। कोई भी स्थान मुझे पहली बार में जितना रोमांचित और हर्षित करता है दूसरी बार नहीं करता। हालाँकि कई बार मेरे साथ विपरीत हो जाता है। कुछ जगह न चाहते हुए भी बार-बार गई हूँ। मसूरी, लन्दन, वैष्णव देवी का मन्दिर इत्यादि बार-बार जाना पड़ा, इसलिए इन स्थानों में मेरी कोई रूचि न रही। मुमकिन है इसी नियम के तहत फिर से इलाहाबाद जाना हो। अगर गई तो जो स्थान छूट गया है, देख सकूँगी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ज़रूर देखने जाऊँगी, वहाँ जा नहीं सकी थी। आनन्द भवन फिर से देखना मुझे अच्छा लगेगा। इलाहाबाद में अपनी बेटी के साथ बिताया तीन दिन अविस्मरणीय है। 

-जेन्नी शबनम (15.8.2026)
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Tuesday, July 7, 2026

139. क्रांतिकारी भरत भूषण तिवारी

गूगल से साभार 
भरत का लाइव विडियो जब से देखी हूँ, मन व्यथित है, बेचैन है। हर थोड़ी देर में उसका कोई-न-कोई लाइव वीडियो देख रही हूँ। लगातार उसके बारे में पढ़ रही हूँ, सुन रही हूँ, देख रही हूँ। उसके पुराने सभी वीडियो देख गई हूँ। लोगों के विचार पढ़ और सुन रही हूँ। भरत की हँसती हुई तस्वीर, उसकी निडरता, बेख़ौफ़ आवाज़, समाज के प्रति भावना, वंचितों के प्रति करूणा, उसकी माँग इत्यादि देखकर, सुनकर, पढ़कर मेरा मन विह्वल हो जाता है। भरत के माता-पिता की पीड़ा मैं महसूस कर रही हूँ। उसका वीडियो देखकर आँखें भर आती हैं। बेहद मर्माहत हूँ। भरत का पूरा परिवार अपने जवान और जाँबाज़ पुत्र के बिना कैसे जीवन व्यतीत करेगा, सोचकर मेरा मन बैठ जाता है। भरत ने जिस तरह अपना बलिदान दिया है, मैंने अपने जीवन में ऐसा नहीं देखा। आज 20 दिन हो गए भरत को गए हुए; परन्तु भरत को न्याय नहीं मिला। मेरे मन में ढेरों सवाल हैं, जो मुझे विचलित कर रहे हैं। 


सोशल मीडिया के कारण हमलोग भरत की हत्या का सारा सच देख सके। अगर भरत ने फेसबुक लाइव न किया होता, तो पुलिस और सरकार द्वारा भरत को अपराधी, मानसिक विक्षिप्त, सनकी, पागल इत्यादि न जाने कितने आरोप लगाकर इनकाउंटर को सही ठहराया जाता। देश की जनता भी सारा सच नहीं जान पाती। जो चश्मदीद गवाह हैं, वे तो पहले से सरकार द्वारा प्रताड़ित हैं, जिनके जीवन का कोई मूल्य नहीं; शायद उन्हें गवाही देने भी नहीं दिया जाता। ऐसे में एक क्रांतिकारी को सदा के लिए अपराधी घोषित कर दिया जाता।  

बिहार के भोजपुर ज़िले के आरा सदर अनुमण्डल के शाहपुर प्रखण्ड के बिलौटी गाँव का रहने वाला 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी समाज सेवा में संलग्न रहकर जन-कल्याण के हर मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाता रहता था। लाइव वीडियो बनाकर भ्रष्टाचार को उजागर करता रहता था।जवाइनियाँ गाँव का अधिकांश हिस्सा गंगा के भयंकर कटाव के कारण गंगा में समा चुका है। जवनइयाँ गाँव के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा बिलौटी गाँव में ज़मीन आवंटित हुआ। जिस क्षेत्र को उन्हें घर बनाने के लिए दिया गया, वह 8-10 फ़ीट गड्ढे में है। इन विस्थापितों की बुनियादी सुविधाओं के लिए भरत ने काफ़ी भाग-दौड़ कर उस क्षेत्र में बिजली लगवाई, रोड बनवाया, चापाकल गड़वाया। गड्ढे को भरवाने के लिए वह लगातार संघर्ष कर रहा था। सभी सम्बंधित अधिकारियों को उसने इस कार्य के लिए आवेदन दिया, निवेदन किया। नौकरशाही, माफ़ियाओं और भ्रष्ट तंत्र के कारण उसके आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई; परन्तु उसने अन्तिम क्षण तक हार नहीं मानी और अपनी पूरी क्षमता से लड़ता रहा। मानो उसने अपने सिर पर कफ़न बाँध लिया हो। 

भरत को प्रशासन द्वारा लगातार परेशान किया जा रहा था। वह जान चुका था कि कितनी भी कोशिश कर ले, विस्थापितों को न न्याय नहीं दिला सकेगा, न भ्रष्टाचारियों का चेहरा समाज के सामने ला सकेगा। वह जानता था कि किसी भी समय प्रशासन द्वारा उसका इनकाउंटर किया जा सकता है। भरत ने लाइव वीडियो में स्पष्ट रूप से कहा था कि अगर उसकी माँग नहीं मानी गई, तो वह अपना बलिदान दे देगा। अंततः हथियार उठाने के लिए वह विवश हो गया। अपने गले का चेन बेचकर उसने पिस्तौल ख़रीदी। भरत ने किसी भी पुलिसकर्मी पर गोली नहीं चलाई, सिर्फ़ हवाई फायरिंग करता रहा। वह सोचा होगा कि पिस्तौल लहराने से शायद प्रशासन जागेगी और उसकी कुछ माँगें पूरी होंगी, भले ही इस कारण उसका इनकाउंटर हो जाए। मुमकिन है उसके बलिदान से विस्थापितों को न्याय मिले और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द हो। उसने एक फेसबुक लाइव में कहा भी है कि ये देश मेरे बलिदान को जाया नहीं जाने देगा। 

17 जून 2026 को सुबह पाँच बजे भरत के घर को पुलिस ने चारों तरफ़ से घेर लिया। नौ बजे भरत स्वयं जवइनियाँ गाँव पहुँचा।अनेक पुलिसकर्मी और कमाण्डों थोड़ी दूरी पर चारों तरफ़ से उसे घेरे हुए थे। गाँव वालों को लाठी से मारकर और धमकाकर भगा दिया गया। यहाँ तक कि भरत की माँ को भी लाठी से मारा गया। भरत पिस्तौल लिए फेसबुक पर लाइव था। पुलिस उसे सरेण्डर करने के लिए दबाव बना रही थी। भरत अपनी माँग पूरी करवाने के लिए अड़ा हुआ था। अंत में पुलिस ने उसकी माँग पूरी होने का आश्वासन दिया। आश्वासन मिलने के बाद भरत अपनी पिस्तौल पुलिस वालों की तरफ़ फेंक दिया और उनकी तरफ़ आराम से चल दिया। एक पुलिसकर्मी तुरन्त पिस्तौल उठा लिया और आठ-दस पुलिसकर्मी उसे घेरकर थोड़ा आगे ले गए और उसके पाँव में तीन गोली मार दी। फिर उसे घसीटकर गाड़ी में डाला गया और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, शाहपुर ले जाया गया। हालत बिगड़ने पर सदर अस्पताल, भोजपुर रेफर किया गया। फिर भारत को इलाज के लिए पटना पी. एम. सी. एच. पटना लाया गया। रास्ते में उसे और दो गोली मारकर हत्या कर दी गई। बिहार पुलिस और भ्रष्ट अधिकारियों के छल का शिकार भरत हुआ। उसे छल से मारने की साज़िश पहले से रची गई थी; क्योंकि सरेण्डर करने के बाद उसे गोली मारी गई।     

भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध भरत का आक्रोश, विवशता, पीड़ा, निराशा, आशंका इत्यादि उसके वीडियो में हम सभी देख चुके हैं। अपने आख़िरी फेसबुक लाइव में पुलिस को वह बेख़ौफ़ होकर ललकारते हुए कहता है कि सीने पर गोली मारो। सरेण्डर करने से पूर्व उसने अपनी माँगें दोहराई, जो उसकी अन्तिम आवाज़ है। उसने कहा- 
''इस देश में आज के बाद कोई भी नेता, मंत्री, विधायक या कोई अधिकारी समाज के साथ देश के साथ खिलवाड़ नहीं करेगा और चुनाव के समय या कभी भी कोई वादा नहीं करेगा झूठा। अगर करेगा तो उसको पूरा करना पड़ेगा, अगर नहीं करेगा तो ये युद्ध क्रांतिकारी युद्ध होगा। माँग पूरी होगी तो हथियार डाल दिया जाएगा''
''इस पूरे समाज में और पूरे देश में जितना भी कार्य है, सामजिक कार्य, गाँव, गली, मोहल्ला, समाज, शहर, महानगर जितना भी कार्य होना चाहिए, नाली-गली-सड़क का, बिजली पानी का वह सभी कार्य अच्छे से बिना भ्रष्टाचार के हो।''
इन सभी माँगों में एक भी माँग ऐसी नहीं है, जिससे आम जनता का सरोकार न हो। उसने अपने या अपने परिवार के लिए कुछ माँगा ही नहीं।  

भरत फेसबुक लाइव पर अपनी हर बात कहता था। भरत ने लाइव वीडियो में कहा- ''समाज में देश में बदलाव ऐसे नहीं आता।'' ''क्रांतिकारियों की शान गोली खाने और खिलाने में है। फाँसी के फंदे पर लटक जाने में है।''
''ये सिर्फ़ बिहार के सिस्टम की लड़ाई नहीं है, पुरे देश की लड़ाई है। ये जंग सिर्फ़ बिहार की नहीं, पुरे देश में बदलाव लाने वाली जंग है।''
''ये जो तुम्हारी जंग है, वो किसी चोर, उचक्के, लफंगे, बदमाश, गुण्डे, मवाली,उग्रवादी या आतंकवादी से नहीं है। सबसे अगर कोई भारी पड़ता है, तो वो सच्चा देश प्रेमी, सच्चा राष्ट्रभक्त होता है। वही अकेला सब पर भारी पड़ता है।''
''दोबारा कुछ कमा सकता है, हर चीज़ दोबारा आ सकता है। मगर किसी का जान-प्राण दोबारा नहीं आ सकता है।'' सब कुछ जानते और समझते हुए समाज के लिए उसने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया था। उसने सचमुच अपने रक्त से क्रान्ति की मशाल जला दी। 

भारत ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा था- ''सत्य और धर्म के रास्तों पर भी जब तक शांति के सारे रास्ते ख़त्म न हो जाएँ तब तक युद्ध को टालते रहना चाहिए।'' ''युद्ध का पहला नियम निवेदन करें, विनती करें, अपने समाज के हक़ में माँगें, तो ये सभी नियम मैंने पूरा कर दिया है, तो आगे चलकर ये नहीं बोल पाएँगे कि मैंने उनसे ऐसा कुछ नहीं बोला।'' ''दूसरा नियम युद्ध ना हो इसके लिए आगे वाले को warning दें ताकि वहाँ  तक भी वो सँभल सके।'' ''तीसरा नियम और जब युद्ध के सिवा कोई विकल्प ही न बचे तो रणभूमि में कूद जाएँ, युद्ध कई प्रकार के होते हैं जिसके अंत में या तो आप बचते हैं या सामने वाला; लेकिन ऐसे युद्ध में मैं किसी को मारूँगा थोड़ी ना''

भरत ने अपने फेसबुक लाइव में अपनी प्रेमिकाओं को आज़ाद करने की बात कही थी कि वह अपनी प्रेमिका से मिलना चाहता है; लेकिन उनके साले उससे मिलने नहीं देते हैं। उसके साले अर्थात् भ्रष्ट नेता, मंत्री, विधायक और अधिकारी। देश का विकास, राज्य का विकास, गाँव का विकास, बिजली-पानी-सड़क की समस्या इत्यादि उसकी प्रेमिकाएँ थीं। 28 वर्ष के एक युवा की ऐसी महान सोच से सचमुच आश्चर्य होता है। भरत ने विवाह नहीं करने का संकल्प लिया था। उसने अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया था। उसने स्वयं अपना पिंडदान भी कर दिया था। भरत अपने परिवार की परवाह न करके समाज सेवा में ऐसा लीन हुआ कि उसने समाज और राष्ट्र के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर दिया। 

भरत ने फेसबुक लाइव में कहा था कि अगर वह मारा जाता है, तो उसका शरीर दान कर दिया जाए। उसका मोबइल उसके परिवार को दे दिया जाए। निश्चित ही उसके मोबइल में कुछ ऐसे राज़ हैं, जिसके कारण भरत की हत्या कर पुलिस ने मोबाइल ज़ब्त कर लिया। आज तक उसके परिवार को वह मोबाइल नहीं दिया गया। कहा जा रहा है कि भरत के मोबाइल में 1400 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का सबूत था। अगर निष्पक्ष जाँच हो, तो सारा सच सामने आ जाएगा, जिसकी सम्भावना नहीं दिख रही। 

भरत की हत्या के बाद विभिन्न पार्टियों के नेता उसके घर मातमपुर्सी के लिए गए। बड़े-बड़े अधिकारी, ढेरों पत्रकार, सामजिक कार्यकर्त्ता उसके घर गए। उसकी तेरहवीं पर हज़ारों लोगों ने भोजन किया। उसकी याद में स्मारक बन रहे हैं। बिहार ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान में भरत की हत्या पर आक्रोश दिख रहा है। समाज सेवा की उसकी मुहीम किस मुकाम तक पहुँचेगी, यह आने वाला समय बताएगा। इतना ज़रूर है की भरत ने वैचारिक क्रान्ति का अलख जगा दिया है। 

सरकार के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हज़ारों आंदोलन हुए; किन्तु हर आंदोलन में संगठित क्रांतिकारियों का समूह होता है। सभी मिलकर संघर्ष करते हैं। लेकिन भरत ऐसा योद्धा था, जिसने अकेले ही युद्ध का मोर्चा सँभाला और हँसते-हँसते अपना बलिदान दे दिया। भरत ने जिस तरह मौत को गले लगाया, मानवीय संवेदना का बहुत बड़ा उदहारण है। भरत को जिस तरह मारा गया है, भ्रष्ट प्रशासन और निरंकुश सत्ता की क्रूरता का अक्षम्य अपराध है। 

जब भी कोई हक़ के लिए सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाता है, तो उसे अपराधी करार कर जेल भेज दिया जाता है या हत्या कर दी जाती है, जिसके अनेकों उदहारण हम देख चुके हैं। चाहे वह पत्रकार हो, छात्र हो, नेता हो, समाज सेवक हो, दलित हो, ग़रीब हो, किसान हो या आम आदमी। जबकि भ्रष्ट नेता चुनाव जीतता है। बड़ा-बड़ा माफ़िया, भ्रष्टाचारी, बलात्कारी, हत्यारा, अपराधी खुले-आम घूमता है। आज के हिन्दुस्तान का यही सच है और यह सच मीडिया और सोशल मीडिया के कारण हम तक पहुँच पा रहा है।    

हम बेहद ख़तरनाक आपराधिक समय से गुज़र रहे हैं। संवेदनशीलता ख़त्म हो चुकी है। हर तरफ़ हिंसा का राज है। सामाजिक व्यवस्थाएँ ढह चुकी हैं। राजनीतिक पार्टियाँ को किसी भी क़ीमत पर सत्ता हथियाना है। हत्याएँ इस तरह हो रही हैं जैसे जीवन कोई खेल हो। क्रूरता, हिंसा, दुश्मनी, दुर्भावना, घृणा, दुराचार, बलात्कार, जातिवाद, धार्मिक उन्माद इत्यादि बढ़ते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच चुका है। यदि कोई सचमुच ईमानदार है, तो वह हँसी का पात्र बनता है या दुत्कारा जाता है या षड़यंत्र का शिकार होता है, जो भरत हुआ। आम आदमी की आवाज़ भरत की आवाज़ की तरह ख़ामोश दी जाती है। परन्तु भरत के विचार व कार्य से प्रेरित होकर आज जन मानस अपनी आवाज़ उठा रहा है और भरत के लिए न्याय माँग रहा है। 

नफ़रत और स्वार्थ से भरे समाज में हज़ारों ऐसे देशभक्त हैं जिन्होंने अपनी परवाह न कर समाज और देश के लिए से स्वयं को मिटा दिया। स्वतंत्रता आंदोलन में हज़ारों लोग शहीद हुए। हिन्दुस्तान स्वतंत्र हैं; परन्तु आंतरिक रूप से हम आज भी आज़ाद नहीं हैं। पहले अंग्रेज़ों के ग़ुलाम थे अब सत्ता के भ्रष्ट तंत्र के ग़ुलाम हैं। ग़रीब को तो इंसान समझते ही नहीं हैं सत्ताधारी; चाहे जिसकी भी सरकार हो। वे सिर्फ़ वोट बैंक हैं। चुनाव समाप्त वोट बैंक की ज़रुरत समाप्त।

भरत सच्चा और वीर क्रांतिकारी था। ग़रीबों की पीड़ा उसे उद्वेलित करती थी। वह धर्म या जाति में विश्वास नहीं रखता था; किन्तु हिन्दू राष्ट्र चाहता था। यह सोच शायद उसकी राजनितिक पार्टी की सम्बद्धता के कारण आई होगी। यद्यपि एक वीडियो में वह पद यात्रा के दौरान कुछ मुस्लिम से मिलता है और उनके साथ भी भाईचारे का सम्बन्ध बनाता है। वह बेहद धार्मिक प्रवृत्ति का था, इसलिए सामाजिक सद्भावना उसमें भरी हुई थी। 

भरत के लिए लोगों ने मुआवज़ा की माँग की है। कितनी भी बड़ी रक़म सरकार दे, भरत वापस नहीं आएगा। उसके बलिदान के बदले में पैसे का मुआवज़ा माँगना भरत के बलिदान का अपमान है। उसे पैसे की भूख होती, तो वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठाता; बल्कि भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर करोड़ों कमा लेता और जीवित भी रहता। 

भरत के फेक इनकाउंटर की निष्पक्ष जाँच हो और हत्यारों को फाँसी हो। सम्पूर्ण देश का विकास और भ्रष्टाचार का खात्मा हो, यही भरत के लिए सच्ची श्रद्धांजलि और मुवाअज़ा है। भरत का संघर्ष समाज के वंचितों, उपेक्षितों, दलितों के अधिकार के लिए था। वह भा. ज. पा. का समर्थक था, फिर भी अपनी ही पार्टी के सरकार द्वारा वह मारा गया। उसकी हत्या में लिप्त पुलिसकर्मी या अधिकारी को सज़ा मिल पाएगी, यह कहना कठिन है; क्योंकि उसकी हत्या सोच समझकर की गई है। 

जवइनियाँ क्षेत्र के विस्थापितों और चश्मदीदों ने सोचा नहीं होगा कि जब भरत हथियार फेंककर स्वयं आगे जाकर समर्पण किया, ऐसे में पुलिस उसे मार देगी। अन्यथा वे सारे एक साथ हमला कर देते, तो भरत बच जाता और अनेकों भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध कर रहा होता। देश में क्रान्ति तभी आएगी जब किसी की मृत्यु के बाद उसे देवता न बनाकर उसके जीवित रहते एकजुट होकर क़दम-से-क़दम मिलाकर युद्ध का हिस्सा बने। यह सच है कि जवइनियाँ के लोगों के लिए भरत उसके भगवान की तरह है। उनके लिए नाउम्मीदी का बहुत बड़ा सहारा था भरत। वे लोग भरत का मन्दिर बनवाना चाहते हैं, पूजते हैं। निश्चित ही शहीद होकर भरत ने भ्रष्ट तंत्र के ख़िलाफ़ एक चिनगारी तो सुलगा ही दिया है।

भरत की हत्या का फेसबुक लाइव देखकर जवइनियाँ गाँव में जन सैलाब उमड़ पड़ा। भरत न अपराधी था न आतंकवादी; परन्तु जिस तरह घेराबंदी करके उसे छल के द्वारा मारा गया, यह किसी के गले से नहीं उतर रहा। यहाँ तक कि बिहार सरकार के कई मंत्रियों, अधिकारियों और भाजपाइयों ने भी इसे ग़लत माना। सरकार की निरंकुशता के ख़िलाफ़ हर तरफ़ से आवाज़ें उठने लगीं हैं। 

जिस जवइनियाँ गाँव के विकास के लिए भरत लड़ रहा था, उस गाँव का हर वह कार्य सरकार द्वारा तेज़ी से हो रहा है, जो भरत चाहता था। गड्ढे को भरा जा रहा है, ताकि बाढ़ से वे प्रभावित न हों। बोरिंग हो रहा है, ताकि पानी की सुविधा मिले। ईंट के घर लोगों के लिए बन रहे हैं। हर तरह से विकास कार्य ज़ोरों पर है; परन्तु अपने सपने को पूरा होते हुए देखने के लिए आज भरत नहीं है। भरत जीते-जी जो काम न करा सका, अपनी जान देकर करवा लिया। फेसबुक लाइव में भरत ने कहा भी था कि वह बलिदान देगा और उसका बलिदान जाया नहीं जाएगी। सचमुच भरत की शहादत जाया नहीं गई।     

भरत जिन वंचितों की लड़ाई लड़ रहा था, उनके लिए वह भगवान् है। ऐसे युवा क्रांतिकारी शहीद की स्मृतियाँ, कार्य, विचार, सामाजिक समर्पण सदैव लोगों को प्रेरणा देता रहेगा। निःसंदेह युवाओं में चेतना जागृत होगी और भरत के इस युद्ध को आगे बढ़ाएँगे, ऐसा मुझे विश्वास है। भरत की शहादत के कारण जवइनियाँ गाँव का विकास हो रहा है, किन्तु सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में ऐसे कई जवइनियाँ गाँव हैं, जिनका विकास ज़रूरी है। आज भरत जैसे साहसी और वैचारिक युवाओं की देश को सख़्त ज़रुरत है, जो निःस्वार्थ भाव से देश के विकास में आगे आएँ। 

भरत को न्याय मिले, इस उम्मीद के साथ क्रांतिकारी भरत को सलाम!

-जेन्नी शबनम (7.7.2027)
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Wednesday, June 17, 2026

138. श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' द्वारा 'साझा संसार' की भूमिका

श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' एवं श्रीमती वीरबाला काम्बोज के साथ मैं  
कला, साहित्य, संगीत आदि क्षेत्रों में जन्मजात यानी नैसर्गिक प्रतिभा ही व्यक्ति को आगे बढ़ाती है। निरन्तर प्रयास और अभ्यास से इस प्रतिभा को निखारा जा सकता है। अर्जित प्रतिभा इसे बल प्रदान करती है। जन्मजात और अर्जित प्रतिभा मिलकर साहित्यकार की लेखनी का परिमार्जन करते हैं। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन और व्यवहार-कला के माध्यम से इसको निखारा जा सकता है। केवल बुद्धिबल के आधार पर साहित्य नहीं रचा जा सकता। संसार और अपने परिवेश को समझने की जितनी संवेदना शक्ति होगी, साहित्यकार का सृजन उतना ही मुग्ध करने वाला होगा। डॉ. जेन्नी शबनम मूलतः कवयित्री हैं, जिनका काव्य-सृजन अभिभूत करता है। आचार्य दण्डी ने कहा है- ''गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति'' अर्थात् गद्य कवियों की कसौटी है। आपके ब्लॉग पर आधारित संग्रह ‘साझा-संसार’ आपकी गम्भीर अभिव्यक्ति का साक्षात् उदाहरण है। 

‘साझा-संसार’ की रचनाएँ विभिन्न  समय पर सम्प्रेषित आपके गहन चिन्तन का प्रतिफलन है। आपका यह संग्रह- 1. कथा/कहानी, 2. स्त्री, 3. समाज, 4. संस्मरण, 5. व्यंग्य, 6. फ़िल्म 7. आत्मन् इन सात इन्द्रधनुषी रंगों से रँगा है। रचनाओं के इस वैविध्य में नारी की स्थिति, उसकी मर्मान्तक पीड़ा, हर युग में किया जाने वाला उसका शोषण, उसके अस्तित्व का संकट, असमानता की दृष्टि गहरे तक छू जाती है। ‘कथा/कहानी’ में लघुकथाएँ- माँ हो न, जेनेरेशन गैप और पहचान नारी के संघर्ष की ही कथा कहते हैं। ‘मुझे नहीं जीना इस दुनिया में’ उसी नारी-व्यथा के संघर्ष की मार्मिक कथा है। वह ग़रीब हो या सम्भ्रान्त, इस मोर्चे पर शोषण और पीड़ा का शिकार सबको होना पड़ता है। 

सामाजिक शोषण और आडम्बर पर आपने कड़ा प्रहार किया है। ‘स्त्री’ में आधी दुनिया की विसंगतियों की शल्य-चिकित्सा की गई है। इस अध्याय में आधी दुनिया की पूरी बातें, नारी के श्रम की अवहेलना, बलात्कृत दामिनियों का दर्द, बलात्कार की स्त्रीवादी परिभाषा, स्त्री का उपभोग की वस्तु मात्र माना जाना व्यथित करता है। जेन्नी शबनम तीखे कटाक्ष के माध्यम से छद्म रूपधारी समाज-सेवकों का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत करती हैं। यही कारण है कि आपकी रचनाओं में आए विचार केवल शब्द नहीं होते; बल्कि वे स्पन्दित हृदय की धड़कन की तरह होते हैं। जेन्नी जी ने इस अध्याय में अकाट्य तर्कों से नारी के प्रति किए जा रहे भेदभाव के यथार्थ चित्र उकेरे हैं। बल देकर कहूँ, तो आपके लेखन में सड़े- गले विचारों और प्रथाओं के प्रति सशक्त विद्रोह झलकता है। ‘आधी दुनिया की पूरी बातें’ में ''ज़र, ज़मीन, जोरू ज़ोर की, नहीं तो किसी और की।'' इस कहावत से आक्रोश और अधिक मुखर हुआ है। लेखिका पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों को भी मानसिक ग़ुलामी की शिकार का उत्तरदायी मानती हैं। तात्पर्य है- बौद्धिक चर्चा में कोई कुछ भी कहे, स्त्री की स्थिति में अधिक बदलाव नहीं हुआ है।
 
‘समाज’ में युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हिन्दी की स्थिति, बचपन और लुप्त होते लोकगीत पर भी अपनी चिन्ता व्यक्त की है। यद्यपि यूट्यूब के माध्यम से आज लुप्तप्राय लोकगीतों की वापसी का विश्वास जगा है। 
 
'संस्मरण' विधा में- रहस्यमय शरत, शान्तिनिकेतन की स्मृतियाँ, कठपुतलियों वाली श्यामली दी प्रभावशाली रचनाएँ हैं, जिनमें जेन्नी जी की भावप्रवणता दृष्टिगोचर होती है। ‘व्यंग्य’ में ‘स्त्री-रोबोट’ केवल व्यंग्य-रचना ही नहीं; बल्कि रुग्ण सामाजिक सोच की शल्य-क्रिया भी है। 

‘फ़िल्म’ स्तम्भ में डंकी, बोल के बोल सधी हुई समीक्षाएँ हैं। 'आत्मन्' नितान्त निजी अनुभूतियों का निर्झर है, जिसमें  दादी, पापा, मम्मी, बेटा और बेटी से जुड़े प्रसंग हैं, जिनकी नमी पाठक की आँखों में अवश्य तैर जाएगी।  

जेन्नी शबनम का यह संसार सबका साझा है। आप जागरूक लेखिका हैं। इस संग्रह की रचनाएँ आद्यन्त पठनीय हैं।

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’        
(24 नवम्बर, 2025)
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Monday, June 1, 2026

137. सुमन कल्याणपुर

सुमन कल्याणपुर का 31 मई 2026 को मुम्बई में देहान्त हो गया। बांग्लादेश के ढाका में 28 जनवरी 1937 को इनका जन्म हुआ था। इनके पिता कर्णाटक के मैंगलोर से थे और ढाका में बहुत समय तक पदस्थापित रहे। इनका परिवार वर्ष 1943 में मुम्बई आ गया। चित्रकला और संगीत में इन्हें शुरू से रूचि थी। इन्होंने बड़े-बड़े गुरु से शास्त्रीय गायन सीखा। वर्ष 1954 में सर्वप्रथम उन्होंने हिन्दी सिनेमा के लिए गाने गाए। उन्होंने 857 हिन्दी गाने गाये हैं। समकालीन सभी गायकों के साथ उन्होंने युगल गीत गाए हैं। मोहम्मद रफ़ी के साथ लगभग 140 युगल गीत गाए हैं।  इनकी आवाज़ लता मंगेशकर से काफ़ी मिलती है, जिससे कई गाने में लोगों को भ्रम होता है कि लता ने गया या सुमन ने। इन्होने हिन्दी के अलावा मराठी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, पंजाबी, राजस्थानी, ओड़िया, गुजराती, असमिया, कन्नड़ इत्यादि कई भाषाओं में गाने गाए हैं। इन्हें गायकी के लिए पद्म भूषण तथा अन्य कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। 

''शराबी-शराबी ये सावन का मौसम, ख़ुदा की कसम ख़ूबसूरत ना होता, अगर इसमें रंग-ए-मुहब्बत न होता'', ''न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें, मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया'', ''बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दीये जलाके'', 'यूँ ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना, तेरी याद तो बन गई एक बहाना'', ''दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो, मुमकिन है इसके बाद कोई इम्तेहाँ न हो'', ''मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा'', ''जो हम पे गुज़रती है, तनहा किसे समझाएँ'' इत्यादि गाना उस ज़माने से मुझे पसन्द है जब न गीत के बोल जानती-समझती थी न उसके माने न मायने। जब तक मेरे पापा जीवित रहे तब तक हर दिन रेकॉर्ड प्लेयर पर सभी गायकों के गाने बजते रहते थे। मुझे सबसे ज़्यादा मोहम्मद ऱफी और सुमन कल्यानपुर को सुनना अच्छा लगता था। 

मैं 12 वर्ष की थी जब पापा का देहान्त हो गया। घर में चुप्पी छा गई। भाई जब गाँव से आता तब घर गुलज़ार होता और रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर बजता था। एक साल बाद जब मैं थोड़ा सामान्य हुई तब मैं फिर से गाना सुनने लगी। गाना सुनना मेरे परिवार के जींस में है शायद। वैसे तो सभी रेकॉर्ड मैं बजाती थी; लेकिन सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी के गाने रिपीट कर-करके सुनती थी। बाद में मीना कुमारी और ग़ुलाम अली की गज़लें भी ख़ूब सुनने लगी। रिकॉर्ड से कैसेट-वाकमैन का ज़माना और फिर मोबाइल-कम्प्यूटर के ज़माने में मैं पहुँची। अब सुमन कल्याणपुर के वे सभी गाने जो मुझे पसन्द हैं, एक जगह रिकॉर्ड कर ली। शाम को टहलते हुए भी सुमन कल्याणपुर को ही अधिकतर सुनती रही हूँ। 

न जाने सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में क्या जादू है कि मुझे लता जी और आशा जी के गाने से ज़्यादा पसन्द इनके गाने लगते हैं। मुझे बचपन से ही उदासी भरे गीत पसन्द आते हैं, इसका कारण नहीं मालूम। हालाँकि मेरे घर में सभी मिज़ाज के गीत के रेकॉर्ड थे। सुमन कल्याणपुर के कुछ गीत हल्के-फुल्के मिजाज़ वाले भी हैं; लेकिन मुझे नहीं भाते। यू ट्यूब पर सुनते समय वैसे गाने आ गए, तो सुन लेती हूँ और पसन्द का आ जाए तो फिर रिपीट कर-करके सुनती रहती हूँ। 

गाना सुनना मेरा बचपन से शौक़ है। जैसे-जैसे बड़ी होती गई, सभी गायक-गायिकाओं को सुनने लगी। लेकिन सुमन कल्याणपुर के गाए कुछ गाने मुझमें इस तरह समाहित हैं, जिसे अपने मन की किसी भी अवस्था में सुनकर सुखद महसूस करती हूँ। सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं; परन्तु उनके गाये गीत मेरे जीवन का हिस्सा हैं। समय और उम्र के बदलाव ने मेरी पसन्द को बदल नहीं सका। अंतर बस यह आया कि बचपन में गीत के बोल समझ नहीं आने पर अपने शब्द भर देती थी; पर अब हर शब्द को समझकर गाना सुनती हूँ। 

सुमन कल्याणपुर का जाना संगीत जगत की ही नहीं; बल्कि श्रोताओं की भी क्षति है। हालाँकि फ़िल्म 'नसीब' (1981) का गाना ''ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, लोगों की जान लेती है'' उनका अन्तिम हिन्दी गाना है। फिर भी उनके गाए सभी गीत उनके चाहने वालों के दिलों में सदा के लिए जीवित रहेंगे और सुमन कल्याणपुर मेरी सबसे पसन्दीदा गायिका रहेंगी। सुमन कल्याणपुर को हार्दिक श्रद्धांजलि!

-जेनी शबनम (1.6.2026) 
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Friday, May 8, 2026

136. श्री राम चन्द्र वर्मा 'साहिल' द्वारा साझा संसार की समीक्षा

डॉ. जेन्नी शबनम की यह पहली गद्य-कृति मेरे हाथ में है, जिसे इन्होंने सात अलग-अलग खण्डों में बाँटकर 'गद्य-विविधा' नाम दिया है। अब तक इनकी जो छह पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं वे सभी काव्यरूप में है; बल्कि एक तो हाइकु-संग्रह है। प्रस्तुत पुस्तक को भले ही इन्होंने गद्य-विविधा कहा है परन्तु मुझे तो इनके गद्य में भी पद्य की लय, नग़्मगी और ख़ुशबू का आभास हो रहा है। वैसे अमृता-इमरोज़ के प्यार में भी एक लघु कविता तथा 'उन्हीं दिनों की तरह', 'अम्मा के बच्चे' और 'उनकी निशानी' जैसी कुछ कविताएँ भी पुस्तक में देखने को मिल रहीं हैं। दर-अस्ल जेन्नी जी बुनियादी तौर पर तो कवयित्री ही हैं, इसलिए हर जगह कविता का फुदककर बीच में आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं।

सात खण्डों में पहला विषय जो इन्होंने चुना- वह है 'कथा/कहानी'। इसमें नारी जाति के बारे में कुछ लघुकथाएँ हैं, जैसे 'पहचान', 'माँ हो न' और 'जैनरेशन गैप' आदि जिनमें नारी की व्यथा, उसकी पीड़ा, उसका दर्द और उसका संघर्ष परिलक्षित होता है। वैसे मेरी सोच तो यह है कि आरम्भ से ही पुरुष वर्ग ने एक बेहद गहरी चाल चली है नारी को छलने की और उसे हमेशा दबाकर रखने की। 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' और 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ...' जैसे जुमले देकर उसे आभासी तौर पर बहुत ऊँचे पद पर बैठा दिया है, ताकि वह इन्हीं झुनझुनों से खेलती रहे, ख़ुश होती रहे, बहलती रहे और पुरुष अपना वर्चस्व क़ायम रखें। आज तक यही चला आ रहा है। वैसे नारी ने स्वयं भी ख़ुद को नीचा समझने में कोई झिझक महसूस नहीं की, यह उसका अपना दोष भी है।

दूसरे विषय 'स्त्री' में स्त्री के बारे में समाज को, समाज की सोच को, कानून को और समाज-सेवकों को जेन्नी जी ने जिस तरह से लताड़ा है, प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी।

'समाज' में युद्ध के विषय में गहन चर्चा है। युद्ध अब तक जो भी हुए हैं और आज भी पूरे विश्व में जो युद्ध छाया हुआ है, ध्यान से देखें तो मुद्दा कोई ख़ास नहीं होता जिसके लिए युद्ध छिड़ा है। यह सिर्फ़ दो सिरफिरे राष्ट्राध्यक्षों की उल्टी सोच का नतीजा होता है और अरबों-खरबों डॉलरों की कमाई का ज़रिया होता है और कुछ नहीं। पिटने वाली, मरने, झेलने वाली तथा नुक़सान उठाने वाली निर्दोष और निरीह जनता ही होती है। जीत किसी की भी हो, हारती दोनों (या कई) देशों की जनता ही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इसके घातक परिणामों पर भी विस्तृत जानकारी दी गई है। बच्चों के खोते बचपन, लोकगीतों का समाज के पटल से विलुप्त होना और समाज की टूटन पर भी प्रकाश डाला गया है।

'संस्मरण' में 'कठपुतलियों वाली श्यामली दी' बहुत ही सुन्दर रचना है। 'छुप-छुप खड़े हो', 'अलविदा मक़बूल' 'अमृता का इमरोज़' तथा 'रहस्यमय शरत' आदि बेहद ख़ूबसूरत और मार्मिक रचनाएँ हैं।

'व्यंग्य' में 'स्त्री-रोबोट' व्यंग्य तो है ही; लेकिन इसके ज़रिए समाज पर गहरी चोट भी है जो समाज को कुछ सोचने पर मजबूर करती है। 'शासक हाथी और शोषित कुत्ता' में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू बताए गए हैं जो समाज में व्याप्त हैं; लेकिन बल सकारात्मक पहलू पर ही होना चाहिए। 'तिथियों की तिकड़म' में आज के ज्योतिषियों पर गहरा प्रहार किया गया है, जो मेरे विचार में बिल्कुल सही है।

'फ़िल्म' वाले खण्ड में 'द केरला स्टोरी' में यह दर्शाया गया है कि कैसे फ़िल्मों के माध्यम से समाज में द्वेष फैलाया जा रहा है। 'डंकी' एक अच्छी सामाजिक फ़िल्म है जो समझाती है कि 'वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में' और यह बहुत बड़ा सच भी है।

अन्तिम तथा सातवाँ खण्ड है 'आत्मन' जिसमें लेखिका ने अपने परिजनों से जुड़े प्रसंगों का बहुत प्यारा चित्रण किया है।

कुल मिलाकर मैं कह सकता हूँ कि यह कृति बहुत ही प्यार से पढ़ने लायक़ है और यह ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक पहुँचनी भी चाहिए ताकि समाज का हर वर्ग और हर वर्ग का हर आदमी इससे लाभान्वित हो।

मुझे लगता है पुस्तक में जहाँ-जहाँ अत्यधिक पीड़ा है, वह लेखिका की नितांत निजी पीड़ा है जिसको दर्शाने के लिए कविताओं, कथाओं तथा लेखों का सहारा लिया गया है। वैसे मेरा मानना है कि जब तक लेखक के मन में पीड़ा रहेगी वह निरन्तर लिखता रहेगा; क्योंकि समाज की पीड़ा उसे तभी दिखेगी जब वह स्वयं पीड़ित होगा, दुःखी होगा और ज़ख़्मी होगा। उसके अन्दर संवेदना भी तभी बनी रहेगी। इस आशय का मेरा अपना एक शे'र भी है:
क़लम को ज़ोर देते हैं ये गहरे ज़ख़्म ही 'साहिल'
ये भर जाएँ तो लिखने वाले लिखना छोड़ देते हैं। 

ख़ैर, अब तक तो पुस्तक के बारे में मैंने कहा जो भी, जैसा भी कहा। अब अन्त में कहना चाहुँगा कि जेन्नी जी स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और इसी तरह काव्य तथा साहित्य की सेवा करती रहें। इनका लेखन और भी अधिक प्रखर हो तथा पाठकों से इन्हें भरपूर प्यार, प्रशंसा तथा समर्थन मिलता रहे। 

राम चन्द्र वर्मा 'साहिल'
131- न्यू सूर्य किरण अपार्टमेंट्स
दिल्ली-110092
मोबाइल- 9968414848 
तिथि- 7.6.2026 
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Friday, May 1, 2026

135. दान

रमन साहब का ऑफ़िस पटना के एक पॉश इलाक़े में है। वे हर दिन ऑफिस जाते हैं और लंच में घर आ जाते हैं, दोबारा ऑफ़िस नहीं जाते। ऑफ़िस शाम सात बजे बंद होता है। सभी स्टाफ़ को सख़्त आदेश है कि कार्यालय-समय में रमन साहब से कोई पर्सनल बात नहीं करनी है और न उनके घर आना है। 
 
शाम के छह बजे थे। रमन साहब कहीं जाने के लिए तैयार हो रहे थे। तभी गोपाल आया, जो ऑफ़िस में साफ़-सफ़ाई का कार्य करता है। गोपाल मन ही मन बहुत डरा हुआ था; ऑफ़िस का समय समाप्त जो नहीं हुआ था। किन्तु अभी ही मिलना आवश्यक था; क्योंकि उसे अभी-अभी पता चला कि रमन साहब शाम को कहीं बहार निकल रहे हैं और कल सुबह 15 दिन के लिए विदेश जा रहे हैं।    

रमन साहब तैयार होकर बरामदे में आए, तो गोपाल ने सकुचाते हुए अभिवादन किया-''गुड इवनिंग सर जी!'' 
घड़ी की तरफ़ देखते हुए रूखे स्वर में साहब ने पूछा- ''क्या बात है गोपाल, ऑफ़िस टाइम में क्यों आए हो?''
''सर जी, बहुत अर्जेन्ट था। बात यह है कि मेरी बेटी की शादी तय हो गई है, कुछ एडवांस मिल जाता तो...
बात बीच में काटते हुए थोड़े क्रोधित स्वर में साहब बोले- ''तुम्हें मालूम है न कि किसी को एडवांस नहीं दिया जाता है।''    
दोनों हाथ जोड़कर गोपाल बोला- ''हाँ सर जी, जानते हैं। पर कहीं से कोई जुगाड़ नहीं हो पाया। अब आपका ही आसरा है सर जी। अच्छा लड़का मिल गया, तो शादी तय कर दिए। आप तो जानते ही हैं कि बेटी की शादी करना कितना मुश्किल होता है।''

साहब का क्रोध बहुत बढ़ गया- ''काम तो ढ़ंग से करता नहीं और एडवांस माँगने आ जाता है कामचोर कहीं का।''
कुछ सोचते हुए कड़क लहजे में पूछा- ''कितने पैसे चाहिए?''
''सर, एक लाख!'' सिर झुकाए हुए गोपाल धीमी आवाज़ में बोला।   
''एक लाख! साले मेरे घर में पैसों का पेड़ उगा है। तू चुका पाएगा एक लाख।'' ''अपनी औक़ात नहीं देखता है और मुँह उठाए चला आया पैसा माँगने।'' साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। 
''सर जी, एडवांस दे दीजिए। हर महीने जितना ज़्यादा होगा कटवा देंगे सैलरी से। पूरा क़र्ज़ा चुका देंगे सर जी।'' 
  
साहब ने मन में कुछ सोचा फिर अपनी पत्नी से कहा- ''पूनम! 50 हज़ार रूपया लेकर आओ और मारो साले के मुँह पर।''
पूनम ने 50 हज़ार लाकर गोपाल के हाथ में थमा दिया। 

गोपाल अवाक्! लगा जैसे चक्कर खाकर वही गिर पड़ेगा। फिर हाथ जोड़कर बोला- ''सर जी, 50 हज़ार में नहीं हो पाएगा, एक लाख रुपया कम पड़ रहा है। आप ही कोई गुंजाइश कर सकते हैं सर जी। एक लाख दे दीजिए, हर महीने जितना चाहे आप काट लीजिएगा।''
''तेरे बाप की कमाई है, जो तुझे एक लाख दे दें।'' चिल्लाते हुए साहब ने कहा। 
''सर जी, नहीं सर जी, आप मालिक हैं, आप ही से तो आस लगाएँगे न सर जी। हम पर भरोसा कीजिए सर जी। एक-एक पाई चुका देंगे सर जी।'' गोपाल की आँखों में आँसू भर आए।
  
साहब ने स्वर में नाटकीयता लाते हुए कहा- ''देख गोपाल! बेटी की शादी है, इसलिए हम यह पैसा दान में दे रहे हैं। मेरी तरफ़ से बेटी की शादी में लगा दे। तुझे लौटना नहीं है।''
गोपाल गिड़गिड़ाते हुए बोला- ''सर जी, हमको दान नहीं चाहिए, हमको क़र्ज़ा दे दीजिए। एक लाख कम पड़ रहा है, इतने से नहीं हो पाएगा सर जी।'' ''सर जी, हम पर दया कीजिए सर जी।''

''अबे साले, औक़ात नहीं थी, तो काहे बेटी ब्याहने चला है। एक तो 50 हज़ार दान में दे रहे हैं और उस पर से तुझको और चाहिए। चल भाग यहाँ से।'' ग़ुस्से से साहब थरथराने लगे। बहुत हिम्मत जुटाकर गोपाल बोला- ''सर जी, हम बेईमान नहीं हैं, इतने साल से आप हमको देख रहे हैं। ज़िन्दगी भर एहसान नहीं भूलेंगे।''
''चल भाग! भागता है कि नहीं यहाँ से, भाग साला।'' साहब इतनी ज़ोर से चिल्लाए कि गोपाल थर-थर काँपने लगा। 
गोपाल की आँखों में आँसू और हाथ में 50 हज़ार। बरामदे से बाहर आकर मेन गेट पर धम्म से बैठ गया। आँखों में अँधेरा, निरुपाय, असहाय। 

''आप भी क्या करते हैं, 50 हज़ार दान देने से क्या फ़ायदा? एक लाख एडवांस दे देते, तो उसकी बेटी की शादी भी हो जाती और पैसा भी चुका देता धीरे-धीरे।'' पूनम ने साहब को धीमी आवाज़ में समझाया। 
''जितना तुम्हारा दिमाग़ है, उतना ही लगाया करो। हम जो करते हैं, सोच-समझकर करते हैं। ग़रीब की बेटी की शादी में 50 हज़ार दान दिए हैं, सोचती हो समाज में मेरा कितना नाम होगा।'' ''पिछले साल अपने गाँव की चार बेटी की शादी में पैसा दान में दिए थे। याद है तुमको, पेपर में यह ख़बर छपी थी। और हाँ, अनाथालय में एक लाख रूपया दान किए थे, सब अखबार में मेरा चर्चा था।'' ''अरे इन ग़रीबों को बड़ा दान देकर जीवनभर का कर्ज़दार बना दो, जब चाहो जो चाहो उनसे काम लो, और समाज में सम्मान मिलता है सो अलग।''

साहब ने घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा-   
''अरे यार पूनम, जल्दी चलो, देर हो रही है। मंत्री जी की बेटी की शादी में जाना है। रास्ते से किसी ज्वेलर्स से उनके बेटी-दामाद के लिए हीरे की अँगूठी भी लेनी है।''
''पूनम, गिफ़्ट इस तरह से देना ताकि सभी लोग देखे सकें कि महँगा है। अरे उन सभी से काम पड़ता रहता है।''

इस बीच गोपाल निराश तथा थके क़दमों से अपनी औक़ात के लोगों के बीच चला गया।

-जेन्नी शबनम (1.5.2026)
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Wednesday, April 1, 2026

134. साझा संसार (गद्य-विविधा) का लोकार्पण


दिनांक 29 मार्च 2026 को 'पेड़ों की छाँव तले फाउण्डेशन' के तहत प्रथम एन सी आर लिटरेरी फ़ेस्टिवल, 2026 का आयोजन ग़ाज़ियाबाद के शम्भू दयाल पी. जी. कॉलेज में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन एवं संचालन श्री अवधेश सिंह एवं सुश्री अनिता सिंह ने किया। सह संयोजक का कार्य डॉ. पूनम सिंह, श्री रघुवीर शर्मा एवं श्री ठाकुर प्रसाद चौबे ने किया। 
कार्यक्रम में सर्वप्रथम मेरी 7वीं पुस्तक 'साझा संसार' (गद्य-विविधा) का लोकार्पण श्री ब्रज किशोर वर्मा 'शैदी', प्रो. डॉ. राजीव रंजन गिरि, डॉ. आरती स्मित, श्री रविन्द्र कांत त्यागी, श्री सुरेंद्र अरोड़ा एवं श्री अवधेश सिंह के हाथों सम्पन्न हुआ। लोकार्पण के बाद श्री ब्रज किशोर 'शैदी', प्रो. डॉ. राजीव रंजन गिरि एवं डॉ. आरती स्मित ने पुस्तक पर वक्तव्य दिए। मेरी पुस्तक के विमोचन के बाद अन्य दो पुस्तकों का विमोचन हुआ। 
विख्यात साहित्यकारों में सुश्री ममता कालिया, श्री दिविक रमेश, श्री महेश दिवाकर, श्री वीरेन्द्र सिंह आस्तिक, श्री अशोक मिश्रा, श्री कमलेश भट्ट कमल, श्री अनिल जोशी उपस्थित रहे। कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. रोचना मित्तल जी भी मंच पर उपस्थित रहीं। इन सभी वरिष्ठ साहित्यकारों के द्वारा 'पेड़ों की छाँव तले... एक दशकीय कविता विमर्श' पुस्तक का लोकार्पण हुआ जिसका सम्पादन अवधेश सिंह जी ने किया है। इस पुस्तक में 72 कवियों की रचनाएँ शामिल हैं जिनमें मेरी भी रचनाएँ हैं। समारोह में सभी सहभागी रचनाकारों को 'साहित्यिक सरोकार स्मृति' चिह्न भेंट किया गया।इस अवसर पर कवयित्री एवं गायिका सुश्री अनुपमा त्रिपाठी ने सरस्वती वन्दना का गायन किया।
 
इस अवसर पर श्री बलराम अग्रवाल, अनिल पाराशर 'मासूम', सुश्री शानू पाराशर, श्री संजय श्रीवास्तव, सुश्री रश्मि लहर, सुश्री मधु वार्ष्णेय, मेरी पुत्री सुश्री परान्तिका दीक्षा एवं अनेक मित्रों की उपस्थिति रही। 
ममता कालिया जी से मिलना और बातें करना मेरे लिए स्मरणीय और सौभाग्यपूर्ण रहा। वरिष्ठ साहित्यकारों का सानिध्य एवं मेरी पुस्तक को इस आयोजन में अपना मंच देने के लिए अवधेश जी का बहुत-बहुत आभार। 
कार्यक्रम के बाद श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' एवं सुश्री बीरबाला काम्बोज से उनके नोएडा स्थित आवास पर मिलकर मैंने आशीर्वाद लिया। कम्बोज भैया का मेरी लेखनी और पुस्तकों के प्रकाशन में सदैव योगदान रहा है। 
मेरी इस पुस्तक की भूमिका श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' एवं प्रो. डॉ. राजीव रंजन गिरी ने लिखी है। इस पुस्तक को मैंने अपने पिता, माँ एवं दादी को समर्पित किया है। इन तीनों के कारण मैं हूँ और मेरे कारण मेरा साझा संसार। 























-जेन्नी शबनम (31.3.2026)
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