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Wednesday, May 1, 2024

111. शासक हाथी और शोषित कुत्ता

एक कहावत है- ''हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार।'' इसका अर्थ है आलोचना, निन्दा, द्वेष या बुराई की परवाह किए बिना अच्छे कार्य करते रहना या सही राह पर चलते रहना। इसका सन्देश अत्यन्त सकारात्मक है, जो हर किसी के लिए उचित, सार्थक एवं अनुकरणीय है। हम सभी के जीवन में ऐसा होता है जब आप सही हों फिर भी आपकी अत्यधिक आलोचना होती है। अक्सर आलोचना से घबराकर या डरकर कुछ लोग निष्क्रिय हो जाते हैं या चुप बैठ जाते हैं। कुछ लोग अनुचित राह पकड़ लेते हैं और ''हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार'' कहावत को चरितार्थ करते हैं। वे बिना किसी परवाह के अनुचित कार्य करते रहेंगे; न अपने सम्मान की चिन्ता न दूसरे की असुविधा की फ़िक्र। बस अपना हित साधना है, पूरी दुनिया जाए भाड़ में।   

वर्तमान परिपेक्ष्य में देखें तो राजनीतिक परिस्थितियों पर यह कहावत सटीक बैठती है, भले नकारात्मक रूप से ही सही। कुछ नेता स्वयं को हाथी मानकर अति मनमानी करते हैं, अति निर्लज्जता से सारे ग़लत काम करते हैं, असंवेदनशीलता की सारी हदें लाँघ जाते हैं, बेशर्मी से दाँव-पेंच लगाकर बाज़ी चलते हैं। उन्हें न अपनी आलोचना की फ़िक्र है, न अपने कुकृत्यों पर शर्मिन्दगी। पद, पैसा और लालच के सामने उन्हें किसी चीज़ की कोई परवाह नहीं। 

इस सन्दर्भ में सोचें तो हम आम जनता कुत्ते की तरह हैं, जो हर अनुचित पर लगातार भौंक रहे हैं और सदियों से भौंकते जा रहे हैं। न किसी को हमारी परवाह है, न कोई हमारी बात सुनता है; फिर भी हम भौंकते रहते हैं। ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद करते रहते हैं। हमारे अधिनायक, बादशाह, शासक, नेता, आका, सत्ताधीश बिगड़ैल हाथी की तरह सत्ता हथियाने के लिए भाग रहे हैं और हम जैसे भौंकते कुत्तों को रौंदते जा रहे हैं। वे हाथी हैं, अपने हाथी होने पर उन्हें घमण्ड है और इस अभिमान में पाँव के नीचे आने वाले कुत्तों को रौंदना उनका कर्त्तव्य; क्योंकि ऐसे कुत्ते उनकी राह में बाधा डालने के लिए खड़े हैं।  

भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अन्याय, अत्याचार, तानाशाही, निरंकुशता आदि के ख़िलाफ़ हम कितना भी भौंके, कोई सुनवाई नहीं है। नेताओं को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उन्हें अपने फ़ायदे के लिए जो सही लगता है वे करते हैं; वे हाथी जो ठहरे। आम जनता तो कुत्ता है, भौंके, भौंकता रहे। जिधर रोटी मिलेगी दुम हिलाते हुए कुछ कुत्ता हाथी के पीछे चला जाएगा। कुछ कुत्ता हमेशा की तरह भौंक-भौंककर जनता को जगाएगा ताकि वे अपना अधिकार जाने और सही के लिए भौंकने में साथ दें। 

जब-जब चुनाव आएगा तब-तब हाथी होश में आएगा और गिरगिट-सा रंग बदलते हुए अपनी चाल थोड़ी धीमी करेगा। बाज़ार से गुज़रते हुए रोटी का टुकड़ा फेंकता जाएगा, थोड़ा पुचकारेगा, थोड़ा दया दिखाएगा; जो झाँसे में न आया उसे पाँव तले कुचल देगा। यों भी पेट और वोट का रिश्ता बहुत पुराना है। पाँच साल जनता कुत्ते की तरह भौंके और नेता हाथी की तरह मदमस्त चलता रहे।

समाज में हर तरह के लोग होते हैं, जो हर कार्य का आकलन, अवलोकन और निष्पादन अपने सोच-विचार से करते हैं। हमारी सोच को शिक्षा, धर्म और संस्कृति सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है। जाने कब आएगा वह दिन जब न कोई शासक होग़ा न कोई शोषित। सभी की सोच पर से धर्म और जाति का पर्दा उठेगा और जनहित को ध्यान में रखकर इन्सानियत वाले समाज का निर्माण होगा।  

शासक हाथी और शोषित कुत्ता, खेल जारी है... हाथी अपने मद में चूर जा रहा है और कुत्ते भौंक रहे हैं। हाथी सदा सही होता है और कुत्ता सदा बेवकूफ़! सन्दर्भ भले उलट गया पर कहावत सही है- ''हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार।'' 

- जेन्नी शबनम (1.5.24)

(मज़दूर दिवस)

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Wednesday, May 1, 2013

45. मज़दूर महिलाएँ : मूल्यहीन श्रम

मैंने जब से होश सँभाला तब से फैज़ की यह नज़्म सुनती और गुनगुनाती रही हूँ-
''हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे 
इक खेत नहीं इक देश नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे...''
 
बचपन में सोचती थी कि आख़िर मेहनत तो सभी करते हैं, फिर कौन किससे हिस्सा माँग रहा है? ये दुनिया आख़िर है किसकी? दुनिया है किसके पास? कोई एक जब पूरी दुनिया ले लेगा, तो बाक़ी लोग कहाँ जाएँगे? अजीब-अजीब-से सवाल मन में इकट्ठे होते रहे। बड़े होने पर समझ आया कि कौन मेहनतकश है और कौन सरमायादार

मई दिवस पर होने वाली हर बैठक में अपने माता-पिता के साथ मैं जाती थी। गोष्ठियाँ और बड़ी-बड़ी रैली होती, जिसमें शहर और गाँव के किसान एवं श्रमिक शामिल होते थे। झंडे, पोस्टर, बैनर आदि होते थे। पुरज़ोर नारे लगाए जाते थे- ''दुनिया के मज़दूरों एक हों'', ''ज़ोर ज़ुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है'', ''इन्क़िलाब ज़िन्दाबाद, पूँजीवाद मुर्दाबाद'' आदि। उन दिनों मई दिवस मेरे लिए जश्न का दिन होता था। 

समय के साथ जब ज़िन्दगी की परिभाषा समझ में आई, तब ढेरों सवाल उगने लगे, जिनके जवाब अक्सर मुझे स्वयं ही समझ में आने लगे। जब ये दुनिया बनी होगी, तब स्त्री और पुरुष सिर्फ़ दो जाति रही होगी। श्रम के आधार पर पुरुषों की दो जातियाँ स्वतः बन गईं। एक जो श्रम करते हैं और एक जो श्रम करवाते हैं। जो श्रम नहीं करते, वे जीवन यापन के लिए बल प्रयोग द्वारा ज़र, जोरू और ज़मीन हथियाने लगे। बाद में इनके हिस्से में शिक्षा, सुविधा और सहूलियत आई। ये कुलीन वर्ग कहलाए। पुरुषों ने स्त्री को अपने अधीन कर लिया; क्योंकि स्त्री शारीरिक रूप से पुरुषों से कमज़ोर होती है। धीरे-धीरे स्त्री ने पुरुष की अधीनता स्वीकार कर ली; क्योंकि इसमें जोख़िम कम था और सुरक्षा ज़्यादा। कितना वक़्त लगा, कितने अफ़साने बने, कितनी ज़िन्दगी इन सबमें मिट गई, कितनी जानें गईं, कितनों ने ख़ुद को मिटा दिया और अंततः सारी शक्तियाँ कुछ ख़ास के पास चली गईं। स्त्रियाँ और कामगार श्रमिक कमज़ोर होते गए और सताए जाने लगे। वे बँधुआ बन गए, उत्पादन करके भी वंचित रहे। वह वर्ग जिसके बल पर दुनिया के सभी कार्य होते हैं, सर्वहारा बन गए। इस व्यवस्था परिवर्तन ने सर्वहारा वर्ग को भीतर से तोड़ दिया। धीरे-धीरे हक़ के लिए आवाज़ें उठने लगीं, सर्वहारा के अधिकारों के लिए क्रान्ति होने लगी। मज़दूर-किसान और स्त्रियों के अधिकार के लिए हुई क्रान्तियों ने कानूनी अधिकार दे दिए, पर सामाजिक ढाँचे में ख़ास बदलाव नहीं आया। आज भी मनुष्य को मापने के दोहरे मापदण्ड हैं।  
पुरुषों के दो वर्ग हैं शासक और शोषित, पर स्त्रियों का सिर्फ़ एक वर्ग है- शोषित। दुनिया की तमाम स्त्रियाँ आज भी अपने अधिकार से वंचित हैं; यों कुछ देशों ने बराबरी का अधिकार दिया है। हर स्त्री उत्पादन का कार्य करती है। चाहे खेत में अनाज उपजाए या पेट में बच्चा। शिक्षित हो या अशिक्षित, घरलू कार्य की ज़िम्मेदारी स्त्री की ही होती है। फिर भी स्त्री को कामगार या श्रमिक नहीं माना जाता है। खेत, दिहाड़ी, चौका-बर्तन, या अन्य जगह काम करने वाली स्त्रियों को पारिश्रमिक मिलता है, पर समान कार्य के लिए पुरुषों से कम मिलता है। एक आम घरेलू स्त्री सारा दिन घर का काम करती है, संतति के साथ आर्थिक उपार्जन में मदद करती है; परन्तु उसके काम को न सिर्फ़ नज़रअंदाज़  किया जाता है बल्कि एक सिरे से यह कहकर ख़ारिज किया जाता है कि ''घर पर सारा दिन आराम करती है, खाना पका दिया तो कौन-सा बड़ा काम किया, बच्चे पालना तो उसकी प्रकृति है, यह भी कोई काम है।'' एक आम स्त्री के श्रम को कार्य की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता है; जबकि सत्य है कि दुनिया की सभी स्त्री श्रमिक है, जिसे उसके श्रम के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता है।

मज़दूर दिवस आते ही मज़दूरों, श्रमिकों या कामगारों की जो छवि आँखों में तैरती है उनमें खेतों में काम करने वाले, दिहाड़ी पर काम करने वाले, रिक्शा-ऑटो चालाक, कुली, सरकारी गैर सरकारी संस्था में कार्यरत चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी आदि होते हैं। हर वह व्यक्ति श्रमिक है, जो दूसरे के लिए श्रमदान करता है और बदले में पारिश्रमिक का हक़दार होता है। परन्तु आम स्त्री को श्रमिक अब तक नहीं माना गया है और न श्रमिक कहने से घर में घरेलू काम-काज करती, बच्चे पालती स्त्री की छवि आँखों में उभरती है। 

मई दिवस आज भी वैसे ही मनाया जाएगा जैसे बचपन से देखती आई हूँ। कई सारे औपचारिक कार्यक्रम होंगे, बड़े-बड़े भाषण होंगे, उद्घोषणाएँ की जाएँगी, आश्वासन दिए जाएँगे, बड़े-बड़े सपने दिखाए जाएँगे। कल अख़बार नहीं आएगा; श्रमिक को साल में एक दिन काम से आराम। इन सबके बीच श्रमिक स्त्री हमेशा की तरह आज भी गूँगी-बहरी बनी रहेगी, क्योंकि माना जाता है कि यही उसकी प्रकृति और नियति है ।
समय आ गया है कि स्त्रियों के श्रम को मान्यता मिले और इसके लिए संगठित प्रयास आवश्यक है। इसमें हर उस इंसान की भागीदारी आवश्यक है, जो स्त्रियों को इंसान समझते हैं, चाहे वे किसी धर्म, भाषा, प्रांत के हों। स्त्रियों के द्वारा किए गए कार्य का पारिश्रमिक देना तो मुमकिन नहीं और न उचित है; इससे स्त्री अपने घर में श्रमिक और उसका पिता या पति मालिक बन जाएगा। अतः स्त्री के कार्य को श्रम की श्रेणी में रखा जाए और उसके कार्य की अवधि की समय सीमा तय की जाए। स्त्री को उसके श्रम के हिसाब से सुविधा मिले और आराम का समय सुनिश्चित किया जाए। स्त्री को उसके अपने लिए अपना वक़्त मिले, ताकि अपनी मर्ज़ी से जी सके और अपने समय का अपने मनमाफ़िक उपयोग सिर्फ़ अपने लिए कर सके। शायद तब हर स्त्री को उसके श्रमिक होने पर गर्व होगा और कह पाएगी ''मज़दूर दिवस मुबारक हो!''

-जेन्नी शबनम (1.5.2013)
(मज़दूर दिवस)
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