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Wednesday, April 29, 2020

73. अलविदा मक़बूल

सिनेमा हॉल का दरवाज़ा बंद था। खुलने के निर्धारित समय से ज़्यादा वक़्त हो चला था। तभी एक गेटकीपर बाहर आया, उससे मैंने पूछा कि बहुत ज़्यादा देर हो रही है, मूवी शुरू होने में देर क्यों है उसने बताया कि थोड़ी देर हो जाएगी, क्योंकि फ़िल्म के प्रोमोशन के लिए लोग आए हैं। सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग मेरे साथ उस गेट के बाहर एकत्रित हो गए। मन में बहुत उत्सुकता थी कि एक झलक कलाकारों को देख लूँ। मैं सिनेमा की बेहद शौक़ीन रही हूँ और फर्स्ट डे और कभी-कभी तो फर्स्ट डे फर्स्ट शो भी देखती हूँ। साथ देखने वाला कोई न भी हो परवाह नहीं, अकेले जाकर देखती हूँ। 
 
भीड़ काफ़ी बढ़ गई मैं खड़े-खड़े थक गई, तो सोचा कि जाकर थोड़ी देर बैठूँ। तभी हॉल का गेट खुला और ढेर सारे लोग बाहर निकलने लगे। देखा कि भीड़ के साथ अर्जुन रामपाल और उनके साथ इरफ़ान खान आ रहे हैं। बाक़ी और कौन-कौन थे साथ में, किसी पर मेरी नज़र नहीं ठहरी, क्योंकि ये दोनों मेरे पसन्दीदा कलाकार हैं। जैसे ही मैंने इरफ़ान को देखा, तो बेटी को ज़रा ज़ोर से बोली कि देखो मक़बूल आ रहा है। कुछ लोग मेरी बातों पर हँस दिए। मैं मक़बूल को देखती रही और वे सामने से मुस्कुराते हुए गुज़र गए। अर्जुन तो हैण्डसम हैं ही; लेकिन इरफ़ान की ख़ूबसूरती देखकर मैं दंग रह गई। कत्थई रंग का सूट पहने लम्बा छरहरा बदन, घुंघराले सुनहरे बाल, बड़ी-बड़ी आँखें और मुस्कुराता चेहरा। रील के चेहरे से ज़्यादा ख़ूबसूरत रियल चेहरा। यह बात है 2013 की, फ़िल्म का नाम 'डी-डे', दिल्ली के साकेत स्थित सेलेक्ट सिटी मॉल का पी.वी.आर. सिनेमा हॉल।   
वर्ष 2004 में एक फ़िल्म आई थी 'मक़बूल', जिसमें मक़बूल का किरदार इरफ़ान खान ने निभाया था। बड़ी अच्छी लगी थी फ़िल्म। यों अब फ़िल्म की कहानी याद नहीं, इतना याद है कि क्राइम पर आधारित फ़िल्म थी और इरफ़ान के साथ तब्बू के कुछ अच्छे सीन थे। मुझे उनका असली नाम कभी याद नहीं रहताजब भी इरफ़ान की कोई फ़िल्म देखने जाना हो और कोई पूछे कि फ़िल्म में कौन एक्टर है, तो मैं मक़बूल बोलती हूँ। इरफ़ान की लगभग सभी फ़िल्में देखी है मैंने और अब भी मक़बूल ही बोलती हूँ, जाने क्यों।   
7 जनवरी 1967 को जयपुर, राजस्थान में जन्मे इरफ़ान खान हिन्दी और अंग्रेज़ी सिनेमा तथा टेलीविजन के बहुत कुशल अभिनेता रहे हैं। बॉलीवुड तथा हॉलीवुड में इरफ़ान एक जाना पहचाना नाम है। इरफ़ान को 'हासिल' फ़िल्म के लिए वर्ष 2004 के फ़िल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला। वर्ष 2008 में बेस्ट ऐक्टर इन सपोर्टिंग रोल का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। अभिनय के लिए सन 2011 में इरफ़ान पद्मश्री से सम्मानित हो चुके हैं। राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 2012 में फिल्म 'पान सिंह तोमर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। वर्ष 2017 के फ़िल्मफेयर में फ़िल्म 'हिन्दी मीडियम' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। 
वर्ष 2018 में जब इरफ़ान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हुआ, तब इरफ़ान ने अपने प्रशंसकों के लिए एक बेहद भावुक नोट लिखा-
''जीवन में अनपेक्षित बदलाव आपको आगे बढ़ना सिखाते हैं। मेरे बीते कुछ दिनों का लब्बोलुआब यही है। पता चला है कि मुझे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हो गया हैइसे स्वीकार कर पाना मुश्किल है; लेकिन आस-पास जो लोग हैं, उनका प्यार और उनकी दुआओं ने मुझे शक्ति दी है कुछ उम्मीद भी बँधी है। फ़िलहाल बीमारी के इलाज के लिए मुझे देश से दूर जाना पड़ रहा है। लेकिन मैं चाहूँगा कि आप सन्देश भेजते रहें।'' ''न्यूरो सुनकर लोगों को लगता है कि ये समस्या ज़रूर सिर से जुड़ी बीमारी होगी लेकिन ऐसा नहीं है इसके बारे में अधिक जानने के लिए आप गूगल कर सकते हैं। जिन लोगों ने मेरे शब्दों की प्रतीक्षा की, इन्तिज़ार किया कि मैं अपनी बीमारी के बारे में कुछ कहूँ, उनके लिए मैं कई और कहानियों के साथ ज़रूर लौटूँगा।''
इरफ़ान अपनी बीमारी के इलाज के लिए लन्दन गए थे। जब वहाँ से लौटे और 'अंग्रेज़ी मीडियम' फ़िल्म किया, तो मुझे लगा कि वे पूर्णतः स्वस्थ हो चुके हैं; क्योंकि मेरा अनुमान था कि कुछ कैंसर ठीक हो जाता है और चिकित्सा के लिए लन्दन के अस्पताल अच्छे माने जाते हैं। 'अंग्रेज़ी मीडियम' उनकी आख़िरी फ़िल्म हो गई। लॉकडाउन के कारण यह फ़िल्म सिनेमा हॉल तक न जा सकी और ऑनलाइन रिलीज हुई। 'हिन्दी मीडियम' की ही तरह 'अंग्रेज़ी मीडियम' हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा की विषमताओं पर आधारित बहुत ही संवेदनशील फ़िल्म है। इरफ़ान अपनी इस फ़िल्म की सफलता जो सिनेमा हॉल में मिलती, देख न सके। इरफ़ान का आख़िरी ट्वीट 12 अप्रैल को, जिसे उन्होंने अपनी अन्तिम फ़िल्म 'अंग्रेज़ी मीडियम' के ऑनलाइन रिलीज होने पर किया- ''मिस्टर चम्पक की मनःस्थिति : अंदर से प्यार, कोशिश करूँगा कि बाहर से दिखा सकूँ।' (''Mr. Champak's state of mind : Love from the inside, making sure to show it outside.'')   
इरफ़ान एक कलाकार के रूप में गज़ब का अभिनय करते हैं। आँखों से भाव को अभिव्यक्त करने में उन्हें महारत हासिल है। जिस भी किरदार में होते हैं जीवन्त कर देते हैं, चाहे वह पान सिंह हो या मक़बूल। उनकी सभी फ़िल्में और उनका अभिनय बेहतरीन है। हिन्दी फ़िल्मों में मक़बूल, रोग, पान सिंह तोमर, लंच बॉक्स, हिन्दी मीडियम, अंग्रेज़ी मीडियम आदि बहुत सफल है और मुझे बेहद पसन्द है। टी.वी. पर चाणक्य, भारत एक खोज आदि धारावाहिक में वे काम कर चुके हैं। हिन्दी फ़िल्म, अंग्रेज़ी फ़िल्म और टी.वी. धारावाहिक सभी में उनका अभिनय बहुत उत्कृष्ट रहा है और हर जगह अपनी छाप छोड़ी है।   
आज इरफ़ान की मृत्यु की ख़बर पढ़कर स्तब्ध हूँ। अभी चार दिन पहले 25 तारीख़ को उनकी माँ गुज़र गईं; परन्तु कोरोना के कारण देशव्यापी लॉकडाउन की वज़ह से इरफ़ान अपनी माँ की अन्तिम यात्रा में शामिल न हो सके थे। कल उनकी तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया आज ज़िन्दगी से बिना जंग किए, मौत के साथ वे इस दुनिया से चले गए। सिर्फ़ फ़िल्मी दुनिया या उनके अपनों के लिए नहीं, बल्कि उनके चाहनेवालों और प्रशंसकों के लिए भी बहुत बड़ा सदमा है। ऐसा सदमा जो हमें इरफ़ान को कभी भूलने नहीं देगा। उनकी फ़िल्में, उनके किरदार, उनका अभिनय, उनकी आँखें, उनकी आँखों की भाषा, उनकी हँसी, उनकी अदाकारी सब कुछ यहाँ हमारे लिए वे छोड़ गए हैं। जब चाहे इन फ़िल्मों या धारावाहिक में उन्हें अभिनय करते हुए हम देख सकते हैं, पर इस बात का दुःख हमेशा रहेगा कि अब उनकी कोई नई फ़िल्म नहीं आएगी और मैं उम्रदराज़ मक़बूल को कभी देख नहीं पाऊँगी। 

अलविदा मक़बूल!  

-जेन्नी शबनम (29.4.2020)
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