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Tuesday, May 6, 2025

124. मेरी दादी


 दादी 
''उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है 
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है।''
मेरी दादी उपरोक्त कविता की ये पंक्तियाँ, जिसे वंशीधर शुक्ल ने अवधी भाषा में लिखी है, कहती थीं, जब हम बच्चे उठने में देर करते थे। दादी से मुझे जीवन, दुनियादारी और परम्पराओं की सीख व समझ गीत, दोहे, भजन, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, कहावत, पहेली, कहानी इत्यादि द्वारा मिली। कबीर के दोहे, सूरदास के पद या विद्यापति की पदावली, दादी से ही मैंने सब सुना व जाना। बोधकथा, जातककथा, धर्मग्रंथों की कहानी, शिक्षाप्रद क़िस्से, तोता-मैना की कहानी, गोनू झा की कहानी, सिंहासन बत्तीसी, बैताल पच्चीसी इत्यादि की कहानियाँ दादी हमें सुनाती थीं। रोज़ रात में सोते समय हम दादी से कहते- ''दादी क़िस्सा सुनाओ।'' दादी रामायण या महाभारत का कुछ अंश कहानी की तरह सुनातीं। दादी हमेशा कबीर का यह दोहा कहती थीं- ''साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए।'' तुलसीदास का एक दोहा भी अक्सर कहती थीं- ''वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।''   
दादी
कितनी बातें, कितनी यादें, कितने क़िस्से हम अपनी स्मृतियों में समेटे होते हैं। जब कोई बात चलती है या याद आती है, तो किताब की तरह जीवन का हर सफ़्हा खुलता चलता है। अतीत को याद करते हुए मन हमेशा बचपन की तरफ़ लौटता है, जहाँ अपने लोगों के साथ जीवन बीता होता है। मेरी दादी मेरे जीवन का अहम हिस्सा रही हैं। खाना पकाती हुई, खेत-खलिहान-बगीचा का अवलोकन करती हुई, ख़ाली पैर भोरे-भोरे तरकारी तोड़कर लाती हुई, अनाज जोखती (तौलना) हुई, अनाज उसनती (उबालना) हुई, ढेंकी में चूड़ा कुटवाती हुई, जाँता में दलिया-दाल दरवाती हुई, मूँज से डलिया बुनती हुई, लालटेन जलाती हुई, घूर (अँगीठी) तापते हुए लोगों से बतियाती हुई, गीत गाती हुई, क़िस्सा सुनाती हुई, मेरे पापा को यादकर रोती हुई, मेरी मम्मी के हर दुःख में हिम्मत बँधाती हुई; न जाने कितने रूपों में दादी याद रहती हैं।  
हम बच्चे 
दादी से जुड़ी इतनी बातें हैं कि याद करूँ तो एक पुस्तक लिख जाए। दादी में मानवता कूट-कूटकर भरी हुई थी। दादी को ग़ुस्सा होते हुए कभी नहीं देखा; परन्तु कुछ ग़लत हो, तो बेबाकी से बोलती थीं। सभी से प्रेम करना, भूखे को खाना खिलाना, दान करना, सभी की फ़िक्र करना, रिश्ते-नाते निभाना, सभी की मदद करना, आदर-सत्कार करना, अपने-पराए का भेद न रखना इत्यादि कितना कुछ गुण दादी में था। वे धार्मिक थीं, उन्हें ईश्वर में आस्था थी; लेकिन वे कभी भी मूर्तिपूजक या पाखण्डी नहीं थीं। दादी बेहद प्रगतिशील सोच की स्त्री थीं। वे ज़्यादा शिक्षा नहीं ले सकीं, मागर ज़रूरत भर पढ़ लेती थीं। वे शिक्षा को बहुत महत्व देती थीं। हिन्दी के अलावा वे कैथी भाषा भी पढ़ती थीं। 
पापा, भइया, मम्मी 
मेरी दादी किशोरी देवी जिनका जन्म वर्ष 1906 में बिहार के शिवहर ज़िला के माली गाँव में हुआ। मेरे दादा सूरज प्रसाद की पहली पत्नी का देहान्त हो चुका था, अतः दादा की दूसरी शादी मेरी दादी से हुई। दादी के चार बच्चे, जिनमें मेरे पापा सबसे बड़े थे, तथा पहली दादी के दो बच्चे मिलाकर दादी छह बच्चों की माँ बनी। दादी शुरू से सभी बच्चों का पालन-पोषण एक समान करती रहीं; लेकिन पापा के बड़े भाई जिन्हें मैं बड़का बाबूजी कहती हूँ, दादी को सदैव सौतेली माँ ही मानते रहे। मेरे दादा दो भाई थे और दोनों के परिवार शिवहर के कोठियाँ गाँव में आस-पास रहते थे। मेरे दादा का संयुक्त परिवार होने के कारण मेरे पिता की शिक्षा में बहुत बाधा आ रही थी; क्योंकि कृषि पर निर्भरता थी। एक बच्चे (मेरे पिता) पर ज़्यादा पैसे ख़र्च हो रहे थे, जिससे घर में कलह होने लगा। अंततः बँटवारा हुआ और दादा-दादी के साथ पापा रह गए। दादी ने मेरे पिता की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बँटवारे के बाद मेरे छोटे चाचा घराड़ी (पुश्तैनी मकान) में रह गए और मेरे दादा-दादी, बड़का बाबूजी का परिवार और मेरे पापा गाँव के बाहर यानी जहाँ से गाँव शुरू होता है, घर बनाकर रहने लगे। मेरे होश सँभालने के बाद पापा ने अलग घर बनवाया जहाँ दादी रहती थीं; दादा का बहुत पहले देहान्त हो चुका था। पापा-मम्मी भागलपुर में कार्यरत थे, तो दादी ही पापा के ज़मीन की खेती का काम देखती थीं। गाँव का कोई भी कार्य दादी से पूछे बिना पापा नहीं करते थे। माँ-बेटे का इतना अच्छा सम्बन्ध बहुत कम देखने को मिलता है। लगभग हर महीने या दो महीने पर वे भागलपुर आतीं, तो अनाज, दाल, तरकारी, घी इत्यादि लेकर आती थीं। जब भी पापा-मम्मी को कहीं बाहर जाना होता, तो वे हम भाई-बहन के लिए भागलपुर आ जाती थीं।
मम्मी, मैं, भाई, फुफेरा भाई, दादी 
हमारे बचपन में ननिहाल-ददिहाल में बच्चों का पालन पोषण होना आम बात थी। मेरी बीचवाली फुआ का बेटा कुछ साल दादी के पास रहकर अपने घर लौट गया। मेरी सबसे बड़ी फुआ का एक बेटा बचपन से हमारे साथ रहा, जबतक उसकी शादी न हो गई। मेरा एक चचेरा भाई लगभग हमारे साथ ही रहता और रात में अपने घर चला जाता था। चूँकि हमारे घर में बिजली थी, अतः भाई के साथ पढ़ने वाले कुछ बच्चे भी हमारे घर पर पढ़ने आते थे। हम सभी बच्चे एक साथ पढ़ते, फिर वे सभी अपने-अपने घर चले जाते या कभी रात में रुक भी जाते थे। मेरे दोनों भाई गाँव में दादी के पास रहकर मेट्रिक किए; लेकिन मैं दो साल गाँव में पढ़कर भागलपुर आ गई। मेरा फुफेरा भाई भी आगे की पढ़ाई के लिए भागलपुर आ गया और मेरा भाई पटना चला गया। उसके बाद खेत को बटइया पर देकर दादी भागलपुर आ गईं। दादी ने हम सभी की बहुत अच्छी तरह देखभाल की, पढ़ाया और समझदार बनाया। 
मैं, मम्मी, भइया, प्रो. गोरा 
मेरी दादी विचार से धार्मिक स्त्री थीं। किसी भी सुख या दुःख में दादी हमेशा रामचरितमानस की यह चौपाई कहतीं- ''होइहि सोइ जो राम रचि राखा।'' वे किसी ग़लत के सामने डटकर खड़ी हो जाती थीं, चाहे वह कोई भी क्यों न हो। पापा कम्युनिस्ट, नास्तिक और गांधीवादी थे। हमारे घर में हर जाति-धर्म के लोगों का स्वागत-सत्कार होता था। पापा की मृत्यु के बाद बड़का बाबूजी के घर अगर कोई ऐसा मेहमान आ गया जो कम्युनिस्ट पार्टी या निम्न जाति का हो, तो उनके खाने के लिए मेरे घर से थाली जाती थी; क्योंकि कम्युनिस्ट  धर्म और छुआछूत नहीं मानते हैं। वर्ष 1989 में जब भागलपुर दंगा हुआ और हमारे घर में लगभग 100 लोग छुपे थे, तो उन सभी का खाना दादी ही बनाती रहीं। दादी ने कभी छुआछूत नहीं माना। शायद पापा के प्रभाव के कारण वे जाति-धर्म से ऊपर उठ गई थीं, या वैचारिक रूप से शुरू से वैसी ही रही होंगी।
बुढ़िया दादी, भइया, मैं, दादी 
मेरी दादी जब बहुत छोटी थीं तब उनके पिता का देहान्त हो गया। मेरी दादी की माँ अक्सर आतीं, जिन्हें हमलोग बुढ़िया दादी कहते थे। उन दिनों विधवा स्त्रियों को सफ़ेद साड़ी पहनना और सिर के बाल मुँड़वाने (अनिवार्य नहीं) की परम्परा थी। बुढ़िया दादी को मैंने सदैव सफ़ेद साड़ी और बिना बाल के सिर में देखा। वे बहुत धार्मिक महिला थीं, कपाल पर चन्दन-टीका और गले में तुलसी का माला पहनती थीं। वे अक्सर अयोध्या में जाकर महीनों रहतीं। जब भी अपने गाँव से आतीं, तो स्वयं का बनाया पेड़ा, मूढ़ी, लाई इत्यादि लाती थीं। हमलोग उनके आने का हमेशा इन्तिज़ार करते थे; क्योंकि उनका बनाया पेड़ा बहुत स्वादिष्ट होता था और वे कहानी सुनाती थीं। वे काफ़ी बूढ़ी थीं, झुककर लाठी लेकर चलतीं, पर अत्यंत फुर्तीली और तेज़ क़दमों से चलती थीं। उनका देहान्त 108 वर्ष की उम्र में 14.1.1979 को दादी के पास हुआ।  
बुढ़िया दादी, दादी, भाई, मैं 
मेरे दादा का देहान्त वर्ष 1963 में हुआ। तब मैं और मेरे भाई का जन्म नहीं हुआ था। जब से हमने होश सँभाला दादी को पाड़ वाली सफ़ेद साड़ी में देखा। अपने लिए साया-ब्लाउज भी वे स्वयं हाथ से सिलकर पहनती थीं। हमारे यहाँ कपास की खेती होती थी, तो दादी कपास से रूई निकालकर तकिया बनाती और उसका खोल भी स्वयं सिलती थीं। वे खाना बहुत स्वादिष्ट बनाती थीं। घर के अधिकतर कार्य वे स्वयं करती थीं। छुट्टियों में जब भी पापा गाँव जाते तो कुछ-न-कुछ काम करवाते, जिसके लिए 10-15 मज़दूर आते थे। इन सभी का पनपिआई (दोपहर का खाना) दादी बनाती थीं। सहयोग के लिए एक स्त्री भी होती थी। गाँव-समाज का कार्य पापा ने इतना कराया, पर अपने जीवन में गाँव का मकान पूरा नहीं बनवा सके। बाद में मैंने और मम्मी ने मुज़फ़्फ़रपुर जाकर मकान बनाने के लिए सभी सामानों की ख़रीददारी की। गाँव की एक स्त्री, जो मम्मी को बहुत सहयोग करती थी, सारा सामान ट्रक से लेकर गाँव आई। दादी अपने सामने पूरा घर बनवाई। जब मकान बन गया तो दादी से कहतीं- ''दुल्हिन तोहरे मेहनत से ई घर बनलई ह। बउआ के सपना तू पूरा कर देलू।'' (तुम्हारे मेहनत से यह मकान बना है। तुमने बउआ (मेरे पापा) का सपना पूरा कर दिया) फिर दादी पापा की याद में रोने लगती थीं। मम्मी कहतीं कि आपका साथ नहीं होता, तो हम यह सब नहीं कर पाते।  
गाँव का हमारा घर 
दादी बहुत कर्मठ और साहसी स्त्री थीं। मेरे पापा-मम्मी के लिए वे हर वक़्त खड़ी रहीं, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। मेरे पापा का देहान्त 18.7.1978 में हुआ। उसके बाद मेरी मम्मी को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। दादी मेरी मम्मी को हिम्मत और हौसला देती रहीं। इस कारण मम्मी की ज़िन्दगी थोड़ी सुगम रही। दादी को पापा दीदी कहते थे और मम्मी माए कहती थीं। पापा को दादी बउआ कहकर पुकारती थीं और मम्मी को दुल्हिन। पापा के देहान्त के बाद भी मम्मी को दुल्हिन ही कहती रहीं। शाम को मम्मी कार्य करने के बाद घर लौटतीं तो थक जाती थीं। वे बिछावन पर लेटतीं, तो दादी आकर उनके पैर की तरफ़ बैठ जातीं और धीरे-धीरे पाँव दबाने लगतीं। मम्मी को बहुत अटपटा लगता कि सास होकर पाँव दबाए। दादी कहती कि तुम पुतोह न होकर बेटी होती तो पैर दबाते न! फिर मम्मी दिन भर का हाल और घटनाएँ दादी को सुनातीं। सास-बहू का इतना अच्छा सम्बन्ध मैंने आजतक नहीं देखा। 
दादी, मैं, मम्मी 
मैं जब समझदार हुई तो मम्मी को ज़बरदस्ती रंगीन साड़ी पहनाती और मम्मी दादी को। हालाँकि दादी कहती कि आदत है इसलिए रंगीन पहनना अच्छा नहीं लगता है। काफी हलके प्रिंट की साड़ी मम्मी जबरदस्ती पहनाती थीं। लेकिन हाथ में चूड़ी कभी नहीं पहनी। होली में जब मैं रंग लगा देती तो ग़ुस्सा होतीं, पर मैं कहाँ मानने वाली। फिर दादी हँसकर कहती- ''देख न दुल्हिन, जेन्नी हमरा रंग लगा देलई।'' (देखो न, जेन्नी ने मुझे रंग लगा दिया) मम्मी कहतीं- ''की होतई माए। हमरो त लगा देलई ह। रंग लगैला से कथी होतई।'' (क्या होगा माँ। मुझे भी लगा दी है। रंग लगाने से क्या होगा) हालाँकि मम्मी ख़ुद अपने को रंग नहीं लगाने देती थीं। मेरे नाना जब भी आते, तो दादी और नाना अपने-अपने पोते की बड़ाई करते रहते। नाना बहुत पूजा करते थे, पर दादी नहीं करती थीं। वे कहतीं- ''न पाप करीले, न पुन ला मरीले'' (न पाप करना है न पुण्य के लिए मरना है)। वे दोनों आपस में धार्मिक चर्चा करते रहते थे। उनका ख़ूब नोक-झोंक भी होता और हमलोग ख़ूब हँसते थे। 
    
बचपन का एक मज़ेदार क़िस्सा याद आता है। जब मैं छोटी थी तो मुझे अपनी दादी बहुत लम्बी-चौड़ी-विशाल दिखती थीं; वे मोटी थीं, शायद इसलिए। एक बार पापा ने सभी के बाल कटवाने के लिए नाई को बुलाया। वैसे मेरी मम्मी ही मेरा बाल काटती थीं; साधना कट का ख़ूब चलन था उस ज़माने में। पापा ने कहा कि जब नाई आया है, तो मेरा बाल भी काट देगा। नाई से बाल कटवाने के डर से मैं पलंग के नीचे छुप गई। मेरी खोज होने लगी। इतने में दादी गाँव से आईं और उसी पलंग के पास खड़ी हुईं। दादी का मोटा-बड़ा पैर देखकर मैं डर से चिल्लाने लगी और पकड़ी गई। दादी-पापा-मम्मी खूब हँसे। जब मैं बड़ी हुई, तो सोचती कि दादी की लम्बाई तो मुझसे कम है, फिर मुझे दादी इतनी विशाल क्यों लगती थी। अब समझ में आता है कि छोटे बच्चों को उनसे बड़ा कोई भी चीज़ विशाल दिखता है। 

वर्ष 1984 में पहली बार दादी बहुत ज़्यादा बीमार हुईं। उन्हें मधुमेह और गठिया हो गया। परन्तु अपने खानपान पर नियंत्रण कर वे स्वयं को स्वस्थ रखती थीं। आँखों के मोतियाबिन्द के ऑपरेशन के बाद वे छोटे अक्षरों वाली किताबें फिर से पढ़ने लगीं। उनकी देखने-सुनने की क्षमता और याददाश्त ज़रा भी कम नहीं हुई। चलने में थोड़ी परेशानी थी; परन्तु अपने सभी काम स्वयं करती थीं। यदि कुछ ख़ास खाना बनवाना हो, तो रसोईघर में कुर्सी पर बैठकर खाना बनवाती थीं। उस उम्र में उनका पढ़ना, गीत गाना, कहानी सुनाना जारी था। दादी जब भाई के पास रहने चली गईं, तो अधिकतर समय धर्मग्रंथ पढ़ने में बिताती थी। भाई सुबह हड़बड़ी में ऑफिस जाने लगता, तो कहता कि देर हो रही है, नहीं खाएँगे। दादी केला छीलकर कहती- ''बउआ एक कौर खा लो, ज़रा-सा खा लो।'' भइया ग़ुस्साते हुए बोलता- ''रोज़ तुम हमको ऐसे ही केला खिला देती हो।'' जिस तरह दादी मेरे पापा को बउआ और मम्मी को दुल्हिन कहकर सम्बोधित करती थीं, भइया और भाभी को भी बउआ और दुल्हिन ही कहती थीं। भइया में तो जैसे प्राण बसता था दादी का और भइया का प्राण दादी में। मेरा भाई अमेरिका से लौटते ही दादी को अपने साथ मुम्बई फिर बैंगलोर ले गया। जब भी दादी बीमार होतीं, तो मम्मी छुट्टी लेकर महीनों वहाँ रहती थीं।    

जब भी मैं दादी से मिलने जाती, तो उन बूढ़ी हथेलियों से मेरे पाँव दबाने लगतीं। मैं कहती- ''दादी तुम ख़ुद बीमार हो और मेरा पैर दबाती हो।'' दादी हँसती और कहती- ''अब देह में ताक़त कहाँ है, पैर दबता थोड़े होगा।'' मुझे महसूस होता था कि दादी के लिए मैं बच्ची ही थी। मेरा बेटा जब हुआ था, तब दादी मेरे ससुराल आई थीं और दिनभर बेटा के पास रहती थीं। मेरी बेटी का अन्नप्राशन दादी द्वारा खीर खिलाकर हुआ। दादी से मिलने मैं कभी-कभी मुम्बई और बैंगलोर जाती, तो बातों का लम्बा सिलसिला चलता था। सभी परिचितों का हाल समाचार लेतीं और बतातीं। अपनी लम्बी उम्र के लिए रोती- ''जाने हम कब मरेंगे, सब लोग (बेटा दोनों) तो चला गया।'' मैं बोलती- ''दादी, सोचो तुम कितनी भाग्यशाली हो। अपनी पोती (मेरी चचेरी बहन) के पोता को देख ली। ख़ुश होकर रहो, मरना तो सबको है ही एक-न-एक दिन, जब तक हो दोनों पोती (भाई की बेटियाँ) के साथ खेलो, उनको गीत सुनाओ, क़िस्सा सुनाओ जैसे हमलोग को सुनाती थी।'' दादी हँसकर कहती- ''अब उतना याद नहीं रहता है।'' मैं किसी कहानी का कुछ हिस्सा बोलती और कहती कि पूरी कहानी याद नहीं है, तो दादी पूरी कहानी सुना देतीं। वे कभी कुछ नहीं भूलीं। मेरे दोनों बच्चों से जब भी मिलीं, कहानी सुनातीं। मेरे बच्चों को उनकी नरम मुलायम झुर्रियाँ छूने में बड़ा मज़ा आता था। वे कहते- ''बड़ी नानी आपका स्किन कितना सॉफ्ट है।'' दादी हँसती थीं।    

मेरे पापा और मेरे छोटे चाचा का देहान्त हो चुका था। दादी हमेशा कहतीं कि बेटा दोनों मर गए और हम ज़िन्दा हैं, भगवान् हमको क्यों नहीं बुलाते हैं। इससे जुड़ा एक मज़ेदार वाक़या हुआ। शायद वर्ष 2002 की बात है। उन दिनों दादी पटना में रह रही थीं। दीवाली की छुट्टी थी, तो मम्मी भी थीं। भैया के कॉलेज के एक दोस्त अमीरुल हसन आए हुए थे। मेरी मम्मी व दादी को वे मम्मी व दादी ही मानते और बुलाते थे। मैं भी उनको शुरू से भइया बोलती और राखी बाँधती या भेजती थी। मुज़फ़्फ़रपुर के पास एक कॉलेज में वे प्रोफेसर थे; इनका देहान्त हुए लगभग 10 वर्ष हो गए हैं। दादी ने एक दिन सपना देखा कि दादा आए हैं, तो दादी पूछ रही हैं कि वे कब मारेंगी। दादा छह बोले और दादी का सपना टूट गया। दादी ने सभी को सपना बताया। दीवाली या उसके आस-पास छह तारीख़ थी। दादी ने कहा कि छह तारीख़ को हम मरेंगे। उस दिन सुबह उठकर दादी ने नई सफ़ेद साड़ी पहनी। भगवान् का नाम लिया, कुछ भजन गाई, अपने पास मम्मी और अमीरुल भैया को बैठाकर रखी कि आज किसी समय वे मरेंगी। दादी इन्तिज़ार करती रहीं और बार-बार कहती रहीं कि दादा अपने साथ ले जाएँगे। पूरा दिन बीत गया, रात के 12 बज गए। दूसरे दिन दादी ख़ूब हँसी और ख़ूब रोई कि भगवान् उनको क्यों नहीं ले जाते। अंततः दादी का सपना सच हुआ, भले कई सालों बाद। दादी का देहान्त 6.5.2008 में 102 साल की उम्र में हुआ। जाने इस संसार का सत्य क्या है, आख़िर दादी छह तारीख को ही इस संसार से विदा हुई। आज दादी के प्राणान्त के 17 वर्ष हो गए हैं। आज भी दादी के शरीर का अन्तिम स्पर्श याद है, बिल्कुल ठण्डा; उस अनुभव को बताने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास। दादी-पापा-मम्मी की तस्वीर अपने कमरे में लगाई हूँ, बिल्कुल सामने। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता जब इन तीनों को मैं याद न करूँ। 

दादी का अन्तिम संस्कार भाई ने किया; लेकिन मुख में अग्नि देने का साहस उसे नहीं हुआ। मैंने और भइया ने एक साथ मुखाग्नि दी। हालाँकि लोगों ने कहा कि स्त्री मुखाग्नि नहीं देती है; लेकिन भइया अकेले देने को तैयार नहीं था। दादी को मुखाग्नि देना और जलते हुए देखना मेरे जीवन का सबसे कष्टदायक समय था। जिसने बचपन से पाल-पोसकर बड़ा किया उसे ही जला रहे और जलते हुए देख रहे हैं। हालाँकि पापा को भी ऐसे ही जलाया गया था; परन्तु उनकी मृत्यु के बाद या उनका दाह-संस्कार मैंने नहीं देखा। मम्मी का देहान्त हुआ तो मैंने बिजली से जलाने के लिए कहा; क्योंकि दादी को अग्नि में चार-पाँच घंटे तक धीरे-धीरे जलते देखना मेरे लिए असह्य था।  
मम्मी 
दादी अपनी मृत्यु से छह माह पूर्व से अस्वस्थ रहने लगीं और बाद में बहुत ज़्यादा बीमार हो गईं। वे चलने में असमर्थ और दूसरों पर आश्रित हो गईं। अन्तिम तीन माह पहले दादी को अपने पास भागलपुर मम्मी ले आईं; क्योंकि मम्मी के लिए लम्बी छुट्टी लेना सम्भव नहीं था। मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व उनकी याददाश्त थोड़ी कमज़ोर हो गई और कुछ देर के लिए किसी को पहचान नहीं पाती थीं। मैं गई तो दादी को लगा कि मेरी छोटी फुआ आई हैं। उन्होंने कहा- ''शशि, तू आ गेले।'' (शशि, तुम आ गई) फिर कुछ मिनट बाद बोलीं- ''ओ जेन्नी हो, हमको लगा की शशि आई है।'' शायद अन्तिम समय में दादी को अपनी बेटी को देखने की चाह रही होगी। गाँव में दादी जब तक रही मेरी छोटी फुआ महीनों-महीनों आकर रहती थीं; सबसे छोटी थीं इसलिए दादी की दुलारी थीं।  
पापा 
आज के समय में जब देखती हूँ कि बच्चों का अपने दादा-दादी या नाना-नानी से औपचारिक सम्बन्ध है, तो मुझे बेहद आश्चर्य होता है। मेरी दादी से मम्मी की तरह ही मेरा अनौपचारिक सम्बन्ध था। वर्ष 1984 में बीमार होने से पहले तक दादी का मेरे सिर में तेल लगाना और बाल धोना जारी था; क्योंकि मेरे बाल लम्बे थे। जब मैं गाँव में थी, तभी मेरा मासिक चक्र शुरू हुआ। उस ज़माने में लड़कियों को यह सब मालूम नहीं होता था। दादी-मम्मी ने मुझे समझाया और बताया। गाँव में साड़ी और अन्य कपड़ों का पैड बनाकर इस्तेमाल करना होता था और बाद में धोकर-सुखाकर दुबारा इस्तेमाल करना होता था। जब तक मैं गाँव में रही, रोज़ मेरा पैड दादी ही धोती रहीं। मेरी दादी ने मेरे लिए जो किया, मालूम नहीं अब की नानी-दादी ये सब करती हैं या नहीं। खाने की थाली में अगर कुछ खाना कभी मुझसे, भइया से या मम्मी से छूट जाए, तो दादी झट से वह खाना ले लेती थी। वे कहतीं कि खाना बर्बाद नहीं करना चाहिए; हालाँकि मम्मी को बहुत संकोच होता रहा; लेकिन दादी के लिए मम्मी बहू नहीं बेटी थी। जब तक पापा थे, तो किसी को किसी का जूठा खाने नहीं देते थे। बचपन से हम सभी को आदत डाली गई थी कि अपने-अपने प्लेट (प्लेट के पीछे हम सभी का नाम लिखा था) में खाना खाकर प्लेट धोकर रखना है।  
दादी 
पापा, दादी और मम्मी चले गए। पापा के हमउम्र सभी रिश्तेदारों (अपने एवं चचेरे सभी चाचा-चाची, फुआ-फूफा) का देहान्त हो गया। अब मेरी पीढ़ी सबसे बड़ी पीढ़ी है, जिनमें कई लोग गुज़र चुके हैं। मेरे गाँव में आज भी दादी को लोग बहुत श्रद्धा से याद करते हैं। पापा को उनके सिद्धांतों के लिए और मम्मी को उनकी सहृदयता और शिक्षा के लिए याद करते हैं। सभी कहते हैं कि दादी बहुत पुण्यात्मा, दयालु और प्रेरक विचारों वाली स्त्री थीं। गाँव वालों की इच्छा से दादा, दादी, पापा और मम्मी की संगमरमर की मूर्ति गाँव के घर में लग रही है।  

दादा 
हम सभी को इसी तरह जीना और मरना है। लेकिन किसी अपने का मरना और उसका जलाया जाना, असहनीय होता है। मैंने अपनी बेटी से कह रखा है कि मेरा पूरा देह दान किया हुआ है, अतः मृत्यु के बाद हॉस्पिटल को सूचना देना। मेरा जो भी अंग काम करेगा, वे ले लेंगे। बचे हुए देह को भागलपुर में बिजली से जलाना, जहाँ मेरे पापा, दादी, मम्मी को जलाया गया। हालाँकि मुझे नहीं मालूम कि मुझे जैसी अनुभूति होती है, वह किसी को होगी या नहीं, फिर भी अपनी बात कह दिया है। सोचती हूँ कि यदि आत्मा जैसी चीज़ हुई, तो शायद उसी जगह पर जलाई जाऊँ तो पापा, दादी, मम्मी की आत्मा से मुलाक़ात होगी, बात होगी। फिर से दादी की कहानी और गीत सुनूँगी। दादी सभी का समाचार पूछेगीं। मेरी मृत्यु होने से रोएँगी; लेकिन मुझे पापा-मम्मी से मिलकर होने वाली ख़ुशी पर मेरे लिए ज़रूर ख़ुश होंगी। दादी! मेरी दादी! प्यारी दादी!
-जेन्नी शबनम (6.5.2025)
दादी की 17वीं पुण्यतिथि)
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Wednesday, July 18, 2018

60. आज भी तुमसे शिकायत है पापा

पापा 
पापा, तुमसे ढेरों शिकायत है। मैं बहुत ग़ुस्सा हूँ। तुमसे बहुत-बहुत ग़ुस्सा हूँ। मैं रूस (रूठना) गई हूँ तुमसे। अगर तुम मिले, तो बात भी नहीं करूँगी तुमसे। पापा! तुमको याद है, मैं अक्सर रूस जाती थी और तुम मुझे मनाते थे। क्या तुम भी रूस गए मुझसे? पर कैसे मनाऊँ तुमको? इतनी भी क्या जल्दी थी तुमको? कम-से-कम मुझे आत्मनिर्भर बना दिए होते जाने से पहले। देखो! मैं कुछ नहीं कर सकी, हर दिन बस उम्र को धकेल रही हूँ। क्यों उस समय में छोड़ गए, जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तुम्हारी। न समझने का मौक़ा दिए, न सँभलने का, बस चल दिए। 
 
पापा-मम्मी
समय किसी की पकड़ में नहीं आया है कभी। समय छलाँग लगाकर भागता है और हम धीरे-धीरे अपने क़दमों पर चलते रहते हैं। अचानक एक दिन पता चलता है अरे! कितना वक़्त गुज़र गया, और हम चौंक जाते हैं। आज से 40 वर्ष पहले आज ही के दिन मेरे पापा इस संसार से हमेशा के लिए चले गए। मैं ज़िन्दगी को और ज़िन्दगी मुझे स्तब्ध होकर देखती रह गई। न मेरे पास कहने को कुछ शेष था, न ज़िन्दगी के पास। कौन क्या कहे? कौन सान्त्वना दे? 
मैं, मम्मी, भइया
मेरे दादा मेरे जन्म से पूर्व गुज़र चुके थे। मेरी दादी लगभग 70 वर्ष की थीं, जब उनके प्रिय पुत्र यानी मेरे पापा का निधन हुआ। उस समय मेरी माँ लगभग 33 वर्ष, मेरा भाई 13 वर्ष और मैं 12 वर्ष की थी। हममे से कोई भी इस लायक़ नहीं था कि इस दुःखद समय में एक दूसरे को सान्त्वना दे सके। धीरे-धीरे हम चारों की ज़िन्दगी पापा के बिना चल पड़ी, या यों कहें कि हमने चलना सीख लिया। हम सभी बहुत बार लड़खड़ाए, गिरे, सँभले और चलते रहे। यह हमलोगों की ख़ुशनसीबी है कि हमारे सगे-सम्बन्धी, मम्मी-पापा के मित्र, मम्मी-पापा के सहकर्मी और पापा के छात्र सदैव हमलोगों के साथ रहे और आज भी हैं।
 
कहते हैं कि वक़्त घाव देता है और वक़्त ही मरहम लगाता है। वक़्त से मिला घाव यों तो ऊपर-ऊपर भर गया, पर मन की पीड़ा टीस बन गई, जो वक़्त-वक़्त पर रुलाती रहती है। क़दम-क़दम पर हमें पापा की ज़रूरत और कमी महसूस होती रही। मेरे पापा स्त्री को स्वावलम्बी बनाने के पक्षधर थे, तो उन्होंने अपने जीवन में ही मेरी माँ को हर तरह से सक्षम बना दिया था। उन दिनों मेरी माँ स्कूल में शिक्षिका थीं और सन 1988 में इंटर स्कूल की प्राचार्य बनी। मेरे पापा की कामना थी कि मेरा भाई बड़ा होकर विदेश में पढ़ाई करे। यह सुखद संयोग रहा कि मेरे भाई ने आई.आई.टी. कानपुर से पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप पर अमेरिका चला गया। मैंने एम.ए., एलएल.बी. और पी-एच.डी. कर अपनी शिक्षा पूर्ण की। मैंने अलग-अलग कई तरह के कार्य किए; परन्तु कोई भी कार्य सुनियोजित और नियमित रूप से नहीं कर सकी, जिससे मैं आत्मनिर्भर बन पाती। अंततः मैं हर क्षेत्र में असफल रही। मेरे पापा जीवित होते तो निःसन्देह उन्हें मेरे लिए दुःख होता।  

लगभग दो वर्ष पापा की बीमारी चली थी। इन दो वर्षों में पापा ने प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा अपना इलाज कराया और अंततः सुधार नहीं होने पर आयुर्वेद की दवा खाते रहे। एलोपैथ पद्धति पर उन्हें विश्वास न था। जब बीमारी बहुत बढ़ गई, तब दिल्ली के एम्स में एक माह तक भर्ती रहे, जहाँ डॉक्टर ने शायद ठीक न हो सकने की बात कही थी। वे भागलपुर लौट आए और उनके अधीन जितने छात्र पी-एच.डी. कर रहे थे उनका काम उन्होंने शीघ्र पूरा कराया। अपनी बीमारी की चर्चा वे किसी से नहीं करते थे। अतः उनकी बीमारी की स्थिति का सही अंदाज़ा किसी को नहीं था। लीवर सिरोसिस इतना ज़्यादा बढ़ चुका था कि अंत में वे कौमा में चले गए और लगभग 10 दिन अस्पताल में रहने के बाद सदा के लिए हमें छोड़ गए।
   
एक पुस्तक, जिसमें पापा की चर्चा है

पापा का लेटर हेड

पापा की हस्तलिखित डायरी

पापा का हस्तलिखित डायरी


पापा को घूमना, गाना सुनना और फोटो खींचकर ख़ुद साफ़ करने का शौक़ था। वे मम्मी के साथ पूरे देश का भ्रमण किए थे और मम्मी की ढेरों तस्वीरें ली थीं। मम्मी की तस्वीरों को बड़ा कर फ्रेम कराकर पूरे घर की दीवारों में उन्होंने स्वयं लगाया था। पूरे घर में गांधी जी, महान स्वतंत्रता सेनानी व मम्मी का फोटो टँगा रहता था। वे शिक्षा, राजनीति और सामजिक कार्यों से अन्तिम समय तक जुड़े रहे। 
 
पापा की थीसिस


बैग

जर्नल

पापा के पी-एच.डी. की ख़बर अख़बार में
पापा के गुज़र जाने के बाद, मैं हर जगह पापा की निशानी तलाशती रही।परन्तु एक भी तस्वीर उनकी नहीं है, जिसमें वे हमलोगों के साथ हों। यों पापा की निशानी के तौर पर मेरी माँ, मेरा भाई और मेरे अलावा उनके उपयोग में लाया गया कुछ ही सामान बचा है। मसलन एक बैग जिसे लेकर वे यूनिवर्सिटी जाते थे, उनकी एक डायरी, उनके कुछ जर्नल, एक दो कपड़े, घड़ी आदि।  
पापा का शर्ट

पापा का शर्ट

पापा का पैंट

पापा की घड़ी


पापा का बैग, जिसे रोज़ यूनिवर्सिटी ले जाते थे
पापा की डायरी

मेरी दादी की मृत्यु 102 वर्ष की आयु में सन 2008 में हुई। दादी जब तक जीवित रहीं, एक दिन ऐसा न गुज़रा जब वे पापा को यादकर रोती न हों।पापा के जाने के बाद मेरी माँ के लिए मेरी दादी बहुत बड़ा सम्बल बनी।समय ने इतना सख़्त रूप दिखाया कि अगर मेरी दादी न होतीं, तो मम्मी का क्या हाल होता, पता नहीं। भाई ने काफ़ी बड़ा ओहदा पाया, पर पिता के न होने के कारण शुरू में उसे काफ़ी दिक्क़तों का सामना करना पड़ा था।
 
दादी
हम सभी पापा को यादकर एक-एक दिन गुज़ारते रहे। बहुत सारे अच्छे दिन आए, बहुत सारे बुरे दिन बीते। हर दिन आँखें रोतीं, जब भी पापा के न होने के कारण पीड़ा मिलती। बिना बाप की बेटी होने के कारण मैं बहुत अपमानित और प्रताड़ित हुई हूँ। मेरा मनोबल हर एक दिन के साथ कम होता जा रहा है। मेरा मन अब शिकायतों की पोटली लिए पापा का इन्तिज़ार कर रहा है, मानों मैं अब भी 12 साल की लड़की हूँ और पापा आकर सब ठीक कर देंगे।     
भागलपुर विश्वविद्यालय का सोफ़ा, जिसपर बीमारी में पापा आराम करते थे

राजनीति शास्त्र विभाग का क्लासरूम

पापा की पुनर्प्रकाशित पुस्तक

पुस्तक का बैक कवर 

अक्सर सोचती हूँ, काश! कुछ ऐसा होता कि मेरी परेशानियों का हल मेरे पापा सपने में आकर कर जाते। या कहीं किसी मोड़ पर कोई ऐसा मिल जाता, जो पापा का पुनर्जन्म होता। जानती हूँ यह सब काल्पनिकता है, लेकिन मन है कि अब भी हर जगह पापा को ढूँढता है। यों मेरी आधी उम्र बीत गई है, पर अब भी अक्सर मैं छोटी बच्ची की तरह एकान्त में पापा के लिए रोती रहती हूँ। पापा! मुझे आज भी तुमसे ढेरों शिकायत है। ताउम्र शिकायत रहेगी पापा! 

-जेन्नी शबनम (18.7.2018)
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Tuesday, July 20, 2010

9. वे जो मेरे पिता थे

पापा
पापा और आचार्य विनोबा भावे

पापा के लिए मन बहुत उदास है। उनको गुज़रे हुए आज 32 साल हो गए हैं। फिर भी यादों में, बातों में, जीवन के हर क्षण में उनकी कमी और ज़रूरत महसूस होती है। जानती हूँ, मेरी उम्र और वक़्त का वह सभी पल बीत चुका है, जब उनकी निहायत ज़रूरत थी; क्योंकि अब हम सभी को उनके बिना जीने की आदत पड़ चुकी है और ज़िन्दगी का बहुत लम्बा सफ़र हम उनके बिना तय कर चुके हैं। यों तो शाश्वत नियम है जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना, लेकिन असमय मृत्यु असह्य होती है।  
 
मेरे पिता प्रोफ़ेसर डा. कृष्ण मोहन प्रसाद का लम्बी बीमारी के बाद असामयिक निधन हुआ था। आज के दिन 17.7.1978 की काली रात कहें या 18.7.1978 की भोर, 1 बजकर 45 मिनट पर पापा हम सभी से बहुत दूर चले गए। भागलपुर विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में शिक्षक मेरे पिता गांधी के सिद्धांतों और विचारों से काफ़ी गहराई से जुड़े रहे। इस विषय पर उनके व्याख्यान इतने सहज ग्राह्य होते थे कि उनके छात्र लगातार घंटों उनको सुनना चाहते थे। गांधीवाद और मार्क्सवाद पर व्याख्यान देने के लिए उन्हें कई संस्थाओं द्वारा बुलाया जाता था।  
 
मुझे याद है मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह तक अस्पताल में वे अचेत रहे। पहले जॉन्डिस (पीलिया) बाद में उन्हें लीवर सिरोसिस हो गया। एक साल तक वे बीमार रहे; लेकिन जिस दिन अचेत हुए उस दिन तक वे साइकिल से विश्वविद्यालय जाते रहे, जबकि डाक्टर ने उन्हें पूर्ण आराम (बेड रेस्ट) करने को कहा था। विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. हरिद्वार राय ने कहा कि कुछ दिनों की छुट्टी ले लें; परन्तु उन्हें ख़ुद से ज़्यादा अपने छात्रों की चिन्ता थी। उन्हें शायद यह मालूम हो गया था कि उनकी ज़िन्दगी अब ख़त्म होने वाली है, अतः उनके अधीन जो छात्र शोध-कार्य कर रहे थे उनको सारी रात बिठाकर वे पढ़ाते और उनके कार्य में संशोधन करते थे।  
 
अपने छात्रों के बीच वे बहुत लोकप्रिय थे, क्योंकि वे जो पढ़ाते या कहते थे, वैसे ही जीते थे। विचार और व्यवहार में समानता के कारण एक आदर्श शिक्षक और व्यक्ति के रूप में उन्हें प्रतिष्ठा मिलती थी। मुझे याद है जब वे अचेत होकर अस्पताल में भर्ती हुए, उनके छात्रों ने दो-दो घन्टे के अन्तराल पर अपना-अपना समय तय कर वहाँ रहना निश्चित किया था; क्योंकि अचेतावस्था में जिस हाथ में पानी (स्लाइन) चढ़ रहा था वे खींच लेते थे, तो उस हाथ को पकड़े रहना होता था। दिन और रात उनके कोई-न-कोई छात्र वहाँ होते थे। शुरू के दो दिन मेरी मम्मी, रिश्ते के एक चाचा और वे छात्र वहाँ थे। दो दिन के बाद दादी और भाई भी आ गए; भाई दादी के साथ गाँव रहता था। बाद में मेरे मामा और ननिहाल के कुछ रिश्तेदार भी आ गए। हम दोनों भाई-बहन छोटे थे, हमें समझ नहीं आया कि पापा ठीक नहीं होंगे या नहीं लौटेंगे।  
 
जिस रात पापा की मृत्यु हुई, उस रात उनके सभी छात्र मेरी मम्मी के साथ वहाँ मौजूद थे। सुबह जब अपनी मौसी और भाई के साथ मैं अस्पताल गई, तो गेट पर किसी ने मौसी को बता दिया कि पापा नहीं रहे, पर हम भाई-बहन को किसी ने नहीं बताया। पापा के मित्र प्रोफ़ेसर डॉ. जवाहर पाण्डेय, जो कभी पापा के छात्र और मम्मी के सहपाठी थे, मुझे और भैया को अपने घर ले गए, नाश्ता कराया और ख़ुद अस्पताल चले गए। बाद में हमें अस्पताल लाया गया। रात में जैसे ही पापा की मृत्यु हुई सभी छात्र एकत्रित हो गए और दाह-संस्कार का सारा इंतिज़ाम कर लिया। बड़े से ट्रक में पापा को रखा जा चुका था और उनके सभी छात्र ट्रक में खड़े थे। मुझे तब भी समझ नहीं आया कि पापा की मृत्यु हो चुकी है और उन्हें उस ट्रक में जलाने ले जाया जाएगा, जबकि मैंने उस ट्रक को देखा और तैयारी करते छात्रों को भी; परन्तु किसी ने मुझे पापा को नहीं दिखाया। अस्पताल से मौसी अपनी गाड़ी से मुझे, मम्मी और दादी को लेकर घर आ गईं। भैया को लेकर वे लोग गंगा के बरारी घाट पर गए, जहाँ दाह-संस्कार व क्रिया-कर्म किया गया। पापा के विचारों के ख़िलाफ़ उनको अग्नि से जलाया गया, जबकि विद्युत से जलाए जाने को वे सदैव उचित कहते थे; मृत्यु के बाद उनकी बात कौन सुनता या मानता।  
 
पापा अपने छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ गए थे। पापा का जन्म ग्रामीण परिवेष में हुआ, जहाँ धार्मिक मान्यताओं और प्रथा-परम्परा को बहुत महत्व दिया जाता है। बचपन से वे रूढ़िवादी परम्पराओं के विरोधी थे तथा शिक्षा को बहुत महत्व देते थे। अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे संयुक्त परिवार से थे। पापा का अपने पिता से बहुत ज़्यादा वैचारिक मतभेद रहा; क्योंकि उनकी सोच, उनकी कार्य-शैली व जीवन-शैली सभी से अलग थी। तीक्ष्ण बुद्धि और अपने प्रखर सोच के कारण वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। उन्होंने इतिहास और राजनीति शास्त्र में एम.ए., बी.एल., गांधी-विचार में पी-एच.डी. किया। उनके पी-एच.डी. की मौखिक परीक्षा (viva) में एक बाह्य परीक्षक (external) आचार्य कृपलानी भी थे। जब कृपलानी जी ने गांधी जी के प्रति उनके विचारों को सुना तो अवाक् रह गए और उन्होंने बहुत प्रशंसा की; हालाँकि उनके थीसिस के कुछ विचारों से उन्हें आपत्ति थी और दोबारा लिखने को कहा था।  
 
पापा का राजनीतिक जीवन कम उम्र से शुरू हो गया था। वर्ष 1942 के आन्दोलन में वे सक्रिय रहे। अपने एक बड़े भाई के साथ रेल की पटरी उखाड़ने में कामयाब रहे और पकड़े नहीं गए। उनकी विचारधारा उसी समय से सोशलिस्ट पार्टी की तरफ़ बढ़ गई थी। बाद में उनका रुझान वामपंथ की ओर हो गया और वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता हो गए। एक आम भारतीय परम्परावादी परिवार में जन्म लेने के बाद भी वे नास्तिक थे; उनकी ये नास्तिकता उनके अपने सोच से थी, न कि किसी को देखकर विचार बने या बदले थे। वे हर उस अंधविश्वास और ग़लत रूढ़ियों के ख़िलाफ़ थे, जिससे प्रगति में बाधा हो। जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा और किसी भी धार्मिक क्रिया-कलाप के विरोधी थे। यहाँ तक की वे अपनी शादी में खादी का धोती-कुर्ता पहने और एक रुपया भी लेने से इनकार कर दिए। वे इसी शर्त पर शादी करने को राज़ी हुए थे कि मम्मी अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी।  
 
साम्यवादी, गांधीवादी, नास्तिक और शिक्षक होने के साथ वे प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास रखते थे और शुद्ध शाकाहारी थे। अपने सभी सिद्धांत जो वे कहते थे या अपने भाषण में बोलते थे, पहले ख़ुद पर प्रयोग कर चुके होते थे। मुझे याद है कि पापा के विचारों से प्रभावित होकर कई लोगों ने सिर्फ़ एक बच्चे में परिवार नियोजन करा लिया था। गाँव में अपनी ज़मीन पर उन्होंने एक प्राथमिक विद्यालय खोला, जो बाद में सरकारी हो गया। उस विद्यालय में पापा का नाम कहीं नहीं है; क्योंकि गाँव के महाजन ने पापा के द्वारा दान की गई विद्यालय की ज़मीन की अदला-बदली कर अपने नाम करा ली और विद्यालय को वहाँ से उठाकर अपने परिसर में ले गए, जहाँ मैं भी कुछ दिन पढ़ी हूँ। पापा की मृत्यु के बाद वह विद्यालय पुनः उसी ज़मीन पर बना जिसे मेरे पापा ने दान किया था, लेकिन अब वह ज़मीन महाजन की चालाकी से महाजन के नाम है। विद्यालय में जाने का रास्ता अब भी हमारे ज़मीन से होकर ही है। पापा ने एक पुस्तकालय भी खोला, जो बाद में बंद हो गया।  
 
मैं तब बहुत छोटी थी जब गाँव में बिजली नहीं आई थी। मैं पापा के साथ सीतामढ़ी गई, जो उस समय मेरे गाँव का ज़िला हुआ करता था, वहाँ से बिजली विभाग में आवेदन देकर बहुत दौड़-धूप करके बिजली का पोल लेकर हम गाँव आए और फिर पूरे गाँव में बिजली आई।  
 
अपने गाँव और आस-पास के इलाक़ों में वे 'कन्हैया जी' के नाम से मशहूर थे। ख़ुद खादी पहनते और मम्मी को भी खादी पहनने को कहते थे। ज़रूरत से ज़्यादा कोई सामान हमारे घर में नहीं था। फोटो खींचने के वे बहुत शौक़ीन थे और ख़ुद फोटो साफ़ भी करते। किसी से भी निर्धारित समय पर वे मिलते थे, जो छुट्टी का दिन छोड़कर हर दिन शाम को चार से छह का होता था; भले ही कोई रिश्तेदार हो या बहुत बड़े ओहदे वाला व्यक्ति। सिर्फ़ उनके अपने छात्रों के लिए वक़्त की कोई पाबन्दी न थी।  
 
सम्भवतः उन्हें अपनी बीमारी के ठीक न होने का अनुमान था। मृत्यु से पूर्व वे दिल्ली के एम्स में एक माह भर्ती रहे, तब डाक्टर ने बहुत आश्चर्य किया कि शाकाहारी व्यक्ति जो चाय भी न पीता हो उसे लीवर सिरोसिस कैसे हुआ; बीमारी उस समय अन्तिम स्थिति में थी। हम सभी से अपनी बीमारी या बीमारी की गम्भीरता के बारे में वे कोई चर्चा नहीं करते थे। अपनी मृत्यु से पूर्व एक माह के भीतर उन्होंने अपना सारा काम पूरा कर लिया; चाहे अध्यापन-विषय (सिलेबस) को पूर्ण करना हो या शोधार्थी छात्रों की थीसिस की अन्तिम जाँच हो। परन्तु घर और परिवार का सारा कार्य वे अधूरा छोड़ गए। उस समय मैं 8वीं की छात्रा थी और भैया 10वीं का। एक महत्वपूर्ण काम उन्होंने हमारे लिए किया था, जो उनके बाद हमारे जीने में मददगार हुआ, वह था मेरी मम्मी का स्कूल में शिक्षिका होना तथा सामजिक कार्यों में आगे बढ़ाना। जब पापा की शादी हुई मम्मी बी.ए. में पढ़ती थीं। शादी के बाद मम्मी ने एम.ए., बी.एल., बी.एड. किया। पापा की मृत्यु के काफ़ी सालों बाद मम्मी ने एम.एड. किया।  
 
'गांधी शान्ति प्रतिष्ठान केन्द्र' की भागलपुर शाखा को पापा ने वर्ष 1967 में शुरू किया, जिसकी फाउंडर सेक्रेटरी (चीफ़ वर्कर) मेरी माँ श्रीमती प्रतिभा सिन्हा थीं। बाद में मम्मी स्कूल में शिक्षिका बनी, साथ-साथ समाज सेवा में सक्रिय रहीं। मम्मी 1974 में शिक्षिका बनी, 1988 में इन्टर स्कूल की प्राचार्य बनी और एक साल पूर्व अवकाश प्राप्त हुई हैं।  
 
अपनी मृत्यु से कुछ पहले पापा ने अपने थीसिस को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए किसी प्रकाशक को दिया था। पुस्तक प्रकाशन से सम्बन्धित सारी बातें हो गईं, प्रूफ-रीडिंग कर चुके थे; परन्तु किताब छप न सकी, उनकी मृत्यु हो गई। मेरे पापा के मित्र प्रोफ़ेसर डा. रामजी सिंह, जो सांसद भी रह चुके हैं, ने पापा की पुस्तक किसी दूसरे प्रकाशक से प्रकाशित करवाई। उन्होंने किताब का शीर्षक बदलकर 'सर्वोदया ऑफ गांधी' कर दिया। यों किताब तो छप गई, पर न आज तक रॉयल्टी मिली न किताब के और छपने की जानकारी।  
 
पापा ने हम दोनों भाई-बहन को पढ़ने के लिए गाँव भेज दिया था। दो साल बाद मैं वापस भागलपुर आ गई, भैया वहीं रह गया। पापा का मानना था कि गाँव में रहकर भी अच्छी शिक्षा ली जा सकती है। पापा की मृत्यु के बाद भाई को मम्मी वापस भगलपुर ले आईं। मेरा भाई पढ़ाई में काफी तेज़ था, तो गाँव से उसके शिक्षक आकर उसे वापस ले गए कि वह गाँव में पढ़ेगा; यह वही स्कूल है जिसमें मेरे पिता भी पढ़े थे। मेरे पापा की सोच सही साबित हुई। मेरा भाई गाँव से मैट्रिक करने के बाद पटना साइंस कॉलेज से आई.एस.सी. फिर आई.आई.टी. कानपुर से एम.एस.सी. और छात्रवृति पाकर आगे की पढ़ाई करने ओहिओ स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका चला गया।  
पुरुष के बिना जीना समाज में कितना मुश्किल होता है, उस समय यह अनुमान न था। जब पापा की मृत्यु हुई मेरी मम्मी मात्र 33 वर्ष की थीं। सामजिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक परेशानी को झेलते हुए मम्मी को मैं देखती रही। उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आता था, शायद यह उस ज़माने का फ़र्क़ था। जबकि आज के बच्चे 10-12 साल में ही बहुत समझदार हो जाते हैं।  
 
यों मेरी दादी, मम्मी के सहकर्मी और मेरे ननिहाल के सभी लोग बहुत सहयोगी रहे हैं। पापा के सभी मित्र, चाहे राजनीतिक जीवन से जुड़े हों या सामाजिक, सभी ने सदैव हमारा साथ दिया। हर वह वक़्त जब मम्मी का सामाजिक बहिष्कार होता, किसी शुभ व धार्मिक आयोजन से मम्मी को दूर कर दिया जाता, या कोई बेचारी समझ हम पर तरस खाता, तो पापा की हर बार बहुत याद आती थी। अब भी जब किसी बात से मन दुःखी होता है, पापा ही याद आते हैं। हर बार पापा से सवाल करती हूँ ''क्यों गए तुम? जाना ही था, तो कम-से-कम थोड़ा रुककर हमारे होश आने तक ठहर जाते। बहुत सी बातें हैं पापा, जो सिर्फ़ तुमसे ही कह सकती या सिर्फ़ तुम ही कर सकते, फिर... पापा, बताओ किससे कहें?'' 
 
32 साल बीत गए पर कभी-कभी लगता है जैसे अभी-अभी की तो बात है, तुम यूनिवर्सिटी से साइकिल से लौटोगे और साथ में अमरूद, गाजर और पेड़ा लाओगे और पुकारोगे- जेन्नी...!

-जेन्नी शबनम (18.7.2010)
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