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Thursday, June 5, 2025

126. युगीन आवश्यकता की परिणति : सन्नाटे के ख़त -दयानन्द जायसवाल

दयानन्द जायसवाल जी और मैं (भागलपुर)
'सन्नाटे के ख़त' डॉ. जेन्नी शबनम (सर्वप्रिय विहार, नई दिल्ली) का अयन प्रकाशन से प्रकाशित यह काव्य-संग्रह युगीन आवश्यकता की परिणति है। इनकी काव्य-सृजन-पीठिका को जितना अधिक खँगाला जाएगा उतना इनकी अनबुझी समस्याएँ पारदर्शी होती चली जाएँगी। इनके साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माण ही उन तमाम परिस्थितियों की देन लगती है, जिनमें परम्पराएँ चरमरा रही हैं। नई-नई आख्याएँ जाग रही हैं। समता, स्नेह, सम्मान की सर्जना के लिए सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों के बदलते परिवेश की नई-नई समस्याओं के नए-नए सन्दर्भ कवयित्री के सामने हैं, तो ऐसे में भावना का बाँध टूटना ही था। अतः कथ्य के साथ-साथ कथ्य के अनुकूल नए-नए व्यंजना के आयाम भी अभिव्यंजित हैं।

सारस्वत साधना में सतत-रत रहनेवाली उत्कृष्ट साहित्य सृजन कर बहुमूल्य कृतियों से साहित्य-समृद्ध करनेवाली सम्मानित रचनाकारों में प्रतिष्ठित कवयित्री डॉ. जेन्नी शबनम की अनेक रचनाएँ देश-विदेश की पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं अनेक साझा-संग्रह में कविता, हाइकु, हाइगा, ताँका, चौका, सेदोका, माहिया, लघुकथा, लेख आदि के अतिरिक्त इनकी मौलिक पुस्तकें 'लम्हों का सफर', 'प्रवासी मन', 'मरजीना', 'नवधा', 'झाँकती खिड़की' के अलावा 'सन्नाटे के ख़त' भी हैं, जिनमें आम जीवन की संवेदना, त्रासद, संकट, सुख-दुःख, बिछुड़न-मिलन आदि विचारों के झंझावात हैं।

साहित्य में जब भी हम जीवन की साधना, अनुभूतियों और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से उकेरने की बात करते हैं, तब काव्य की भूमि सबसे उपजाऊ प्रतीत होती है। ऐसा ही एक सशक्त उदाहरण डॉ. जेन्नी शबनम द्वारा रचित काव्य-संग्रह 'सन्नाटे के ख़त' जो न केवल भावनाओं का दस्तावेज़ है; बल्कि जीवन के विविध रंगों को समेटे एक संवेदनशील यात्रा भी है। 105 कविताओं से सुसज्जित यह संग्रह पाठक को आत्ममंथन, आत्मविश्लेषण और आत्मानुभूति की उस यात्रा पर ले चलता है, जहाँ हर कविता एक दर्पण की तरह सामने खड़ी हो जाती है। संग्रह की कविताएँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं है; बल्कि एक एहसास है जो पाठकों के अंतर्मन तक उतर जाता है। कविताएँ न तो जटिल हैं और न ही बनावटी; वे सीधे मन को छूनेवाली हैं। यह संग्रह उन लोगों के लिए एक उपहार है, जो कविता को केवल पढ़ना नहीं; जीना चाहते हैं। इसी संग्रह की एक कविता 'देव' है-
"देव! देव! देव!
तुम कहाँ हो, क्यों चले गए?
एक क्षण को न ठिठके तुम्हारे पाँव
अबोध शिशु पर क्या ममत्व न उमड़ा
क्या इतनी भी सुध नहीं, कैसे रहेगी ये अपूर्ण नारी
कैसे जिएगी, कैसे सहन करेगी संताप
अपनी व्यथा किससे कहेगी
शिशु जब जागेगा, उसके प्रश्नों का क्या उत्तर देगी
वह तो फिर भी बहल जाएगा
अपने निर्जीव खिलौनों में रम जाएगा। 
बताओ न देव!
क्या कमी थी मुझमें
किस धर्म का पालन न किया
स्त्री का हर धर्म निभाया
तुम्हारे वंश को भी बढ़ाया
फिर क्यों देव, यों छोड़ गए
अपनी व्यथा, अपनी पीड़ा किससे कहूँ देव?
बीती हर रात्रि की याद, क्या नाग-सी न डसेगी
जब तुम बिन ये अभागिन तड़पेगी? ..."

वर्तमान समय की व्यवहारिक सच्चाइयों से मुठभेड़ करती कविताओं में शहरी जीवन की कृत्रिमता और गाँवों की आत्मीयता के बीच की खाई बड़े ही मार्मिक अंदाज में 'लौट चलते हैं अपने गाँव' नामक कविता में उकेरा गया है। यह कविता बताती है कि शहरी आधुनिकता की चकाचौंध में भी सूनापन है; लेकिन अपनापन तो गाँव की मिट्टी में ही साँस लेता है-
"मन उचट गया है शहर के सूनेपन से
अब डर लगने लगा है
भीड़ की बस्ती में अपने ठहरेपन से। 
चलो लौट चलते हैं अपने गाँव
अपने घर चलते हैं
जहाँ अजोर होने से पहले
पहरू के जगाते ही हर घर उठ जाता है
चटाई बीनती हुक्का गुड़गुड़ाती
बुढ़िया दादी धूप सेंकती है
गाती बाँधे नन्हकी स्लेट पर पेन्सिल घिसती है। ..."

एक रचनाकार जन-जीवन से संघर्ष करते-करते जब थक जाता है, हार जाता है, तब इस हार के अंतर शब्द ही उसके साँस बन जाते हैं और तब जैसे जीवनानुभूति के नए पर निकल आते हैं और उसके बाद ही जैसे छलाँग लगाते हैं- जीवन से सृष्टि, सृष्टि से ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड में स्व के अस्तित्व की अनुभूति करता है। ऐसी अवस्था में कवयित्री शबनम सबसे ज्यादा भावुक होती हैं और उस भाव चेतना के लिए स्थापित सिद्धांतों का उतना महत्त्व नहीं देतीं, जितना मानवीय निश्छलता का। जीवन संघर्ष उसकी भावुकता को जितना सघन और पैना बनाते हैं उतनी ही प्रबलता से हृदय द्रवित होता है और व्यंजना के संकेत स्वयं अपने अनुरूप शब्द शिल्प लेकर 'अपनों का अजनबी बनना' ऐसी कविता को जन्म देते हैं-
"समीप की दो समानान्तर राहें
कहीं-न-कहीं किसी मोड़ पर मिल जाती हैं
दो अजनबी साथ हों
तो कभी-न-कभी अपने बन जाते हैं। 
जब दो राह
दो अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े फिर?
दो अपने साथ रहकर अजनबी बन जाएँ फिर?
सम्भावनाओं को नष्ट कर नहीं मिलती कोई राह
कठिन नहीं होता, अजनबी का अपना बनना
कठिन होता है, अपनों का अजनबी बनना।  
एक घर में दो अजनबी
नहीं होती महज़ एक पल की घटना
पलभर में अजनबी अपना बन जाता है
लेकिन अपनों का अजनबी बनना, धीमे-धीमे होता है। 
व्यथा की छोटी-छोटी कहानी होती है
पल-पल में दूरी बढ़ती है
बेगानापन पनपता है
फ़िक्र मिट जाती है
कोई चाहत नहीं ठहरती है। 
असम्भव हो जाता है
ऐसे अजनबी को अपना मानना।"

कवयित्री डॉ. जेन्नी शबनम का यह संग्रह 'सन्नाटे के ख़त' शिवत्व की चाहत में अपने ही भीतर एक द्वंद्वात्मक सम्बन्ध जी रहे हैं। शरीर एक बोझ तब लगने लगता है जब आत्मा अपनी अस्मिता के लिए घुटन महसूस करने लगे। यह तथ्य मैं जीवन की पथरीली पगडण्डी पर नंगे पाँव चलने वाले कवयित्री की काल्पनिक राही के सन्दर्भ में कह रहा हूँ, जिसको बार-बार अपनी पहचान के लिए अग्नि परीक्षा से गुज़रना पड़ता है। यदि उसे अपनी आत्मशक्ति और अपने संयम के प्रति अगाध आस्था न होती, तो विजय-यात्रा के अपने पड़ावों पर शब्द आतिथ्य उसके लिए बोझ के अतिरिक्त कुछ न होता। एक तरफ़ 'सन्नाटे के ख़त' में पाए जाने वाले भावनात्मक आक्रोश की प्रबलता का भार है, तो दूसरी तरफ यथार्थग्राही काव्य की चिन्ता, उसके बाद कविता के विशिष्ट हो पाने की दमतोड़ मेहनत। इन शक्तियों की क़दमताल में कवयित्री संयमित-अर्जित निखार से कभी खुलकर हँस नहीं पायी। वह सामाजिक चुनौतियाँ तथा जीवन के कटु क्षणों के ख़त के सन्नाटे का सामना करने में सशक्त- अशक्त होती रही है। कभी अभिजात की ज़ेब से उछलकर फ़कीर की झोली में गिरती है, तो कभी प्रकृति सम्पदा से आसक्त मानवीयकृत होती है और कभी नगर-बोध तो कभी ग्राम-बोध आदि से झूलती हुई नजर आती है। कहने का अभिप्राय है कि ख़त हमेशा अपनी आत्मा की आवाज़ सुनने को भाषाशैली की बाजारों में दूर-दूर भटकता रहा। सन्नाटे के नाम चुप्पी से भरा ख़त पाकर कवयित्री का दार्शनिक मन बार-बार उनके फंदे से फिसलकर लहूलुहान होता हुआ अपनी सर्जनात्मक ज़मीन को और उर्वर-उपजाऊ बनाने का संकल्प दोहराता रहा इस 'अनुबन्ध' कविता के रूप में-
"एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच
कभी साथ-साथ घटित न होना
एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच
कभी साथ-साथ फलित न होना
एक अनुबन्ध है स्वप्न और यथार्थ के बीच
कभी सम्पूर्ण सत्य न होना
एक अनुबन्ध है धरा और गगन के बीच
कभी किसी बिन्दु पर साथ न होना
एक अनुबन्ध है आकांक्षा और जीवन के बीच
कभी सम्पूर्ण प्राप्य न होना
एक अनुबन्ध है मेरे मैं और मेरे बीच
कभी एकात्म न होना।"

कवयित्री डॉ. जेन्नी शबनम का अनुभूति-पक्ष जितना सबल है, उसका शिल्प-पक्ष उतना ही सुंदर है। शब्द-योजना, बिम्ब-योजना आदि शिल्प-सौंदर्य कविता को मूल्यवान बनाते हैं। सफलता हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ हैं।
कवयित्री का संपर्क सूत्र- 9810743437

-दयानन्द जायसवाल 
संस्थापक सह प्रधान सम्पादक, सुसंभाव्य पत्रिका 
भागलपुर 
तिथि- 20.5.2025
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Sunday, May 25, 2025

125. सन्नाटे के ख़तों की आवाज़ -भीकम सिंह

मेरी छठी पुस्तक 'सन्नाटे के ख़त' की समीक्षा प्रो. डॉ. भीकम सिंह जी ने की है। प्रस्तुत है उनकी लिखी समीक्षा: 


सन्नाटे के ख़तों की आवाज़

लम्हों का सफ़रनवधाझाँकती खिड़की के साथ प्रवासी मन (हाइकु-संग्रह) और मरजीना (क्षणिका-संग्रह) को जोड़कर डॉ. जेन्नी शबनम का यह छठा काव्य-संग्रह (सन्नाटे के ख़त) आया है। व्हाट्सएप के समय में हम सन्नाटे के ख़तों से गुज़रते हुए अचरज से भर जाते हैं; क्योंकि इन ख़तों (कविताओं) में समय और समाज का यथार्थ और फैंटेसी अनेक भंगिमाओं में व्यक्त हुई है, कहीं सपाट कथन के साथ, तो कहीं रूपक के साथ। यही कारण है कि जेन्नी शबनम की कविताएँ सीधे पाठक मन को कोमलता से छूती है। 

प्रस्तुत पुस्तक की पहली कविता- ‘अनुबन्ध’ यह कविता जीवन में अनेक तरह के अनुबन्धों का काव्यात्मक दस्तावेज़ हैजिनमें जीवन अनुबन्ध की खिड़की के पीछे साथ-साथ गतिमान दिखाई देता है-

एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच

कभी साथ-साथ घटित न होना

एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच। (पृष्ठ संख्या 15)

जेन्नी शबनम की कविताओं को पढ़ने पर वे ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। उनका समय से आशय बेहद स्पष्ट और मुखर है-

बेवक़्त खिंचा आता था मन

बेसबब खिल उठता था पल

हर वक़्त हवाओं में तैरते थे

एहसास जो मन में मचलते थे। 

अब इन्तिजार है (पृष्ठ संख्या 29)

जो यह होने को एक निजी इन्तिज़ार भी हो सकता है। जिसका अब इन्तिज़ार है और अब नहीं है। बस इसके लिए मन में आए बदलाव महत्त्वपूर्ण हैं। जेन्नी शबनम अपनी भावनाओं को अनेक चित्रों और वर्णनों से व्याख्यायित करती हैं। उनकी कविताओं से गुज़रते हुए हम सहज ही लक्षित कर सकते हैं कि यहाँ भावनाएँ घायल हैं; इसलिए ख़ुद पर कविता लिखना मुश्किल है। समय का यथार्थ जेन्नी शबनम की कविताओं में विस्तार के साथ आता रहता है। इसके साथ ही क्षेत्रीय हवा, जो राजनैतिकसामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ बनाती हैं उस तरफ़ भी जेन्नी शबनम का बराबर ध्यान गया है-

जाने कैसी हवा चल रही है

न ठण्डक देती हैन साँसें देती है

बदन को छूती है

तो जैसे सीने में बरछी-सी चुभती है

अब हवा बदल गई है। (पृष्ठ संख्या 52)

अपने गाँव से जुड़नाअपनी जड़ों से जुड़नाअपनी परम्परा से जुड़ना है। शायद इसलिए जेन्नी शबनम का मन उचट जाता है-

मन उचट गया है शहर के सूनेपन से

अब डर लगने लगा है

भीड़ की बस्ती में अपने ठहरेपन से। 

चलो लौट चलते हैं अपने गाँव (पृष्ठ संख्या 58)

अपना गाँव एक केन्द्रीय कथ्य के बतौर इस कविता में है। उसी गाँव में खड़ा किसान और उससे रिश्ता बरकरार रखती एक मज़दूर के लिए एक अदद रोटी-

सुबह से रातरोज सबको परोसता

गोल-गोलप्यारी-प्यारीनरम-मुलायम रोटी

मिल जातीकाश!

उसे भी कभी खाने को गरम-गरम रोटी। (पृष्ठ संख्या 66)

भूमिका’ कविता कोई निजी दुःख कातरता नहीं है। होने को तो यह एक निजी भूमिका हैजैसे कि हर किसी की होती है; लेकिन इस भूमिका के कारण और इसका स्वरूप नितान्त पारिवारिक है। एक संवेदनशील महिला के लिए यह भूमिका असह्य हो जाती है-

अब दो पात्र मुझमें बस गए

एक तन में जीताएक मन में बसता

दो रूप मुझमें उतर गए। (पृष्ठ संख्या 70)

और कोई नया रास्ता खुलने की प्रक्रिया में स्थितियाँ प्रतिरोध के बजाय किसी वक़्त के चमत्कार की समर्थक होती चली जाती हैं-

इन सभी को देखता वक़्तठठाकर हँसता है

बदलता नहीं कानून

किसी के सपनों की ताबीर के लिए

कोई संशोधन नहीं

बस सज़ा मिलती है

इनाम का कोई प्रावधान नहीं

कुछ नहीं कर सकते तुम

या तो जंग करो या पलायन

सभी मेरे अधीनबस एक मैं सर्वोच्च हूँ। (पृष्ठ संख्या 73)

और फिर जेन्नी शबनम की कविताएँ एक बदलाव की उम्मीद में रुमानी ज़िन्दगी का वर्णन करती हैं। ‘जी उठे इन्सानियत’ कविता में ऐसे प्रभावी चित्र मिलते हैं और फैंटेसी सीधे-सच्चे रस्तों से भटकाकर अपने जाल में फँसा लेती है। फैंटेसी की कोई नीति नहींकोई दायरा नहीं, यह भावनाओं का आखेट हैजो इसकी जद में आ जाए सभी को सूँघ लेती है-

एक कैनवास कोरा-सा

जिस पर भरे मैंने अरमानों के रंग

पिरो दिए अपनी कामनाओं के बूटे

रोप दिए अपनी ख़्वाहिशों के रंग। (पृष्ठ संख्या 86)

और धीरे-धीरे कविता का रूप लेती है। एक तरह से देखा जाए, तो जेन्नी शबनम की तरह हरेक रचनाकार इसकी चपेट में आ जाते हैंफिर दो ही रास्ते बचते हैं- या तो फैंटेसी के पहले रास्ते पर हम हार जाएँ या हम इसमें फँस जाएँ और फँसते जाएँ-

मन चाहता

भूले-भटके

मेरे लिए तोहफ़ा लिए 

काश! आज मेरे घर एक सांता आ जाता। (पृष्ठ संख्या 89)

जेन्नी शबनम इसकी चकाचौंध से उबरने का रास्ता नहीं खोजती; बल्कि इसकी हिमायती हो जाती है और मगज़ के उस हिस्से को काट देना चाहती है, जहाँ विचार जन्म लेते हैं। ढूँढ लेती है अलमारी का निचला खाना, जहाँ बचपन बैठा है रूठा हुआ।

इस फैंटेसी के साथ जेन्नी शबनम की कविताओं में एक चीज और नत्थी है, वह है सरलता! फैंटेसी को समझने और यथार्थ को समझनेउसे अभिव्यंजित करने की पूरी प्रक्रिया के केन्द्र में है। सरलता यहाँ कविताओं को समझने-समझाने में हैजो जेन्नी शबनम की कविताओं का प्लस पॉइंट है और पाठकों के लिए ज़रूरी है। जेन्नी शबनम इस सरलता को गम्भीरता में भी नहीं छोड़ती; बल्कि उसी के सहारे अपनी कविता की नदी को बढ़ाती है-

नीयत और नियति समझ से परे है

एक झटके में सब बदल देती है

जिन्दगी अवाक्। (पृष्ठ संख्या 98)

जेन्नी शबनम अपनी एक कविता ‘चाँद की पूरनमासी’ में बात की बात में इस सरलता को ऐसे पकड़ती है कि आश्चर्य होता है कि इस तरह इतनी आसानी से इतनी गूढ़ बात को किस तरह कहा जा सकता है-

‘क़िस्से-कहानियों से तुम्हें निकालकर

अपने वजूद में शामिलकर

जाने कितना इतराया करती थी

कितने सपनों को गुनती रहती थी

अब यह सब बीते जीवन का क़िस्सा लगता है। 

हर पूरनमासी की रात। (पृष्ठ संख्या 109)

जेन्नी शबनम की रचना प्रक्रिया का यह बेहद सीधा-सच्चा रास्ता हैयहाँ सयानापन कतई नहीं हैअति सूधौ सनेह को मारग है' घनानन्द के मार्ग की तरह। सच्ची और अच्छी कविता इसी प्रक्रिया में लिखी जा सकती है। फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए पुरज़ोर कोशिश करतीअनुभूतियों के सफ़र में कड़वे-कसैले शब्दों की मार झेलती जेन्नी शबनम की कविता बेहिसाब जिजीविषा, ज़िन्दादिली की सूचक है। ''अपनी पीर छुपाकर जीनामीठा कहकर आँसू पीना'' पूर्ण समर्पण है। मन के किसी कोने में अब भी गूँजती हैं कुछ धुनेंजिन्हें जेन्नी शबनम ने सपनों में बचाए रखा है। शायद अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की ‘सबसे ख़तरनाक’ कविता आपने पढ़ी होगी; इसलिए अपनी कविताओं में जेन्नी शबनम सपनों को ज़िन्दा रखती है और उम्मीद करती है-

शायद मिल जाए वापस

जो जाने-अनजाने बन्द मुट्ठी से फिसल गया। (पृष्ठ संख्या 138)

काव्य में द्वंद्वात्मकता को पकड़ना जेन्नी शबनम का कौशल है-

प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ तक

बदन के घेरों में

या मन के फेरों में?

सुध-बुध बिसरा देना प्रेम है

या स्वयं का बोध होना प्रेम है। (पृष्ठ संख्या 139)

अलगनी’ उस वातावरण के बारे में हैजो हमारे बहुत पास पसरा हुआ है; लेकिन हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं। 

सन्नाटे के ख़त (काव्य-संग्रह) में कुल 105 कविताएँ हैंभाषा शैली की चित्रात्मकता तो इस काव्य संग्रह में सराहनीय है हीइसका सबसे सबल पक्ष यह भी है कि इसे बार-बार पढ़ने को मन करता है और भूमिका में जैसे रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने कहा है कि पाठक इन ख़तों को पढ़कर अर्न्तमन में महसूस करेंगे। थोड़े में कहें, तो इन ख़तों की आवाज़ साहित्यिक जगत् में सुनी जाएगी। पुस्तक का मुद्रण सुन्दर और आवरण आकर्षक है।

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सन्नाटे के ख़तडा. जेन्नी शबनमप्रथम संस्करण- 2024, मूल्य- 425 रुपयेपृष्ठ- 150

प्रकाशकः अयन प्रकाशकजे-19/139, राजापुरीउत्तम नगरनई दिल्ली- 110059


-भीकम सिंह 

दादरी, गौतमबुद्ध नगर 

तिथि- 16.5.2025 

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- जेन्नी शबनम (25.5.2025)

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Monday, February 3, 2025

121. 'सन्नाटे के ख़त' (काव्य-संग्रह) की काव्यात्मक समीक्षा -आर. सी. वर्मा 'साहिल'

जनवरी 72025 को मेरे छठे काव्य-संग्रह के विमोचन के अवसर पर आर. सी. वर्मा 'साहिल' जी उपस्थित हुए। साहिल जी हिन्दी और उर्दू के सम्मानीय कवि हैं। इन्होंने राम चरित मानस का मन्ज़ूम-तर्जुमा यानी काव्यात्मक अनुवाद कर ऐतिहासिक कार्य किया है। मैंने साहिल जी से आग्रह किया कि मेरी इस पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रया दें एवं काव्यात्मक समीक्षा करें। मात्रा तीन दिन में उन्होंने यह लिखकर मुझे भेज दिया। इतनी सुन्दर समीक्षा के लिए साहिल जी का हार्दिक धन्यवाद।

प्रस्तुत है उनकी काव्यात्मक समीक्षा:     

'सन्नाटे के ख़त' (काव्य-संग्रह) की काव्यात्मक समीक्षा 

हैं हाथों में मेरे 'सन्नाटे के ख़त', काव्य की पुस्तक
जहाँ सन्नाटे भी देते दिलों पर भारी इक दस्तक
यह डॉ.  जेन्नी शबनम के लिए है प्यारी कविताएँ 
मुझे लगतीं मगर सारी की सारी बहती सरिताएँ 
या लगता सारे पृष्ठों पर टँके हों क़ीमती गौहर
या इसमें उतरा है कश्मीर का गुलमर्गो-गुलमोहर
मैं करता जा रहा जैसे ही कविताओं का अवलोकन
प्रफुल्लित और हैराँ भी हुआ जाता है मेरा मन
अलंकारित अनूठी भाषा हर कविता में है दिखती
विद्वत्ता और प्रतिभा जेन्नी जी की है हमें मिलती
कहीं है ओज कविता में, कहीं है यास कविता में
कहीं संकट की बातें हैं, कहीं है आस कविता में
कहीं हैं फ़लसफ़े गहरे औ गहरी सोच कविता में
कहीं सख़्ती नज़र आती, कहीं है लोच कविता में
कि अभिव्यक्ति बहुत ही स्पष्ट व सुन्दर नज़र आती
किसी कविता में तो नज़रें ठहर जातीं, ठहर जातीं
यहाँ 'अनुबंध' में अनुबंध कितने ही नज़र आते
है 'भीड़' में भीड़ इतनी ख़ुद को भी हम न नज़र आते
'नाइन्साफी' ख़ुदा की भी नज़र आती है कविता में
'नहीं लिख पाई ख़ुद पे कविता' भी आती है कविता में
बुलाना 'देव' को जो चल दिए घर से विमुख होकर
बताना कष्ट भी उनको, गये जो घर के सुख खोकर
यह है माहौल कैसा 'अब हवा ख़ून-ख़ून कहती है'
न ठण्डक देती है, बस आग के दरिया-सी बहती है
या रब 'इक चूक मेरी' कर गई क्या-क्या सितम मुझ पर
था उनके हाथ में जो भी, गिरा वो बनके ग़म मुझ पर
सनम अब क्यों न हम भी 'लौट के चलते हैं गाँव अपने'
कि झूठे और टूटे हैं शहर के जो भी थे सपने
न 'जाने कैसे' छोटी जात के संग खा निवाला इक
कोई हो जाता छोटा पीके पानी का पियाला इक
मैं अपनी 'भूमिका' ही तो निभाती आ रही अब तक
किए संवाद जो कण्ठस्थ वो दोहरा रही अब तक
यह सच है 'कवच' अपना-अपना हम ख़ुद ही बनाते हैं
और उसमें आदतन फिर क़ैद ख़ुद हम हो ही जाते हैं
यों लगता है कि जैसे आए हैं हम दूर से चल कर
बिताने वक़्त ख़ुद के साथ आए 'वापस अपने घर'
कि मन ये चाहता है भूले-भटके लेके इक तोहफ़ा
मेरे घर भी तो कोई काश! आज 'इक सांता आ जाता'
इसी तरह सभी कविताओं के रंग हैं बहुत गहरे
फ़लसफ़े बहुत गहरे सोच गहरी ढंग बहुत गहरे
बहुत मजबूर करती कविताएँ कुछ सोचने को भी
समझने, सीखने को भी ये और कुछ बोलने को भी
दुआ है जेन्नी जी आइन्दा भी लिखती रहें ऐसे
बढ़ें आगे ही इस पथ पर, क़लम चलती रहे ऐसे

-आर. सी. वर्मा 'साहिल'
तिथि: 10.1.2025
फ़ोन: 9968414848
-0- 

-जेन्नी शबनम (3.2.2025)
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Thursday, January 16, 2025

119. ख़त, जो मन के उस दराज़ में रखे थे -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

आदरणीय रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा लिखी भूमिका:
काव्य में कल्पना के पुष्प खिलते हैंभावों की कलिकाएँ मुस्कुराती हैं, सुरभित हवाएँ आँचल लहराते हुए अम्बर की सीमाएँ नाप लेती हैं। जीवन इन्द्रधनुषी रंगों से रँग जाता है। चिट्ठियों की मधुर सरगोशियाँ नींद छीन लेती हैं। क्या वास्तविक जीवन ऐसा ही हैकदापि नहीं। भावों की कलिकाओं को जैसे ही गर्म लू के थपेड़े पड़ते हैंतो यथार्थ जीवन के दर्शन होते हैं। जीवन की पगडण्डी बहुत पथरीली हैजिस पर नंगे पाँव चलना हैतपती दोपहर में। आसपास कोई छतनार गाछ नहीं हैजिसके नीचे बैठकर पसीना सुखा लिया जाए। चारों तरफ़ सन्नाटा है। कोई बतियाने वालाराह बताने वाला नहीं है। उस समय पता चलता है कि जो हम कहना चाहते थेवह कभी उचित समय पर कहा नहीं। जो सहना चाहते थेवह सहा नहीं। जिसे अपना बनाकर रखना चाहते थेवह कभी अपना था ही नहीं। जब इस जगत्-सत्य का पता चलता हैतब पता चला कि मुट्ठी से रेत की मानिन्द समय निकल गया। चारों तरफ़ बचा केवल सन्नाटा। जीवन के कटु क्षणों के वे ख़तजो कभी लिखे ही नहीं गए। जो लिखे भी गएकभी भेजे ही नहीं गए। ज़ुहूर नज़र के शब्दों में-

              वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देखकर

              मैंने उसको आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं।


डॉ. जेन्नी शबनम के कुछ इसी प्रकार के 105 ‘सन्नाटे के ख़त’ हैंजो समय-समय पर चुप्पी के द्वारा लिखे गए हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम जिससे प्रेम करते हैंउसे सही समय पर अभिव्यक्त नहीं करते। जिसे घृणा करते हैंसामाजिक दबाव में उसको कभी होंठों पर नहीं लाते। परिणाम होता हैजीवन को भार की तरह ढोते हुए चलते जाना।


ये ख़त मन के उस दराज़ में रखे थेजिसे कभी खोलने का अवसर ही नहीं मिला। अब जी कड़ा करके पढ़ने का प्रयास कियाक्योंकि ये वे ख़त हैंजो कभी भेजे ही नहीं गए। किसको भेजने थेस्वयं को ही भेजने थे। अब तक जो अव्यक्त थाउसे ही तो कहना था। पूरा जीवन तो जन्म-मृत्युप्रेम घृणास्वप्न और यथार्थ के बीच अनुबन्ध करने और निभाने में ही चला गया-

              एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच

              कभी साथ-साथ घटित न होना

              एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच

              कभी साथ-साथ फलित न होना

              एक अनुबन्ध है स्वप्न और यथार्थ के बीच

              कभी सम्पूर्ण सत्य न होना


जीवनभर कण्टकाकीर्ण मार्ग पर ही चलना पड़ता है; क्योंकि जिसे हमने अपना समझ लिया हैउसका अनुगमन करना था। मन की दुविधा व्यक्ति को अनिर्णय की स्थिति में लाकर खड़ा कर देती हैजिसके कारण सही मार्ग का चयन नहीं हो पाताजबकि-

              उस रास्ते पर दोबारा क्यों जाना

              जहाँ पाँव में छाले पड़ेंसीने में शूल चुभें

              बोझिल साँसें जाने कब रुकें।


निराश होकर हम आगे बढ़ने का मार्ग ही खो बैठते हैं। आधे-अधूरे सपने ही तो सब कुछ नहीं। सपनों से परे भी तो कुछ है। कवयित्री ने जीवन में एक अबुझ प्यास को जिया है। मन की यह प्यास किसी सागरनदी या झील से नहीं बुझ सकती।


घर बनाने में और उसको सँभालने में ही हमारा सारा पुरुषार्थ चुक जाता है। इसी भ्रम में जीवन के सारे मधुर पल बीत जाते हैं-

              शून्य को ईंट-गारे से घेरघर बनाना

              एक भ्रम ही तो है

              बेजान दीवारों से घर नहींमहज़ आशियाना बनता है

              घरों को मकान बनते अक्सर देखा है

              मकान का घर बनना, ख़्वाबों-सा लगता है।


इन 105 ख़तों में मन का सारा अन्तर्द्वन्द्वअपने विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। आशा है पाठक इन ख़तों को पढ़कर अन्तर्मन में महसूस करेंगे।


दीपावली: 31.10.2024                                                     -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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- जेन्नी शबनम (16.1.2025)

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Friday, January 10, 2025

118. 'सन्नाटे के ख़त' का लोकार्पण











जनवरी माह की सात तारीख़ मेरे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और यादगार है। वर्ष 2000 में आज के दिन मेरी बेटी का जन्म हुआ। मेरी पहली पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में जनवरी 7, 2020 को हुआ। मेरी दूसरी पुस्तक 'प्रवासी मन' जनवरी 7, 2021 को मुझे प्राप्त हुई, जिसका अनौपचारिक विमोचन मेरी बेटी और मैंने किया। जनवरी 10, 2021 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 'हिन्दी हाइकु' एवं 'शब्द सृष्टि' के संयुक्त तत्वाधान में गूगल मीट और फेसबुक पर आयोजित पहला ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मलेन हुआ, जिसमें मेरी पुस्तक 'प्रवासी मन' का औपचारिक लोकार्पण हुआ।

  
आज मेरे दिल्ली आवास पर मेरी बेटी के वर्षगाँठ के अवसर पर मेरी छठी पुस्तक 'सन्नाटे के ख़त' का अत्यन्त अनौपचारिक माहौल में औपचारिक लोकार्पण हुआ। लोकार्पण के अवसर पर श्री बी. के. वर्मा 'शैदी', डॉ. पुष्पा सत्यशील, श्री आर. सी. वर्मा 'साहिल', श्रीमती नरेश बाला वर्मा, श्री अनिल पाराशर 'मासूम', श्रीमती शानू पाराशर, श्रीमती अनुपमा त्रिपाठी, डॉ. राजीव रंजन गिरि, श्री आवेश तिवारी, सुश्री संगीता मल्लिक, सुश्री शिल्पा पाटिल, श्री विभोर चौधरी, श्रीमती सोमवती शर्मा, श्रीमती दिशा शर्मा, श्री राजेश पाण्डेय, श्री राजेश कुमार श्रीवास्तव, श्री अभिज्ञान सिद्धांत, सुश्री परान्तिका दीक्षा सम्मिलित हुए।
सबसे पहले बेटी ने केक काटकर आयोजन का शुभारम्भ किया। शैदी जी व साहिल जी ने बेटी के जन्मदिन पर अपनी लिखी विशेष रचना द्वारा बेटी को आशीर्वाद दिया। मेरी रचना, जिसे मैंने बेटी के जन्मदिन पर लिखी, अनिल जी ने पढ़कर सुनाया। शैदी जी, साहिल जी एवं मासूम जी ने अपनी-अपनी रचनाएँ पढ़ीं। अनुपमा त्रिपाठी जी एवं राजेश श्रीवास्तव जी ने गीत गाए। आवेश जी ने अपनी रचना सुनाई। विभोर चौधरी जी ने हास्य व व्यंग्य द्वारा मनोरंजन किया। राजेश पाण्डेय जी ने हमारी छवियाँ अपने कैमरे में उतारीं ताकि यह दिन कभी विस्मृत न हो।  










आदरणीय शैदी जी द्वारा अंग्रेज़ी में माहिया और शुभकामना सन्देश-

कुछ तो है बात, बनाती हैं जो विशेष इसे
साल-भर जिसका कि इस दिल को इंतज़ार रहे।
आज के दिन ही तो उठती हैं उमंगें दिल में,
जनवरी सात का दिन क्यों न यादगार रहे??


माहिया-

Today is January seven
It's really Special Day 
for some special one.

We are enjoying completely
You have invited all of us 
we are grateful Jenny Ji.

Year two thousand twenty five
Will surely be better 
we shall better survive.
-0-

आदरणीय साहिल जी द्वारा काव्य-गीत द्वारा शुभकामनाएँ-

प्रिय बेटी 'ख़ुशी' के जन्मदिन के पावन अवसर पर आशीर्वाद और शुभकामनाओं के कुछ उद्गार: 07/01/2025 

-साहिल 

बधाई जन्मदिन की कर लो तुम स्वीकार ऐ बेटी
हमेशा दूँ तुम्हें आशीष और अपना प्यार ऐ बेटी
यह दिन लाता रहे हर वर्ष इक रंगत नई तुम पर
बने जीवन तुम्हारा फूलों से गुलज़ार ऐ बेटी। 

ग़मों से, आफ़तों से खेलने का नाम है जीवन
इन्हीं से ज़िन्दगी है और इन्हीं का नाम है जीवन
ख़ुशी दो दिन की है, इसको हमेशा न समझ अपना
जो जीवन में मुसीबत है, उसी का नाम है जीवन। 

ग़मों से गर उबर जाओ, इन्हीं के बाद खुशियाँ हैं
मुसीबतें झेल लो पहले, इन्हीं के बाद खुशियाँ हैं
डरो न इनसे बेटी, ये बनाएँगी तुम्हें पुख़्ता
यक़ीं मानो इन्हीं के बाद तो खुशियाँ ही खुशियाँ हैं। 

यह दिन आता रहे जीवन में तेरे हर ख़ुशी लेकर
महक लेकर चमक लेकर हँसी और ताज़गी लेकर
रहे तू स्वस्थ हरपल, चाँदनी उतरे तेरे आँगन 
तेरे जीवन में आए हर नया दिन ज़िन्दगी लेकर। 

मनाओ जन्मदिन अपना ख़ुशी से झूमकर गाओ
ये ग़म तो आने-जाने हैं ग़मों को भूलकर गाओ
जो अपने पास है अपना है, जो खोया गया समझो
न इन बातों में उलझो, आज के दिन झूमकर गाओ। 

मनाती तू रहे हर साल अपना जन्मदिन यूँ ही
मनाएँ हम भी तेरे साथ तेरा जन्मदिन यूँ ही
रहे बढ़ता सभी का प्यार जीवन में तेरे हरपल
रहे लाता नई आशा तेरा हर आज और हर कल। 
-0-

पुस्तक लोकार्पण के बाद गीत-ग़ज़ल के साथ दिन का भोजन हुआ। सभी उपस्थित विद्वजनों का स्नेह और आशीर्वाद मेरी पुस्तक और मेरी बेटी को मिला, यह मेरा सौभाग्य है। सभी का हार्दिक धन्यवाद व आभार! 

-जेन्नी शबनम (7.1.2025)
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