Showing posts with label स्वास्थ्य. Show all posts
Showing posts with label स्वास्थ्य. Show all posts

Monday, April 6, 2020

72. क़ातिल कोरोना का क़हर

भारत तथा विश्व की वर्तमान परिस्थिति पर ध्यान दें, तो ऐसा लग रहा है मानो प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है कि बहुत हुआ, अब तो चेत जाओ, वापस लौट जाओ अपनी-अपनी जड़ों की तरफ़, जिससे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक सुन्दर दुनिया निर्मित हो सके। सिर्फ़ भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व आधुनिकता की दौड़ में इस तरह उलझ चुका है कि थोड़ी देर रुककर चिन्तन, मनन, आत्मविश्लेषण करने को तैयार नहीं। अगर ज़रा देर रुके, तो शेष दुनिया न जाने कितनी आगे निकल जाएगी, कितना कुछ छूट जाएगा, कितना नुक़सान हो जाएगा। पैसा, पद, प्रतिष्ठा, पहचान, पहुँच आदि सफलता के नए मानदण्ड और मापदण्ड बन गए हैं। सफल होना तभी सम्भव है, जब प्रतिस्पर्धा की दौड़ में ख़ुद को सबसे आगे रखा जाए।प्रतिस्पर्धा में जीतना ही आज के समय में दुनिया जीतने का मंत्र है।  

जीव-जन्तु तो सदैव अपनी प्रकृति के साथ जीवन जीते हैं, भले आज के समय में उन्हें हम मनुष्यों ने प्रकृति से दूर कर दिया है। परन्तु मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध, प्रकृति को हथियार बनाकर विजयी होना चाहता है। इस कारण एक तरफ़ प्रकृति का दोहन हो रहा है, तो दूसरी तरफ़ हम प्रकृति से दूर होते चले जा रहे हैं। हम भूल गए हैं कि मनुष्य हो या कोई भी जीव-जन्तु, सभी प्रकृति के अंग हैं और प्रकृति पर निर्भर। प्राकृतिक संसाधन हमें प्रचुर मात्रा में मिला है; लेकिन हमारी प्रवृत्ति ने हमें आज विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। हमारी जीवन शैली ऐसी हो चुकी है कि हम सिर्फ़ एक दिन भी प्रकृति के साथ नहीं गुज़ार सकते। अप्राकृतिक जीवनचर्या के कारण हमारी शारीरिक क्षमताएँ धीरे-धीरे कम हो रही हैं। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित हो गई है, जिससे रोग प्रतिरोधक शक्ति कम हो गई है।  

सभी जानते हैं कि हानिकारक जीवाणु (बैक्टीरिया) हो या कोई भी विषाणु (वायरस) इसका प्रसार संक्रमण के माध्यम से होता है। कोरोना वायरस के संक्रमण से आज पूरी दुनिया संकट में है और असहाय महसूस कर रही है। अज्ञानता, मूढ़ता, भय, लापरवाही, अतार्किकता, असंवेदनशीलता आदि के कारण जिस तरह कोरोना का संक्रमण बढ़ता जा रहा है, निःसन्देह यह न सिर्फ़ चिन्ता का विषय है; बल्कि हमारी विफलता भी है। कोरोना से मौत का आँकड़ा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। टी.वी. और अख़बार के समाचार के मुताबिक़ सिर्फ़ चीन, जहाँ से कोरोना के संक्रमण की शुरुआत हुई थी, वहाँ स्थिति नियंत्रण में है। शेष अन्य देशों की स्थिति गम्भीर होती जा रही है।  

आम जनता को कोरोना की भयावहता का अनुमान शुरू में नहीं हुआ था।मार्च 22 को जब एक दिन का जनता कर्फ़्यू लगा और ताली, थाली, घंटी आदि बजाने का आह्वान प्रधानमंत्री ने किया, तब इसका भय लोगों में बढ़ा। काफ़ी सारे लोगों के लिए ताली-थाली-घंटी बजाना मनोरंजन का अवसर रहा। वे अपने-अपने घरों से निकलकर मानो उत्सव मनाने लगे; यों जैसे ताली-थाली-घंटी पीटने से कोरोना की मृत्यु हो रही हो, या यह कोई जादू-टोना या टोटका हो, जिससे कोरोना समाप्त हो जाएगा। अप्रैल पाँच को जब प्रधानमंत्री ने रात के नौ बजे घर की बत्ती बुझाकर दीया जलाने को कहा, तो लोगों ने इसे दीपोत्सव बना दिया। दीये जलाए गए, आतिशबाज़ी भी ख़ूब हुई, मोदी जी के लिए ख़ूब नारे लगे। यों लग रहा था ज्यों यह कोई त्योहार हो। अगर प्रधानमंत्री एक दीया जलाकर दो मिनट मौन रखने को कहते, जो लोग इस महामारी में मारे गए हैं, तो शायद लोग इसे गम्भीरता से लेते और भीड़ इकट्ठी कर न पटाखे फोड़ते, न दीवाली मनाते। हम भारतीय इतने असंवेदनशील कैसे होते जा रहे हैं? कोरोना कोई एक राक्षस नहीं है जिसे भीड़ इकट्ठी कर अग्नि से डराकर ललकारा जाए और वह मनुष्यों की एकजुटता और उद्घोष से डर कर भाग जाए।  

प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के बाद जिस तरह अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हुआ, उससे कोरोना का संक्रमण और फैल गया। अधिकतर लोग बाज़ार से महीनों का सामान घर में भरने लगे, जिससे बाज़ार में ज़रूरी सामानों की क़िल्लत हो गई और दुकानों में भीड़ इकट्ठी होने लगी। चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल हो गया। क्वारंटीन, आइसोलेशन, सोशल डिसटेनसिंग, घर से बाहर न निकलना आदि को लेकर ढेरों भ्रांतियाँ फैलने लगीं। लोग भय और आशंका से पलायन करने लगे, जिससे ट्रेन व बस में और संक्रमण फैलने लगा।  

जनवरी 2020 के अंत में जब भारत में पहला कोरोना का मामला आया तभी सरकार को ठोस क़दम उठाना चाहिए था। विदेशों से जितने भी लोग आ रहे थे, उसी समय उन्हें क्वारंटीन करना चाहिए था। देश में जितने भी समारोह, सम्मलेन, सभा का आयोजन जिसमें भीड़ इकट्ठी होनी थी, तुरन्त बंद कर देना चाहिए था। कोरोना का मामला आने के बाद भी ढेरों सरकारी कार्यक्रम हुए, जिनमें देश-विदेश से लोगों ने शिरकत की। कहीं भी किसी तरह की भीड़ एकत्रित होने पर पाबन्दी नहीं लगाई गई। लगभग दो महीने से थोड़े कम दिन में जब कोरोना के संक्रमण का फैलाव बहुत ज़्यादा हुआ और मौत का सिलसिला शुरू हुआ तब सरकार जाग्रत हुई। इतने विलम्ब से लॉकडाउन के निर्णय का कारण समझ से परे है; क्योंकि वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय को अवश्य होगा। यदि स्वास्थ्य मंत्रालय इसकी भयावहता से अनभिज्ञ था, तो यह भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश के लिए शर्म की बात है।  

लॉकडाउन होने के बाद दिल्ली से पलायन करने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग एकत्रित हो गए। इनमें दूसरे राज्यों से आए दिहाड़ी मज़दूरों की संख्या ज़्यादा थी। निःसन्देह अफ़वाहों और सरकार के प्रति अविश्वसनीयता के कारण वे सभी ऐसा करने के लिए विवश हुए। न काम है, न अनाज है, न पैसा है, न घर है; ऐसे में कोई क्या करे? सरकार खाना देगी यह गारंटी कौन किसे दे? ग़रीबों की सुविधा का ध्यान कभी किसी सरकार ने रखा ही कब? हालाँकि पहली बार यह हुआ है कि दिल्ली में सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से अच्छी हुई है। रैनबसेरा, सस्ता खाना आदि का उत्तम प्रबन्ध हुआ है। फिर भी राजनीतिक नेता और सरकार पर विश्वास शीघ्र नहीं होता है। ऐसे में लोगों को यही विकल्प सूझा कि किसी तरह अपने-अपने घर चले जाएँ, ताकि कम-से-कम ज़िन्दा तो रह सकें। इनमें सभी जाति-धर्म के लोग शामिल थे। लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद सरकार अपने ख़र्च पर सुरक्षित तरीक़े से सभी को अपने-अपने गाँव या शहर पहुँचा देती, तो समस्याएँ इतनी विकराल रूप नहीं लेतीं। शेल्टर में रहकर कोई कितने दिन समय काट सकता है?  

निज़ामुद्दीन स्थित मरकज़ में तब्लीग़ी जमात के लोगों की गतिविधियाँ बेहद शर्मनाक हैं। लॉकडाउन के बावजूद वे सभी इतनी बड़ी संख्या में साथ रह रहे थे। उन्हें जब जबरन जाँच के लिए ले जाया जा रहा था तब और अस्पताल में जाने के बाद जिस तरह की घिनौनी हरकत वे कर रहे हैं, उन्हें कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। सरकार द्वारा निवेदन और चेतावनी के बावजूद निज़ामुद्दीन के अलावा देश में कई स्थानों पर अब भी भीड़ इकट्ठी हो रही है। कई जगह स्वास्थ्यकर्मियों एवं पुलिस के साथ बदसलूकी की जा रही है।कई मामले ऐसे हो रहे हैं, जब संक्रमित व्यक्तियों को आइसोलेशन में रखा गया, तो वे भाग गए या ख़ुद को ख़त्म कर लेने की धमकी दे रहे हैं। कुछ लोग कोई-न-कोई जुगाड़ लगाकर लॉकडाउन के बावजूद घर से बहार निकल रहे हैं। जबकि सभी को मालूम है कि जितना ज़्यादा सोशल डिसटेनसिंग रहेगा संक्रमण से बचाव होगा। ऐसे लोग जान-बूझकर जनता, सरकारी व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। लॉकडाउन से कोरोना के रफ़्तार में जो कमी आती, उसे इनलोगों ने न सिर्फ़ रोक दिया है, बल्कि ख़तरा को बहुत ज़्यादा बढ़ा दिया है। समाज की भलाई किसी भी धर्म-सम्प्रदाय से बढ़कर है।

राजनीति और सियासत का खेल हर हाल में जारी रहता है, भले देश में आपातकाल की स्थिति हो। एक दिन अख़बार में फोटो के साथ ख़बर छपी कि दिल्ली सरकार एक लड्डू, ज़रा-सा अचार के साथ सूखी पूड़ी बाँट रही है। अब देश में महा-समारोह तो नहीं चल रहा कि पकवान बना-बनाकर सरकार परोसेगी। यहाँ अभी किसी तरह ज़िन्दा और सुरक्षित रहने का प्रश्न है। ऐसे हालात में दो वक़्त दो सूखी रोटी और नमक या खिचड़ी मिल जाए, तो भी काम चलाया जा सकता है। अगर अच्छा भोजन उपलब्ध हो सके, तो इससे बढ़कर ख़ुशी की क्या बात होगी। अफ़वाह यह भी फैला कि खाना मिल ही नहीं रहा है, भूख से लोग मर रहे हैं। जबकि दिल्ली सरकार, केन्द्र सरकार, ढेरों संस्थाएँ, सामाजिक कार्यकर्ता आदि इस काम में पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं।  

देश और दुनिया के हालात से सबक लेकर हमें अपनी जीवन शैली में सुधार करना होगा। खान-पान हो या अन्य आदतें, प्रकृति के नज़दीक जाकर प्रकृति के द्वारा ख़ुद को सुधारना होगा। भले कोरोना चमगादड़ से फैला है; लेकिन कई सारे जानवरों से दूसरे प्रकार का संक्रमण फैलता है। अतः मांसाहार को त्यागकर शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए। योग, व्यायाम तथा उचित दैनिक दिनचर्या का पालन करना चाहिए, ताकि हमारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़े। संचार माध्यमों के इस्तेमाल के साथ आपसी रिश्ते को मज़बूती से थामे रखा जाए, ताकि कहीं कोई अवसाद में न जाए।  

कोरोना के क़हर से बचाव के लिए हमें सरकार को सहयोग देना होगा। सिर्फ़ सरकार पर दोषारोपण कहीं से जायज़ नहीं है। हम देशवासियों को अपना कर्त्तव्य समझना चाहिए। जिन्हें संक्रमण की थोड़ी भी आशंका हो, उन्हें स्वयं आइसोलेट हो जाना चाहिए या क्वारंटीन के लिए चला जाना चाहिए। इस राष्ट्रीय और वैश्विक आपदा की घड़ी में अपने-अपने घरों में रहकर हम आवश्यक और मनोवांछित कार्य कर सकते हैं।मनोरंजन के ढेरों साधन घर पर उपलब्ध हैं, ऐसे में बोरियत का सवाल ही नहीं। एकान्तवास से अच्छा और कोई अवकाश नहीं होता, जब हम चिन्तन-मनन कर सकते हैं और कार्य योजना बना सकते हैं। आत्मावलोकन, आत्मविश्लेषण और कुछ नया सीखने का यह बहुत अच्छा मौक़ा है। यों कोरोना के कारण मन अशांत और ख़ौफ़ में है; परन्तु इससे कोरोना का ख़तरा बढ़ेगा, कम नहीं होगा।बेहतर है स्वयं, परिवार, समाज, देश और विश्व के उत्थान के लिए हम इस समय का सदुपयोग करें।  

-जेन्नी शबनम (6.4.2020)
___________________