Wednesday, June 17, 2026

138. श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' द्वारा 'साझा संसार' की भूमिका

श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' एवं श्रीमती वीरबाला काम्बोज के साथ मैं  
कला, साहित्य, संगीत आदि क्षेत्रों में जन्मजात यानी नैसर्गिक प्रतिभा ही व्यक्ति को आगे बढ़ाती है। निरन्तर प्रयास और अभ्यास से इस प्रतिभा को निखारा जा सकता है। अर्जित प्रतिभा इसे बल प्रदान करती है। जन्मजात और अर्जित प्रतिभा मिलकर साहित्यकार की लेखनी का परिमार्जन करते हैं। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन और व्यवहार-कला के माध्यम से इसको निखारा जा सकता है। केवल बुद्धिबल के आधार पर साहित्य नहीं रचा जा सकता। संसार और अपने परिवेश को समझने की जितनी संवेदना शक्ति होगी, साहित्यकार का सृजन उतना ही मुग्ध करने वाला होगा। डॉ. जेन्नी शबनम मूलतः कवयित्री हैं, जिनका काव्य-सृजन अभिभूत करता है। आचार्य दण्डी ने कहा है- ''गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति'' अर्थात् गद्य कवियों की कसौटी है। आपके ब्लॉग पर आधारित संग्रह ‘साझा-संसार’ आपकी गम्भीर अभिव्यक्ति का साक्षात् उदाहरण है। 

‘साझा-संसार’ की रचनाएँ विभिन्न  समय पर सम्प्रेषित आपके गहन चिन्तन का प्रतिफलन है। आपका यह संग्रह- 1. कथा/कहानी, 2. स्त्री, 3. समाज, 4. संस्मरण, 5. व्यंग्य, 6. फ़िल्म 7. आत्मन् इन सात इन्द्रधनुषी रंगों से रँगा है। रचनाओं के इस वैविध्य में नारी की स्थिति, उसकी मर्मान्तक पीड़ा, हर युग में किया जाने वाला उसका शोषण, उसके अस्तित्व का संकट, असमानता की दृष्टि गहरे तक छू जाती है। ‘कथा/कहानी’ में लघुकथाएँ- माँ हो न, जेनेरेशन गैप और पहचान नारी के संघर्ष की ही कथा कहते हैं। ‘मुझे नहीं जीना इस दुनिया में’ उसी नारी-व्यथा के संघर्ष की मार्मिक कथा है। वह ग़रीब हो या सम्भ्रान्त, इस मोर्चे पर शोषण और पीड़ा का शिकार सबको होना पड़ता है। 

सामाजिक शोषण और आडम्बर पर आपने कड़ा प्रहार किया है। ‘स्त्री’ में आधी दुनिया की विसंगतियों की शल्य-चिकित्सा की गई है। इस अध्याय में आधी दुनिया की पूरी बातें, नारी के श्रम की अवहेलना, बलात्कृत दामिनियों का दर्द, बलात्कार की स्त्रीवादी परिभाषा, स्त्री का उपभोग की वस्तु मात्र माना जाना व्यथित करता है। जेन्नी शबनम तीखे कटाक्ष के माध्यम से छद्म रूपधारी समाज-सेवकों का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत करती हैं। यही कारण है कि आपकी रचनाओं में आए विचार केवल शब्द नहीं होते; बल्कि वे स्पन्दित हृदय की धड़कन की तरह होते हैं। जेन्नी जी ने इस अध्याय में अकाट्य तर्कों से नारी के प्रति किए जा रहे भेदभाव के यथार्थ चित्र उकेरे हैं। बल देकर कहूँ, तो आपके लेखन में सड़े- गले विचारों और प्रथाओं के प्रति सशक्त विद्रोह झलकता है। ‘आधी दुनिया की पूरी बातें’ में ''ज़र, ज़मीन, जोरू ज़ोर की, नहीं तो किसी और की।'' इस कहावत से आक्रोश और अधिक मुखर हुआ है। लेखिका पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों को भी मानसिक ग़ुलामी की शिकार का उत्तरदायी मानती हैं। तात्पर्य है- बौद्धिक चर्चा में कोई कुछ भी कहे, स्त्री की स्थिति में अधिक बदलाव नहीं हुआ है।
 
‘समाज’ में युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हिन्दी की स्थिति, बचपन और लुप्त होते लोकगीत पर भी अपनी चिन्ता व्यक्त की है। यद्यपि यूट्यूब के माध्यम से आज लुप्तप्राय लोकगीतों की वापसी का विश्वास जगा है। 
 
'संस्मरण' विधा में- रहस्यमय शरत, शान्तिनिकेतन की स्मृतियाँ, कठपुतलियों वाली श्यामली दी प्रभावशाली रचनाएँ हैं, जिनमें जेन्नी जी की भावप्रवणता दृष्टिगोचर होती है। ‘व्यंग्य’ में ‘स्त्री-रोबोट’ केवल व्यंग्य-रचना ही नहीं; बल्कि रुग्ण सामाजिक सोच की शल्य-क्रिया भी है। 

‘फ़िल्म’ स्तम्भ में डंकी, बोल के बोल सधी हुई समीक्षाएँ हैं। 'आत्मन्' नितान्त निजी अनुभूतियों का निर्झर है, जिसमें  दादी, पापा, मम्मी, बेटा और बेटी से जुड़े प्रसंग हैं, जिनकी नमी पाठक की आँखों में अवश्य तैर जाएगी।  

जेन्नी शबनम का यह संसार सबका साझा है। आप जागरूक लेखिका हैं। इस संग्रह की रचनाएँ आद्यन्त पठनीय हैं।

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’        
(24 नवम्बर, 2025)
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Monday, June 1, 2026

137. सुमन कल्याणपुर

सुमन कल्याणपुर का 31 मई 2026 को मुम्बई में देहान्त हो गया। बांग्लादेश के ढाका में 28 जनवरी 1937 को इनका जन्म हुआ था। इनके पिता कर्णाटक के मैंगलोर से थे और ढाका में बहुत समय तक पदस्थापित रहे। इनका परिवार वर्ष 1943 में मुम्बई आ गया। चित्रकला और संगीत में इन्हें शुरू से रूचि थी। इन्होंने बड़े-बड़े गुरु से शास्त्रीय गायन सीखा। वर्ष 1954 में सर्वप्रथम उन्होंने हिन्दी सिनेमा के लिए गाने गाए। उन्होंने 857 हिन्दी गाने गाये हैं। समकालीन सभी गायकों के साथ उन्होंने युगल गीत गाए हैं। मोहम्मद रफ़ी के साथ लगभग 140 युगल गीत गाए हैं।  इनकी आवाज़ लता मंगेशकर से काफ़ी मिलती है, जिससे कई गाने में लोगों को भ्रम होता है कि लता ने गया या सुमन ने। इन्होने हिन्दी के अलावा मराठी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, पंजाबी, राजस्थानी, ओड़िया, गुजराती, असमिया, कन्नड़ इत्यादि कई भाषाओं में गाने गाए हैं। इन्हें गायकी के लिए पद्म भूषण तथा अन्य कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। 

''शराबी-शराबी ये सावन का मौसम, ख़ुदा की कसम ख़ूबसूरत ना होता, अगर इसमें रंग-ए-मुहब्बत न होता'', ''न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें, मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया'', ''बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दीये जलाके'', 'यूँ ही दिल ने चाहा था रोना रुलाना, तेरी याद तो बन गई एक बहाना'', ''दिल ग़म से जल रहा है जले, पर धुआँ न हो, मुमकिन है इसके बाद कोई इम्तेहाँ न हो'', ''मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा'', ''जो हम पे गुज़रती है, तनहा किसे समझाएँ'' इत्यादि गाना उस ज़माने से मुझे पसन्द है जब न गीत के बोल जानती-समझती थी न उसके माने न मायने। जब तक मेरे पापा जीवित रहे तब तक हर दिन रेकॉर्ड प्लेयर पर सभी गायकों के गाने बजते रहते थे। मुझे सबसे ज़्यादा मोहम्मद ऱफी और सुमन कल्यानपुर को सुनना अच्छा लगता था। 

मैं 12 वर्ष की थी जब पापा का देहान्त हो गया। घर में चुप्पी छा गई। भाई जब गाँव से आता तब घर गुलज़ार होता और रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर बजता था। एक साल बाद जब मैं थोड़ा सामान्य हुई तब मैं फिर से गाना सुनने लगी। गाना सुनना मेरे परिवार के जींस में है शायद। वैसे तो सभी रेकॉर्ड मैं बजाती थी; लेकिन सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी के गाने रिपीट कर-करके सुनती थी। बाद में मीना कुमारी और ग़ुलाम अली की गज़लें भी ख़ूब सुनने लगी। रिकॉर्ड से कैसेट-वाकमैन का ज़माना और फिर मोबाइल-कम्प्यूटर के ज़माने में मैं पहुँची। अब सुमन कल्याणपुर के वे सभी गाने जो मुझे पसन्द हैं, एक जगह रिकॉर्ड कर ली। शाम को टहलते हुए भी सुमन कल्याणपुर को ही अधिकतर सुनती रही हूँ। 

न जाने सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में क्या जादू है कि मुझे लता जी और आशा जी के गाने से ज़्यादा पसन्द इनके गाने लगते हैं। मुझे बचपन से ही उदासी भरे गीत पसन्द आते हैं, इसका कारण नहीं मालूम। हालाँकि मेरे घर में सभी मिज़ाज के गीत के रेकॉर्ड थे। सुमन कल्याणपुर के कुछ गीत हल्के-फुल्के मिजाज़ वाले भी हैं; लेकिन मुझे नहीं भाते। यू ट्यूब पर सुनते समय वैसे गाने आ गए, तो सुन लेती हूँ और पसन्द का आ जाए तो फिर रिपीट कर-करके सुनती रहती हूँ। 

गाना सुनना मेरा बचपन से शौक़ है। जैसे-जैसे बड़ी होती गई, सभी गायक-गायिकाओं को सुनने लगी। लेकिन सुमन कल्याणपुर के गाए कुछ गाने मुझमें इस तरह समाहित हैं, जिसे अपने मन की किसी भी अवस्था में सुनकर सुखद महसूस करती हूँ। सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं; परन्तु उनके गाये गीत मेरे जीवन का हिस्सा हैं। समय और उम्र के बदलाव ने मेरी पसन्द को बदल नहीं सका। अंतर बस यह आया कि बचपन में गीत के बोल समझ नहीं आने पर अपने शब्द भर देती थी; पर अब हर शब्द को समझकर गाना सुनती हूँ। 

सुमन कल्याणपुर का जाना संगीत जगत की ही नहीं; बल्कि श्रोताओं की भी क्षति है। हालाँकि फ़िल्म 'नसीब' (1981) का गाना ''ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, लोगों की जान लेती है'' उनका अन्तिम हिन्दी गाना है। फिर भी उनके गाए सभी गीत उनके चाहने वालों के दिलों में सदा के लिए जीवित रहेंगे और सुमन कल्याणपुर मेरी सबसे पसन्दीदा गायिका रहेंगी। सुमन कल्याणपुर को हार्दिक श्रद्धांजलि!

-जेनी शबनम (1.6.2026) 
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