समय की बीतना, मानो सूरज का रोज़ उगना और ढलना। भोर से साँझ, रात, फिर भोर अनवरत। इसी तरह हमारा जीवन चलता रहता है अनवरत। बीच-बीच में कुछ ख़ास दिन याद दिलाता है कि हमारी यात्रा कहाँ तक पहुँची है, कब-कब हमें ठहरना है, रुकना है, चलना है, किधर जाना उचित किधर जाना अनुचित है, कब कौन सा त्योहार है, कब हमें क्या करना है, अन्तिम मक़ाम तक पहुँचने की सही राह कौन सी है इत्यादि।
नव वर्ष भी ऐसे ही एक ख़ास दिन है जब पूरी दुनिया पुराने साल को अलविदा कहती है और नए का स्वागत करती है। हर जगह त्योहार का माहौल। जाड़े की रात भी मदहोशी के आलम में डूबी हुई चहकती और जगमग करती रहती है। हर एक व्यक्ति के मन में उत्साह रहता है। जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुँचती है जश्न में डूबी रात ज़ोर से खिलखिलाती है और तमाम दुनिया के लोग मस्ती में झूमने लगते हैं। कहीं आतिशबाज़ी तो कहीं मदमस्तों की टोली अपने अपने मन के अनुसार नाचते-गाते हैं। रात जागती रहती है और यूँ खिली रहती है मानो दीवाली की रात हो। जगमगाती, खिलखिलाती, नाचती, गाती, रोमांटिक मनोदशा में होती है।
बहुत बचपन का नव वर्ष तो याद नहीं। स्कूल के दिनों का याद है जब 19 दिसम्बर से बड़े दिन की छुट्टी शुरू हो जाती थी और शायद तीन-चार जनवरी को स्कूल खुलता था। उस ज़माने में न फ़ोन, न टी.वी. न रात में जश्न मनाने के लिए बिजली। जो करना है दिन में ही करना है। इसलिए 31 दिसम्बर के दिन या रात में कुछ भी ख़ास नहीं होता था, सिर्फ़ नए साल में ख़ास कार्यक्रम की की रूपरेखा तैयार होती थी। पहली जनवरी की भोर में पहला काम होता था कि उठते ही जो भी घर में है उसे हैप्पी न्यू ईयर बोलना। दुसरा काम घर के सभी कैलेण्डर को फाड़कर फेंकना। तीसरा काम अपनी कॉपी में पहली जनवरी की तारीख डालना। पिछले दिन तय किए हुए कार्यक्रम का क्रियान्वयन करना। सिनेमा जाना, किसी रेस्तरां में खाना, किसी के घर लोगों के सामूहिक भोजन में हिस्सा लेना (कभी कभी मेरे घर भी होता था) इत्यादि।
विवाहोपरान्त जीवन की दिशा बदल गई। विवाह के बाद मेरे घर में बहुत लोग रहते थे, अतः कोई भी कार्यक्रम हो तो सभी उसमें रहते थे। बच्चों के होने के बाद थोड़ा बदलाव आया। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए बहुत बदलाव आया। वर्ष 2011 तक मेरे पति के संस्थान में नव वर्ष के अवसर पर बहुत बड़ा आयोजन होता था। धीरे-धीरे वह कम हो गया। बच्चे बड़े हुए तो वे अपने मित्रों के साथ नया साल मनाने लगे। साथ कोई न भी जाए तो मैं अक्सर सिनेमा देखने जाती थी।
इस वर्ष का नया साल आजीवन मुझे याद रहेगा। मेरे निवास से नज़दीक आज़ाद अपार्टमेन्ट में मेरे एक बुज़ुर्ग मित्र एम. एस. आज़ाद जी से मिलने मैं 22 दिसंबर को गई। लौटते समय हल्का अँधेरा हो गया था। आज़ाद जी समतल रास्ते से मुझे छोड़ने आ रहे थे और मैं शॉर्टकट के लिए एक ऊँचे चबूतरे पर चढ़कर आ रही थी। जैसे मैं नीचे उतरने लगी, पाँव मुड़ गया और मैं धड़ाम से नीचे। नई-नई चप्पल का उद्घाटन हो गया। आज़ाद जी मुझे उठाने लगे। दाएँ पाँव का घुटना छिल गया। धीरे-धीरे मैं उठी; परन्तु बाएँ पाँव में भयंकर दर्द होने लगा और तुरत सूज गया। मुझे लगा कि गिर गई थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा। मैंने आज़ाद जी से कहा कि जब वे मेरे घर आये थे तो वापसी में सिद्दी से वे गिर गए थे, तो मैंने उन्हें सँभाल लिया था, इस लिए बदले में आज उनके घर गिरकर मेरी बराबरी हो गई।
| पहला दिन |
| दूसरा दिन |
| तीसरा दिन |
अब देखना है कि नया साल 2026 मेरे लिए क्या-क्या लेकर आता है। सभी को नव वर्ष की मंगलकामनाएँ !
-जेन्नी शबनम (1.1.2026)
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