Wednesday, April 7, 2021

86. श्री रमेश कुमार सोनी जी द्वारा 'लम्हों का सफ़र' की समीक्षा

 
लम्हों का सफ़र (कविता-संग्रह) डॉ. जेन्नी शबनम

प्रकाशक: हिन्द-युग्म ब्लू, नोएडा, सन- 2020

मूल्य- 120/-रु., पृष्ठ- 112, ISBN NO. : 978-93-87464-73-5

भूमिका- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु एवं संगीता गुप्ता

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                       शब्दों में सिमटे हुए लम्हों के सफ़र

 

                आपके इस जीवन में यथार्थ की धरातल पर भोगे हुए अच्छे-बुरे पलों की पड़ताल करती कविताओं का यह एक गुलदस्ता है, जिसमें एक संवेदनशील स्त्री के बनते-बिखरते अरमानों का शब्दांकन है ये कविताएँ अपने वक़्त की जुगाली करती हुई वर्तमान की धरातल पर उसका डिसेक्शन करती हैं और विचारों की हाँडी में इसे पकाकर परोस देती हैं कविताएँ यूँ तो ख़ामोशी की पड़ताल करती हैं; लेकिन इसकी आगोश में अब चीखक्रंदन और आन्दोलनों के स्वर भी शामिल हुए हैं 

                आपका यह प्रथम काव्य-संग्रह इन सात भागों में विभाजित है- जा तुझे इश्क़ होअपनी कहूँरिश्तों का कैनवासआधा आसमानसाझे सरोकार, ज़िंदगी से कहा-सुनी और चिन्तन इसे आपने अपने पूज्य माताजी एवं पिताजी को सादर समर्पित किया है इस संग्रह का केन्द्रीय भाव- ‘स्त्रियों की आवाज़ को बुलंद करना है यह संग्रह उनके भोगते हुए वर्तमान और भूतकाल की पीड़ा से ऊपर उठकर एक स्वर्णिम भविष्य रचना चाहती है   

                इस जीवन में कोई किसी की ज़िंदगी नहीं जी सकता; लेकिन वह ज़रूर चाहता है कि अगला व्यक्ति उसकी तरह व्यवहार करे, उसके इशारे पर उठे-बैठे और हँसे-रोए, जो संभव ही नहीं, ख़ासकर किसी युगल के जीवन में, स्त्रियों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं इनका जीवन पुरुषों के मुक़ाबले काफ़ी सुकोमल और चिन्तनमना होता है कविता के द्वारा इस दर्द को सहने हेतु एक शाप  देने की कोशिश आपने की है, वह भी बड़ी अजीब है कि ''जा तुझे इश्क हो!'' 

       ...ग़ैरों के दर्द को महसूस करना और बात है / दर्द को ख़ुद जीना और बात / एक बार तुम भी जी लो, मेरी ज़िंदगी / जी चाहता है / तुम्हें शाप दे ही दूँ- / ''जा तुझे इश्क हो!'' 

              जीवन की गाड़ी के दोनों पहिए गर साथ चलें, तो गृहस्थी बेहतर चलती है; लेकिन यदि एक की राह में पगडंडी हो और एक की राह में आकाश हो,  तो ये पंक्तियाँ सहज ही जन्म लेती हैं-

      ...अबकी जो आओतो मैं तुमसे सीख लूँगी / ख़ुद को जलाकर भाप बनना / और बिना पंख आसमान में उड़ना / अबकी जो आओ / एक दूसरे का हुनर सीख लेंगे / मेरी पगडंडी और तुम्हारा आसमान / दोनों को मुट्ठी में भर लेंगे / तुम मुझसे सीख लेना... / मैं सीख लूँगी... 

            जब कोई अपनी बातों की गठरी किसी अपने या साहित्य के आँचल में खोलती है, तो उसकी अपनी आपबीती कुछ यूँ प्रकट हो ही जाती है-

      ...दर्द में आँसू निकलते हैंकाटो तो रक्त बहता है / ठोकर लगे तो पीड़ा होती हैदग़ा मिले तो दिल तड़पता है / ... / मेरे जज़्बात, मुझसे अब रिहाई माँगते हैं / ... / हाँ, मैं सिर्फ़ एक शब्द नहीं / साँसे भरती हाड़-मांस की / मैं भी जीवित इंसान हूँ   

               कुछ देर और ठहर जाने पर पता चलता है कि गाँव की ख़ुशबू साथ लिए वो नन्ही लड़की शहर चली गई, जहाँ शायद वह पत्थरों में चुन दी गई आज भी इन कविताओं में कवयित्री के अतीत के अंतहीन दर्द को महसूस किया जा सकता है, विशेषकर जब उसे 'बेचारी' शब्द का संबोधन सुनने को मिलता है, तब यह दर्द फफोले की तरह सीने में अक्सर उभर आता है इसी दौर में वह पुकार उठती है एक छोटी बच्ची बनकर, अपने बाबा को यह कहते हुए कि- ''बाबा आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है।'' इसी बिटिया की सभी चाहतें उसके गुल्लक में बंद हैं;  बरसों से सोचती थी कि इनसे वह अपने सपने खरीदेगी; लेकिन यह मुमकिन नही हो पाया और वह लिख पड़ी-

      ...चलन से मैं भी उठ गई और ये पैसे भी मेरे / ... / गुल्लक और पैसेमेरे सपनों की यादें हैं / एक ही चुनरी में बँधे सब साथ जीते हैं / ... / मेरे पैसेमेरे सपनेगुल्लक के टुकड़े और मैं

            रिश्तों को सँभालने का ज़्यादा दायित्व चाहे-अनचाहे स्त्रियों पर थोप दिया जाता है। इसी परम्परा को निभाते हुए जेन्नी जी अपने पिताजी और माताजी की यादों की निशानियाँ सहेजती हैं और अपने पुत्र के लिए लिखती हैं-

        ''...अपनी तमाम संवेदनाएँ तुममें भर दूँ / ... / तुम जीवन-युद्ध में डटे रहोगे / जो तुम्हें किसी के विरुद्ध नहीं / बल्कि स्वयं को स्थापित करने के लिए करना है...'' और अपनी पुत्री के लिए लिखती हैं- सिर्फ़ अपने दम पर / सपनों को पंख लगाकर / हर हार को जीत में बदल देना / तुम क्रांति-बीज बन जाना!'' तथा ''...दूसरों... / ताकि धरातल पर, जीवन की सुगंध फैले / और तुम्हारा जीवन परिपूर्ण हो / जान लो / सपने और जीवन / यथार्थ के धरातल पर ही / सफल होते हैं।''

          वाक़ई इस दौर में माताओं के ही हिस्से में रह गया है कि वे अपनी संतानों को सुसंस्कारित बनाएँ; पुरुष प्रधान इस युग की यही एक बड़ी विडम्बना है कि वे स्वयं इस ओर से पूर्णतः ग़ैरज़िम्मेदार रहते हैं। यद्यपि रिश्तों के संधान के बारे में यह कहा जाता है कि ये त्याग की मज़बूत धरातल पर टिके होते हैं और स्वार्थ की मामूली आँधी में भरभराकर टूट जाते हैं।

             वर्तमान दौर का सबसे बड़ा स्लोगन है- ''बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ''। हमें इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि हमने तमाम स्त्रियों को भोग्या समझा और कन्या के लालन-पालन को सबसे बड़ा सिरदर्द; फलतः एक नई समस्या हमारे समक्ष खड़ी हुई- कन्या भ्रूण हत्या, तथा जन्म हुआ एक पैशाचिक कृत्यों वाले समय का ऐसे दौर में हमारी आधी आबादी आज हमारे समक्ष स्वतंत्रता के लिए आंदोलित और मुखरित हुई, जो स्वाभाविक ही है। ऐसी ही साथियों के लिए जेन्नी जी लिखती हैं एक आंदोलित कविता- ‘मैं स्त्री हूँ। आपने वाजिब सवाल उठाया है कि आख़िर क्यों अलग है स्त्रियों और पुरुषों के गणित, विज्ञान और उनके जीवन का फ़ॉर्मूला? इसे समझने के लिए दोनों को एक जैसा होना ही होगा - बहुत सुन्दर पंक्तियाँ। आपने 'झाँकती खिड़की' कविता के ज़रिए किसी लड़की की इच्छाओं को व्यक्त किया है -

            ''...कौन पूछता हैखिड़की की चाह / अनचाहा-सा कोई / धड़धड़ाता हुआ पल्ला ठेल देता है / खिड़की बाहर झाँकना बंद कर देती है / आस मर जाती है / बाहर एक लम्बी सड़क है / जहाँ आवागमन है, ज़िंदगी है / परखिड़की झाँकने की सज़ा पाती है / अब न वह बाहर झाँकती है / न उम्र के आईने को ताकती है।''

          अपनी कविताओं में आप स्त्रियों के पक्ष में वज़नदार तरीक़े से पक्षधरता को निभाते हुए लिखती हैं-

                 ''...घर भी अजनबीऔर वो मर्द भी / नहीं है औरत के लिएकोई कोना / जहाँ सुकून सेरो भी सके।'' 

             ''... / ओ पापी कपूतों की अम्मा! / तेरे बेटे की आँखों में जब हवस दिखा था / क्यों न फोड़ दी थी उसकी आँखें...।''

               इस समय हमें ज़रूरत है एक साझे सरोकार की, जब हम यह कहने से नहीं हिचकें कि ''मेरा भी जाता हैमुझे भी लेना-देना है, ये मेरे परिवार से है।'' इस युग में हम सिर्फ़ शासक होकर ज़िंदा नहीं रह सकते और न ही ये मान सकते कि-

         ''... / शासक होना ईश्वर का वरदान है / शोषित होना ईश्वर का शाप!''

          ''... / ओ संगतराश! / कुछ ऐसे बुत भी बनाओ / जो आग उगल सके / पानी को मुट्ठी में समेट ले / हवा का रुख़ मोड़ दे / ... / गढ़ दो, आज की दुनिया के लिए / कुछ इंसानी बुत!''

               आपने भागलपुर के दंगों की आँखों देखी लिखी है, जहाँ इंसानों को आपने हैवान बनते देखा है, जहाँ आपने रिश्तों को खून से लहूलुहान देखा है और इतनी विभीषिका के बीच आपने अपने आपके भीतर की मनुष्यता को बचाए रखा है, ये सबसे बड़ी बात है। इस तरह के तीन वाक़यों से मैं भी गुज़रा हूँ, तो समझ सकता हूँ कि इस दौर में कैसे ज़िंदा रहा जाता है। वाक़ई जब हमें दूसरों के दर्द का अहसास होता है तभी हम सही मायने में इंसान हैं, वर्ना यहाँ ज़िंदा तो घूमती-फिरती लाशें भी हैं। ‘मालिक की किरपा’ कविता ग़रीबी में पलते अंधविश्वास पर करारी चोट है।

            कोई भी साहित्यकार के पास ये एक बड़ी पूँजी होती है कि वे अपने वक़्त और ज़िंदगी की आँखों में आँखें डालकर बात कर सके, साथ ही अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कह सके।

            ''... / सब के पाँव के छाले / आपस में मूक संवाद करते हैं /अपने-अपनेलम्हों के सफ़र पर निकले हम / वक़्त को हाज़िर नाज़िर मानकर / अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं / चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं।''

                वाक़ई ज़िंदगी एक बेशब्द किताब की तरह है, जहाँ शब्द हमारे ज़ुबाँ से झरते हैं, यही हमारा पासवर्ड भी है; यूँ ही कोई आकर हमें कुरेदकर हमारी इस किताब को मुफ़्त में नहीं पढ़ सकता। इस ज़िंदगी में हमें अपने लिबास सहेजते हुए कहना ही होगा- ‘कहो ज़िंदगी और लिखना ही होगा रोज़ एक ख़त अपने ही नाम का, क्योंकि चारों ओर काला जादू पसरा हुआ है-

         ''... / मैंने किसी काकुछ भी तो न छीनान बिगाड़ा / फिर मेरे जीवन मेंरेगिस्तान कहाँ से पनप जाता है / कैसे आँखों में, आँसू की जगहरक्त-धार बहने लगती है / कौन पलट देता हैमेरी क़िस्मत / कौन है, जो काला जादू करता है ''

             वर्तमान युग में जीवन के लिए चिन्तन एक ज़रूरी पक्ष है, जिसमें हम अपने खोए-पाए का हिसाब रखते हैं कि कब हमें कितना हँसना-हँसाना है और कब हमें रोना है, हमारे जीवन की धुरी क्या है? प्रेम का रंग क्या है? मेरी आत्मा उसकी आत्मा से अलग कैसे है? इन्हीं सब प्रश्नों के इर्द-गिर्द हमारी ज़िंदगी किसी चकरघिन्नी की तरह घूमते रहती है ऐसे ही हालातों में ये शब्द गढ़े जाते हैं-

     ''हँसी बेकार पड़ी हैयूँ ही कोने में कहीं / ख़ुशी ग़मगीन रखी है, ज़ीने में कहीं / ज़िंदगी गुमसुम खड़ी हैअँगने में कहीं / अपने इस्तेमाल की आस लगाए / ठिठके सहमे से हैं सभी''   

मैं वाली इस दुनिया में हम कहाँ समझ पाते हैं कि-

           ''... / हर पल मेरे बदन में हज़ारों मछलियाँ / ऐसे ही जनमती और मरती हैं / उसकी और मेरी तक़दीर एक है / फ़र्क महज़ ज़ुबान और बेज़ुबान का है''

                 आपकी कविता ज़िंदगी की खुरदरी सतह पर संवेदनाओं का गीत है, अपने आसपास के सामजिक सरोकारों की पड़ताल हैदबी ज़ुबान से बोले जाने वाले प्रश्नों को खुलेपन से कहने का साहस रखती है इन कविताओं में एक स्त्री का स्वाभिमान बोलता है कि कैसी-कैसी परिस्थितियों के साथ उसे दो-चार होना होता है, जो उसके और समाज के लिए विचारणीय बिंदु है आपके शब्द जीवंत होकर सीधे ही पाठकों को खदबदाने का साहस रखते हैं और ये अपने लम्हों के मुनीम भी हैं

            अच्छी रचनाओं के इस पठनीय संग्रह के लिए आपको बधाई एवं शुभकामनाएँ!


होली - 2021

 

रमेश कुमार सोनी

कबीर नगर, रायपुर 

छत्तीसगढ़ - 492099

संपर्क - 7049355476 / 9424220209

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Sunday, March 21, 2021

85. 'प्रवासी मन' विषय-वैविध्य की कृति - 'रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
  
मेरी दूसरी पुस्तक 'प्रवासी मन' (हाइकु-संग्रह) 2021 को अयन प्रकाशन से प्रकाशित हुई और 7 जनवरी को मुझे प्राप्त हुई 10 जनवरी 2021 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 'हिन्दी हाइकु' एवं 'शब्द सृष्टि' के संयुक्त तत्वाधान में गूगल मीट और फेसबुक पर आयोजित पहला ऑनलाइन अन्तर्राष्ट्रीय कवि सम्मलेन हुआ, जिसमें 'प्रवासी मन' का लोकार्पण हुआ मेरी पुस्तक में आदरणीय रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी ने भूमिका लिखी है, जिसे यहाँ प्रेषित कर रही हूँ    

                         'प्रवासी मनविषय-वैविध्य की कृति


प्रकृति और जीव-जगत् एक दूसरे के पूरक हैंएक दूसरे के बिना अधूरे हैं। बाह्य प्रकृति जीव-जगत् को प्रभावित करती है, तो जीव जगत् भी प्रकृति को प्रभावित करता है। तापबरसातकुहासावसन्तपतझरभूकम्पसुनामी प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन में भी किसी न किसी रूप में घटित होते ही हैं। इन सबके बीच रहकर मानव इन सबसे अछूता भी कैसे रह सकता है? अगर कोई यह कहता है कि वह किसी से राग-द्वेष (प्यार और नफ़रत) नहीं रखतावह कभी रोता नहींवह कभी हँसता नहींवह कभी नाराज़ नहीं होतातो समझिए कि या तो वह झूठ बोल रहा है या वह देवता है या संवेदना-शून्य है। हाइकु कविता के लिए भी कोई विषय त्याज्य नहीं माना जा सकताक्योंकि कवि का अपना व्यक्तित्व हैउसके संस्कार हैंउसका मन हैउसके अपने सामाजिक सरोकार हैं। वह इन सबकी उपेक्षा कैसे कर सकता है? डॉ. जेन्नी शबनम जहाँ एक रचनाकार हैंदूसरी ओर वह सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी हैं एवं जन समस्याओं से रूबरू भी होती रहती हैंइसीलिए इनका गद्य जितना अच्छा हैउतनी ही गहरी एवं संवेदना-सिंचित इनकी कविताएँ हैं। हाइकु-सर्जन में भी उनकी वही गहराई और मज़बूत पकड़ नज़र आती है। इसका एक कारण दृष्टिगत होता हैइनका जीवन-अनुभव और साहित्य का गहन अध्ययन। अमृता प्रीतम से इनका प्रगाढ़ सामीप्य रहा है। इनके काव्य में कहीं-कहीं उसकी झलक मिल जाती हैफिर भी इनका अपना चिन्तन हैअपनी शैली है।

 

जीवन में शाश्वत सुख जैसा कुछ नहीं होता। मन को जो थोड़ी देर के लिए सुख मिलता हैउसमें भी कहीं न कहीं दुःख की छाया रहती है। जहाँ मिलन या संयोग का आनन्द होता हैउसी में उस सुख के छिन जाने का भय बना रहता है। घनानंद ने कहा भी है- 'अनोखी हिलग दैयाबिछुरे तै मिल्यौ चाहै / मिलेहू पै मारै जारै खरक बिछोह की।' यानी प्रेम भी अनोखा है कि बिछुड़ जाने पर मिलने के लिए व्याकुल होता है और मिलन होने पर बिछोह का खटका लगा रहता है। इसी तरह जेन्नी जी के हाइकु में एक ओर प्रेम हैछले जाने की पीर हैदु:ख की नियति हैतो जीवन का उल्लास भी हैप्रकृति का अनुपम सौन्दर्य भीखेत में अन्न से जाग्रत किसान है, तो दो वक़्त की रोटी के लिए जूझता मज़दूर भी है। हर मौसम का सौन्दर्य हैतो उनका निर्दय रूप भी है।

 

मन को प्रवासी कहा है। वह भी ऐसा प्रवासी, जिसका कोई घर ही नहीं। वह लौटे भी, तो कहाँ जाए। जाए भी कैसेरास्ता काँटों-भरापाँव ज़ख़्मी हो गएअब कहाँ जाया जाए। एकान्त को तोड़ने के लिए गौरैया से भी मनुहार की है कि वह चीं-चीं बोले तो चुप्पी टूटे। ज़िन्दगी का आनन्द तो दूर रहाउल्टे वह हवन हो गईजिसका धुआँ बादलों तक जा पहुँचा-

पाँव है ज़ख़्मी / राह में फैले काँटे / मैं जाऊँ कहाँ! - 4

लौटता कहाँ / मेरा प्रवासी मन / कोई न घर! -1

मेरी गौरैया / चीं चीं-चीं चीं बोल री, / मन है सूना! - 1000

हवन हुई / बादलों तक गई / ज़िन्दगी धुँआ! - 316

 

प्रकृति का आलम्बन रूप में यदि उसके स्वरूप का चित्रांकन किया गया है, तो उसका लाक्षणिक और प्रतीक रूप भी मौजूद है। 'बगियाके अभिधेय और लाक्षणिक दोनों रूप मौजूद हैं-

गगरी खाली / सूख गई धरती / प्यासी तड़पूँ! - 26

झुलस गई / धधकती धूप में / मेरी बगिया! - 28

 

प्रकृति का मोहक सौन्दर्य भी हैजिसमें फसलों के हँसने काफूलों का बच्चों की तरह गलबहियाँ डालकर बैठने का मोहक मानवीकरण भी है। हँसता हुआ गगन है, तो बेपरवाह धूप भी है। अम्बर से बादल नहीं बरसा; बल्कि अम्बर उस बच्चे की तरह रोया हैजिसका किसी ने खिलौना छीन लिया हो। जेन्नी शबनम की यह नूतन कल्पना नन्हे-से हाइकु को चार चाँद लागा देती है। कम से कम शब्दों में उकेरे गए ये चित्र मनमोहक हैं-

फूल यूँ खिले, / गलबहियाँ डाले / बैठे हों बच्चे! - 1019

फसलें हँसी, / ज्यों धरा ने पहने / ढेरों गहने! - 1022

गगन हँसा / बेपरवाह धूप / साँझ से हारी! - 951

अम्बर रोया, / ज्यों बच्चे से छिना / प्यारा खिलौना! -1020

 

प्रकृति का चेतावनी देना वाला वह रूप भी हैजिसे मानव ने अपने स्वार्थ से नष्ट कर दिया है। कैकेयी की तरह रूठना जैसे पौराणिक उपमानों का सार्थक प्रयोग विषय को और भी प्रभावी बना देता है। धूल और धुएँ से धरती की बेदम साँसें पूरी मानवता के लिए बहुत बड़ी चेतावनी हैं। हरियाली के लिए पर्यावरण की हरी ओढ़नी का सार्थक प्रयोग किया गया है। उस ओढ़नी को छीनने पर प्रकृति की नग्नताप्रकारान्तर से जीवन के लिए ख़तरे का संकेत हैतो अनावृष्टि का चित्र देखिए- खेतों का ठिठकना, 'बरसो मेघहाथ जोड़कर पुकारना, कितनी व्याकुलता से भरा हुआ है!

ठिठके खेत / कर जोड़ पुकारें / बरसो मेघ! - 53

रूठा है सूर्य / कैकेयी-साजा बैठा / कोप-भवन! - 1025

धूल व धुआँ / थकी हारी प्रकृति / बेदम साँसें! - 928

हरी ओढ़नी / भौतिकता ने छीनी / प्रकृति नग्न! - 935

 

प्रकृति की भयावह स्थिति का चित्रण करते हुए जीव-जगत् की विवशताजलाभाव में कण्ठ सूखनापेड़ और पक्षियों का लिपटकर रोना बहुत कारुणिक है। प्रकृति के ऐसे भावचित्र साहित्य में दुर्लभ ही हैं। ऐसे दृश्य को आठ शब्दों के 17 वर्ण में समेटना बड़ी शब्द-साधना है।

कंठ सूखता / नदी-पोखर सूखे / क्या करे जीव? - 757

पेड़ व पक्षी / प्यास से तड़पते / लिपट रोते! - 758

 

प्रेम प्राणिमात्र की अबुझ प्यास है। गोपालदास नीरज ने एक गीत में कहा है- 'प्यार अगर न थामता पथ में / उँगली इस बीमार उम्र की / हर पीड़ा वेश्या बन जाती / हर आँसू आवारा होता।' उसी प्रेम को कवयित्री ने विभिन्न भाव-संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत किया है। कहीं वह प्रेम अग्नि है, जो ऊँच-नीच का भेद नहीं करता। कहीं वह ऐसा बन्धन है, जो बिना किसी रज्जु या शृंखला के अटूट हैकहीं वह चिड़िया की तरह बावरा है, जो ग़ैरों में भी अपनापन तलाशता है-

प्रेम की अग्नि / ऊँच-नीच न देखे / मन में जले! - 143

प्रेम बंधन / न रस्सी न साँकल / पर अटूट! - 145

बावरी चिड़ी / ग़ैरों में वह ढूँढती / अपनापन! - 163

 

प्रेम की एकनिष्ठता में सूर्य और सूर्यमुखी का सम्बन्ध हैतो कभी नैनों की झील में उतरने का अमन्त्रण हैकहीं उन स्वप्न को छुपाने वाले नैनों का सौन्दर्य हैजो झील की तरह गहरे हैं। जिनमें उतरकर ही प्रेम की थाह पाई जा सकती है।

मैं सूर्यमुखी / तुम्हें ही निहारती / तुम सूरज! - 851

गहरी झील / आँखों में है बसती / उतरो ज़रा! - 890

स्वप्न छिपाती / कितनी है गहरी / नैनों की झील! - 899

 

उसे जब उसका प्रेमास्पद मिल जाता हैतो उसका अनुरागउसका आगमन गुलमोहर बनकर खिल जाता है-

तुम्हारी छवि / जैसे दोपहरी में / गुलमोहर! - 219

उनका आना / जैसे मन में खिला / गुलमोहर! - 217

 

वियोग की स्थिति होने पर उस मन में सन्नाटा पसर जाता हैचुप्पी भी सन्नाटे के नाम ख़त भेजने लगती है। मन में जो प्राणप्रिय बसा था, वह था तो आकाश की तरह व्यापक तोलेकिन उसकी पहुँच से दूर है-

कोई न आया / पसरा है सन्नाटा / मन अकेला! - 234

ख़त है आया / सन्नाटे के नाम से, / चुप्पी ने भेजा! - 238

मेरा आकाश / मुझसे बड़ी दूर / है मग़रूर! - 619

 

जब व्यक्ति की वेदना सीमाएँ लाँघ जाती हैतो मौन ही फिर एकमात्र उपाय रह जाता है। भरपूर दु:ख सहने पर भी कभी उसका अन्त नहीं होता। वह बेहया अतिथि की तरह आता तो अचानक हैलेकिन फिर जाने का नाम नहीं लेता-

मेरी वेदना / सर टिकाए पड़ी / मौन की छाती! - 852

दुःख की रोटी / भरपेट है खाई / फिर भी बची! - 859

दुःख अतिथि / जाने की नहीं तिथि / बड़ा बेहया! - 860

 

जीवन बड़ा विकट है। ज़माने की बुरी नज़रें अस्तित्व को न जाने कब ध्वस्त कर दें। ख़ुद को गँवाने पर भी कुछ मिल जाएसम्भव नहीं। जीवन बीत जाता है। हमारे सामने ही हमारे सुखों कोसुख-साधनों को कोई और हड़प लेता है-

घूरती रही / ललचाई नज़रें, / शर्म से गड़ी! - 177

कुछ न पाया / ख़ुद को भी गँवाया / लाँछन पाया! - 178

ताकती रही / जी गया कोई और / ज़िन्दगी मेरी! - 298

 

बुढ़ापा सारे अभाव का नाम है। कोई उसकी व्यथा सुनने वाला नहींअपने सगे भी साथ छोड़ जाते हैं। जो परदेस चले जाते हैंवे भी धीरे-धीरे सारे सम्बन्ध समेट लेते हैं। इसी तरह बेसहारा जीवन अवसान की ओर बढ़ता रहता है। जेन्नी जी ने बुढ़ापे का बहुत मार्मिक चित्रण किया है-

वृद्ध की कथा / कोई न सुने व्यथा / घर है भरा! - 865

बुढ़ापा खोट / अपने भी भागते / कोई न ओट! - 875

वृद्ध की आस / शायद कोई आए / टूटती साँस! - 876

वृद्ध की लाठी / बस गया विदेश / भूला वो  माटी! - 882

 

बहन और बेटी के सम्बन्धों की प्रगाढ़ता को अपने हाइकु में मधुर स्वर दिया है-

छूटा है देस / चली है परदेस / गौरैया बेटी! - 1012

ये धागे कच्चे / जोड़ते रिश्ते पक्के / होते ये सच्चे! - 290

 

यादों को लेकर जो कसक हैउसे न लौटने की हिदायत ही दे डाली-

तुम भी भूलो, / मत लौटना यादें, / हमें जो भूले! - 1032

 

     वैचारिक पक्ष को देखें तो एक महत्त्वपूर्ण बात कवयित्री ने कही हैजिसको व्यापक अर्थ और परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। मानव ही मन्दिर की मूर्त्ति को बनाता-तराशता है; लेकिन वही मनुष्यउस मन्दिर की व्यवस्था द्वारा बुरा क़रार दे दिया जाता है-

हमसे जन्मी / मंदिर की प्रतिमा, / हम ही बुरे! - 1052

 

      अगर भाषा की बात करें तो कवयित्री भाषा–प्रयोग में बहुत सजग हैं। हाइकु को हाइकु में परिभाषित करते हुए उसका जीवन से साम्य प्रस्तुत किया है-

हाइकु ऐसे / चंद लफ़्ज़ों में पूर्ण / ज़िन्दगी जैसे! - 172 

 

भाषा में क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग हाइकु को और अधिक सशक्त बना देता है। राह अगोरे (बाट देखनाप्रतीक्षा करना)सरेह (खेत)बनिहारी (खेतों में काम करना)असोरा (ओसारादालान)पथार (सुखाने के लिए फैलाया गया अनाज) जैसे सार्थक और उपयुक्त शब्दों के प्रयोग हाइकु को और अधिक सशक्त बना देते हैं-

राह अगोरे / भइया नहीं आए / राखी का दिन! - 39

हुआ विहान, / बैल का जोड़ा बोला- / सरेह चलो! - 457

भोर की वेला / बनिहारी को चला / खेत का साथी! - 562

असोरा ताके / कब लौटे गृहस्थ / थक हार के! - 566

भोज है सजा / पथार है पसरा / गौरैया ख़ुश! - 1008

 

डॉ जेन्नी शबनम के हाइकु का फलक बहुत विस्तृत है। यहाँ संक्षेप में कुछ विशेषताएँ बताने का प्रयास किया है। विषय-वैविध्य इनके हाइकु की शक्ति भी हैविशेषता भी। इस शताब्दी के लगभग पूरे दशक में आपकी लेखनी चलती रही है। मुझे विश्वास है कि 'प्रवासी मनसंग्रह इस दशक के महत्त्वपूर्ण संग्रहों में से एक सिद्ध होगा।

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काम्बोज भैया और मैं

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

23 नवम्बर 2020

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-जेन्नी शबनम (21.3.21)

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Monday, March 8, 2021

84. माँ के बिना महिला दिवस

2017
हर साल की तरह आज पूरी दुनिया में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस उत्साह और उमंग के साथ मनाया जा रहा है। आज मेरी माँ का फ़ोन नहीं आया और अब आएगा भी नहीं। अब किसी भी महिला दिवस पर उनका संबोधन, भाषण एवं चर्चा नहीं सुन पाऊँगी। अतीत में उनके द्वारा दी गई बधाइयों, शुभकामनाओं और उनके साथ जिए पलों की यादों के साथ मेरा आज का यह महिला दिवस बीतेगा। 
  
लगभग 49 वर्षों से मेरी माँ प्रतिभा सिन्हा भारतीय महिला फेडरेशन (NFIW) से जुड़ी रहीं। विगत दो वर्षों से जब अत्यधिक बीमार हो गईं, तब से महिला दिवस के अवसर पर उनकी शारीरिक सक्रियता कम हुई; परन्तु मानसिक और सामाजिक रूप से अंत तक जुड़ी रहीं। भारतीय महिला फेडरेशन की बिहार इकाई (बिहार महिला समाज) की कार्यकर्ता और नेत्री होने के नाते वे हर महिला दिवस पर उतना ही उत्साहित रहती थीं और हमेशा सोचती रहीं कि शायद एक दिन चलने में समर्थ हो जाएँ, तो पुनः सक्रिय हो जाएँगी। पर 30 जनवरी 2021 को दिन के तीन बजे वह सदा के लिए चली गईं, साथ चली गई बिहार महिला समाज और बतौर सामाजिक कार्यकर्त्ता हर महिला के दुःख-दर्द में शामिल रहने वाली एक कर्मठ, जुझारू और बुद्धिजीवी महिला। 
  
मम्मी द्वारा लिखित (अस्वस्थ होने के कारण ठीक से नहीं लिख सकीं)
 
22 नवम्बर 1972 में मेरी माँ बिहार महिला समाज की सदस्य और फिर भागलपुर ज़िला की सचिव बनीं। बाद में वे राज्य सचिव बनीं। वे छह बार भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय परिषद की सदस्य रही हैं। भागलपुर में महिलाओं के हित के लिए बनाए गए संगठन 'महिला कोषांग' में नियमित रूप से जाती रहीं और महिलाओं की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न करती रहीं। 31 दिसम्बर 2008 को मोक्षदा बालिका इंटर स्कूल, भागलपुर से प्राचार्य के पद से रिटायर हुईं। अवकाश प्राप्ति के बाद वे अस्वस्थ हो गईं; परन्तु 2017 तक अपने सभी कार्यों का सम्पादन एवं निर्वहन सुचारू रूप से करती रहीं। उनकी बहुत इच्छा थी कि जब तक जीवित रहें, तब तक महिलाओं के लिए कार्य करती रहें; लेकिन शारीरिक अस्वस्थता ने उनकी क्रियाशीलता को अन्तिम दो साल के लिए विराम दे दिया।   
 
सामाजिक कार्यों में विशेषकर स्त्री-अधिकार के लिए वे सदैव संघर्षरत रहीं। व्यक्तिगत जीवन में भी उन्हें काफ़ी संघर्षों का सामना करना पड़ा, इसके बावजूद वे अपनी राह पर अडिग रहीं। कम उम्र की विधवा और उस पर से समाज सेवी महिला के साथ समाज का व्यवहार बहुत अनुचित होता है, मेरी माँ के साथ यह होता रहा। परन्तु समाज में ऐसे भी लोग हैं जो इस कड़वी सच्चाई को जानते-समझते हुए सदैव सहयोग का हाथ बढ़ाते हैं। भारतीय महिला फेडरेशन, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी, शिक्षक संघ, पेंशनर समाज, समाज सेवी संगठनों, सहकर्मियों, मित्रों का साथ और सहयोग माँ को मिलता रहा, जिससे वे प्राचार्य के साथ-साथ समाज सेवा के कार्य में अनवरत जुटी रहीं। 
वर्ष 1972 से मेरी सहभागिता भारतीय महिला फेडरेशन से रही; भले ही उन दिनों मुझे इसकी समझ नहीं थी। जब भी महिला समाज की गोष्ठी, सम्मेलन, धरना, प्रदर्शन होता मैं अपनी माँ के साथ जाती रही। विवाहोपरान्त मेरी उपस्थिति काफ़ी कम हो गई, पर जब भी मौक़ा मिला मैं सम्मिलित होती रही। 8 मार्च 2017 में मैं अन्तिम बार अपनी माँ के साथ अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर शामिल हुई थी। अब यह सब यादें बनकर मेरे साथ आजीवन रहेंगी। आज महिला दिवस पर न सिर्फ़ मुझे या परिवार के सदस्यों को; बल्कि उनके उन तमाम साथियों को उनकी अनुपस्थिति खलेगी जिनके साथ उन्होंने कई दशकों तक कार्य किया है और महिला दिवस मनाया है।   
मम्मी! तुम जहाँ जा चुकी हो, जानती हूँ मेरी आवाज़, मेरी पुकार, मेरी पीड़ा, मेरी उदासी, मेरी ख़ुशी, मेरी बधाई, मेरी शुभकामनाएँ तुम तक नहीं पहुँचेगी। तुम्हारे कार्यों और संघर्षों को यादकर दुनिया की सभी महिलाओं को तुम्हारी तरफ़ से महिला दिवस की बधाई और शुभकामनाएँ देती हूँ। तुमको अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई मम्मी! 
  

भागलपुर 2017
दिल्ली, 2018
 


 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
-जेन्नी शबनम (8.3.2021)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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Friday, January 15, 2021

83. मेरी दूसरी पुस्तक 'प्रवासी मन' (हाइकु संग्रह) का लोकार्पण

जनवरी 7, 2021 को मेरी दूसरी पुस्तक 'प्रवासी मन' (हाइकु-संग्रह) प्रकाशित हुई। मेरी पहली पुस्तक ‘लम्हों का सफ़र‘ (कविता-संग्रह) का लोकार्पण 7 जनवरी 2020 में पुस्तक मेले में हुआ था। सुखद यह है कि आज के दिन मेरी बेटी का जन्मदिन है और इसी दिन मेरी दोनों पुस्तकें एक साल के अन्तराल में आई हैं।  


मेरी बेटी और मैं
 
10 जनवरी 2021 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 'हिन्दी हाइकु' एवं 'शब्द सृष्टि' के संयुक्त तत्वाधान में गूगल मीट और फेसबुक पर आयोजित पहला ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मलेन हुआ, जिसमें मेरी पुस्तक 'प्रवासी मन' का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में देश-विदेश के हाइकुकार एवं साहित्यकार सम्मिलित हुए। श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', डॉ. कुमुद बंसल, डॉ. कुँवर दिनेश सिंह और डॉ. हसमुख परमार ने हिन्दी हाइकु पर अपने वक्तव्य दिए। डॉ. पूर्वा शर्मा ने इसका संचालन किया। मेरे लिए ख़ास बात यह रही कि मैं पहली बार ऑनलाइन लाइव कार्यक्रम में सहभागी हुई। मेरे अतिरिक्त अनिता ललित, अनिता मण्डा, कमला निखुर्पा, डॉ कविता भट्ट, कृष्णा वर्मा, डॉ. शैलजा सक्सेना, भावना सक्सैना, शशि पाधा, रचना श्रीवास्तव, रमेश कुमार सोनी, सुदर्शन रत्नाकर, ज्योत्स्ना प्रदीप, ऋताशेखर मधु, प्रियंका गुप्ता, डॉ. सुरंगमा यादव, डॉ. शिवजी श्रीवास्तव शामिल हुए।
               
'प्रवासी मन' मेरा प्रथम हाइकु-संग्रह है, जिसमें 1060 हाइकु हैं। दस साल में जितने भी हाइकु लिखी हूँ, सभी को क्रमानुसार इसमें शामिल किया है। पुस्तक में 120 पृष्ठ हैं। यह पुस्तक अयन प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई है। 
 
मेरे हाइकु लेखन और इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने के सफ़र की कहानी बहुत रोचक है। एक साल लगे मुझे पहला हाइकु लिखने में और 10 साल लगे अपने 'प्रवासी मन' को पुस्तक रूपी घर देने में। 

हाइकु ऐसे / चंद लफ़्ज़ों में पूर्ण / ज़िन्दगी जैसे! 

ओशो (आचार्य रजनीश) की पुस्तकों और प्रवचनों में ज़ेन, बाशो, हाइकु इत्यादि की चर्चा रहती है। उनको पढ़ते-पढ़ते हाइकु पढ़ना मुझे अच्छा लगने लगा, पर इस विधा में कभी लिखूँगी यह मैंने कभी सोचा नहीं था। 

विख्यात साहित्यकार एवं अवकाशप्राप्त प्राचार्य आदरणीय रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी ने वर्ष 2010 में मेरी कोई कविता अन्तर्जाल पर पढ़ी।मुझमें हाइकु-लेखन की सम्भावना उन्हें दिखी, तो उन्होंने मुझसे सम्पर्क किया। हाइकु से सम्बन्धित लेख पढ़ने को दिए तथा इसे लिखना समझाया।अब किसी नियम के तहत कुछ लिखना मेरे बस में तो था नहीं। इतने कम शब्दों में मन के भाव को पाबन्दी के साथ पिरोना मुझे लगा असम्भव है, नहीं लिख पाऊँगी। काम्बोज जी ने मुझे अपनी छोटी बहन माना और हर सम्भव प्रयास किया कि मैं सिर्फ़ हाइकु ही नहीं, बल्कि साहित्य की हर विधा में पारंगत हो सकूँ। उन्होंने मुझसे हाइकु लिखवाने का जैसे प्रण लिया हो। वे मुझे प्रोत्साहित करते थे कि बहन आप लिख सकती हैं, आपमें क्षमता है, आप लिख लेंगी। वे आश्वस्त थे कि मैं एक दिन हाइकुकार बनूँगी। 

मैं शर्मिन्दा थी कि मैंने ढेरों रचनाएँ लिखीं, पर 5+7+5 वर्णक्रम की तीन पंक्तियों की नन्ही-सी कविता क्यों नहीं लिख पा रही हूँ। अंततः 24 मार्च 2011 को ट्रेन में सफ़र के दौरान बाहर का दृश्य देखते हुए अचानक मन में शब्द व भाव जन्म लेने लगे और मैंने कई हाइकु लिख दिए। मुझे लगा जैसे मैंने वैतरणी पार कर ली हो। काम्बोज भैया को अति उत्साह से फ़ोन कियामुझसे अधिक वे मेरी सफलता पर प्रसन्न हुए। अंततः मैं हाइकु-लेखन की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई। मेरा प्रथम हाइकु, जो मैंने लिखा- 

लौटता कहाँ / मेरा प्रवासी मन / कोई न घर! 

काम्बोज भैया के आदेश, निर्देश, मार्गदर्शन, सहयोग, प्रेरणा, प्रोत्साहन और स्नेह का परिणाम है कि मैंने न सिर्फ़ हाइकु लिखना सीखा; बल्कि ताँका, सेदोका, चोका, हाइगा, माहिया भी लिखे। काम्बोज भैया की छत्र-छाया में मैंने बहुत सीखा और उनके आशीष का प्रतिफल है कि मेरी रचनाएँ देश-विदेश का सफ़र करती हैं। काम्बोज भैया की आजीवन कृतज्ञ रहूँगी, जिन्होंने अति व्यस्ततम समय में भी इस पुस्तक की भूमिका को लिखने के साथ पुस्तक प्रकाशन से सम्बन्धित सारे कार्य बड़े भाई के रूप में किए हैं। एक हाइकुकार के रूप में काम्बोज भैया ने मुझे स्थापित किया है। काम्बोज भैया न सिर्फ़ मेरे बड़े भाई हैं; बल्कि साहित्य के सफ़र में मेरे गुरु भी हैं। यह पुस्तक मैं उन्हें समर्पित की हूँ। 

आदरणीया डॉ. सुधा गुप्ता जी हाइकु-जगत् के लिए आदर्श हैं। सुधा गुप्ता जी ने मुझे शुभकामनाएँ एवं आशीष दिए; जो हस्तलिखित है और उसी रूप में पुस्तक में शामिल है।
  
सुधा गुप्ता जी का हस्तलिखित सन्देश

आदरणीय रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु‘ जी, जिनसे मैंने हाइकु लिखना सीखा, ने मेरी इस पुस्तक की भूमिका लिखी है। गद्य कोश में भूमिका प्रकाशित है, जिसका लिंक है- 

-डॉ. जेन्नी शबनम (14.1.2021)  
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Monday, November 16, 2020

82. अधूरे सपनों की कसक - मेरा सपना

वर्ष 2019, जून की बात है मेरी ब्लॉगर मित्र श्रीमती रेखा श्रीवास्तव जी का सन्देश प्राप्त हुआ कि वे कुछ ब्लॉगारों के 'अधूरे सपनों की कसक' शीर्षक से अपने सम्पादन में एक पुस्तक-प्रकाशन की योजना बना रही हैं; अतः मैं अपने अधूरे सपनों की कसक लिखकर भेजूँ। अपने कुछ अधूरे सपनों को याद करने लगी, जो अक्सर मुझे टीस देते हैंयों सपने तो हज़ारों देखे, मगर कुछ ऐसी तक़दीर रही मानो नींद में सपना देखा और जागते ही सब टूट गयाकुछ सपने ऐसे भी देखे, जिनको पूरा करने की दिशा में न कोई कोशिश की, न एक क़दम भी आगे बढ़ाया। कुछ सपने जिनके लिए कोशिश की, वे अधूरे रह गए। मेरे कुछ अधूरे सपने 'अधूरे सपनों की कसक' पुस्तक में शामिल है, जिसे यहाँ प्रेषित कर रही हूँ, इस विश्वास के साथ कि कोई मुझे पढ़े, तो वे अपने सपनों को पूरा करने में अवश्य लग जाएँ; नहीं तो उम्र भर टीस रह जाएगी। अगर सपने पूर्ण न हो सकें, तो कम-से-कम यह संतोष तो रहेगा कि हमने कोशिश तो की। अन्यथा आत्मविश्वास ख़त्म होने लगता है और जीवन की दुरूह राहों से समय से पहले भाग जाने को मन व्यग्र रहता है
 
मेरा सपना
 
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अपने छूटे   
सब सपने टूटे,   
जीवन बचा   

सपने देखने की उम्र कब आई कब गुज़र गई, समझ न सकी। वर्ष 1978 में जब मैं 12 वर्ष की थी, पिता गुज़र गए तब अचानक यूँ बड़ी हो गई, जिसमें सपनों के लिए कोई जगह नहीं बची पिता के गुज़र जाने के बाद एक-एक कर मैंने शिक्षा की उच्च डिग्रियाँ हासिल की, और तब भविष्य के लिए कुछ सपने भी सँजोने लगी।   

कैसी पहेली   
ज़िन्दगी हुई अवाक्   
अनसुलझी।   

मेरे पिता यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर थे बचपन में उनकी ज़िन्दगी को देखकर उनकी तरह ही बनने का सपना देखने लगी, जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी। वर्ष 1993 में बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन में राजकीय महिला पॉलिटेकनिक में व्याख्याता के पद के लिए आवेदन किया था। मेरा स्थायी पता तब भी भागलपुर ही था और उसी पते पर पत्राचार होता था उन दिनों मैं गुवाहाटी में अपने ससुराल में रह रही थी मुझे अपने प्रमाण पत्रों के साथ निश्चित तिथि को बुलाया गया था गुवाहाटी में होने के कारण मैं वक़्त पर पटना न जा सकी; क्योंकि मेरा बेटा उस समय कुछ माह का था कुछ महीने के बाद दोबारा कॉल लेटर आया कि मैं अपने प्रमाण पत्रों के साथ उपस्थित होऊँ मैं जब तक पटना आई, तब तक वह तिथि भी बीत गईफिर भी मैंने निवेदन किया कि चूँकि मैं भागलपुर में नहीं थी, अतः उपरोक्त तिथि पर उपस्थित न हो सकी, इसलिए एक बार पुनः विचार किया जाएसंयोग से मेरे आवेदन पर विचार हुआ और मुझे सभी प्रमाण पत्र जमा करने और कॉल लेटर की प्रतीक्षा करने को कहा गया ऐसा दुर्भाग्य रहा कि मुझे उसी दौरान दिल्ली लौट जाना पड़ा और मिली हुई नौकरी मेरे हाथ से निकल गईअब तक इस बात का पछतावा है कि मैं उस समय पटना से बाहर क्यों गई मेरे स्थान पर किसी और को नौकरी मिल गई होगी, इस बात की ख़ुशी है, पर अपने सपने के अधूरे रह जाने का मलाल भी बहुत है   
ताकती रही   
जी गया कोई और   
ज़िन्दगी मेरी। 
 
वर्ष 1995 में 'बिहार एलिजिबिलिटी टेस्ट फॉर लेक्चरशिप' (बी.इ.टी. / B.E.T.) की लिखित परीक्षा मैंने पास की इंटरव्यू से पहले पता चला कि बिना पैसे दिए इंटरव्यू में सफल नहीं हो सकते हैं मैंने अपने विचार के विरुद्ध और वक़्त के अनुसार पचास हज़ार रुपये का प्रबंध किया चूँकि उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति बहुत ही ख़राब थी, इसलिए यह नौकरी मुझे हर हाल में चाहिए थी तथा मेरे पसंद का कार्य भी था लेकिन ऐसा कोई व्यक्ति मुझे न मिल सका, जो पैसे लेकर नौकरी दिला पाने की गारंटी देता मुझे यह डर भी था कि यदि पैसे भी चले गए और नौकरी भी न मिली, तो उधार के पैसे कैसे वापस लौटाऊँगी यूँ मेरी माँ और भाई से लिए पैसे मुझे नहीं लौटाने थे लेकिन ससुराल पक्ष के एक रिश्तेदार से लिए पैसे मुझे लौटाने ही होते। अंततः घूस के लिए मैंने पैसे नहीं दिए इंटरव्यू दिया और मैं सफल रही कुल 15 सीट के लिए वैकेन्सी थी और मुझे 12वाँ स्थान मिला था मैं बहुत ख़ुश थी कि बिना घूस दिए मेरा चयन हो गया और मैं अपने सपने को पूरा कर पाई बाद में पता चला कि सिर्फ़ 11 लोगों को ही लिया गया और शेष 4 सीट को वैकेंट छोड़ दिया गया मुमकिन है पैसे नहीं देने के कारण हुआ हो या फिर राजनितिक हस्तक्षेप के कारण मेरे सपने टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर गए जब-जब 'बी.इ.टी.' का प्रमाणपत्र और पॉलिटेक्निक का कॉल लेटर देखती हूँ, तो मन के किसी कोने में ऐसा कुछ दरकता है, जिसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता; लेकिन वह कसक मुझे चैन से सोने नहीं देती है।   
ओ मेरे बाबा!   
तुम हो गए स्वप्न   
छोड़ जो गए 

यूँ तो मेरी ज़िन्दगी में बहुत सारी कमियाँ रह गईं, जिनकी टीस मन से कभी गई नहीं पिता की मृत्यु के बाद उनके मृत शरीर का अन्तिम दर्शन और अन्तिम स्पर्श नहीं कर पाई, यह कसक आजीवन रहेगी जीवन में एक बहुत बड़ा पछतावा यह भी है कि समय-समय पर मैंने ठोस क़दम क्यों न उठाया वक़्त के साथ कुछ सपने ऐसे थे, जिसे मैं पाना चाहती थी; परन्तु उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरे जीवन में हार और ख़ुद को खोने का सिलसिला शुरू हो गया। आज जब पाती हूँ कि जीवन में सब तरफ़ से हार चुकी हूँ और असफलता से घिर चुकी हूँ, तो अपनी हर मात और कसक मुझे चैन से सोने नहीं देती है पिता नास्तिक थे मैं भी हूँ, पर अब क़िस्मत जैसी चीज़ में खुद को खोने और खोजने लगी हूँ। नदी के प्रवाह में कभी बह न सकी, अपनी पीड़ा किसी से कह न सकी।

रिसता लहू   
चाक-चाक ज़िन्दगी   
चुपचाप मैं।

-जेन्नी शबनम (29.6.2019)
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Thursday, November 5, 2020

81. राम चन्द्र वर्मा 'साहिल' जी द्वारा 'लम्हों का सफ़र' की समीक्षा


 साहिल जी और मैं 
आदरणीय श्री राम चन्द्र वर्मा 'साहिल', सम्मानित कवि, ग़ज़लकार तथा महानगर टेलीफ़ोन निगम लिमिटेड से अवकाश प्राप्त अधिकारी, ने मेरी पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' की बहुत सुन्दर और सार्थक समीक्षा की है। उन्होंने इस पुस्तक को दो बार पढ़ा है, इसका कारण वे ख़ुद बता रहे हैं। मैं हृदय तल से कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने मेरी रचनाओं को तथा मुझे इतना मान दिया है। साहिल जी का स्नेह और आशीष सदा मुझे मिलता रहे यही कामना है। साहिल जी को आभार के साथ, उनके द्वारा की गई समीक्षा प्रस्तुत कर रही हूँ।  
 
साहिल जी और मैं
'लम्हों का सफ़र' की समीक्षा 

देर-आयद, दुरुस्त-आयद - इस लोकोक्ति का अर्थ प्रायः यह लिया जाता है कि देर से तो आए, चलो आए तो सही। परन्तु मैं मज़ाक के तौर पर इसका अर्थ ऐसे करता हूँ कि जो भी देर से आया या जो कार्य देर से किया गया, वही दुरुस्त है। ऐसा इसलिए भी कह रहा हूँ कि जिस कविता-संग्रह (लम्हों का सफ़र) का मैं यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ, डॉ. जेन्नी शबनम का यह संग्रह मुझे बहुत समय पहले मिला था। पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इसके विषय में मुझे जो भी लिखना था, शायद मैं लिखकर शबनम जी के पास भेज चुका हूँ। परन्तु यह मेरी चूक थी, ऐसा हुआ नहीं था; यह बहुत बाद में मुझे आभास हुआ। इस चूक के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ।
 
इस संग्रह की प्रायः सभी रचनाएँ मैं पढ़ चुका था। अब क्योंकि समय बहुत बीत गया, रचनाएँ फिर से पढ़ीं। हर रचना के अवलोकन पर ऐसा लगा जैसे किसी अलग ही दुनिया में पहुँच गया हूँ। हर रचना अपने आप में अनूठी तथा अपने अंदर बहुत कुछ समेटे हुए लगी। कुछ रचनाओं का उल्लेख बहुत ही आवश्यक लग रहा है, जैसे- 
 
पहली कविता 'जा तुझे इश्क़ हो', इसका शीर्षक ही ऐसा दिया गया है जो कुछ सोचने पर विवश कर देता है। जैसे यह प्यार में बहुत गहरी चोट खाए किसी प्रेमी के दिल से निकली आह हो। और जो कुछ उसने भुगता है वह चाहता है कि सामने वाला भी इसे भुगते। इसकी ये पंक्तियाँ देखिए- 
''तुम्हें आँसू नहीं पसंद / चाहे मेरी आँखों के हों / या किसी और के / चाहते हो हँसती ही रहूँ / भले ही वेदना से मन भरा हो / ... कैसे इतने सहज होते हो / फ़िक्रमंद भी हो और / बिंदास हँसते भी रहते हो।''

'पगडंडी और आकाश', इसके भी अंश देखिएगा-
''पगडंडी पर तुम चल न सकोगे / उस पर पाँव-पाँव चलना होता है / और तुमने सिर्फ़ उड़ना जाना है।...
मैं सीख लूँगी / हथेली पर आसमान को उतारना / तुम अपनी माटी को जान लेना / और मैं उस माटी से बसा लूँगी एक नयी दुनिया / जहाँ पगडंडी और आकाश / कहीं दूर जाकर मिल जाते हों।''

'बाबा आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है', इस रचना में बिटिया की अंतर्वेदना को स्वयं महसूस कीजिए- 
''क्यों चले गए, तुम छोड़ के बाबा / देखो बाप बिन बेटी, कैसे जीती है / बूँद आँसू न बहे, तुमने इतने जतन से पाले थे / देखो आज अपनी बिटिया को, अपने आँसू पीती है।''

'वो अमरूद का पेड़', जहाँ लेखिका कदाचित स्वयं को खोज रही है-
''वह लड़की, खो गई है कहीं / बचपन भी गुम हो गया था कभी / उम्र से बहुत पहले, वक़्त ने उसे / बड़ा बना दिया था कभी / कहीं कोई निशानी नहीं उसकी / अब कहाँ ढूँढूँ उस नन्ही लड़की को?''

'इकन्नी-दुअन्नी और मैं चलन में नहीं', इस रचना में समय का बदलता रूप और उससे उपजी मानव-विवशताओं को शबनम जी ने किस प्रकार उकेरा है-
''वो गुल्लक फोड़ दी / जिसमें एक पैसे दो पैसे, मैं भरती थी / तीन पैसे और पाँच पैसे भी थे, थोड़े उसमें /... सोचती थी, ख़ूब सारे सपने खरीदूँगी इससे / इत्ते ढेर सारे पैसों में, तो ढेरों सपने मिल जाएँगे /...
अब क्या करूँ इन पैसों का?''

'उठो अभिमन्यु', इस कविता में कवयित्री ने अभिमन्यु के वीर-गति  प्राप्त हो जाने पर गर्भवती अभिमन्यु-पत्नी 'उत्तरा' गर्भ में पल रहे शिशु को कैसी उत्साहवर्द्धक प्रेरणा दे रही है, इसका मार्मिक वर्णन इस पद्यांश में देखिए- 
''क्यों चाहते हो, सम्पूर्ण ज्ञान गर्भ में पा जाओ / क्या देखा नहीं, अर्जुन-सुभद्रा के अभिमन्यु का हश्र / छः द्वार तो भेद लिए, लेकिन अंतिम सातवाँ / वही मृत्यु का कारण बना / या फिर सुभद्रा की लापरवाह नींद / नहीं-नहीं, मैं कोई ज्ञान नहीं दूँगी / न किसी से सुनकर, तुम्हें बताऊँगी / तुम चक्रव्यूह रचना सीखो / स्वयं ही भेदना और निकलना सीख जाओगे।''

'नन्ही भिखारिन' में शबनम जी का संवेदनशील हृदय नन्ही भिखारिन से बात करते कैसे पीड़ा से रिसता है, देखिए- 
यह उसका दर्द है / पर मेरे बदन में क्यों रिसता है? / या ख़ुदा! नन्ही-सी जान, कौन सा गुनाह था उसका? / शब्दों में ख़ामोशी, आँखों में याचना, पर शर्म नहीं / हर एक के सामने, हाथ पसारती।''

'हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी बेकार है पड़ी', ज़िन्दगी का क्या चित्रण किया गया है इस रचना में; कुछ पंक्तियाँ देखते चलें- 
हँसी बेकार पड़ी है, यूँ ही कोने में कहीं / ख़ुशी ग़मगीन रखी है, ज़ीने में कहीं / ज़िंदगी गुमसुम खड़ी है, अँगने में कहीं / अपने इस्तेमाल की आस लगाए / ठिठके सहमे से हैं सभी।'' 

इसी प्रकार कई चुनिन्दा कविताएँ हैं, जिन्होंने मुझे उद्वेलित किया है। मैं चाहता तो हूँ सभी का थोड़ा-थोड़ा उल्लेख करना, परन्तु डर है कि कहीं ऐसा किया तो मेरी बात बहुत ही लम्बी हो जाएगी जो कि उचित नहीं होगी। हक़ तो शबनम जी का बनता है कि मैं ऐसा करूँ, परन्तु नहीं। मुझे लगता है, विद्वान लेखकों ने भी, जिन्होंने इस पुस्तक की भूमिका लिखी है; इसी तरह न चाहते हुए भी आगे लिखने से अपने हाथ खींच लिए होंगे और उन्हें भी ऐसे ही अफ़सोस हुआ होगा जैसा मुझे हो रहा है। 

अंत में डॉ. शबनम जी की दीर्घायु एवं अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए अपनी बात को, न चाहते हुए भी, यहीं समेटता हूँ।
 
राम चन्द्र वर्मा 'साहिल'
131- न्यू सूर्य किरण अपार्टमेंट्स
दिल्ली-110092
मोबाइल- 9968414848 
तिथि- 2.11.2020
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