Wednesday, April 1, 2026

134. साझा संसार (गद्य-विविधा) का लोकार्पण


दिनांक 29 मार्च 2026 को 'पेड़ों की छाँव तले फाउण्डेशन' के तहत प्रथम एन सी आर लिटरेरी फ़ेस्टिवल, 2026 का आयोजन ग़ाज़ियाबाद के शम्भू दयाल पी. जी. कॉलेज में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन एवं संचालन श्री अवधेश सिंह एवं सुश्री अनिता सिंह ने किया। सह संयोजक का कार्य डॉ. पूनम सिंह, श्री रघुवीर शर्मा एवं श्री ठाकुर प्रसाद चौबे ने किया। 
कार्यक्रम में सर्वप्रथम मेरी 7वीं पुस्तक 'साझा संसार' (गद्य-विविधा) का लोकार्पण श्री ब्रज किशोर वर्मा 'शैदी', प्रो. डॉ. राजीव रंजन गिरि, डॉ. आरती स्मित, श्री रविन्द्र कांत त्यागी, श्री सुरेंद्र अरोड़ा एवं श्री अवधेश सिंह के हाथों सम्पन्न हुआ। लोकार्पण के बाद श्री ब्रज किशोर 'शैदी', प्रो. डॉ. राजीव रंजन गिरि एवं डॉ. आरती स्मित ने पुस्तक पर वक्तव्य दिए। मेरी पुस्तक के विमोचन के बाद अन्य दो पुस्तकों का विमोचन हुआ। 
विख्यात साहित्यकारों में सुश्री ममता कालिया, श्री दिविक रमेश, श्री महेश दिवाकर, श्री वीरेन्द्र सिंह आस्तिक, श्री अशोक मिश्रा, श्री कमलेश भट्ट कमल, श्री अनिल जोशी उपस्थित रहे। कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. रोचन मित्तल जी भी मंच पर उपस्थित रहीं। इन सभी वरिष्ठ साहित्यकारों के द्वारा 'पेड़ों की छाँव तले... एक दशकीय कविता विमर्श' पुस्तक का लोकार्पण हुआ जिसका सम्पादन अवधेश सिंह जी ने किया है। इस पुस्तक में 72 कवियों की रचनाएँ शामिल हैं जिनमें मेरी भी रचनाएँ हैं। इस अवसर पर कवयित्री एवं गायिका सुश्री अनुपमा त्रिपाठी ने सरस्वती वन्दना का गायन किया। 

इस अवसर पर श्री बलराम अग्रवाल, अनिल पाराशर 'मासूम', सुश्री शानू पाराशर, श्री संजय श्रीवास्तव, सुश्री रश्मि लहर, सुश्री मधु वार्ष्णेय, मेरी पुत्री सुश्री परान्तिका दीक्षा एवं अनेक मित्रों की उपस्थिति रही। 

ममता कालिया जी से मिलना और बातें करना मेरे लिए स्मरणीय और सौभाग्यपूर्ण रहा। वरिष्ठ साहित्यकारों का सानिध्य एवं मेरी पुस्तक को इस आयोजन में अपना मंच देने के लिए अवधेश जी का बहुत-बहुत आभार। 

कार्यक्रम के बाद श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' एवं सुश्री बीरबाला काम्बोज से उनके नोएडा स्थित आवास पर मिलकर मैंने आशीर्वाद लिया। कम्बोज भैया का मेरी लेखनी और पुस्तकों के प्रकाशन में सदैव योगदान रहा है। 
 
मेरी इस पुस्तक की भूमिका श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'  एवं प्रो. डॉ. राजीव रंजन गिरी ने लिखी है। इस पुस्तक को मैंने अपने पिता, माँ एवं दादी को समर्पित किया है। इन तीनों के कारण मैं हूँ और मेरे कारण मेरा साझा संसार। 

-जेन्नी शबनम (31.3.2026)
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Thursday, February 26, 2026

133. लंदन की रोमांचक यात्राएँ

जीवन एक यात्रा है। चाहे-अनचाहे हम जीवनभर यात्रा करते हैं। चाहे छोटी पगडंडियों पर पाँव-पाँव चलकर किसी सुन्दर स्थान पर जाएँ या बड़ी सवारी द्वारा लम्बी यात्रा कर मनचाहे स्थान पर जाएँ। चाहकर की जाने वाली सभी यात्राएँ मन को सुकून देती हैं तथा नए-नए रोमांचक अनुभव कराती हैं। इन यात्राओं में हम अपने नियमित जीवन के कार्यों से राहत पाकर प्रफुल्लित होते हैं तथा एक नई ऊर्जा के साथ आगे की जीवन-यात्रा करते हैं।  


नए-नए स्थान की यात्रा का आनन्द ही अलग होता है, भले वहाँ की यात्रा हमने कई बार की हो। मेरी अनेक यात्राओं में कई यात्राएँ लंदन की हैं। हालाँकि विदेश यात्रा का यह तीसरा अनुभव है। मेरी पहली यात्रा बहुत बचपन में नेपाल की थी। दूसरी यात्रा सिंगापुर की 30 दिसम्बर 2000 और वापसी 3 जनवरी 2001 की है, जब मेरे दोनों बच्चे छोटे थे। सिंगापुर में नए वर्ष का अनुभव बहुत यादगार रहा। लंदन की मेरी पहली यात्रा वर्ष 2003 तथा अन्तिम यात्रा वर्ष 2018 में की। हर बार लंदन जाना मुझे अच्छा लगता रहा; लेकिन पहली बार जाने का उत्साह बहुत अधिक था। लंदन जाना मुझे रोमांचित कर रहा था; क्योंकि विलायत की बातें बचपन से सुनती-पढ़ती आ रही हूँ। वह देश जिसने पृथ्वी के एक चौथाई हिस्से पर राज किया और हमारे देश पर लगभग 200 वर्ष तक शासन किया, वह देश कैसा है, यह देखने और जानने की उत्कंठा थी। इस यात्रा से मुझे लंदन के लोग, संस्कृति, समाज, प्रकृति, मौसम, मकान, रहन-सहन, सामान्य जन-जीवन इत्यादि को समीप से जानने और देखने का अवसर मिला। 
वर्ष 2003 के 6 जून को एयर इंडिया की विमान से लंदन जाना और 16 जून को वापस आना निश्चित हुआ। रात 11 बजे हमलोग दिल्ली के इन्दिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँचे और सारी प्रक्रिया के बाद उड़ान की प्रतीक्षा में एक जगह बैठ गए, जो सुबह लगभग तीन या चार बजे की थी। उस समय मेरा बेटा नौ वर्ष और बेटी तीन वर्ष की थी। बेटी मेरी गोद में सो गई और नींद तोड़कर बैठा बेटा भी मेरी गोद में सिर टिकाकर सो गया। अंततः प्रतीक्षा समाप्त हुई और हमलोग विमान में बैठ गए। हमारा टिकट सामान्य वर्ग का था। कुर्सी काफ़ी सटी हुई थी, जिससे पाँव पसारने में कठिनाई हो रही थी। इतनी लम्बी यात्रा बैठकर करनी है, यह सोचकर मन घबरा रहा था। हमें कम्बल इत्यादि मिल गया। हेडफ़ोन भी मिला, जिससे हमलोग यात्रा में मनोरंजन कर सकें। 

मुझे डायबिटीज है, तो हर खाने से पहले इंसुलिन लेना होता था। विमान में जब पहला खाना मिलना शुरू हुआ, तो मैंने इन्सुलिन ले लिया। खाना आया तो मैंने अपने और बेटी के लिए शाकाहारी खाना माँगा। पति और बेटा मांसाहारी हैं, तो उन्हें कोई समस्या नहीं थी। खाना में समोसा था। एक ट्रे में शाकाहारी और मांसाहारी समोसे अलग-अलग रखे थे; किन्तु परोसने के लिए एक ही चिमटा था। उसी चिमटे से वे मांसाहारी को समोसे देकर मुझे देने लगे। मैंने नहीं लिया। बेटी को उन्होंने कुछ चॉकलेट दिया। चूँकि इन्सुलिन लिया था मैंने और खाना शुद्ध नहीं था, तो बिस्किट खाकर किसी तरह समय गुज़ारा। फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे पर कुछ घंटे रुककर दूसरी उड़ान भरनी थी। फ्रैंकफर्ट के हवाई अड्डे के शौचालय में पानी नहीं था। हम भारतीय टिश्यू पेपर वाले तो हैं नहीं। जुगाड़ कर हम सभी दैनिक क्रियाओं से निपटे। मेरा तो सारा उत्साह भूख से ख़त्म हो रहा था। इन्सुलिन लेने के कारण तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। मैं और मेरी बेटी कुछ बिस्किट और चॉकलेट खाकर थके हुए लंदन पहुँचे।
लंदन के केन्सिंगटन में ली मेरीडियन होटल में हमारी बुकिंग थी। होटल का कमरा इतना छोटा था कि दस दिन बिताना कठिन लगा। एक रात रहकर हमलोग समीप के होटल हॉलीडे इन में चले गए। बहुत अच्छा कमरा था; परन्तु दो दिन बिजली की कुछ समस्या रही। होटलवालों ने क्षमा माँगी और बहुत बड़े कमरे में हमें स्थानांतरित कर दिया। उन्होंने पुराने कमरे के अनुसार किराया लिया और दो दिन का किराया वापस लौटाया। होटल में वैसे तो कई शाकाहारी व्यंजन थे, पर मैं और बेटी खाते नहीं थे। हम दोनों के खाने लायक पावरोटी, मक्खन, जैम, हैश ब्राउन, आलू का बिल्कुल सादा कटलेट, फल और जूस था। दलिया कहकर बेटी को कॉर्नफ्लेक्स खिलाया, पर उसने नहीं खाया। खाने के प्लेट, ग्लास और कटोरी से मुझे सदैव मांसाहार की दुर्गन्ध आती थी। दस दिन तक हम माँ-बेटी ब्रेड और केला खाकर दिन बिताया करते। जिस किसी रेस्तराँ में जाती, तो मांसाहार की दुर्गन्ध के कारण मुझसे कुछ खाया नहीं जाता था। कुछ बांग्लादेशी रेस्तराँ मिले, जहाँ भात, दाल व तरकारी मिला और मैं नाक बंदकर रात का खाना खाती थी। लंदन में हमारे एक नज़दीकी अंकल का पुत्र डॉ. सोमेश्वर सिंह सपरिवार रहते थे। अंकल-आंटी भी उन दिनों वहीं थे। आंटी को पता है मेरे खाने की समस्या, तो उन्होंने घर बुलाकर भात, दाल और तरकारी खिलाया। मुझे यों लगा मानो सालों बाद मैंने भरपेट खाना खाया हो।  
लंदन में हर जगह सड़क किनारे लाल रंग का टेलीफ़ोन बूथ था, जिस पर अश्लील तस्वीरें चिपकी थीं। जब भी टेलीफ़ोन बूथ दिखता, तो मेरी बेटी अपने एक चाचा का नाम लेकर कहती कि उसको फ़ोन करो, वह गाड़ी से आकर हमको ले जाएगा, हम नहीं रहेंगे यहाँ। मैं उसे समझाती कि यहाँ न चाचा आ सकता है न गाड़ी, हम दूसरे देश में हैं। वह दूसरे देश का न मतलब समझती थी न गाड़ी के यहाँ न आने का कारण। वह किसी भी गाड़ी को दिखाकर कहती कि वह देखो गाड़ी चल रही है, फ़ोन करो चाचा आकर ले जाए। उसे वहाँ ज़रा भी अच्छा नहीं लग रहा था। 
एक दिन थककर हमलोग जल्दी होटल लौट आए और सो गए। लगभग रात के दस बजे हमारी नींद खुली, तो देखा कि बाहर दिन है। मुझे लगा कि घड़ी ख़राब हो गई है; परन्तु घड़ी सही थी। जबकि लंदन के समय के अनुसार हमने घड़ी को मिला लिया था। लंदन में दिन का उजियारा बहुत रात तक रहता है। यहाँ का मौसम बहुत सुहाना है। हवा बहुत स्वच्छ है। सड़क पर कहीं गन्दगी नहीं दिखती, पेड़ के पत्ते और सिगरेट बट हर जगह देखने को मिले। मेट्रो जिसे ट्यूब कहते हैं, में अत्यंत भीड़ होती है, पर कोई किसी से सटता नहीं, एक निश्चित दूरी बनाकर सभी रखते हैं। यहाँ के लोग काफ़ी मददगार दिखे। मेरे पास भारी सूटकेस था, तो कोई अंग्रेज़ मुस्कुराकर उसे उठाकर सीढ़ी के ऊपर या नीचे रख देता था। यह मेरे साथ कई बार हुआ। यहाँ के अधिकांश लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं, जैसे ट्रैन, बस, मेट्रो। गाड़ियों की रफ़्तार अमूमन बहुत तेज़ होती है। जाम की समस्या नहीं दिखी। सड़क पर ट्रैफिक पुलिस दिखती नहीं है; लेकिन कुछ समस्या होने पर अचानक आ जाती है। सड़क पार करने के लिए हर ज़ेब्रा क्रासिंग पर बटन लगा हुआ है। अगर कोई व्यक्ति गुज़र रहा है और हरी बत्ती जल गई, फिर भी गाड़ी रुकी रहती है, जब तक वह सड़क पार न कर ले। बेवजह का हॉर्न कोई नहीं बजाता। लंदन में जहाँ भी मैं गई, कहीं भी बिजली का तार बाहर नहीं दिखा, हर जगह भूमिगत था। यहाँ का हर नागरिक अपने देश के कानून और नियमों का पालन स्वेच्छा से करता है; अपवाद तो हर जगह है। यहाँ के मकान जिसे रो हाउस कहते हैं, मुझे बहुत अच्छे लगे। 
 
मेरा बेटा लंदन घूमने के लिए अत्यंत उत्साहित था। वह बहुत समझदार है, उसने हर घूमने की जगह का पता कर लिया था। हम लोग एक दिन हॉप-ऑन हॉप-ऑफ़ बस से लंदन घूमे। लैम्बेथ रोड में इम्पीरियल वॉर म्यूजियम घूमने गए। म्यूजियम के बाहर पार्क में प्रेमियों की जोड़ियों को आलिंगनबद्ध देख आँखें झुकाकर हम बाहर आए। जोड़ियों का इस तरह आलिंगनबद्ध दिखना यहाँ आम बात है। हमलोग विंडसर कैसल घूमने गए, जहाँ ब्रिटेन की महारानी रहती हैं। ब्रिटिश राजशाही का आधिकारिक निवास और प्रशासनिक मुख्यालय बकिंघम पैलेस को देखा। वहाँ हर सप्ताह के कुछ निश्चित दिन में गार्ड बदलने का रोचक समारोह होता है। जिस दिन हमलोग वहाँ गए, उस दिन समारोह नहीं होना था, इसलिए दुःख हो रहा था; क्योंकि उन दिनों यहाँ दुबारा आने का हम सोच भी नहीं सकते थे। बाद की किसी यात्रा में हमने वह समारोह देखा। एक बार ठण्ड के मौसम में हम लंदन गए ताकि बर्फ़ गिरते हुए देखें। रात में बर्फ़ गिरी, पर बहुत कम।  
लंदन से ट्रेन लेकर हमलोग स्ट्रैटफोर्ड गए, जहाँ शेक्सपियर का घर है। मैंने बी.ए. में शेक्सपियर को पढ़ा है, तो उनके घर को देखने का बहुत उत्साह और रोमांच था। हमलोग ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी घूमे। टैफलगर स्क्वायर, बिग बेन, लंदन आई, सी लाइफ एक्वेरियम, थेम्स नदी में क्रूज़ की सवारी, ब्रिटिश म्यूजियम इत्यादि घूमे और ख़ूब सारी तस्वीरें लीं। 'लंदन आई' के पास 'द लंदन डंजन' है जहाँ लंदन के इतिहास की भयानक घटनाओं को अत्यंत डरावने और मनोरंजक ढंग से दिखाया जाता है। हमलोग टिकट लेकर प्रवेश द्वार पर आए, तो वहाँ दो लोग ब्रिटिश सैनिक के रूप में खड़े थे, जिनका चेहरा क्रूर और शरीर कटा हुआ, जिससे रक्त बह रहा था। हालाँकि ये रूप उन्होंने धारण किया था, पर वे बेहद डरावने लग रहे थे। पंक्तिबद्ध होकर जैसे हम वहाँ पहुँचे कि उन्होंने ज़ोर से तलवार चलाकर डराया, जिससे मेरी बेटी भय से रोने लगी और बेटा ज़ोर से मुझे पकड़ लिया। बच्चे इतने डर गए कि हमलोग भीतर नहीं गए। बाद की किसी यात्रा में जब बच्चे बड़े हुए तब हमने इसे देखा।    
वेस्टमिंस्टर में हाइड पार्क घूमना बहुत मनोरम लगा। यह बहुत हरा-भरा है। यहाँ झील, उद्यान, मूर्तियाँ, स्मारक, फव्वारे तथा सुन्दर प्राकृतिक और मनोरम दृश्य है। यहाँ घूमने में तीन-चार घंटे लग जाते हैं। बाद की यात्रा में मेरे दोनों बच्चे यहाँ ख़ूब साइकिल चलाते थे। मुझे डर लगता था कि पार्क है, किसी से टकरा गए तो समस्या न हो जाए। परन्तु दोनों बहुत अच्छी तरह साइकिल चलाते हैं। वहाँ बच्चे और बड़े भी साइकिल चला रहे थे। काफ़ी लोग धूप का आनन्द लेने के लिए ज़मीन पर लेटे हुए थे। कुछ खाया तो डस्टबिन में ही कचरा फेंकते हैं। यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी नियमों का पालन बिना बताए करते हैं।  
मैरीलेबोन रोड स्थित वैक्स म्यूजियम 'मैडम तुसाद' की स्थापना फ्रांसीसी मोम मूर्तिकार मैरी तुसाद ने की थी। यहाँ कई देशों के ऐतिहासिक हस्तियों के असली दिखने वाले मोम के पुतले बने हैं। ये इतने जीवन्त लगते हैं, मानो अभी बोल पड़ेंगे। यहाँ मोम के पुतलों द्वारा इतिहास की गाथाएँ दिखाई गई हैं। यहाँ चैम्बर ऑफ़ हॉरर्स है, जिसमें कुख़्यात हत्यारों के पुतले बने हैं, जो अत्यंत डरावने लगते हैं। यहाँ शाही हस्तियाँ, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, फ़िल्मी कलाकार, राजनेता, हत्यारे इत्यादि के पुतले हैं। मैडम तुसाद में किसी अच्छी शख़्सियत का शामिल होना सम्मान की बात है। यहाँ महात्मा गांधी के पुतले को देखकर मन रोमांचित हो गया। जिन्हें हम सच में नहीं देख सकते, यों लगा मानो उन सभी को सच में देख रहे हैं।  
मसूरी में वर्ष 1870 में अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित और रेल विभाग द्वारा संचालित ओक ग्रोव स्कूल है। जब अंग्रेज़ी शासन था, तब यहाँ अंग्रज़ों के बच्चे पढ़ते थे। मेरे पति इस स्कूल से पढ़े हैं। मेरे पति के लिए उनके जीवन में सबसे पहला स्थान उनका स्कूल है। वर्ष 2003 में मेरे बेटे और वर्ष 2011 में मेरी बेटी ने कुछ समय यहाँ रहकर पढ़ाई की है। उन दिनों ओक ग्रोव स्कूल जाना हमारा हर महीने की गतिविधियों में शामिल था। इस स्कूल से पढ़े कुछ अंग्रेज़ों का पता मेरे पति को मिला, जिनसे उन्होंने सम्पर्क किया। लन्दन में हमसे मिलने 75-80 वर्षीय दो स्त्री और दो पुरुष अंग्रेज़ ओकग्रोवियन आए। चूँकि वे पहली बार मिल रहे थे, तो उन्होंने मुझे पाउण्ड दिए; जैसे हमारे यहाँ मुँह-दिखाई में देते हैं। मेरे मना करने पर उन्होंने कहा कि यह भारत का रिवाज है, इसलिए मैंने हँसकर ले लिया। चूँकि उनका जन्म और शिक्षा भारत में हुई, इसलिए वे यहाँ की परम्परा जानते थे और निभा रहे थे। हालाँकि वे हिन्दी नहीं बोल पाते थे, पर नमस्ते जैसे एक-दो शब्द बोल लेते थे।  
लंदन में मुझे एक बेहद रहस्यमय और डरावना अनुभव हुआ। मुझे वॉशरूम जाना था, तो समीप के एक बार में जाकर बाथरूम पूछा, उसने मुझे बेसमेंट में जाने के लिए कहा। वहाँ गई तो देखा कि एक युवती के चेहरे व हाथ पर ढेरों खरोंचे थीं, जिससे लगातार लहू टपक रहा था। वह टिश्यू पेपर से लगातार पोंछ रही थी। वह घायल थी, तो मुझे लगा कि मुझे उसकी मदद करनी चाहिए। मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ, क्या कोई मदद करूँ। वह मुझे घूरते हुए देखने लगी और कहा कि तुम अपने काम से मतलब रखो, तुम्हें क्या करना है जानकर, मुझे कोई मदद नहीं चाहिए। मुझे बड़ा अजीब लगा कि वह खून से लथपथ है और ऐसे कह रही है मानो वह कोई भूतनी हो, जिसे दर्द नहीं हो रहा हो। मैं जल्दी भागकर बाहर आई। मुझे लगा जैसे मैंने मॉडर्न कपड़े पहने किसी रहस्यमी आत्मा या ख़ूनी भूतनी को देख लिया हो। उसका लहूलुहान चेहरा मैं कई दिनों तक भूल नहीं पाई। मेरे पति ने कहा कि यहाँ ऐसे अनजान से बात मत करो, पराया देश है, कुछ भी झंझट हो गया तो मुश्किल होगी।
ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट से हमने ख़ूब सारी ख़रीददारी की। हम जहाँ-जहाँ घूमने गए वहाँ से यादगार के रूप में कुछ-न-कुछ ज़रूर ख़रीदते थे। कपड़े, कप, खिलौने, सूटकेस, बैग, छाता, नेलकटर, की-रिंग, सभी रिश्तेदारों के लिए परफ्यूम इत्यादि ख़रीदे। भारत वापसी के दिन हमलोग हवाई अड्डे के पास किसी होटल में चले गए; क्योंकि बहुत सुबह की उड़ान लेनी थी और हॉलिडे इन से हवाई अड्डा जाने में समय लगता, जाने टैक्सी मिले न मिले। हम समय पर हीथ्रो हवाई अड्डा पहुँचे। वापसी में खाने की समस्या नहीं हुई; क्योंकि वेज-नॉनवेज का पैकेट बना हुआ था। मैंने घर में पहले से कह रखा था कि लौटने पर भात, दाल, तरकारी और आलू का चोखा बनाकर रखना है। लंदन की यह पहली यात्रा खाना के अलावा सुखद रही और हमलोगों ने लंदन को दस दिनों में भरपूर देखा। जो स्थान न जा सकी, उसका दुःख तो था; परन्तु यह कम नहीं था कि विलायत की उस धरती को मैंने देखा, जिसे देखने की लाखों लोगों की कल्पना होती है।  
लंदन की दूसरी यात्रा हमने वर्ष 2013 में की। जून में मेरे सास-ससुर की शादी की 50वीं वर्षगाँठ थी, जो भागलपुर में मनाया गया। उसी समारोह के विस्तार के रूप में हमलोग लंदन गए। हमारे साथ मेरे सास-ससुर, पति की एक स्टाफ व उनका बेटा गए। मेरी मम्मी के भी साथ जाने की बात थी; परन्तु मेरे ससुरालवालों के साथ मम्मी का जाना मुझे और मेरी माँ को उचित नहीं लगा; क्योंकि आपसी सम्बन्ध कभी भी अच्छे नहीं रहे; हालाँकि मेरे पति ने साथ चलने की ज़िद की थी। वैसे मेरी मम्मी को मेरे भाई ने दो बार अमेरिका घुमाया; परन्तु मम्मी को लन्दन जाने की बहुत इच्छा थी। बाद में वे बीमार हो गईं, इसलिए विलायत जाने की कामना अधूरी रह गई। मैं इतनी बार लंदन गई; परन्तु एक बार भी मम्मी को नहीं ले जा, इसका दुःख मुझे जीवनभर रहेगा।    

इस बार हम अपने साथ ख़ूब सारा खाना लेकर गए, जो ले जाना प्रतिबन्धित नहीं था; क्योंकि वहाँ का खाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। ग्लूसेस्टर रोड में रेडिसन ब्लू में हमलोग ठहरे। समीप ही बॉम्बे ब्रेसर्स नामक रेस्तराँ मिल गया, जहाँ बहुत अच्छा खाना मिलता है। इस बार अन्य कई रेस्तराँ भी मिले, जहाँ अच्छा खाना मिला। अधिकतर स्थान मैं पहली यात्रा में घूम चुकी थी, फिर भी सबके साथ घूमी और पुरानी यादें ताज़ा की। लंदन में भारत का दूतावास, जिसे 'इंडिया हाउस' कहते हैं, में मेरे पति के एक मित्र शैलेन्द्र जी कार्यरत थे, जिनके साथ हमलोग इंडिया हाउस घूमे। लंदन में मेरी एक साहित्यिक मित्र शिखा वार्ष्णेय जी रहती हैं। उनसे मिलने हमलोग उनके घर गए। उन्होंने हमें भारतीय खाना खिलाया। मेरे विवाह की वर्षगाँठ 21 जून को है, तो मेरे पति ने मेरे लिए सोने और हीरे की अँगूठी मुझे तोहफ़े में दी। मेरे बेटे का जन्मदिन 22 जून को है। बॉम्बे ब्रेसर्स में हमने पार्टी रखी, जिसमें शिखा जी सपरिवार आईं और मेरी बेटी की ओक ग्रोव स्कूल की एक मित्र स्वर्णिमा उपाध्याय आई, जो लंदन में फ़िल्म स्टडी की पढ़ाई कर रही थी। 
 
वर्ष 2014 में हमलोग चार बार लंदन गए। वर्ष 2015 में भी कई बार लंदन गए। अब हमारा टिकट बिज़नेस क्लास का लिया जाने लगा था। अब मैं जैन भोजन की बुकिंग करवाती थी, ताकि शुद्ध शाकाहारी भोजन मिले। यहाँ खाना अच्छे से परोस कर देते हैं, जितनी मर्ज़ी खाएँ-पिएँ। जितनी चाहे जूस या मदिरा पिएँ। आरामदायक कुर्सी से बहुत अच्छा बिछवान बन जाता है, जिस पर पाँव पसार कर सो सकते हैं। बाहर का नज़ारा कुछ नहीं दिखता, जिस ऊँचाई पर जहाज है वह बादलों से बहुत ऊपर है। यह हम पर है कि कुछ पढ़ें, हैडफ़ोन लगाकर मनोरंजन करें; परन्तु शोर नहीं कर सकते; क्योंकि लोग आँखों पर पट्टी लगाकर सो रहे होते हैं। एक बार लंदन की एक यात्रा से हमलोग की वापसी उस दिन की थी जिस दिन मेरी वैवाहिक वर्षगाँठ थी। जब विमान-कर्मचारियों को पता चला, तो उन्होंने वाइन की बोतल और ढेर सारे चॉकलेट हमें तोहफ़े में दिए।  
 
हमलोग लंदन में कोवेंट गार्डन, यूस्टन स्क्वायर, लीसेस्टर स्क्वायर के रेडिसन ब्लू, ग्लूसेस्टर के मिलेनियम होटल, हॉलिडे इन एक्सप्रेस इत्यादि में रुकते थे। एक बार ट्रेन द्वारा हमलोग स्कॉटलैंड गए, जहाँ एडिनबर्ग में रुके और विमान से लंदन लौटे। होम्योपैथ के डॉ. दिलजीत फुल जो मेरे पति के मित्र थे, भारतीय दूतावास में होम्योपैथी के डॉक्टर थे। लंदन के कार्ने, वुड लेन, आइवर, स्लो में वे सपरिवार रहते थे। जब भी हमलोग जाते, वे एयरपोर्ट पर हमें लेने आते। होटल बुक करते और मेरे लिए अक्सर अपने घर से खाना लेकर आते। कभी-कभी आकर अपने घर ले जाते ताकि हमलोग ठीक से खा सकें। वे हर बार अलग-अलग रेस्तराँ ले जाते, जहाँ अच्छा खाना मिलता है। डॉ. फुल के साथ हमलोग श्री वीरेन्द्र शर्मा जी के घर गए। वे लेबर पार्टी से एमपी थे। इतने सरल और सहज नेता से मैं पहली बार मिली थी। हमारे यहाँ तो छोटा नेता भी पूरे घमण्ड में रहता है। इस दौरान लंदन का पार्लियामेंट जो वेस्टमिन्स्टर में है, घूमे और वहाँ के मेस में खाने का हमें अवसर मिला। डॉ. फुल ने साउथ हॉल जिसे 'लिटिल इंडिया' कहते हैं, घुमाया और वहाँ खिलाया। साउथ हॉल में जाकर ऐसा लगा जैसे भारत आ गए हों, बस मकान की रूपरेखा और मौसम अलग है।  

15 अगस्त 2014 को हमलोग लंदन में थे। यहाँ न समोसा मिलता है न जलेबी। डॉ. फुल किसी शाकाहारी भारतीय रेस्तराँ में ले गए और हमने स्वतंत्रता दिवस मनाया। कोवेंट्री में मेरे एक ग़ज़लकार-कहानीकार मित्र प्राण शर्मा जी रहते थे। उनका आग्रह था कि मैं मिलने आऊँ; परन्तु इस बार समय नहीं मिला। अगली बार आने के लिए कहा, पर जब जाने का सोचा तब तक उनका देहान्त हो गया। वे मेरी हर रचना पढ़ते थे और अपनी रचना मुझे भेजते थे। 
 
31 दिसम्बर 2014 को हमलोग लंदन में थे। जहाँ-जहाँ से गुज़रते सड़क के ऊपर बिजली की लड़ियाँ जगमगा रही थीं। नए साल के आगमन में थेम्स नदी के किनारे बहुत सुन्दर और मनोरम आयोजन होता है, जहाँ आधी रात को आतिशबाज़ी होती है और बिग बेन की घंटी बजती है। चूँकि उस समारोह का टिकट पहले से बुक हो जाता है, तो वहाँ तक हम नहीं पहुँच सके। अंततः हमने पिज़्ज़ा के दूकान में पिज़्ज़ा बनना देखा और पिज़्ज़ा खाकर नए साल का स्वागत किया। मेरे पति को घूमने से ज़्यादा होटल में रहकर मौसम का आनन्द लेना पसन्द है। मैं और मेरे बच्चे कई बार घूमे हुए जगह को फिर से घुमते थे। मेरा बेटा सुबह-सुबह तैयार होकर कोई नॉवेल लेकर किसी कॉफ़ी हाउस में बैठकर ब्लैक कॉफ़ी पीता, जबतक हमलोग तैयार होते थे। मेरी बेटी भी अक्सर अकेले घूमने निकल जाती थी। इस वर्ष 7 जनवरी को मेरी बेटी का जन्मदिन किसी रेस्तराँ में मनाया गया, जहाँ मेरे पति के मित्र शैलेन्द्र सपरिवार आए थे। 

वर्ष 2016 के 21 जून को मेरे विवाह का 25वाँ वर्ष पूरा होने वाला था। चूँकि यह सिल्वर जुबली था, तो सभी रिश्तेदारों के आने और भागलपुर में समारोह करने की योजना थी। मेरे पति की इच्छा थी कि लंदन में मनाया जाए; किन्तु मेरे पुत्र का जन्मदिन 22 जून को है, तो उसने लंदन जाने से मना कर दिया। वैवाहिक समारोह से पहले लंदन जाने की योजना बनी। मेरे पति ने अपने माता-पिता, एक भाई जिसका चार लोगों का परिवार, दो बहनें जिनके चार-चार लोगों का परिवार, मेरी बेटी और मेरा टिकट कराया। हर परिवार के लिए एक-एक कमरा लिया गया था। मेरा बेटा नहीं गया। डॉ. फूल ने हमारे लिए होटल की व्यवस्था की, सभी को 200-200 पाउण्ड दिए और अपने घर खाने के लिए ले गए। उनका घर बहुत आलीशान था। मकान के चारों तरफ़ फूलवारी है और झूला लगा हुआ था। इस मकान से पहले वाला घर रो हाउस था; लेकिन यह बहुत बड़ी कोठी थी। इस बार सभी लोग अलग-अलग घूम रहे थे। मेरे सास-ससुर सिर्फ़ एक बार खाने के लिए बाहर निकलते थे, बाक़ी समय होटल में ही व्यतीत करते और साथ लाया हुआ भोजन करते। इस बार हम सभी रेडी टू ईट (ready to eat) खाना ले गए थे। हालाँकि मुझे और मेरी बेटी को छोड़कर सभी मांसाहारी हैं; परन्तु उन्हें डर था कि सूअर या गाय का मांस खाने में न हो। बेटी के साथ एक-दो जगह घूमने गई और प्राइमार्क से सामान ख़रीदे। लंदन के ट्रिप का सारा ख़र्च मेरे पति ने किया; अलग से वे सभी कहीं गए तो अपना ख़र्च करते थे। अक्सर हमलोग बॉम्बे ब्रेसर्स में रात का खाना खाते थे।      

वर्ष 2016 में जब लंदन गई, तब शिखा जी के साथ किसी कार्यक्रम में गई। वहाँ अंतरजाल की मेरी साहित्यकार मित्र दिव्या माथुर जी से मिली। बाद में उनसे मिलने ब्रिटिश लाइब्रेरी गई। ब्रिटिश लाइब्रेरी अद्भुत है। यदि कोई लंदन जाए तो यहाँ ज़रूर जाना चाहिए। किन्हीं एक यात्रा में मुग़ल-ए-आज़म के डायरेक्टर के.आसिफ़ के बेटे अकबर आसिफ़ से मिलने हम उनके घर गए। वे बड़े व्यवसायी हैं और अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। चूँकि मैं सिनेमा-प्रेमी हूँ, तो सिनेमा से सम्बन्धित ढेरों बातें हुईं। पता चला कि वहीं पर शाहरुख़ खान ने घर लिया है। हमलोग फुलहम में चेल्सी फुटबॉल क्लब स्टेडियम देखने गए, जो बहुत विशाल है।  

वर्ष  2016 में मेरा बेटा अभिज्ञान सिद्धांत 'क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन' से लॉ में स्नातकोत्तर करने गया। उसकी स्नातक की सहपाठी मोहना श्रीवास्तव, जो बाद में उसकी पत्नी बनी, लॉ से स्नातकोत्तर करने यूसीएल (यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन) गई। वे दोनों एक ही हॉस्टल में रहते थे। उनका हॉस्टल बहुत अच्छा था। हर विद्यार्थी के लिए एक कमरा और कमरे से लगा हुआ शौचालय, बिछावन, अलमारी, टेबल, कुर्सी इत्यादि मिला था। खाना भी बहुत अच्छा मिलता था। हम लोग उनके यूनिवर्सिटी तथा हैरी पॉटर स्टूडियो देखने गए। 

2018 में मेरी बेटी परान्तिका दीक्षा 'क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन' के माइल एन्ड कैम्पस से स्नातक करने गई। मैंने अब तक लंदन की इतनी यात्राएँ की थीं कि अब घूमने की इच्छा नहीं रही। इस बार मैं भारत से इलेक्ट्रिक कुकर और कुछ बर्तन ले गई थी; क्योंकि बेटी के हॉस्टल में उसे स्वयं खाना पकाना था। उसके कॉलेज से नज़दीक किसी होटल में हमलोग रुके। हमारे होटल के समीप बाज़ार था, जहाँ चावल, दाल, सब्ज़ी, मसाला और ज़रूरत का हर सामान मिलता था। वहाँ से मैं ख़रीदकर लाती और इलेक्ट्रिक कुकर में सूप, भात, तरकारी, खिचड़ी बनाकर खाती थी। सत्तू और चूड़ा भी साथ था, तो खाने की परेशानी नहीं थी। बेटी एक साल बाद लौट आई, तब से हमारा लंदन जाना बंद है; परन्तु मेरे पति को उस देश से बहुत प्रेम है, इसलिए वहाँ जाने के लिए हमेशा कहते हैं। 
 
लंदन की किसी यात्रा में मैंने बी.बी.सी. रेडियो स्टेशन लंदन और साउथ केनसिंगटन में रॉयल अल्बर्ट हॉल देखा; ये नाम बचपन से सुनती आ रही हूँ। ईस्ट इंडिया कम्पनी, जिसने हमारे देश को लूटा, अब एक छोटे से ऑफ़िस के रूप में दिखा, यह मेरे लिए आश्चर्जनक लगा; क्योंकि समय कब, किसे, कहाँ पहुँचाता है इसका उदहारण सामने था। हम रीजेन्ट्स पार्क के पास शरलॉक होम्स का म्यूजियम देखने गए। एक बार लंदन से लौटने में फ्लाइट छूट गई, तो हम सब दुःखी थे। डॉ. फुल हमें थेम्स नदी के किनारे लंदन के सबसे ऊँचे और प्रसिद्ध 72 मंज़िला इमारत 'शार्ड' ले गए, जहाँ हमने खाया-पीया। शार्ड से लंदन ब्रिज और लंदन आई खिलौना जैसा लगता है। 

लंदन में जहाँ भी रुकते थे आसपास सेंसबरी नाम का बहुत बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर होता था। यहाँ से हमलोग बहुत सामान ख़रीदते थे। ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट पर प्राइमार्क दुकान से कपड़े, जूता, चप्पल, पर्स इत्यादि की ख़रीददारी जब भी गए तब किया। डॉ. फुल के साथ क्रॉम्पटन रोड स्थित हैरोड्स लक्जरी डिपार्टमेंट स्टोर गए। वहाँ के सामान की क़ीमत देख मैं आशर्यचकित रह गई। एक छोटे से पर्स की क़ीमत भारतीय रुपये में 40-50 हज़ार रुपये, एक ड्रेस की क़ीमत लाख रुपये। मैंने कहा कि यादगार के लिए भी यहाँ से कुछ नहीं ख़रीदना चाहिए। फिर भी यादगार के लिए बेटे ने कुछ ख़रीद ही लिया। बाद में डॉ. फुल ने मुझे हैरोड्स से कई पर्स और इयरिंग्स सेट तोहफ़े में दिए। जब भी वे भारत आते, तो मेरे लिए हैरॉड्स का पर्स लाते थे। वे मुझे बहन की तरह मानते थे। वे अब इस संसार में नहीं हैं, पर उनके साथ बिताए हुए लंदन की यादें साथ हैं।  

मैं इतनी बार लंदन गई कि हर यात्रा याद नहीं रही। भूल गई हूँ कि किस यात्रा में क्या-क्या ख़ास किया। सारी यादें आपस में गडमड हो जाती हैं। लंदन की गर्मी, ठण्ड, बरसात सभी मौसम का आनन्द ले चुकी हूँ। लंदन में बहुत सारी ऐसी जगह घूमी हूँ जिनके नाम याद नहीं आते। बच्चे याद दिलाते हैं या एलबम देखती हूँ तो ख़ुशी होती है कि मैंने लंदन की यात्राओं को जीभरकर जिया है। अक्सर कुछ घटनाएँ या कोई चित्र याद आ जाता है। वैसे हमारी तस्वीरों में वह सब जगह क़ैद है जहाँ-जहाँ हमलोग गए; परन्तु मेरी यादों से धीरे-धीरे सब फिसल रहा है। निःसन्देह लंदन के मौसम का आनन्द लेने कई बार जाया जा सकता है; परन्तु कुछ अंतराल पर जाने से सुखद लगेगा और हमारी यादों में यात्राएँ सुरक्षित रहेंगी। 

-जेन्नी शबनम (1.8.2025)
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Friday, January 30, 2026

132. मम्मी की पाँचवीं पुण्यतिथि

मम्मी की पाँचवीं पुण्यतिथि पर हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मम्मी के घर आई हूँ। इस बार भाई भी साथ है और पहली बार मम्मी की नज़दीकी मित्र उषा श्रीवास्तव भी आई हैं। उषा मौसी दरभंगा में मम्मी के साथ कॉलेज में पढ़ती थीं। संयोग ऐसा रहा कि विवाह के बाद इनकी मित्रता भागलपुर में भी बनी रही। मम्मी के जाने के बाद भी उनसे मेरा सम्बन्ध बना हुआ है। 
मेरा भाई- अमिताभ सत्यम्
आज हर वर्ष की तरह मेरे स्कूल और कॉलेज की कई मित्र आई। मम्मी और मुझसे जुड़े कई लोग आए। कम्युनिस्ट पार्टी के कई लोग आए। मेरे कुछ रिश्तेदार आए। मम्मी को यादकर हम सभी हँसे, रोए, बातें किए। मम्मी का घर आज भी वैसे ही है जैसे मम्मी के रहने पर था। फूल अब कम कर दिया गया है और तरकारी उपजाई जा रही है ताकि वर्ष में एक बार जब मैं आऊँ तो मम्मी के मेहनत के घर की ज़मीन में उपजाई हुई तरकारी खा सकूँ। मम्मी के जीवित रहते कभी भी इस घर में एक रात भी नहीं रही; परन्तु अब आकर रहती हूँ। मम्मी के घर में बहुत सुकून मिलता है।  
मैं 
आत्मा-परमात्मा के रहस्य को सुलझाना तो मेरे लिए संभव नहीं हुआ; परन्तु आत्मा-परमात्मा की दुनिया को काल्पनिक भी मानने पर मेरे मन को झूठी तसल्ली मिलती है। मैं कल्पना में सोचती हूँ कि यदि आत्मा की दुनिया है, तो शायद मम्मी की आत्मा अपने घर में मेरे और मेरे दोनों बच्चे तथा भैया और उसके दोनों बच्चे के आने की प्रतीक्षा में रहती होगी। मम्मी हमेशा चाहती थी कि हम सभी वैसे ही एकत्रित हों जैसे वर्ष 2016 में मम्मी ने अपने घर में गृह प्रवेश किया था, तो हम सभी एकत्रित हुए थे। लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सका।

मम्मी को लोग भूलना चाहें भी, तो मैं भूलने नहीं देती हूँ। कुछ लोग जो मम्मी से संबद्ध थे, फेसबुक पर मम्मी के अपडेट पर प्रतिक्रिया देते हैं। मैंने फेसबुक पर मम्मी के प्रोफाइल को जीवित रखा है और प्रतिदिन की मेमोरी को पोस्ट करती हूँ। अपने प्रोफाइल से जाकर जिनकी भी प्रतिक्रिया मिलती है, उन्हें यथायोग्य धन्यवाद, प्रणाम और स्नेह देती हूँ।

समय और उम्र बढ़ने के साथ मम्मी की पुण्यतिथि पर कब तक भागलपुर जा सकूँगी, मालूम नहीं। इस बार मेरा एक पैर फ्रैक्चर हो गया है। पाँव में प्लास्टर लगा है। हालाँकि पाँच सप्ताह हो चुके हैं; लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि छह सप्ताह से पहले प्लास्टर नहीं खोला जा सकता है। ऐसा दुर्भाग्य रहा कि पैर फ्रैक्चर होने के दस दिन बाद यानी पहली जनवरी को स्नानघर में फिसलकर गिर गई। मुझे तो लग रहा था कि इस वर्ष नहीं आ सकूँगी; लेकिन विमान के व्हीलचेयर के सहारे मैं आराम से आ सकी।

जीवन-मृत्यु शाश्वत सत्य है; परन्तु इस सत्य को स्वीकार करना हमेशा से दुःखद रहा है। पापा, दादी, मम्मी और बहुत सारे रिश्तेदार इस संसार से चले गए। जब-जब वे सभी याद आते हैं, तो बहुत दुखः होता है। यही जीवन है और यूँ ही हम सभी का अंत होना है। मम्मी की यादें और जीवन मेरे लिए सदैव प्रेरक रहा है और जीवन को ज़िन्दादिली से जीने की प्रेरणा मिलती है।

मम्मी को सादर प्रणाम!

-जेन्नी शबनम (30.1.2026)
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Thursday, January 1, 2026

131. नए वर्ष का तोहफ़ा

समय की बीतना, मानो सूरज का रोज़ उगना और ढलना। भोर से साँझ, रात, फिर भोर अनवरत। इसी तरह हमारा जीवन चलता रहता है अनवरत। बीच-बीच में कुछ ख़ास दिन याद दिलाता है कि हमारी यात्रा कहाँ तक पहुँची है, कब-कब हमें ठहरना है, रुकना है, चलना है, किधर जाना उचित किधर जाना अनुचित है, कब कौन सा त्योहार है, कब हमें क्या करना है, अन्तिम मक़ाम तक पहुँचने की सही राह कौन सी है इत्यादि। 


नव वर्ष भी ऐसे ही एक ख़ास दिन है जब पूरी दुनिया पुराने साल को अलविदा कहती है और नए का स्वागत करती है। हर जगह त्योहार का माहौल। जाड़े की रात भी मदहोशी के आलम में डूबी हुई चहकती और जगमग करती रहती है। हर एक व्यक्ति के मन में उत्साह रहता है। जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुँचती है जश्न में डूबी रात ज़ोर से खिलखिलाती है और तमाम दुनिया के लोग मस्ती में झूमने लगते हैं। कहीं आतिशबाज़ी तो कहीं मदमस्तों की टोली अपने अपने मन के अनुसार नाचते-गाते हैं। रात जागती रहती है और यूँ खिली रहती है मानो दीवाली की रात हो। जगमगाती, खिलखिलाती, नाचती, गाती, रोमांटिक मनोदशा में होती है। 

बहुत बचपन का नव वर्ष तो याद नहीं। स्कूल के दिनों का याद है जब 19 दिसम्बर से बड़े दिन की छुट्टी शुरू हो जाती थी और शायद तीन-चार जनवरी को स्कूल खुलता था। उस ज़माने में न फ़ोन, न टी.वी. न रात में जश्न मनाने के लिए बिजली। जो करना है दिन में ही करना है। इसलिए 31 दिसम्बर के दिन या रात में कुछ भी ख़ास नहीं होता था, सिर्फ़ नए साल में ख़ास कार्यक्रम की की रूपरेखा तैयार होती थी। पहली जनवरी की भोर में पहला काम होता था कि उठते ही जो भी घर में है उसे हैप्पी न्यू ईयर बोलना। दुसरा काम घर के सभी कैलेण्डर को फाड़कर फेंकना। तीसरा काम अपनी कॉपी में पहली जनवरी की तारीख डालना। पिछले दिन तय किए हुए कार्यक्रम का क्रियान्वयन करना। सिनेमा जाना, किसी रेस्तरां में खाना, किसी के घर लोगों के सामूहिक भोजन में हिस्सा लेना (कभी कभी मेरे घर भी होता था) इत्यादि।

विवाहोपरान्त जीवन की दिशा बदल गई। विवाह के बाद मेरे घर में बहुत लोग रहते थे, अतः कोई भी कार्यक्रम हो तो सभी उसमें रहते थे। बच्चों के होने के बाद थोड़ा बदलाव आया। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए बहुत बदलाव आया। वर्ष 2011 तक मेरे पति के संस्थान में नव वर्ष के अवसर पर बहुत बड़ा आयोजन होता था। धीरे-धीरे वह कम हो गया। बच्चे बड़े हुए तो वे अपने मित्रों के साथ नया साल मनाने लगे। साथ कोई न भी जाए तो मैं अक्सर सिनेमा देखने जाती थी। 

इस वर्ष का नया साल आजीवन मुझे याद रहेगा। मेरे निवास से नज़दीक आज़ाद अपार्टमेन्ट में मेरे एक बुज़ुर्ग मित्र एम. एस. आज़ाद जी से मिलने मैं 22 दिसंबर को गई। लौटते समय हल्का अँधेरा हो गया था। आज़ाद जी समतल रास्ते से मुझे छोड़ने आ रहे थे और मैं शॉर्टकट के लिए एक ऊँचे चबूतरे पर चढ़कर आ रही थी। जैसे मैं नीचे उतरने लगी, पाँव मुड़ गया और मैं धड़ाम से नीचे। नई-नई चप्पल का उद्घाटन हो गया। आज़ाद जी मुझे उठाने लगे। दाएँ पाँव का घुटना छिल गया। धीरे-धीरे मैं उठी; परन्तु बाएँ पाँव में भयंकर दर्द होने लगा और तुरत सूज गया। मुझे लगा कि गिर गई थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा। मैंने आज़ाद जी से कहा कि जब वे मेरे घर आये थे तो वापसी में सिद्दी से वे गिर गए थे, तो मैंने उन्हें सँभाल लिया था, इस लिए बदले में आज उनके घर गिरकर मेरी बराबरी हो गई। 

पहला दिन 
मैं किसी तरह घर आई। बेइन्तहाँ दर्द के कारण डॉक्टर को दिखने पंचशील मैक्स हॉस्पिटल गई, लेकिन डॉक्टर छुट्टी पर थे। फिर मैं नेहरू प्लेस में फोर्टिस हॉस्पिटल गई, वहां डायबिटिज के लिए जाती रहती हूँ। काफी इंतज़ार के बाद डॉक्टर ने फ़ोन पर कहा की पहले एक्स रे करवाऊं। फिर डॉक्टर ने कहा कि फ्रैक्चर है और प्लास्टर किया, पांच सप्ताह तक प्लास्टर रहेगा। हालाँकि बेटी ने फ़ोन कर कहा भी था कि आजकल घर पर एक्सरे भी हो जाता है और डॉक्टर भी आ जाता है; लेकिन मुझे लगा कि घर पर यह ठीक नहीं होगा, इसलिए हॉस्पिटल गई। बेटी तीसरे दिन आई तो प्लास्टर पर अपनी कलाकारी की। बेटा भी इस दिन आया। बच्चों के आने से दर्द भी कुछ देर के लिए भूल गई। 

दूसरा दिन 
अब पाँव में प्लास्टर है और बच्चे भी साथ नहीं। तो यूँ भी कोई प्लान नए साल के लिए नहीं था। सिनेमा तो जा सकती थी, वह भी नहीं जा सकी पाँव के कारण। रहा-सहा कसर पूरा हुआ कि मैं आज बाथरूम में फिसल कर गिर गई। टेल बोन पर ज़ोर की चोट लगी। दर्द इतना है कि हिलने में भी दर्द हो रहा है। सूजी का हलवा मुझे बेहद पसंद है, सुबह शाम बेहिचक खाया। इतनी चोट में डाइबिटीज भी याद रखूँ, अब यह तो न होने वाला। बेटी ने रात 12 बजे विश किया था। जब गिर गई उसके तुरत बाद बेटी ने फिर से नया साल विश किया तो मैंने बताया की अभी गिर गई हूँ, बाद में फ़ोन करती हूँ। उसने अपने पापा को बताया कि मम्मी गिर गई जल्दी जाकर देखो। 
तीसरा दिन 
उम्र के साथ याददाश्त कमज़ोर पड़ रही है। चोट या दर्द के दवा का नाम याद ही नहीं आ रहा था। अंततः केमिस्ट से पूछा और उसने दवा भेज दी। दर्द के कारण अब भी हिल नहीं पा रही हूँ। किसी के गिरने पर सभी को बहुत हँसी आती है, जानती हूँ की यह गलत है। पर मुझे बेहद हँसी आई। क्या लाजवाब नया वर्ष आया मेरा। जितना ही इस दिन को उत्साह से मनाती थी, उतना ही इस वर्ष सब गड़बड़ हो गया।  फिर भी एक बेहतरीन फ़िल्म 31 दिसंबर की रात और पहली जनवरी के पहले पहर में देखी। वर्ष का पहला दिन गिर पड़ी, अब बचपन की मान्यताओं के अनुसार साल भर गिरती पड़ती रहूँगी; क्योंकि बच्चपन में हम बच्चों की मान्यता थी कि साल के पहले दिन जो होता है वही सालभर होगा। 

अब देखना है कि नया साल 2026 मेरे लिए क्या-क्या लेकर आता है। सभी को नव वर्ष की मंगलकामनाएँ ! 

-जेन्नी शबनम (1.1.2026)
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