Thursday, June 21, 2012

38. क्योंकि वह ताजमहल नहीं था

साइनबोर्ड 
एक बार फिर रोई अमृता, फूट-फूटकर रोई। इमरोज़ के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़कर झिंझोड़कर पूछा- ''क्यों नहीं बचाया मेरा घर? क्यों नहीं लड़ सके तुम मेरे लिए?'' ''बोलो इमा, क्यों नहीं रोका तुमने उन लोगों को, जो मेरी ख़्वाहिशों को उजाड़ रहे थे, हमारे प्रेम के महल को ध्वस्त कर रहे थे? हर एक कोने में मैं जीवित थी तुम्हारे साथ, क्यों छीन लेने दिया मेरा संसार?'' 
इमरोज़ जी
इमरोज़ निःशब्द! इमरोज़ बेबस! ख़ामोशी से अपनी माझा को रोते हुए देखते रहे। आँखें भीग गईं, फिर तड़पकर कहा- ''माझा, मैं क्या करता, मेरा हक़ तो सिर्फ़ तुम पर था न, उस घर पर नहीं। मैं कैसे रोकता उन्हें?'' ''माझा! मैं घर को बचा नहीं सका, मैं किसके पास जाकर गिड़गिड़ाता? जिन लोगों ने तुमको इतना सम्मान दिया, पुरस्कृत किया, उन लोगों में से कोई भी तुम्हारे धरोहर को बचाने नहीं आया।'' ''माझा! उस घर को मैं अपने सीने में समेट लाया हूँ। हमारे घर के ऊपर बने विशाल बहुमंजिली इमारत में वे ईंटें दफ़्न हैं, जिन्हें तुमने जोड़ा था और मैंने रंगों से सजाया था।'' ''ये देखो माझा! हमारी वह तस्वीर ले आया, जब पहली बार तुम मेरे लिए रोटी सेंक रही थी, तुम्हें कितना अच्छा लगता था मेरे लिए खाना बनाना। ये देखो! वह कप भी मैं ले आया हूँ, जिसमें हर रात मैं तुमको चाय देता हूँ; रात में तुम अब भी लिखते समय चाय पीना चाहती हो न। वह देखो! उस तस्वीर में तुम कितनी सुन्दर लग रही हो, जब पहली बार हम मिले थे। वह देखो! हमारे घर का नेम-प्लेट 'अमृता प्रीतम, के-25', और देखो वह तस्वीर जिसे बनाने में मुझे पाँच साल लगे थे, जिसे तुम्हारे कहने पर मैंने बनाया था 'वुमेन विद माइंड'।'' ''माझा, मैं अपनी तक़लीफ़ किसे दिखाऊँ? मेरी लाचारी तुम समझती हो न! तुम तो चली गई, मुझे अकेला छोड़ गई। सभी आते हैं और मुझमें तुमको ढूँढते हैं, पर मैं तुमको कहाँ ढूँढूँ?'' ''माझा!  मेरा मन बस अब तुम्हारा घर है, क्योंकि अब तुम सीधे मेरे पास आती हो, पहले तो तुम जीवन के हर खट्टे-मीठे अनुभव के बाद मुझ तक आई थी। तुम्हारी यादें और मैं अब मेरा घर है।''     
बिकने के बाद टूटकर बन रहा k-25
किसी जीवित घर का मिटाया जाना विधि का विधान नहीं, न नियति का क्रूर मज़ाक है; बल्कि मनुष्य के असंवेदनशील होने का प्रमाण है। उस घर का बाशिंदा कितना तड़पा होगा, जब उससे वह घर छीन लिया गया होगा, जिसमें उसकी प्रियतमा की हर निशानी मौजूद है। ये सब अतीत की कथा नहीं बल्कि उसका वर्तमान जीवन है। कितना रोया होगा वह। कितना पुकारा होगा वह अपनी प्रियतमा को, जिसने अकेला छोड़ दिया यादों के सहारे जीने के लिए। पर उसने सदैव उसे अपने साथ महसूस किया है, उसे सोचा नहीं; बल्कि उसके साथ जी रहा है। कितनी बेबस हुई होगी उस स्त्री की आत्मा जब उसके सपनों का घर टूट रहा होगा और उसका हमसफ़र उसकी निशानियों को चुन-चुनकर समेट रहा होगा। तोड़ दिया गया प्रेम का मन्दिर। फफक पड़ी होंगी दीवार की एक-एक ईंटें। चूर हो गया किसी स्त्री की ख़्वाहिशों का संसार। कैसे दिल न पिघला होगा उसका, जिसने इस पवित्र घर को नष्ट कर दिया। क्या ज़रा भी नहीं सोचा कि अमृता की आत्मा यहाँ बसती है? अमृता को उसके ही घर से बेदख़ल कर दिया गया और उसकी निशानियों को सदा के लिए मिटा दिया गया। 
कुछ यादें- अमृता-इमरोज़
हौज़ ख़ास के मकान नम्बर k-25 के गेट में घुसते ही सामने खड़ी मारुती कार, जिसे अमृता-इमरोज़ ने साझा खरीदा था, अब कभी नहीं दिखेगी। घंटी बजाने पर कुर्ता-पायजामा और स्पोर्ट्स शू पहने ज़ीने से उतरकर दरवाज़ा खोलते हर्षित इमरोज़, जो बहुत ख़ुश होकर पहली मंजिल पर ले जाते और सामने लगी खाने की मेज़-कुर्सी पर बिठाते हुए कहते हैं- ''देखो वहाँ अमृता अभी सो रही है'', साथ लगी उस रसोई में ख़ुद चाय बनाते, जिस रसोई में न जाने कितनी बार अमृता ने रोटी पकाई होगी; अब कभी न दिखेगी। रसोई में रखी काँच की छोटी-छोटी शीशियाँ भी उस वक़्त की गवाह हैं, जब अमृता रसोई में अपने हाथों से कुछ पकाती थीं और इमरोज़ उसे निहारते थे। अमृता का वह कमरा जहाँ अमृता ने कितनी रचनाएँ गढ़ीं, जहाँ इमरोज़ की गोद में अन्तिम साँस ली; अब कभी नहीं दिखेगा। कैनवस पर चित्रित अमृता-इमरोज़ की साझी ज़िन्दगी का इन्द्रधनुषी रंग जो उस घर के हर हिस्से में दमकता था, अब कभी नहीं दिखेगा। सफ़ेद फूल जो अमृता को बहुत पसन्द है, इमरोज़ हर दिन लाकर सामने की मेज़ पर सजा देते थे; अब उस मेज़ की जगह बदल चुकी है। अमृता की रूह शायद अब भी उस जगह भटक रही होगी; मेज़, फूल और फूलदान को तलाश रही होगी। छत के पास अब भी पंछी आते होंगे कि शायद इमरोज़ आ जाएँ और दाना-पानी दे जाएँ, पर अब जब छत ही नहीं रहा तो पखेरू दर्द भरे स्वर में पुकारकर लौट जाते होंगे। 
साहिर-अमृता
अमृता का जीवन, अमृता का प्रेम, अमृता की रचनाएँ, अमृता के बच्चों की किलकारियाँ, अमृता के हमसफ़र की जुम्बिश, चाय की प्याली, कैनवस पर इमरोज़ का जीवन- अमृता, रसोईघर में चाय बनाते इमरोज़, रोटी सेंकती अमृता, बच्चों को स्कूटर पर स्कूल छोड़ते इमरोज़, हर शाम पंछियों को दाना-पानी देते इमरोज़, पूरी दुनिया में अपनी रचनाओं के द्वारा सम्मानित अमृता जो अपने बिस्तर पर लाचार पड़ी है - वृद्ध अशक्त अमृता का सहारा बनते इमरोज़, हर एक तस्वीर जिसमें अमृता है का विस्तृत विवरण देते इमरोज़; अमृता और अमृता का साझा-संसार जो उनके मन में सिमट गया है। इमरोज़ जो बिना थके कई बार नीचे दरवाज़ा खोलने, कभी छत पर पौधों में पानी डालने, कभी सबसे ऊपर की छत पर पंछियों का कलरव देखने आते जाते रहते। इमरोज़ के माथे पर न शिकन न शिकायत, बदन में इतनी स्फूर्ति मानो अमृता ने अपनी सारी शक्ति सहेजकर रखी हो और विदा होते वक़्त अन्तिम आलिंगन में सौंप दिया हो और चुपके से कहा हो ''मेरे इमा, मैं इस शरीर को छोड़कर जा रही हूँ, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी, तुम कभी थकना नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूँ, पग-पग पर, पल-पल में, वक़्त के उस आख़िरी छोर तक जब तक तुम इस शरीर में हो, सामने वाले कमरे में बैठी मैं हर रात तुम्हारे लिए गीत रचूँगी और जिसे तुम अपने हाथों से नज़्म का रूप दोगे। मैं तुम्हारी माझा, तुम्हारे लिए सदैव वर्तमान हूँ, यों भी तुम इमरोज़ हो जिसका अर्थ है आज, तुम मेरे आज हो, मेरी ख़्वाहिशों को तुम पालना, हमारे इस घर में मैं हर जगह मौजूद रहूँगी, तुम जीवन का जश्न जारी रखना, तुम्हारे कैनवस पर और तुम्हारी नज़्मों में मैं रहूँगी, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।'' 
मुश्किलों से जूझती अमृता का 'अमृता प्रीतम' बनना इतना सहज नहीं हुआ होगा। पति से अलग हुई एक आम औरत जिसके दो छोटे बच्चे, जीवन सरल नहीं रहा होगा। टूटी-हारी 40 वर्षीया अमृता को इमरोज़ का साथ और फिर समाज की मान्यताओं और प्रतिमानों से जूझना बेहद कठिन हुआ होगा। रेडियो स्टेशन में कामकर घर चलाती अमृता ने कैसे-कैसे दिन देखे होंगें, ये तो बस वे जानती हैं या इमरोज़। अमृता का सम्पूर्ण अस्तित्व जो उस एक घर में बना, पसरा, फिर सिमटा, कितनी क्रूरता से मिटा दिया गया।इमरोज़ के लिए नहीं, तो कम-से-कम उस औरत, जिसकी हर ख़्वाहिशें और ज़िन्दगी यहाँ मौजूद थी, पर तो रहम किया होता। प्रेम की दुहाई देने वाले और अमृता-इमरोज़ के प्रेम की मिसाल देने वाले कहाँ गए? क्या जीवन के बाद ऐसे ही भुला दिया जाता है उसकी हस्ती को, जिसने समाज को एक नई सोच और दिशा दी, जिसने स्त्री होने के अपराधबोध से ग्रस्त होना नहीं सीखा और स्त्री को गौरव प्रदान किया, पुरुष को सिर्फ़ एक मर्द नहीं, बल्कि एक इंसान और सच्चे साथी के रूप में समझा।   
नए फ्लैट का एक कोना
अब कहाँ ढूँढूँ उस घर को? प्रेम के उस मन्दिर को? वह घर टूटकर बहुमंजिली इमारत में तब्दील हो चुका है। अमृता बहुत रो रही थी और अपने इमरोज़ को समझा रही थी- ''वह सिर्फ़ एक मकान नहीं था इमा, हमारा प्रेम और संसार बसता था वहाँ। मेरे अपनों ने मुझे मेरे ही घर से बेदख़ल कर दिया। हाँ इमा! जानती हूँ तुम्हारी बेबसी, मेरे घर के कानूनी हक़दार तुम नहीं हो न! दुनिया के रिवाज से तुम मेरे कोई नहीं, ये बस मैं जानती हूँ कि तुम मेरे सब कुछ हो, जानती हूँ तुम यहाँ मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहे होगे पर कानून... उफ़!''
नए घर के एक आईने में मैं और इमरोज़ जी
इमरोज़ जी से पूछने पर कि उस घर को क्यों बेच दिया गया, वे कहते हैं- ''जीवन में 'क्यों' कभी नहीं पूछना, हर 'क्यों' का जवाब भी नहीं होता है, जो होता है ठीक ही होता है।'' ''अगर अमृता होती तो उनको कैसा लगता?'' पूछने पर बहुत संजीदगी से मुस्कुराते हुए कहते हैं- ''अगर अमृता होती तो वह घर बिकता ही नहीं।'' ''ये घर भी बहुत बड़ा है और बच्चों को जो पसन्द मुझे भी पसन्द, अपने बच्चों के साथ ही मुझे रहना है।'' 
विस्तार से घर दिखाते इमरोज़ जी और मैं
इमरोज़ के साथ अमृता अब नए घर में आ चुकी है। अमृता के परिवार के साथ दूसरे मकान में शिफ्ट होते समय इमरोज़ जी ने अमृता की हर निशानी को अपने साथ लाया है और पुराने मकान की तरह यहाँ भी सजा दिया है।हर कमरे में अमृता, हर जगह अमृता। चाहे उनके पेंटिंग करने का कमरा हो या उनका शयन कक्ष, गैलरी, भोजन कक्ष, या फिर अन्य कमरा। अमृता को देखना या महसूस करना हो, तो हमें के-25 या एन-13 नहीं बल्कि इमरोज़ से मिलना होगा। इमरोज़ जी के साथ अमृता हर जगह हैं, चाहे वे जहाँ भी रहें। 
इमरोज़ जी और मैं
-जेन्नी शबनम (21.6.2012)
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Friday, June 8, 2012

37. विकलांगों का गाँव

''न चल सकते, न सो सकते, न बैठ सकते हैं, कैसे जीवन काटें?'' कहते-कहते गीता देवी की आँखों में आँसू भर आते हैं। मेरे पास कोई जवाब नहीं, क्या दूँ इस सवाल का जवाब। मैं पूछती हूँ ''कब से आप बीमार हैं?'' 50 वर्षीया शान्ति देवी विकलांग हो चुकी हैं, रो-रोकर बताती हैं ''जब से सरकार ने चापाकल गाड़ा है, ज़हर पी-पीके हमारा ई हाल हुआ है।'' वे अपने दोनों पाँव को दिखलाती हैं, जिसकी हड्डियाँ टेढ़ी हो चुकी हैं। उन्होंने कहा ''जब तक चापाकल नहीं गाड़ा गया था, तब तक पानी का बहुत दिक्क़त था।लेकिन अब लगता है कि ये चापाकल ही हमारा जान ले लेगा, तो हम कभी इसका पानी नहीं पीते।'' खटिया पर बैठे हुए वह अपने घर का चापाकल दिखाती हैं और इशारा करती हैं उन डब्बों की ओर जिसमें पानी भरकर रखा हुआ है। वे कहती हैं कि सरकार थोड़ा-बहुत पानी का इन्तिज़ाम की है, वहीं से पानी लाकर रखते हैं, बाक़ी काम तो इसी ज़हर वाले पानी से करना पड़ता है।''
45 वर्षीया गीता देवी का पूरा बदन सूख गया है, दोनों हाथ-पाँव की हड्डियाँ टेढ़ी होकर अकड़ गई हैं, ख़ुद से कुछ नहीं कर सकतीं। अपना व्यक्तिगत काम करने में भी असमर्थ हैं। उनकी बीमारी के कारण देखकर लगता है जैसे वह 60 साल की हों। उनसे पूछने पर कि यह बीमारी कब से है, वे ऐसे देखती हैं मानो उनके कान सुन्न पड़ चुके हैं और ज़ुबाँ भी ख़ामोश, बस बेचारगी से चुपचाप देखती हैं। उनके पति बताते हैं कि क़रीब दो-तीन साल पहले बीमार हुई और धीरे-धीरे पूरा देह सूखकर अकड़ गया। वे बताते हैं कि वही ज़हर जो पूरे गाँव को एक-एक करके खा रहा है उसी से ऐसा हाल हुआ है।
डी.पी.एस. भागलपुर के प्रधानाध्यापक श्री राकेश सिंह और हिन्दी की शिक्षिका श्रीमती अलका सिंह के साथ मैं भागलपुर शहर से क़रीब 15 किलोमीटर दूर जगदीशपुर प्रखंड के कोलाखुर्द गाँव में पहुँची। राकेश सिंह के एक मित्र जो भागलपुर में फिजियोथेरेपिस्ट हैं और उस गाँव के मरीजों को देखने जाते हैं, हमारे साथ थे। गाँव में घुसते ही 20-25 लोग इकट्ठे हो गए। सभी का अपना-अपना दर्द, कुछ बदन की पीड़ा कुछ मन की पीड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि तक़रीबन 2000 की आबादी वाले इस गाँव में लगभग 100 व्यक्ति पूर्णतः या अंशतः विकलांग हो चुके हैं। कितने बड़े-बड़े नेता आए, कितने पेपरों में छपा। देश में कई जगहों पर यहाँ का पानी टेस्ट हुआ और सभी रिपोर्ट में आर्सनिक और फ्लोराइड होने की पुष्टि हुई। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। अब भी ज़हर वाला पानी पी रहे हैं सभी। फ्लोराइड और आर्सनिक के कारण लगभग सभी को जोड़ में दर्द और हड्डी की समस्या है। रीढ़ की हड्डी धनुष की तरह मुड़ गई है। कई लोगों ने गाँव को छोड़ दिया है। ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता, न यहाँ की बेटी से कोई जल्दी ब्याह करना चाहता है। अपना खेत होते हुए भी कई लोग खेती छोड़कर पंजाब, गुजरात, दिल्ली पलायन कर चुके हैं। उनकी कमाई इतनी कम है कि घरवालों को ले नहीं जा सकते और जितना कमाते हैं परिवार वालों की बीमारी पर ख़र्च हो जाता है। छोटे-छोटे बच्चों का पाँव टेढ़ा हो गया है, वे सीधे चल नहीं पाते हैं। सरकार योजना तो बनाती है; लेकिन कितने लोगों को अपाहिज बनाने के बाद कुछ करेगी क्या पता।
कोलाखुर्द गाँव जहाँ अधिकांश राजपूत हैं और सभी के पास खेत है; परन्तु सिंचाई के अभाव में खेत-खलिहान बंजर पड़े हुए हैं। सभी घरों में एक-न-एक व्यक्ति ज़रूर है, जिसे आर्सनिक और फ्लोराइड के दुष्प्रभाव ने मरीज़ बना दिया है। तक़रीबन 30 वर्षों से यहाँ यह समस्या है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने यहाँ पर स्वच्छ पानी के लिए मिनी प्लांट बिठाया है जिसमें कोई ख़ास दवा डाली जाती है, जिससे पानी शुद्ध होता है। इस दवा की क़ीमत लाखों में है। सरकार द्वारा नियुक्त ठीकेदार अपनी मनमानी करता है और समय पर दवा नहीं डालता, जिसके कारण ये पानी भी ज़हरीला है। जिन-जिन चापाकलों के पानी में आर्सनिक या फ्लोराइड की मात्रा ज़्यादा है, उन चापाकलों पर लाल निशान लगा दिए गए हैं और पानी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। परन्तु सभी लोग इन चापाकलों के पानी का उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि मिनी प्लांट समुचित पानी देने में असमर्थ है। लाल निशान वाले एक चापाकल से एक चुल्लू पानी पीकर मैंने देखा कि पीने में ये कैसा लगता है। स्वाद में सामान्य पानी जैसा ही रंगहीन गंधहीन। लेकिन ऐसे रसायन का समिश्रण जिससे इंसान की ज़िन्दगी में तक़लीफ़ और दर्द का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है, जो मृत्युपर्यन्त रहता है।   
इस गाँव से एक किलोमीटर की दूरी पर नारायणपुर कोलाखुर्द गाँव है, जहाँ एक कुआँ है, जिसके पानी में न तो फ्लोराइड है न आर्सनिक। सरकार ने एक योजना बनाई है जिसके तहत इस कुआँ के पास एक बड़ा कुआँ खोदकर पाईप लाइन द्वारा घर-घर पानी की आपूर्ति जाएगी। लेकिन हर सरकारी योजनाओं की तरह यह योजना भी फाइलों में दबी पड़ी है। यहाँ के लोगों के द्वारा बार-बार माँग करने पर सरकार ने तीन महीने के अंदर योजना के कार्यान्वयन की बात कही थी, लेकिन तीन महीने गुज़र चुके हैं।ग्रामीणों की स्थिति और भी विकट होती जा रही है। 
भागलपुर का यह जगदीशपुर प्रखंड कतरनी चावल के उत्पादन के लिए समूचे देश में प्रसिद्ध है। लेकिन इसका कोलाखुर्द गाँव न अनाज उपजाता है न कोई सब्ज़ी; क्योंकि सिंचाई तो इसी पानी से करनी होगी। सिर्फ़ वर्षा के पानी पर निर्भर होकर खेती सम्भव नहीं है। जिन्हें भी सम्भव हो सका वे गाँव छोड़कर चले गए। जो बिल्कुल असमर्थ हैं शारीरिक या आर्थिक रूप से, धीरे-धीरे ख़ुद को ख़त्म होते देख रहे हैं। अधिकांश मरीज़ ऐसे हो चुके हैं जिनका इलाज सम्भव नहीं है। न उठ सकते, न हिल सकते, न स्वयं दैनिक क्रिया-कलाप कर सकते, ख़ामोशी से मृत्यु का इन्तिज़ार कर रहे हैं।
इस गाँव से लगा हुआ मध्य विद्यालय है, जिसमें 145 बच्चे और चार शिक्षक हैं। कितने बच्चों को विकलांगता है, यह पूछने पर शिक्षकों ने अनभिज्ञता जताई। पाँच बच्चे वहीं सामने दिख गए, जिनके पाँव की हड्डी टेढ़ी हो गई है।स्कूल परिसर में मध्याह्न भोजन बनता है और बच्चों को खिलाया जाता है। आज भात (चावल) और दाल फ्राई बना, जिसमें दाल कम और पीला पानी ज़्यादा था। खाना बनाने वाली हमें देखकर डर गई कि कहीं सरकार की तरफ़ से कोई जाँच-पड़ताल तो नहीं। राकेश सिंह ने वहाँ की भाषा (अंगिका) में उसे समझाया कि डरो नहीं हम लोग सरकार के यहाँ से नहीं आए हैं, बस घूमने आए हैं। बहुत कहने पर भी वह खाना दिखाने से डरती रही, फिर वहीं के एक छात्र ने ढक्कन खोलकर खाना दिखाया। मेनू के हिसाब से खाना बना है; लेकिन मात्रा और पोषकता को कोई नहीं देखता। बीच-बीच में इसका भी अकस्मात अवलोकन और परीक्षण आवश्यक है।
कोलाखुर्द का दर्द पिघल-पिघलकर पूरे देश के अख़बार की ख़बरों का हिस्सा बनता है; लेकिन किसी इंसान के दिल को नहीं झकझोरता, न तो सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाता है। यहाँ स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है। भागलपुर जाकर इलाज कराना इनके लिए मुमकिन नहीं; क्योंकि आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि रोज़गार छोड़कर अपने घर वालों का अच्छा इलाज करा सकें। सरकार ने उन चापाकलों पर लाल निशान लगा दिए हैं, जिसका पानी दूषित है। प्लांट में समुचित पानी नहीं आता है, जिससे पूरे गाँव को पानी मिल सके; यों प्लांट भी दवा के अभाव में अशुद्ध पानी ही दे रहा है।ग्रामीणों के पास दो विकल्प हैं, या तो ज़हर पी-पीकर धीरे-धीरे पीड़ा से मरें या गाँव छोड़ दें। एक और विकल्प है जिससे कोलाखुर्द को बचाया जा सकता है और वह है सामूहिक आंदोलन, जिसके लिए समस्त ग्रामीणों को एकजुट होकर हिम्मत दिखानी होगी। फिर शुद्ध पानी-सप्लाई की ठण्डी योजना फ़ाइल से निकल कोलाखुर्द तक पहुँचेगी और एक गाँव मिटने से बच जाएगा। कई बार अधिकार न मिले तो छीनना पड़ता है और शुद्ध पानी हक़ हमारा कानून हमें देता है ।
एक सवाल जो मेरे ज़ेहन में आया और मैं पूछने से ख़ुद को रोक न सकी कि जब सभी जान चुके हैं कि पानी ज़हरीला है, तो महज एक किलोमीटर दूर जहाँ शुद्ध पानी है, वहाँ से कम-से-कम पीने का पानी तो हर घर में लाया जा सकता है, जब तक सरकार योजना पर अमल नहीं करती है। यों भी सरकार द्वारा चापाकल गड़वाने से पहले यहाँ के ग्रामीण उसी कुआँ से पानी लाते थे। ज़िन्दगी दाँव पर लगा सकते हैं, लेकिन थोड़ा अधिक मेहनत नहीं कर सकते। सरकार तो अपनी ही रफ़्तार से चलती है, लेकिन हमें अपनी रफ़्तार तो बढ़ानी और बदलनी चाहिए।
अलका सिंह, राकेश सिंह और मैं

-जेन्नी शबनम (8.6.2012)
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Monday, May 14, 2012

36. मुझे नहीं जीना ऐसी दुनिया में (व्यथा-कथा)

रात के लगभग आठ बजे थे। प्राइवेट नर्सिंग होम में एक स्त्री को इमरजेंसी में भर्ती कराया गया और उसका अल्ट्रासाउंड हो रहा था। स्त्री लगातार दर्द से रो रही थी और बीच-बीच में अंग्रेज़ी में डॉक्टर से कुछ-कुछ पूछ रही थी। डॉक्टर ने कान में आला लगाकर बच्चे की धड़कन सुनने की कोशिश की। तभी भ्रूण ने चिल्लाकर कहा- ''डॉक्टर, मुझे मार डालो, मैं इस दुनिया में नहीं आना चाहती, मेरी हत्या कर दो।'' डॉक्टर ने कहा ''ऐसा क्यों कह रही हो, तुम तीन महीने की हो चुकी हो, अब यह मुमकिन नहीं और ऐसा मैं क्यों करूँ?'' भ्रूण ने बेहद कातर स्वर में कहा ''डॉक्टर, आप नहीं जानतीं मेरी माँ की स्थिति, मुझे बचाने के लिए वे कितनी पीड़ा सह रही हैं, जबकि वे जानती भी नहीं कि मैं कन्या-भ्रूण हूँ।'' डॉक्टर हतप्रभ! वह स्त्री न तो ग़रीब परिवार की दिख रही, न अशिक्षित, धड़ाधड़ अंग्रेज़ी में मेडिल टर्म के शब्द बोल रही है और किसी तरह बच्चे को बचा लेने के लिए अनुरोध कर रही है। डॉक्टर समझ नहीं पा रही कि एक शिक्षित संपन्न माँ की कन्या-भ्रूण दुनिया में क्यों नहीं आना चाहती है।

भ्रूण ने बताया कि जब उसकी माँ को पहली बार यह पता चला कि वह पेट से है, तो ख़ुश होकर अपने पति को बताने गई। दो झन्नाटेदार चाँटा गाल पर। माँ सहम गई। उसका पति चिल्लाने लगा कि बच्चा पैदा करने किसने बोला, उसने बच्चा पैदा करने के लिए शादी नहीं की है। उसे रोज़ उसका बदन चाहिए न कि बच्चा। बहुत रोई माँ। दूसरे दिन जब ऑफ़िस गई तो सभी ने पूछा- ''अरे फिर से ये क्या हो गया तुम्हें, गाल पर चोट के निशान?'' माँ ने बताया कि वह फिर से बाथरूम में फिसल गई, बहुत स्लीपरी है न बाथरूम। कई बार चोट के नीले निशान तथा हाथ और चेहरे पर खरोंच भी देखा था सभी ने, पर हर बार माँ यही कहती कि कभी सीढ़ी से गिर गई, कभी रास्ते पर हड़बड़ी में चलते हुए गिर गई, कभी पड़ोस के शिशु ने नाखून से नोच दिया। वह कैसे कहती कि उसका पति जिससे उसने प्रेम विवाह किया है, उसमें हर रात शैतान उतर आता है। 

दूसरे दिन शाम को माँ के ऑफ़िस से लौटने के बाद उसका पति उसे डॉक्टर के पास ले गया और लिंग जाँच कराया, तो पता चला कि कन्या है। रात को उसके पति ने जबरन शराब पिलाई और उसमें नींद की आठ-दस गोलियाँ डाल दीं। रात में तबीयत बिगड़ने पर किसी डॉक्टर के पास ले गया और हमल गिरवा दिया। सुबह जब उसकी नींद खुली वह समझ गई कि उसका बच्चा नहीं रहा। फिर वही नियम, घर का काम-काज, ऑफ़िस और वही रातें जिनमें उसे ख़रीदी हुई वेश्या बन जाना होता है, जिसका फ़र्ज़ है ग्राहक को ख़ुश करना।

इस बार जब गर्भ रह गया, तो माँ ने किसी को नहीं बताया। किसी तरह तीन महीना गुज़र गया। जिसमें से एक महीना वह अपने सास-ससुर के पास रही; क्योंकि सास अस्वस्थ थी और अच्छी परिचारिका होने के कारण पति ने वहाँ भेज दिया था। सास को पता चल गया कि वह पेट से है। ख़ुशी में ख़ूब लड्डू बाँटे और पोता ही जनने की धमकी दे डाली। बेटे को बताया, तो बेटा ख़ुश हुआ और पत्नी को उलाहना दिया कि उसे क्यों नहीं बताया। माँ ने सोचा कि शायद इस बार सब ठीक हो गया है; क्योंकि  सास भी वारिस का मुँह देखने उसके साथ ही  पति के घर आ गई थी। आज शाम को पति बोला कि चलकर  डॉक्टर को दिखा ले और जो भी सावधानी करनी चाहिए, वह पता कर ले। माँ चली गई डॉक्टर के पास। फिर उसके पति ने डॉक्टर से पता कर लिया कि गर्भ में इस बार भी कन्या है। घर आकर माँ को बहुत मारा और पेट के बल धक्का दे दिया। सास खड़ी होकर तमाशा देखती रही। तभी उसके पति का एक दोस्त घर आया, उसने देखा कि माँ नीचे पड़ी कराह रही है और रक्त बह रहा है। दोस्त को देखते ही उसका पति बोला कि माँ सीढ़ी से गिर गई है, फिर झट से माँ को उठाया और गाड़ी में लेकर यहाँ आया।

भ्रूण ने कहा ''मैं कन्या हूँ न! इतने से मार से मैं खत्म नहीं हो पाई, दोस्त अंकल के कारण मैं बच गई; परन्तु दूसरों के भरोसे कितने दिन मैं बचूँगी। अगर बच भी गई, तो माँ रोज़ ऐसे ही पिटेगी, नहीं सह पाती हूँ ये सब देखना।'' डॉक्टर ने भ्रूण को बहुत समझाया कि तीन महीने की तुम हो चुकी हो, ऐसा करना पाप है और अपराध भी। भ्रूण ने कहा कि आप नहीं कर सकतीं, पर दूसरे डॉक्टर तो यह करते ही हैं। किसी डॉक्टर ने ही तो बताया था कि माँ के पेट में कन्या है, तभी तो माँ के साथ इतना क्रूर बर्ताव हुआ। माँ को जब उसका पति मार रहा था, तो बोला ''अगर पैदा ही करना है, तो लड़का पैदा करो, मेरा वंश तो चलेगा। लड़की की रखवाली हर वक़्त कौन करेगा, कहीं रेप-वेप हो गया तो किसको मुँह दिखाएँगे, लड़की पैदा करके क्या दहेज में अपनी सारी सम्पत्ति किसी ग़ैर को दे दें ?'' 

''डॉक्टर, आप ही बताइए क्या ऐसे घर में मेरा जन्म लेना मुनासिब है? अगर इन सब के बाद भी बच गई, तो जन्म के बाद जाने क्या हो? जाने कब कौन हवस का शिकार बना ले। हर वक़्त बदन के अंदर झाँकती नज़रों से कहाँ बच पाऊँगी। इन सबसे गुज़रते हुए बड़े होने पर अगर कोई मन को भा जाए, तो क्या पता मुझे इसकी क्या सज़ा मिले, मुमकिन है हम दोनों की हत्या कर दी जाए।  यह भी सम्भव है कि किसी के इसरार पर इन्कार करूँ, तो तेज़ाब से जलाकर मुझे विकृत कर दे। अगर इन सब हादसों से बच जाऊँ और विवाह की बात हो, तो दहेज की जुगाड़ में माँ-बाप के अवसाद की वजह बनूँगी और मेरा मन कुण्ठाग्रस्त हो जाएगा। अगर यह भी सही सलामत निपट जाए, तो क्या मालूम और ज़्यादा दहेज के लिए जला दी जाऊँ, चरित्रहीन बताकर निष्काषित कर दी जाऊँ, मुझे आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़े। यह भी मुमकिन है कि किसी की धूर्तता से मैं भी माँ-सी बन जाऊँ, जिसे इस आरोप में बार-बार प्रताड़ित किया जाए कि पेट से क्यों हुई या पेट में कन्या-भ्रूण क्यों?'' 

''डॉक्टर, मुझे नहीं जीना ऐसी दुनिया में, मुझे नहीं बनना अपनी माँ की तरह और न चाहती हूँ ऐसी ख़ौफ़नाक ज़िन्दगी, जिसमें हर पल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए प्रहार और आघात सहूँ। लोगों के तिरस्कार और घृणा की पात्र बनूँ। भ्रूण से लेकर जन्म होने और उसके बाद मृत्यु तक तमाम उम्र दहशत में जियूँ। अपने जीवन के वास्ते दूसरों की मेहरबानी के लिए याचना करती रहूँ और एक-एक दिन यह सोचकर व्यतीत करूँ कि चलो आज तो सुरक्षित रही। जानती हूँ मुझे मार ही दिया जाना है, चाहे तुम मारो या दूसरी डॉक्टर। माँ के साथ मैं भी हर वक़्त डरी होती हूँ कि कब क़त्ल कर दी जाऊँ। पल-पल मृत्यु की प्रतीक्षा बहुत ख़ौफ़नाक होती है। मैं नहीं आना चाहती ऐसे घृणित और डरावने संसार में।'' 

''डॉक्टर, तुम ही सोचो! दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती को पूजने वाले भी अपने लिए कन्या नहीं चाहते। यह माना जाता है कि बिना ईश्वर-कृपा कुछ नहीं होता, फिर तो ईश्वर की इच्छा से ही कन्या-भ्रूण भी माँ के गर्भ में आती है न! पर अब लगता है कि शायद ईश्वर के हाथ में जीवन-मृत्यु नहीं, डॉक्टर चाहे तो परखनली द्वारा बच्चे को जन्म दे और चाहे तो किसी को मृत्यु। मैं जन्म नहीं लेना चाहती डॉक्टर, मुझे मार दो।''

जो डॉक्टर पाप-पुण्य और कानून की बात सुनाकर क़त्ल करने से मना कर रही थी, उसी ने पैसे से पाप को पुण्य में बदल दिया। भ्रूण की मृत्यु-याचना के कारण नहीं; बल्कि स्त्री के पति के पैसे से उसने पुण्य कमाया। डॉक्टर ने कसाई बनकर माँ के बदन से भ्रूण को निकाला। एक चीख और फिर निःस्तब्धता! स्त्री और मानवता फिर से हारी, पुरुष जीत गया।

-जेन्नी शबनम (8.3.2006)
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Thursday, March 8, 2012

35. आधी दुनिया अधूरे ख़्वाब


चित्र - मेरे द्वारा
शायद 21वीं सदी का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि विकास के तमाम आयामों को प्राप्त करने और सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को निरन्तर मज़बूत बनाए रखने की सफल कोशिशों के बावजूद स्त्री-विमर्श ज़िन्दा है। ये न सिर्फ़ किताबों, कहानियों, कविताओं तक सीमित है, बल्कि हर पढ़े-लिखे और अनपढ़ नागरिकों के मन में पुरज़ोर ढंग से चल रहा है। आज जब हम महिलाओं के पिछड़ेपन की बात करते हैं, तो इसका सबसे बड़ा कारण मातृसत्तात्मक समाज का ख़त्म होना और पितृसत्तात्मक समाज का उदय होना दिखाई पड़ता है। जैसे-जैसे समाज पुरुष-प्रधान बनता गया स्त्री हमेशा के लिए पुरुष-वर्ग की 'सर्वहारा' बनती गई। एक-एककर स्त्री के सारे अधिकार पुरुष को मिलते गए और स्त्री ग़ुलाम बनती गई। सत्ता के हस्तान्तरण ने स्त्री की अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। धीरे-धीरे स्त्री सम्पत्ति बनती गई, जिसका स्वामी उसका निकट सम्बन्धी होने लगा। पुरुष की सुविधा, विलासिता और स्वेच्छाचारिता के लिए स्त्री उपभोग की वस्तु बन गई। 
 
पूँजीवाद और साम्राज्यवाद तेजी से विकसित हो रहे थे, तब औद्योगीकरण का प्रभाव बढ़ने लगा। महिलाओं का आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से शोषण बढ़ता जा रहा था। पूँजीवाद के कारण आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा और फिर घर सँभालने के साथ मज़दूरी करने का दोहरा बोझ स्त्री पर पड़ा। स्त्रियाँ रोज़गार के लिए घर से बाहर निकलने लगीं, कारख़ानों और लघु उद्योगों में काम करने लगीं। एक तरफ़ घर की ज़िम्मेदारियाँ, दूसरी तरफ़ मालिकों-महाजनों का क़हर। सामान्य अधिकारों से वंचित ये स्त्रियाँ टूट रही थीं और ख़ुद को स्थापित करने के लिए एकजुट हो रही थीं। उन्हें कारख़ानों में समान काम के लिए पुरुष से कम वेतन मिलता था, काम के घंटे अधिक थे, प्रसव-काल में अलग से कोई सुविधा नहीं दी जाती थी। स्त्रियों के सवाल भी एक और दास्ताँ भी एक। धीरे-धीरे महिलाएँ अपनी अस्मिता और अपने अधिकार के लिए सचेत और संगठित होने लगीं। चिनगारी सुलगने लगी। महिलाओं द्वारा अपने अधिकार के लिए उठाई गई आवाज़ को कुचल दिया जा रहा था। स्थिति असह्य और विस्फोटक होती गई और महिलाओं का संघर्ष क्रान्ति का रूप लेने लगा। 
 
चित्र - मेरे द्वारा
महिलाओं के शोषण पर 19वीं शताब्दी के अंत से सवाल उठने शुरू हुए और 20वीं शताब्दी के शुरुआत में एक आन्दोलन का रूप ले लिया। समाजवादी और कम्युनिस्ट आन्दोलन ने सबसे पहले महिलाओं के मुद्दे को अपने कार्यक्रम में व्यापक रूप से शामिल किया। जर्मनी में वर्ष 1890 में समाजवादी महिला आन्दोलन की शुरुआत हुई, जिसमें काम के घंटों में कमी, पुरुषों के बराबर मज़दूरी, बाल मज़दूरी का उन्मूलन, महिलाओं को मत देने का अधिकार आदि मुद्दों को शामिल किया गया। वर्ष 1908 में न्यूयार्क के कपड़ा-मिल मज़दूर महिलाओं ने अपने काम के घंटे में कमी, बेहतर वेतन और वोट के अधिकार के लिए विशाल प्रदर्शन किया। 28 फरवरी 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमेरिका द्वारा पहली बार 'नेशनल वुमेन डे' मनाया गया, तब तक दुनिया भर में स्त्री चेतना का संघर्ष निर्णायक दौर में पहुँच चुका था। तत्पश्चात वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में महिलाओं के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया गया और वर्ष 1911 में पहली बार 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' मनाया गया। इस दिन ऑस्ट्रिया, जर्मनी, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड में लाखों की तादाद में महिलाओं ने रैली निकाली और प्रदर्शन किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शान्ति स्थापित करने के लिए महिलाओं ने इस दिन महिला दिवस मनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1977 में सरकारी तौर पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मान्यता प्रदान कर प्रस्ताव पारित किया कि विश्व के समस्त देश इस दिन को महिलाओं के अधिकार के लिए समर्पित करें और महिला दिवस मनाएँ। 
बाएँ से - मैं, ग्रामीण स्त्री, सहयोगी शिक्षिका
महिलाओं के अधिकारों के लिए किया जाने वाला संघर्ष पूर्णतः सफल नहीं हो पाया। अपितु बहुत सारे अधिकार प्रदान किए गए और स्थिति में काफ़ी बड़ा परिवर्तन आया। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से स्त्री को पुरुष के बराबर अधिकार मिले। वेतन, वोट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में स्त्री को बराबर की भागीदारी मिली। क़ानून द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार के लिए क़ानून में कई सुधार और संशोधन किए गए। हर क्षेत्र में महिलाओं के लिए समान अवसर निश्चित किए गए। ग़ौरतलब है कि महिलाओं के संघर्ष-आन्दोलन को पश्चिमी देशों में जितनी मान्यता और सफलता मिली अन्य जगहों में नहीं।
ग्रामीणों द्वारा उत्सव नृत्य
महिलाओं के संघर्ष की गाथा जितनी पुरानी है, उतनी ही बेमानी लगती है क़ानून से प्राप्त अधिकारों के साथ महिला की ज़िन्दगी। काग़ज़ पर सारे अधिकार मिल गए; लेकिन वास्तविक रूप में स्थिति आज भी शोचनीय है। हमारे देश में आज भी स्त्रियाँ दोयम दर्जे की ज़िन्दगी जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में आज भी स्त्रियाँ पुरुष के मुक़ाबले बहुत पीछे हैं। बाल विवाह, अशिक्षा, दोहरी मानसिकता, दहेज, बलात्कार आदि समस्या दिन-ब-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, अंधविश्वास के कारण प्रताड़ना और हत्या, ऑनर किलिंग आदि घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। बड़े-बड़े महानगरों के अपवाद को छोड़ दें, तो सम्पूर्ण देश की महिलाओं की हालत आज भी एक जैसी त्रासद है।
मेरे साथ ग्रामीण बच्चे और सहयोगी
आज महिला आन्दोलन को महिला आरक्षण तक सीमित किया जा रहा है और शासक की इस चाल को समझते हुए भी महिला दिवस मनाकर संतोष कर लिया जाता है। हर साल की तरह हर साल महिला दिवस मनाया जाता है। कुछ औपचारिक कार्यक्रम, भाषण, व्याख्यान, स्त्री सशक्तीकरण के कुछ उदाहरण पर संतुष्टि, आरक्षण का मुद्दा और फिर 'महिला दिवस' एक साल तक के लिए समाप्त।
ग्रामीणों के साथ मेरी सहयोगी
स्त्री सशक्तीकरण और स्त्रियों के अधिकार की लड़ाई महज़ महिला दिवस मना लेने से कतई सम्भव नहीं है। जब तक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होगा, महिलाओं की स्थिति यथावत् रहेगी। ये तय है कि महिलाओं को सम्पूर्ण आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक अधिकार समाजवाद से ही सम्भव है। इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं, जिससे महिलाओं की स्थिति पर गम्भीरता से विचार किया जाए। सिर्फ़ कानून बनाकर सरकार द्वारा कर्तव्यों की इतिश्री न समझी जाए। जितने भी स्त्री उत्थान के लिए कानून बने, सभी विफल हुए या फिर उस कानून की आड़ में सदैव मनमानी की गई, चाहे स्त्री द्वारा या पुरुष द्वारा। कानून असफल हो गए, नियम  ध्वस्त हो गए। आज स्त्री जिस कुण्ठा में जी रही है, उससे निःसन्देह समाज में अस्थिरता आएगी। स्त्री को प्रारब्ध से मिले असंगति का निवारण न सरकार कर पाती है न समाज न तथाकथित ईश्वर।
होली मिलन - ग्रामीणों के साथ मैं
-जेन्नी शबनम (8.3.2012)
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Wednesday, February 15, 2012

34. शान्तिनिकेतन की स्मृतियाँ (भाग- 3)

भाग-1: https://saajha-sansaar.blogspot.com/2011/08/blog-post.html
 
भाग-2: https://saajha-sansaar.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html
 
गौर किशोर घोष

प्रकृति का प्राकृत सुन्दर रूप, हर तरफ़ हरियाली, जीवन्तता, भारतीय कला-संस्कृति की अनुगूँज, सहज और सरल जीवन-शैली, विचार में मौलिकता, आपसी प्रेम-सौहार्द आदि कितनी ही विशेषताओं का सम्मिलित स्वरूप 'शान्तिनिकेतन' है। शिक्षित और विचारशील लोग जिनके जीवन में वैसे ही उतार चढ़ाव हैं, जैसे हर मनुष्य के जीवन में होते हैं; लेकिन उन सबको लेकर जीवन को पूरी शिद्दत से जीना ताकि चैन के पल जीवनभर स्थिर रहे, शायद यहाँ की मिट्टी या गुरुदेव के सोच की देन है। गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की कर्मभूमि 'शान्तिनिकेतन' शब्द ही हृदय में शान्ति और सरल जीवन का अनुभव करा देता है। कला के किसी भी क्षेत्र का मर्मज्ञ हो या जिज्ञासु, जीवन में एक बार गुरुदेव की भूमि पर जाकर उस स्थान को अनुभव करना चाहता है, जिसे कला, शान्ति और संस्कृति का पर्याय कह सकते हैं।  
 
शान्तिनिकेतन से मेरा नाता सुकून पाने जैसा रहा; क्योंकि वहाँ मेरा जाना कतिपय किसी उद्देश्य के लिए नहीं था और न वहाँ जाने के लिए मैंने कोई प्रयास ही किए। जीवन में चलते हुए कई बार अचानक ऐसे मोड़ आ जाते हैं कि सब कुछ उलट-पलट हो जाता है। ऐसा भी होता है कि अपार कठिनाइयों को पार कर एक नई दुनिया और नए लोक में पहुँच जाते हैं; जहाँ के लिए मन ने सोचा भी न होता है; शायद ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ।यों कुछ कठिनाइयाँ बचपन में आ गई थीं, जब पिता का देहान्त हुआ था। फिर भी जीवन में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा; क्योंकि उस समय भविष्य की समझ नहीं थी। उसके बाद का सबसे कठिन और दुःखद समय था, जब वर्ष 1989 में भागलपुर दंगा हुआ और हमारे घर में पनाह लिए लोगों में से 22 का क़त्ल कर दिया गया। उसके बाद से उस घर में रहना बहुत कठिन भरा समय था। कई महीनों तक किसी रिश्तेदार के घर में हम लोगों ने समय काटा; क्योंकि उस घर में जाने से भी हृदय काँपता था।
 
मेरे जीवन में शान्तिनिकेतन के साथ भागलपुर दंगा का अजीब सम्बन्ध जुड़ गया है। वर्ष 1990 का शायद फरवरी-मार्च का महीना था। दिल्ली की एक पत्रकार 'नलिनी सिंह' ने भागलपुर के दंगे पर वृत्तचित्र बनाया, जिसमें अन्य रिपोर्ट के साथ मेरे घर पर हुए दंगे की रिपोर्ट भी थी और उसका राष्ट्रीय प्रसारण हुआ। कोलकाता के एक दैनिक अख़बार 'आनन्द बाज़ार पत्रिका' से सम्बद्ध गौर किशोर घोष ने इस ख़बर को सुना। कुछ लोगों की एक टीम बनाकर वे भागलपुर आए, ताकि पीड़ितों के बीच सौहार्द और सद्भावना स्थापित करने में सहयोग कर सकें तथा उन ख़बरों तक पहुँच सकें, जहाँ अब तक मीडिया की नज़र नहीं गई थी। उसी दौरान वे मेरे घर आए। दंगे पर एक पूरी रिपोर्ट तस्वीर के साथ उन्होंने 17 जून 1990 के आनन्द बाज़ार पत्रिका में छापी। उस रिपोर्ट के बाद कई अख़बारों में ख़बर छपी, जिनमें 15 जुलाई 1990 को नव भारत टाइम्स तथा 29 जुलाई 1990 को सेंटिनल प्रमुख है। इस दौरान गौर दा के साथ मैं और मेरी माँ ने भागलपुर में सद्भावना-कैम्प में हिस्सा लिया। गौर दा ने मेरी मानसिक स्थिति को समझते हुए कहा कि एम.ए. की परीक्षा के बाद मैं उनके साथ चलूँ।
सबसे बाएँ- मेरी माँ प्रतिभा सिन्हा, बीच से दाएँ दूसरे- गौर दा
शान्तिनिकेतन की धरती पर मैं पहली बार गौर दा और अपनी माँ के साथ पहुँची। दिन और महीना तो अब याद नहीं पर गर्मी का मौसम था। गौर दा हमें रिक्शे से लेकर शान्तिनिकेतन के रतनपल्ली में 'रंजना' नामक मकान में आए, जहाँ हमारे ठहरने का प्रबन्ध किया गया था; वह मकान बानी सिन्हा का घर था। बानी दी उनकी मित्र थीं और भागलपुर दौरे पर कई बार आई थीं। हम बानी दी और गौर दा के साथ उनके उन सभी मित्रों के घर गए, जो शान्तिनिकेतन में रहते थे। सभी लोगों ने बहुत उत्साह से हमारा स्वागत किया। गौर दा के साथ बानी दी, श्यामली दी (खस्तगीर) और मनीषा बनर्जी अक्सर भागलपुर आते रहते थे, तो उनसे पूर्व परिचय था। विश्वभारती विश्वविद्यालय की प्रो वाइस चांसलर और विनय भवन की प्राचार्या सुश्री आरती सेन, जो गौर दा की मित्र थीं, के घर अक्सर हमलोग जाते थे। आरती दी बहुत ही सरल और संवेदनशील महिला थीं। अब जब 20 साल बाद मैं दोबारा शान्तिनिकेतन गई, तो पता चला कि वे अवकाश प्राप्त कर चुकी हैं; उनके बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
बाएँ- आरती दी की बहन, गौर दा, मेरी माँ
मेरी सभी परीक्षाओं के ख़त्म होने के बाद दोबारा मैं शान्तिनिकेतन आ गई।गौर दा मुझे लेने स्टेशन आए थे। उस दौरान कई लोगों से मुलाक़ात हुई, कुछ बैठकों में मैंने भी हिस्सा लिया। यहाँ आकर नहीं लगता था कि मैं किसी अनजान अहिन्दी-भाषी प्रदेश में हूँ। सभी लोग मुझसे हिन्दी में बात करते थे, भले उन्हें बोलने में असुविधा हो। गौर दा ने कहा था कि मैं आकर यही रहूँ, तो मैं अपने कुछ सामान के साथ आ गई थी। रतनपल्ली के उस मकान 'रंजना' में बानी दी कई सालों से किराए पर रह रही थीं। दो कमरे का मकान जिसमें एक कमरे में दो अलग-अलग चौकी लगी थी, जिस पर मैं और बानी दी सोते थे। बानी दी बहुत अच्छा सूप बनाती थीं। अक्सर रात का हमारा खाना ब्रेड और सूप होता था। यों काम करने वाली एक स्त्री 'कालीदासी' थी जो खाना बनाती थी। बानी दी को कुत्ते पालने का बहुत शौक़ था, जो आज भी है। मकान के मुख्य दरवाज़े पर एक कमरा था; जहाँ एक देशी कुतिया अपने 6 -7 बच्चों के साथ रहती थी। 
 
बानी दी का नियम था- सुबह वक़्त पर तैयार होकर विश्वभारती विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में जाना। जिस दिन देर हो जाती तो कहतीं- ''उफ़ आज फिर से हमको देर हो गिया।'' मैं सोचती कि जब वे कोई नौकरी नही करतीं, फिर देर हो जाने से परेशान क्यों होती हैं। वे सिर्फ़ पढ़ने के लिए लाइब्रेरी जाती थीं। अपना सारा समय लाइब्रेरी में व्यतीत करती हैं। एस्ट्रो फिजिक्स उनका प्रिय विषय है। हर दिन शाम को बानी दी की मित्र मंडली एकत्र होती थी। उसमें अलग-अलग विषय और वर्ग के कॉलेज के छात्र होते थे। सभी मिलकर चाय या कॉफ़ी बनाते और ख़ुद बर्तन धोकर रख देते थे। कभी-कभी वे टेलिस्कोप से किसी ग्रह या तारे के बारे में बतातीं। पशु-पक्षियों के बारे में पढ़ना उन्हें बहुत पसन्द है।
बाएँ- मैं, लुत्फा दी, बानी दी, नाम याद नहीं, दीपान्निता, मनीषा
बानी दी को कोलकाता जाना था, तो कुछ दिन के लिए मैं मनीषा की अतिथि बनकर उसके साथ मृणालिनी छात्रावास में रही। मनीषा विश्वभारती विश्वविद्यालय में अँगरेज़ी विषय से एम.ए. कर रही थी। एक कमरे में चार छात्राएँ थीं और सभी ने अपनी चौकी को एक साथ जोड़ लिया था, इसलिए मेरे होने से उन्हें दिक्क़त नहीं हुई। कमरे से लगा हुआ शौचालय था। मेस का खाना पारम्परिक बंगाली तरीक़े का बेहद साधारण था, जिसके स्वाद में मीठापन होता है। मेस में बनी चुकन्दर और गाजर की तरकारी मुझे बहुत पसन्द थी; जबकि वहाँ की छात्राओं को पसन्द नहीं थी। कुछ लड़कियाँ जिन्हें एक पूरा कमरा रहने के लिए मिला था, अपने लिए खाना भी बनाया करती थीं। उस छात्रावास में मैं बहुत कम समय रही; लेकिन बहुत अच्छा लगा वहाँ रहना। छात्रावास जैसा कोई बन्धन नहीं लगा। शायद शान्तिनिकेतन की हवाओं में भी अपनापन है। मनीषा और उसकी कुछ मित्रों के साथ बोलपुर के एक सिनेमा हॉल में हमलोग एक बांग्ला सिनेमा देखने गए; क्योंकि अब तक मैं बांग्ला समझने और थोड़ा-थोड़ा बोलने लगी थी। 'आशिकी' सिनेमा के गीत का बंगाली रूपांतरण का कैसेट खरीद लाई और ख़ूब सुना करती थी।
श्यामली दी और मैं
एक दिन गौर दा विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति के घर मुझे ले गए। कुलपति श्री असिन दासगुप्ता ने मुझसे कहा कि तुम मुझसे हिन्दी में बात करो, तुम हमको हिन्दी सिखाओ हम तुमको बांग्ला सिखाएँगे। भागलपुर के दंगे की घटना की बात हुई। गौर दा और कुलपति ने विचार किया कि विश्वविद्यालय में किसी कोर्स में मेरा नामांकन करा दिया जाए। कुलपति ने कोई प्रावधान बनाया जिसके तहत मेरा नामांकन हो सके। जब पेपर में यह ख़बर छपी कि भागलपुर से आई एक लड़की के नामांकन के लिए कुलपति ने ख़ास नियम की घोषणा की है, तो बिहार के कुछ छात्र बानी दी के घर आए और इस ख़बर के बारे में बताया। वे पूछने लगे कि कौन है वह लड़की, क्योंकि बानी दी भागलपुर जाया करती थीं। जब बानी दी ने बताया कि वह मैं हूँ, तो सभी अचम्भित हुए कि इतने दिनों से मैं रह रही हूँ और किसी को यह जानकारी नहीं थी। 
 
कुलपति बहुत सरल इंसान थे और शायद गुरुदेव के सोच के वारिस। मुझे याद है एक दिन मैं लाइब्रेरी गई। अचानक देखा कि एक सज्जन आए और पुस्तकों की रैक पर पड़ी धूल झाड़ने लगे। वहाँ का चपरासी यह देख हड़बड़ा गया, दौड़कर आया और माफ़ी माँगने लगा। उस रैक को झाड़ने के बाद वे चुपचाप दूसरी तरफ़ चले गए और वह चपरासी जल्दी-जल्दी बाक़ी रैक को साफ़ करने लगा। वे सज्जन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति थे। मैं हतप्रभ होकर यह सब देखती रही। न डाँटा, न ग़ुस्सा किया और कर्त्तव्य का पाठ सिखा दिया। निश्चित ही उनकी सरलता और कार्यशैली गुरुदेव की शिक्षा का परिणाम थी। 
 
एक बार गौर दा के साथ मैं कोलकाता गई तो वे किसी से मिलने गए और मुझे भी साथ ले गए। वे बुज़ुर्ग थे और बहुत शांत और सरल। गौर दा ने हमारा परिचय कराया। बाद में गौर दा ने बताया कि वे विश्वभारती विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति हैं श्री अमलान दत्त। मुझे आश्चर्य हुआ; क्योंकि किसी भी विश्वविद्यालय का कुलपति इतना सहज और सरल नहीं देखा था मैंने, चाहे वो अमलान दा हों या फिर असिन दा। 
बाएँ से- गौर दा, रमा कुंडू, मेरी माँ, श्यामा कुंडू
 
विश्वभारती में बांग्ला और संगीत में मेरा नामांकन हुआ। मुझे अलग एक कमरे की आवश्यकता हुई। बानी दी के मकान के बगल में लुत्फा दी का मकान है। उनके मकान के छत पर एक कमरा मैंने किराए पर लिया। इस बीच काफ़ी लोगों से मेरी पहचान हुई। विश्वविद्यालय में युवा महोत्सव का आयोजन होने वाला था। हर तरफ़ चहल-क़दमी बढ़ गई थी। उन्हीं दिनों मेरी पहचान उत्तर प्रदेश की एक लड़की सुनीता गुप्ता से हुई, जो छात्रावास में रह रही थी। हिन्दी भाषी होने के कारण उससे मित्रता बढ़ गई। वह रोज़ मेरे घर आती, मैं खिचड़ी बनाती और हमदोनों खाकर निकल जाते। मैंने ज़्यादा स्थान नहीं देखे थे, सुनीता मुझे सभी जगह की जानकारी दिया करती। बच्चों का विद्यालय पाठ भवन से गुज़रना बड़ा अच्छा लगता था। संगीत भवन और विद्या भवन भी घूम आई; क्योंकि वहाँ मुझे पढ़ना था।कभी कैंटीन चली जाती, कभी संगीत भवन, जहाँ कोई नाट्य या संगीत का कार्यक्रम होता रहता था।
बाएँ से- मैं, गौर दा, मनीषा, लुत्फा दी
 
शान्तिनिकेतन घूमने के लिए हर समय टूरिस्ट आते रहते हैं। मुझे याद है एक बार मैं और सुनीता कैम्पस में कहीं जा रही थी, तो पर्यटक को वहाँ का लोकल गाइड बांग्ला में बोला ''वह देखो शान्तिनिकतन की लड़की, कितना लम्बा बाल है'', सुनीता के बाल बहुत लम्बे थे घुटने से भी बड़े, और यह सुनकर हम दोनों हँस देते थे। 
 
लाइब्रेरी से साथ लगे मैदान में पौष मेला लगता है। भारतीय लोक कला और संस्कृति के विकास व विस्तार के लिए इस मेला का विशेष महत्त्व है। मेले में हस्तकला, चित्रकला, लोककला, मिट्टी के सामान, धातु के सामान, खिलौने, कलाकृति, विभिन्न प्रान्तों की कसीदाकारी के वस्त्र, शिल्प उद्योग के सामान आदि का प्रदर्शन और बिक्री होती है। एक बड़े से पंडाल में लोक गीत, लोक नृत्य, बाउल गान आदि का आयोजन होता है। विश्वविद्यालय के छात्र और कलाकार भी इसमें हिस्सा लेते हैं। गुरुदेव से सम्बन्धित प्रदर्शनी लगाई जाती है। हर उम्र और तबक़े के लोग तीन दिन तक मेले में डूबे रहते हैं। खाने का सामान बहुत सस्ती दर पर मिलता है। यों भी बंगाल में अन्य जगहों के मुक़ाबले महँगाई काफ़ी कम है। इस मेला को देखने दूर-दूर से लाखों लोग आते हैं। होटल हो या किसी का मकान, इस समय कहीं भी जगह नहीं मिलती है। पौष महीने की सातवीं तिथि से इस मेले का शुभारम्भ होता है। यों विधिवत तीन दिन का मेला होता है; लेकिन लगभग 15 दिन तक चलता है। छोटी-छोटी वस्तुएँ, सजावटी सामान, कपड़े, शॉल, मिट्टी-लकड़ी के आभूषण, वगैरह मेले से मैं ख़ूब ख़रीदती थी।
बाएँ से बानी दी, गौर दा की पत्नी
 
अभी नामांकन-परीक्षा हुई नहीं थी, अतः मैं ख़ाली थी। श्रीनिकेतन के स्कूल के संगीत शिक्षक श्री दुर्गाचरण मजुमदार, जिन्हें दुर्गा दा कहती थी, से बानी दी ने मेरे गाना सीखने का प्रबन्ध किया। दुर्गा दा एक छात्रावास में रहते थे। क़रीब एक महीना रोज़ शाम को मैं उनसे संगीत सीखती रही। यह अलग बात कि मेरे गले ने विद्रोह कर दिया और मैं संगीत सीख नहीं सकी।गाने की क्लास के बाद दुर्गा दा रोज़ मुझे रतनपल्ली छोड़ने आते। मैं अक्सर कालो की दूकान से मिष्टी दोई (मीठी दही) ख़रीदकर लाती और दही-चूड़ा खा लेती थी; क्योंकि रोज़ का खाना पकाना मुझे पसन्द नहीं है।ख़ास अवसर के लिए कुछ ख़ास पकाना मुझे पसन्द रहा है। यों भी मैं खाना को अहमियत नहीं देती, ज़रूरत भर खा लेना पर्याप्त है। मेरे लिए यह ज़्यादा आवश्यक था कि अपने समय को शान्तिनिकेतन के विभिन्न क्रिया-कलाप में लगाऊँ; चाहे वह गौर दा के साथ या श्यामली दी या बानी दी के साथ।
श्यामली दी
एक दिन एक मित्र आया। उसने बताया कि विश्वविद्यालय में रॉक म्यूजिक का ग्रुप आया है। मैं उसके साथ चली गई देखने और सुनने। जीवन में पहली बार ऐसा कार्यक्रम लाइव देख रही थी। कभी श्यामली दी के घर 'पलाश' जो दक्खिनपल्ली में है, कभी मंजु दी के घर, कभी बानी दी के घर जाती रहती थी। मुझे याद है वर्ष 1991 की पहली जनवरी को मैं शान्तिनिकेतन में थी।मेरा अनुमान था कि नए साल के उपलक्ष्य में यहाँ उत्सव होगा, जैसा कि बाक़ी जगह होता है। पर पूरे विश्वविद्यलय में कोई आयोजन नहीं, न ही शान्तिनिकेतन में कुछ भी ख़ास; क्योंकि यहाँ हिन्दी तिथि से सब कुछ होता है। पहली जनवरी को मैं और सुनीता खिचड़ी खाकर किसी के घर मिलने गए। यहाँ बसन्तोत्सव ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है। होली भी बहुत अच्छी तरह यहाँ मनाते हैं। भारतीय संस्कृति और परम्परा का सुन्दर रूप और जीवन यहाँ देखने को मिलता है। 
बाएँ से श्यामा कुंडू, रमा कुंडू, मैं, गौर दा
 
भागलपुर के हमारे कुछ परिचित शान्तिनिकेतन आए। उनके साथ मैं शान्तिनिकेतन के सभी स्मृति-स्थलों पर घूमने गई। यों पहले भी कई बार गई थी, जब भी मन किया। उपासना गृह के बाहर बैठना अच्छा लगता है। विश्वविद्यालय में कहीं भी जाएँ, कला के सुन्दर नमूने ज़रूर दिखते हैं। कला भवन हो या संगीत भवन बहुत सुन्दर चित्रकारी और कलाकृति है। चारों तरफ़ हरियाली, कहीं भी बैठने से सुकून मिलता है। उत्तरायण में स्थित गुरुदेव का पाँचों घर उदयन, कोणार्क, श्यामली, पुनश्च और उदीची भी अपने-अपने तरह का अनूठा मकान है। जब महात्मा गांधी आए थे, तो वे श्यामली में ठहरे थे। उन पलों की स्मृति में बापू और गुरुदेव की तस्वीर श्यामली में लगी है। सभी जगह गुरुदेव की तस्वीर और उनके कला को प्रदर्शित किया गया है। गुरुदेव कुछ लिखते और अगर कुछ ग़लत हो जाए तो उसे इस तरह काटते थे कि एक अलग तरह की आकृति बन जाती थी, जो अपने आप में कला का एक उदाहरण है; गुरुदेव की यह एक अलग शैली भी बन गई। सच है कि कलाकार के मन में कब क्या आ जाता है और किसमें क्या कला दिख जाए, कहना मुश्किल है। उनकी कलाकृति का बेजोड़ नमूना आज भी गुरुदेव के सभी घरों में दिखता है।बिचित्र में, जिसे रबीन्द्र भवन भी कहते हैं, गुरुदेव द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। इन्हें देखकर अजीब-सा रोमाँच और हर्ष होता है। ऐसा लगता है जैसे गुरुदेव अभी-अभी कहीं से आएँगे और अपने किसी घर में बैठकर कोई कविता या गीत रचेंगे या कोई चित्र ही बनाने लग जाएँगे।
  
शान्तिनिकेतन में बानी दी और श्यामली दी के जितने भी मित्र हैं, सभी के घर मैं उनके साथ गई। श्यामली दी के मित्र चीन व जापान से भी हैं, जिनके घर वे मुझे अक्सर ले जाती थीं। पहली बार जापान की चाय बनाने और पीने की अनोखी शैली और परम्परा देखी। जाने कितने लोगों से मेरा परिचय हुआ, कुछ लोगों को तो मैं भी भूल गई हूँ। बातों-बातों में याद आ जाते हैं वे सभी। बानी दी के भाई इन्द्रजीत रॉय चौधरी, जिन्हें टॉम दा कहती हूँ, अक्सर बानी दी के घर आते थे। टॉम दा कोलकाता में रहते हैं। पुरानी कलात्मक वस्तुओं को संगृहित करने का उन्हें शौक़ है। बहुत अच्छे चित्रकार हैं और उनकी कलाओं की प्रदर्शनी लगती रहती है। टॉम दा ने कोलकाता से ताँत की साड़ी मुझे तोहफ़े में दी। किसी ज्योतिष ने मुझे ग्रह की दो अँगूठी पहनने को कहा था, तो टॉम दा ने ख़ुद ही दोनों अँगूठी बनाई। आज भी मेरे पास एक अँगूठी सुरक्षित है और दूसरी कहीं गुम हो गई। बानी दी की एक बहन कोयली दी पूर्वपल्ली में रहती हैं। उनके घर भी अक्सर जाती थी। बांग्ला फिल्म के मशहूर अभिनेता उत्पल दत्त उनके बहुत अच्छे मित्र थे। बानी दी अक्सर मज़ाक में कहतीं कि मेरा दोस्त तो दाढ़ी वाला बुड्ढा है और कोयली का दोस्त सिनेमा का हीरो। बानी दी का तात्पर्य गौर दा से था। गौर दा बड़ी-बड़ी दाढ़ी रखते थे। कोयली दी का पुत्र देवराज रॉय जिन्हें सोमी कहते हैं इन्डियन स्टेटिसटिकल इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली में कार्यरत हैं, जिनसे मैं दिल्ली आने के बाद भी मिली। 
 
शान्तिनिकेतन में किसी की शादी में गई थी, वहाँ पहली बार बंगाली विधि-विधान से शादी की रस्म देखी। उस शादी में अभिनेत्री मुनमुन सेन की नानी आई थीं। बाद में पता चला कि शान्तिनिकेतन में बहुत सारे लोग अवकाश का समय बिताने आते हैं और कई सारे लोगों ने अवकाश प्राप्ति के बाद के बचे हुए समय को शान्ति से व्यतीत करने के लिए यहाँ मकान लिया हुआ है। शान्तिनिकेतन में अधिकतर एक और दो मंज़िल के मकान हैं। सभी मकान में सुन्दर रंग-सज्जा और फुलवारी या फूलों के गमले ज़रूर दिखते हैं, जो आँखों को भी शान्ति प्रदान करते हैं।

मैं जब भी शान्तिनिकेतन से भागलपुर जाती तो शयमाली दी या गौर दा बोलपुर स्टेशन छोड़ने आते थे। श्यामली दी बांग्ला सीखने के लिए बांग्ला अक्षर ज्ञान की एक किताब दीं, जिसे पूरी ट्रेन में मैं पढ़ती और याद करती रही। धीरे-धीरे बोलना सीख गई, बांग्ला पढ़ना-लिखना भी सीख गई।टॉम दा की माँ श्रीमती रेणुका रॉय चौधरी की एक पुस्तक का हिन्दी रूपांतरण का काम मैंने और मनीषा ने मिलकर शुरू किया। लेकिन मुझे शान्तिनिकेतन छोड़ना पड़ा और फिर ज़िन्दगी में इतनी अस्थिरता आई कि मुझसे बांग्ला भाषा भी दूर हुई और शान्तिनिकेतन भी दूर हो गया। 
 
शान्तिनिकेतन से जुड़ी मेरी यादें और अनुभव ऐसे हैं जिन्हें शब्दों में बाँध नहीं पाती हूँ। जिस बेफ़िक्री और मस्ती भरी ज़िन्दगी को मैंने वहाँ जिया है दोबारा वैसी ज़िन्दगी पाना असम्भव है। वहाँ की बातें, वहाँ की यादें, वहाँ के लोग, सब कुछ मेरी स्मृतियों में यथावत हैं। मेरी स्मृतियों का शान्तिनिकेतन आज भी मेरे लिए वैसा ही है, भले कुछ लोग छोड़कर चले गए, कुछ लोग सदा के लिए विदा हो गए। बहुत कुछ बदल गया यहाँ इन दो दशकों में मेरी तरह। 
 
समाप्त!

-जेन्नी शबनम (14.2.2012)
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