Sunday, February 14, 2010

5. प्यार-मोहब्बत वग़ैरह-वग़ैरह

चित्र- गूगल से साभार
'वेलेंटाइन डे' शब्द सुनते ही इसके विरोधियों के मन में अश्लीलता और प्रेमी-प्रेमिका की असहज छवि मन में उभरती है। प्रेम में अश्लीलता कब, कैसे और कहाँ से आ गई, इस पर कभी कोई नहीं सोचता है। प्रेम जीवन की शाश्वतता है, हर युग में इसे स्थान और सम्मान मिला है। हम किसी भी धर्म या मज़हब की बात करें, सभी प्रेम की बात करते हैं। प्रेम के बिना न जीवन सम्भव है न सभ्य समाज, फिर भी प्रेम को लेकर जाने कितनी बहस छिड़ गई है।  
 
प्रेम किसी भी रिश्ते से हो सकता है, किसी से भी हो सकता है, कभी भी हो सकता है, शरीरी और अशरीरी हो सकता है, आध्यात्मिक हो सकता है, इंसान का ईश्वर से हो सकता है। क्यों हम किसी दायरे में रखकर सोचते हैं? शायद प्रेम को किसी रिश्ते से जोड़ने का परिणाम है कि प्रेम की परिभाषा ही नहीं, बल्कि भाषा भी बदल गई है। आज प्रेम का रिश्ता अश्लील और ग़ैरसामाजिक माना जाने लगा है। दो इंसान के बीच अगर प्रेम है, तो उसे आश्चर्यजनक ढंग से चारित्रिक पतन कहा जाता है या प्रेम की परिभाषा को शरीर के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया जाता है।  
 
'वेलेंटाइन डे' हो या पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित कोई परम्परा, हम सभी पाश्चात्य संस्कृति को दोष दे देते हैं, अपनी ग़लती नहीं समझते। पाश्चात्य संस्कृति से बहुत कुछ हम सीखते हैं, लेकिन उसका रूप बिगाड़ देते हैं और फिर जब स्थिति अपने हाथ से बाहर हो जाती है, तब हम उस संस्कृति पर दोष मढ़ देते हैं। 
    
पाश्चात्य संस्कृति में तो प्रेम के लिए मात्र एक दिन माना गया है, जबकि हमारी संस्कृति में सावन का पूरा महीना प्रेम को समर्पित है। किसी भी युग की बात करें, प्रेम जीवन का अहम हिस्सा रहा है। शिव को पाने के लिए पार्वती और सती ने कठोर तपस्या की। राधा-कृष्ण का प्रेम अमर है। प्रेम की पराकाष्ठा की जब बात होती है, तब कृष्ण और मीरा का नाम लिया जाता है।  
फाल्गुन महीने में आने वाले त्योहार होली को रंग के साथ हँसी-ठिठोली का त्योहार भी माना जाता है। यह सिर्फ़ परम्परा ही नहीं; बल्कि हमारी संस्कृति और हमारे ग्रंथ में है। कृष्ण और गोपियों की हँसी-ठिठोली व रास-लीला उस युग में जायज़ था। आज भी होली के अवसर पर अपनी प्रेमिका या पत्नी को रंग लगाना मन की सबसे बड़ी मुराद होती है।  
 
किसी भी बात की अति हो या उस पर पाबन्दी या बंदिश हो, तो हमेशा विकृति आ जाती है। 'वेलेंटाइन डे' आज से 25 साल पूर्व भी मनाया जाता रहा होगा; परन्तु मुझे नहीं याद कि मध्यम वर्ग तक इसकी बहुत ज़्यादा पहुँच थी। मुमकिन है बड़े घरानों में या कुछ ख़ास तबक़ों के बीच इसकी पैठ रही होगी। जैसे-जैसे बाज़ारीकरण और वैश्वीकरण बढ़ता गया, घर-घर में यह पहुँच गया।  
 
आज 'वेलेंटाइन डे' पर न सिर्फ़ विवाद छिड़ गया है, बल्कि दो गुट बन गए हैं। एक पक्ष प्रेम को जीवित रखने के लिए उस संत की याद में इस एक दिन को जीता है, तो दूसरा पक्ष अतार्किक बहस छेड़ इस दिन को जश्न के रूप में मनाने वालों का न सिर्फ़ उत्पीड़न करता है, बल्कि तोड़-फोड़कर अपने ही देश की संपत्ति नष्ट करता है।  
 
प्रेम के लिए अब न समय है किसी के पास, न सोच का इतना विस्तृत दायरा। वक़्त के साथ इंसानी मन भी संकुचित हो गया है। अब न फागुन महीने का वह फगुनाहट छाता है, न सावन महीने में प्रिय से मिलन की व्याकुलता। जीवन का हर आयाम सिमटकर किसी तरह जीवन यापन भर रह गया है।  
 
ऐसे में अगर एक दिन प्रेम को समर्पित कर दिया जाए, तो जीवन में उमंग का एक दिन तो ज़रूर मिलता है। मेरा मानना है कि जीवन का होना और मिटना, महज़ क्षणभर की बात है। तो क्यों न जितने समय हम जीवन में हैं, प्रेम से और प्रेममय जिया जाए तथा एक दिन ही क्यों हर दिन 'वेलेंटाइन डे' मनाया जाए। वेलेंटाइन संत विदेशी थे, तो उनकी परम्परा न मानकर अपनी संस्कृति और परम्परा को मानकर निभाते हुए पूरा साल प्रेम को समर्पित कर दें!  
 
'वेलेंटाइन डे' पर प्रेम के सभी संतों और प्रेम-पीपासुओं को बधाई व शुभकामनाएँ!

-जेन्नी शबनम (14.2.2010)
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Friday, January 29, 2010

4. गांधी, गांधीवाद और गांधीगी

चित्र- गूगल से साभार
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि कल है। गांधी जयन्ती पहले गुज़र चुकी है। गांधी की प्रतिमाओं और उनकी तस्वीरों को पिछली जयन्ती के बाद धोने-पोंछने का यह पहला अवसर आया है। प्रत्येक वर्ष ऐसा ही होता है। जयन्ती और पुण्यतिथि के बीच की अवधि में गांधी जी के साथ कोई नहीं होता है, कड़वी बात तो यह है कि बचे-खुचे गांधीवादी भी नहीं। गांधी-विचार से जुड़े संस्थानों में एक दिन और उनके नाम, तस्वीर पर माल्यार्पण, उनके भजन का पाठ और औपचारिकता ख़त्म! फिर गांधी जयन्ती तक ख़ामोशी! गांधी जयन्ती का इंतिज़ार भी अब इसलिए रह गया है कि उस दिन से खादी के वस्त्र पर छूट मिलना शुरू होता है। विगत कुछ वर्षों में खादी फ़ैशन में आ गया है। खादी का चलन अब सिर्फ़ नेताओं तक सीमित नहीं रह गया। हाँ, यह ज़रूर है कि गांधी टोपी अब कम नज़र आती है। खादी के कपड़े बहुत महँगे होते हैं, जबकि सिंथेटिक कपड़े की क़ीमत कम। ऐसे में ग़रीब आदमी खादी कैसे इस्तेमाल में लाए? यह सच है कि खादी या गांधी को आम जीवन से जोड़ना धीरे-धीरे और भी कठिन होता जा रहा है। उनके सिद्धांतों में किसी को विश्वास है या नहीं, इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता।  
 
गांधी जी के अपने कुछ सिद्धांत थे, जो उन्होंने ख़ुद पर प्रयोग कर तय किए थे। सार्वजनिक हित, अहिंसा, सत्य, करुणा, शाकाहार, सादा जीवन इत्यादि कुछ ऐसे विचार और व्यवहार हैं, जो अब आम जीवन से दूर होते जा रहे हैं।इनकी सार्थकता तो आज भी उतनी ही है; परन्तु जिस तरह से समाज की सोच बदली है, अब ज़रूरी है कि गांधीवाद को परिमार्जित किया जाए। यानी कि गांधीवाद की व्याख्या नए सन्दर्भों में की जाए। आज देश के नेता गांधी के नाम और सिद्धांतो को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल में ला रहे हैं। आम जन गांधी की जीवन शैली को न तो जानता है और न ही उनके सरोकारों से सम्बन्ध स्थापित करने की सोचता है; क्योंकि उसे लगता है कि इस राह पर चलकर ख़ुद को बनाए रखना आज मुश्किल है।


मैं गांधीवादी विचारधारा के गुण-दोष की चर्चा नहीं कर रही, न तो पक्ष-विपक्ष की वकालत कर रही हूँ। परन्तु कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो मैं बचपन से देखती आई हूँ। चूँकि मेरा जीवन उस माहौल में बीता है, तो उन कुछ बातों की चर्चा कर रही हूँ। मेरे पिता भागलपुर विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर थे, गांधीवाद उनके व्याख्यान का मुख्य विषय था। गांधी-विचार पर उन्होंने अपना शोध-कार्य भी किया था। उनके मृत्युपरान्त उनकी पुस्तक छपी जिसका नाम 'सर्वोदया ऑफ़ गांधी' (Sarvodaya of Gandhi) है। मेरे पिता न सिर्फ़ गांधीवाद  पढ़ाते थे, बल्कि उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण गांधीवादी एवं समाजवादी था। इसके साथ वे पक्के नास्तिक थे। इस माहौल में गुज़रा मेरा बचपन मेरे पिता के विचार से प्रेरित हुआ, पर जीवन में पूर्णतः उतार पाना मुमकिन न हुआ। अब उन विचारों से असहमति या आपत्ति नहीं; परन्तु जिस उम्र में ये सब जीती रही, उस समय लगता था कि यह अच्छा नहीं है। 
 
यों मेरे विचार पर मेरे पिता का पूर्ण प्रभाव पड़ा है, जिससे मेरी सोच का दायरा भी बढ़ा है। मुझे याद है बचपन में मेरे घर में नियम था कि सभी को अपना काम ख़ुद करना है, अपने खाये हुए बर्तन को ख़ुद धोना है। मेरे पिता ख़ुद खादी पहनते थे और मेरी माँ को भी खादी ही पहनना होता था; चाहे कोई भी अवसर हो। हम दोनों भाई-बहन के लिए स्कूल ड्रेस के अलावा सिर्फ़ ज़रूरत भर कपड़े ख़रीदे जाते थे। राजनीतिक या सामजिक रूप से कोई कितने ही बड़े पद पर हो, मिलने का समय तय था; सिर्फ़ अपने शोधार्थी छात्रों के लिए वे हर वक़्त उपलब्ध थे। पिता का अधिकतर समय पढ़ने-पढ़ाने और सामाजिक-राजनितिक कार्यों में बीतता था। नाते-रिश्ते में मेरे पिता के जीने के तरीक़े पर आलोचना होती थी; क्योंकि वे जो कहते थे उसे अपने जीवन में उतारते थे, इसलिए आम धार्मिक ख़यालात के लोगों के लिए यह सब नागवार हुआ करता था। मेरे पिता का देहान्त वर्ष 1978 में हुआ। उम्र के साथ मुझे समझ आया कि उनके विचार उचित व न्यायसंगत थे। आज के सन्दर्भ में मैं सोचती हूँ कि क्या ऐसी जीवन शैली आज की पीढ़ी अपना पाएगी। 
 
आज पूरा विश्व आतंकवाद से त्रस्त है। हमारे देश में आतंकवाद, अलगाववाद और कट्टरवादी संगठनों की जड़ें इतनी मज़बूत हो चुकी हैं कि तमाम कोशिशों के बाद भी इन पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। हर इंसान अनहोनी और आतंक के साये में जीवन यापन को विवश है। आतंकवाद, अलगाववाद, कट्टरवाद, सम्प्रदायवाद, जातिवाद आदि कितने ही 'वाद' ने जन्म लेकर हमारे देश की आन्तरिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। ऐसे में मुझे लगता है कि आज फिर से 'गांधीवाद' को अपनाने की ज़रूरत है। गांधीवादी विचारधारा स्वतंत्रतापूर्व जितनी सार्थक थी, आज भी उतनी ही है। इसे आज के परिवेश के अनुरूप ढालकर व्यवहार में लाना आवश्यक है। आज सत्य, अहिंसा, प्रेम जैसे शब्द हमारे अंतर्मन में भी शामिल नहीं रह गए हैं। गांधी सदैव व्यक्ति के मानसिक और आन्तरिक सोच को विकसित कर समूल परिवर्तन के पक्षधर थे। आज के सन्दर्भ में सिर्फ गांधीवाद सार्थक नहीं होगा, जब तक इसमें आधुनिक समाज में प्रचलित गांधीगीरी को शामिल न किया जाए। मेरे विचार से गांधीवाद, समाजवाद और साम्यवाद का मिश्रित स्वरूप गांधीगीरी है। यह कोई मान्य परिभाषा नहीं; बल्कि मेरी अपनी समझ है, जो आज के परिपेक्ष्य में उपयुक्त लगता है।


किसी व्यक्ति के नकारात्मक विचार में मनोवैज्ञानिक तरीक़े से सकारात्मक परिवर्तन ही गांधीगीरी है। 'गांधीगीरी' शब्द जबरन थोपा या मनवाया गया कोई कार्य-व्यवहार लगता है; परन्तु इसके शब्द स्वरूप पर न जाकर इसे व्यवहार में लाया जाए, तो निश्चित ही विश्व की अधिकांश समस्याएँ स्वतः सुलझ जाएँगी। आज लोग अपने दुःख से दुःखी नहीं, बल्कि दूसरों के सुख से ज़्यादा दुःखी हैं। अपराध करना जैसे आज मनोरंजन का साधन बन गया है और जीवन यापन का सरल सुगम रास्ता। अपराधी को अपने अपराध के लिए शर्मिंदगी भी महसूस नहीं होती है। ऐसे में गांधीगीरी के द्वारा मनुष्य में चेतना और जागृति उत्पन्न की जाए, ताकि समाज में जागरूकता आए, तो क्या ग़लत है? जागरूक जनता, प्रशासन, न्यायालय, मनोविश्लेषक, मनोचिकित्सक, पुलिस, नेता आदि एकजुट होकर गांधीगीरी में भागीदार होंगे, तभी विध्वंसकारी शक्तियों पर नियंत्रण एवं नज़ात सम्भव है। जैसे देश की आज़ादी में गांधीवाद सफल रहा, वैसे ही गांधीगीरी के द्वारा इंसान के मन और चेतना की आज़ादी होगी, जिससे उसमें सही सोच पनपेगी और एक सुनहरे भविष्य को हम देख सकेंगे। फिर पूरा विश्व प्रेम और शान्ति से रह सकेगा।

-जेन्नी शबनम (29.1.2010)
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Wednesday, January 20, 2010

3. छोटी बात, जात और मैं

चित्र- गूगल से साभार

लोकसभा की अध्यक्ष मीरा कुमार पर कुछ नेताओं द्वारा की गई जातिसूचक टिप्पणी ने मुझे बहुत दुःख पहुँचाया है। मेरा बीता हुआ कल किसी सिनेमा के फ्लैश बैक की तरह मेरी आँखों के सामने है। मुझे याद आता है जाड़े की दुपहरी का एक ठिठुरता-सा वह दिन जब नर्म धूप खिली थी। घर की छत पर मैं गुनगुनी धूप को सज़दा करते हुए चाय की चुस्कियों के साथ कोई पुराना गाना सुन रही थी। कुछ ही देर बीते होंगे कि तक़रीबन 40-45 वर्ष की एक महिला आई और चुपचाप खड़ी हो गई। पूछने पर उसने अपना नाम बताया और कहा ''हम आपके यहाँ साफ़-सफ़ाई का काम करते हैं, पर... जाति के नहीं हैं।'' फिर उसने कहा ''हम आपके साथ दिल्ली जाएँगे मेरी जात... है।'' मैंने कहा ''अपना नाम और उम्र मेरे स्टाफ को लिखा दो, टिकट में जाति नहीं लिखना होता है।'' फिर वह काम पर चली गई, और मेरे ज़ेहन में जाति का वह सवाल छोड़ गई, जो अमूमन हर जगह ढूँढा जाता है।शायद रूढ़ियों से हमारे मन में यह बस चुका है और ज़िन्दगी के हर क्षेत्र से जुड़ चुका है। चाहते हुए भी इससे परे कोई नहीं जा पाता है।  
 
मुझे अपना बचपन याद आता है। जिसकी गोद में मैं पली थी, वह मेरे गाँव का निम्न जाति का था। हमारे खेत में जो काम करता था, वह भी उसी निम्न जाति का था। जब हमलोग गाँव जाते, अपने पिता के साथ उसके घर जाते और भैंस का बिना उबला हुआ ताज़ा दूध उसके घर में उसके लोटा में पीते थे। हालाँकि उन दिनों गाँव में मेरे पिता की आलोचना भी होती रही और काफ़ी लोग उनके इस सोच से सहमत भी होते रहे। जब भी मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो पाती हूँ कि जाति-बिरादरी के इस दुष्चक्र ने हमसे और इस देश की जनता से कितना कुछ छीना है; लेकिन ये सिलसिला कब ख़त्म होगा, समझ नहीं पाती हूँ।  
 
मुझे याद है मेरी एक फुफेरी बहन की शादी, जो मेरे पिता ने करवाई थी और शादी मेरे ही घर से हो रही थी, शायद 1974-75 की बात होगी। मेरे पिता गांधीवादी और साम्यवादी विचारधारा के थे। उनके एक मित्र के बेटे से बिना दहेज मेरी बहन की शादी हो रही थी। रात में शादी थी और बारात दिन में बुला लिया गया था; क्योंकि गाँव में अँधेरा जल्दी हो जाता है। दिन के भोज में रिश्तेदारों के अलावा बहुत सारे गाँव वाले आमंत्रित थे। बाराती, रिश्तेदार और गाँव वाले सभी लोग एक साथ खाने के लिए पंक्ति में बैठे थे।अचानक किसी एक रिश्तेदार ने उठकर कहा कि कोई खाना न खाओ, खाना बनाने वाली ... जाति की है। कुछ लोग उठकर चले गए कि धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, नहीं खाएँगे। फिर दीदी के होने वाले ससुर, जो मेरे पिता की सोच और जीवन शैली से बहुत प्रभावित थे, ने कहा ''चाहे जो भी खाना बनाए हम तो खाएँगे, जिसे जाना हो जाए।'' खाना बनाने वाली उसी गाँव की थी। चूँकि शादी की बात थी इसलिए गाँव की मानसिकता को सोचकर मेरी दादी ने उसे बुलाया था, जिसका बनाया सभी खा सकें। वह हंगामा उस वक़्त बड़ा मज़ेदार लगा था मुझे। यह समझ नहीं आया था कि जिसका बनाया हुआ हम खाते हैं, सभी लोग खाएँगे तो क्या होगा। बाद में भी मेरे गाँव से निम्न जाति की लड़की काम करने आई। परन्तु मेरे घर में किसी ने नहीं पूछा कि वह काम करने वाली किस जाति की है; क्योंकि मेरे घर आने वाले सभी लोग मेरे पिता के विचार से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे।  
 
मुझे याद आई मेरी शादी के बाद की एक घटना। वर्ष 1992 में दिल्ली में यूनिटेक कंस्ट्रक्शन कम्पनी में लॉ असिस्टेंट (law assistant) के पद पर मैंने नौकरी शुरू की थी। पहली तनख़्वाह मिली तो मेरे नाम में मेरे पति का उपनाम (surname) जोड़कर चेक मिला। मैंने पूछा कि मेरे नाम में उपनाम क्यों जोड़ा गया, सभी प्रमाणपत्रों में तो मेरा यही नाम है। मुझे कहा गया कि शादी के बाद अपने-आप जुड़ जाता है, अगर आपको नहीं जोड़ना तो आप शपथ-पत्र (affidavit) दीजिए या समाचारपत्र में प्रकाशित कराइए, तभी उपनाम नहीं जोड़ेंगे। मुझे बेहद ग़ुस्सा आया। मैंने कहा कि किसी क़ानून में नहीं है कि पति का उपनाम जोड़ा जाए, ये महज़ परम्परा है। अंत में मुझे अख़बार में निकलवाना पड़ा कि मेरा नाम यही है और यही रहेगा; तब मुझे तनख़्वाह मिली।  
 
कुछ लोग कहते हैं कि मेरी जाति का पता कैसे चलेगा, जब धर्म का ही पता नहीं चलता है। अक्सर मैं हँस पड़ती हूँ और सोचती हूँ कि लोगों को क्यों फ़र्क़ पड़ता है कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए कौन-सा रास्ता कौन अपनाता है या ईश्वर को नहीं मानता है। कोई यह तो किसी के बारे में नहीं पूछता कि अमुक खाना ही क्यों पसन्द है अमुक क्यों नहीं, यह रंग ही क्यों पसन्द है कोई दूसरा क्यों नहीं, यह सिनेमा ही क्यों पसन्द है दूसरा क्यों नहीं, यह कपड़ा ही क्यों पसन्द है कुछ और क्यों नहीं। जबकि यह सब तो हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं और हमारी पहचान में शामिल हैं।  
 
ग्रामीण परिवेश में छुआछुत की भावना तो अब ज़्यादा न रही, लेकिन जातिवाद और धर्म से जुड़ी मानसिकता गाँव के विघटन के रूप में सामने आ रही है। शहरों में छुपी हुई जातिवाद की भावना दिखती है, जिसका घृणित और विकृत रूप हम अख़बार में पढ़ते हैं, चाहे राजनीति, शादी-विवाह या कोई कर्म-काण्ड हो। वर्ण-व्यवस्था जब क़ायम हुई होगी, तब सामजिक कर्त्तव्यों के निर्वहन की सुविधा को ध्यान में रखा गया होगा। जो जिस क्षेत्र में पारंगत होगा, उसे उस हिसाब से उस वर्ण में शामिल किया गया होगा। कालान्तर में सब कुछ ऊँच-नीच जाति में बँट गया। जिन कामों में ज़्यादा शारीरिक श्रम वह काम नीचा है, ऐसा क्यों हुआ? कोई तथ्यपूर्ण जवाब नहीं मिलता है मुझे। मेरे अपने विचार से इन सब के जड़ में कहीं-न-कहीं पूँजीवादी व्यवस्था और आधिपत्य बनाए रखने की साजिश थी, जिसका कुपरिणाम आज जाति-भेद का भयंकर और विकराल रूप हम आए दिन देख रहे हैं। हमारे रक्त में जैसे ये ज़हर की तरह घुल गया है। इससे परे अब न इंसान की सोच रह गई है, न उसकी पहचान, न उसका अपना कोई परिचय। धर्म और जाति का सामजिक जीवन से क्या सरोकार? सच कहूँ तो आज तक समझ न आया कि लोगों को इंसान से ज़्यादा उसकी जाति या धर्म में दिलचस्पी क्यों होती है।

-जेन्नी शबनम (20.1.2010)
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Friday, December 11, 2009

2. मोहल्ला मुख्यमंत्री

चित्र- गूगल से साभार
 
हम भी बनेंगे मुख्यमंत्री! हर राजनीतिज्ञ जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनना चाहता है, तो हम क्यों न बनें? कहावत है- ''जिसकी लाठी, उसकी भैंस''। यह बहुत सार्थक कहावत है, आज के समयानुकूल। हर इंसान को नाम, शोहरत और पैसा चाहिए। जब कुछ ख़ास के पास है, तो हम आम लोगों के पास क्यों नहीं? राजनीति से अच्छा आजकल कोई धंधा नहीं, जिसमें सब कुछ मिल जाता है।
 
मित्रो, आइए हम सभी मिलकर एक काम करते हैं। हर मोहल्ले को एक राज्य बनाकर मुख्यमंत्री बना दिया जाए और उस मोहल्ले के हर घर का मुख्यकर्त्ता विधान सभा का सदस्य, हर मोहल्ले में जो सरकारी ज़मीन पर पार्क हो उसे हटाकर वहाँ विधान सभा का भवन बना दिया जाए। सभी मोहल्ला एक राज्य, जिसमें एक मुख्यमंत्री, कई मंत्री, सभी विधान सभा के सदस्य, जिसकी जैसी मर्ज़ी अपना-अपना राज्य चलाएँ।  
 
कैसा लगा मेरा सुझाव? मेरी, आपकी और सबकी महत्वाकांक्षा पूरी हो जाएगी।  
 
अंग्रेज़ों की चाल 'फूट डालो, राज करो' की नीति का परिणाम यह था कि देश दो टुकड़ों में बँटा। सिंहासन-लोभ और राजनैतिक-महत्वाकांक्षा को महात्मा गांधी भी रोक न पाए और देश का विभाजन हुआ, जिसकी पीड़ा आज तक हम सह रहे हैं। देश की आज़ादी के लिए महात्मा गांधी ने जिस अहिंसा और अनशन के द्वारा अंग्रेज़ों को कभी परास्त किया, आज उनके ही समर्थक इस ताक़त को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, अपने स्वार्थ के लिए। बापू की वर्षों की तपस्या और संघर्ष से प्राप्त आज़ाद भारत आज टुकड़ों-टुकड़ों में बँट रहा है। मन तो हर आदमी का बँट चुका है, देश का आतंरिक-भौगोलिक क्षेत्र भी सत्ता-लोभ से बँट रहा है। जाने अब और कितने टुकड़ों में बँटेगा भारत?  
 
तेलंगाना राज्य का गठन होना मात्र एक राज्य के बँटने तक सीमित नहीं है, इसका गठन होना नौ और नए राज्यों के गठन के लिए रास्ता दिखा रहा है, साथ ही देश में आन्दोलनों की एक नई शृंखला शुरू होने जा रही है। बिहार को दो टुकड़ों में बाँटकर एक नया राज्य झारखंड बनाया गया था। अब बिहार के कुटिल-राजनीतिज्ञ उत्तर बिहार को अलग कर नया राज्य 'मिथिलांचल' की माँग कर रहे हैं। उसी तरह गोरखालैंड (पश्चिम बंगाल और दार्जिलिंग का हिस्सा), पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश), ग्रेटर कूच बिहार (पश्चिम बंगाल और असम का हिस्सा), हरित प्रदेश (पश्चिम उत्तर प्रदेश), बुंदेलखण्ड (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का हिस्सा) कूर्ग (कर्नाटक), सौराष्ट्र (गुजरात), विदर्भ (महाराष्ट्र) आदि अलग राज्य के लिए माँग कर रहे हैं। हमारे बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञों की राय है कि देश की तरक्की, विकास, सुधार और सुशासन के लिए राज्यों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटना ज़रूरी है। फिर तो ग्राम-सभा, ग्राम-पंचायत, नगर-पालिका, नगर-पंचायत, जो एक तरह की छोटी-छोटी विधानसभाएँ ही हैं, इन सभी का क्या औचित्य?  
 
असली प्रजातंत्र तो अब यही है कि हर गाँव, कस्बे, मोहल्ले को एक नया राज्य बना दिया जाए। भाषा के आधार पर अलग राज्य, परिधान के आधार पर अलग राज्य, भौगोलिक स्थिति के आधार पर अलग राज्य, संस्कृति के आधार पर अलग राज्य, हर सम्प्रदाय के लिए अलग राज्य, पुरुषों का अलग राज्य, स्त्रियों का अलग राज्य, हर पार्टी के वर्चस्व के आधार पर अलग राज्य, ग़रीबों का एक राज्य, अमीरों का एक राज्य, दलितों का एक राज्य।जाति, उपजाति, गोत्र, पिंड, टोटम, देवी-देवता, भाषा, क्षेत्रीय भाषा, रहन-सहन, सन्दर्भ समूह, इन सभी आधार पर भी राज्य बाँट सकते हैं।  
 
छोटे-छोटे राज्यों में बँटकर किसकी साध पूरी होगी? जाने राजनीतिज्ञों की ये सत्ता की भूख देश को कहाँ लेकर जाएगी? देश की प्रगति के लिए राज्यों का अब और बँटवारा उचित नहीं; बल्कि देश की अखण्डता को बनाए रखना ज़रूरी है। आज देश में ग़रीबी, अशिक्षा, भूखमरी, महँगाई, पानी, बिजली, प्राकृतिक आपदा, आतंकवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयता, हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार, इत्यादि ऐसे गम्भीर मसले हैं, जिससे हर आम और ख़ास नागरिक प्रभावित होता है। राजनीतिज्ञों की सत्ता-लोलुपता का ही नतीजा है कि देश के इतने टुकड़े हो चुके हैं, फिर भी वे संतुष्ट नहीं। राज्य का विभाजन ही नहीं, बल्कि इंसानों के विभाजन में भी वे कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। एक तरफ़ सम्पूर्ण दुनिया में वैश्वीकरण की बात होती है, तो दूसरी तरफ़ देश के भीतर इतना ज़्यादा विभाजन। किस-किस प्रकार से बाँटते रहेंगे? देश के बाद राज्य के विभाजन में देश का सुन्दर भविष्य देखने वाले इन देश-भक्त नेताओं से किसकी तरक़्क़ी की उम्मीद करें?  
 
आश्चर्य है, सत्ता पक्ष हो या विपक्ष कैसे किसी राज्य को बाँटने के लिए तैयार है?

-जेन्नी शबनम (11.12.2009)
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Sunday, December 6, 2009

1. राम जन्मभूमि : बाबरी मस्जिद