Sunday, July 3, 2022

96. लम्हा-लम्हा एहसास - अनुपमा त्रिपाठी 'सुकृति'

 
अनुपमा त्रिपाठी और मैं
जेन्नी शबनम की पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' पढ़ रही हूँ। लम्हों के सफ़र में लम्हा-लम्हा एहसास पिरोये हैं। अपनी ही दुनिया में रहने वाली कवयित्री के मन में कसक है, जो इस दुनिया से ताल-मेल नहीं बैठा पाती हैं। बहुत रूहानी एहसास से परिपूर्ण कविताएँ हैं। गहन हृदयस्पर्शी भाव हैं। प्रेम की मिठास को ज़िन्दगी का अव्वल दर्जा दिया गया है। दार्शनिक एहसास के मोतियों से रचनाएँ पिरोई गई हैं। किसी और से जुड़कर उसके दुःख को इतनी सहृदयता से महसूस करना एक सशक्त कवि ही कर सकता है। पीड़ा को, दर्द को, छटपटाहट को शब्द मिले हैं। ज़मीनी हक़ीक़त से जुड़ी तथा जीवन की जद्दोजहद प्रस्तुत करती हुई कविताएँ हैं। सभी कविताओं को सात भाग में विभाजित किया है: 
1.जा तुझे इश्क़ हो 2.अपनी कहूँ 3. रिश्तों का कैनवास 4. आधा आसमान 5. साझे सरोकार 6. ज़िन्दगी से कहा-सुनी 7. चिन्तन 

रिश्तों के कैनवास में उन्होंने अनेक कविताएँ अपनी माँ, पिता, बेटा और बेटी को समर्पित कर लिखी हैं। 

आइए उनकी कुछ कविताओं से आपका परिचय करवाऊँ। 

'पलाश के बीज \ गुलमोहर के फूल' में बहुत रूमानी एहसास हैं। बीते हुए दिनों को यादकर एक टीस-सी उठती प्रतीत होती है:

याद है तुम्हें 
उस रोज़ चलते-चलते
राह के अंतिम छोर तक
पहुँच गए थे हम
सामने एक पुराना-सा मकान
जहाँ पलाश के पेड़
और उसके ख़ूब सारे, लाल-लाल बीज
मुठ्ठी में बटोरकर हम ले आए थे
धागे में पिरोकर, मैंने गले का हार बनाया
बीज के ज़ेवर को पहन, दमक उठी थी मैं
और तुम बस मुझे देखते रहे
मेरे चेहरे की खिलावट में, कोई स्वप्न देखने लगे
कितने खिल उठे थे न हम! 

अब क्यों नहीं चलते
फिर से किसी राह पर
बस यूँ ही, साथ चलते हुए
उस राह के अंत तक
जहाँ गुलमोहर के पेड़ों की क़तारें हैं
लाल-गुलाबी फूलों से सजी राह पर
यूँ ही बस...!

फिर वापस लौट आऊँगी
यूँ ही ख़ाली हाथ
एक पत्ता भी नहीं
लाऊँगी अपने साथ!

कवयित्री का प्रकृति प्रेम स्पष्ट झलक रहा है। सिर्फ़ यादें समेटकर लाना कवयित्री की इस भावना को उजागर करता है कि उनकी सोच भौतिकतावादी नहीं है। प्रकृति तथा कविता से प्रेम उनकी कविता 'तुम शामिल हो' में भी परिलक्षित होता है, जब वे कहती हैं:

तुम शामिल हो
मेरी ज़िन्दगी की
कविता में...

कभी बयार बनकर
...
कभी ठण्ड की गुनगुनी धूप बनकर
...
कभी धरा बनकर
...
कभी सपना बनकर
... 
कभी भय बनकर
...
जो हमेशा मेरे मन में पलता है
...
तुम शामिल हो मेरे सफ़र के हर लम्हों में
मेरे हमसफ़र बनकर
कभी मुझमे मैं बनकर
कभी मेरी कविता बनकर!

बहुत सुंदरता से जेन्नी जी ने प्रकृति प्रेम को दर्शाया है और उतने ही साफ़गोई से अपने अंदर के भय का भी उल्लेख किया है जो प्रायः सभी में होता है। ऐसी रचनाएँ हैं जिन्हें बार-बार पढ़ने का मन करता है। अब यह रचना पढ़िए 'तुम्हारा इंतज़ार है':

मेरा शहर अब मुझे आवाज़ नहीं देता
नहीं पूछता मेरा हाल
नहीं जानना चाहता
मेरी अनुपस्थिति की वज़ह
वक़्त के साथ शहर भी
संवेदनहीन हो गया है
या फिर नयी जमात से फ़ुर्सत नहीं
कि पुराने साथी को याद करे
कभी तो कहे कि आ जाओ
''तुम्हारा इंतज़ार है!"
प्रायः नए के आगे हम पुराना भूल जाते हैं, इसी हक़ीक़त को बड़ी ही ख़ूबसूरती से बयाँ किया है।

जीवन की जद्दोजहद और मन पर छाई भ्रान्ति को बहुत सुंदरता से व्यक्त किया है कविता 'अपनी अपनी धुरी' में। हमारे जीवन की गति सम नहीं है। इसी से उत्पन्न होती वर्जनाएँ हैं, भय है, भविष्य कैसा होगा। नियति पर विश्वास रखते हुए वे कर्म प्रधान प्रतीत होती हैं। यह कविता ये सन्देश देती है कि भय के आगे ही जीत है। कर्म करने से ही हम भय पर क़ाबू पा सकते हैं। 

'मैं और मछली' में वे लिखती हैं:

जल-बिन मछली की तड़प
मेरी तड़प क्योंकर बन गई? 
...

उसकी और मेरी तक़दीर एक है
फ़र्क महज़ ज़ुबान और बेज़ुबान का है। 
वो एक बार कुछ पल तड़प कर दम तोड़ती है
मेरे अंतस् में हर पल हज़ारों बार दम टूटता है
हर रोज़ हज़ारों मछली मेरे सीने में घुट कर मरती है। 
बड़ा बेरहम है, ख़ुदा तू
मेरी न सही, उसकी फितरत तो बदल दे!

मछली की इस वेदना को कितने शिद्दत से महसूस किया है आपने, जितनी तारीफ़ की जाए कम है। किसी से जुड़कर उसके सोच से जुड़ना कवयित्री का दार्शनिक सोच परिलक्षित करता है। 

ऐसी ही कितनी रचनाएँ हैं जिनमें व्यथा को अद्भुत प्रवाह मिला है। 

हिन्द युग्म से प्रकाशित की गई यह पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध है। 


आशा है आप भी इन रचनाओं का रसास्वादन ज़रूर लेंगे। धन्यवाद!

- अनुपमा त्रिपाठी 'सुकृति' 

1.7.2022
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Wednesday, April 27, 2022

95. भावनाओं को आलोड़ित करता : लम्हों का सफ़र - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

आदरणीय शिवजी श्रीवास्तव द्वारा मेरी पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' की समीक्षा:
शिवजी श्रीवास्तव
भावनाओं को आलोड़ित करता - लम्हों का सफ़र
 
- डॉ. शिवजी श्रीवास्तव


समीक्ष्य कृति- लम्हों का सफ़र
कवयित्री- डॉ. जेन्नी शबनम
पृष्ठ संख्या- 112
संस्करण- प्रथम 2020
मूल्य- ₹120/-
प्रकाशक- हिन्द युग्म ब्लू, सी-31, सेक्टर 20, नोएडा(उ.प्र.)- 201301

          'लम्हों का सफ़र' शीर्षक ही ध्यान आकृष्ट करता है। एक क्षण की अवधि अत्यन्त स्वल्प होती है, उसमें कितने क़दम चला जा सकता है? किन्तु जीवन मे कुछ लम्हे ऐसे भी आते हैं, जो भाव-जगत् को आलोड़ित करते हुए दीर्घ यात्रा पर ले जाते हैं। डॉ. जेन्नी शबनम की काव्य-कृति 'लम्हों का सफ़र' ऐसे ही संवेदनशील अनुभव-यात्रा को कविता में अभिव्यक्त करती हुई कृति है। सात शीर्षकों में विभक्त इस पुस्तक का हर शीर्षक जीवन का एक यादगार लम्हा है, एक-एक लम्हे की अपनी कई कहानियाँ हैं, कहीं दर्द है, कहीं प्रेम है, कहीं नारी-नियति के चित्र हैं, कहीं उलाहने हैं, कहीं दायित्व-बोध है तो कहीं घनीभूत करुणा की चरमावस्था है। कवयित्री ने विविध अनुभूतियों को बड़े सलीके से कविता में पिरोया है। 
          संग्रह के प्रथम खण्ड- 'जा तुझे इश्क़ हो' के अन्तर्गत सात कविताएँ हैं। ये सातों कविताएँ प्रेम की घनी अनुभूति की, प्रेम करने की, प्रेम में टूटने की और प्रेम में होने की कविताएँ हैं। 'प्रेम करने' में और 'प्रेम में होने' में बड़ा फ़र्क है। जो प्रेम में होता उसका समग्र व्यक्तित्व प्रेममय होता है, इमरोज़ इसका उदाहरण हैं। जेन्नी जी अमृता-इमरोज़ के सम्पर्क में बहुत रही हैं। वे जानती हैं कि प्रेम करना सरल है, पर प्रेम में होना कठिन है, लोग प्रेम तो करते हैं पर प्रेम में नहीं होते। इमरोज़ प्रेम में थे, पर हर प्रेम करने वाला इमरोज़ नहीं बन सकता - इसी भाव भूमि पर लिखी कविता 'क्या बन सकोगे एक इमरोज़' में वे कहती हैं- ''ये उनका फ़लसफ़ा था / एक समर्पित पुरुष / जिसे स्त्री का प्रेमी भी पसंद है / इसलिए कि वो प्रेम में है।'' इसी खण्ड की कविता 'जा तुझे इश्क़ हो' में भाषा की व्यंजना चमत्कृत करती है, शायद ही कभी किसी ने किसी को ये शाप दिया होगा ''जा तुझे इश्क़ हो''। वस्तुतः जो प्रेम के मार्ग से नहीं गुज़रे, वे आँसुओं का मूल्य नही जानते, दूसरों की पीड़ा की अनुभूति उन्हें नहीं होती, तो उन्हें यही शाप दिया जा सकता है- ''जा तुझे इश्क हो!'' 
          संग्रह का दूसरा खण्ड है- 'अपनी कहूँ', इसमें पन्द्रह कविताएँ हैं। इस खण्ड में कवयित्री ने अपनी उन अनुभूतियों / पीड़ाओं को अभिव्यक्ति दी है जो निजी होते हुए भी प्रत्येक संवेदनशील मन की हैं। ये कविताएँ 'स्व' से 'पर' तक की अनुभूतियों को समाहित किए हैं, यथा 'मैं भी इंसान हूँ' कविता में हर नारी के मन की पीड़ा देखी जा सकती है- ''मैं एक शब्द नहीं, एहसास हूँ, अरमान हूँ / साँसें भरती हाड़-मांस की, मैं भी जीवित इंसान हूँ।'' 
          जेन्नी जी ने बहुत कम वय में अपने पिता को खोया है, ये पीड़ा उनकी नितांत निजी है, पर ज्यों ही ये पीड़ा - 'बाबा, आओ देखो! तुम्हारी बिटिया रोती है' कविता में व्यक्त होती है, यह हर उस व्यक्ति की पीड़ा बन जाती है, जिसने अल्प वयस में अपने पिता को खोया है। इस खण्ड में प्रबल अतीत-मोह है, बड़ी होती हुई स्त्री बार-बार अतीत में लौटती है और वहाँ से स्मृतियों के कुछ पुष्प ले आती है। समाज मे लड़कियों को अभी भी अपनी इच्छा से जीने की आज़ादी नहीं है, इसीलिए ज्यों-ज्यों लड़की बड़ी होती है, उसका मन अतीत में भागता है। 'जाने कहाँ गई वो लड़की' में इसी दर्द को देखा जा सकता है - ''जाने कहाँ गई, वो मानिनी मतवाली / शायद शहर के पत्थरों में चुन दी गई / उछलती-कूदती वो लड़की''। 'वो अमरूद का पेड़', 'उन्हीं दिनों की तरह', 'ये कैसी निशानी है', 'इकन्नी-दुअन्नी और मैं चलन में नहीं', 'ये बस मेरा मन है', 'उम्र कटी अब बीता सफ़र' ऐसी ही कविताएँ हैं, जिनमे कवयित्री का मन अतीत के भाव-जगत् में डूबता-उतराता रहता है। वर्तमान की त्रासद स्थितियों में अतीत और अधिक लुभाता है, पर कभी-कभी मन विद्रोही भी हो जाता है। 'कभी न मानूँ' में ये विद्रोही स्वर देखा जा सकता है - ''जी चाहता है, विद्रोह कर दूँ / अबकी जो रूठूँ,कभी न मानूँ।" 
          तीसरे खण्ड 'रिश्तों का कैनवास' में सात कविताएँ हैं, सातों कविताएँ नितांत निजी रिश्तों के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, पर ये कविताएँ निजी होते हुए भी सभी को आंदोलित करती हैं। 'उनकी निशानी' सहेजकर रखी गई पिता की पुरानी चीज़ों की कविता है। इसमे बड़ी ख़ूबसूरती से पिता को याद किया गया है- "उस काले बैग में / उनके सुनहरे सपने हैं / उनके मिज़ाज हैं / उनकी बुद्धिमत्ता है / उनके बोए हुए फूल हैं / जो अब बोन्जाई बन गए।'' पिता के न रहने पर माँ की वेदना को 'माँ की अन्तःपीड़ा' में व्यक्त किया गया है। अपने पुत्र के 18वें, 20वें एवं 25वें जन्मदिन पर उपहार स्वरूप लिखी गईं क्रमशः तीन कविताएँ हैं- 'विजयी हो पुत्र', 'उठो अभिमन्यु' और 'परवरिश'। इन कविताओं में कोरी भावाकुता या स्नेह नहीं है, अपित कुछ उपदेश हैं, शिक्षाएँ हैं जो किसी भी युवा के जीवन-रण में संघर्ष के लिए अनिवार्य हैं। प्रत्येक युवा को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होती है, इस तथ्य को वे विजयी हो पुत्र में पुत्र को बतला रही हैं - ''तुम पांडव नहीं / जो कोई कृष्ण आएगा सारथी बनकर / और युद्ध मे विजय दिलाएगा।'' 'उठो अभिमन्यु' में भी वे यही बल नैतिक उपदेशों के साथ प्रदान कर रही हैं- ''क़दम-क़दम पर एक चक्रव्यूह है / और क्षण-क्षण अनवरत युद्ध है... जाओ अभिमन्यु / धर्म-युद्ध प्रारंभ करो / बिना प्रयास हारना हमारे कुल की रीत नहीं / और पीठ पर वार धर्म-युद्ध नहीं।'' अपनी किशोरी पुत्री को उसके 13वें जन्मदिन में भी वे 'क्रांति-बीज बन जाना' कविता में यही प्रबोध देती हैं कि ''सिर्फ़ अपने दम पर / सपनों को पंख लगाकर / हर हार को जीत में बदल देना / तुम क्रांति-बीज बन जाना।'' वहीं पुत्री के 18वें जन्मदिन पर 'धरातल' कविता में वे उसे यथार्थ के धरातल पर चलने का परामर्श देती हैं - ''जान लो / सपने और जीवन / यथार्थ के धरातल पर ही / सफल होते हैं।'' स्पष्ट है ये कविताएँ नितांत निजी होकर भी हर युवा के लिए ज़रूरी परामर्श की भाँति हैं। 
          चौथे खण्ड- 'आधा आसमान' में दस कविताएँ हैं। शीर्षक से ही स्पष्ट है कि इस खण्ड में समाज में स्त्री की स्थिति, पीड़ा, द्वंद्वों और वेदनाओं को स्वर मिले हैं। ये कविताएँ गम्भीर प्रश्न भी उपस्थित करती हैं। 'मैं स्त्री हूँ' कविता बहुत तीखेपन से इस बात को कहती है - ''मैं स्त्री हूँ / इस बात की शिनाख़्त, हर उस बात से होती है / जिसमें स्त्री बस स्त्री होती है / जिसे जैसे चाहे इस्तेमाल में लाया जा सके।'' 'फ़ॉर्मूला' कविता भी इसी पीड़ा को व्यक्त करती है - ''पुरुष के जीवन का गणित और विज्ञान / सीधा और सहज है / जिसका एक निर्धारित फ़ॉर्मूला है / मगर स्त्रियों के जीवन का गणित और विज्ञान / बिलकुल उलट है... उनके आँसुओं के ढेरों विज्ञान हैं / उनकी मुस्कुराहटों के ढेरों गणित हैं।'' इस खण्ड की सभी कविताओं में नारी जीवन का पीड़ाजन्य आक्रोश प्रभावी रूप में व्यक्त हुआ है। 'झाँकती खिड़की', 'मर्द ने कहा', 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' इत्यादि नारी नियति और समाज के दुहरे मानदंडों की कविताएँ हैं। किताबों और हक़ीकत में नारी जीवन में अंतर को 'फूल कुमारी उदास है' कविता में देखा जा सकता है - ''कहानी में, फूल कुमारी उदास होती है / और फिर उसकी हँसी लौट आती है / सच की दुनिया में / फूल कुमारी की उदासी / आज भी क़ायम है।'' ''सच है, कहानी सिर्फ़ पढ़ने के लिए होती है / जीवन मे नहीं उतरती।'' 
          अगले खण्ड 'साझे सरोकार' में नौ कविताएँ हैं। इन कविताओं में सामाजिक विषमताओं और मूल्यहीनता की चिंताएँ हैं। 'शासक' कविता शोषण और शोषक के चरित्र को सामने लाती है - ''इतनी क्रूरता, कैसे उपजती है तुममें / कैसे रच देते हो, इतनी आसानी से चक्रव्यूह / जहाँ तिलमिलाती हैं, विवशताएँ / और गूँजता है अट्टहास।'' 'अब जो बचा है' में नैतिक मूल्यों के ह्रास की चिंता है - 'नैतिकता, जाने किस सदी की बात थी / जिसने शायद किसी पीर के मज़ार पर / दम तोड़ दिया था।'' वर्तमान के प्रति आक्रोश और विद्रोह भी कई कविताओं में देखा जा सकता है, 'आजादी', 'संगतराश', 'नन्ही भिखारिन', 'घर' और 'मालिक की किरपा' ऐसी ही कविताएँ हैं। 
          'भागलपुर दंगा (24.10.1989)' कवयित्री के जीवन में आए भयानक दुःस्वप्न की तरह है। उसकी भयावहता को भी उन्होंने इस कविता में व्यक्त किया है - "कैसे भूल जाऊँ, वो थर्राती-काँपती हवा, जो बहती रही / हर कोने से चीख और ख़ौफ़ से दिन-रात काँपती रही / बेटा-भैया-चाचा सारे रिश्ते, जो बनते पीढ़ियों से पड़ोसी / अपनों से कैसा डर, थे बेख़ौफ़, और क़त्ल ही गई ज़िंदगी।'' इसी वेदना को 'हवा ख़ून-ख़ून कहती है' कविता में भी देखा जा सकता है - 'हवा अब बदल गई है / लाल लहू से खेलती है / बिखेरती है इंसानी बदन का लहू गाँव शहर में / और छिड़क देती है मंदिर-मस्जिद की दीवारों पर / फिर आयतें और श्लोक सुनाती है।'' 
          संग्रह के छठवें खण्ड 'जिंदगी से कहा-सुनी' में दस कविताएँ तथा अंतिम सातवें खण्ड 'चिंतन' में आठ कविताएँ हैं। इन दोनो खण्डों की कविताएँ कहीं दार्शनिक भाव-बोध के प्रश्नों के उत्तर तलाशने की चेष्टा करती हैं तो कभी वैराग्य भाव और कभी अवसाद ग्रस्त होते मन के द्वंद्व को चित्रित करती हैं। गूढ़ विषयों के चयन और जटिल मनःस्थितियों के चित्रण के कारण इन कविताओं में उलझाव अधिक है सहजता कम, यथा 'मैं' कविता में व्यक्त ये दार्शनिक चिंतन - ''जीवन मैं, मृत्यु भी मैं / इस पार मैं, उस पार भी मैं / प्रेम मैं, द्वेष भी मैं / ईश की संतान मैं, ईश्वर भी मैं /आत्मा मैं, परमात्मा भी मैं / मैं, मैं, सिर्फ़ मैं / सर्वत्र मैं।'' कुछ कविताओं के तो शीर्षक भी जटिल हैं, यथा - 'देह, अग्नि और आत्मा...जाने कौन चिरायु', 'हँसी, ख़ुशी और ज़िंदगी बेकार है पड़ी', 'अज्ञात शून्यता', 'रिश्तों का लिबास सहेजना होगा' इत्यादि। वस्तुतः इन दो खण्डों की कविताएँ संग्रह की अन्य कविताओं से अलग धरातल की हैं, जो एक विशेष बौद्धिक वर्ग के लिए हैं। 
          समग्रतः भाव-जगत् को झंकृत करते इस उत्कृष्ट संग्रह के लिए जेन्नी जी को बधाई देते हुए 'लम्हों का सफ़र' कविता के एक अंश से ही अपनी बात को विराम देता हूँ - 'हम सब हारे हुए मुसाफ़िर / न एक दूसरे को ढाढस देते हैं / न किसी की राह के काँटे बीनते हैं / सब के पाँव के छाले / आपस मे मूक संवाद करते हैं / अपने-अपने लम्हों के सफ़र पर निकले हम / वक़्त को हाज़िर नाज़िर मानकर / अपने हर लम्हे को यहाँ दफ़न करते हैं / चलो अब अपना सफ़र शुरू करते हैं।''
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Mob: 9557518552
date: 19.8.2021 
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Tuesday, March 8, 2022

94. आधी दुनिया की पूरी बातें

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने श्री गोपाल कृष्ण गोखले को एक पत्र में लिखा ''... ऐसा लगता है कि हमें भारत को उसकी बीमारी से मुक्त करने से पहले पुरुषों की एक नई नस्ल की आवश्यकता है। हम मक़सद को लेकर अधिक प्रतिबद्धता, भाषण में अधिक साहस और कार्रवाई में अधिक ईमानदारी चाहते हैं। हम ऐसे पुरुष चाहते हैं, जो इस देश से प्यार करते हों और अपने भाइयों-बहनों की सेवा और सहायता के लिए इच्छुक रहते हों। वे नहीं जो कपट और स्वार्थ से देश के पतन में और बढ़ावा दे रहे हैं। मैं आपको कैसे बताऊँ कि मुझे दिखावा और पूर्वाग्रहों से कितनी सख़्त नफ़रत है। इसी तरह साम्प्रदायिक संकीर्णता, दृष्टि और उद्देश्य की प्रांतीय सीमाओं से भी मुझे सख़्त नफ़रत है। मानव निर्मित विभाजनों और मतभेदों के सभी अभिमानी परिष्कार मुझे थका चुके हैं।" 
 
इस पत्र को पढ़कर एक बात मेरे ज़ेहन में आती है कि उन दिनों क्रांतिकारियों और आज़ादी के लिए प्रतिबद्ध लोगों को छोड़कर कुछ ऐसे पुरुष भी थे जो कुटिल और बेईमान थे, जिनकी मानसिकता समाज के विरुद्ध थी। सरोजिनी नायडू का पुरुष की नई नस्ल की बात कहना पुरुष की सोच, मासिकता और कायरता को दर्शाता है। निःसन्देह अगर ऐसा न होता तो किसी भी सदी में कभी भी देश ग़ुलाम न हुआ होता; चाहे मुग़ल शासकों की ग़ुलामी हो या अंग्रेज़ों की। कठिन संघर्षों के बाद अब हमारा देश भौगौलिक रूप से आज़ाद है, लेकिन मानसिक ग़ुलामी से आज़ादी की हर सम्भावना अब धूमिल पड़ती दिखती है। इसके लिए दोषी कोई ख़ास समाज, सम्प्रदाय, जाति, धर्म नहीं; बल्कि सदियों से रोपित व पोषित हमारी मानसिकता है। 
 
एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है- ''ज़र, ज़मीन, जोरू ज़ोर की, नहीं तो किसी और की।'' आख़िर ऐसा क्या बदलाव हुआ जो ऐसी लोकोक्ति बनी, हमें इस पर विचार करना चाहिए। ज़र यानी संपत्ति और ज़मीन से स्त्री की समानता क्यों? एक ही समानता है कि ताक़त के बल पर इन तीनों पर आधिपत्य जमाया जा सकता है। ग़ुलाम भारत में स्त्रियाँ संपत्ति की तरह देखी जाती थीं। अगर किसी राज्य या रियासत को अपने अधीन करना है, तो युद्ध में जीत के बाद संपत्ति के साथ स्त्रियों पर भी अधिकार कर लिया जाता था। कई वीरांगनाओं ने अधीनता स्वीकार न कर जंग किया और मृत्यु को गले लगाया कुछ स्त्रियों ने जौहर कर आत्मदाह किया कुछ ने पति के साथ सती हो जाना स्वीकार किया। ग़ुलामी से पहले भी स्त्रियों पर अत्याचार हुए हैं; क्योंकि स्त्री की शारीरिक शक्ति पुरुष से कम है और इसका लाभ हर युग में पुरुषों ने उठाया है। अहल्या के पत्थर बनने की कहानी से यह बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। बेहद अफ़सोसनाक है कि अपराधी पुरुष है और दण्ड स्त्रियाँ पाती हैं। आज के समय में इ मुद्दों पर गहन विमर्श और बदलाव की आवश्यकता है 
 
मम्मी (2017)
मम्मी के साथ एक मंच पर मैं
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आज के समय में अधिकतर  प्रगतिशील होने का ढोंग ही होता है; क्योंकि मानसिक रूप से आज भी सदियों पुरानी रूढ़ियों और परम्पराओं के प्रभाव से हम उबर नहीं सके हैं। कहीं-न-कहीं हमारी सोच एक ऐसे जाल में उलझी हुई है, जो रूढ़ियों, परम्पराओं, प्रथाओं, चलन, रिवाज इत्यादि के द्वारा सदियों पहले बुना गया था। निश्चित ही उस समय की यह आवश्यकता रही होगी; क्योंकि हर कार्य के पीछे कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। समय के उस दौर में जो आवश्यक रहा होगा, वह भी विकास प्रक्रिया के अनुसार सोच के बदलाव से ही सम्भव हुआ होगा; अन्यथा आज भी पाषाण युग में मानव सभ्यता जी रही होती। 

हमारे सोच को मानसिक ग़ुलामी ने इस क़दर जकड़ रखा है कि समय के साथ हुए परिवर्तन के बावजूद देखने का नज़रिया रूढ़िवादी और ढकोसलावादी है, विशेषकर स्त्रियों के लिए। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ पुरुष की सोच ऐसी है; बल्कि स्त्रियाँ स्वयं मानसिक ग़ुलामी की शिकार हैं और परम्पराओं व प्रथाओं के नाम पर अनुचित रूढ़ियों को बढ़ावा देती हैं। ऐसा कहना ग़लत होगा कि सिर्फ़ अशिक्षित समाज की स्त्रियाँ रूढ़िवादी हैं; बल्कि शिक्षित समाज की स्त्रियाँ ज़्यादा रूढ़िवादी हैं। 

अशिक्षित समाज की स्त्रियाँ अगर रूढ़िवादी हैं, तो उसी अनुरूप कार्य-व्यवहार करती हैं; किन्तु अधिकतर शिक्षित समाज की स्त्रियाँ दोहरे व्यवहार के साथ जीती हैं। स्वयं को आधुनिक दिखाने के लिए पहनावा और रहन-सहन में भले ही आधुनिकता अपना लें; लेकिन रूढ़ियाँ उनके दिमाग़ को जकड़े हुए हैं। जिन रूढ़ियों की अभी के समय और समाज में न आवश्यकता है न औचित्य, उससे वे स्वयं को अलग नहीं कर पाती हैं। जितनी कुरीतियाँ व कुप्रथाएँ हैं उनके पक्ष में उनके पास ढेरों तर्क हैं, जो बेबुनियाद, अतार्किक, मूढ़ और फ़िज़ूल हैं। अधिकांशतः रूढ़ियों के पक्ष के सारे तर्क व्यवहार, धर्म और मान्यता से जोड़कर ही किए जाते हैं। 

अगर हम सनातन धर्म के अनुसार देखें, तो यह सत्यापित होता है कि वेद, पुराण, ग्रंथ, इत्यादि के अनुसार उस युग या काल की स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी वे स्वतंत्र थीं, उनके अपने सोच-व्यवहार थे, उनका रहन-सहन और पहनावा उनके अपने अनुसार था। यहाँ तक कि स्वयंवर के द्वारा अपने पति का चुनाव वे स्वयं कर सकती थीं सत्ययुग और त्रेतायुग में स्त्री का अपना एक अलग सम्मानीय स्थान था। द्वापरयुग से स्त्रियों की स्थिति निम्न होती गई और मध्यकाल आते-आते स्त्री पूरी तरह से पुरुष के अधीन हो गई । 

उपनिषद काल में पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी शिक्षित किया जाता था। लव-कुश के साथ आत्रेयी पढ़ती थी यानी उस युग में भी सह-शिक्षा थी। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, पार्वती, सीता, उर्मिला, कौशल्या, कैकेयी, कुंती, द्रौपदी, गांधारी, राधा, रुक्मिणी, अदिति, शची, गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, अपाला, लोपमुद्रा आदि सभी अपने-अपने विचार, कर्त्तव्य और कार्य के लिए स्मरणीय मानी गई हैं। अगर इनके युगों को हम काल्पनिक भी मानें, तो ऐसी कल्पना करने वालों ने स्त्रियों के लिए बहुत मज़बूत चरित्र का निर्माण किया है। इके लेखन-काल के समय स्त्रियों की दशा कैसी थी, इससे यह भी पता चलता है। अगर हम कलियुग में देखें तो हमारे इतिहास में ऐसी अनेक विदुषी और वीरांगना स्त्रियों की गाथा मिलती है, जो पुरुष से ज़रा भी कम न थीं। 

हर युग में स्त्रियों का अपना अस्तित्व था। शक्ति, शिक्षा, सम्पदा के लिए देवी को ही आराध्य माना गया है। किसी भी युग में न सिन्दूर की प्रथा थी, न अपने शरीर को लेकर लज्जा की कोई बात, न गहना-ज़ेवर पर स्त्रियों का एकछत्र अधिकार, न कन्या-वध, न दहेज हत्या, न पर्दा प्रथा, न नाम परिवर्तन। निःसन्देह मुग़ल शासन के समय इन कुप्रथाओं की शुरुआत हुई; क्योंकि उस समय की यही माँग थी। उस काल में सिन्दूर, घूँघट, बाल-विवाह इत्यादि का चलन स्त्रियों की सुरक्षा के कारण शुरू हुआ, जो बाद में प्रथा और परम्परा का रूप ले लिया। 

अब जब भारत स्वतंत्र है, तब इन कुप्रथाओं को ढोने का कोई सटीक तर्क नहीं मिलता है, सिवा इसके कि समाज द्वारा यह स्त्रियों के लिए नैतिक माना गया है। इन कुप्रथाओं से स्त्री के चरित्र और नैतिकता को आँकना न सिर्फ़ अनुचित है, बल्कि अनैतिक भी है। ऐसा नहीं कि स्त्रियों की अपनी कोई सोच नहीं है; लेकिन अधिकतर ऐसा देखने में आता है कि पुरुष की सोच से प्रभावित होकर स्त्रियाँ अपने जीवन की दिशा निर्धारित करती हैं। सिर्फ़ धार्मिक कार्य करते समय स्त्री को पूरा सम्मान मिलता है। 

आज जब बुर्क़ा-हिजाब-नक़ाब को लेकर विवाद देख रही हूँ, तो सचमुच बेहद आश्चर्य होता  है। बुर्क़ा या पर्दा से आज़ादी मिल रही है, किन्तु स्त्रियाँ ख़ुद इसकी ग़ुलाम रहने को बे-क़रार हैं। मुस्लिम स्त्रियों के शरीर का ढाँचा अन्य स्त्रियों से अलग तो नहीं, जिसे सबसे छुपाना ज़रूरी है? बिना नक़ाब या बुर्क़ा के अगर कोई देख ले, तो कौन-सा क़हर टूट पड़ेगा? हर स्त्री ख़ूबसूरत होती है, नक़ाब में क्यों छुपाना अपना चेहरा? जिन पुरुषों को स्त्री का चेहरा देखकर ही कामुकता आती हो, तो वैसे पुरुषों से क्या डरना, उन्हें  कानून के हवाले कर देना चाहिए न कि ख़ुद को पर्दा में छुपा लेना। 

सम्प्रदायों के सैद्धांतिक मत-भिन्नता के विवाद ने फिर से हद को पार किया है और इस बार स्त्रियों का पहनावा मुद्दा बना है। इस विवाद में अब एक नया अध्याय शुरू हुआ है हिजाब-नक़ाब-बुर्क़ा का। मुझे याद है जब मैं छोटी थी, तब मुहर्रम के समय ईरान से कुछ स्त्री-पुरुष मस्जिद में आते थे। वे क्यों आते थे, यह अब तक मुझे नहीं मालूम। जानने की जिज्ञासा भी न हुई कभी। बस इतना याद है कि जो भी बुर्क़ा में होती, हम उसे ईरानी कहते थे। उन दिनों भारतीय स्त्रियाँ बुर्क़े में ज़्यादा नहीं दिखती थीं। मेरे कॉलेज की कुछ शिक्षक और छात्राओं को बुर्क़ा पहनकर आते देखा, पर वे कॉलेज पहुँचकर उतार देती थीं। मैं सोचती थी कि वे सुन्दर हैं, इसलिए उनके घर से उन पर बुर्क़ा पहनने का दबाव होगा। एक फ़ायदा यह भी है कि छेड़खानी से वे बच जाएँगी। हमारे ज़माने में भी छेड़खानी होती थी, पर अभी से ज़रा कम। मुझे नहीं लगता कि कोई भी लड़की छेड़खानी का शिकार होने से बच पाई होगी। यदि घर के बाहर बच गई तो घर में भी पुरुष होते हैं, चाहे रिश्ता कोई भी हो और पहनावा कुछ भी हो। 

मैं सोचती थी की छोटी-छोटी लड़कियों को उनके घरवालों द्वारा बुर्क़ा से आज़ाद होने नहीं दिया जाता है। मैं मन में बहुत दुःखी रहती थी उन्हें देखकर। अभी जो हिजाब-विवाद हो रहा है, इसे देखकर उन छात्राओं के लिए दुःख हो रहा है, जो अपना वस्त्र दूसरे के मन से धारण करती हैं। वे अपनी ज़िन्दगी का कोई भी निर्णय क्या कभी ख़ुद ले पाएँगी? आख़िर ऐसी ग़ुलामी उन्हें स्वीकार क्यों है? अब जब मौक़ा है, ज़रा-सा हिम्मत जुटातीं और ख़ुद ही नक़ाब से बाहर आ जातीं। अब तो राजनीति के हाथों का खेल वे ख़ुद को बना चुकी हैं। अब खेलो बुर्क़ा-बुर्क़ा, सिन्दूर-बिन्दी और तमाशा देखेगा आज का तथाकथित धार्मिक समाज। 

संविधान हमें अपने पसन्द के कपड़े पहनने से नहीं रोक सकता है। परन्तु हिजाब बनाम सिन्दूर-चूड़ी विवाद का कोई औचित्य समझ नहीं आता है। जो बुर्क़ा शौ से पहनती हैं, पहनें; लेकिन स्कूल-कॉलेज या किसी व्यवसाय में अगर ड्रेस कोड है, तो उसका पालन करना ही होगा। अब इसका तो यही अर्थ हुआ कि कोई बुर्क़ा या घूँघट में रहती है, तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ने जाए तब भी वह घूँघट-बुर्क़ा में रहे। जिसे ऐसे रहना है वह घर में बैठे, शिक्षा की क्या ज़रूरत है? बुर्क़ा और घूँघट में स्त्री सुविधापूर्ण तरीक़े से न चल सकती है, न खेल सकती है, न कोई नौकरी कर सकती है। बस बच्चा पैदा करने का काम ही है, जो कर सकती है। पुलिस, आर्मी, नर्स, वकील इत्यादि नौकरी उनके लिए सम्भव नहीं; क्योंकि बुर्क़ा पहनकर तो यह सब मुमकिन नहीं है। बुर्क़ा खुद को छुपाने का बेहतरीन विकल्प है, पर आज के समय के अनुसार जायज़ नहीं है। सिन्दूर, बिन्दी या चूड़ी ही जायज़ नहीं है, जिन्हें शौक़ हो इस्तेमाल में लाएँ। ये सभी शृंगार प्रसाधन हैं, जिसे सुन्दर दिखने के लिए उपयोग में लाया जाता है। हिजाब से सिन्दूर-चूड़ी की तुलना अर्थहीन और अतार्किक है। 

मैं भागलपुर के एक सरकारी बालिका विद्यालय में पढ़ती थी, जिसका प्रबंधन मिशनरी द्वारा किया जाता है। हमारे स्कूल में कक्षा आठ  तक सभी को सफ़ेद शर्ट, नीला स्कर्ट, नीला फीता, काला जूता पहनना होता था। 9वीं और 10वीं कक्षा से सभी को सफ़ेद ब्लाज और नीले पाड़ (किनारी) की सफ़ेद साड़ी पहनना अनिवार्य था। ब्लाज की लम्बाई इतनी हो कि पेट न दिखे। सप्ताह में हमलोगों के नाखून देखे जाते थे कि किसी के नाखून बड़े तो नहीं, नेलपॉलिश या मेँहदी तो न लगाया, हाथ में चूड़ी या कड़ा तो न पहना। हमारी प्राचार्य मिस सरकार का बहुत सख़्त अनुशासन था। स्कूल के किसी भी नियम में ज़रा-सी भी ढील वे बर्दाश्त नहीं करती थीं। हर दिन पहला एक क्लास बाइबल का होता था, जिसमें हम सभी का जाना अनिवार्य था। यहाँ जिस भी धर्म की छात्रा हो, उसे यह सब नियम मानना होता था। अगर किसी को इन नियमों से समस्या है, तो वे दूसरे विद्यालय में पढ़ सकती हैं। हर संस्थान के अपने नियम होते हैं और नामांकन के बाद वहाँ के नियमों का पालन करना बाध्यता है और यही उचित भी है। संस्थान के नियम से अगर आप सहमत नहीं हैं, तो आप वहाँ न जाएँ। 

मैं सोचती हूँ, ख़ूब सारे सौंदर्य सामग्री का इस्तेमाल कर बुर्क़ा पहन लिया, तो क्या फ़ायदा हिजाब में कम-से-कम चेहरा तो दिखता है; परन्तु फ़ैशन के अनुरूप वस्त्र धारण करने का क्या फ़ायदा? बुर्क़ा बिरादरी से बाहर निकल हिजाब को तिलांजलि देकर एक आम स्त्री का जीवन जीना ख़ुद स्त्रियों को अच्छा लगना चाहिए। इसके लिए दुनिया की सभी स्त्रियों को एक साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। क्यों पुरुषों की ग़ुलामी सही जाए? क्यों ख़ुद को नक़ाब में रखें? दुनिया का कोई भी पुरुष बुर्क़ा या नक़ाब नहीं पहनता, तो स्त्रियाँ क्यों पहनें? अपने पसन्द के अनुरूप परिधान धारण करना हमारी स्वतंत्रता है और यह स्वतंत्रता भारत में रहने वाले सभी लोगों के लिए हैइसका यह अर्थ कदापि नहीं कि किसी भी संस्थान के नियम के विरुद्ध जाएँ।  

जहाँ तक मुझे लगता है कि मन की कट्टरता ने हिजाब-बुर्क़ा या घूँघट को अपनाए रखने के लिए विवश किया हुआ है। इस विवाद में पुरुष पड़े हैं और वह भी बुर्क़ा के पक्ष-विपक्ष में, यह समझ से परे है; क्योंकि यह मसला स्त्रियों का है। बुर्क़ा के विरोध में बोलना ज़रूरी है न कि बदले में भगवा चादर ओढ़ लेना। मुझे तो यह निहायत मूर्खता वाली बात लगती है। यह समय है जब पुरुषों को आगे बढ़कर इन कुप्रथाओं के विरुद्ध स्त्रियों का साथ देना चाहिए। 

यह सही है कि लीक से हटकर जिन स्त्रियों ने जीना शुरू किया, उन्हें समाज का तिरस्कार और आक्षेप सहना पड़ता है। फिर भी यह ज़्यादा सही है बनिस्पत रूढ़ियों से जकड़े हुए कठपुतली की तरह दूसरों के इशारे पर जीवन जीने से। मेरे विचार से पुरुष-वर्ग को आगे आना होगा, अपने घर की स्त्रियों को बुर्क़ा या घूँघट से बाहर आने की हिचक को तोड़ने के लिए। एक तरफ़ हम वैश्वीकरण की बात करते हैं, विकास की बात करते हैं, दूसरे ग्रह पर जाने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ़ धर्म-जाति के लफड़े के बाद अब व्यक्तिगत पहनावा पर राजनीति कर रहे हैं। आशचर्यचकित हूँ, बुर्क़ा या हिजाब के पक्ष में स्त्रियाँ कैसे हैं? प्रगति और विकास की बात कोई क्या करेगा, जब किसी की सोच पहनावे में उलझ जाए।   

महिला दिवस पर मेरी यही दुआ  और शुभकामना है कि पूरी दुनिया की स्त्री ख़ुद के मन से जीवन जिएँ, अपने पसन्द के अनुसार नैतिक रूप से जो सही हो वह करें। मैं तो चाहती हूँ कि ''दुनिया की महिलाएँ एक हों'' की जगह अब यह कहा जाए- ''दुनिया के इंसानों एक हों!''
महिला दिवस पर (सफ़ेद साड़ी में मम्मी) 
-जेन्नी शबनम (8.3.2022)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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