Friday, May 1, 2020

75. हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे

आज अंतरराष्ट्रीय श्रमिक/मज़दूर दिवस है। हर साल यह दिन आता है और ऐसे चला जाता है, जैसे रोज़ सुबह का उगता सूरज अपने नियत समय पर शाम को ढल जाता है। कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं, कहीं कोई शोर नहीं, बदलाव के लिए पूरज़ोर आवाज़ नहीं। मज़दूरों-किसानों के लिए कहीं कोई इन्तिज़ाम नहीं, उनके जीने के लिए कोई सहूलियत नहीं। यों सत्ता पर आसीन हर सरकार किसानों, मज़दूरों, श्रमिकों के लिए बड़ी-बड़ी बातें, बड़ी-बड़ी योजनाएँ, बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करती है; लेकिन धरातल पर कहीं कुछ नहीं होता। साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की पार्टियाँ किसानों-मज़दूरों के हक़ के लिए शुरू से प्रतिबद्ध हैं और समय-समय पर इनके लिए सरकार से लड़ती रही हैं। लेकिन वह नारों से इतर मज़दूरों की स्थिति बदलने में नाकाम रही। आज किसानों-मज़दूरों के हित के लिए जो भी सहूलियत है, भले बहुत कम सही, पर इनके ही बदौलत है।   

बचपन से फैज़ अहमद फैज़ का मशहूर गीत, जिसे सुन-सुनकर हम बड़े हुए हैं, बरबस आज के दिन मुझे याद आ जाता है-
 
हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे  
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया माँगेंगे 
वो सेठ व्यापारी रजवाड़े दस लाख, तो हम हैं दस करोड़ 
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा माँगेंगे  

आज के दिवस पर पाँच साल पुरानी एक घटना याद आ रही है। हमलोग घूमने के लिए लन्दन गए, जहाँ एक होटल में ठहरे थे। बाथरूम का फ्लश ख़राब हो गया, तो मैंने रिसेप्शन पर ठीक करवाने के लिए कह दिया। कुछ मिनट बीते होंगे कि दरवाज़े की घंटी बजी, मैंने दरवाज़ा खोला। सामने एक लम्बा-सा नौजवान खड़ा था, जिसने शर्ट, पैंट, कोट, चमचमाता जूता और हाथ में दस्ताना पहन रखा था। उसने पूछा कि मैंने रिसेप्शन पर कॉल किया था। मैं कहा कि हाँ, बाथरूम का फ्लश ख़राब हो गया है, कृपया किसी को ठीक करने भेज दीजिए। वह बोला ठीक है, एक मिनट में आया। फिर वह एक बैग लेकर आया और बाथरूम ठीक करने लगा। मैं हतप्रभ हो गई। मैं तो उसे होटल का मैनेजर समझ रही थी। उसे देखकर मैं सोचने लगी कि हमारे देश में यह होता, तो उसका वस्त्र कैसा होता। शर्ट-पैंट तो ठीक है परन्तु चमचमाता जूता और हाथ में दस्ताना, यह तो मैंने आज तक नहीं देखा। मैं सोचने लगी हमारे देश में गंदे नाले की सफ़ाई में हर साल कितने लोगों की मृत्यु हो जाती है। हमारे यहाँ सफ़ाईकर्मियों को सबसे निम्न दर्जा प्राप्त है। हमारी सरकार को इनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए कड़े नियम बनाने होंगे। अगर ये न हों, तो हमारे लिए जीवन नामुमकिन हो जाएगा।निश्चित ही सफ़ाईकर्मियों का महत्व हम सभी को इस कोरोनाकाल में अच्छी तरह समझ आ गया है। शायद अब इनके हालात में थोड़ा ही सही, पर सुधार हो।   
 
किसानों की ज़मीन लेकर बड़े उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिए दी गई। किसानों की खेती की ज़मीन सस्ते में लेकर उस पर मॉल बनाए जा रहे हैं, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनाई जा रही हैं। यह तो तय है कि इन सबका निर्माण मज़दूर करता है, और उन्हीं के पास अपना सिर छिपाने के लिए छत नहीं है। जिनकी खेती की ज़मीन ले ली गई, उनके भरण-पोषण के लिए कोई निदान नहीं किया गया। वे या तो पलायन करते हैं या फिर किसी तरह उम्र काटने के लिए आसमान की तरफ़ हाथ उठाए दुआओं में ज़िन्दगी खपाते हैं। किसान का ऋण उनके जीवन का ऋण होता है, जिसे चुकाने में वे अपनी जान की बाज़ी लगा देते हैं। परन्तु मौसम की मार, सरकार की बेरुखी और निरंकुशता किसानों को तोड़ देती है और वे कभी उससे बाहर नहीं आ पाते हैं।    

इंसान की पाँच बुनियादी ज़रूरतें- भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य हैं, जिनके बिना एक सुसंस्कृत और विकसित देश की कल्पना सम्भव नहीं है। परन्तु आज भी हमारे देश में इन विषयों पर सरकार का ध्यान नहीं जाता है। सरकारी योजनाओं का फ़ायदा उच्च वर्ग और पूँजीपतियों को ही मिलता है। आम लोग जिनमें निम्न वर्ग, आदिवासी, दलित, किसान, मज़दूर, असंगठित कामगार इत्यादि को इसका कोई लाभ नहीं मिलता है।    

छोटे शहरों और गाँवों में आज भी अस्पताल नहीं है। वहाँ ऐसे स्वास्थ्यकर्मी नहीं हैं, जो लोगों को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक कर सकें। यहाँ के निवासी बीमार हों, तो छोटा ही सही कोई अस्पताल तो हो, ताकि बिना इलाज वह मरे नहीं। अगर किसी को कोई बड़ी बीमारी हो गई, तो बड़े शहर जाकर इलाज कराना बहुत कठिन होता है। इसलिए उन पिछड़े इलाक़ों में इलाज के अभाव में मृत्यु बहुत ज़्यादा होती है। अस्पताल और प्रशिक्षित दाई न होने के कारण आज भी गाँव में अधिकतर बच्चों का जन्म घर में होता है, जिसे गाँव की अप्रशिक्षित दाई करवाती है। जच्चा-बच्चा राम भरोसे।   

गाँव हो या शहर (दिल्ली को छोड़कर) जहाँ भी सरकारी स्कूल है, वहाँ के शिक्षा का स्तर बेहद निम्न है। सरकार से अनुदान मिलने पर भी भ्रष्टाचार का दीमक सब चट कर जाता है। देश में दो तरह की शिक्षा पद्धति जब तक रहेगी, समाज के दोनों वर्गों की खाई कभी नहीं भरेगी। पूरे देश में सिर्फ़ एक माध्यम से पढ़ाई होनी चाहिए, अमीर हों या ग़रीब सभी की शिक्षा निःशुल्क तथा एक साथ होनी चाहिए। हमारे देश में जब हिन्दू-हिन्दू करने वाली सरकार बनी, तो मुझे सिर्फ़ एक बात की उम्मीद थी कि यह पार्टी जो ख़ुद को भारतीय संस्कृति की अकेली पैरोकार मानती है, भारतीय परिधान और हिन्दी पर ज़ोर देती है, निश्चित ही हिन्दी को हमारे देश की राष्ट्रभाषा बनाएगी। पर ऐसा कुछ न हुआ, आज भी हम अँगरेज़ी की ग़ुलामी कर रहे हैं।   

जब से राम मन्दिर प्रकरण शुरू हुआ है, देश का साम्प्रदायिक सौहार्द इस तरह बिगड़ गया है कि लोगों में आपसी प्रेम पनपना नामुमकिन है। हर घटना को हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे से देखा जाता है। यह हिन्दू-मुस्लिम करवाने वाली तो राजनीतिक पार्टियाँ हैं, लेकिन करने वाले वे बेरोज़गार और अशिक्षित हैं जिनके पास कोई काम नहीं है। यों कहें कि इन्हें ऐसा करने के लिए पोषित किया जाता है और हर पार्टी में ऐसे लोगों का संगठित हुजूम है जो हर वक़्त हिन्दू-मुसलमान करता है। जिनके पास पेट भरने के लिए नहीं, वे लोग सहज ही इस अपराध में शामिल हो जाते हैं। दंगा हो या आतंकवाद, इसके जड़ में अशिक्षा और बेरोज़गारी ही है। जाति और साम्प्रदायिक आधार पर किसानों-मजदूरों को बाँटने का काम करके वोट बैंक तैयार होता है और उनके द्वारा जन-विरोधी कार्य करवाए जाते हैं।   

हमारी सभी आशाएँ मिट चुकी हैं। अँधेरा गहराता जा रहा है। फिर भी उम्मीद की एक किरण है, जो कभी-कभी दिख जाती है। महीनों से कोरोना संकट से जूझ रहे प्रवासी कामगारों, श्रमिकों, मज़दूरों, छात्रों और वे सब जो अपने-अपने घरों से दूर हैं; उनमें से कुछ के लिए सरकार द्वारा घर वापसी का प्रबन्ध किया गया है। आज एक ट्रेन रवाना हुई है, जिसमें काफ़ी लोग जो घर पहुँच पाने की उम्मीद छोड़ चुके थे, अपने-अपने घरों को जा रहे हैं; कोरोना से बचाव के लिए उनके कुछ और जाँच किए जाएँगे। 
 
काफ़ी देर से सही, पर सरकार ने सही क़दम उठाया है। इस देरी के कारण न जाने कितने लोगों की जान चली गई है। जिनके पास घर नहीं, पैसा नहीं, खाना नहीं वे कैसे गुज़ारा करते? कैसे व्यक्तिगत दूरी का पालन करते हुए ख़ुद को कोरोना से बचाते? भय और आशंका के कारण कामगारों ने जान जोखिम में डालकर, एक झोले में अपना पूरा घर समेटकर, कितने-कितने किलोमीटर नंगे पाँव चल दिए। पर उनमें से बहुत कम ही अपने प्रांत या घर पहुँच पाए। किसी-किसी का भूख से दम निकला, तो किसी-किसी का शरीर इतनी लम्बी दूरी चलना सह नहीं पाया और काल-कवलित हो गया। अधिकतर तो लॉकडाउन तोड़ने के जुर्म में पुलिस से मार भी खाए और शेल्टर होम की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ ठहराए भी गए। कई मेहनतकश ने तो मुफ़्त का रहना स्वीकार न किया और अपने हुनर का इस्तेमाल कर उस स्थान का रंग-रोगन कर सुन्दर बनाकर एक अच्छा उदाहरण पेश किया। आज के दिन बस यही कामना है कि जितने भी लोग घर से दूर अपने घर जाने की बाट जोह रहे हैं, सरकार उन्हें सुरक्षित तरीक़े से उनके घर पहुँचा दे।   

मज़दूर दिवस की शुभकामनाएँ!   

-जेन्नी शबनम (1.5.2020)
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Thursday, April 30, 2020

74. ऋषि नॉट आउट

ऋषि कपूर का जाना मन को बेचैन कर गया। कल से इरफ़ान खान की मृत्यु के शोक में हम सभी हैं, ऐसे में आज ऋषि कपूर का चला जाना स्तब्ध कर गया। यह बहुत दुःख भरा समय है। कोई शब्द नहीं सूझ रहा कि ऐसे वक़्त में क्या कहा जाए। एक कलाकार के चले जाने से उसके देह का अंत भले हो जाता है, मगर उसका काम सदा हमारे साथ जीवित रहता है। ऋषि कपूर फ़िल्मी जगत के उस प्रतिष्ठित परिवार से हैं, जहाँ से फ़िल्मी कलाकारों की कई पुश्तें आई हैं। पृथ्वी राज कपूर और राज कपूर की विरासत को बहुत कुशलता और संजीदगी से सँभालने और आगे बढ़ाने में ऋषि कपूर की भूमिका स्मरणीय और सराहनीय है। वे जितने कुशल अभिनेता थे, उतने ही संजीदा और ज़िन्दादिल इंसान थे। कपूर ख़ानदान का प्यारा और सिने जगत का खिलखिलाता हुआ सितारा चिंटू आज सभी को अलविदा कह गया।   
ऋषि कपूर सही मायने में मेरे ज़माने के हीरो थे। जब फ़िल्म देखने और समझने की मेरी उम्र हुई, उस दौर में वे अभिनेता के साथ हीरो बन चुके थे। लेकिन उस उम्र में हमें फ़िल्में नहीं दिखाई जाती थीं। हमारे स्कूल में कुछ फ़िल्में ज़रूर दिखाई गईं, जो देश प्रेम की होतीं या किसी ऐसे चरित्र पर जिसने समाज को प्रेरित किया हो। मुझे याद है स्कूल में संत ज्ञानेश्वर कई बार दिखाई गई थी। कॉलेज के समय में मैंने ख़ूब फ़िल्में देखीं। सन 1973 में ऋषि कपूर की फिल्म 'बॉबी', जिसमें डिम्पल कापड़िया अभिनेत्री है, बहुत हिट हुई। इसका गाना ''झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो'', हम बच्चों का पसन्दीदा गाना था, जिसे अन्ताक्षरी में ख़ास जगह मिलती थी। हालाँकि इस गाना के अर्थ पर हमारा कभी ध्यान नहीं गया, हमें तो बस झूठ बोले कौआ काटे से ही मतलब था।   
4 सितम्बर 1952 को बम्बई (मुम्बई) में जन्मे ऋषि कपूर को एक रोमांटिक अभिनेता के रूप में शोहरत और पहचान मिली। ऋषि कपूर की अमर अकबर एंथोनी, प्रेम रोग, सरगम, लैला मजनू, चाँदनी, कभी-कभी, सागर, दामिनी, क़र्ज़, हम किसी से कम नहीं आदि ढेरों फ़िल्में आईं और लगभग सभी सराही गईं। ऋषि कपूर की काफ़ी फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर ख़ूब नाम कमाया है। कुछ फ़िल्में फ्लॉप भी हुईं, पर उनमें भी बहुत कमाल का अभिनय किया है। 'कपूर एंड संस' तथा '102 नॉट आउट' मुझे बेहद पसन्द है। ऋषि कपूर ने '102 नॉट आउट' में 102 वर्षीय पिता, जो अमिताभ बच्चन हैं, के 75 वर्षीय बुज़ुर्ग बेटे का किरदार निभाया है। इस फ़िल्म को देखकर लगा ही नहीं कि वे इसमें अभिनय कर रहे हैं। बहुत ही सहज, सरल और जीवन्त अभिनय किया है। जैसे-जैसे ऋषि कपूर की उम्र बढ़ी उनके अभिनय ने एक अलग ही मक़ाम हासिल किया। बहुत शुरू की उनकी फ़िल्में मुझे पसन्द नहीं थीं; लेकिन उनके प्रौढ़ होने के बाद की सभी फ़िल्में मुझे पसन्द हैं, चाहे वे जिस भी किरदार में हों।   
ऋषि कपूर एक ऐसे वरिष्ठ और दिग्गज अभिनेता रहे हैं, जिन्होंने तीन साल की उम्र में राज कपूर की फ़िल्म 'श्री 420' में काम करना शुरू किया। 'मेरा नाम जोकर' में वे बाल कलाकार के रूप में ख़ूब चर्चित हुए और इस फ़िल्म के लिए उन्हें वर्ष 1970 में नेशनल फ़िल्म अवार्ड मिला। वर्ष 1973 में आई फिल्म 'बॉबी' ने बहुत धूम मचाया और इसके लिए वर्ष 1974 में उन्हें फ़िल्मफेयर का बेस्ट एक्टर अवार्ड मिला। वर्ष 2008 में उन्हें फ़िल्मफेयर लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला। वर्ष 2009 में रशियन सरकार द्वारा सिनेमा में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। वर्ष 2017 में 'कपूर एंड संस' के लिए कई सारे अवार्ड मिले। लगातार अलग-अलग जगहों से उन्हें ढेरों सम्मान और पुरस्कार मिलते रहे, जैसे ज़ी सिने अवार्ड, स्क्रीन अवार्ड, टाइम्स ऑफ़ इंडिया फ़िल्म अवार्ड आदि।   
ऋषि कपूर की आत्मकथा 'खुल्लम खुल्ला : ऋषि कपूर अनसेंसर्ड' का लोकार्पण 15 जनवरी 2017 को हुआ, जिसे ऋषि कपूर ने मीना अय्यर के साथ लिखा है और हार्पर कॉलिन्स ने प्रकाशित किया है। निःसन्देह ऋषि के चाहने वालों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें ऋषि के जीवन के वे पहलू भी मिलेंगे, जिन्हें हमलोग नहीं जानते या कैमरा के सामने आने या सार्वजनिक होने से बच गए हैं।   
ऋषि कपूर किसी भी मुद्दे पर अपनी निष्पक्ष और बेबाक राय रखने के लिए मशहूर रहे हैं। वे काफ़ी चर्चित हुए, जब उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा था कि उन्होंने गाय का मांस खाया है। इसके विरोध में बजरंग दल वालों ने काफ़ी हंगामा किया और उनसे माफ़ी माँगने को कहा था। कश्मीर के मुद्दे पर फारूक़ अब्दुल्ला के एक ट्वीट पर ऋषि कपूर ने रीट्वीट किया, जिसके विरोध में उन पर एफ.आई.आर. दर्ज हुआ। ऋषि कपूर अपने बयानों से काफ़ी विवादित रहे हैं। वे अपने बयानों पर सदैव अडिग रहे हैं, यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता थी। इसका अर्थ है कि वे काफ़ी सोच-समझकर ही कुछ भी बयान दिया करते थे।   
ऋषि कपूर को वर्ष 2018 में बोनमैरो कैंसर हुआ, जिसका इलाज न्यूयॉर्क में चलता रहा। अमेरिका से इलाज कराने के बावजूद वे स्वस्थ न हो सके और आज उनकी मृत्यु ने हम सभी को झकझोर दिया है। ऐसे समय में जब देश में कोरोना के कारण लॉकडाउन है, उनकी मृत्यु पर उनके सभी परिवार वाले, उनके सभी मित्र, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग, उनके प्रशंसक उनकी अन्तिम यात्रा में शामिल न हो सके। बहुत कम लोग उपस्थित हो सके, जिन्हें सरकार से इजाज़त मिली।   
ज़िन्दगी की क्षणभंगुरता से हम सभी इनकार नहीं कर सकते। चार दिन की ज़िन्दगी में कब चौथा दिन आ जाता है, पता ही नहीं चलता। इरफ़ान और ऋषि कपूर की मृत्यु का कारण कैंसर था। वर्ष 2018 में इन दोनों को अपनी बीमारी का पता चला। इलाज कराने इरफ़ान लन्दन गए और ऋषि न्यूयॉर्क। दोनों स्वस्थ होकर लौटे; लेकिन कैंसर को हरा नहीं सके और एक दिन के अंतर में दोनों अलविदा कह गए। 
 
अब यह बात मुझे समझ आ गई है कि इंगलैंड हो या अमेरिका, कोई फ़र्क नहीं पड़ता। कहीं भी चले जाओ जीवन के कुछ जंग में हमें हारना ही होता है। शोहरत या दौलत कुछ भी काम नहीं आती है। मृत्यु अन्तिम सत्य है, इससे कोई बच नहीं सकता। मन बहुत विचलित है। जीवन-मृत्यु के अटल सत्य को समझते हुए भी स्वीकारने का मन नहीं होता है। ऋषि अब हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु उनकी फ़िल्में, उनके ट्वीट, उनके विचार हमारे बीच हैं। उन्होंने ज़िन्दगी की अपनी पारी बिना नॉट आउट हुए बहुत अच्छी खेली है। ऋषि कपूर के लिए हम कह सकते हैं कि इस संसार से वे भले ही चले गए, पर वे नॉट आउट हैं और नॉट आउट रहेंगे।   

-जेन्नी शबनम (30.4.2020)
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Wednesday, April 29, 2020

73. अलविदा मक़बूल

सिनेमा हॉल का दरवाज़ा बंद था। खुलने के निर्धारित समय से ज़्यादा वक़्त हो चला था। तभी एक गेटकीपर बाहर आया, उससे मैंने पूछा कि बहुत ज़्यादा देर हो रही है, मूवी शुरू होने में देर क्यों है। उसने बताया कि थोड़ी देर हो जाएगी, क्योंकि फ़िल्म के प्रोमोशन के लिए लोग आए हैं। सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग मेरे साथ उस गेट के बाहर एकत्रित हो गए। मन में बहुत उत्सुकता थी कि एक झलक कलाकारों को देख लूँ। मैं सिनेमा की बेहद शौक़ीन रही हूँ और फर्स्ट डे और कभी-कभी तो फर्स्ट डे फर्स्ट शो भी देखती हूँ। साथ देखने वाला कोई न भी हो परवाह नहीं, अकेले जाकर देखती हूँ। 
 
भीड़ काफ़ी बढ़ गई। मैं खड़े-खड़े थक गई, तो सोचा कि जाकर थोड़ी देर बैठूँ। तभी हॉल का गेट खुला और ढेर सारे लोग बाहर निकलने लगे। देखा कि भीड़ के साथ अर्जुन रामपाल और उनके साथ इरफ़ान खान आ रहे हैं। बाक़ी और कौन-कौन थे साथ में, किसी पर मेरी नज़र नहीं ठहरी, क्योंकि ये दोनों मेरे पसन्दीदा कलाकार हैं। जैसे ही मैंने इरफ़ान को देखा, तो बेटी को ज़रा ज़ोर से बोली कि देखो मक़बूल आ रहा है। कुछ लोग मेरी बातों पर हँस दिए। मैं मक़बूल को देखती रही और वे सामने से मुस्कुराते हुए गुज़र गए। अर्जुन तो हैण्डसम हैं ही; लेकिन इरफ़ान की ख़ूबसूरती देखकर मैं दंग रह गई। कत्थई रंग का सूट पहने लम्बा छरहरा बदन, घुंघराले सुनहरे बाल, बड़ी-बड़ी आँखें और मुस्कुराता चेहरा। रील के चेहरे से ज़्यादा ख़ूबसूरत रियल चेहरा। यह बात है 2013 की, फ़िल्म का नाम 'डी-डे', दिल्ली के साकेत स्थित सेलेक्ट सिटी मॉल का पी.वी.आर. सिनेमा हॉल।   
वर्ष 2004 में एक फ़िल्म आई थी 'मक़बूल', जिसमें मक़बूल का किरदार इरफ़ान खान ने निभाया था। बड़ी अच्छी लगी थी फ़िल्म। यों अब फ़िल्म की कहानी याद नहीं, इतना याद है कि क्राइम पर आधारित फ़िल्म थी और इरफ़ान के साथ तब्बू के कुछ अच्छे सीन थे। मुझे उनका असली नाम कभी याद नहीं रहता। जब भी इरफ़ान की कोई फ़िल्म देखने जाना हो और कोई पूछे कि फ़िल्म में कौन एक्टर है, तो मैं मक़बूल बोलती हूँ। इरफ़ान की लगभग सभी फ़िल्में देखी है मैंने और अब भी मक़बूल ही बोलती हूँ, जाने क्यों।   
7 जनवरी 1967 को जयपुर, राजस्थान में जन्मे इरफ़ान खान हिन्दी और अंग्रेज़ी सिनेमा तथा टेलीविजन के बहुत कुशल अभिनेता रहे हैं। बॉलीवुड तथा हॉलीवुड में इरफ़ान एक जाना पहचाना नाम है। इरफ़ान को 'हासिल' फ़िल्म के लिए वर्ष 2004 के फ़िल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मिला। वर्ष 2008 में बेस्ट ऐक्टर इन सपोर्टिंग रोल का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। अभिनय के लिए सन 2011 में इरफ़ान पद्मश्री से सम्मानित हो चुके हैं। राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 2012 में फिल्म 'पान सिंह तोमर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। वर्ष 2017 के फ़िल्मफेयर में फ़िल्म 'हिन्दी मीडियम' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। 
वर्ष 2018 में जब इरफ़ान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हुआ, तब इरफ़ान ने अपने प्रशंसकों के लिए एक बेहद भावुक नोट लिखा-
''जीवन में अनपेक्षित बदलाव आपको आगे बढ़ना सिखाते हैं। मेरे बीते कुछ दिनों का लब्बोलुआब यही है। पता चला है कि मुझे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हो गया है। इसे स्वीकार कर पाना मुश्किल है; लेकिन आस-पास जो लोग हैं, उनका प्यार और उनकी दुआओं ने मुझे शक्ति दी है। कुछ उम्मीद भी बँधी है। फ़िलहाल बीमारी के इलाज के लिए मुझे देश से दूर जाना पड़ रहा है। लेकिन मैं चाहूँगा कि आप सन्देश भेजते रहें।'' ''न्यूरो सुनकर लोगों को लगता है कि ये समस्या ज़रूर सिर से जुड़ी बीमारी होगी। लेकिन ऐसा नहीं है। इसके बारे में अधिक जानने के लिए आप गूगल कर सकते हैं। जिन लोगों ने मेरे शब्दों की प्रतीक्षा की, इन्तिज़ार किया कि मैं अपनी बीमारी के बारे में कुछ कहूँ, उनके लिए मैं कई और कहानियों के साथ ज़रूर लौटूँगा।''
इरफ़ान अपनी बीमारी के इलाज के लिए लन्दन गए थे। जब वहाँ से लौटे और 'अंग्रेज़ी मीडियम' फ़िल्म किया, तो मुझे लगा कि वे पूर्णतः स्वस्थ हो चुके हैं; क्योंकि मेरा अनुमान था कि कुछ कैंसर ठीक हो जाता है और चिकित्सा के लिए लन्दन के अस्पताल अच्छे माने जाते हैं। 'अंग्रेज़ी मीडियम' उनकी आख़िरी फ़िल्म हो गई। लॉकडाउन के कारण यह फ़िल्म सिनेमा हॉल तक न जा सकी और ऑनलाइन रिलीज हुई। 'हिन्दी मीडियम' की ही तरह 'अंग्रेज़ी मीडियम' हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा की विषमताओं पर आधारित बहुत ही संवेदनशील फ़िल्म है। इरफ़ान अपनी इस फ़िल्म की सफलता जो सिनेमा हॉल में मिलती, देख न सके। इरफ़ान का आख़िरी ट्वीट 12 अप्रैल को, जिसे उन्होंने अपनी अन्तिम फ़िल्म 'अंग्रेज़ी मीडियम' के ऑनलाइन रिलीज होने पर किया- ''मिस्टर चम्पक की मनःस्थिति : अंदर से प्यार, कोशिश करूँगा कि बाहर से दिखा सकूँ।' (''Mr. Champak's state of mind : Love from the inside, making sure to show it outside.'')   
इरफ़ान एक कलाकार के रूप में गज़ब का अभिनय करते हैं। आँखों से भाव को अभिव्यक्त करने में उन्हें महारत हासिल है। जिस भी किरदार में होते हैं जीवन्त कर देते हैं, चाहे वह पान सिंह हो या मक़बूल। उनकी सभी फ़िल्में और उनका अभिनय बेहतरीन है। हिन्दी फ़िल्मों में मक़बूल, रोग, पान सिंह तोमर, लंच बॉक्स, हिन्दी मीडियम, अंग्रेज़ी मीडियम आदि बहुत सफल है और मुझे बेहद पसन्द है। टी.वी. पर चाणक्य, भारत एक खोज आदि धारावाहिक में वे काम कर चुके हैं। हिन्दी फ़िल्म, अंग्रेज़ी फ़िल्म और टी.वी. धारावाहिक सभी में उनका अभिनय बहुत उत्कृष्ट रहा है और हर जगह अपनी छाप छोड़ी है।   
आज इरफ़ान की मृत्यु की ख़बर पढ़कर स्तब्ध हूँ। अभी चार दिन पहले 25 तारीख़ को उनकी माँ गुज़र गईं; परन्तु कोरोना के कारण देशव्यापी लॉकडाउन की वज़ह से इरफ़ान अपनी माँ की अन्तिम यात्रा में शामिल न हो सके थे। कल उनकी तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया। आज ज़िन्दगी से बिना जंग किए, मौत के साथ वे इस दुनिया से चले गए। सिर्फ़ फ़िल्मी दुनिया या उनके अपनों के लिए नहीं, बल्कि उनके चाहनेवालों और प्रशंसकों के लिए भी बहुत बड़ा सदमा है। ऐसा सदमा जो हमें इरफ़ान को कभी भूलने नहीं देगा। उनकी फ़िल्में, उनके किरदार, उनका अभिनय, उनकी आँखें, उनकी आँखों की भाषा, उनकी हँसी, उनकी अदाकारी सब कुछ यहाँ हमारे लिए वे छोड़ गए हैं। जब चाहे इन फ़िल्मों या धारावाहिक में उन्हें अभिनय करते हुए हम देख सकते हैं, पर इस बात का दुःख हमेशा रहेगा कि अब उनकी कोई नई फ़िल्म नहीं आएगी और मैं उम्रदराज़ मक़बूल को कभी देख नहीं पाऊँगी। 

अलविदा मक़बूल!  

-जेन्नी शबनम (29.4.2020)
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Monday, April 6, 2020

72. क़ातिल कोरोना का क़हर

भारत तथा विश्व की वर्तमान परिस्थिति पर ध्यान दें, तो ऐसा लग रहा है मानो प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है कि बहुत हुआ, अब तो चेत जाओ, वापस लौट जाओ अपनी-अपनी जड़ों की तरफ़, जिससे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक सुन्दर दुनिया निर्मित हो सके। सिर्फ़ भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व आधुनिकता की दौड़ में इस तरह उलझ चुका है कि थोड़ी देर रुककर चिन्तन, मनन, आत्मविश्लेषण करने को तैयार नहीं। अगर ज़रा देर रुके, तो शेष दुनिया न जाने कितनी आगे निकल जाएगी, कितना कुछ छूट जाएगा, कितना नुक़सान हो जाएगा। पैसा, पद, प्रतिष्ठा, पहचान, पहुँच आदि सफलता के नए मानदण्ड और मापदण्ड बन गए हैं। सफल होना तभी सम्भव है, जब प्रतिस्पर्धा की दौड़ में ख़ुद को सबसे आगे रखा जाए।प्रतिस्पर्धा में जीतना ही आज के समय में दुनिया जीतने का मंत्र है।  

जीव-जन्तु तो सदैव अपनी प्रकृति के साथ जीवन जीते हैं, भले आज के समय में उन्हें हम मनुष्यों ने प्रकृति से दूर कर दिया है। परन्तु मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध, प्रकृति को हथियार बनाकर विजयी होना चाहता है। इस कारण एक तरफ़ प्रकृति का दोहन हो रहा है, तो दूसरी तरफ़ हम प्रकृति से दूर होते चले जा रहे हैं। हम भूल गए हैं कि मनुष्य हो या कोई भी जीव-जन्तु, सभी प्रकृति के अंग हैं और प्रकृति पर निर्भर। प्राकृतिक संसाधन हमें प्रचुर मात्रा में मिला है; लेकिन हमारी प्रवृत्ति ने हमें आज विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। हमारी जीवन शैली ऐसी हो चुकी है कि हम सिर्फ़ एक दिन भी प्रकृति के साथ नहीं गुज़ार सकते। अप्राकृतिक जीवनचर्या के कारण हमारी शारीरिक क्षमताएँ धीरे-धीरे कम हो रही हैं। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित हो गई है, जिससे रोग प्रतिरोधक शक्ति कम हो गई है।  

सभी जानते हैं कि हानिकारक जीवाणु (बैक्टीरिया) हो या कोई भी विषाणु (वायरस) इसका प्रसार संक्रमण के माध्यम से होता है। कोरोना वायरस के संक्रमण से आज पूरी दुनिया संकट में है और असहाय महसूस कर रही है। अज्ञानता, मूढ़ता, भय, लापरवाही, अतार्किकता, असंवेदनशीलता आदि के कारण जिस तरह कोरोना का संक्रमण बढ़ता जा रहा है, निःसन्देह यह न सिर्फ़ चिन्ता का विषय है; बल्कि हमारी विफलता भी है। कोरोना से मौत का आँकड़ा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। टी.वी. और अख़बार के समाचार के मुताबिक़ सिर्फ़ चीन, जहाँ से कोरोना के संक्रमण की शुरुआत हुई थी, वहाँ स्थिति नियंत्रण में है। शेष अन्य देशों की स्थिति गम्भीर होती जा रही है।  

आम जनता को कोरोना की भयावहता का अनुमान शुरू में नहीं हुआ था।मार्च 22 को जब एक दिन का जनता कर्फ़्यू लगा और ताली, थाली, घंटी आदि बजाने का आह्वान प्रधानमंत्री ने किया, तब इसका भय लोगों में बढ़ा। काफ़ी सारे लोगों के लिए ताली-थाली-घंटी बजाना मनोरंजन का अवसर रहा। वे अपने-अपने घरों से निकलकर मानो उत्सव मनाने लगे; यों जैसे ताली-थाली-घंटी पीटने से कोरोना की मृत्यु हो रही हो, या यह कोई जादू-टोना या टोटका हो, जिससे कोरोना समाप्त हो जाएगा। अप्रैल पाँच को जब प्रधानमंत्री ने रात के नौ बजे घर की बत्ती बुझाकर दीया जलाने को कहा, तो लोगों ने इसे दीपोत्सव बना दिया। दीये जलाए गए, आतिशबाज़ी भी ख़ूब हुई, मोदी जी के लिए ख़ूब नारे लगे। यों लग रहा था ज्यों यह कोई त्योहार हो। अगर प्रधानमंत्री एक दीया जलाकर दो मिनट मौन रखने को कहते, जो लोग इस महामारी में मारे गए हैं, तो शायद लोग इसे गम्भीरता से लेते और भीड़ इकट्ठी कर न पटाखे फोड़ते, न दीवाली मनाते। हम भारतीय इतने असंवेदनशील कैसे होते जा रहे हैं? कोरोना कोई एक राक्षस नहीं है जिसे भीड़ इकट्ठी कर अग्नि से डराकर ललकारा जाए और वह मनुष्यों की एकजुटता और उद्घोष से डर कर भाग जाए।  

प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के बाद जिस तरह अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हुआ, उससे कोरोना का संक्रमण और फैल गया। अधिकतर लोग बाज़ार से महीनों का सामान घर में भरने लगे, जिससे बाज़ार में ज़रूरी सामानों की क़िल्लत हो गई और दुकानों में भीड़ इकट्ठी होने लगी। चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल हो गया। क्वारंटीन, आइसोलेशन, सोशल डिसटेनसिंग, घर से बाहर न निकलना आदि को लेकर ढेरों भ्रांतियाँ फैलने लगीं। लोग भय और आशंका से पलायन करने लगे, जिससे ट्रेन व बस में और संक्रमण फैलने लगा।  

जनवरी 2020 के अंत में जब भारत में पहला कोरोना का मामला आया तभी सरकार को ठोस क़दम उठाना चाहिए था। विदेशों से जितने भी लोग आ रहे थे, उसी समय उन्हें क्वारंटीन करना चाहिए था। देश में जितने भी समारोह, सम्मलेन, सभा का आयोजन जिसमें भीड़ इकट्ठी होनी थी, तुरन्त बंद कर देना चाहिए था। कोरोना का मामला आने के बाद भी ढेरों सरकारी कार्यक्रम हुए, जिनमें देश-विदेश से लोगों ने शिरकत की। कहीं भी किसी तरह की भीड़ एकत्रित होने पर पाबन्दी नहीं लगाई गई। लगभग दो महीने से थोड़े कम दिन में जब कोरोना के संक्रमण का फैलाव बहुत ज़्यादा हुआ और मौत का सिलसिला शुरू हुआ तब सरकार जाग्रत हुई। इतने विलम्ब से लॉकडाउन के निर्णय का कारण समझ से परे है; क्योंकि वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय को अवश्य होगा। यदि स्वास्थ्य मंत्रालय इसकी भयावहता से अनभिज्ञ था, तो यह भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश के लिए शर्म की बात है।  

लॉकडाउन होने के बाद दिल्ली से पलायन करने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग एकत्रित हो गए। इनमें दूसरे राज्यों से आए दिहाड़ी मज़दूरों की संख्या ज़्यादा थी। निःसन्देह अफ़वाहों और सरकार के प्रति अविश्वसनीयता के कारण वे सभी ऐसा करने के लिए विवश हुए। न काम है, न अनाज है, न पैसा है, न घर है; ऐसे में कोई क्या करे? सरकार खाना देगी यह गारंटी कौन किसे दे? ग़रीबों की सुविधा का ध्यान कभी किसी सरकार ने रखा ही कब? हालाँकि पहली बार यह हुआ है कि दिल्ली में सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से अच्छी हुई है। रैनबसेरा, सस्ता खाना आदि का उत्तम प्रबन्ध हुआ है। फिर भी राजनीतिक नेता और सरकार पर विश्वास शीघ्र नहीं होता है। ऐसे में लोगों को यही विकल्प सूझा कि किसी तरह अपने-अपने घर चले जाएँ, ताकि कम-से-कम ज़िन्दा तो रह सकें। इनमें सभी जाति-धर्म के लोग शामिल थे। लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद सरकार अपने ख़र्च पर सुरक्षित तरीक़े से सभी को अपने-अपने गाँव या शहर पहुँचा देती, तो समस्याएँ इतनी विकराल रूप नहीं लेतीं। शेल्टर में रहकर कोई कितने दिन समय काट सकता है?  

निज़ामुद्दीन स्थित मरकज़ में तब्लीग़ी जमात के लोगों की गतिविधियाँ बेहद शर्मनाक हैं। लॉकडाउन के बावजूद वे सभी इतनी बड़ी संख्या में साथ रह रहे थे। उन्हें जब जबरन जाँच के लिए ले जाया जा रहा था तब और अस्पताल में जाने के बाद जिस तरह की घिनौनी हरकत वे कर रहे हैं, उन्हें कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। सरकार द्वारा निवेदन और चेतावनी के बावजूद निज़ामुद्दीन के अलावा देश में कई स्थानों पर अब भी भीड़ इकट्ठी हो रही है। कई जगह स्वास्थ्यकर्मियों एवं पुलिस के साथ बदसलूकी की जा रही है।कई मामले ऐसे हो रहे हैं, जब संक्रमित व्यक्तियों को आइसोलेशन में रखा गया, तो वे भाग गए या ख़ुद को ख़त्म कर लेने की धमकी दे रहे हैं। कुछ लोग कोई-न-कोई जुगाड़ लगाकर लॉकडाउन के बावजूद घर से बहार निकल रहे हैं। जबकि सभी को मालूम है कि जितना ज़्यादा सोशल डिसटेनसिंग रहेगा संक्रमण से बचाव होगा। ऐसे लोग जान-बूझकर जनता, सरकारी व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। लॉकडाउन से कोरोना के रफ़्तार में जो कमी आती, उसे इनलोगों ने न सिर्फ़ रोक दिया है, बल्कि ख़तरा को बहुत ज़्यादा बढ़ा दिया है। समाज की भलाई किसी भी धर्म-सम्प्रदाय से बढ़कर है।

राजनीति और सियासत का खेल हर हाल में जारी रहता है, भले देश में आपातकाल की स्थिति हो। एक दिन अख़बार में फोटो के साथ ख़बर छपी कि दिल्ली सरकार एक लड्डू, ज़रा-सा अचार के साथ सूखी पूड़ी बाँट रही है। अब देश में महा-समारोह तो नहीं चल रहा कि पकवान बना-बनाकर सरकार परोसेगी। यहाँ अभी किसी तरह ज़िन्दा और सुरक्षित रहने का प्रश्न है। ऐसे हालात में दो वक़्त दो सूखी रोटी और नमक या खिचड़ी मिल जाए, तो भी काम चलाया जा सकता है। अगर अच्छा भोजन उपलब्ध हो सके, तो इससे बढ़कर ख़ुशी की क्या बात होगी। अफ़वाह यह भी फैला कि खाना मिल ही नहीं रहा है, भूख से लोग मर रहे हैं। जबकि दिल्ली सरकार, केन्द्र सरकार, ढेरों संस्थाएँ, सामाजिक कार्यकर्ता आदि इस काम में पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं।  

देश और दुनिया के हालात से सबक लेकर हमें अपनी जीवन शैली में सुधार करना होगा। खान-पान हो या अन्य आदतें, प्रकृति के नज़दीक जाकर प्रकृति के द्वारा ख़ुद को सुधारना होगा। भले कोरोना चमगादड़ से फैला है; लेकिन कई सारे जानवरों से दूसरे प्रकार का संक्रमण फैलता है। अतः मांसाहार को त्यागकर शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए। योग, व्यायाम तथा उचित दैनिक दिनचर्या का पालन करना चाहिए, ताकि हमारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़े। संचार माध्यमों के इस्तेमाल के साथ आपसी रिश्ते को मज़बूती से थामे रखा जाए, ताकि कहीं कोई अवसाद में न जाए।  

कोरोना के क़हर से बचाव के लिए हमें सरकार को सहयोग देना होगा। सिर्फ़ सरकार पर दोषारोपण कहीं से जायज़ नहीं है। हम देशवासियों को अपना कर्त्तव्य समझना चाहिए। जिन्हें संक्रमण की थोड़ी भी आशंका हो, उन्हें स्वयं आइसोलेट हो जाना चाहिए या क्वारंटीन के लिए चला जाना चाहिए। इस राष्ट्रीय और वैश्विक आपदा की घड़ी में अपने-अपने घरों में रहकर हम आवश्यक और मनोवांछित कार्य कर सकते हैं।मनोरंजन के ढेरों साधन घर पर उपलब्ध हैं, ऐसे में बोरियत का सवाल ही नहीं। एकान्तवास से अच्छा और कोई अवकाश नहीं होता, जब हम चिन्तन-मनन कर सकते हैं और कार्य योजना बना सकते हैं। आत्मावलोकन, आत्मविश्लेषण और कुछ नया सीखने का यह बहुत अच्छा मौक़ा है। यों कोरोना के कारण मन अशांत और ख़ौफ़ में है; परन्तु इससे कोरोना का ख़तरा बढ़ेगा, कम नहीं होगा।बेहतर है स्वयं, परिवार, समाज, देश और विश्व के उत्थान के लिए हम इस समय का सदुपयोग करें।  

-जेन्नी शबनम (6.4.2020)
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Sunday, March 8, 2020

71. एक बार फिर बीत गया महिलाओं का एक दिन

महिला दिवस के उपलक्ष्य में रंगारंग कार्यक्रम अपने चरम पर था। तय समय से ज़्यादा वक़्त हो गया, पर कार्यक्रम पूरा नहीं हो सका। शाम के सात बज गए। सभी महिलाएँ जाने को बेताब हो रही थीं; इसलिए कार्यक्रम को शीघ्र ख़त्म करने का बार-बार आग्रह कर रही थीं। आयोजक मंडली भी जल्दी-जल्दी सभी कार्यक्रम निपटा रही थी और हर वक़्ता को संक्षिप्त में बोलने का आग्रह कर रही थी। कुछ प्रतियोगिताएँ भी हुई थीं, जिसे शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँचाया जा रहा था, ताकि परिणाम घोषित हो सके। सभी तबक़े की महिलाएँ यहाँ आमंत्रित थीं। 
 
कार्यक्रम पूर्ण होने से पहले ही तक़रीबन आधी महिलाएँ जा चुकी थीं। जो मुख्य अतिथि और वक्ता थीं, वे बार-बार मोबाइल पर वक़्त देख रही थीं। एक महिला से यह पूछने पर कि अभी तो सिर्फ़ सात ही बजे हैं, इतनी जल्दी क्या है। उन्होंने कहा, ''वे जब तक घर जाकर चाय नहीं बनाएँगी, उनके पति चाय नहीं पिएँगे, भले ही कितनी देर हो जाए। यों वे कुछ कहेंगे नहीं कि देर क्यों हुई; लेकिन हमारी परवरिश ऐसी हुई है कि शाम के बाद घर से बाहर रहने की आदत नहीं है। कोई कुछ न कहे फिर भी मन में एक अपराधबोध-सा होने लगता है।'' किसी महिला को रात के खाने की चिन्ता हो रही है, किसी को उसके बच्चे की चल रही परीक्षा की, किसी को बाज़ार से होली के सामान ख़रीदने हैं, किसी को यह डर कि घर में सास-ससुर नाराज़ होंगे।किसी महिला का पति लेने पहुँच चुका है, तो उस महिला को मानसिक रूप से दबाव लग रहा कि उसका पति उसके कारण इन्तिज़ार में खड़ा है।मुश्किल से 10 महिलाएँ होंगी जो देर होने के बावजूद बेफ़िक्र होकर कार्यक्रम में सक्रिय योगदान कर रही थीं।   

समय की पाबन्दी निःसन्देह आज की ज़रूरत है; लेकिन यह सिर्फ़ महिलाओं के लिए क्यों? यों ढेरों पुरुष हैं जो घर के कार्यों में योगदान करते हैं और एक समय सीमा के भीतर घर आ जाते हैं। घर, बच्चे और पत्नी की जवाबदेही बख़ूबी निभाते हैं। अगर कभी देर हो, तो वे घर पर बता देते हैं, ऐसे में घर लौटने के बाद पत्नी या बच्चे प्रश्नसूचक दृष्टि से नहीं देखते। उनके देर हो जाने से कोई कार्य नहीं रुकता, न देर से आने से पुरुष को कोई ग्लानि होती है। पर इसके उलट स्त्रियों के लिए वह सब होता है, जो पुरुष के लिए नहीं होता। वह अगर देर तक बाहर है तो कहाँ होगी, कौन-कौन वहाँ होंगे, कैसे जाएगी, कैसे लौटेगी, कितने बजे लौटेगी इत्यादि प्रश्नों के बीच घिर जाती है। हाँ, सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह सब जानना लाज़िमी है; परन्तु ये सभी प्रश्न पुरुषों के लिए भी उतने ही ज़रूरी हैं। पुरुष भी उतने ही असुरक्षित हैं जितनी स्त्रियाँ। इन सबके बावजूद स्त्री-पुरुष के लिए नियमों के अलग-अलग पैमाने तय हो चुके हैं, जो सर्वमान्य हैं।   

शिक्षा, स्वास्थ्य, पहनावा, रहन-सहन इत्यादि हर पहलू पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि हमारा समाज स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग मापदण्ड रखता है और दोहरी नीति अपनाता है। स्त्रियों को उसके विरासत में स्त्री होना सिखाया जाता है, जिसमें तय नियमों पर खरा उतरने की उससे अपेक्षा की जाती है। वहीं पुरुषों के लिए बिल्कुल अलग दृष्टिकोण है। शिक्षित समाज में पुरुष से बस इतनी अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षा प्राप्त कर एक अच्छी नौकरी पा ले। अशिक्षित समाज में परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाना पुरुष के लिए वांछित होता है, बाक़ी कुछ भी आवश्यक नहीं है। परन्तु स्त्रियों के लिए चाहे वह शिक्षित समाज हो या अशिक्षित, स्त्रियोचित गुण के साथ उन सारी ज़िम्मेदारियों का पालन करना आवश्यक है, जिसे समाज ने उनके लिए निर्धारित किए हैं। अजीब बात यह है कि कोई भी व्यक्ति इस बात की पुष्टि नहीं करता कि ऐसे नियम समाज में स्थापित हैं। स्त्रियों की यह कसौटी पत्नी और माँ, बहु और बेटी में अंतर कर देती है। जो क़ायदे किसी की पत्नी के लिए मानने आवश्यक हैं, वे उस पुरुष की माँ, बहन, बेटी के लिए ज़रूरी नहीं होते। रिश्तों के साथ सारे समीकरण बदल जाते हैं। ऐसे में स्त्री गहन पीड़ा और अकुलाहट से भर जाती है कि ऐसा क्यों है। जो बातें किसी स्त्री के लिए वाजिब हैं, पुरुष के लिए ज़रूरी क्यों नहीं? समाज या कानून में ऐसे कोई नियम या क़ायदे नहीं बनाए गए हैं, किन्तु व्यावाहारिक रूप से यही मान्य है और सत्य भी।   

जीवन का समीकरण आख़िर कैसे तय किया जाए? किन नियमों के तहत जीवन को ढाला जाए ताकि समय के साथ क़दमताल मिलाया जा सके? हम स्त्री व पुरुष की बराबरी की बात करते हैं, लेकिन यह तब तक सम्भव नहीं है, जब तक स्त्री व पुरुष को बुनियादी रूप से बराबर न माना जाए।सामजिक संरचना, सामाजिक दृष्टिकोण, प्रथाएँ, परम्पराएँ आदि हमारी सोच को इस तरह प्रभावित करती हैं कि कब हम इन नियमों को मानने लग जाते हैं, पता ही नहीं चलता। यों वह सारे नियम जो एक स्त्री के लिए मान्य है, यदि पुरुष भी पालन करने लग जाएँ, तो निःसन्देह समाज में समानता आ जाएगी। जो ग़लत नियम या परम्पराएँ स्थापित हो चुकी हैं, उन्हें स्त्री-पुरुष को मिलकर ध्वस्त करना चाहिए। जो तरीक़े या नियम पुरुष के लिए ग़ैरज़रूरी हैं, वह स्त्री के लिए भी ग़ैरवाजिब होने चाहिए। 

बहरहाल जीवन प्रवाहमान है। असंतुलन बना हुआ है। स्त्री-विमर्श की चर्चा हर जगह होती ही रहती है। कहीं स्त्री, तो कहीं पुरुष प्रताड़ित होते रहते हैं। स्त्रियों की समस्याएँ विकराल और वीभत्स रूप से सामने आ रही हैं। इन सभी विषयों पर पूरे समाज को जागरूक होकर सोचने और निर्णय पर पहुँचने की ज़रूरत है। यह तभी मुमकिन है जब समाज में स्त्री-पुरुष बराबर हों और एक दूसरे का सम्मान करें।   

-जेन्नी शबनम (8.3.2020)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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Friday, February 21, 2020

70. फाँसी की फाँस


वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह का बयान कि जैसे सोनिया गांधी ने राजीव गांधी के हत्यारे को माफ़ किया है, वैसे ही निर्भया की माँ निर्भया के बलात्कारियों को माफ़ कर दें। एक स्त्री होकर वकील साहिबा ऐसा कैसे सोच सकीं? राजीव गांधी की हत्या और निर्भया के बलात्कार का अपराध एक श्रेणी में कैसे माना जा सकता है? मानवीय दृष्टि से किसी की मौत के पक्ष में होना सही नहीं है। परन्तु बलात्कार ऐसा अमानवीय अपराध है, जिसमें पीड़ित स्त्री के जीवन और जीने के अधिकार का हनन हुआ है, ऐसे में बलात्कारी के लिए मानवीय दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता है। इस अपराध के लिए सज़ा के तौर पर शीघ्र मृत्यु-दण्ड से कम कुछ भी जायज़ नहीं है। 
  
निर्भया के मामले में डेथ वारंट जारी होने के बाद फाँसी में देरी कानूनी प्रावधानों का ही परिणाम है। किसी-न-किसी नियम और प्रावधान के तहत फाँसी का दिन बढ़ता जा रहा है। अभी चारों अपराधी जेल में हैं, ढेरों सुरक्षाकर्मी उनके निगरानी के लिए नियुक्त हैं, उनकी मानसिक स्थिति ठीक रहे इसके लिए काउन्सिलिंग की जा रही है, शरीर स्वस्थ्य रहे इसके लिए डॉक्टर प्रयासरत हैं, उनके घरवालों से हमेशा मिलवाया जा रहा है। आख़िर यह सब क्यों? जेल मैनुअल के हिसाब से दोषी का फाँसी से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना ज़रूरी है। यह कैसे सम्भव है कि फाँसी की सज़ा पाया हुआ मुजरिम बिल्कुल स्वस्थ हो? भले ही जघन्यतम अपराध किया हो; परन्तु फाँसी की सज़ा सुनकर कोई सामान्य कैसे रह सकता है? बलात्कारी की शारीरिक अवस्था और मानसिक अवस्था कैसी भी हो, फाँसी की सज़ा में कोई परवर्तन या तिथि को आगे बढ़ाना अनुचित है। निर्भया के बलात्कारियों को अविलम्ब फाँसी पर लटका देना चाहिए।    

ऐसा नहीं है कि बलात्कार की घटनाएँ पहले नहीं होती थी। परन्तु विगत कुछ वर्षों से ऐसी घटनाओं में जिस तरह बेतहाशा वृद्धि हुई है, बेहद अफ़सोसनाक और चिन्ताजनक स्थिति है। कानून बने और सामजिक विरोध भी बढ़े; परन्तु स्थिति बदतर होती जा रही है। कुछ लोगों का विचार है कि आज की लड़कियाँ फैशनपरस्त हैं, कम कपड़े पहनती हैं, शाम को अँधेरा होने पर भी घर से बाहर रहती हैं, लड़कों से बराबरी करती हैं आदि-आदि; इसलिए छेड़खानी और बलात्कार जैसे अपराध होते हैं। इनलोगों की सोच पर हैरानी नहीं होती है; बल्कि इनकी मानसिक स्थिति और सोच पर आक्रोश होता है। अगर यही सब वज़ह है बलात्कार के, तो दूधमुँही बच्ची या बुज़ुर्ग स्त्री के साथ ऐसा कुकर्म क्यों होता है?   

अगर स्त्री को सिर्फ़ देखकर कामोत्तेजना पैदा हो जाती है, तो हर बलात्कारी को अपनी माँ, बहन, बेटी में रिश्ता नहीं, उनका स्त्री होना नज़र आता और वे उनके साथ भी कुकर्म करते; परन्तु ऐसा नहीं है। कोई बलात्कारी अपनी माँ, बहन, बेटी के साथ बलात्कार होते हुए सहन नहीं कर सकता है।हालाँकि ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं, जब रक्त सम्बन्ध को भी कुछ पुरुषों ने नहीं छोड़ा है। वैज्ञानिकों के लिए यह खोज का विषय होना चाहिए कि दुष्कर्मी में आख़िर ऐसा कौन-सा रसायन उत्पन्न हो जाता है, जो स्त्री को देखकर उसे वहशी बना देता है। ताकि अपराधी मनोवृति पर शुरुआत में ही अंकुश लगाया जा सके।    

हमारी न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और इसके ढेरों प्रावधान के कारण अपराधियों में न सिर्फ़ भय ख़त्म हुआ है; बल्कि मनोबल भी बढ़ता जा रहा है। यह सही है कि कानून हर अपराधी को अधिकार देता है कि वह अपने आप को निरपराध साबित करने के लिए अपना पक्ष रखे तथा अपनी सज़ा के ख़िलाफ़ याचिका दायर करे। समस्त कानूनी प्रक्रियाओं के बाद जब सज़ा तय हो जाए, और सज़ा फाँसी की हो, तब ऐसे में दया याचिका का प्रावधान ही ग़लत है। दया याचिका राष्ट्रपति तक जाए ही क्यों? ऐसा अपराधी दया का पात्र हो ही नहीं सकता है। सरकार का समय और पैसा इन अपराधियों के पीछे बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं है। सज़ा मिलते ही 10 दिन के अंदर फाँसी दे देनी चाहिए। कानूनविदों को इस पर विचार-विमर्श एवं शोध करने चाहिए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के प्रावधानों की आड़ में कोई अपराधी बच न पाए। मानवीय दृष्टिकोण से सभी वकीलों को बलात्कारी का केस न लेने का संकल्प लेना चाहिए। अव्यावाहारिक और लचीले कानून में बदलाव एवं संशोधन की सख़्त ज़रूरत है, ताकि कानून का भय बना रहे, न्याय में विलम्ब न हो तथा कोई भी जघन्यतम अपराधी बच न पाए।   

-जेन्नी शबनम (20.2.2020)
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Tuesday, January 14, 2020

69. मेरी पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' का लोकार्पण



'लम्हों का सफ़र' पुस्तक देखते ही मन ख़ुशी से झूम उठा। पुस्तक को हाथ में लेते ही एक अजीब-सा रोमांच और उत्साह महसूस हुआ। मेरी क्षमता, योग्यता और सृजन को जैसे मैंने हाथों में पकड़ रखा हो। यों मेरी 25 से ज़्यादा साझा संकलन प्रकाशित हो चुकी हैं; परन्तु यह मेरा एकल कविता-संग्रह है। इसलिए मुझे एक अलग-सा एहसास हुआ। वर्षों से यह मेरी बहुप्रतीक्षित पुस्तक है, जिसका इन्तिज़ार मुझे तो था ही, मेरे कुछ मित्रों को मुझसे भी ज़्यादा था।   

मेरी पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' मेरा प्रथम एकल कविता-संग्रह है, जिसका लोकार्पण 7.1.2020 को विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में हुआ। डॉ. राजीव रंजन गिरि, जो राजधानी कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर हैं, के हाथों पुस्तक लोकार्पित हुई। 'लम्हों का सफ़र' हिन्द युग्म प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। लोकार्पण से पूर्व हिन्द युग्म के स्टूडियो में सौरभ जी के साथ पुस्तक से सम्बन्धित बातचीत हुई, जिसे फेसबुक पर लाइव प्रसारित किया गया। लोकार्पण के बाद मैंने पुस्तक से कविता-पाठ किया।
   
प्रोफ़ेसर डॉ. राजीव रंजन गिरि, शायर श्री अनिल पाराशर 'मासूम' एवं श्रीमती शानू पाराशर, लेखिका श्रीमती नीलिमा शर्मा, लेखक श्री नीलोत्पल मृणाल, हास्य कलाकार श्री विभोर चौधरी, लेखिका श्रीमती पारुल सिंह, लेखिका श्रीमती सपना बंसल 'अहसास', हिन्द युग्म के प्रकाशक श्री शैलेश भारतवासी, हिन्द युग्म की सम्पादक सुश्री ज्योति दुबे, हिन्द युग्म से जुड़े एवं कार्यरत सहयोगी, मेरी पुत्री परान्तिका दीक्षा व उसके मित्रों तथा उन सभी मित्रों का आभार जिनके कारण यह आयोजन सफल हुआ।

लोकार्पण के इस सुखद अवसर पर मित्रों, लेखकों, पुस्तक प्रेमियों, दर्शकों तथा मेरी पुत्री और उसके मित्रों ने उपस्थित होकर मुझमें ऊर्जा का संचार किया। लोकार्पण के इस सुखद समय में मेरे साथ रहकर जिन लोगों ने मुझमें उमंग भरा है, मैं उन सभी की दिल से आभारी हूँ। मुझे सम्मान व प्रेम देने तथा मुझमें विश्वास रखने के लिए सभी का दिल से धन्यवाद व आभार। 
 
 

 
 











 
-जेन्नी शबनम (14.1.2020)
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Wednesday, October 2, 2019

68. इतना मैं गांधी को जानती हूँ

आज महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती है। आज फिर से वह गीत याद आ रहा है, जिसे सुन-सुनकर मैं बड़ी हुई हूँ- ''सुनो-सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी, वो बापू जो पूज है इतना जितना गंगा माँ का पानी...।'' मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गाया और राजेन्द्र कृष्ण द्वारा लिखा यह गीत मेरे कानों में गूँजता रहता है। इस गाने के साथ मेरा बचपन जुड़ा हुआ है। मेरे पिता यह गाना रिकॉर्ड प्लेयर पर हमेशा बजाते थे। इतना ज़्यादा कि इसके बोल याद हो गए मुझे। अक्सर सोचती हूँ काश! मेरा जन्म आज़ादी से पहले हुआ होता, तो मैं अवश्य बापू के साथ जुड़ जाती। बापू मेरे हृदय में बसे हुए हैं; क्योंकि मेरे पिता गांधीवादी विचार के थे और उस परिवेश में पलने-बढ़ने के कारण ख़ुद को उनके क़रीब पाती हूँ। परन्तु तमाम कोशिशों के बावजूद अपने पिता या बापू की जीवन शैली मैं अपना न सकी। 
मेरे पिता
अक्सर सोचती हूँ कि बापू सच में कैसे दिखते होंगे? वे कैसे रहते होंगे? उनके सोच-विचार ऐसे कैसे हुए होंगे? जबकि वे भी तो आम भारतीय ही थे। काश! मैं सच में एक बार बापू को देख पाती। यों बचपन में प्रोजेक्टर पर गांधी जी को देखती थी। न जाने क्यों सदैव उनकी तरफ़ एक खिंचाव-सा महसूस होता रहा। शायद पिता के जीवन यापन का तरीक़ा मेरे सोच पर प्रभावी हुआ होगा। उम्र और ज़रूरत ने मेरी सोच को अपना न रहने दिया। बापू को अपने जीवन में उतार न सकी, इसका दुःख अक्सर सालता है। बापू को पूर्णतः अपनाने के लिए एक साहस चाहिए, जो मुझमें नहीं है। यह ज़रूर है कि मेरे मस्तिष्क में एक क्षीण काया का वह वृद्ध व्यक्ति अक्सर मेरे साथ होता है और मुझे क़दम-क़दम पर टोकता है, जिसने दिश को आज़ादी दिलाई।  
तारा जी और मैं
तारा गाँधी भट्टाचार्या और मैं

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
पिछले वर्ष मैं एक पुस्तक विमोचन में गई। वहाँ एक बुज़ुर्ग महिला आईं, जो शुद्ध खादी के वस्त्रों में थीं और सबसे अलग दिख रही थीं। जिज्ञासा हुई जानने की कि वे कौन हैं। किसी परिचित से पता चला कि वे तारा गांधी भट्टाचार्या हैं, महात्मा गांधी के सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी की पुत्री। उनको देखकर मेरा मन इतना रोमांचित हुआ कि जाकर उनसे बात किए बिना रह न सकी। बहुत सरल हृदय की हैं वे। उन्होंने कहा कि जब चाहो घर पर आओ। सन 2014 में मैंने अपने पिता की पुस्तक 'सर्वोदया ऑफ़ गाँधी' (Sarvodaya of Gandhi) का पुनर्प्रकाशन करवाया था। उस पुस्तक के विमोचन में तारा जी के आने की बात हुई थी; परन्तु अस्वस्थ होने के कारण वे नहीं आ सकीं। मैंने यह बताया, तो सुनकर वे बहुत ख़ुश हुईं। उनसे मिलकर मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि लगा मानो बापू से न मिल सकी, परन्तु उनके अंश से तो मिल ली। बापू के बारे में सोचकर मन एक अजीब से रोमांच से भर जाता है।
   
मेरे पिता की पुस्तक
मेरे पिता की पुस्तक
महात्मा गांधी की जीवन शैली और उनके द्वारा किए गए सत्य के प्रयोग के कारण उनकी काफ़ी आलोचना होती है। यों मैं गांधीवाद को जितना जान पाई हूँ अपने पिता के जीवन से जाना है। मैं इस बात को लेकर विश्वास रखती हूँ कि गांधीवाद न सिर्फ़ आज की ज़रूरत है, बल्कि समाज के सकारात्मक उत्थान के लिए आवश्यक है। आज समाज में भ्रष्टाचार, द्वेष, हिंसा, दुराचार, असहनशीलता, अकर्मण्यता, दुराभाव, बलात्कार, मॉब लिंचिंग इत्यादि बढ़ते जा रहे है। इस स्थिति में न सरकार प्रभावी हो पा रही है, न सामजिक संस्थाएँ कुछ कर पा रही हैं। ऐसे में सभी समस्याओं का समाधान गांधीवाद को केन्द्र में रखकर निकाला जा सकता है। यह ज़रूरी है कि न केवल आम जनता बल्कि सत्ता और नौकरशाही भी गांधी को जानें, समझें और आत्मसात करें। वैसे बचपन से सभी को स्कूल में अच्छी शिक्षा दी जाती है; लेकिन कुछ तो कमी है, जिससे समाज ऐसा होता चला जा रहा है। जीवन शैली और शिक्षा पद्धति में बड़े बदलाव की सख़्त ज़रूरत  है।
   
बापू के जीवन के सिद्धांत या नियम इतने सहज, सरल और मानवीय हैं कि अगर कोई मन से चाहे तो अवश्य अपना सकता है। एक सुसभ्य, सम्मानित और आत्मनिर्भर व्यक्ति तथा समाज के निर्माण के लिए बापू की जीवन शैली अपनाना ही एकमात्र तरीक़ा है। हमारा राष्ट्र अगर बापू के विचार का कुछ अंश भी हमारे क़ायदे-कानून में शामिल कर दे, तो निःसन्देह एक सुन्दर समाज की कल्पना साकार हो सकती है। बापू के विचार समाज में समूल परिवर्तन कर एक आदर्श स्थिति को लाने में बेहद कारगर हो सकते हैं, जैसे कि आज़ादी की लड़ाई में गांधी जी ने किया था।   

आज गांधी जयन्ती पर सरकार और समाज से यही उम्मीद है कि गांधी को पढ़ें, समझें, फिर अपनाएँ। बापू को सादर प्रणाम!   

महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जी को उनकी जयन्ती पर हार्दिक नमन!   

-जेन्नी शबनम (2.10.2019)   
(महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती पर)
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