Monday, August 15, 2011

26. स्मृतियों में शान्तिनिकेतन (भाग- 1)


यह जाना पहचाना रास्ता अब अनजान था; शायद वक़्त पहचान को अजनबियत में बदल देता है। सड़क के दोनों ओर हरे-हरे पेड़, बीच में कुछ दूर छोटे-बड़े शांत पहाड़, तेज़ भागती गाड़ी और किसी बॉलीवुड की फ़िल्म की तरह तेज़ी से आँखों से गुज़रता फ्लैश बैक! मन में उमंग, उत्सुकता और उल्लास! बीच-बीच में मनीषा (मनीषा बनर्जी मेरी मित्र, सरकारी इंटर स्कूल में शिक्षिका) का फ़ोन आता रहता कि हमलोग कहाँ तक पहुँचे। यों भागलपुर से शान्तिनिकेतन 210 किलोमीटर है, पर सड़क की बदहाल स्थिति के कारण हमें छह घंटे लग गए। भागलपुर से बाँका, मंदारहिल, दुमका, सिउरी होते हुए हम शान्तिनिकेतन पहुँचे।  
 
शान्तिनिकेतन का रतनपल्ली, जहाँ आज से 20 वर्ष पूर्व मैं कई महीने रह चुकी हूँ, बिल्कुल पहचान न सकी। सबकुछ बदला-बदला लग रहा था, अपरिचित-सा। अचानक एक दुकान पर नज़र पड़ी 'रंजना', मैंने चौंककर कहा ''अरे ये तो हाशिम भाई की दुकान है (लुत्फा दी के शौहर), जिनके मकान में मैं रहती थी। पर कालो की दूकान कहाँ है, जहाँ गौर दा के साथ अक्सर खाने के लिए जाती थी।'' गौर किशोर घोष, जिन्हें हम सभी गौर दा कहते हैं, आनन्द बाज़ार पत्रिका के सिनियर एडिटर, कहानीकार, उपन्यासकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता थे। वर्ष 1981 में उन्हें पत्रकारिता, साहित्य तथा सृजनात्मक सम्प्रेषण कला के लिए मैग्सेसे सम्मान मिला था। मैं चारों तरफ़ देख रही थी, कितना कुछ बदल गया है यहाँ। मैं भी तो पूर्णतः बदल गई हूँ। जब यहाँ से गई थी तो अविवाहित थी, दोबारा यहाँ आई हूँ अपने 18 साल के बेटे के साथ। मन में सोचकर हँसी आई और ख़ुद पर दुःख भी हुआ। सच है, वक़्त और दूरी सब कुछ बदल देता है, शायद अपनापन भी। 
 
मनीषा अपनी नौ वर्षीया बेटी मेघना के साथ रतनपल्ली में वहाँ पहुँच चुकी थी, जहाँ उसने मुझे रुकने के लिए कहा था। उसके साथ हमलोग उसके घर गए। मनीषा से मेरा परिचय भागलपुर में हुआ था, जब भागलपुर दंगा (अक्टूबर 1989) के बाद गौर दा एक टीम बनाकर हमारे घर आए थे। भागलपुर दंगा के कारण मैं बहुत परेशान और उदास रहती थी, इसलिए 1990 में गौर दा मुझे शान्तिनिकेतन लेकर आए, जहाँ बानी दी और मनीषा के साथ मैं रही थी। उन दिनों मनीषा अँगरेज़ी में एम.ए. कर रही थी और मृणालिनी छात्रावास में रहती थी। अब उसने रतनपल्ली में अपना मकान ख़रीद लिया है, जहाँ पति से अलग होने के बाद अपनी एकमात्र बेटी के साथ रहती है। 
मैं और मनीषा
मनीषा ने मेरे लिए शुद्ध शाकाहारी खाना बनवा रखा था और मेरे बेटे के लिए मछली; यों मनीषा भी शाकाहारी है। मैंने कहा कि सिद्धांत (मेरा बेटा अभिज्ञान सिद्धांत) के लिए मछली क्यों बनवाई, तो वह बोली कि बंगाल आए और मछली न खाए, ऐसा कैसे होगा। मनीषा का घर बड़ा प्यारा है। उसने हमारे रहने का प्रबन्ध ऊपर के कमरे किया था। खाना खाकर हम बात कर रहे थे कि लुत्फा दी (लुत्फा मुंशी) आ गईं। वे हिन्दी नहीं बोल पातीं हैं और मैं अब ठीक से बांग्ला नहीं बोल पाती हूँ। मुझे देखकर उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ कि एक लड़की दुबली-पतली चुप-चुप-सी रहने वाली, अब एक औरत है, जिसका छेले (बेटा) 18 साल का, थोड़ी मोटी-मोटी-सी हँसती खिलखिलाती हुई। थोड़ी देर बातें हुईं फिर घर आने का कहकर वे चली गईं।  
मनीषा, मैं, श्यामली दी
शाम को हमलोग प्रकृति गए, जहाँ क्राफ्ट मेला लगता है
; छोटे पौष मेला जैसा ही मनमोहक। मिट्टी, लकड़ी, पत्थर आदि से बना कान-गले का आभूषण, हाथ से बना पेपर, बाटिक प्रिंट के कपड़े, बाऊल के गीत सब कुछ थे वहाँ। फिर वहाँ से श्यामली दी (श्यामली खस्तगीर जो एक सामजिक कार्यकर्ता, लेखिका, चित्रकार, कलाकार, हस्तकला और लोककला की मर्मज्ञ हैं) से मिलने मनीषा के साथ हमलोग पास के एक कॉफ़ी हाउस गए। यहाँ से श्यामली दी के साथ एक मित्र के घर जाना था, जहाँ रात्रि भोजन और बाऊल गान होना था। मैं, मनीषा, मेघना और सिद्धांत कुछ खाने का ऑर्डर कर श्यामली दी के आने का इन्तिज़ार करने लगे।थोड़ी देर में श्यामली दी उसी पुराने अंदाज़ में आईं। सूती साड़ी, दोनों कन्धे पर दो झोले, पर इस बार उनको चप्पल भी पहने देखा। मुझे याद है उन दिनों वे शान्तिनिकेतन में बिना चप्पल पहने रहती थीं। मैंने पाँव छुए तो उन्होंने गले से लगा लिया, फिर मेरी मम्मी का हाल पूछने लगीं। वहाँ से वे एक किताब की दुकान में ले गईं, जहाँ से उन्होंने पाँच किताबें ख़रीदीं और अपनी लिखी हुई एक किताब जो वे साथ लाई थीं, मुझे तोहफ़े में दिया। साथ ही सेरेमिक की एक छोटी-सी प्याली और एक सुराही भी दीं, जो सजावट के लिए है और शान्तिनिकेतन के पॉटरी में बनता है।
बाएँ से मनीषा, मेघना, मैं, श्यामली दी, सत्य शिवरमन, एक सज्जन 
हम लोग सत्य शिवरमन के घर गए, जो अभी हाल में शान्तिनिकेतन रहने आए हैं और पेशे से पत्रकार हैं। वहाँ 5-6 बाऊल (गेरुआ वस्त्र पहनते हैं, एकतारा से धुन बजाते हैं, भक्ति गीत गाते हैं, जो सूफी संगीत की तरह होता है) पहले से आ चुके थे, बस हमलोग के आने का इन्तिज़ार हो रहा था। सबसे नमस्कार के बाद उनका गाना शुरू हुआ। हम सभी उनके गाने में डूबने लगे। गाने के बाद खाना लगाया गया। सत्य और उनकी मित्र मधुमिता ने स्वयं सारा खाना बनाया था और श्यामली दी की बनाई हुई एक ख़ास सब्ज़ी चरचरी भी थी। खाने के बाद श्यामली दी को उनके घर पर पहुँचाकर हम मनीषा के साथ उसके घर आ गए।  

बाएँ से मेरा पुत्र अभिज्ञान, मनीषा, मैं, मंजु दी, सुभाष चन्द्र राय
दूसरे दिन विश्वभारती विश्वविद्यालय घूमने जाना था और एक-दो पुराने मित्रों से मिलना था। नाश्ते के बाद मनीषा के साथ हमलोग हिन्दी भवन गए। हिन्दी भवन की विभागाध्यक्ष मंजु दी (मंजु रानी सिंह) से मिले, वे भागलपुर की रहने वाली हैं और उनकी शिक्षा विश्वभारती में हुई है। जब मैं यहाँ रहती थी, तो अक्सर उनसे मिलती थी। सुभाष (सुभाष चन्द्र राय) जो अब हिन्दी भवन में व्याख्याता हैं (बेगूसराय के रहने वाले हैं, उन दिनों यहाँ के छात्र थे और वी.पी.सिंह का गहरा प्रभाव होने के कारण उनकी तरह कुर्ता-पायजामा और टोपी पहनते थे) को भी मंजु दी ने बुला लिया। सुभाष अब भी वैसे ही हैं, पर अब टोपी उतार दिया है। बानी दी (इनके घर पर लगभग मैं एक महीना रही थी) के घर अक्सर छात्रों का जमावड़ा होता था, जिनमें सुभाष भी होते थे। रात को मंजु दी ने खाने पर बुलाया और फिर रात में मिलने का कहकर मैं सिद्धांत को टैगोर का घर दिखाने ले गई। 
   
टैगोर का पाँचो घर- उदयना, कोणार्क, श्यामली, पुनश्च और उदीची हमने देखा। 'बिचित्र' जिसे रबीन्द्र भवन कहते हैं टैगोर का म्यूजियम है, जो इन दिनों बन्द हैं, सुरक्षा के कड़े प्रबन्ध के लिए कुछ निर्माण कार्य चल रहा है।संगीत भवन और कला भवन भी हम घूम आए। फिर मृणालिनी छात्रावास (मनीषा के साथ कुछ दिन रही थी) देखते हुए हम मनीषा के घर वापस आए। मनीषा ने साड़ी, कुर्ता, बैग, फ़ाइल फोल्डर, मिट्टी का गले-कान का सेट आदि मेरे और मेरे परिवार के लिए तोहफ़े में दिया, जो उसने वहीं के कॉपरेटिव स्टोर से लिया था। खाना खाकर मैं और मनीषा बातें करने बैठ गए। बीती ज़िन्दगी की बातें, जिनमें मनीषा की मुश्किलों भरी ज़िन्दगी और गौर दा की बातें प्रमुख थीं। फिर मनीषा का एक मित्र रेहान आया, जो मनीषा का सहकर्मी है, जिससे बातें कर हमलोग लुत्फा दी के घर गए। 
 
लुत्फा दी और मैं
लुत्फा दी के घर में किराया लेकर मैं कई माह रही थी। प्रथम तल पर बड़ी सी छत पर 'एल' आकार का एक कमरा, उससे लगा एक बड़ा-सा रसोईघर, बाहर दरवाज़े से लगा शौचालय। मेरे पास सामान के नाम पर एक चटाई, पतला तोसक (गद्दा), एक तकिया, रजाई, कुछ कपड़े, एक छोटा सूटकेस, एक स्टोव, एक कूकर, कुछ बर्तन, एक वॉकमैन और ढेर सारे कैसेट थे। मैं अपने घर पर बहुत डरती थी अकेले सो नहीं सकती थी, पर यहाँ बिल्कुल अकेले रह रही थी। बड़े प्यारे दिन थे वे भी। कुछ जल्दी-जल्दी बना-खा लिया और चल पड़े। किसी तरह का कोई डर नहीं। उन्हीं दिनों सुनीता गुप्ता नाम की एक छात्रा जो हॉस्टल में रहती थी, से मेरी दोस्ती हुई।उसके बाल बहुत लम्बे, घुटने से भी ज़्यादा बड़े थे। जब भी कोई पर्यटक उसे देखता तो कहता कि देखो बंगाली लड़की का बाल और हम दोनों हँस देते; क्योंकि वह बंगाली नहीं गोरखपुर की रहने वाली थी। पूरे पौष मेला में हम दोनों मेरे घर पर खिचड़ी बनाकर खा लेते और निकल जाते, दिन भर मेला देखते रहते। पता नहीं वह कहाँ है आजकल। उसका पता नहीं मिल पाया मुझे। 
 
लुत्फा दी ने खाने की ढेर सारी तैयारी कर रखी थी। पहले मुझे वह कमरा देखना था, जहाँ मैं रहती थी। बहुत उत्साह से पूरा घर दिखाया उन्होंने। जहाँ मैं रहती थी वहाँ एक और कमरा बन गया है, जिसमें उनकी एकमात्र बेटी जब ससुराल से आती है, तब रहती है। मेरे बाद कोई और नहीं रहा वहाँ।फिर हमलोगों ने नाश्ता किया। बहुत अच्छा खाना बनाती हैं लुत्फा दी। उन दिनों भी अक्सर कुछ-न-कुछ खिलाती थीं मुझे। मेरे लिए शान्तिनिकेतन का एक बैग और सिद्धांत के लिए एक वॉलेट तोहफ़ा में दिया उन्होंने। अपनी लिखी पुस्तक (बांग्ला लिपि में) जो उनकी आत्मकथा है मुझे दिया। दोबारा आने का कहकर हमलोग वहाँ से विदा हुए। ठीक उनके मकान से लगा हुआ बानी दी (बानी सिन्हा, 92 वर्षीया, गौर दा की मित्र, जिनके घर मैं लगभग एक महीना रही) का घर था। अब वे दूसरे मकान में रहती हैं और अस्वस्थ होने के कारण इन दिनों कोलकाता में अपनी बहन के पास रह रही हैं। ठहरकर बाहर से उस मकान को देख लिया। फिर हम बोलपुर बाज़ार चल पड़े, यहाँ का कुछ ख़ास सामान यादगार स्वरूप लेने के लिए।   
 
रात्रि भोजन के लिए हमलोग मंजु दी के घर के लिए निकले। रास्ते में अमर्त्य सेन का घर आया, गाड़ी थोड़ी धीमी कर हमने उस घर को ठीक से देख लिया। मंजु दी के घर कविताओं पर चर्चा हुई। मंजु दी और मनीषा ने अपनी स्वरचित कविता सुनाई। मैं अपनी उसी दिन की लिखी हुई कविता सुनाई, जो शान्तिनिकेतन आने पर की अनुभूति थी। कविता के भाव इस तरह हैं जैसे शान्तिनिकेतन और मेरे बीच वार्ता हो रही है। वह नाराज़ है मुझसे कि मैं क्यों छोड़ गई थी शान्तिनिकेतन, फिर से दोबारा आऊँ वक़्त निकालकर कुछ दिनों के लिए, साथ-साथ यादों को जीने के लिए। 
 
उन्हीं दिनों की तरह 
***
चौंककर उसने कहा-
''जाओ लौट जाओ, क्यों आई हो यहाँ 
क्या सिर्फ़ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें 
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
 
मैं अवाक्! निरुत्तर!
फिर भी कह उठी-
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी 
गवाह तो थे न तुम
जीवन की दशा और दिशा को तुमने ही तो बदला था
सब जानते तो थे तुम, तब भी और अब भी।
 
सच है, तुम भी बदल गए हो 
वह न रहे, जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं
एक भूलभुलैया या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा 
जाने क्यों लग रही है मुझे?
 
तुम न समझो, पर अपना-सा लग रहा है मुझे 
थोड़ा-थोड़ा ही सही
आस है, शायद तुम वापस अपना लो मुझे 
उसी चिर-परिचित अपनेपन के साथ   
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे 
और तुमने बेझिझक सहारा दिया था मुझे   
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ   
और हमेशा रहूँगी  
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थीं   
और मैं बेफ़िक्र, ज़िन्दगी के नए रूप देख रही थी   
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी। 
   
सब कुछ बदल गया है वक़्त के साथ  
जानती हूँ, पर उन यादों को जी तो सकती हूँ  
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे   
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ  
फ़र्क़ सिर्फ़ वज़ह का है   
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है   
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ। 
   
तनिक सुकून दे दो   
फिर लौट जाना है मुझे   
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में   
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी तुमसे दूर   
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी   
अब तक जीवित हूँ।
    
मत कहो-   
''जाओ, लौट जाओ'',   
एक बार कह दो-   
''शब! तुम वही हो, मैं भी वही   
फिर आना कुछ वक़्त निकालकर   
एक बार साथ-साथ जिएँगे   
फिर से उन्हीं दिनों की तरह कुछ पल!'' 
-0-

मं
जु दी से दुर्गा दा का पता करने को कहा था। मैं जब यहाँ रह रही थी तब एक महीने तक रोज़ एक घंटा दुर्गा दा से गाना सीखती थी। जिस दिन यहाँ से वापस गई किसी से मिल न पाई, दुर्गा दा को धन्यवाद भी न दे सकी। मुझे उनका पूरा नाम भी मालूम न था, सिर्फ़ दुर्गा दा ही जानती थी। मंजु दी ने उनके घर का पता लगा लिया। सुबह 8 बजे मिलने का वक़्त दिया उन्होंने।एक उलझन थी कि क्या ये वही दुर्गा दा हैं या कोई और, और इसका समाधान उनसे मिलने के बाद ही होना था। तय हुआ कि सुबह मंजु दी के साथ जाऊँगी और अगर वे वही दुर्गा दा न हुए तो फिर उनसे पता करूँगी।ख़ैर पता भी सही था और दुर्गा दा भी वही थे। बहुत ख़ुश हुए मुझसे मिलकर, पर पहचानने में थोड़ा वक़्त लगा उन्हें। बानी दी का नाम कहने पर तब याद कर सके वे मुझे; क्योंकि बानी दी ने ही मेरे संगीत शिक्षा के लिए उनसे बात की थी। 

आज हमें वापस लौटना था
। श्यामली दी ने सुबह अपने घर नाश्ते पर बुलाया था। नाश्ते के बाद वहीं से भागलपुर लौट जाना था। दुर्गा दा से मिलने के बाद मंजु दी मेरे साथ मनीषा के घर आ गईं; काफ़ी दिनों से वे श्यामली दी से मिली नहीं थीं, तो मेरे साथ उनके घर चलेंगी। मनीषा बाद में आने का बोली; क्योंकि उस दिन उसे तीन-चार सेमीनार में जाना था, जहाँ उसका भाषण था। हमलोग श्यामली दी के घर चल दिए।  
मैं और श्यामली दी
श्यामली दी का घर 'पलाश' जहाँ मैं बहुत आती थी, उनसे लाल चन्दन के बीज से गहना बनाना सीखा था। गेट के भीतर घुसते ही चन्दन के बीज गिरे हुए दिखे। बेटे से मैंने कहा कि कुछ बीज उठा ले, गहना बनाना याद करूँगी। जैसे ही हम लोग उनके घर के बरामदे में पहुँचे, उनका एक अफ्रिकन मित्र घबराया हुआ बाहर आया और बताया कि श्यामली दी को अटैक आया है। हम दौड़ते हुए अन्दर पहुँचे। एक कुर्सी पर वे निढाल बैठी थीं। उनकी गोद में एक प्लेट, हाथ में कटे प्याज और चाकू थे। उनके एक पाँव और एक हाथ में लकवा (paralysis) का अटैक हो चुका था। चेहरे पर उस समय तक नहीं हुआ था, वे बोल पा रही थीं। हमारे पहुँचने से पहले ही उन्होंने मनीषा को फ़ोन कर दिया था कि उन्हें अटैक आया है। हॉस्पिटल जाने को वे राज़ी नहीं थीं, पर बहुत कहने पर राज़ी हुईं कि शान्तिनिकेतन के हॉस्पिटल में जाएँगी बाहर नहीं। एक कमरे की तरफ़ इशारा कर उन्होंने एक झोला मँगवाया और उसमें से पैसे निकालकर मंजु दी को दिया कि मनीषा को दे देना। मंजु दी से वे बार-बार कह रही थीं कि जेन्नी को खाना खिला देना। धीरे-धीरे उनके चेहरे पर भी असर होने लगा। तब तक मनीषा आ गई, मनीषा की गाड़ी से उनको अस्पताल भेजा गया। फिर सत्य शिवरमन को सूचना दी गई, वे आए और उन्हें लेकर हम अस्पताल पहुँचे।  
 
अस्पताल में उनके मित्रों की भीड़ लग गई। चूँकि कोई भी उनका रक्त-सम्बन्धी नहीं था, तो अस्पताल की कार्रवाई में दिक्कत आ रही थी; परन्तु डॉक्टर अपना काम कर रहे थे। डॉक्टर ने उनको दुर्गापुर या कोलकाता ले जाने के लिए कहा; क्योंकि स्थिति बहुत नाज़ुक थी। शरीर का पूरा दाहिना हिस्सा और चेहरा लकवाग्रस्त हो चुका था। वहाँ जब हम लोग मिलने गए तो उन्होंने इशारे से कहा कि खाना खा लेना और मंजु दी को कहा कि जेन्नी को खाना खिला देना। हम लोगों ने कहा कि दुर्गापुर जाना है, तो इस स्थिति में भी इंकार करने लगीं कि शान्तिनिकेतन छोड़कर नहीं जाना है। तब तक दुर्गापुर से एम्बुलेंस लाने की व्यवस्था हो गई। सत्य ने स्वयं उनके साथ एम्बुलेंस में जाने का निर्णय लिया। तत्पश्चात श्यामली दी का झोला जिसमें पैसे थे, सत्य को दे दिया गया । 
मनीषा ने मुझसे कहा कि एम्बुलेंस आने में दो घंटा लगेगा, तब तक घर जाकर खा लो, नहीं तो श्यामली दी को बहुत दुःख होगा। वह भी तब तक अपने सेमीनार से होकर आ जाएगी। मंजु दी के साथ मैं और मेरा बेटा श्यामली दी के घर आए। एक रिक्शावाला वहीं रहता है, उसने बताया कि श्यामली दी रात में बहुत देर तक जागी थीं और सुबह से हमारे लिए खाने की तैयारी कर रही थीं। खाना बनाने और खिलाने की शौक़ीन रही हैं श्यामली दी। मिक्स पराठा बना चुकी थीं, दूध फाड़कर पनीर बनाकर रखी थीं, आलू उबला हुआ, प्याज आधा कटा हुआ, फ्रिज़ में कई तरह की सामग्री। इस परिस्थिति में खाने का मन नहीं हो रहा था पर इंसुलिन लिए काफ़ी देर हो चुका था, तो खाना भी आवश्यक था। पनीर आलू को भूनकर पराठा और अचार के साथ हम तीनों ने खाया। इस बीच मंजु दी ने सिद्धांत से कहा कि घर की तस्वीर ले लो, क्योंकि श्यामली दी के पिता सुधीर खस्तगीर एक बहुत बड़े शिल्पकार और चित्रकार थे, श्यामली दी भी थीं।उनकी कीमती कलाकृति सब वैसे ही पड़ी हुई थी। 
 
श्यामली दी के पुत्र 'आनन्दो तान ली' कनाडा में रहते हैं, जब तक वे आ न जाएँ, तब तक पता नहीं किसके पास घर की चाबी हो। मैंने मनीषा से कहा कि उनके घर की चाबी वह ख़ुद रखे किसी और को न दे, क्योंकि मनीषा को श्यामली दी बहुत मानती थीं। फिर वापस आकर मैंने श्यामली दी को बताया कि हम लोगों ने उनका बनाया खाना खा लिया है, तो वे मुस्कुरा दीं और भर्राई हुई आवाज़ में कुछ कहा। शब्द गले में अटके जा रहे थे, बहुत चेष्टा करने पर भी स्पष्ट नहीं बोल पा रही थीं। उनकी आँखें भींग गईं थीं। उस मुस्कराहट में लग रहा था जैसे कि उनके बनाए हुए खाने को मेरे खा लेने से उनको तसल्ली मिली हो। इस अवस्था में भी उन्हें अपने से ज़्यादा दूसरों की फ़िक्र थी। अपना इलाज अपने पैसे से कराने की उनकी ज़िद जारी थी।
श्यामली दी का घर
क़रीब तीन बजे हम लोग भागलपुर के लिए चले। दुर्गा दा का फ़ोन आया कि रास्ते में उनका विद्यालय है, मिलते हुए जाना। श्रीनिकेतन में रास्ते में उनसे मिलते हुए हम भागलपुर के लिए रवाना हो गए, कुछ अच्छी और कुछ दुःख भरी यादें साथ लिए। गौर दा से तो मिल न सकी थी। वर्ष 2000 में उनकी मृत्यु हो चुकी थी, पर मुझे वर्ष 2003 में पता चला। ज़िन्दगी में मैं ऐसी उलझी कि विवाह पूर्व के सारे रिश्ते खोते चले गए। बानी दी भी अब बहुत ज़्यादा अस्वस्थ हो चली हैं, शान्तिनिकेतन कम ही रहती हैं। बाद में कोलकाता जाना हुआ तो टॉम दा (इन्द्रजीत रॉय चौधरी, चित्रकार व पुराने वस्तु के संग्राहक, बानी दी के भाई) से मुलाक़ात हुई। उन दिनों टॉम दा जब भी शान्तिनिकेतन आते, तो मुझसे ज़रूर मिलते थे। जब मैं वहाँ रह रही थी तब अपने हाथों से बनाई हुई दो अँगूठी और बंगाल की एक साड़ी उपहारस्वरूप उन्होंने मुझे दी थी। दोबारा एक बार और कोलकाता जाना हुआ तो उनकी माँ रेणुका रॉय चौधरी से मुलाक़ात हुई जो अपने समय की विख्यात उपन्यासकार थीं।
   
श्यामली दी का ऑपरेशन हो चुका है और लोगों को थोड़ा-थोड़ा पहचान रही हैं; लेकिन स्थिति नाज़ुक बनी हुई है। उनका बेटा आ चुका है और माँ का पूरा ख़याल रख रहा है। श्यामली दी को कोलाकाता ले जाया गया है; लेकिन स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जा रहा है। वे अब भी वेंटीलेटर पर हैं। जब तक वे थोड़ा भी बोल सकीं या इशारे से बता सकीं, शान्तिनिकेतन जाने की बात कहती हैं। आगे क्या होगा नहीं पता; लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि उन्हें शान्तिनिकेतन ले आना चाहिए, कम-से-कम मानसिक रूप से तो वे मज़बूत महसूस करेंगी। यों भी उनके प्राण शान्तिनिकेतन में बसते हैं, भले कुछ कहने में अब असमर्थ हो गई हैं। उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना सभी जानने और चाहने वाले कर रहे हैं। स्वस्थ हो जाने के बाद एक बार फिर से शान्तिनिकेतन जाऊँगी श्यामली दी से मिलने। 
 
जारी...

-जेन्नी शबनम (11.8.2011)
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Wednesday, July 20, 2011

25. तुम आमिर खान ही हो न?


दिल्ली के पेट में क्या सिर्फ़ गाली और असभ्य जीवन शैली है? क्या यहाँ रिश्तों का कोई मूल्य नहीं? क्या सिर्फ नग्नता और अवांछित स्थितयाँ ही दिल्ली के गर्भ में है? आख़िर आमिर खान 'देल्ही बेली' से क्या साबित करना चाहते हैं? वही आमिर खान जो किसानों की आत्महत्या पर, मीडिया के तमाशे पर, बेहद असरदार फ़िल्म बनाते हैं। वही आमिर खान जो बच्चों और अभिभावकों के मनोविज्ञान को परदे पर यूँ उतारते हैं, जैसा कभी किसी ने सोचा न हो। वही आमिर खान 'देल्ही बेली' जैसी निरर्थक फ़िल्म भी बनाते हैं। क्यों बनाते हैं, इसका जवाब शायद आमिर के पास भी नहीं होगा।  
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
गालियों की बौछार इस सिनेमा में क्यों है, इसका कोई औचित्य समझ में नहीं आया। बाथरूम जाने और पेट ख़राब होने के भौंडेपन पर कोई हँसी नहीं आई। किसी भी दृश्य से आम जीवन के साथ इसका सन्दर्भ समझ नहीं आया। अगर बात करें बैचलर ज़िन्दगी की, तो मैं नहीं मानती कि कोई भी इतने गन्दे वातावरण में रह सकता है, जैसा सिनेमा में दिखाया गया है। जिन किरदारों को इसमें दिखाया गया है, वे पढ़े-लिखे और मीडिया से हैं। ऐसी जीवन शैली कहीं से भी उनकी दशा का वास्तविक चित्रण नहीं है। हर वाक्य में गाली, देश के किसी भी कोने में ऐसा देखने को नहीं मिलता है।  
 
आज का युवा चिन्तनशील है, शराब पीता है, मोहब्बत करता है, एक लड़की को इसलिए छोड़ सकता है क्योंकि मानसिक धरातल पर उसे अपने बराबर नहीं समझता है, जीवन शैली निम्न हो सकती है, गाली भी देता है, वेश्यागमन भी कर सकता है, अपनी मर्ज़ी से ज़िन्दगी जीना चाहता है। परन्तु इस सिनेमा के किरदार-सा एक भी चरित्र आम जीवन में नहीं दिखता है। पुराने मकान की दशा, टूट जाना, या गन्दगी को दिखाना फिर भी जायज़ है; लेकिन एक युवा पत्रकार, फोटोग्राफर और कार्टूनिस्ट के बारे में ऐसा दिखाना कहीं से भी ग्राह्य नहीं है।  
 
गाली देना मनुष्य के प्रतिकार से जुड़े मनोविज्ञान का हिस्सा है। गाली वह हथियार है, जिससे किसी के प्रति अपने क्रोध को अहिंसात्मक तरीक़े से अभिव्यक्त किया जाता है और गाली देकर मन की भड़ास निकाली जाती है। गाली देना हमारी परम्परा में भी शामिल है; भले उसके लिए ख़ास अवसर होते हैं, जब सार्वजनिक रूप से औरतें भी गाली देती हैं। हिन्दू-विवाह में एक अवसर पर वर पक्ष वालों को गाली देने का रिवाज है, जो हास्य और मनोरंजन माना जाता है। इस रिवाज की लोग प्रतीक्षा करते हैं।इसमें वर के महत्वपूर्ण रिश्तेदारों का नाम पता करके गाली दी जाती है। इसे कोई बुरा नहीं मानता; बल्कि सभी मज़ा लेते हैं और एक परम्परा की तरह इसे महत्त्व देते हैं।  
 
गाली को आधुनिक युवाओं की थाती बताना कहाँ से जायज़ है? महिला हो या मर्द गाली सभी देते हैं और अपने-अपने हिसाब से देते हैं। बस फ़र्क ये आया है कि वही गाली हिन्दी में सुनने में बुरी लगती है और अँगरेज़ी में कहा जाए तो आम बात। परन्तु यों धड़ल्ले से गाली देना आज तक कहीं नहीं सुना, न देखा। फ़िल्म 'ओमकारा' में बहुत गालियाँ थीं; लेकिन उस फ़िल्म के चरित्र के लिए यह सही था और उसका गाली देना अटपटा नहीं लगा। पत्रकारों का स्तर इतना निम्न नहीं है कि वे सारा समय सिर्फ़ गाली देते रहें और वह भी बेवज़ह। जीवन शैली में गिरावट दिखाना अगर इस सिनेमा का मक़सद है, फिर भी अंत में कुछ तो सन्देश देना चाहिए।  
 
इस फ़िल्म को किस दर्जा में डाला जाएगा, आमिर खान को कम-से-कम एक बार ज़रूर विचार करना चाहिए था। दिल्ली में संस्कारों की कमी नहीं है, न यहाँ के युवा इतने निम्न स्तर पर उतर आए हैं। गाली ठूँसकर 'ए' सर्टिफिकेट लेना, ताकि जनमानस के दिमाग़ में कुछ ख़ास सिनेमा होने की सोच आए और फ़िल्म चल पड़े; शायद ऐसी मानसिकता रही होगी आमिर खान की। अपने नाम को भुनाकर इस फ़िल्म को हिट कराना एकमात्र उद्देश्य है, जिसे आमिर खान ने बख़ूबी किया है। हर दृश्य में फूहड़ हास्य, गाली और अतार्किक सोच। क्या आमिर खान का स्तर ऐसा हो गया? ऐसी स्तरहीन सिनेमा के द्वरा दर्शक को क्या सन्देश देना चाहते हैं आमिर खान, जिनसे हर सिनेमाप्रेमी स्तरीय सिनेमा की उम्मीद रखता है। यह फ़िल्म बेहद निराश करती है। आमिर खान की सोच और समझ पर आश्चर्य होता है। अब आमिर खान के सिनेमा को देखने से पहले फ़िल्मी समीक्षकों की राय पढ़कर ही जाना होगा, क्या पता 'देल्ही बेली' की तरह फिर से ख़ुद पर शर्मिंदा होकर लौटना पड़े।

-जेन्नी शबनम (9.7.2011)
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