Monday, January 27, 2025
120. इमरोज़ की चाय
Thursday, January 16, 2025
119. ख़त, जो मन के उस दराज़ में रखे थे -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देखकर
मैंने उसको आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं।
डॉ. जेन्नी शबनम के कुछ इसी प्रकार के 105 ‘सन्नाटे के ख़त’ हैं, जो समय-समय पर चुप्पी के द्वारा लिखे गए हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम जिससे प्रेम करते हैं, उसे सही समय पर अभिव्यक्त नहीं करते। जिसे घृणा करते हैं, सामाजिक दबाव में उसको कभी होंठों पर नहीं लाते। परिणाम होता है, जीवन को भार की तरह ढोते हुए चलते जाना।
ये ख़त मन के उस दराज़ में रखे थे, जिसे कभी खोलने का अवसर ही नहीं मिला। अब जी कड़ा करके पढ़ने का प्रयास किया; क्योंकि ये वे ख़त हैं, जो कभी भेजे ही नहीं गए। किसको भेजने थे? स्वयं को ही भेजने थे। अब तक जो अव्यक्त था, उसे ही तो कहना था। पूरा जीवन तो जन्म-मृत्यु, प्रेम घृणा, स्वप्न और यथार्थ के बीच अनुबन्ध करने और निभाने में ही चला गया-
एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच
कभी साथ-साथ घटित न होना
एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच
कभी साथ-साथ फलित न होना
एक अनुबन्ध है स्वप्न और यथार्थ के बीच
कभी सम्पूर्ण सत्य न होना
जीवनभर कण्टकाकीर्ण मार्ग पर ही चलना पड़ता है; क्योंकि जिसे हमने अपना समझ लिया है, उसका अनुगमन करना था। मन की दुविधा व्यक्ति को अनिर्णय की स्थिति में लाकर खड़ा कर देती है, जिसके कारण सही मार्ग का चयन नहीं हो पाता, जबकि-
उस रास्ते पर दोबारा क्यों जाना
जहाँ पाँव में छाले पड़ें, सीने में शूल चुभें
बोझिल साँसें जाने कब रुकें।
निराश होकर हम आगे बढ़ने का मार्ग ही खो बैठते हैं। आधे-अधूरे सपने ही तो सब कुछ नहीं। सपनों से परे भी तो कुछ है। कवयित्री ने जीवन में एक अबुझ प्यास को जिया है। मन की यह प्यास किसी सागर, नदी या झील से नहीं बुझ सकती।
घर बनाने में और उसको सँभालने में ही हमारा सारा पुरुषार्थ चुक जाता है। इसी भ्रम में जीवन के सारे मधुर पल बीत जाते हैं-
शून्य को ईंट-गारे से घेर, घर बनाना
एक भ्रम ही तो है
बेजान दीवारों से घर नहीं, महज़ आशियाना बनता है
घरों को मकान बनते अक्सर देखा है
मकान का घर बनना, ख़्वाबों-सा लगता है।
इन 105 ख़तों में मन का सारा अन्तर्द्वन्द्व, अपने विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। आशा है पाठक इन ख़तों को पढ़कर अन्तर्मन में महसूस करेंगे।
दीपावली: 31.10.2024 -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
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- जेन्नी शबनम (16.1.2025)
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Friday, January 10, 2025
118. 'सन्नाटे के ख़त' का लोकार्पण
जनवरी माह की सात तारीख़ मेरे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और यादगार है। वर्ष 2000 में आज के दिन मेरी बेटी का जन्म हुआ। मेरी पहली पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में जनवरी 7, 2020 को हुआ। मेरी दूसरी पुस्तक 'प्रवासी मन' जनवरी 7, 2021 को मुझे प्राप्त हुई, जिसका अनौपचारिक विमोचन मेरी बेटी और मैंने किया। जनवरी 10, 2021 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 'हिन्दी हाइकु' एवं 'शब्द सृष्टि' के संयुक्त तत्वाधान में गूगल मीट और फेसबुक पर आयोजित पहला ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मलेन हुआ, जिसमें मेरी पुस्तक 'प्रवासी मन' का औपचारिक लोकार्पण हुआ।


Wednesday, January 1, 2025
117. नव वर्ष 2025
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चित्र गूगल से साभार |
Thursday, December 12, 2024
116. रहस्यमय अंतरिक्ष
अंतरिक्ष जिसे अंग्रेज़ी में स्पेस (space) कहते हैं, मुझे सदैव बड़ा ही रहस्यमय लगता है। जब मैं छोटी थी तब अपनी माँ के साथ एक कॉन्फ्रेंस में कलकत्ता (कोलकाता) गई। वहाँ पहली बार तारामण्डल देखने गई। जब वहाँ गई तो दिन था और जैसे शो शुरू हुआ रात हो गई, रात की तरह चाँद-तारे उग गए। जैसे रात में नींद आती है, वैसे ही नींद आ गई और मैं कुर्सी पर सो गई। माँ ने मुझे उठाया और मैं देखने लगी कि आसमान में क्या सब हो रहा है। शो के बाद बाहर आई तो दिन ही था। मुझे समझ नहीं आया कि अभी तो रात थी, दिन कैसे हो गया।
बचपन में सोचती थी कि आकाश दिन में आसमानी और रात में चाँद-तारों से भरा अँधेरा क्यों हो जाता है। सूरज तो आसमान में रहता है फिर वहाँ अँधेरा कहाँ से आ जाता है। बचपन से ही एक कुतूहल मन में रहता था कि अंतरिक्ष कहाँ है, ब्रह्माण्ड कहाँ है, सूरज डूबकर कहाँ सोने चला जाता है, चाँद बड़ा-छोटा क्यों दिखता है और कभी-कभी कहाँ ग़ायब हो जाता है, आकाश कितना दूर है, वहाँ क्या-क्या होता है, वहाँ कौन-कौन रहता है, क्या मरने के बाद लोग आकाश में रहते हैं या तारा बन जाते हैं, क्या सच में वहाँ ईश्वर रहता है। समय और उम्र के साथ इन सवालों के जवाब थोड़े-थोड़े मुझे मिलते गए, लेकिन पूर्ण जवाब न मिल सका। आज भी मुझे अंतरिक्ष, ब्रह्माण्ड, सूरज, चाँद, तारा, ईश्वर जैसे विषय को जानना-समझना रुचिकर लगता है।
पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहर का ख़ाली स्थान अथवा किसी दो ग्रहों के बीच का शून्य स्थान जिसका असीमित विस्तार है और जिसका क्षेत्र त्रि-आयामी है, अंतरिक्ष कहलाता है। इसमें लाखों आकाशगंगा (Galaxy), सभी ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, तारे, उल्कापिंड, मैग्नेटिक फील्ड, ब्लैक होल इत्यादि मौजूद है। अंतरिक्ष में न हवा है, न पानी, न गुरुत्वाकर्षण बल। यहाँ सूरज की रोशनी बिखर नहीं सकती है, इसलिए अँधेरा रहता है। अंतरिक्ष एक निर्वात (vacuum) है जहाँ किसी की आवाज़ नहीं सुन सकते। यहाँ ख़तरनाक रेडिएशन है।
वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के ढेरों रहस्य खोज लिए, पर अभी भी बहुत से रहस्य ऐसे हैं, जो खोजे न जा सके। जिस तरह विज्ञान ने प्रगति की है, मुमकिन है अंतरिक्ष का हर रहस्य खोज लिया जाएगा। भारत तथा अन्य देशों के ढेरों मानव निर्मित उपग्रह यानी कृत्रिम उपग्रह (Satellite) अंतरिक्ष में स्थापित किए गए हैं, जिनसे लगातार अंतरिक्ष के अध्ययन और खोज किए जा रहे हैं। वर्ष 1957 में सोवियत यूनियन ने पहला कृत्रिम उपग्रह 'स्पुतनिक' अंतरिक्ष में स्थापित किया था। एक उपग्रह ट्रैकिंग वेबसाइट के अनुसार मई 2024 तक अंतरिक्ष में कुल सक्रिय उपग्रह क़रीब 9,900 हैं। वर्ष 2028 तक हर साल 990 उपग्रह प्रक्षेपित किए जाने का अनुमान है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 23 अगस्त, 2023 को चन्द्रमा पर चंद्रयान-3 विक्रम लैंडर को चन्द्रमा ध्रुवीय क्षेत्र पर सफलतापूर्वक उतारा था। इस उपलब्धि के कारण हर वर्ष 23 अगस्त को भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस' घोषित किया गया है। भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह 'आर्यभट्ट' 19 अप्रैल 1975 को प्रक्षेपित किया गया, जिसे इसरो द्वारा बनाया गया था। इसरो के अनुसार वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष में भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किया जाएगा, जो भारत के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
अंतरिक्ष में उपग्रह के ज़रिए परिवहन, संचार, सार्वजनिक सुरक्षा, रक्षा, सरहद की सुरक्षा, शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य व चिकित्सा, वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकी अनुसंधान व विकास, अंतरिक्ष विज्ञान, सूचना प्रोद्योगिकी, पृथ्वी अवलोकन, टेलीविजन प्रसारण, मौसम का अनुमान, जलवायु परिवर्तन आदि का काम होता है। टेलीमेडिसिन और टेली-हेल्थ के क्षेत्र में भी उपग्रह से बड़ा योगदान मिलता है। आपदा प्रबंधन और उसके निदान में अंतरिक्ष प्रोद्योगिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। मोबाइल सेवा, इंटरनेट कनेक्टिविटी, वित्तीय लेन-देन भी उपग्रह पर निर्भर है। यह न हो तो हम न फ़ोन कर सकेंगे, न टेक्सट भेज सकेंगे और न इंटरनेट का उपयोग कर सकेंगे। ये उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर सभी कार्यों का निष्पादन और संचालन की व्यवस्था करते हैं, साथ ही अंतरिक्ष के रहस्यों का पता करते हैं।
अंतरिक्ष से जुड़े कार्य में लाखों लोग कार्यरत हैं। घर बैठे हम जो चाहें जान सकते हैं। विज्ञान और तकनीक की प्रगति में अंतरिक्ष उद्योग बहुत सहायक है। आज हम इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। अंतरिक्ष से जुड़े कार्य हमारे जीवन को सहूलियत, सुविधा और ज्ञान देते हैं, साथ ही हमारे अन्धविश्वास को दूर कर रहे हैं। जिस ब्रह्माण्ड को ईश्वर का स्थान माना जाता था, वहाँ का सारा रहस्य लगभग ज्ञात हो चुका है। संसार, ब्रह्माण्ड, अंतरिक्ष, ग्रह, नक्षत्र इत्यादि का विस्तृत रूप से तथ्यपूर्ण व तर्कपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो चुका है। हमारे ढेरों अंधविश्वास को भी विज्ञान और तकनीक ने नकार दिया है।
अंतरिक्ष-उद्योग में अंतरिक्ष-पर्यटन-उद्योग लगातार बढ़ रहा है। अंतरिक्ष पर जाना बेहद ख़र्चीला है, फिर भी लोग अंतरिक्ष-यात्रा का अनुभव लेने जाते हैं। यह यात्रा आम लोगों के लिए सहज सुलभ नहीं है। अंतरिक्ष-यात्रा के लिए विशेष प्रकार का प्रशिक्षण लेना होता है; क्योंकि वहाँ सामान्य जीवन नहीं होता, न सामान्य तरीके से रह सकते हैं। भविष्य में इस उद्योग के विस्तार की प्रबल संभावना है; क्योंकि हर देश इस क्षेत्र में सर्वोपरि बनना चाहता है।
अंतरिक्ष-उद्योग लगातार बढ़ रहा है, जिसके कारण अंतरिक्ष में उपग्रहों की बाढ़-सी आ गई है। नासा के अनुसार करीब 8400 टन कचरा अंतरिक्ष में है, जो लगातार पृथ्वी की कक्षा में घूम रहा है। अगर एक भी टुकड़ा पृथ्वी पर गिरा तो भारी तबाही कर सकता है। उपग्रह प्रक्षेपित करने के लिए जो रॉकेट वहाँ गए उसके अंश, फ्यूल टैंक, बोल्ट्स, बैटरी, लॉन्चिंग से जुड़े हार्डवेयर आदि अंतरिक्ष में कचरा के रूप में जमा हैं। अंतरिक्ष में कचरा कम हो इसके लिए अन्य देशों की तरह इसरो भी लगातार अध्ययन कर रहा है।
अंतरिक्ष के कार्यों से जहाँ दुनिया ने इतनी प्रगति और खोज कर ली है, वहीं इसके नुक़सान भी बहुत अधिक हैं। लगातार सभी देशों में होड़ लगी है कि अंतरिक्ष में कौन कितना ज़्यादा उपग्रह प्रक्षेपण कर अपना वर्चस्व दिखा सकता है। इसके कारण अंतरिक्ष में उपग्रहों की भीड़ बढ़ती जा रही है। प्रतिस्पर्धा और श्रेष्ठता साबित करने के लिए हर देश अंतरिक्ष में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। जिसके पास जितना ज़्यादा उपग्रह होगा उसके पास उतनी ज़्यादा शक्ति होगी। कोई भी देश मनमानी करके कभी भी कहीं भी विनाश ला सकता है और इससे समस्त मानवता ही नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी के नष्ट होने का ख़तरा पैदा हो गया है।
अंतरिक्ष में जितना ज़्यादा उपग्रह स्थापित किया जाएगा, उतना ही ज़्यादा कचरा जमा होगा। ज़्यादा उपग्रह होने से अंतरिक्ष-मलबा और कार्बन उत्सर्जन जैसी चुनौती उत्पन्न हो गई है। उपग्रह और अंतरिक्ष-कचरा के बीच टकराव होने का ख़तरा पैदा हो गया है। अंतरिक्ष में जाने वाला हर रॉकेट काला कार्बन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, क्लोरीन, छोड़ता है जिससे पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग और अन्य पर्यावरणीय समस्या पैदा हो रही है। अंतरिक्ष उड़ान की गतिविधि ज़्यादा बढ़ने से ओजोन परत को नुक़सान हो रहा है। रॉकेट के कारण वायुमण्डलीय प्रदूषण हो रहा है। अन्तरिक्ष में लम्बे समय तक रहने से मनुष्य की हड्डियाँ और मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं, विशेषकर पैरों और पीठ के निचले हिस्से की।
किसी भी युद्ध की दशा में अब अंतरिक्ष-युद्ध होगा। आज हर देश की तमाम सेवाएँ उपग्रह के ज़रिए ही होती हैं। दुश्मन देश के उपग्रह को नष्टकर उस देश के रक्षा, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, परिवहन जैसे आधारीय संरचना को ठप्प कर सकते हैं। ऐसे में दुश्मन देश सक्षम होते हुए भी हार जाएगा। उपग्रह के नष्ट होने से ज़मीन पर चल रहे युद्ध पर बहुत बड़ा असर होगा। अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हथियारों और सैनिकों को जी.पी.एस. (Global Positioning System) से दिशा-निर्देश देना, दुश्मन की गतिविधियों पर निगरानी करना, कमांड और कंट्रोल देना आदि करते है। अगर ऐसे उपग्रह नष्ट कर दिए जाएँ तो परिणाम का अंदाज़ा हम लगा सकते हैं। इतिहास में पहले अंतरिक्ष युद्ध का उदहारण है जब 31 अक्टूबर 2023 को इज़रायल-हमास युद्ध में इज़रायल पर यमनी मिसाइल हमले के दौरान इज़राइल ने अपने एरो 2 मिसाइल रक्षा प्रणाली द्वारा हौथी बैलिस्टिक मिसाइल को रोक दिया था।
विज्ञान की प्रगति ने एक तरफ़ अंतरिक्ष तक हमारी पहुँच बना दी है तो दूसरी तरफ़ ख़ौफ़ का ऐसा अनदेखा साया पूरी पृथ्वी ही नहीं ब्रह्माण्ड पर मँडरा रहा है, जिसमें संसार के विनाश का हर उपाय मौजूद है। कौन देश किस तरह से हमला करेगा, इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है। उपग्रह पर हमला कर किसी भी देश की व्यवस्था को सहज रूप से नष्ट किया जा सकता है। यदि ये उपग्रह नष्ट हुए तो हमारा जीवन पूर्णतः ध्वस्त हो जाएगा। अतः मानवता के लाभ-हानि पर विचार कर अंतरिक्ष क्षेत्र पर राज करने का विचार त्यागकर सिर्फ़ प्रगति के लिए नियंत्रित एवं संयमित होकर अंतरिक्ष का उपयोग किया जाना आवश्यक है।
- जेन्नी शबनम (25.7.2024)
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Thursday, November 21, 2024
115. साँसों का संकट
Saturday, November 16, 2024
114. साहस और उत्साह से भरी राह
Friday, October 18, 2024
113. हृदय की संवेदनशीलता और कोमलता बयाँ करता काव्य-संग्रह 'नवधा' - दयानन्द जायसवाल
कवयित्री डॉ. जेन्नी शबनम का 'नवधा' काव्य-संग्रह में नौ विधाओं का संग्रह है। उन नौ विधाओं में ' हाइकु', 'हाइगा', 'ताँका', 'सेदोका', 'चोका', 'माहिया', 'अनुबन्ध', 'क्षणिकाएँ' तथा 'मुक्तावलि' हैं। नवधा-काव्य-सृजन में इनका सम्पूर्ण परिचय और इनके जीवन के मीठे-कटु अनुभवों का आत्मालोचन भी है। इनकी यह सारी काव्य शैली जापानी कविता की समर्थवान विधा है।
हाइकु का विकास होक्कू से हुआ है, जो एक लंबी कविता की शुरुआती तीन पंक्तियाँ हैं जिन्हें टंका के नाम से भी जाना जाता है। यह 5-7-5 के शब्दांश होते हैं जिसमें इन्होंने प्रेम की महत्ता को इस प्रकार दर्शाया है-
" प्रेम का काढ़ा
हर रोग की दवा
पी लो ज़रा-सा।"
'हाइगा' जिसका शाब्दिक अर्थ है 'चित्र कविता', जो चित्रों के समायोजन से वर्णित किया जाता है। यह हाइकु का प्रतिरूप है, जिसमें इन्होंने समुद्र की लहर का सचित्र वर्णन किया है-
"पाँव चूमने
लहरें दौड़ आईं
मैं सकुचाई।"
'ताँका' जापानी काव्य की एक सौ साल पुरानी काव्य विधा है। इस विधा को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के दौरान काफ़ी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे। हाइकु का उद्भव इसी से हुआ है। यह पाँच पंक्तियों और 5-7-5-7-7= 31 वर्णों के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करता है, जिसे इन्होंने बालकविता के रूप में एक नन्हीं-सी परी को आसमान से उतारी और वो बच्चों का दिल बहलाई और पुनः लौट गई। उसे इन चंद पंक्तियों में भावनाओं का अथाह सागर-सा उड़ेल दी है-
"नन्हीं सी परी
लिए जादू की छड़ी
बच्चों को दिए
खिलौने और टॉफी
फिर उड़ वो चली।"
'सेदोका' में किसी एक विषय पर एक निश्चित संवेदना, कल्पना या जीवन-अनुभव वर्णित होता है। इसमें क्रमशः 5-7-7-5-7-7 वर्णक्रम की छह पंक्तियाँ होती हैं, जिसे इन्होंने वियोगावस्था का वर्णन, प्रेमिका के मन की पीड़ा को संवेदनाओं की काली घटाओं में इस प्रकार घोली हैं-
"मन की पीड़ा
बूँद-बूँद बरसी
बदरी से जा मिली
तुम न आए
साथ मेरे रो पड़ी
काली घनी घटाएँ।"
'चोका' भारतीय दृष्टिकोण से यह एक वार्णिक छंद है जिसमें 5-7-5-7 वर्णों के क्रम में कई पंक्तियाँ हो सकती हैं। इसके अंत की दो पंक्तियों में सात-सात वर्ण होते हैं। इस कला पक्ष के साथ भाव के प्रवाह में रची गयी कविता 'चोका' कहलाती है।
कवयित्री के मन में अपनी इन कविताओं को लेकर कोई दुविधा नहीं है। देश दुनिया के संघर्षजीवी जन के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, आकांक्षाओं और बेहतर ज़िंदगी, बेहतर दुनिया के लिए इनकी मुक्ति चेतना ही प्रतिबद्धता है। दूसरी ओर इस प्रतिबद्धता के पीछे इनकी समस्त भावनाओं, अनुभूतियों, आत्मीयता और कोमलतम संवेदनाओं को बचा लेने का मन दिखता है, जिसके बिना न तो जीवन जीने योग्य दिखता है और न ही मनुष्यता सुरक्षित हो सकती है। इनकी कविताओं में प्रकृति के उपादानों के माध्यम से मानव जीवन के अनुभवों को कुशलता से व्यक्त किया गया है। इसमें अभिव्यक्ति की सहजता और शब्दों की तरलता के साथ-साथ दृश्यात्मक बिम्बों की विशिष्टता देखकर आँखें जुड़ा जाती हैं। 'चोका' की एक कविता है-
'सुहाने पल' - "मुट्ठी में बंद / कुछ सुहाने पल / ज़रा लजाते / शरमा के बताते / पिया की बातें / हसीन मुलाक़ातें / प्यारे-से दिन / जगमग-सी रातें / सकुचाई-सी / झुकी-झुकी नजरें / बिन बोले ही / कह गई कहानी / गुदगुदाती / मीठी-मीठी खुशबू / फूलों के लच्छे / जहाँ-तहाँ खिलते / रात चाँदनी / आँगन में पसरी / लिपटकर / चाँद से फिर बोली / ओ मेरे मीत / झीलों से भी गहरे / जुड़ते गए / ये तेरे-मेरे नाते / भले हों दूर / न होंगे कभी दूर / मुट्ठी ज्यों खोली / बीते पल मुस्काए / न बिसराए / याद हमेशा आए / मन को हुलसाए।"
रूप, रस, गंध, शब्द-स्पर्श आदि ऐन्द्रिय बिम्बों से बुना गया इनकी अन्य कविताओं का सृजनात्मक कर्म जीवन के सन्दर्भों का समुच्चय है। कवयित्री का यह प्रयास घर को घर की तरह रखने का संकल्प है। घर गहरी आत्मीयता, परस्पर सम्बद्धता, समर्पण, विश्वास और व्यवस्था का एक रूप है। दीवारों के दायरे को भरे-पूरे संसार में तब्दील करना इनका लक्ष्य है। इनका यह सोच इनकी लोक-संपृक्ति का प्रमाण है।
कवयित्री को हार्दिक बधाई एवं सफलता की शुभकामनाएँ।
कवयित्री का संपर्क सूत्र- 9810743437
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