Thursday, March 8, 2012

35. आधी दुनिया अधूरे ख़्वाब


चित्र - मेरे द्वारा
शायद 21वीं सदी का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि विकास के तमाम आयामों को प्राप्त करने और सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को निरन्तर मज़बूत बनाए रखने की सफल कोशिशों के बावजूद स्त्री-विमर्श ज़िन्दा है। ये न सिर्फ़ किताबों, कहानियों, कविताओं तक सीमित है, बल्कि हर पढ़े-लिखे और अनपढ़ नागरिकों के मन में पुरज़ोर ढंग से चल रहा है। आज जब हम महिलाओं के पिछड़ेपन की बात करते हैं, तो इसका सबसे बड़ा कारण मातृसत्तात्मक समाज का ख़त्म होना और पितृसत्तात्मक समाज का उदय होना दिखाई पड़ता है। जैसे-जैसे समाज पुरुष-प्रधान बनता गया स्त्री हमेशा के लिए पुरुष-वर्ग की 'सर्वहारा' बनती गई। एक-एककर स्त्री के सारे अधिकार पुरुष को मिलते गए और स्त्री ग़ुलाम बनती गई। सत्ता के हस्तान्तरण ने स्त्री की अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। धीरे-धीरे स्त्री सम्पत्ति बनती गई, जिसका स्वामी उसका निकट सम्बन्धी होने लगा। पुरुष की सुविधा, विलासिता और स्वेच्छाचारिता के लिए स्त्री उपभोग की वस्तु बन गई। 
 
पूँजीवाद और साम्राज्यवाद तेजी से विकसित हो रहे थे, तब औद्योगीकरण का प्रभाव बढ़ने लगा। महिलाओं का आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से शोषण बढ़ता जा रहा था। पूँजीवाद के कारण आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा और फिर घर सँभालने के साथ मज़दूरी करने का दोहरा बोझ स्त्री पर पड़ा। स्त्रियाँ रोज़गार के लिए घर से बाहर निकलने लगीं, कारख़ानों और लघु उद्योगों में काम करने लगीं। एक तरफ़ घर की ज़िम्मेदारियाँ, दूसरी तरफ़ मालिकों-महाजनों का क़हर। सामान्य अधिकारों से वंचित ये स्त्रियाँ टूट रही थीं और ख़ुद को स्थापित करने के लिए एकजुट हो रही थीं। उन्हें कारख़ानों में समान काम के लिए पुरुष से कम वेतन मिलता था, काम के घंटे अधिक थे, प्रसव-काल में अलग से कोई सुविधा नहीं दी जाती थी। स्त्रियों के सवाल भी एक और दास्ताँ भी एक। धीरे-धीरे महिलाएँ अपनी अस्मिता और अपने अधिकार के लिए सचेत और संगठित होने लगीं। चिनगारी सुलगने लगी। महिलाओं द्वारा अपने अधिकार के लिए उठाई गई आवाज़ को कुचल दिया जा रहा था। स्थिति असह्य और विस्फोटक होती गई और महिलाओं का संघर्ष क्रान्ति का रूप लेने लगा। 
 
चित्र - मेरे द्वारा
महिलाओं के शोषण पर 19वीं शताब्दी के अंत से सवाल उठने शुरू हुए और 20वीं शताब्दी के शुरुआत में एक आन्दोलन का रूप ले लिया। समाजवादी और कम्युनिस्ट आन्दोलन ने सबसे पहले महिलाओं के मुद्दे को अपने कार्यक्रम में व्यापक रूप से शामिल किया। जर्मनी में वर्ष 1890 में समाजवादी महिला आन्दोलन की शुरुआत हुई, जिसमें काम के घंटों में कमी, पुरुषों के बराबर मज़दूरी, बाल मज़दूरी का उन्मूलन, महिलाओं को मत देने का अधिकार आदि मुद्दों को शामिल किया गया। वर्ष 1908 में न्यूयार्क के कपड़ा-मिल मज़दूर महिलाओं ने अपने काम के घंटे में कमी, बेहतर वेतन और वोट के अधिकार के लिए विशाल प्रदर्शन किया। 28 फरवरी 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमेरिका द्वारा पहली बार 'नेशनल वुमेन डे' मनाया गया, तब तक दुनिया भर में स्त्री चेतना का संघर्ष निर्णायक दौर में पहुँच चुका था। तत्पश्चात वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में महिलाओं के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया गया और वर्ष 1911 में पहली बार 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' मनाया गया। इस दिन ऑस्ट्रिया, जर्मनी, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड में लाखों की तादाद में महिलाओं ने रैली निकाली और प्रदर्शन किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शान्ति स्थापित करने के लिए महिलाओं ने इस दिन महिला दिवस मनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1977 में सरकारी तौर पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मान्यता प्रदान कर प्रस्ताव पारित किया कि विश्व के समस्त देश इस दिन को महिलाओं के अधिकार के लिए समर्पित करें और महिला दिवस मनाएँ। 
बाएँ से - मैं, ग्रामीण स्त्री, सहयोगी शिक्षिका
महिलाओं के अधिकारों के लिए किया जाने वाला संघर्ष पूर्णतः सफल नहीं हो पाया। अपितु बहुत सारे अधिकार प्रदान किए गए और स्थिति में काफ़ी बड़ा परिवर्तन आया। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से स्त्री को पुरुष के बराबर अधिकार मिले। वेतन, वोट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में स्त्री को बराबर की भागीदारी मिली। क़ानून द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार के लिए क़ानून में कई सुधार और संशोधन किए गए। हर क्षेत्र में महिलाओं के लिए समान अवसर निश्चित किए गए। ग़ौरतलब है कि महिलाओं के संघर्ष-आन्दोलन को पश्चिमी देशों में जितनी मान्यता और सफलता मिली अन्य जगहों में नहीं।
ग्रामीणों द्वारा उत्सव नृत्य
महिलाओं के संघर्ष की गाथा जितनी पुरानी है, उतनी ही बेमानी लगती है क़ानून से प्राप्त अधिकारों के साथ महिला की ज़िन्दगी। काग़ज़ पर सारे अधिकार मिल गए; लेकिन वास्तविक रूप में स्थिति आज भी शोचनीय है। हमारे देश में आज भी स्त्रियाँ दोयम दर्जे की ज़िन्दगी जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में आज भी स्त्रियाँ पुरुष के मुक़ाबले बहुत पीछे हैं। बाल विवाह, अशिक्षा, दोहरी मानसिकता, दहेज, बलात्कार आदि समस्या दिन-ब-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, अंधविश्वास के कारण प्रताड़ना और हत्या, ऑनर किलिंग आदि घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। बड़े-बड़े महानगरों के अपवाद को छोड़ दें, तो सम्पूर्ण देश की महिलाओं की हालत आज भी एक जैसी त्रासद है।
मेरे साथ ग्रामीण बच्चे और सहयोगी
आज महिला आन्दोलन को महिला आरक्षण तक सीमित किया जा रहा है और शासक की इस चाल को समझते हुए भी महिला दिवस मनाकर संतोष कर लिया जाता है। हर साल की तरह हर साल महिला दिवस मनाया जाता है। कुछ औपचारिक कार्यक्रम, भाषण, व्याख्यान, स्त्री सशक्तीकरण के कुछ उदाहरण पर संतुष्टि, आरक्षण का मुद्दा और फिर 'महिला दिवस' एक साल तक के लिए समाप्त।
ग्रामीणों के साथ मेरी सहयोगी
स्त्री सशक्तीकरण और स्त्रियों के अधिकार की लड़ाई महज़ महिला दिवस मना लेने से कतई सम्भव नहीं है। जब तक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होगा, महिलाओं की स्थिति यथावत् रहेगी। ये तय है कि महिलाओं को सम्पूर्ण आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक अधिकार समाजवाद से ही सम्भव है। इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं, जिससे महिलाओं की स्थिति पर गम्भीरता से विचार किया जाएसिर्फ़ कानून बनाकर सरकार द्वारा कर्तव्यों की इतिश्री न समझी जाए। जितने भी स्त्री उत्थान के लिए कानून बने, सभी विफल हुए या फिर उस कानून की आड़ में सदैव मनमानी की गई, चाहे स्त्री द्वारा या पुरुष द्वारा। कानून असफल हो गए, नियम  ध्वस्त हो गए। आज स्त्री जिस कुण्ठा में जी रही है, उससे निःसन्देह समाज में अस्थिरता आएगी। स्त्री को प्रारब्ध से मिले असंगति का निवारण न सरकार कर पाती है न समाज न तथाकथित ईश्वर।
होली मिलन - ग्रामीणों के साथ मैं
-जेन्नी शबनम (8.3.2012)
__________________

Wednesday, February 15, 2012

34. स्मृतियों में शान्तिनिकेतन (भाग- 3)

भाग-1: https://saajha-sansaar.blogspot.com/2011/08/blog-post.html
 
भाग-2: https://saajha-sansaar.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html
 
गौर किशोर घोष

प्रकृति का प्राकृत सुन्दर रूप, हर तरफ़ हरियाली, जीवन्तता, भारतीय कला-संस्कृति की अनुगूँज, सहज और सरल जीवन-शैली, विचार में मौलिकता, आपसी प्रेम-सौहार्द आदि कितनी ही विशेषताओं का सम्मिलित स्वरूप 'शान्तिनिकेतन' है शिक्षित और विचारशील लोग जिनके जीवन में वैसे ही उतार चढ़ाव हैं, जैसे हर मनुष्य के जीवन में होते हैं; लेकिन उन सबको लेकर जीवन को पूरी शिद्दत से जीना ताकि चैन के पल जीवनभर स्थिर रहे, शायद यहाँ की मिट्टी या गुरुदेव के सोच की देन है। गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की कर्मभूमि 'शान्तिनिकेतन' शब्द ही हृदय में शान्ति और सरल जीवन का अनुभव करा देता है। कला के किसी भी क्षेत्र का मर्मज्ञ हो या जिज्ञासु, जीवन में एक बार गुरुदेव की भूमि पर जाकर उस स्थान को अनुभव करना चाहता है, जिसे कला, शान्ति और संस्कृति का पर्याय कह सकते हैं।  
 
शान्तिनिकेतन से मेरा नाता सुकून पाने जैसा रहा; क्योंकि वहाँ मेरा जाना कतिपय किसी उद्देश्य के लिए नहीं था और न वहाँ जाने के लिए मैंने कोई प्रयास ही किए। जीवन में चलते हुए कई बार अचानक ऐसे मोड़ आ जाते हैं कि सब कुछ उलट-पलट हो जाता है। ऐसा भी होता है कि अपार कठिनाइयों को पार कर एक नई दुनिया और नए लोक में पहुँच जाते हैं; जहाँ के लिए मन ने सोचा भी न होता है; शायद ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ।यों कुछ कठिनाइयाँ बचपन में आ गई थीं, जब पिता का देहान्त हुआ था। फिर भी जीवन में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा; क्योंकि उस समय भविष्य की समझ नहीं थी। उसके बाद का सबसे कठिन और दुःखद समय था, जब वर्ष 1989 में भागलपुर दंगा हुआ और हमारे घर में पनाह लिए लोगों में से 22 का क़त्ल कर दिया गया। उसके बाद से उस घर में रहना बहुत कठिन भरा समय था। कई महीनों तक किसी रिश्तेदार के घर में हम लोगों ने समय काटा; क्योंकि उस घर में जाने से भी हृदय काँपता था।
 
मेरे जीवन में शान्तिनिकेतन के साथ भागलपुर दंगा का अजीब सम्बन्ध जुड़ गया है। वर्ष 1990 का शायद फरवरी-मार्च का महीना था। दिल्ली की एक पत्रकार 'नलिनी सिंह' ने भागलपुर के दंगे पर वृत्तचित्र बनाया, जिसमें अन्य रिपोर्ट के साथ मेरे घर पर हुए दंगे की रिपोर्ट भी थी और उसका राष्ट्रीय प्रसारण हुआ। कोलकाता के एक दैनिक अख़बार 'आनन्द बाज़ार पत्रिका' से सम्बद्ध गौर किशोर घोष ने इस ख़बर को सुना। कुछ लोगों की एक टीम बनाकर वे भागलपुर आए, ताकि पीड़ितों के बीच सौहार्द और सद्भावना स्थापित करने में सहयोग कर सकें तथा उन ख़बरों तक पहुँच सकें, जहाँ अब तक मीडिया की नज़र नहीं गई थी। उसी दौरान वे मेरे घर आए। दंगे पर एक पूरी रिपोर्ट तस्वीर के साथ उन्होंने 17 जून 1990 के आनन्द बाज़ार पत्रिका में छापी। उस रिपोर्ट के बाद कई अख़बारों में ख़बर छपी, जिनमें 15 जुलाई 1990 को नव भारत टाइम्स तथा 29 जुलाई 1990 को सेंटिनल प्रमुख है। इस दौरान गौर दा के साथ मैं और मेरी माँ ने भागलपुर में सद्भावना-कैम्प में हिस्सा लिया। गौर दा ने मेरी मानसिक स्थिति को समझते हुए कहा कि एम.ए. की परीक्षा के बाद मैं उनके साथ चलूँ।
सबसे बाएँ- मेरी माँ प्रतिभा सिन्हा, बीच से दाएँ दूसरे- गौर दा
शान्तिनिकेतन की धरती पर मैं पहली बार गौर दा और अपनी माँ के साथ पहुँची दिन और महीना तो अब याद नहीं पर गर्मी का मौसम था। गौर दा हमें रिक्शे से लेकर शान्तिनिकेतन के रतनपल्ली में 'रंजना' नामक मकान में आए, जहाँ हमारे ठहरने का प्रबन्ध किया गया था; वह मकान बानी सिन्हा का घर था बानी दी उनकी मित्र थीं और भागलपुर दौरे पर कई बार आई थीं। हम बानी दी और गौर दा के साथ उनके उन सभी मित्रों के घर गए, जो शान्तिनिकेतन में रहते थे। सभी लोगों ने बहुत उत्साह से हमारा स्वागत किया। गौर दा के साथ बानी दी, श्यामली दी (खस्तगीर) और मनीषा बनर्जी अक्सर भागलपुर आते रहते थे, तो उनसे पूर्व परिचय था। विश्वभारती विश्वविद्यालय की प्रो वाइस चांसलर और विनय भवन की प्राचार्या सुश्री आरती सेन, जो गौर दा की मित्र थीं, के घर अक्सर हमलोग जाते थे। आरती दी बहुत ही सरल और संवेदनशील महिला थीं। अब जब 20 साल बाद मैं दोबारा शान्तिनिकेतन गई, तो पता चला कि वे अवकाश प्राप्त कर चुकी हैं; उनके बारे में और कोई जानकारी नहीं मिली।
बाएँ- आरती दी की बहन, गौर दा, मेरी माँ
मेरी सभी परीक्षाओं के ख़त्म होने के बाद दोबारा मैं शान्तिनिकेतन आ गईगौर दा मुझे लेने स्टेशन आए थे। उस दौरान कई लोगों से मुलाक़ात हुई, कुछ बैठकों में मैंने भी हिस्सा लिया। यहाँ आकर नहीं लगता था कि मैं किसी अनजान अहिन्दी-भाषी प्रदेश में हूँ। सभी लोग मुझसे हिन्दी में बात करते थे, भले उन्हें बोलने में असुविधा हो। गौर दा ने कहा था कि मैं आकर यही रहूँ, तो मैं अपने कुछ सामान के साथ आ गई थी। रतनपल्ली के उस मकान 'रंजना' में बानी दी कई सालों से किराए पर रह रही थीं। दो कमरे का मकान जिसमें एक कमरे में दो अलग-अलग चौकी लगी थी, जिस पर मैं और बानी दी सोते थे। बानी दी बहुत अच्छा सूप बनाती थीं। अक्सर रात का हमारा खाना ब्रेड और सूप होता था। यों काम करने वाली एक स्त्री 'कालीदासी' थी जो खाना बनाती थी। बानी दी को कुत्ते पालने का बहुत शौक़ था, जो आज भी है। मकान के मुख्य दरवाज़े पर एक कमरा था; जहाँ एक देशी कुतिया अपने 6 -7 बच्चों के साथ रहती थी। 
 
बानी दी का नियम था- सुबह वक़्त पर तैयार होकर विश्वभारती विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में जाना। जिस दिन देर हो जाती तो कहतीं- ''उफ़ आज फिर से हमको देर हो गिया।'' मैं सोचती कि जब वे कोई नौकरी नही करतीं, फिर देर हो जाने से परेशान क्यों होती हैं। वे सिर्फ़ पढ़ने के लिए लाइब्रेरी जाती थीं। अपना सारा समय लाइब्रेरी में व्यतीत करती हैं। एस्ट्रो फिजिक्स उनका प्रिय विषय है। हर दिन शाम को बानी दी की मित्र मंडली एकत्र होती थी। उसमें अलग-अलग विषय और वर्ग के कॉलेज के छात्र होते थे। सभी मिलकर चाय या कॉफ़ी बनाते और ख़ुद बर्तन धोकर रख देते थे। कभी-कभी वे टेलिस्कोप से किसी ग्रह या तारे के बारे में बतातीं। पशु-पक्षियों के बारे में पढ़ना उन्हें बहुत पसन्द है।
बाएँ- मैं, लुत्फा दी, बानी दी, नाम याद नहीं, दीपान्निता, मनीषा
बानी दी को कोलकाता जाना था, तो कुछ दिन के लिए मैं मनीषा की अतिथि बनकर उसके साथ मृणालिनी छात्रावास में रही। मनीषा विश्वभारती विश्वविद्यालय में अँगरेज़ी विषय से एम.ए. कर रही थी। एक कमरे में चार छात्राएँ थीं और सभी ने अपनी चौकी को एक साथ जोड़ लिया था, इसलिए मेरे होने से उन्हें दिक्क़त नहीं हुई। कमरे से लगा हुआ शौचालय था। मेस का खाना पारम्परिक बंगाली तरीक़े का बेहद साधारण था, जिसके स्वाद में मीठापन होता है। मेस में बनी चुकन्दर और गाजर की तरकारी मुझे बहुत पसन्द थी; जबकि वहाँ की छात्राओं को पसन्द नहीं थी। कुछ लड़कियाँ जिन्हें एक पूरा कमरा रहने के लिए मिला था, अपने लिए खाना भी बनाया करती थीं। उस छात्रावास में मैं बहुत कम समय रही; लेकिन बहुत अच्छा लगा वहाँ रहना। छात्रावास जैसा कोई बन्धन नहीं लगा। शायद शान्तिनिकेतन की हवाओं में भी अपनापन है। मनीषा और उसकी कुछ मित्रों के साथ बोलपुर के एक सिनेमा हॉल में हमलोग एक बांग्ला सिनेमा देखने गए; क्योंकि अब तक मैं बांग्ला समझने और थोड़ा-थोड़ा बोलने लगी थी। 'आशिकी' सिनेमा के गीत का बंगाली रूपांतरण का कैसेट खरीद लाई और ख़ूब सुना करती थी।
श्यामली दी और मैं
एक दिन गौर दा विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति के घर मुझे ले गए। कुलपति श्री असिन दासगुप्ता ने मुझसे कहा कि तुम मुझसे हिन्दी में बात करो, तुम हमको हिन्दी सिखाओ हम तुमको बांग्ला सिखाएँगे। भागलपुर के दंगे की घटना की बात हुई। गौर दा और कुलपति ने विचार किया कि विश्वविद्यालय में किसी कोर्स में मेरा नामांकन करा दिया जाए। कुलपति ने कोई प्रावधान बनाया जिसके तहत मेरा नामांकन हो सके। जब पेपर में यह ख़बर छपी कि भागलपुर से आई एक लड़की के नामांकन के लिए कुलपति ने ख़ास नियम की घोषणा की है, तो बिहार के कुछ छात्र बानी दी के घर आए और इस ख़बर के बारे में बताया। वे पूछने लगे कि कौन है वह लड़की, क्योंकि बानी दी भागलपुर जाया करती थीं। जब बानी दी ने बताया कि वह मैं हूँ, तो सभी अचम्भित हुए कि इतने दिनों से मैं रह रही हूँ और किसी को यह जानकारी नहीं थी। 
 
कुलपति बहुत सरल इंसान थे और शायद गुरुदेव के सोच के वारिस। मुझे याद है एक दिन मैं लाइब्रेरी गई। अचानक देखा कि एक सज्जन आए और पुस्तकों की रैक पर पड़ी धूल झाड़ने लगे। वहाँ का चपरासी यह देख हड़बड़ा गया, दौड़कर आया और माफ़ी माँगने लगा। उस रैक को झाड़ने के बाद वे चुपचाप दूसरी तरफ़ चले गए और वह चपरासी जल्दी-जल्दी बाक़ी रैक को साफ़ करने लगा। वे सज्जन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति थे। मैं हतप्रभ होकर यह सब देखती रही। न डाँटा, न ग़ुस्सा किया और कर्त्तव्य का पाठ सिखा दिया। निश्चित ही उनकी सरलता और कार्यशैली गुरुदेव की शिक्षा का परिणाम थी। 
 
एक बार गौर दा के साथ मैं कोलकाता गई तो वे किसी से मिलने गए और मुझे भी साथ ले गए। वे बुज़ुर्ग थे और बहुत शांत और सरल। गौर दा ने हमारा परिचय कराया। बाद में गौर दा ने बताया कि वे विश्वभारती विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति हैं श्री अमलान दत्त। मुझे आश्चर्य हुआ; क्योंकि किसी भी विश्वविद्यालय का कुलपति इतना सहज और सरल नहीं देखा था मैंने, चाहे वो अमलान दा हों या फिर असिन दा। 
बाएँ से- गौर दा, रमा कुंडू, मेरी माँ, श्यामा कुंडू
 
विश्वभारती में बांग्ला और संगीत में मेरा नामांकन हुआ मुझे अलग एक कमरे की आवश्यकता हुई। बानी दी के मकान के बगल में लुत्फा दी का मकान है। उनके मकान के छत पर एक कमरा मैंने किराए पर लिया। इस बीच काफ़ी लोगों से मेरी पहचान हुई। विश्वविद्यालय में युवा महोत्सव का आयोजन होने वाला था। हर तरफ़ चहल-क़दमी बढ़ गई थी। उन्हीं दिनों मेरी पहचान उत्तर प्रदेश की एक लड़की सुनीता गुप्ता से हुई, जो छात्रावास में रह रही थी। हिन्दी भाषी होने के कारण उससे मित्रता बढ़ गई। वह रोज़ मेरे घर आती, मैं खिचड़ी बनाती और हमदोनों खाकर निकल जाते। मैंने ज़्यादा स्थान नहीं देखे थे, सुनीता मुझे सभी जगह की जानकारी दिया करती। बच्चों का विद्यालय पाठ भवन से गुज़रना बड़ा अच्छा लगता था। संगीत भवन और विद्या भवन भी घूम आई; क्योंकि वहाँ मुझे पढ़ना था।कभी कैंटीन चली जाती, कभी संगीत भवन, जहाँ कोई नाट्य या संगीत का कार्यक्रम होता रहता था।
बाएँ से- मैं, गौर दा, मनीषा, लुत्फा दी
 
शान्तिनिकेतन घूमने के लिए हर समय टूरिस्ट आते रहते हैं। मुझे याद है एक बार मैं और सुनीता कैम्पस में कहीं जा रही थी, तो पर्यटक को वहाँ का लोकल गाइड बांग्ला में बोला ''वह देखो शान्तिनिकतन की लड़की, कितना लम्बा बाल है'', सुनीता के बाल बहुत लम्बे थे घुटने से भी बड़े, और यह सुनकर हम दोनों हँस देते थे। 
 
लाइब्रेरी से साथ लगे मैदान में पौष मेला लगता है। भारतीय लोक कला और संस्कृति के विकास व विस्तार के लिए इस मेला का विशेष महत्त्व है। मेले में हस्तकला, चित्रकला, लोककला, मिट्टी के सामान, धातु के सामान, खिलौने, कलाकृति, विभिन्न प्रान्तों की कसीदाकारी के वस्त्र, शिल्प उद्योग के सामान आदि का प्रदर्शन और बिक्री होती है। एक बड़े से पंडाल में लोक गीत, लोक नृत्य, बाउल गान आदि का आयोजन होता है। विश्वविद्यालय के छात्र और कलाकार भी इसमें हिस्सा लेते हैं। गुरुदेव से सम्बन्धित प्रदर्शनी लगाई जाती है। हर उम्र और तबक़े के लोग तीन दिन तक मेले में डूबे रहते हैं। खाने का सामान बहुत सस्ती दर पर मिलता है। यों भी बंगाल में अन्य जगहों के मुक़ाबले महँगाई काफ़ी कम है। इस मेला को देखने दूर-दूर से लाखों लोग आते हैं। होटल हो या किसी का मकान, इस समय कहीं भी जगह नहीं मिलती है। पौष महीने की सातवीं तिथि से इस मेले का शुभारम्भ होता है। यों विधिवत तीन दिन का मेला होता है; लेकिन लगभग 15 दिन तक चलता है। छोटी-छोटी वस्तुएँ, सजावटी सामान, कपड़े, शॉल, मिट्टी-लकड़ी के आभूषण, वगैरह मेले से मैं ख़ूब ख़रीदती थी।
बाएँ से बानी दी, गौर दा की पत्नी
 
अभी नामांकन-परीक्षा हुई नहीं थी, अतः मैं ख़ाली थी। श्रीनिकेतन के स्कूल के संगीत शिक्षक श्री दुर्गाचरण मजुमदार, जिन्हें दुर्गा दा कहती थी, से बानी दी ने मेरे गाना सीखने का प्रबन्ध किया। दुर्गा दा एक छात्रावास में रहते थे। क़रीब एक महीना रोज़ शाम को मैं उनसे संगीत सीखती रही। यह अलग बात कि मेरे गले ने विद्रोह कर दिया और मैं संगीत सीख नहीं सकी।गाने की क्लास के बाद दुर्गा दा रोज़ मुझे रतनपल्ली छोड़ने आते। मैं अक्सर कालो की दूकान से मिष्टी दोई (मीठी दही) ख़रीदकर लाती और दही-चूड़ा खा लेती थी; क्योंकि रोज़ का खाना पकाना मुझे पसन्द नहीं है।ख़ास अवसर के लिए कुछ ख़ास पकाना मुझे पसन्द रहा है। यों भी मैं खाना को अहमियत नहीं देती, ज़रूरत भर खा लेना पर्याप्त है। मेरे लिए यह ज़्यादा आवश्यक था कि अपने समय को शान्तिनिकेतन के विभिन्न क्रिया-कलाप में लगाऊँ; चाहे वह गौर दा के साथ या श्यामली दी या बानी दी के साथ।
श्यामली दी
एक दिन एक मित्र आया। उसने बताया कि विश्वविद्यालय में रॉक म्यूजिक का ग्रुप आया है। मैं उसके साथ चली गई देखने और सुनने। जीवन में पहली बार ऐसा कार्यक्रम लाइव देख रही थी। कभी श्यामली दी के घर 'पलाश' जो दक्खिनपल्ली में है, कभी मंजु दी के घर, कभी बानी दी के घर जाती रहती थी। मुझे याद है वर्ष 1991 की पहली जनवरी को मैं शान्तिनिकेतन में थी।मेरा अनुमान था कि नए साल के उपलक्ष्य में यहाँ उत्सव होगा, जैसा कि बाक़ी जगह होता है। पर पूरे विश्वविद्यलय में कोई आयोजन नहीं, न ही शान्तिनिकेतन में कुछ भी ख़ास; क्योंकि यहाँ हिन्दी तिथि से सब कुछ होता है। पहली जनवरी को मैं और सुनीता खिचड़ी खाकर किसी के घर मिलने गए। यहाँ बसन्तोत्सव ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है। होली भी बहुत अच्छी तरह यहाँ मनाते हैं। भारतीय संस्कृति और परम्परा का सुन्दर रूप और जीवन यहाँ देखने को मिलता है। 
बाएँ से श्यामा कुंडू, रमा कुंडू, मैं, गौर दा
 
भागलपुर के हमारे कुछ परिचित शान्तिनिकेतन आए उनके साथ मैं शान्तिनिकेतन के सभी स्मृति-स्थलों पर घूमने गई। यों पहले भी कई बार गई थी, जब भी मन किया। उपासना गृह के बाहर बैठना अच्छा लगता है विश्वविद्यालय में कहीं भी जाएँ, कला के सुन्दर नमूने ज़रूर दिखते हैं कला भवन हो या संगीत भवन बहुत सुन्दर चित्रकारी और कलाकृति है। चारों तरफ़ हरियाली, कहीं भी बैठने से सुकून मिलता है। उत्तरायण में स्थित गुरुदेव का पाँचों घर उदयन, कोणार्क, श्यामली, पुनश्च और उदीची भी अपने-अपने तरह का अनूठा मकान है। जब महात्मा गांधी आए थे, तो वे श्यामली में ठहरे थे। उन पलों की स्मृति में बापू और गुरुदेव की तस्वीर श्यामली में लगी है। सभी जगह गुरुदेव की तस्वीर और उनके कला को प्रदर्शित किया गया है। गुरुदेव कुछ लिखते और अगर कुछ ग़लत हो जाए तो उसे इस तरह काटते थे कि एक अलग तरह की आकृति बन जाती थी, जो अपने आप में कला का एक उदाहरण है; गुरुदेव की यह एक अलग शैली भी बन गई। सच है कि कलाकार के मन में कब क्या आ जाता है और किसमें क्या कला दिख जाए, कहना मुश्किल है। उनकी कलाकृति का बेजोड़ नमूना आज भी गुरुदेव के सभी घरों में दिखता है।बिचित्र में, जिसे रबीन्द्र भवन भी कहते हैं, गुरुदेव द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। इन्हें देखकर अजीब-सा रोमाँच और हर्ष होता है। ऐसा लगता है जैसे गुरुदेव अभी-अभी कहीं से आएँगे और अपने किसी घर में बैठकर कोई कविता या गीत रचेंगे या कोई चित्र ही बनाने लग जाएँगे।
  
शान्तिनिकेतन में बानी दी और श्यामली दी के जितने भी मित्र हैं, सभी के घर मैं उनके साथ गई। श्यामली दी के मित्र चीन व जापान से भी हैं, जिनके घर वे मुझे अक्सर ले जाती थीं। पहली बार जापान की चाय बनाने और पीने की अनोखी शैली और परम्परा देखी। जाने कितने लोगों से मेरा परिचय हुआ, कुछ लोगों को तो मैं भी भूल गई हूँ। बातों-बातों में याद आ जाते हैं वे सभी। बानी दी के भाई इन्द्रजीत रॉय चौधरी, जिन्हें टॉम दा कहती हूँ, अक्सर बानी दी के घर आते थे। टॉम दा कोलकाता में रहते हैं। पुरानी कलात्मक वस्तुओं को संगृहित करने का उन्हें शौक़ है। बहुत अच्छे चित्रकार हैं और उनकी कलाओं की प्रदर्शनी लगती रहती है। टॉम दा ने कोलकाता से ताँत की साड़ी मुझे तोहफ़े में दी। किसी ज्योतिष ने मुझे ग्रह की दो अँगूठी पहनने को कहा था, तो टॉम दा ने ख़ुद ही दोनों अँगूठी बनाई। आज भी मेरे पास एक अँगूठी सुरक्षित है और दूसरी कहीं गुम हो गई। बानी दी की एक बहन कोयली दी पूर्वपल्ली में रहती हैं। उनके घर भी अक्सर जाती थी। बांग्ला फिल्म के मशहूर अभिनेता उत्पल दत्त उनके बहुत अच्छे मित्र थे। बानी दी अक्सर मज़ाक में कहतीं कि मेरा दोस्त तो दाढ़ी वाला बुड्ढा है और कोयली का दोस्त सिनेमा का हीरो। बानी दी का तात्पर्य गौर दा से था। गौर दा बड़ी-बड़ी दाढ़ी रखते थे। कोयली दी का पुत्र देवराज रॉय जिन्हें सोमी कहते हैं इन्डियन स्टेटिसटिकल इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली में कार्यरत हैं, जिनसे मैं दिल्ली आने के बाद भी मिली। 
 
शान्तिनिकेतन में किसी की शादी में गई थी, वहाँ पहली बार बंगाली विधि-विधान से शादी की रस्म देखी। उस शादी में अभिनेत्री मुनमुन सेन की नानी आई थीं। बाद में पता चला कि शान्तिनिकेतन में बहुत सारे लोग अवकाश का समय बिताने आते हैं और कई सारे लोगों ने अवकाश प्राप्ति के बाद के बचे हुए समय को शान्ति से व्यतीत करने के लिए यहाँ मकान लिया हुआ है। शान्तिनिकेतन में अधिकतर एक और दो मंज़िल के मकान हैं। सभी मकान में सुन्दर रंग-सज्जा और फुलवारी या फूलों के गमले ज़रूर दिखते हैं, जो आँखों को भी शान्ति प्रदान करते हैं।

मैं जब भी शान्तिनिकेतन से भागलपुर जाती तो शयमाली दी या गौर दा बोलपुर स्टेशन छोड़ने आते थे। श्यामली दी बांग्ला सीखने के लिए बांग्ला अक्षर ज्ञान की एक किताब दीं, जिसे पूरी ट्रेन में मैं पढ़ती और याद करती रही। धीरे-धीरे बोलना सीख गई, बांग्ला पढ़ना-लिखना भी सीख गई।टॉम दा की माँ श्रीमती रेणुका रॉय चौधरी की एक पुस्तक का हिन्दी रूपांतरण का काम मैंने और मनीषा ने मिलकर शुरू किया लेकिन मुझे शान्तिनिकेतन छोड़ना पड़ा और फिर ज़िन्दगी में इतनी अस्थिरता आई कि मुझसे बांग्ला भाषा भी दूर हुई और शान्तिनिकेतन भी दूर हो गया। 
 
शान्तिनिकेतन से जुड़ी मेरी यादें और अनुभव ऐसे हैं जिन्हें शब्दों में बाँध नहीं पाती हूँ। जिस बेफ़िक्री और मस्ती भरी ज़िन्दगी को मैंने वहाँ जिया है दोबारा वैसी ज़िन्दगी पाना असम्भव है। वहाँ की बातें, वहाँ की यादें, वहाँ के लोग, सब कुछ मेरी स्मृतियों में यथावत हैं। मेरी स्मृतियों का शान्तिनिकेतन आज भी मेरे लिए वैसा ही है, भले कुछ लोग छोड़कर चले गए, कुछ लोग सदा के लिए विदा हो गए बहुत कुछ बदल गया यहाँ इन दो दशकों में मेरी तरह। 
 
समाप्त!

-जेन्नी शबनम (14.2.2012)
___________________

Saturday, January 7, 2012

33. रहस्यमय शरत

श्री शरतचन्द्र चटोपाध्याय
कोई कहता वह आवारा था, कोई कहता वह चरित्रहीन था, कोई कहता अगर उसको जानना हो तो किसी पथभ्रष्ट मनचले को जान लो, कोई कहता कि वह वेश्यागमन करता था लेखक हुआ तो क्या हुआ महान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने वर्षों की मेहनत के बाद उसकी जीवनी को 'आवारा मसीहा' नामक पुस्तक के रूप में लिखने में सफलता प्राप्त की; क्योंकि उस रहस्यमय लेखक का चरित्र सदैव सन्देहास्पद रहा है उसको जानने वाले स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं बताते और कुछ लोग बताने से कतराते भी हैं इस सन्दर्भ में 'आवारा मसीहा' को पढ़कर समझा जा सकता है
 
सुरेन्द्र नाथ गंगोपाध्याय
मानिक सरकार चौक से हर बार गुज़रते हुए हठात् उस गली की ओर मेरी निगाहें मुड़ जाती हैं और हर बार मन होता है कि उस घर को जाकर देखूँ, जहाँ उस रहस्यमय साहित्यकार का बचपन गुज़रा है, जिसके बारे में आज भी तरह-तरह की भ्रांतियाँ फैली हुई हैं किसी के लिए वह महान साहित्यकार है, तो किसी के लिए स्वछन्द मनचला इंसान बहुत कुछ पढ़ते, सुनते, जानते हुए वह मेरा प्रिय साहित्यकार है और उसकी कई रचनाएँ पढ़ चुकी हूँ उसकी रचनाओं पर दूरदर्शन पर धारावाहिक और कई फ़िल्मों का निर्माण हुआ है और सभी ने बहुत लोकप्रियता अर्जित की है
 

विश्वविख्यात और प्रसिद्ध साहित्यकार शरतचन्द्र चटोपाध्याय का ननिहाल भागलपुर के मानिक सरकार चौक स्थित काली बाड़ी के पास है वहाँ उन्होंने जीवन के वे पल बिताए जो उनके जीवन की आधारशिला है मानिक सरकार चौक से एक रास्ता गंगा नदी के घाट तक जाता है इस रास्ते में घाट से थोड़ा पहले काली बाड़ी है, जहाँ शरतचन्द्र के मामा श्री सुरेन्द्रनाथ गांगुली ने जगधात्री पूजा शुरू की थी और आज भी उनके वंशज प्रतिवर्ष धूमधाम से पूजा करते हैं उसके समीप ही वह मकान है, जहाँ शरतचन्द्र का बचपन बीता है उस घर को देखने की ललक को मैं रोक न सकी और एक शाम चल पड़ी उस व्यक्तित्व के उन पलों को महसूस करने जहाँ उन्होंने कई साल बिताए और शिक्षा ग्रहण की थी  
 
छोटे से दरवाज़े से घुसते ही एक छोटी-सी बैठक, बैठक के एक कोने में चार तस्वीर दो छोटी और एक बड़ी तस्वीर शरतचन्द्र की, एक सुरेन्द्रनाथ गंगोपाध्याय (गांगुली) की बैठक से लगा मकान का बरामदा, आँगन और रहने वाला कमरा है बैठक में हमारा स्वागत किया शरतचन्द्र के मामा सुरेन्द्रनाथ गांगुली के पौत्र (पोता) श्री उज्ज्वल गांगुली ने, जो एक निजी विद्यालय में शिक्षक हैं क़रीब 5-6 वर्षीय उनका एकमात्र पुत्र जो बहुत चंचल है, उनके साथ था, जिसे बहुत मज़ा आ रहा था अपने घर में किसी मेहमान को देखकर डी.पी.एस. भागलपुर के वरीय प्रधानाध्यापक श्री सत्यजीत सिंह की उज्ज्वल जी से बहुत अच्छी और गहरी मित्रता है सत्यजीत जी ने हमारा परिचय उज्ज्वल जी से कराया और फिर चल पड़ा शरतचन्द्र से जुड़ी बातों का सिलसिला
 
उज्जवल जी का पुत्र और मैं
उज्ज्वल जी बताते हैं कि शरतचन्द्र के बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है; क्योंकि उस ज़माने में कोई पुत्र अपने पिता से बहुत ज़्यादा बातें नहीं किया करता था अतः उन्होंने अपने पिता से कभी कुछ पूछा नहीं, पिता ने जो भी बताया और घर के अन्य लोगों से जो सुना, बस उतनी ही जानकारी हैउज्ज्वल जी की माता जी, जो क़रीब 100 वर्ष की हैं बात करने में असमर्थ हैं, अन्यथा उनसे कुछ ख़ास जानकारी हमें मिल सकती थी   
 
उज्जवल जी बताते हैं कि बहुत लोग आते हैं शरतचंद्र के बारे में बात करने और जानकारी लेने के लिए अभी हाल में कोलकाता के एक अख़बार ने शरतचन्द्र के बारे में कुछ लिखा जो ग़लत था, उन्होंने इस बारे में अपनी आपत्ति लिख भेजी है अभी हाल में एक निजी चैनल ने शरतचन्द्र से सम्बन्धित किसी ख़ास जानकारी के सत्यापन और प्रामाणिकता के लिए उज्ज्वल जी पर दबाव दिया था इन सब से आहत उज्ज्वल जी कहते हैं ''मेरे पास भी प्रमाण नहीं, तो मैं कैसे किसी उस बात का सत्यापन करूँ जो मैं जानता नहीं, बस घर में सुना है मसलन शरतचन्द्र ने जिसे अपनी पत्नी बताया क्या वे सच में पत्नी थीं, क्या देवदास शरतचन्द्र की जीवनी है आदि।'' लोगों की मनःस्थिति से उज्ज्वल जी काफ़ी आहत हैं, और ख़ुश इस बात से कि शरतचन्द्र जैसे महान साहित्यकार और हस्ती के वंशज हैं उन्होंने विरासत में मिली हर धरोहर को बहुत सजगता से संजोया हुआ है, चाहे वह शरतचन्द्र की कोई निशानी हो, मकान हो या फिर काली बाड़ी में होने वाली पूजा

उज्जवल गांगुली व उनका पुत्र
शरतचन्द्र के ननिहाल का परिवार संयुक्त रूप से रहता था बहुत बड़े अहाते में स्थित मकान जिसमें शरतचन्द्र के नाना श्री केदारनाथ अपने भाइयों के साथ रहते थे उज्ज्वल जी के दादा श्री सुरेन्द्रनाथ गांगुली स्थानीय दुर्गाचरण स्कूल में प्राचार्य होने के साथ एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे और शरतचन्द्र के हमउम्र चचेरे मामा थे। वे शरतचन्द्र के बाल सखा और सबसे प्रिय मित्र भी थे, जिनसे शरतचन्द्र अपनी निजी-गोपनीय बातें साझा करते थे शरतचन्द्र के पिता की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी, इसलिए शरतचन्द्र को पढ़ने के लिए ननिहाल भेज दिया गया कहा जाता है कि विपन्नता के बावजूद शरतचन्द्र शुरू से ही स्वछन्द जीवन जीते थे, अतः ननिहाल के कड़े अनुशासन में उनके सुधार की गुंजाइश थी भागलपुर के दुर्गाचरण स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की और टी.एन.बी. कॉलेजियट स्कूल से एंट्रेंस परीक्षा पास की इसके आगे की पढ़ाई के बारे में उज्जवल जी को स्पष्ट कोई जानकारी नहीं है पता चला कि शरतचन्द्र के पिता श्री मोतीलाल चटोपाध्याय और शरतचन्द्र की माता भुवन मोहिनी कुछ समय भागलपुर के खंजरपुर मोहल्ला में किराए पर रहे थे और फिर वापस बंगाल चले गए
 
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
शरतचन्द्र के भागलपुर में रहने की निश्चित अवधि तथा यहाँ से जाने की निश्चित तिथि की जानकारी उज्ज्वल जी को नहीं है आगे की शिक्षा और शरतचन्द्र के परिवार के अन्य लोगों के बारें में भी ख़ास जानकारी उन्हें नहीं है परिवार के कई लोग यहाँ से अपना हिस्सा बेचकर चले गए पूर्वजों से प्राप्त जानकारी के अनुसार शरतचन्द्र भागलपुर से सटे जगदीशपुर प्रखंड के रामचन्द्रपुर कभी-कभी जाते थे और वहाँ भी उनका लेखन कार्य जारी रहता था उज्ज्वल जी कहते हैं ''शरतचन्द्र तो बाद में बड़ा आदमी बना, पहले तो वह एक आम आदमी था जो अपनी मर्ज़ी से जीता था और लोग इस लिए उसको पसन्द नहीं करते थे चूँकि वह अवज्ञा करता था, अनुशासन में नहीं रहता था, इसलिए कोई उसको मान नहीं देता था शरतचन्द्र की बेफ़िक्री और मनमौजी घर के लोगों को पसन्द नहीं थी लोगों की नापसन्दगी के कारण शायद शरतचन्द्र ने अपनी पहली पुस्तक 'मन्दिर' को अपने मामा श्री सुरेन्द्रनाथ गांगुली के नाम से प्रकाशित कराया जिसे पुरस्कार मिला''
खण्डित हुक्का व पेन स्टैंड/ऐश ट्रे
कहते हैं कि शरतचन्द्र लिखते-लिखते अचानक उठकर नदी की ओर चल देते थे अँधेरी रात में अकेले डेंगी (छोटी नाव) लेकर नदी पार कर जाते थेकभी मछली मारने निकल जाते थे। खंजरपुर स्थित एक मक़बरा पर अक्सर जाकर बैठे रहते थे। मानिक सरकार चौक के बाद मंसूरगंज मोहल्ला है; जहाँ तवायफ़ें रहती थीं वर्ष 1989 के भागलपुर दंगा में ये मोहल्ला पूरी तरह उजड़ गया, बचे हुए परिवारों को शहर से बाहर एक जगह विस्थापित किया गया है कहते हैं कि इसी मंसूरगंज की एक तवायफ़ 'कालीदासी' के कोठे पर शरतचन्द्र का आना जाना था, जहाँ वे बैठकर लिखा भी करते थेजैसे-जैसे उनका लिखना बढ़ता गया, आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी और उन्हें शराब पीने की लत लग गई डॉ. बिधान चन्द्र रॉय ने शरतचन्द्र का इलाज किया श्री सुरेन्द्रनाथ गांगुली ने शरतचन्द्र की मृत्यु के बाद शरतचन्द्र की जीवनी पर आधारित पुस्तक 'शरत परिचय' लिखा निःसन्देह यह शरतचन्द्र की जीवनी की सबसे प्रामाणिक पुस्तक मानी जा सकती है; क्योंकि सुरेन्द्रनाथ जी शरतचन्द्र के सबसे प्रिय सखा और मामा थे
 
शरतचन्द्र के समय की कुर्सी
शरतचन्द्र की कहानी में स्त्री चरित्र बहुत मज़बूत, सशक्त और प्रभावशाली होता है। परम्परागत बन्धनों से छटपटाती स्त्री का अंतर्द्वंद, मानसिक पीड़ा और उनकी जीवन शैली का बहुत सटीक चित्रण दिखता है स्त्री मन की बारीकियों को इतनी सहजता से समझना और लिखना सच में अद्भुत है उनकी कहानियाँ और उसके पात्र उनके इर्द-गिर्द के ही थे, इसलिए हर पाठक को सभी कहानी जीवन्त लगती है, चाहे देवदास हो या श्रीकान्त वे अपने अनुभव के आधार पर कथा गढ़ते थे शरतचन्द्र का जीवन सन्देहों, अफ़वाहों और रहस्यों से भरा हुआ है उन्होंने विधिवत विवाह नहीं किया, पर हिरण्यमयी देवी जो उनके साथ रहती थीं, उनको अपनी पत्नी का दर्जा दिया; लेकिन परिवार ने इस रिश्ते को मान्यता नहीं दी माना जाता है कि देवदास की पारो का चरित्र काल्पनिक नहीं है; बल्कि शरतचन्द्र की वह वास्तविक पारो मुज़फ्फरपुर में ब्याही गई थी
 
शरतचन्द्र द्वारा निर्मित काग़ज़-कलम होल्डर
शरतचन्द्र की कुछ निशानी जो उज्ज्वल जी ने सँभालकर रखी है, मुझे दिखाने के लिए ले आए कुल चार सामानों में एक है लकड़ी की कुर्सी उज्ज्वल जी के अनुसार ''ये कहना मुश्किल है कि शरतचन्द्र ने इस कुर्सी का इस्तेमाल किया या नहीं, लेकिन ये उस समय से घर में है, तो वे ज़रूर इस पर बैठते होंगे'' लकड़ी का काग़ज़ और कलमदान (पेपर-पेन-होल्डर) जो शरतचन्द्र ने ख़ुद अपने हाथों से बनाया था उसे हाथ में लेकर मैं देखती रही, न जाने कितनी कहानियों को रचने का साधन बना कलम और काग़ज़ इसमें रखा गया होगा धातु का बना हुक्का का आधा टूटा हिस्सा और कलम रखने का एक छोटा स्टैंड भी था जो ऐश-ट्रे भी हो सकता है; वक़्त के साथ अपनी-अपनी कहानी कह रहा था उज्ज्वल जी ने बहुत अच्छी तरह इन चारों निशानी को सँभालकर रखा है
शरतचन्द्र की चार निशानी
उस मकान से निकलकर मैं गंगा नदी के किनारे गई मकान से नदी मात्र 100 मीटर की दूरी पर है इसी घाट से वह आवारा मसीहा अपनी धुन में निकल पड़ता होगा डेंगी लेकर, न जाने मन में क्या-क्या सोचता हुआ, किस-किस की पीड़ा को जीता हुआ, अपनी दुनिया में लीन, अपनी कहानी बुनता और जीता हुआ उस स्थान पर ख़ुद को पाना मेरे लिए बहुत ही रोमांचकारी अनुभव है, जहाँ कभी शरतचन्द्र ने न जाने कितना समय बिताया होगा हर उस गली से मैं भी गुज़री हूँ जहाँ से शरतचन्द्र गुज़रे होंगे दुर्गाचरण स्कूल के सामने से रोज़ आती-जाती रही हूँ नया बाज़ार का कॉलेजियट स्कूल जहाँ मैं अक्सर जाती थी; क्योंकि मेरी माँ पहले वहाँ शिक्षिका थीं गंगा नदी का दूसरा घाट जहाँ अक्सर हमलोग घूमने और खेलने जाते थे मंसूरगंज मोहल्ला जो मेरे बचपन के स्कूल के रास्ते में पड़ता है अब भी याद है बचपन में किसी ने डरा दिया कि वे लोग बच्चे पकड़ लेती हैं, तो मैं और मेरा भाई एक दूसरे का हाथ पकड़कर मानिक सरकार चौक से सीधे जोगसर चौक तक दौड़ जाते थे अजीब-सी सिहरन और रोमांच हुआ अँधेरी रात में नदी के इतने समीप जाकर, जहाँ न जाने कितनी बार शरतचन्द्र अकेले गए होंगे, अपनी धुन में गंगा से मिलने और बतियाने
सुरेन्द्रनाथ व शरतचन्द्र की तस्वीर के साथ मैं
सभी लोगों ने अपनी-अपनी सोच से शरतचन्द्र देखा और जाना है उनके बारे में अनेको धारणाएँ और अफ़वाहें हैं उनका जीवन जीने का तरीक़ा, विचार, व्यक्तित्व, सब कुछ इतना अजीब था कि शुरू में उन्हें कहीं भी सम्मान नहीं मिला; बल्कि तिरस्कार ही मिला बाद में उनकी रचनाओं की प्रसिद्धि और लोकप्रियता ने उनको सम्मान दिलाया देवदास, परिणीता, बिराज बहु, श्रीकान्त, चरित्रहीन, बड़ी दीदी, मझली दीदी, नया बिधान, पथ के दावेदार आदि उनकी ख्यातिप्राप्त कृतियाँ हैं 'पथ के दावेदार' पुस्तक को ब्रिटिश सरकार ने ज़ब्त कर लिया; क्योंकि बंगाल की क्रान्ति पर लिखा गया था बेहद संवेदनशील, शरारती और जागरूक शरतचन्द्र का जीवन उलझनों और घटनाओं का ऐसा जाल था, जिसमें वे आजीवन तड़पते रहे, पर कभी किसी से अपनी वेदना न कही उनकी रचनाओं से उनके तेवर, तड़प और संवेदनाओं को जाना और महसूस किया जा सकता है कथा-कहानी लिखने और सुनाने में माहिर शरतचन्द्र की शख़्सियत का रहस्यमय सच आज भी हम सभी के लिए अबूझ रहस्य है

-जेन्नी शबनम (7.1.2012)
__________________