Tuesday, March 8, 2022
94. आधी दुनिया की पूरी बातें
Monday, February 7, 2022
93. छुप-छुप खड़े हो की मेरी लता
Sunday, January 30, 2022
92. मम्मी को याद करते हुए
वक्ता के रूप में |
मम्मी ने एक दिन मुझसे कहा- "मेरे जीवन को तुमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता-समझता है, मेरे जीवन के बारे में भी कुछ लिखो।" मैंने हँसकर कहा- "तुम्हारी ज़िन्दगी पर तो फ़िल्म बन सकती है मम्मी। काश! किसी को हम जानते, तो कहते कि कहानी लिखे और सिनेमा बनाए। कम-से-कम उस एक दृश्य में तो तुमको ज़रूर दिखाए, जिस दिन तुम्हारा रिटायरमेंट हुआ, तो तुम्हारे सहकर्मी और छात्राएँ रो रही थीं। तुम्हारे अधेड़ावस्था का चरित्र हम और युवावस्था का चरित्र ख़ुशी (मेरी बेटी) निभाए।" मम्मी मेरी बातों पर ख़ूब हँसने लगी और बोली "वाह! यह तो बहुत अच्छा आइडिया है; लेकिन मेरे जैसे पर कोई क्यों सिनेमा बनाएगा? जो सम्भव है वह सोचो न! तुम इतना अच्छा लिखती हो, मेरे बारे में तुम जो भी सोचती हो, वह सब लिखो।" मैंने कहा- "मम्मी! तुम मानसिक पीड़ा में जीती रही हो। हम लिखेंगे तो सारा सच ही लिखेंगे, तुम पढ़ोगी और बीते कष्टप्रद दिनों को याद करोगी और रोज़ रोती रहोगी।" मम्मी के जीवन के हर पहलू, उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख, अच्छे-बुरे वक़्त से मैं पूर्णतः वाक़िफ़ रही हूँ।
प्राचार्य पद से रिटायर होने के दिन |
तीन-चार वर्ष की उम्र से ही मुझमें उम्र से ज़्यादा समझ थी। मैं बहुत गम्भीर और संकोची स्वभाव की थी। उस उम्र से हर कार्य को मैं अपने तरीक़े से सोचकर, बहुत स्थिर और तल्लीनता से करती थी, भले ही समय ज़्यादा लग जाए। हड़बड़ी में किसी तरह कार्य को पूरा करना मेरे स्वभाव में नहीं है। जो भी कार्य करूँ, मेरे मुताबिक़ परफ़ेक्ट होना चाहिए, अन्यथा मैं करती ही नहीं हूँ। इस आदत के कारण मैंने पाया कम, गँवाया ज़्यादा है।
पापा की मृत्यु के बाद जैसे अचानक मैं वयस्क हो गई और हर परिस्थिति को समझकर विश्लेषण करने लगी। यही वज़ह है कि सही समय पर मम्मी पर मैं कुछ भी लिख न सकी। जब भी थोड़ा लिखती, भावुक हो जाती और डिलीट कर देती थी। मैं नहीं चाहती थी कि मम्मी अपने दुःखद पलों को बार-बार याद करें। मम्मी को मानसिक और भावनात्मक पीड़ा इतनी ज़्यादा मिली कि मैं लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। मेरी कुछ कविताएँ जो मम्मी को अपने जीवन से जुड़ी हुई लगतीं, बार-बार पढ़कर ख़ूब रोती थीं, विशेषकर वृद्धावस्था और अकेलेपन की रचनाएँ। मम्मी हमेशा कहतीं- "तुम तब से लिखती हो, हमको पता कैसे नहीं चला? मेरी जैसी स्थिति और परिस्थिति में लोग क्या महसूस करते हैं, तुम कैसे इतना सोचकर लिख लेती हो?" मैं मुस्कुराकर कहती- "पता नहीं मम्मी, कैसे लिख लेते हैं हम। पर सोचो, माँ को नहीं पता कि बेटी लिखती है; लेकिन बेटी को माँ का सब कुछ पता है।" मैं जब भी भागलपुर जाती और मम्मी से मिलती थी, तो हँसना, बोलना, गाना, खाना जारी रहता था। कोई भी दुःखद बात हो जाती, तो मम्मी अपने असहाय होने पर बहुत रोती थीं। जीवन का बीता हर एक पल मम्मी को हमेशा याद रहा।
सुलह केन्द्र में सलाहकार |
प्रतिभा सिन्हा, महज़ मेरी माँ का नाम नहीं; बल्कि ऐसी शख़्सियत का नाम है, जिनकी पहचान आदर्श शिक्षक, कर्मठ प्राचार्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़े संगठनों में एक कर्मठ नेत्री के रूप में है। जब से मैंने होश सँभाला उन्हें घर, बच्चे, परिवार, विद्यालय और सामजिक कार्यों में व्यस्त देखा है। मम्मी के जीवन के उतार-चढ़ाव में सुख-दुःख, संघर्ष, सम्मान, अपमान, हिम्मत सब शामिल रहा है। नौकरी के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों से सम्बन्धित संगठनों से सम्बद्धता, हर सम्भव लोगों की सहायता करना, चाहे वह आर्थिक हो या पारिवारिक, भागलपुर के सुलह केन्द्र में सलाहकार, इत्यादि न जाने कितने कार्य हैं जो मम्मी लगातार करती रहीं।
वर्ष 2010 से उनके पैरों में बहुत तक़लीफ़ रहने लगी और धीरे-धीरे चलने में असमर्थ होती गईं। इसके बावजूद 2017 तक उनके किसी भी कार्य में अवरोध नहीं आया, वे सक्रिय रहीं। वर्ष 2018 में मम्मी दिल्ली आईंं। यहाँ दो बार हार्ट अटैक आया। इसके बाद वे धीरे-धीरे कमज़ोर होती चली गईं। देहान्त के दो साल पहले से चलने में असमर्थ और अपनी हर दिनचर्या के लिए दूसरों पर निर्भर हो गई थीं। हर दूसरे-तीसरे महीने उनका शुगर और सोडियम कम हो जाता था। अस्पताल में भर्ती होना फिर 10-12 दिन में ठीक होकर घर आना, मानो यह उनके जीवन का हिस्सा बन गया। एक बार लगातार दो महीना तक अस्पताल में रहना पड़ा, जब उनके कमर में बहुत दर्द हुआ और चलने में असमर्थ हो गईं। ऐसे में मम्मी जीवन से निराश हो चुकी थीं। मैं, मेरा भाई, मम्मी के मित्र, सहकर्मी, छात्र-छात्राएँ, रिश्तेदारों आदि से मिलने पर मम्मी जैसे खिल जाती और अपनी सारी पीड़ा भूल जाती थीं।
भारत भ्रमण के दौरान |
मम्मी अपने जीवन-संघर्ष से हारने लगतीं या किसी घटना के कारण अवसाद में होतीं, तो मैं अक्सर कहती थी "मम्मी! तुम अपनी मालिक हो, कोई तुमसे न सवाल करेगा न किसी को जवाब देने के लिए बाध्य हो। कभी किसी से कुछ नहीं लिया, जीवन भर लोगों की सहायता ही करती रही हो। तुम्हारे बच्चे स्थापित हैं, सबकी फ़िक्र छोड़ो, सिर्फ़ अपनी फ़िक्र करो। तुम्हारा अपना पैसा है मेहनत से कमाया हुआ, भरपूर जियो, खूब घूमो, ख़ूब आराम से जीवन जियो, जो मन में आए करो।" परन्तु मम्मी ने कभी भी बेफ़िक्र होकर जीवन नहीं जिया। उस समय की मध्यमवर्गीय परिवेश की माँ, विशेषकर एकल और विधवा स्त्री अपने से ज़्यादा अपने बच्चों के लिए फ़िक्रमन्द रहती थीं। मेरी फ़िक्र ने मम्मी के स्वास्थ्य को और भी ज़्यादा प्रभावित किया। उच्च शिक्षा लेकर भी मैं आर्थिक रूप से निर्भर हूँ, इस बात का अफ़सोस मुझे रहता है और मम्मी करती रहती थीं। सच है कि परिस्थितियाँ कब बदल जाए कोई नहीं जानता। मम्मी बहुत ख़ुश थीं कि मैं लेखिका और कवयित्री बन गई हूँ। मम्मी के सामने मेरी एक पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' प्रकाशित हुई, जो मम्मी के पास थी। दूसरी किताब 'प्रवासी मन' प्रकाशित हुई; लेकिन मम्मी को मैं दे नहीं सकी। मेरी तीसरी किताब 'मरजीना' प्रकाशित हुई, जिसे मैंने मम्मी को समर्पित किया है।
मम्मी की तस्वीर के साथ मेरी पुस्तकें |
मेरी शादी में मम्मी |
भैया के जन्म के बाद मम्मी |
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भारत भ्रमण पर पापा-मम्मी |
3 जून 1962 को दरभंगा में मम्मी की शादी हुई, तब वे दरभंगा विश्वविद्यालय में बी.ए. पार्ट-1 में पढ़ती थीं। हम दोनों भाई-बहन के जन्म के कारण उनकी पढ़ाई में एक साल का व्यवधान आया और 1967 में टी.एन.बी.कॉलेज, भागलपुर से बी.ए.ऑनर्स किया। मेरे पापा डॉ. कृष्ण मोहन प्रसाद अपने पढ़ाई के दिनों में अपने गाँव कोठियाँ (अब शिवहर ज़िला) के नज़दीक अदौरी स्कूल में क़रीब एक साल शिक्षक रहे। 1961 में गिरिडीह कॉलेज, राँची विश्वविद्यालय में फिर 1963 में भागलपुर विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर बने। मम्मी ने भागलपुर विश्वविद्यालय से 1969 में राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया। पापा उसी विभाग में शिक्षक और मम्मी उनकी छात्रा। मैं मम्मी को छोड़ती नहीं थी, चाहे मम्मी को पढ़ने जाना हो या मीटिंग; हालाँकि हम दोनों भाई-बहन के देख-रेख के लिए दो लोग रहते थे। मैं मम्मी को बहुत ज़्यादा दिक्क़त देती थी; परन्तु मेरे सिद्धांतवादी पापा ने मम्मी को सहूलियत नहीं दी। पापा के विभागाध्यक्ष ने पापा से कहा कि मम्मी क्लास न करें और पापा घर में नोट्स दे दें। परन्तु पापा के लिए सभी छात्र एक बराबर हैं, किसी एक को सुविधा क्यों? मम्मी पढ़ने के लिए अक्सर अपनी मित्र श्रीमती लक्ष्मी गुप्ता, जिनका घर (मायका) कोतवाली चौक पर है, के घर चली जाती थीं। मम्मी ने 1971 में टी.एन.बी.लॉ.कॉलेज से बी.एल. किया। 1974 में राजकीय शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय, भागलपुर से बी.एड. और 1982 में एम.एड. किया।
मम्मी को याद करने में मम्मी-पापा के विवाह की चर्चा न हो यह कैसे मुमकिन है। मम्मी-पापा की शादी बहुत अनोखी थी। पापा का घर कोठियाँ धर्मपुर धर्मागत गाँव, जो शिवहर ज़िला (पहले मुज़फ्फ़रपुर फिर सीतामढ़ी ज़िला) मुख्यालय से लगभग 2 किलोमीटर दूर है। समीप के गाँव पुरनहिया के डुमर गाँव के किसी समृद्ध परिवार से शादी के लिए पापा पर बहुत दबाव था। यहाँ तक कि वे लोग पी-एच.डी. का ख़र्च देने को तैयार थे। सोनौल सुब्बा से सटा हुआ एक गाँव है घरबारा, जहाँ मम्मी के रिश्ते के मुनि चाचा रहते थे, जो पापा के रिश्ते में भी कुछ थे। उन्होंने मेरे मामा को शादी की बात करने भेजा। पापा ने अपने पिता और घर के किसी भी सदस्य को मामा से बात करने नहीं दिया। वे सारा दिन मामा के साथ बिताए और अपने सिद्धांत और शर्तों के बारे में स्पष्टतः बताया। पापा का परिवार परम्परावादी है, तो उन्हें आशंका थी कि घरवाले कुंडली मिलाएँगे, मुहूरत देखेंगे, पारम्परिक शादी चाहेंगे। पापा के रिश्ते में भतीजा और मम्मी के रिश्ते में भाई श्री राजकमल शिरोमणि, जो बाद में अँगरेज़ी के प्रोफ़ेसर बने, के साथ मम्मी को दरभंगा के सिनेमा हॉल में भेजा गया। पापा ने मम्मी को दूर से देखा, पर मम्मी को इस बात की जानकारी नहीं दी गई। एक महीने के बाद पापा ने रजिस्ट्री चिट्ठी भेजकर मामा को बुलाकर कहा कि अगर मम्मी में मेरिट हो और वे आगे पढ़ेंगी, तो वे शादी के लिए तैयार हैं; लेकिन शादी उनके शर्त के मुताबिक़ होगी। पापा द्वारा चयनित राजनीति शास्त्र, गृहविज्ञान और अंग्रेज़ी के पाँच प्रश्नों के साथ मम्मी की परीक्षा लेने पापा की बड़ी भाभी और भाई हरिमोहन प्रसाद दरभंगा आए। मम्मी ने प्रश्नों के उत्तर उनके सामने लिखे और लिफ़ाफ़े में चिपकाकर दे दिया। मम्मी मेरिट-टेस्ट में पास हो गईं। मम्मी ख़ुश थीं कि शादी से पढ़ाई में बाधा नहीं होगी। नाना-मामा ने शादी की सभी शर्तों को मान लिया। मामा ने चुपचाप पापा की कुंडली बनवाई और कुंडली-मिलान कराया, जिसके अनुसार 36 में से 32 गुण मिल गए थे।
विवाह के बाद की तस्वीर की पेन्टिंग |
बाएँ से मम्मी, मैं, भैया, फूफेरा भाई, दादी |
मम्मी के मेहनत से बने मकान में फूल और मम्मी |
2004 |
मम्मी पूरी तरह गांधीवादी, साम्यवादी, समाज सेविका, शिक्षिका, प्राचार्या बन गई थीं। उन्होंने यह सब अपने विचार, मेहनत और हिम्मत से किया। पापा भी यही चाहते थे कि कोई भी विचार मम्मी ख़ुद समझें और मन से अपनाएँ। मम्मी अपने आगे बढ़ने और शिक्षित होने का सारा श्रेय पापा को देती हैं, अन्यथा इस मुक़ाम तक नहीं पहुँचती। मम्मी बताती थीं कि गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र में पहली बार जब भाषण देना था, मम्मी डर से थर-थर काँप रही थी। पापा ने भाषण लिखा और मम्मी के पीछे खड़े होकर बोलते गए, मम्मी दुहराती गई। धीरे-धीरे मम्मी इतनी सक्षम हो गई कि एक बार मंच पर गई तो किसी भी मुद्दे पर बिना रुके घंटो बोल सकती थीं।
आज मम्मी को पंचतत्व में विलीन हुए एक साल हो गए हैं। आज बहुत दुःखी हूँ, मम्मी नहीं हैं और मैं उन पर लिख रही हूँ। वे अब न पढ़ सकेंगी न उनके प्रति मेरे विचार को शब्द रूप में देख पाएँगी। यह जगत् और वह जगत् बहुत रहस्यमय है। दार्शनिकों को पढ़ती हूँ, समझने का प्रयास करती हूँ; लेकिन मेरी समझ से परे है। मम्मी! अगर तुम मुझे देख सकती हो, सुन सकती हो, समझ सकती हो, तो मेरे मन की अवस्था समझना। अब चारों तरफ़ एक सन्नाटा है, जिसमें तुम्हारी बेटी हँसते-हँसते धीरे-धीरे गुम हो रही है।
एक अच्छे दिन में मम्मी इस संसार से विदा हुई, जिस दिन महात्मा गांधी ने शहादत दी। आज महात्मा गांधी की 74वीं पुण्यतिथि है और मम्मी की पहली पुण्यतिथि। महात्मा गांधी को हार्दिक नमन! इस आलेख के द्वारा मम्मी को श्रद्धांजलि!
Thursday, September 2, 2021
91. माँ का दुलारा, बन गया आसमाँ का तारा : सिद्धार्थ शुक्ला
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सिद्धार्थ शुक्ला (12.12.1980 - 2.9.2021) |
