Tuesday, March 8, 2022

94. आधी दुनिया की पूरी बातें

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने 24 दिसम्बर 1914 को श्री गोपाल कृष्ण गोखले को एक पत्र लिखा था। पत्र में लिखा ''... ऐसा लगता है कि हमें भारत को उसकी बीमारी से मुक्त करने से पहले पुरुषों की एक नई नस्ल की आवश्यकता है। हम मक़सद को लेकर अधिक प्रतिबद्धता, भाषण में अधिक साहस और कार्रवाई में अधिक ईमानदारी चाहते हैं। हम ऐसे पुरुष चाहते हैं, जो इस देश से प्यार करते हों और अपने भाइयों-बहनों की सेवा और सहायता के लिए इच्छुक रहते हैं। वे नहीं जो कपट और स्वार्थ से देश के पतन में और बढ़ावा दे रहे हैं। मैं आपको कैसे बताऊँ कि मुझे दिखावा और पूर्वाग्रहों से कितनी सख़्त नफ़रत है। इसी तरह साम्प्रदायिक संकीर्णता, दृष्टि और उद्देश्य की प्रांतीय सीमाओं से भी मुझे सख़्त नफ़रत है। मानव निर्मित विभाजनों और मतभेदों के सभी अभिमानी परिष्कार मुझे थका चुके हैं।" 
 
इस पत्र को पढ़कर एक बात मेरे ज़ेहन में आती है कि उन दिनों क्रांतिकारियों और आज़ादी के लिए प्रतिबद्ध लोगों को छोड़कर कुछ ऐसे पुरुष भी थे जो कुटिल और बेईमान थे, जिनकी मानसिकता समाज के विरुद्ध थी। सरोजनी नायडू का पुरुष की नई नस्ल की बात कहना पुरुष की सोच, मासिकता और कायरता को दर्शाता है। निःसंदेह अगर ऐसा न होता तो किसी भी सदी में कभी भी देश ग़ुलाम न हुआ होता; चाहे मुग़ल शासकों की ग़ुलामी हो या अँगरेज़ों की। कठिन संघर्षों के बाद अब हमारा देश भौगौलिक रूप से आज़ाद है, लेकिन मानसिक ग़ुलामी से आज़ादी की हर सम्भावना अब धूमिल पड़ती दिखती है। इसके लिए दोषी कोई ख़ास समाज, सम्प्रदाय, जाति, धर्म नहीं; बल्कि सदियों से रोपित व पोषित हमारी मानसिकता है। 
 
एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है, ''ज़र, ज़मीन, जोरू ज़ोर की, नहीं तो किसी और की।'' आख़िर ऐसा क्या बदलाव हुआ जो ऐसी लोकोक्ति बनी, हमें इस पर विचार करना चाहिए। ज़र यानी संपत्ति और ज़मीन से स्त्री की समानता क्यों? एक ही समानता है कि ताक़त के बल पर इन तीनों पर आधिपत्य जमाया जा सकता है। ग़ुलाम भारत में स्त्रियाँ संपत्ति की तरह देखी जाती थीं। अगर किसी राज्य या रियासत को अपने अधीन करना है, तो युद्ध में जीत के बाद संपत्ति के साथ स्त्रियों पर भी अधिकार कर लिया जाता था। कई वीरांगनाओं ने अधीनता स्वीकार न कर जंग किया और मृत्यु को गले लगाया कुछ स्त्रियों ने जौहर कर आत्मदाह किया कुछ ने पति के साथ सती हो जाना स्वीकार किया। ग़ुलामी से पहले भी स्त्रियों पर अत्याचार हुए हैं; क्योंकि स्त्री की शारीरिक शक्ति पुरुष से कम है और इसका फ़ायदा हर युग में पुरुषों ने उठाया है। अहल्या की कहानी से यह बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। बेहद अफ़सोसनाक है कि अपराधी पुरुष है और सज़ा स्त्रियाँ पाती हैं। आज के वक़्त में इस पर गहन विमर्श और बदलाव की
ज़रूरत है।
 
मम्मी (2017)
मम्मी के साथ एक मंच पर मैं
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आज के समय में ज़्यादातर प्रगतिशील होने का ढोंग ही होता है; क्योंकि मानसिक रूप से आज भी सदियों पुरानी रूढ़ियों और परम्पराओं के प्रभाव से हम उबर नहीं सके हैं। कहीं-न-कहीं हमारी सोच एक ऐसे जाल में उलझी हुई है, जो रूढ़ियों, परम्पराओं, प्रथाओं, चलन, रिवाज इत्यादि के द्वारा सदियों पहले बुना गया था। निश्चित ही उस समय की यह ज़रूरत रही होगी; क्योंकि हर कार्य के पीछे कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। समय के उस दौर में जो आवश्यक रहा होगा, वह भी विकास प्रक्रिया के अनुसार सोच के बदलाव से ही सम्भव हुआ होगा; अन्यथा आज भी पाषाण युग में मानव सभ्यता जी रही होती। 

हमारे सोच को मानसिक ग़ुलामी ने इस क़दर जकड़ रखा है कि समय के साथ हुए परिवर्तन के बावजूद देखने का नज़रिया रूढ़िवादी और ढकोसलावादी है, विशेषकर स्त्रियों के लिए। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ पुरुष की सोच ऐसी है; बल्कि स्त्रियाँ स्वयं मानसिक ग़ुलामी की शिकार हैं, ग़लत रूढ़ियों को बढ़ावा देती हैं, परम्पराओं और प्रथाओं के नाम पर। ऐसा कहना ग़लत होगा कि सिर्फ़ अशिक्षित समाज की स्त्रियाँ रूढ़ियों का पालन करती हैं; बल्कि शिक्षित समाज की स्त्रियाँ ज़्यादा रूढ़िवादी हैं। 

अशिक्षित समाज की स्त्रियाँ अगर रूढ़िवादी हैं, तो उसी अनुरूप कार्य-व्यवहार करती हैं, किन्तु अधिकतर शिक्षित समाज की स्त्रियाँ दोहरे व्यवहार के साथ जीती हैं। स्वयं को आधुनिक दिखाने के लिए पहनावा और रहन-सहन में भले ही आधुनिकता अपना लें, लेकिन रूढ़ियाँ उनके दिमाग़ को जकड़े हुए हैं। जिन रूढ़ियों की अभी के समय और समाज में न ज़रूरत है न औचित्य, उससे वे ख़ुद को अलग नहीं कर पाती हैं। जितनी कुरीतियाँ व कुप्रथाएँ हैं उनके पक्ष में उनके पास ढेरों तर्क हैं, जो बेबुनियाद, अतार्किक, मूढ़ और फ़िज़ूल हैं। अधिकांशतः रूढ़ियों के पक्ष के सारे तर्क और व्यवहार, धर्म और मान्यता से जोड़कर ही किए जाते हैं। 

अगर हम सनातन धर्म के अनुसार देखें, तो यह सत्यापित होता है कि वेद, पुराण, ग्रंथ, इत्यादि के अनुसार उस युग या काल की स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी, वे आज़ाद थीं, उनके अपने सोच-व्यवहार थे, उनका रहन-सहन और पहनावा उनके अपने अनुसार था। यहाँ तक कि स्वयंवर के द्वारा अपने पति का चुनाव वह स्वयं कर सकती थीं सतयुग और त्रेतायुग में स्त्री का अपना एक अलग सम्मानीय स्थान था। द्वापरयुग से स्त्रियों की स्थिति निम्न होती गई और मध्यकाल आते-आते स्त्री पूरी तरह से पुरुष की ग़ुलाम बन गई। 

उपनिषद काल में पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी शिक्षित किया जाता था। लव-कुश के साथ आत्रेयी पढ़ती थी; यानी उस युग में भी सह-शिक्षा थी। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, पार्वती, सीता, उर्मिला, कौशल्या, कैकेयी, कुंती, द्रौपदी, गांधारी, राधा, रुक्मिणी, अदिति, शची, गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, अपाला, आदि सभी अपने-अपने विचारों, कर्तव्यों और कार्यों के लिए स्मरणीय मानी गई हैं। अगर इन युगों को हम काल्पनिक भी माने, तो ऐसी कल्पना करने वालों ने स्त्रियों के लिए बहुत मज़बूत चरित्र का निर्माण किया है। इसके लेखन-काल के समय स्त्रियों की दशा कैसी थी, यह भी पता चलता है। अगर हम कलयुग में देखें तो हमारे इतिहास में ऐसी अनेक विदुषी और वीरांगना स्त्रियों की गाथा मिलती है, जो पुरुष से ज़रा भी कम न थीं। 

हर युग में स्त्रियों का अपना अस्तित्व था। शक्ति, शिक्षा, सम्पदा के लिए देवी को ही आराध्य माना गया। किसी भी युग में न सिन्दूर की प्रथा थी, न अपने शरीर को लेकर लज्जा की कोई बात, न गहना-ज़ेवर पर स्त्रियों का एकछत्र अधिकार, न कन्या-वध, न दहेज हत्या, न पर्दा प्रथा, न नाम परिवर्तन। निःसंदेह मुग़ल शासन के समय इन कुप्रथाओं की शुरुआत हुई; क्योंकि उस समय की यही माँग थी। उस काल में सिन्दूर, घूँघट, बाल-विवाह इत्यादि का चलन स्त्रियों की सुरक्षा के कारण शुरू हुआ, जो बाद में प्रथा और परम्परा का रूप ले लिया। 

अब जब भारत आज़ाद है, तब इन कुप्रथाओं को ढोने का कोई सटीक तर्क नहीं मिलता है, सिवा इसके कि समाज द्वारा यह स्त्रियों के लिए नैतिक माना गया है। इन कुप्रथाओं से स्त्री के चरित्र और नैतिकता को आँकना न सिर्फ ग़लत है बल्कि अनैतिक भी है। ऐसा नहीं कि स्त्रियों की अपनी कोई सोच नहीं है; लेकिन ज़्यादातर ऐसा देखने में आता है कि पुरुष के सोच से प्रभावित होकर स्त्रियाँ अपने जीवन की दिशा निर्धारित करती हैं। सिर्फ़ धार्मिक कार्य करते समय स्त्री को पूरा सम्मान मिलता है। 

आज जब बुर्क़ा-हिजाब-नक़ाब को लेकर विवाद देख रही हूँ, तो सचमुच बेहद आश्चर्य हो रहा है। बुर्क़ा या पर्दा से आज़ादी मिल रही है और स्त्रियाँ ख़ुद इसकी ग़ुलाम रहने को बे-क़रार हैं। मुस्लिम स्त्रियों के शरीर का ढाँचा अन्य स्त्रियों से अलग तो नहीं, जिसे सबसे छुपाना ज़रूरी है? बिना नकाब या बुर्क़ा के अगर कोई देख ले, तो कौन-सा क़हर टूट पड़ेगा? कोई भी स्त्री हो, सभी ख़ूबसूरत होती है, नक़ाब में क्यों छुपाना अपना चेहरा? जिन पुरुषों को स्त्री का चेहरा देखकर ही कामुकता आती हो, तो वैसे पुरुषों से क्या डरना, उनको कानून के हवाले कर देना चाहिए न कि ख़ुद को पर्दा में छुपा लेना चाहिए। 

सम्प्रदायों के सैद्धांतिक मत-भिन्नता के विवाद ने फिर से हद को पार किया है, और इस बार स्त्रियों के पहनावा को मुद्दा बनाया गया है। इस विवाद में अब एक नया अध्याय शुरू हुआ है हिजाब-नक़ाब-बुर्क़ा का। मुझे याद है जब मैं छोटी थी तब मुहर्रम के समय ईरान से कुछ स्त्री-पुरुष मस्जिद में आते थे। वे क्यों आते थे, यह अब तक मुझे नहीं मालूम। जानने की जिज्ञासा भी न हुई कभी। बस इतना याद है कि जो भी बुर्क़ा में होती थी हम उसे ईरानी कहते थे। उन दिनों भारतीय स्त्रियाँ बुर्क़े में ज़्यादा नहीं दिखती थीं। मेरे कॉलेज की कुछ शिक्षक और छात्राओं को बुर्क़ा पहनकर आते देखा, लेकिन वे कॉलेज पहुँचकर उतार देती थीं। मैं सोचती थी कि चूँकि वे सुन्दर हैं, इसलिए उनके घर से उन पर बुर्क़ा पहनने का दबाव होगा। एक फ़ायदा यह भी है कि छेड़खानी से वे बच जाएँगी। हमारे ज़माने में भी छेड़खानी होती थी, लेकिन अभी से ज़रा कम। मुझे नहीं लगता कि कोई भी लड़की इस छेड़खानी का शिकार होने से बच पाई होगी। अगर घर के बाहर बच गई तो घर में भी पुरुष होते हैं, चाहे रिश्ता कोई भी हो। 

मैं हमेशा सोचती थी की छोटी-छोटी लड़कियों को उनके घर से बुर्क़ा से आज़ाद होने नहीं दिया जाता है। मैं मन में बहुत दुःखी रहती थी उनको देखकर। लेकिन अभी जो हिजाब-विवाद हो रहा है, इसे देखकर उन छात्राओं के लिए दुःख हो रहा है, जो अपना वस्त्र दूसरे के मन से धारण करती हैं। वे अपनी ज़िन्दगी का कोई भी निर्णय क्या कभी ख़ुद ले पाएँगी? आख़िर ऐसी ग़ुलामी उन्हें स्वीकार क्यों है? अब जब मौक़ा है, ज़रा-सा हिम्मत जुटातीं और ख़ुद ही नक़ाब से बाहर आ जातीं। पर अब तो राजनीति के हाथों का खेल ख़ुद को बना चुकी हैं। अब खेलो बुर्क़ा-बुर्क़ा, सिन्दूर-बिन्दी; और तमाशा देखेगा आज का तथाकथित धार्मिक समाज। 

संविधान हमें अपने पसन्द के कपड़े पहनने से नहीं रोक सकता है। परन्तु हिजाब बनाम सिन्दूर-चूड़ी विवाद का कोई औचित्य समझ नहीं आता है। जो बुर्क़ा शौक से पहनती हैं, पहनें; लेकिन स्कूल-कॉलेज या किसी व्यवसाय में अगर ड्रेस कोड है, तो उसका पालन करना ही होगा। अब इसका तो यही अर्थ हुआ कि कोई बुर्क़ा या घूँघट में रहती है, तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ने जाए तब भी वह घूँघट-बुर्क़ा में रहे। जिसे ऐसे रहना है वह घर में ही बैठें, शिक्षा की क्या ज़रूरत है? बुर्क़ा और घूँघट में कोई सुविधापूर्ण तरीक़े से न चल सकती है, न खेल सकती है, न कोई नौकरी कर सकती है। बस बच्चा पैदा करने का काम ही है, जो कर सकती है। पुलिस, आर्मी, नर्स, वकील आदि नौकरी उनके लिए सम्भव नहीं; क्योंकि बुर्क़ा पहनकर तो यह सब मुमकिन नहीं। बुर्क़ा खुद को छुपाने का बेहतरीन विकल्प है, परन्तु आज के समय के अनुसार जायज़ नहीं। न सिन्दूर, बिन्दी या चूड़ी ही जायज़ है। जिसे जो शौक हो इस्तेमाल में लाएँ। यह सभी शृंगार प्रसाधन हैं, जिसे सुन्दर दिखने के लिए उपयोग में लाया जाता है। हिजाब से सिन्दूर-चूड़ी की तुलना अर्थहीन है। 

मैं भागलपुर के एक सरकारी गर्ल्स स्कूल जिसका प्रबंधन मिशनरी द्वारा किया जाता था, में पढ़ती थी। हमारे स्कूल में कक्षा 8 तक सभी को सफ़ेद शर्ट, नीला स्कर्ट, नीला फीता, काला जूता पहनना होता था। 9वीं और 10वीं कक्षा से सभी को सफ़ेद ब्लाऊज और नीले पाड़ (किनारी) की सफ़ेद साड़ी पहनना अनिवार्य था। ब्लाऊज की लम्बाई इतनी हो कि पेट न दिखे। सप्ताह में हमलोगों के नाख़ून देखे जाते थे कि किसी के नाख़ून बड़े तो नहीं, नेलपॉलिश या मेँहदी तो न लगाया, हाथ में चूड़ी या कड़ा तो न पहना। हमारी प्राचार्य मिस सरकार का बहुत सख़्त अनुशासन था। स्कूल के किसी भी नियम में ज़रा-सी भी ढील वे बर्दाश्त नहीं करती थीं। हर दिन पहला एक क्लास बाइबल का होता था, जिसमें हम सभी का जाना अनिवार्य था। उस स्कूल में जिस भी धर्म की छात्रा हो, उसे यह सब नियम मानना होता था। अगर किसी को शर्ट-स्कर्ट से समस्या है, तो वह उस स्कूल में जाए जहाँ सलवार कमीज़ पहनावा हो। हर संस्थान के अपने नियम होते हैं और नामांकन के बाद वहाँ के नियमों का पालन करना बाध्यता है और यही उचित भी है। संस्थान के नियम से अगर आप सहमत नहीं हैं तो आप वहाँ न जाएँ। 

मैं सोचती हूँ, ख़ूब सारे सौंदर्य सामग्री का इस्तेमाल कर बुर्क़ा पहन लिया, तो क्या फ़ायदा? हिजाब में कम-से-कम चेहरा तो दिखता है, पर फ़ैशन के अनुरूप वस्त्र धारण करने का क्या फ़ायदा? बुर्क़ा बिरादरी से बाहर निकल हिजाब को तिलांजलि देकर एक आम स्त्री का जीवन जीना ख़ुद स्त्रियों को अच्छा लगना चाहिए। इसके लिए दुनिया की सभी स्त्रियों को एक साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। क्यों पुरुषों की ग़ुलामी सही जाए? क्यों ख़ुद को नक़ाब में रखें? दुनिया का कोई भी पुरुष बुर्क़ा या नक़ाब नहीं पहनता, तो स्त्रियाँ क्यों पहनें? अपने पसन्द के अनुरूप परिधान धारण करना हमारी स्वतंत्रता है और यह स्वतंत्रता भारत में रहने वाले सभी लोगों के लिए है लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि संस्थान के नियम के विरुद्ध जाएँ।  

जहाँ तक मुझे लगता है कि मन की कट्टरता ने हिजाब-बुर्क़ा या घूँघट को अपनाए रखने के लिए विवश किया हुआ है। इस विवाद में पुरुष पड़े हैं, और वह भी बुर्क़ा के पक्ष-विपक्ष में, यह समझ से परे है; क्योंकि यह मसला स्त्रियों का है। बुर्क़ा के विरोध में बोलना ज़रूरी है न कि बदले में भगवा चादर लेना। मुझे तो यह निहायत मूर्खता वाली बात लगती है। यह समय है जब पुरुषों को आगे बढ़कर इन कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ स्त्रियों का साथ देना चाहिए। 

यह सही है कि लीक से हटकर जिन स्त्रियों ने जीना शुरू किया, उन्हें समाज का तिरस्कार और आक्षेप सहना पड़ता है। फिर भी यह ज़्यादा सही है बनिस्पत रूढ़ियों से जकड़े हुए कठपुतली की तरह दूसरों के इशारे पर जीवन जिएँ। मेरे विचार से पुरुष-वर्ग को आगे आना होगा, अपने घर की स्त्रियों को बुर्क़ा या घूँघट से बाहर आने की हिचक को तोड़ने के लिए। एक तरफ़ हम वैश्वीकरण की बात करते हैं, विकास की बात करते हैं, दूसरे ग्रह पर जाने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ़ धर्म-जाति के लफड़े के बाद अब व्यक्तिगत पहनावा पर राजनीति कर रहे हैं। आशचर्यचकित हूँ, बुर्क़ा या हिजाब के पक्ष में स्त्रियाँ कैसे हैं? प्रगति और विकास की बात कोई क्या करेगा, जब किसी की सोच पहनावे में उलझ जाए।   

महिला दिवस पर मेरी तो यही कामना और शुभकामना है कि पूरी दुनिया की स्त्री ख़ुद के मन से जीवन जिएँ, अपने पसन्द के अनुसार नैतिक रूप से जो सही हो वह करें। मैं तो चाहती हूँ कि ''दुनिया की महिलाएँ एक हों'' की जगह अब यह कहा जाए- ''दुनिया के इंसानों एक हों!''
महिला दिवस पर मम्मी - सफ़ेद साड़ी में
- जेन्नी शबनम (8.3.2022)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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Monday, February 7, 2022

93. छुप-छुप खड़े हो की मेरी लता


लता मंगेशकर का मतलब मेरे लिए है उनका गाया गीत ''चुप-चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है...।" यह गाना मेरी ज़बान पर चढ़ गया था और मैं अपने पापा को यह गाकर चिढ़ाती थी। मेरे पापा गाना सुनने के बहुत शौकीन थे घर में एक रेडियो-रेकॉर्ड प्लेयर और ढेरों रेकॉर्ड थे। मेरे घर में दिनभर गाना बजता रहता था। उन दिनों गीत के बोल मेरी समझ में नहीं आते थे, और अपनी समझ से कोई भी शब्द जोड़ देती थी। उन्हीं में यह गीत था चुप-चुप खड़े हो, जिसके बोल मेरे लिए थे छुप-छुप खड़े हो...। पापा अपने कमरे में अधिकतर समय पढ़ते-लिखते रहते थे। मुझे लगता कि पापा सबसे छुपकर कमरे हैं और मैं जैसे लुका-चोरी खेलने में उनको पकड़ ली होऊँ, मैं उँगली के इशारे से बोलती, "पापा, हम तुमको पकड़ लिए। छुप-छुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है...।" 
लता मंगेशकर को मैंने अपने पापा के माध्यम से जाना है। हालाँकि उस उम्र में मुझे नहीं मालूम था कि गीत किसने गाया और रेकॉर्ड में बजता कैसे है। 'हिज मास्टर्स वॉइस' के रेकॉर्ड में लाउडस्पीकर के सामने एक कुत्ता बैठा रहता है। मैं सोचती थी कि वह कुत्ता कितना अच्छा गाता है, स्त्री-पुरुष दोनों की आवाज़ में गाता है। लेकिन बाहर का कुत्ता क्यों नहीं गाता, सिर्फ़ भौं-भौं क्यों करता है? यह ऐसा अनसुलझा प्रश्न था जो मैं सोचती रहती थी, आश्चर्यचकित रहती थी, मेरी खोजबीन जारी थी। लेकिन इसका उत्तर कभी पूछा नहीं किसी से। जब समझ आया कि गाना इंसान गाता है, तो अपनी मूर्खता पर चुचाप ख़ुद हँसती थी।
हमारे पास सैकड़ों रेकॉर्ड थे, जिसमें सभी गायक-गायिका और फ़िल्म के गाने थे। जब थोड़ी समझ खुली, तो सोचती थी कि जिस रेकॉर्ड पर जिस फ़िल्म का गाना है, तो उस फ़िल्म के कलाकारों ने गाया है। पाकीज़ा है तो मीनाकुमारी, नीलकमल है तो वहीदा रहमान व राज कुमार, हमराज़ है तो विम्मी व राजकुमार, वक़्त है तो साधना व सुनील दत्त इत्यादि। तब नहीं मालूम था कि गीतकार, संगीतकार, गायक, कलाकार आदि सब अलग-अलग लोग होते हैं। जब यह राज़ हमपर खुला, तब अपनी मंदबुद्धि के लिए अपने आप से शर्मिन्दा हुई। मुमकिन है मम्मी-पापा से अपनी मूर्खता बताई रही होऊँ, जो मुझे अब याद नहीं है। 

जब गाना की समझ आई फिर तो लता-ही-लता मेरी चारों तरफ़। लता के दर्द भरे गाने मुझे इतने पसन्द आते थे जैसे कि मैं संगीत में दक्ष वयस्क स्त्री हूँ और गीत के बोल और भाव बहुत अच्छी तरह समझती हूँ। हालाँकि तब भी गीत के बोल में मेरे शब्द भण्डार से शब्द जुड़ते रहते थे। उन दिनों उर्दू शब्द का ज़रा भी ज्ञान नहीं था मुझे। उम्र के साथ सोच विकसित हुई और तब गीत, संगीत और गाना का मतलब समझ आया। फिर तो गाना मेरी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा बन गया। गाना सुने बिना मेरी पढ़ाई भी नहीं होती थी। मैं कई बार सोचती हूँ कि संगीत से मुझे इतना लगाव है, लेकिन एक पंक्ति भी क्यों नहीं गा सकी, हालाँकि कोशिश बहुत की। 

न सिर्फ़ लता बल्कि सुरैया, नूरजहाँ, बेगम अख़्तर, फ़रीदा ख़ानम, आशा भोंसले, मोहम्मद रफ़ी, सुमन कल्याणपुर, मीना कुमारी, मन्ना डे, सहगल, महेंद्र कपूर, हेमन्त कुमार, मुकेश, किशोर कुमार, एस. डी. बर्मन आदि सभी गायकों के गानों की लम्बी फ़ेहरिस्त बनती चली गई। कुछ नाम भूल रही हूँ, लेकिन ये सभी मेरे पसन्दीदा गायक-गायिका हैं, जिन्हें जितना भी सुनूँ मन नहीं भरता है। रेकार्ड के ज़माने से शुरू हुआ मेरा संगीत प्रेम कैसेट, सी डी, मेमोरी कार्ड से होते हुए अन्तर्जाल के विभिन्न साइट तक पहुँच गया है। जब ग़ज़ल की समझ आई तब मेँहदी हसन, ग़ुलाम अली, पंकज  उदास, जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, पिनाज़ मसानी आदि को ख़ूब सुनती रही। ग़ुलाम अली साहब को तो जैसे लोरी के रूप में सुनती हूँ। ग़ुलाम अली को सुनते-सुनते ही सोती हूँ। लता मंगेशकर और जगजीत सिंह के ग़ज़ल का एल्बम 'सजदा' मेरा पसन्दीदा है। लता जी का गाया गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी...' जब भी जितनी बार भी सुनती हूँ, आँखें भींग जाती हैं और रोआँ-रोआँ सिहर जाता है। 

किस-किस गानों की चर्चा करूँ, किस-किस गायक-गायिकाओं की चर्चा करूँ, फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि मेरी यादें कमज़ोर पड़ जाती हैं। गाना-ग़ज़ल के प्रति मेरी दीवानगी ख़त्म नहीं होती। रफ़ी साहब के प्रति मेरी दीवानगी तो आज भी परले दर्जे का है। उनके ख़िलाफ़ मैं कुछ सुन ही नहीं सकती। जब रफ़ी साहब का इंतकाल हुआ था, तब मैं सोचती थी कि रफ़ी के बिना संगीत की दुनिया कैसे चलेगी? आज सोच रही हूँ कि लता जी के बिना संगीत की दुनिया कैसी होगी? 
समय-चक्र और जीवन-चक्र अपनी धुरी पर चलता है, चलता रहेगा; हम हों-न-हों कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। यह मालूम है, संसार से सबको नियत समय पर जाना है। परन्तु उन कुछ लोगों का जाना बहुत दुःख देता है, जिनसे हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं। लता जी ने तो करोड़ों ही नहीं असंख्य लोगों के दिलों पर राज किया है, चाहे वे देशी हों या विदेशी। लता जी का गाया गीत- 'नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे...।', मैं सोचती हूँ कि लता जी का न कभी नाम गुम होगा, न कोई चेहरा भूलेगा, हर एक की लता दीदी अपनी आवाज़ के रूप में हमारे साथ सदियों-सदियों जीती रहेंगी। मेरे लिए तो छुप-छुप खड़े हो की लता चुप-चुप दुनिया से विदा हो गईं और अपनी आवाज़ जो इस दुनिया की धरोहर है, हमारे लिए छोड़ गईं। 

लता जी को हार्दिक श्रद्धांजलि!
- जेन्नी शबनम (6.2.2022)
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Sunday, January 30, 2022

92. मम्मी को याद करते हुए

वक्ता के रूप में 

मम्मी ने एक दिन मुझसे कहा- "मेरे जीवन को तुमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता-समझता है, मेरे जीवन के बारे में भी कुछ लिखो।" मैंने हँसकर कहा- "तुम्हारी ज़िन्दगी पर तो फ़िल्म बन सकती है मम्मी। काश! किसी को हम जानते, तो कहते कि कहानी लिखे और सिनेमा बनाए। कम-से-कम उस एक दृश्य में तो तुमको ज़रूर दिखाए, जिस दिन तुम्हारा रिटायरमेंट हुआ, तो तुम्हारे सहकर्मी और छात्राएँ रो रही थीं। तुम्हारे अधेड़ावस्था का चरित्र हम और युवावस्था का चरित्र ख़ुशी (मेरी बेटी) निभाए।" मम्मी मेरी बातों पर ख़ूब हँसने लगी और बोली "वाह! यह तो बहुत अच्छा आइडिया है; लेकिन मेरे जैसे पर कोई क्यों सिनेमा बनाएगा? जो सम्भव है वह सोचो न! तुम इतना अच्छा लिखती हो, मेरे बारे में तुम जो भी सोचती हो, वह सब लिखो।" मैंने कहा- "मम्मी! तुम मानसिक पीड़ा में जीती रही हो। हम लिखेंगे तो सारा सच ही लिखेंगे, तुम पढ़ोगी और बीते कष्टप्रद दिनों को याद करोगी और रोज़ रोती रहोगी।" मम्मी के जीवन के हर पहलू, उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख, अच्छे-बुरे वक़्त से मैं पूर्णतः वाक़िफ़ रही हूँ। 

प्राचार्य पद से रिटायर होने के दिन

तीन-चार वर्ष की उम्र से ही मुझमें उम्र से ज़्यादा समझ थी। मैं बहुत गम्भीर और संकोची स्वभाव की थी। उस उम्र से हर कार्य को मैं अपने तरीक़े से सोचकर, बहुत स्थिर और तल्लीनता से करती थी, भले ही समय ज़्यादा लग जाए। हड़बड़ी में किसी तरह कार्य को पूरा करना मेरे स्वभाव में नहीं है। जो भी कार्य करूँ, मेरे मुताबिक़ परफ़ेक्ट होना चाहिए, अन्यथा मैं करती ही नहीं हूँ। इस आदत के कारण मैंने पाया कम, गँवाया ज़्यादा है। 

पापा की मृत्यु के बाद जैसे अचानक मैं वयस्क हो गई और हर परिस्थिति को समझकर विश्लेषण करने लगी। यही वज़ह है कि सही समय पर मम्मी पर मैं कुछ भी लिख न सकी। जब भी थोड़ा लिखती, भावुक हो जाती और डिलीट कर देती थी। मैं नहीं चाहती थी कि मम्मी अपने दुःखद पलों को बार-बार याद करें। मम्मी को मानसिक और भावनात्मक पीड़ा इतनी ज़्यादा मिली कि मैं लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। मेरी कुछ कविताएँ जो मम्मी को अपने जीवन से जुड़ी हुई लगतीं, बार-बार पढ़कर ख़ूब रोती थीं, विशेषकर वृद्धावस्था और अकेलेपन की रचनाएँ। मम्मी हमेशा कहतीं- "तुम तब से लिखती हो, हमको पता कैसे नहीं चला? मेरी जैसी स्थिति और परिस्थिति में लोग क्या महसूस करते हैं, तुम कैसे इतना सोचकर लिख लेती हो?" मैं मुस्कुराकर कहती- "पता नहीं मम्मी, कैसे लिख लेते हैं हम। पर सोचो, माँ को नहीं पता कि बेटी लिखती है; लेकिन बेटी को माँ का सब कुछ पता है।" मैं जब भी भागलपुर जाती और मम्मी से मिलती थी, तो हँसना, बोलना, गाना, खाना जारी रहता था। कोई भी दुःखद बात हो जाती, तो मम्मी अपने असहाय होने पर बहुत रोती थीं। जीवन का बीता हर एक पल मम्मी को हमेशा याद रहा। 

सुलह केन्द्र में सलाहकार

प्रतिभा सिन्हा, महज़ मेरी माँ का नाम नहीं; बल्कि ऐसी शख़्सियत का नाम है, जिनकी पहचान आदर्श शिक्षक, कर्मठ प्राचार्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़े संगठनों में एक कर्मठ नेत्री के रूप में है। जब से मैंने होश सँभाला उन्हें घर, बच्चे, परिवार, विद्यालय और सामजिक कार्यों में व्यस्त देखा है। मम्मी के जीवन के उतार-चढ़ाव में सुख-दुःख, संघर्ष, सम्मान, अपमान, हिम्मत सब शामिल रहा है। नौकरी के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों से सम्बन्धित संगठनों से सम्बद्धता, हर सम्भव लोगों की सहायता करना, चाहे वह आर्थिक हो या पारिवारिक, भागलपुर के सुलह केन्द्र में सलाहकार, इत्यादि न जाने कितने कार्य हैं जो मम्मी लगातार करती रहीं। 

वर्ष 2010 से उनके पैरों में बहुत तक़लीफ़ रहने लगी और धीरे-धीरे चलने में असमर्थ होती गईं। इसके बावजूद 2017 तक उनके किसी भी कार्य में अवरोध नहीं आया, वे सक्रिय रहीं। वर्ष 2018 में मम्मी दिल्ली आईंं। यहाँ दो बार हार्ट अटैक आया। इसके बाद वे धीरे-धीरे कमज़ोर होती चली गईं। देहान्त के दो साल पहले से चलने में असमर्थ और अपनी हर दिनचर्या के लिए दूसरों पर निर्भर हो गई थीं। हर दूसरे-तीसरे महीने उनका शुगर और सोडियम कम हो जाता था। अस्पताल में भर्ती होना फिर 10-12 दिन में ठीक होकर घर आना, मानो यह उनके जीवन का हिस्सा बन गया। एक बार लगातार दो महीना तक अस्पताल में रहना पड़ा, जब उनके कमर में बहुत दर्द हुआ और चलने में असमर्थ हो गईं। ऐसे में मम्मी जीवन से निराश हो चुकी थीं। मैं, मेरा भाई, मम्मी के मित्र, सहकर्मी, छात्र-छात्राएँ, रिश्तेदारों आदि से मिलने पर मम्मी जैसे खिल जाती और अपनी सारी पीड़ा भूल जाती थीं। 

भारत भ्रमण के दौरान

मम्मी अपने जीवन-संघर्ष से हारने लगतीं या किसी घटना के कारण अवसाद में होतीं, तो मैं अक्सर कहती थी "मम्मी! तुम अपनी मालिक हो, कोई तुमसे न सवाल करेगा न किसी को जवाब देने के लिए बाध्य हो। कभी किसी से कुछ नहीं लिया, जीवन भर लोगों की सहायता ही करती रही हो। तुम्हारे बच्चे स्थापित हैं, सबकी फ़िक्र छोड़ो, सिर्फ़ अपनी फ़िक्र करो। तुम्हारा अपना पैसा है मेहनत से कमाया हुआ, भरपूर जियो, खूब घूमो, ख़ूब आराम से जीवन जियो, जो मन में आए करो।" परन्तु मम्मी ने कभी भी बेफ़िक्र होकर जीवन नहीं जिया। उस समय की मध्यमवर्गीय परिवेश की माँ, विशेषकर एकल और विधवा स्त्री अपने से ज़्यादा अपने बच्चों के लिए फ़िक्रमन्द रहती थीं। मेरी फ़िक्र ने मम्मी के स्वास्थ्य को और भी ज़्यादा प्रभावित किया। उच्च शिक्षा लेकर भी मैं आर्थिक रूप से निर्भर हूँ, इस बात का अफ़सोस मुझे रहता है और मम्मी करती रहती थीं। सच है कि परिस्थितियाँ कब बदल जाए कोई नहीं जानता। मम्मी बहुत ख़ुश थीं कि मैं लेखिका और कवयित्री बन गई हूँ। मम्मी के सामने मेरी एक पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' प्रकाशित हुई, जो मम्मी के पास थी। दूसरी किताब 'प्रवासी मन' प्रकाशित हुई; लेकिन मम्मी को मैं दे नहीं सकी। मेरी तीसरी किताब 'मरजीना' प्रकाशित हुई, जिसे मैंने मम्मी को समर्पित किया है 

मम्मी की तस्वीर के साथ मेरी पुस्तकें
मैं कॉलेज में पढ़ती थी। एक दिन मैंने मम्मी से कहा- "तुम दूसरी शादी क्यों नहीं की? कोई तो रहता तुम्हारे साथ, जब तुम बहुत बूढ़ी हो जाती। दादी उम्रदराज़ हो गई है, शादी के बाद हम भी चले जाएँगे, तब तुम अकेली पड़ जाओगी।" दादी यह सुनकर हँसने लगी। मम्मी ने कहा- "क्या बोलती हो, कुछ भी अनाप-शनाप सोचती और बोलती हो। दूसरी शादी क्यों करते भला? अगर मेरी दूसरी शादी होती, तो क्या तुम्हारी शादी हो पाएगी? तुम्हारी शादी के लिए अभी कितने ऑफर आते हैं, पर कोई नहीं चाहेगा कि ऐसी लड़की से शादी हो, जिसकी विधवा माँ ने दूसरी शादी की हो। मेरे पास नौकरी है, ढेरों काम है, तुम्हारी दादी है, तुम दोनों बच्चे हो, शादी का औचित्य क्या था?" मम्मी के जवाब से मैं संतुष्ट नहीं थी। मैं सचमुच चाहती थी कि मम्मी के जीवन में रंग हो। मम्मी का रंगहीन साड़ी पहनना, बिन्दी-चूड़ी नहीं पहनना मुझे बहुत अखरता था। पहले वे काजल लगाती थीं और कान में बड़ी-सी बाली पहनती थीं, पापा के देहान्त के बाद बन्द कर दीं। मम्मी ने दीवाली-होली सब कुछ रस्म के तौर पर निभाना शुरू कर दिया; हालाँकि पापा कोई भी त्योहार नहीं मनाते थे, पर हमें रोकते नहीं थे।
 
मेरी शादी में मम्मी 
मैं कम बोलती और शांत रहती थी; लेकिन मुझे ख़ुश रहना पसन्द था। मैं होली, दीवाली, ईद, नया साल, क्रिसमस, जन्मदिन, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या अन्य कोई ख़ास दिन ख़ूब शौक से मनाती थी। मम्मी को लेकर ज़बरदस्ती सिनेमा देखने जाती। होली में दादी-मम्मी और नाना को रँग देती थी। दादी-मम्मी ग़ुस्सा होतीं, पर मैं कहाँ सुनती थी किसी की। मम्मी को ज़बरदस्ती रंगीन साड़ी पहनाती थी। मेरे अनुसार चूड़ी, बिन्दी, बिछिया आदि सुहाग की निशानी नहीं; बल्कि सौंदर्य प्रसाधन है, पर मम्मी कभी नहीं पहनीं। 
 
मुझे वह पल याद है जब पापा की मृत्यु हुई मम्मी की स्थिति बहुत ख़राब हो गई, उनको नींद की सूई दी जा रही थी उसी अर्ध-बेहोशी में किसी स्त्री ने मम्मी के हाथ में ही काँच की सभी चूड़ियाँ तोड़ दीं और नहलाकर सफ़ेद साड़ी पहना दी। मुझे बेहद ग़ुस्सा आया, पर उस समय मेरी कौन सुनता। हमारे समाज और संस्कृति ने मम्मी को विधवापन झेलने को मज़बूर किया। हालाँकि मम्मी मेरी बातों को समझती थीं; लेकिन उनके मन में सदियों का बैठा मानसिक अवरोध था कि 'लोग क्या कहेंगे'। मैं कहती थी कि जिसे जो कहना है कहने दो, अपने मन का करो; परन्तु मम्मी न कभी बिन्दी लगाई न रंगीन काँच की चूड़ियाँ पहनीं। वर्ष 1963 में मेरे दादा के देहान्त के बाद से दादी ने भी कभी सफ़ेद के अलावा किसी और रंग को नहीं अपनाया। मुझे यह सब बेहद क्रूर लगता है। 

भैया के जन्म के बाद मम्मी
भारत भ्रमण पर पापा-मम्मी
मम्मी का पूरा नाम प्रतिभा सिन्हा और घर का नाम सुशीला है। विवाहोपरान्त प्रतिभा सिन्हा ही नाम रहा; क्योंकि मेरे पापा इस बात के विरुद्ध थे कि शादी के बाद स्त्री का नाम बदला जाए या पति का उपनाम जोड़ा जाए। मम्मी का जन्म बिहार के सीतामढ़ी ज़िला के सुप्पी ब्लॉक के सोनौल सुब्बा गाँव में 21 दिसम्बर 1944 को हुआ। उनके पिता बैकुण्ठ नारायण सिन्हा, सोनौल के एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे और माँ रामधारी देवी गृहिणी थीं। बड़ी बहन उर्मिला देवी गृहिणी और बहनोई भूपनारायण प्रसाद रेलवे में कार्यरत थे, अवकाश प्राप्ति के बाद मोतिहारी में रहने लगे; अब वे दोनों इस संसार में नहीं हैं। बड़े भाई श्री कृष्णदेव नारायण सिन्हा बिहार सरकार में ऑडिटर थे और भाभी श्रीमती राममणि सिन्हा स्कूल में शिक्षक थीं; वे मोतिहारी में रहते हैं। मम्मी के दो मामा हैं, जो मोतिहारी में रहते थे। बड़े मामा धर्मदेव नारायण सिन्हा जज थे तथा छोटे मामा विष्णुदेव नारायण सिन्हा वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे। मम्मी की सातवीं कक्षा तक की शिक्षा गाँव से हुई। आगे की पढ़ाई के लिए मम्मी अपने बड़े  मामा जो उन दिनों बेगूसराय में ज़िला जज थे, के घर रहने आ गईं और वहीं से 1961 में मैट्रिक किया। मेरे मामा की पोस्टिंग 1959 में दरभंगा में हुई और  उनकी शादी 1960 में हुई। मम्मी अपने भाई-भाभी के पास रहने आ गईं और दरभंगा विश्वविद्यालय से 1962 में प्री यूनिवर्सिटी (मेरे समय का इंटरमीडिएट) किया।

3 जून 1962 को दरभंगा में मम्मी की शादी हुई, तब वे दरभंगा विश्वविद्यालय में बी.ए. पार्ट-1 में पढ़ती थीं हम दोनों भाई-बहन के जन्म के कारण उनकी पढ़ाई में एक साल का व्यवधान आया और 1967 में टी.एन.बी.कॉलेज, भागलपुर से बी.ए.ऑनर्स किया। मेरे पापा डॉ. कृष्ण मोहन प्रसाद अपने पढ़ाई के दिनों में अपने गाँव कोठियाँ (अब शिवहर ज़िला) के नज़दीक अदौरी स्कूल में क़रीब एक साल शिक्षक रहे। 1961 में गिरिडीह कॉलेज, राँची विश्वविद्यालय में फिर 1963 में भागलपुर विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर बने। मम्मी ने भागलपुर विश्वविद्यालय से 1969 में राजनीति शास्त्र में एम.ए. किया। पापा उसी विभाग में शिक्षक और मम्मी उनकी छात्रा। मैं मम्मी को छोड़ती नहीं थी, चाहे मम्मी को पढ़ने जाना हो या मीटिंग; हालाँकि हम दोनों भाई-बहन के देख-रेख के लिए दो लोग रहते थे। मैं मम्मी को बहुत ज़्यादा दिक्क़त देती थी; परन्तु मेरे सिद्धांतवादी पापा ने मम्मी को सहूलियत नहीं दी। पापा के विभागाध्यक्ष ने पापा से कहा कि मम्मी क्लास न करें और पापा घर में नोट्स दे दें। परन्तु पापा के लिए सभी छात्र एक बराबर हैं, किसी एक को सुविधा क्यों? मम्मी पढ़ने के लिए अक्सर अपनी मित्र श्रीमती लक्ष्मी गुप्ता, जिनका घर (मायका) कोतवाली चौक पर है, के घर चली जाती थीं। मम्मी ने 1971 में टी.एन.बी.लॉ.कॉलेज से बी.एल. किया। 1974 में राजकीय शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय, भागलपुर से बी.एड. और 1982 में एम.एड. किया। 

 
पापा के सहयोग से मम्मी ने मार्च 1967 में भागलपुर में गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र की स्थापना की और उसकी फाउण्डर सेक्रेटरी जिसे चीफ़ वर्कर कहते हैं, बनी। फिर 1972 में गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र के सचिव-पद से इस्तीफ़ा दे दिया। 1972 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (C P I) में शामिल हो गईं। 22 नवम्बर 1972 को बिहार महिला समाज से जुड़ी और भागलपुर शाखा की सचिव बनीं। वे बिहार महिला समाज की राज्य सचिव रहीं और छह बार भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय परिषद् की सदस्य रहीं। 
 
आनन्द मोहन सहाय, जो आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सेक्रेटरी जनरल थे और शारदा देवी वेदालंकार, जो सुन्दरवती कॉलेज की संस्थापक प्राचार्य थीं, के सहयोग से 23 दिसंबर 1975 को टी.एन.बी. कॉलेजिएट स्कूल में शिक्षक के रूप में मम्मी की बहाली हुई। उसके बाद 1988 में बिहार सेवा आयोग द्वारा प्राचार्य के पद पर नियुक्ति हुई और प्रोजेक्ट गर्ल्स हाई स्कूल धौनी, बाँका में पदस्थापित हुईं। बीच में एक साल के लिए नाथनगर गर्ल्स हाई स्कूल में पोस्टिंग हुई थी। फिर मोक्षदा बालिका इन्टर स्कूल, भागलपुर में 12.1.2004 से 31.12.2008 तक प्राचार्य रहीं और वहीं से रिटायर हुईं। मोक्षदा स्कूल के सहकर्मी श्री दयानन्द जायसवाल, जो बाद में मोक्षदा के प्राचार्य बने, के सम्पादन में 2013 में संभाव्य नाम से हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसका अनुमोदन मम्मी ने किया। 2015 में पत्रिका का नाम बदलकर 'सुसंभाव्य' किया गया ताथा मम्मी मृत्युपर्यन्त पत्रिका की संरक्षिका रहीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, महिला समाज, गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र, भारतीय जननाट्य संघ, राष्ट्र सेवा दल, परिधि, शिक्षक संघ, पेंशनर समाज, कानूनी सहायता-सुलह केन्द्र आदि ढेरों संगठनों से मम्मी आजीवन जुड़ी रहीं और 2017 तक पूर्ण सक्रिय रहीं। 

 

मम्मी को याद करने में मम्मी-पापा के विवाह की चर्चा न हो यह कैसे मुमकिन है। मम्मी-पापा की शादी बहुत अनोखी थी। पापा का घर कोठियाँ धर्मपुर  धर्मागत गाँव, जो शिवहर ज़िला (पहले मुज़फ्फ़रपुर फिर सीतामढ़ी ज़िला) मुख्यालय से लगभग 2 किलोमीटर दूर है। समीप के गाँव पुरनहिया के डुमर गाँव के किसी समृद्ध परिवार से शादी के लिए पापा पर बहुत दबाव था। यहाँ तक कि वे लोग पी-एच.डी. का ख़र्च देने को तैयार थे। सोनौल सुब्बा से सटा हुआ एक गाँव है घरबारा, जहाँ मम्मी के रिश्ते के मुनि चाचा रहते थे, जो पापा के रिश्ते में भी कुछ थे। उन्होंने मेरे मामा को शादी की बात करने भेजा। पापा ने अपने पिता और घर के किसी भी सदस्य को मामा से बात करने नहीं दिया। वे सारा दिन मामा के साथ बिताए और अपने सिद्धांत और शर्तों के बारे में स्पष्टतः बताया। पापा का परिवार परम्परावादी है, तो उन्हें आशंका थी कि घरवाले कुंडली मिलाएँगे, मुहूरत देखेंगे, पारम्परिक शादी चाहेंगे। पापा के रिश्ते में भतीजा और मम्मी के रिश्ते में भाई श्री राजकमल शिरोमणि, जो बाद में अँगरेज़ी के प्रोफ़ेसर बने, के साथ मम्मी को दरभंगा के सिनेमा हॉल में भेजा गया पापा ने मम्मी को दूर से देखा, पर मम्मी को इस बात की जानकारी नहीं दी गई। एक महीने के बाद पापा ने रजिस्ट्री चिट्ठी भेजकर मामा को बुलाकर कहा कि अगर मम्मी में मेरिट हो और वे आगे पढ़ेंगी, तो वे शादी के लिए तैयार हैं; लेकिन शादी उनके शर्त के मुताबिक़ होगी। पापा द्वारा चयनित राजनीति शास्त्र, गृहविज्ञान और अंग्रेज़ी के पाँच प्रश्नों के साथ मम्मी की परीक्षा लेने पापा की बड़ी भाभी और भाई हरिमोहन प्रसाद दरभंगा आए। मम्मी ने प्रश्नों के उत्तर उनके सामने लिखे और लिफ़ाफ़े में चिपकाकर दे दिया। मम्मी मेरिट-टेस्ट में पास हो गईं। मम्मी ख़ुश थीं कि शादी से पढ़ाई में बाधा नहीं होगी। नाना-मामा ने शादी की सभी शर्तों को मान लिया। मामा ने चुपचाप पापा की कुंडली बनवाई और कुंडली-मिलान कराया, जिसके अनुसार 36 में से 32 गुण मिल गए थे। 

विवाह के बाद की तस्वीर की पेन्टिंग
शादी की शर्तें मुख्यतः ये थीं कि मेरे दादा शादी में नहीं जाएँगे, खादी की एक साड़ी और सिन्दूर की पुड़िया पापा लेकर जाएँगे, दहेज या लेन-देन की कोई बात नहीं होगी, मायके से एक या दो से ज़्यादा गहना नहीं देना है, कपड़ा सिर्फ़ मम्मी को देना है जो खादी का हो, मम्मी को बैग भी दें तो खादी भण्डार का ही। लहेरियासराय में मम्मी की बड़ी मामी की बड़ी बहन रहती थीं। उनके घर से शादी हुई। पापा खादी का सफ़ेद धोती-कुरता-बंडी पहनकर चार दोस्तों के साथ रिक्शे पर आए। विधि के तौर पर भी उन्होंने न एक रूपया लिया, न एक कपड़ा। वहाँ के लोगों को बहुत अजीब लगा कि यह कैसा लड़का है, पर सभी संतुष्ट थे कि लड़का प्रोफ़ेसर है। विदा होते समय पापा ने घूँघट लेने से मना कर दिया। जब गाँव पहुँचने वाले थे, तो गाँव का एक लड़का सुरजिया जो बारात में गया था, मम्मी को बोला कि घूँघट कर लीजिए। घर के ठीक सामने पापा ने पुस्तकालय बनवाया था, मम्मी को लेकर सबसे पहले वे वहीं गए। फिर घर लेकर गए जहाँ दुल्हन के आने पर कोई ख़ास विधि नहीं हुई, न ही कोई ख़ास भोज। पापा की हिदायत थी कि ऐसा कुछ नहीं करना है।
सुबह मेरी दादी किशोरी देवी आईं, तो पाँव में मिट्टी सना था, मम्मी ने पैर छुए। उसी समय पापा के चचेरे बड़े भाई रामेश्वर प्रसाद आए, तो पापा के कहने पर मम्मी ने उनके भी पैर छूए। फिर तो ख़ूब हंगामा हुआ कि दुल्हिन ने भसुर (जेठ) का पैर छू लिया, जिसे पाप माना जाता है। मम्मी को यह सब बहुत अजीब लग रहा था कि पापा ऐसे क्यों कर रहे हैं। सुबह-सुबह ख़ाली पाँव, खादी का हाफ़ पैंट, खादी की गंजी पहनकर मम्मी को लेकर पापा गाँव में घूमने चल दिए। पूरे गाँव में हंगामा मच गया कि कन्हैया जी (पापा का घर का नाम) नई दुल्हिन को लेकर सरेहे-सरेहे पूरे गाँव में घूमा रहे हैं, और वह भी बिना घूँघट। मेरे दादा सूरज प्रसाद ने मम्मी से कहा कि वे सर पर आँचल रख ले, तो पापा ने मम्मी से कहा कि अगर मेरे साथ रहना है, तो मेरे साथ चलना होगा। दादा और पापा में वैचारिक मतभेद हमेशा से रहा है। पापा के अनुसार मम्मी रहने लगीं। शादी के 10 दिन बाद मम्मी के बड़े मामा की बड़ी बेटी की शादी बेगूसराय से हुई, जहाँ वे दोनों शादी के बाद पहली बार कहीं अकेले गए। फिर पापा ने मम्मी को दरभंगा पहुँचा दिया; क्योंकि पढ़ाई करनी थी।
पापा का परिवार भले ही धार्मिक और परम्परावादी था, पर पापा बचपन से ही अलग विचारधारा के थे। वे बहुत छोटी उम्र से सोच से नास्तिक, परम्पराओं के विरोधी और स्वभाव से गांधीवादी थे। हालाँकि उस उम्र में उन्हें गांधी या गांधीवाद पता भी नहीं था। पापा 11 वर्ष की उम्र में वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सोशलिस्ट पार्टी में सक्रिय होकर हिस्सा लिए और अपने चचेरे बड़े भाई लक्ष्मेश्वर प्रसाद के साथ ट्रेन की पटरी उखाड़कर बच निकले थे। छात्र जीवन में ही वे गांधीवाद के प्रबल समर्थक बने और समाजवाद से जुड़ गए। मम्मी का परिवार पूरी तरह धार्मिक और परम्परावादी था, तो मम्मी की सोच उसी अनुसार थी। मम्मी को तब न गांधीवाद पता था न नास्तिकता, पर इतना जानती थी कि पापा विद्वान हैं, जो कहते हैं वह सही होगा। शादी के बाद पहली तीज पर पापा ने स्पष्ट कह दिया कि आपको तीज नहीं करनी है। लेकिन मम्मी को ईश्वर में आस्था थी, उन्होंने छुपकर तीज किया, जिसका पता पापा को कभी नहीं चला। वर्ष 1963 में मम्मी दरभंगा से भागलपुर आईं और पूरे रास्ते पापा की हिदायतें, नियम, विचार सुनती-समझती रहीं। तब नाथनगर के कर्णगढ़ में पापा रहते थे। नाथनगर के पुरानी सराय मोहल्ले में मम्मी की चाची सुमित्रा देवी रहती थीं, जो शिक्षक थीं। वे दोनों अक्सर उनके घर चले जाते थे। 
बाएँ से मम्मी, मैं, भैया, फूफेरा भाई, दादी
वर्ष 1975 में हम सभी गाँव गए। बहुत ज़्यादा बाढ़ आ गई थी, तो मुझे और मेरे भाई को गाँव में छोड़कर पापा-मम्मी भागलपुर लौट आए। उन्हीं दिनों मम्मी बहुत बीमार हो गईं। पटना में मम्मी की चचेरी बहन प्रेमा प्रसाद (चाची सुमित्रा देवी की बेटी) जो स्कूल में शिक्षक थीं तथा उनके पति गोपाल प्रसाद सी.आई.डी. में कार्यरत थे, रहते थे। मम्मी के बीमार होने की सूचना पाकर मौसा उनको पटना ले गए। थोड़ी स्वस्थ होने के बाद मम्मी भागलपुर आईं और अपने बड़े मामा की बड़ी बेटी श्रीमती रेणुका सिन्हा, जिनके पति गौर किशोर प्रसाद उस समय रेलवे मजिस्ट्रेट थे और स्टेशन परिसर में रहते थे, के पास रहने चली गईं। हमलोग बाढ़ के कारण भागलपुर लौट नहीं सके, तो हम दोनों भाई-बहन दादी के पास रहकर गाँव में पढ़ने लगे।
 
जून 1976 में मम्मी फिर से बीमार हुईं। पापा उन दिनों गाँव आए हुए थे। मौसी सपरिवार बाहर गई थीं। डॉ. क्वाड्रेस जो उस समय की मशहूर डॉक्टर थीं, ने एक दिन भी देर करने से मना कर दिया और यूट्रेस रिमूवल के ऑपरेशन का टाइम दे दिया। मम्मी अस्पताल में भर्ती हुईं। वे उस समय अकेली थीं, तो उन्होंने छुपकर बाहर जाकर ऑपरेशन के सामान ख़रीदे, सबको टेलीग्राम किया। पापा किसी काम से शिवहर गए, तो टेलीग्राम मिला। पापा वहीं से चले गए, किसी के द्वारा हमलोग को ख़बर भेज दिया कि वे भागलपुर जा रहे हैं। मम्मी तब तक अस्पताल से मौसी के घर आ चुकी थीं। हमारी वार्षिक परीक्षा के बाद मम्मी गाँव आईं और मुझे लेकर भागलपुर आ गईं, भैया को गाँव में ही रहकर पढ़ने को पापा ने कहा था। 
 
वर्ष 1977 की गर्मी के दिनों में पापा बीमार हो गए। उन्हें जॉन्डिस हुआ, जो बाद में लिवर सिरोसिस हो गया। स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता किशोरी प्रसन्न सिंह, जिन्हें हम सभी किशोरी भाई कहते हैं, पापा-मम्मी को बहुत मानते थे। किशोरी भाई ने अपनी पत्नी के नाम पर हाजीपुर में सुनीति आश्रम बनाया था, वहाँ उन्होंने पापा-मम्मी को आकर रहने के लिए कहा। मैं भी साथ गई। एक महीना हमलोग आश्रम में किशोरी भाई के साथ रहे। पापा की तबीयत में कोई सुधार न हुआ। फिर वे दिल्ली के एम्स में एक माह भर्ती रहे। अंततः 18 जुलाई 1978 को पापा सदा के लिए चले गए। मम्मी पूरी तरह से टूट गईं। उनकी उम्र उस समय 33 वर्ष की थीं। मानसिक, आर्थिक, सामाजिक परेशानियों से एक साथ घिर गईं। संघर्ष का दौर शुरू हो चुका था। मेरा भाई अमिताभ सत्यम् चूँकि पढ़ाई में तीक्ष्ण था, अतः गाँव के उसके विद्यालय के शिक्षकों के आग्रह पर वह गाँव में रहकर मैट्रिक किया। फिर वह आई.आई.टी. कानपुर और स्कालरशिप पर अमेरिका चला गया। धीरे-धीरे हम सभी की ज़िन्दगी समय के साथ अपनी-अपनी पटरी पर चल पड़ी। 
समय ने मम्मी को बहुत छला है। अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व से पापा काफ़ी बदल गए थे। मेरी शादी और भाई की पढ़ाई की बात मम्मी-पापा अक्सर करते थे। एक दिन पापा मुझे और मम्मी को लेकर बाज़ार गए और मम्मी के लिए बहुत ख़ूबसूरत शिफॉन की दो साड़ी ख़रीदे। फिर हमलोग कचौड़ी गली गए और वहाँ नाश्ता किए। वे घर के काम की सहूलियत के लिए कैरो गैस, प्रेशर कूकर, लोहे का आलमीरा ख़रीदे। मैं सोचती थी कि आज दलिया की जगह रोटी-तरकारी या चूड़ा-घुघनी हम खा रहे हैं और पापा कुछ नहीं बोले। शुरू से ही हमारे यहाँ हर महीने भोज ज़रूर होता था जिसमें पूरी, तरकारी, भुजिया, पुलाव, खीर इत्यादि बनता था। लेकिन सामान्य दिनों में हमलोग दलिया-दही या घी और भात-दाल तरकारी खाते थे। सूती, ऊनी या सिल्क हो, पर खादी के अलावा और कोई कपड़ा हमारे यहाँ नहीं आता था, सिवा हमलोगों के स्कूल यूनिफॉर्म को छोड़कर। मम्मी को भी अब खादी बहुत पसन्द आ गया था। 

मम्मी के मेहनत से बने मकान में फूल और मम्मी 
पापा को घूमने का बहुत शौक था और वे अलग-अलग ट्रिप में सबको घूमाते थे। कभी सिर्फ़ मम्मी को लेकर गए, कभी नाना, नानी, मम्मी को लेकर गए, कभी दादी, दादी की माँ और हम भाई-बहन को लेकर गए, तो कभी सिर्फ़ भैया को लेकर गए। सबसे कम मैं ही घूमी हूँ पापा के साथ। परन्तु मम्मी के साथ मैं शुरू से लगभग हर जगह जाती थी। चाहे कोई मीटिंग हो या कॉन्फ्रेंस या धरना-प्रदर्शन। पापा को फोटो खींचने और ख़ुद साफ़ करने का शौक था। वर्ष 1967 में हमलोग नया बाज़ार के यमुना कोठी में किराए पर आ गए, जहाँ 2009 तक मम्मी रहीं। वह घर बहुत बड़ा और बरामदा भी बहुत लम्बा-चौड़ा था। पापा ने मम्मी की तस्वीरें, जो वे ख़ुद खींचकर साफ़ करते थे, को बड़ा कराके फ़्रेम कराया और सभी कमरे और बरामदा में टाँग दिया। चारों तरफ़ सिर्फ़ मम्मी-ही-मम्मी। कुछ तस्वीरें गांधी जी और स्वतंत्रता सेनानियों की भी थीं
पापा की अपनी एक भी तस्वीर नहीं थी। मम्मी को लगभग पूरा भारत पापा ने घुमाया। भैया ने मम्मी को दो बार अमेरिका घुमाया। मम्मी के जितने भी शौक थे सभी पूरे हुए, सिर्फ़ लंदन जाना रह गया, जो बीमारी के कारण न हो सका। भागलपुर में अपना मकान जिसमें सामने गार्डन हो, जिसमें ख़ूब सारे फूल हों, मम्मी की यह कामना भी पूरी हुई। बहुत कम समय तक मम्मी स्वस्थ होकर अपने घर का आनन्द उठा सकी, इस बात का बहुत दुःख है मुझे। पर ख़ुशी है कि जितना भी समय स्वस्थ होकर वहाँ रही, बहुत ख़ुश रही। 
2004

मम्मी पूरी तरह गांधीवादी, साम्यवादी, समाज सेविका, शिक्षिका, प्राचार्या बन गई थीं। उन्होंने यह सब अपने विचार, मेहनत और हिम्मत से किया। पापा भी यही चाहते थे कि कोई भी विचार मम्मी ख़ुद समझें और मन से अपनाएँ। मम्मी अपने आगे बढ़ने और शिक्षित होने का सारा श्रेय पापा को देती हैं, अन्यथा इस मुक़ाम तक नहीं पहुँचती। मम्मी बताती थीं कि गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र में पहली बार जब भाषण देना था, मम्मी डर से थर-थर काँप रही थी। पापा ने भाषण लिखा और मम्मी के पीछे खड़े होकर बोलते गए, मम्मी दुहराती गई। धीरे-धीरे मम्मी इतनी सक्षम हो गई कि एक बार मंच पर गई तो किसी भी मुद्दे पर बिना रुके घंटो बोल सकती थीं। 

अन्तिम छह माह पापा का बहुत ख़राब बीता था। मम्मी या अन्य कोई नहीं समझ सका कि पापा को लिवर सिरोसिस है, जो ठीक नहीं होगा। डॉक्टर को भी आश्चर्य होता था कि जो चाय तक नहीं पीता है उसका लिवर कैसे इतना ख़राब हुआ। पापा और हम सभी पूर्ण रूप से शाकाहारी थे और प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार स्वास्थप्रद खाना खाते थे। अन्तिम दिनों में मम्मी से वह सब खाना बनवाने लगे जो पापा कभी नहीं खाते थे। जब उनकी तबीयत बहुत ख़राब रहने लगी, तो मम्मी की ज़िद पर एलोपैथ के डॉ. पवन कुमार अग्रवाल, जो नया बाज़ार में रहते थे और मौसा के घनिष्ट मित्र थे, को दिखाने लगे। लेकिन पापा की बीमारी इतनी बढ़ गई थी कि किसी भी पैथी से ठीक होना नामुमकिन हो गया। मम्मी में सभी बदलाव आए लेकिन पूर्णतः नास्तिक नहीं बन पाई। वह शिव की पूजा करती रहीं। लेकिन न भगवान् शिव न कोई डॉक्टर पापा को बचा सके। अब मम्मी का सामजिक प्रताड़ना के साथ आर्थिक और मानसिक कष्ट का समय आ गया था। 
जवान विधवा के साथ समाज का रवैया बहुत ग़लत होता है, मम्मी को आजीवन इसका सामना करना पड़ा। हाँ! यह ज़रूर है कि कुछ रिश्तेदारों, मित्रों, सहकर्मियों ने मम्मी की बहुत मदद की। मेरी दादी तो मम्मी की सास से माँ बन गईं और 102 साल की आयु में अपनी मृत्यु तक मम्मी को हर तरह से सहारा देती रहीं। समाज का घिनौना चरित्र समय के साथ मम्मी भले भूल गईं और लोगों को माफ़ किया; लेकिन मुझे सब याद है कि किसने मम्मी को क्या कहा, किसने अपमान किया, किसने रुलाया। मुझे हर एक घटना याद है, जिसने मेरे या मम्मी के जीवन को बहुत प्रभावित किया है। पापा का न होना शुरू के एक-दो साल बहुत अखरा था; लेकिन मम्मी साथ थीं, तो सब सामान्य हो गया। विवाहोपरान्त पापा का न होना मेरे लिए बहुत कष्टदायक रहा। मम्मी का जीवन जिन लोगों ने कष्टप्रद बनाया है, मैं आश्वस्त हूँ कि अपने इसी जन्म में उनके कर्म का फल देखूँगी। कर्म का फल मिलना किसी भगवान का नियम नहीं बल्कि प्रकृति का नियम है और यह तय है। 
मम्मी के लिए मैं कुछ नहीं कर सकी, यह टीस मुझे झकझोरती है। मेरे कारण मम्मी ने बहुत अपमान सहा है, यह बात मैं भूल नहीं सकती। मम्मी चुप होकर, दबकर सब कुछ सहन करती रहीं। जब भी मैं दुःखी होती तो मम्मी मुझसे कहतीं- "चिन्ता नहीं करो, हम हैं न!" देह से लाचार थीं; लेकिन मुझमें जीने की हिम्मत बढ़ाती रहती थीं। अब मैं क्या करूँ? अपनी पीड़ा किससे साझा करूँ? मम्मी की मृत्यु के बाद से मैं निडर हो गई हूँ। मेरे पास अब खोने को कुछ नहीं रहा। सभी रिश्ते-नाते अपने-अपने जीवन में व्यस्त हैं, मेरी परवाह करने वाली सिर्फ़ मम्मी थीं, जो अब नहीं हैं। मुझे महसूस होता है मानो मरकर मम्मी मुझमें समा गईं और मुझे बेख़ौफ़ बना गईं हैं। 

आज मम्मी को पंचतत्व में विलीन हुए एक साल हो गए हैं। आज बहुत दुःखी हूँ, मम्मी नहीं हैं और मैं उन पर लिख रही हूँ। वे अब न पढ़ सकेंगी न उनके प्रति मेरे विचार को शब्द रूप में देख पाएँगी। यह जगत् और वह जगत् बहुत रहस्यमय है दार्शनिकों को पढ़ती हूँ, समझने का प्रयास करती हूँ; लेकिन मेरी समझ से परे है। मम्मी! अगर तुम मुझे देख सकती हो, सुन सकती हो, समझ सकती हो, तो मेरे मन की अवस्था समझना। अब चारों तरफ़ एक सन्नाटा है, जिसमें तुम्हारी बेटी हँसते-हँसते धीरे-धीरे गुम हो रही है। 
 
मैं तुमसे सदैव कहती थी- "हमसे पहले तुम इस संसार से नहीं जाना, तुम्हारे सिवा कोई नहीं, जो हमको समझता हो।" तुम मेरी इस बात पर कितना ग़ुस्सा होती थी "तुम मर जाओगी और हम ज़िन्दा रहेंगे!" हमको छोड़कर तुम चली ही गई मम्मी, मैं अनाथ हो गई। कहने को तो हज़ारों रिश्ते हैं, जिन्हें मैं जी रही हूँ, निभा रही हूँ, लेकिन मेरा वजूद किसी के लिए ज़रूरी नहीं; यह तुमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता है। जानती हूँ मृत्यु के बाद सारे बन्धन मिट जाते हैं, फिर भी चाहती हूँ कि जिस संसार में अब तुम हो वहाँ बहुत ख़ुश रहना और अगर दूसरा जन्म हो, तो ऐसे परिवेश में हो जहाँ सबको बराबर का अधिकार हो।
 

एक अच्छे दिन में मम्मी इस संसार से विदा हुई, जिस दिन महात्मा गांधी ने शहादत दी। आज महात्मा गांधी की 74वीं पुण्यतिथि है और मम्मी की पहली पुण्यतिथि। महात्मा गांधी को हार्दिक नमन! इस आलेख के द्वारा मम्मी को श्रद्धांजलि! 
अंतिम स्पर्श / दाह-संस्कार से पूर्व 
-जेन्नी शबनम (30.1.2022)
(मम्मी की प्रथम पुण्यतिथि)
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Thursday, September 2, 2021

91. माँ का दुलारा, बन गया आसमाँ का तारा : सिद्धार्थ शुक्ला

सिद्धार्थ शुक्ला (12.12.1980 - 2.9.2021) 
मृत्यु का जन्म से बस एक नाता है- जन्म लेते ही मृत्यु अवश्यम्भावी है उम्र के साल की गिनती, धन, सम्मान, शोहरत, जाति, धर्म आदि किसी से भी मृत्यु का कोई लेना-देना नहीं जिस ज़िन्दगी को पाने के लिए न जाने क्या-क्या नहीं करते, उसके ख़त्म होने में महज़ एक क्षण लगता है पलभर में साँसें बंद जीवन समाप्त! मृत्यु के सामने हम बेबस और किंकर्त्तव्य-विमूढ़ हो जाते हैं यों तो हर पल हज़ारों लोग मृत्यु की गोद में समाते हैं, पर सभी के लिए दुःख नहीं होता है अगर होता, तो जीवन जीना असम्भव हो जाता; क्योंकि हर क्षण कोई-न-कोई मृत्यु को प्राप्त होता है दुःख उनके लिए होता है, जब कोई अपना संसार छोड़ जाता है दुःख उनके लिए होता है, जब किसी की मृत्यु असमय हो जाती है दुःख उनकी मृत्यु पर होता है, जिनसे हम बहुत प्यार करते हैं, जिनके सम्पर्क में हम होते हैं या पहचान होती है, जिनसे भले हम न मिले हों; लेकिन वे हमारे मन के क़रीब होते हैं, जिन्हें हम पसन्द करते हैं 
आज मन को फिर से आघात लगा, जैसे ही मालूम हुआ कि युवा अभिनेता और कलाकार सिद्धार्थ शुक्ला नहीं रहे एक और ज़मीं का सितारा, माँ का दुलारा, लाखों का प्यारा, बन गया आसमाँ का तारा पिछले साल इरफ़ान और सुशांत के जाने पर ऐसी ही अनुभूति हुई थी फिर भी मेरे मन में यह बात थी कि इरफ़ान ने जीवन के हर रूप को जिया है और एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त थे, जिससे वे समझते होंगे कि ज़्यादा दिन नहीं रहेंगे सुशांत तो उम्र में छोटा था, सब कुछ अधूरा-अधूरा भले शोहरत और सम्मान ख़ूब मिला, मगर जाने क्यों जीवन पसन्द नहीं आया और मृत्यु को स्वीकार किया उसने जानबूझकर जीवन का अंत किया या उसकी हत्या हुई कहना कठिन हैसिद्धार्थ शुक्ला तो महज़ 40 वर्ष का था, ज़िन्दगी और ज़िन्दादिली से भरपूरकितने सपने देखे होंगे उसने उसका जीवन अभी अधूरा था माँ का इकलौता बेटा, जिसपर माँ का दायित्व था क्या बीत रही होगी उस माँ पर, सोचकर मन काँप उठता है

मैं टी.वी. नहीं देखती हूँ, भले सामने टी.वी. चल रहा हो हाँ, फ़िल्में बहुत देखती हूँ एक दिन घर के लोग टी.वी. देख रहे थे, 'झलक दिखला जा' में सिद्धार्थ का डांस चल रहा था एक झलक मैंने देखा, बड़ा अच्छा लगा मुझे सिद्धार्थ फिर दो-तीन एपिसोड देखे मैंने एक दिन टी.वी. पर 'बालिका वधू' का कोई एपिसोड चल रहा था, जिसमें सिद्धार्थ कलेक्टर और बालिका वधू का पति है तथा सुरेखा सीकरी बालिका वधू की 'दादी सा' हैं सिद्धार्थ को देखकर मैं बोली- ''अरे यह तो झलक दिखला जा वाला डांसर है।'' मैं उसे देखने के लिए बैठ गई दादी सा के बोलने के निराले अंदाज़ तथा सिद्धार्थ को गम्भीर और प्यार करने वाले पति की मोहक भूमिका में देख मैंने पूरा एपिसोड ही नहीं, बल्कि सीरियल के कुछ पुराने एपिसोड भी देखे सुरेखा सीकरी और सिद्धार्थ की अदाकारी बस कमाल है सीरियल की कहानी अच्छी नहीं लग रही थी, बावज़ूद मैंने उस सीरियल को अंत तक देखासिद्धार्थ का व्यक्तित्व इस सीरियल में बेहद आकर्षक, गम्भीर और संतुलित है

मेरे समय के अभिनेताओं में सलमान खान और शाहरुख खान मेरे सबसे पसन्दीदा हैं एक दिन टी.वी. पर बिग बॉस आ रहा था, जिसे सलमान ने होस्ट किया है उस दिन से बिग बॉस का लगभग सभी सीजन मैंने देखा 2019 का बिग बॉस का पूरा सीजन मैंने देखा जब कभी कोई एपिसोड छूट जाए, तो वूट पर जाकर ज़रूर देखती थी। भले यह शो विवादित है, मगर इस शो को देखना मुझे बेहद पसन्द है इस शो में वास्तविक सिद्धार्थ को हमने देखा है- उसका प्यार, ग़ुस्सा, चिड़चिड़ापन, अदाकारी, बचपना, समझदारी, दोस्ती, आक्रोश सब कुछ हमने खिलखिलाते सिद्धार्थ को देखा, तो बीमार सिद्धार्थ को भी देखा उसकी लड़ाई जितनी तगड़ी थी, रूठना-मनाना उतना ही सरल सिद्धार्थ के रहने का तरीक़ा बिल्कुल बच्चों जैसा है और जीने का तरीक़ा बहुत ही सहज हर तरफ़ कैमरा है, इसके बावजूद वह सामान्य रह रहा था न कोई दिखावा न कोई बनावटीपन जैसा है तो बस है सिद्धार्थ और शहनाज़ की जोड़ी बहुत प्यारी थी पूरे सीजन में मैं चाहती थी कि सिद्धार्थ विजयी हो, और वह हुआ
 
'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' फ़िल्म में सिद्धार्थ को हम देख चुके हैं अभी बहुत सी फ़िल्में आनी थीं हीरो बनने के सारे टैलेंट उसमें थे बहुत सारे पुरस्कार और सम्मान उसे मिले हैं, अभी न जाने कितने और मिलते टी.वी. का एक बेहतरीन कलाकार, मॉडल, ख़ूबसूरत व्यक्तित्व का स्वामी, शारीरिक रूप से चुस्त व बलशाली युवा अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला के न जाने कितने सपने रहे होंगे सिद्धार्थ की माँ के ढेरों सपने रहे होंगे सब कुछ ख़त्म हो गयासिद्धार्थ के घरवालों को सिद्धार्थ की यादों के साथ जीने की हिम्मत मिले यही कामना कर सकती हूँ 

तक़दीर में किसके पास कितनी साँसें हैं, काश! कोई जान पाता, तो तय वक़्त के मुताबिक़ सपने देखता और पूरे करता मृत्यु तो तय है; लेकिन अधूरी कामनाओं के साथ किसी का असमय गुज़र जाना, उसके अपनों के लिए पीड़ा यों है मानो दुःख के पानी से भरा घड़ा, जिसे जितना पीते जाएँगे वह भरता जाएगा दुःख लहू में दौड़ेगा, नसों में पसरेगा, आँखों से बरसेगासमय का कितना भी बड़ा पहर या कई युग बीत जाए, न घड़ा ख़ाली होगा न दुःख विस्मृत होगा सिद्धार्थ! तुमने वह दुःख का घड़ा सभी को देकर अलविदा कह दिया यों क्यों गए सिद्धार्थ? अलविदा सिद्धार्थ! 

-जेन्नी शबनम (2.9.2021) 
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