Friday, March 8, 2013

43. हद से बेहद तक

अक्सर सोचती हूँ कि स्त्रियों के पास इतना हौसला कैसे होता है, कहाँ से आती है इतनी ताक़त कि हार-हारकर भी उठ जाती हैं फिर से दुनिया का सामना करने के लिए। अजीब विडम्बना है स्त्री-जीवन; न जीवन जीते बनता है न जीवन से भागते। स्त्री जानती है कि उसकी जीत उसके अपने भी बर्दाश्त नहीं करते और उसे अपने अधीन करने के सभी निरर्थक और क्रूर उपाय करते हैं; शायद इस कारण स्त्रियाँ जान-बूझकर हारती हैं। एक नहीं कई उदाहरण हैं जब किसी सक्षम स्त्री ने अक्षम पुरुष के साथ रहना स्वीकार किया, महज़ इसलिए कि उसके पास कोई विकल्प नहीं था। पुरुष के बिना स्त्री को हमारा समाज सहज स्वीकार नहीं करता है। किसी कारण विवाह न हो पाए, तो लड़की में हज़ारों कमियाँ बता दी जाती हैं, जिनके कारण किसी पुरुष ने उसे नहीं अपनाया। दहेज और सुन्दरता विवाह के रास्ते की रुकावट भले हो, लेकिन ख़ामी सदैव लड़की में ढूँढी जाती है। पति की मृत्यु हो जाए, तो कहा जाता है कि स्त्री के पिछले जन्म के कर्मों की सज़ा है। तलाक़शुदा या परित्यक्ता हो, तो मान लिया जाता है कि दोष स्त्री का रहा होगा।  
 
भ्रूण हत्या, बलात्कार, एसिड हमला, जबरन विवाह, दहेज के लिए अत्याचार, आत्महत्या के लिए विवश करना, कार्यस्थल पर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न, घर के भीतर शारीरिक और मानसिक शोषण, सामाजिक विसंगतियाँ आदि स्त्री-जीवन का सच है। स्त्री जाए तो कहाँ जाए, इन सबसे बचकर या भागकर। न जन्म लेने का पूर्ण अधिकार, न जीवन जीने में सहूलियत और न इच्छा-मृत्यु के लिए प्रावधान क्या करे स्त्री? जन्म, जीवन और मृत्यु स्त्री के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिए गए हैं। 

शिक्षित समाज हो या अशिक्षित, निम्न आर्थिक वर्ग हो या उच्च, स्त्रियों की स्थिति अमूमन एक जैसी है। अशिक्षित निम्न समाज में फिर भी स्त्री जन्म से उपयोगी मानी जाती है, अतः भ्रूण-हत्या की सम्भावना कम है। तीन-चार साल की बच्ची अपने छोटे भाई-बहनों की देख-रेख में माँ की मदद करती है तथा घर के छोटे-मोटे काम करना शुरू कर देती है। अतः उसके जन्म पर ज़्यादा आपत्ति नहीं है, बस इतना है कि कम-से-कम एक पुत्र ज़रूर हो। 

मध्यम आर्थिक वर्ग के घरों में स्त्रियों की स्थिति सबसे ज़्यादा नाज़ुक है। वंश परम्परा हो या दहेज के लिए रक़म की कमी; दोष स्त्री का और सज़ा स्त्री को। कई बार यों लगता है जैसे पति के घर में स्त्री की स्थिति बँधुआ मज़दूर की है तमाम ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए भी स्त्री फ़ुज़ूल समझी जाती है, अप्रत्यक्ष आर्थिक उपार्जन करते हुए भी बेकार मानी जाती है। न वह अपने अधिकार की माँग कर सकती है, न उसके पास पलायन का कोई विकल्प है। सुहागन स्वर्ग जाना और जिस घर में डोली आई है अर्थी भी वहीं से उठनी है; इसी सोच से जीवन यापन और यही है स्त्री-जीवन का अन्तिम लक्ष्य।  

उच्च आर्थिक वर्ग में स्त्रियों की स्थिति ऐसी है जिसका सहज आकलन करना बेहद कठिन है। सामाजिक मानदण्डों के कारण जब तक असह्य न हो, गम्भीर परिस्थितियों में भी स्त्रियाँ मुस्कुराती हुई मिलेंगी और अपनी तक़लीफ़ छुपाने के लिए हर मुमकिन प्रयास करेंगी। समाज में सम्मान बनाए रखना सबसे बड़ा सवाल होता है। अतः अपने अधिकार के लिए सचेत होते हुए भी स्त्रियाँ अक्सर ख़ामोशी ओढ़कर रहती हैं अत्यन्त गम्भीर परिस्थिति हो, तो स्वयं को इससे निकाल भी लेती हैं। यहाँ दहेज अत्याचार और भ्रूण-हत्या की समस्या नहीं होती, लेकिन अन्य समस्याएँ सभी स्त्रियों के समान हैं। इन घरों में स्त्रियों को आर्थिक व शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक तक़लीफ़ ज़्यादा रहती है। अगर स्त्री स्वावलंबी हो तो सबसे बड़ा मुद्दा अहंकार और भरोसा होता है। स्त्री को अपने बराबर देखकर पुरुष के अहम् को चोट लगती है, जिससे आपसी सम्बन्ध में ईर्ष्या-द्वेष समा जाता है एक दूसरे को सन्देह व विरोधी के रूप में देखने लगते हैं। इस रंजिश से भरोसा टूटता है और रिश्ता महज़ औपचारिक बनकर रह जाता है। फलतः मानसिक तनाव और अलगाव की स्थिति आती है। कई बार इसका अंत आत्महत्या पर भी होता है।  

स्त्रियाँ अपनी परिस्थितियों के लिए सदैव दूसरों को दोष देती हैं; यह सच भी है, परन्तु इससे समस्या से नजात नहीं मिलती। कई बार स्त्री ख़ुद अपनी परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार होती है। स्त्रियों की कमज़ोरी उनके घर और बच्चे होते हैं, जो उनके जीने की वज़ह हैं और त्रासदी का कारण भी। स्त्री की ग़ुलामी का बड़ा कारण स्त्री की अपनी कमज़ोरी है। पुरुष को पता है कि कहाँ-कहाँ कोई स्त्री कमज़ोर पड़ सकती है और कैसे-कैसे उसे कमज़ोर किया जा सकता है। सम्पत्ति, चरित्र, मायका, गहना-ज़ेवर आदि ऐसे औज़ार हैं जिसका समय-समय पर प्रयोग अपने हित के लिए पुरुष करता है। पुरुष के इस शातिरपना से स्त्रियाँ अनभिज्ञ नहीं हैं, पर अनभिज्ञ होने का स्वाँग करती हैं, ताकि उनका जीवन सुचारू रूप से चले व घर बचा रहे। 

एक अनकही उद्घोषणा है कि पुरुष के पीछे-पीछे चलना स्त्री का स्त्रैण गुण और दायित्व है, जबकि पुरुष का अपने दम्भ के साथ जीना पुरुषोचित गुण और अधिकार। स्त्रियों को सदैव सन्देह के घेरे में खड़ा रखा जाता है और चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं, ताकि स्त्री का मनोबल गिरा रहे और पुरुष इसका लाभ लेते हुए अपनी मनमानी कर सके। स्त्री अपने को साबित करते-करते आत्मग्लानि की शिकार हो जाती है। हमारे अपने हमसे खो न जाएँ स्त्री इससे डरती है, जबकि पुरुष यह सोचते हैं कि स्त्रियाँ उनसे डरती हैं। स्त्री का यह डर पुरुष का हथियार है जिससे वह जब-न-तब वार करता रहता है।

निःसंदेह स्त्रियाँ शिक्षित हों, तो आत्विश्वास स्वतः आ जाता है और हर परिस्थिति का सामना करने का हौसला भी। वे स्वावलम्बी होकर जीवन को प्रवाहमय बना सकती हैं। जीवन के प्रति उनकी सोच आशावादी होती है, जो हर परिस्थिति में संयमित बनाता है। वे विवेकशील होकर निर्णय कर सकती हैं। विस्फोटक स्थिति का सामना सहजता से कर अपने लिए अलग राह भी चुन सकती हैं। वे अपने अधिकार और कर्तव्य के बारे में जागरूक होती हैं। वे अकेली माँ की भूमिका भी बख़ूबी निभाती हैं। समाज का कटाक्ष दुःख भले पहुँचाता है पर तोड़ता नहीं, अतः वह सारे विकल्पों पर विचार कर स्वयं के लिऐ सही चुनाव कर सकती हैं।

स्त्रियों को पुरुषों से कोई द्वेष नहीं होता है। वे महज़ अपना अधिकार चाहती हैं, सदियों से ख़ुद पर किए गए अत्याचार का बदला नहीं। स्त्री के अस्तित्व के लिए पुरुष जितना ज़रूरी है, पुरुष के अस्तित्व के लिए उतनी ही ज़रूरी स्त्री है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं; यह बात अगर समझ ली जाए और मान ली जाए तो इस संसार से सुन्दर और कोई स्थान नहीं है।

आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं
 
***

तुम कहते हो-
''अपनी क़ैद से आज़ाद हो जाओ
।''
बँधे हाथ मेरे, सींखचे कैसे तोडूँ?
जानती हूँ 
उनके साथ मुझमें भी ज़ंग लग रहा है
पर अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद
एक हाथ भी आज़ाद नहीं करा पाती हूँ

कहते ही रहते हो तुम
अपनी हाथों से काट क्यों नहीं देते मेरी जंज़ीर?
शायद डरते हो
बेड़ियों ने मेरे हाथ मज़बूत न कर दिए हों
या फिर कहीं तुम्हारी अधीनता अस्वीकार न कर दूँ
या कहीं ऐसा न हो
मैं बचाव में अपने हाथ तुम्हारे ख़िलाफ़ उठा लूँ

मेरे साथी!
डरो नहीं तुम
मैं महज़ आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं
किस-किस से लूँगी बदला
सभी तो मेरे ही अंश हैं
मेरे ही द्वारा सृजित मेरे अपने अंग हैं
तुम बस मेरा एक हाथ खोल दो
दूसरा मैं ख़ुद छुड़ा लूँगी
अपनी बेड़ियों का बदला नहीं चाहती
मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद जीना चाहती हूँ

तुम मेरा एक हाथ भी छुड़ा नहीं सकते
तो फिर आज़ादी की बातें क्यों करते हो?
कोई आश्वासन न दो, न सहानुभूति दिखाओ
आज़ादी की बात दोहराकर
प्रगतिशील होने का ढोंग करते हो
अपनी खोखली बातों के साथ
मुझसे सिर्फ़ छल करते हो
इस भ्रम में न रहो कि मैं तुम्हें नहीं जानती हूँ
तुम्हारा मुखौटा मैं भी पहचानती हूँ

मैं इन्तिज़ार करूँगी उस हाथ का 
जो मेरा एक हाथ आज़ाद करा दे 
इन्तिज़ार करूँगी उस मन का 
जो मुझे मेरी विवशता बताए बिना साथ चले 
इन्तिज़ार करूँगी उस वक़्त का
जब जंज़ीर कमज़ोर पड़े और मैं अकेली उसे तोड़ दूँ

जानती हूँ, कई युग और लगेंगे
थकी हूँ, पर हारी नहीं
तुम जैसों के आगे विनती करने से अच्छा है
मैं वक़्त और उस हाथ का इन्तिज़ार करूँ
-0-

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर तमाम महिलाओं और पुरुषों को बधाई!

-जेन्नी शबनम (8.3.2013)
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Monday, January 21, 2013

42. दामिनियों के दर्द से कराहता देश

वह मुक्त हो गई। इस समाज, देश, संसार से उसका चला जाना ही उचित था। मगर दुःखद पहलू यह है कि उसे प्रतिघात का न मौक़ा मिला, न पलटवार करने के लिए जीवन। उसे अलविदा होना ही पड़ा। अब एक ऐसी अनजान दुनिया में वह चली गई, जहाँ उसे न कोई छू सकेगा, न उसे दर्द दे सकेगा। न कोई ख़ौफ़, न कोई अनुभूति हार-जीत से परे, दुःख-दर्द की दुनिया से दूर जाने कहाँ गई? किस लोक? स्वर्ग, नरक या कोई और लोक जो मृतात्माओं का प्रतीक्षालय है; जहाँ मृतात्माएँ अपने पूर्व जन्म के अत्याचार का बदला लेने के लिए पुनर्जन्म को तत्पर रहती हैं। 

इस संवेदनशून्य दुनिया से उसने पलायन नहीं किया; बल्कि अपनी शक्ति से दमभर लड़ती रही। भले ही जंग हार गई, पर हौसला नहीं टूटा। वह बहादूर थी। वह चाहती थी कि जीवित रहे और उन वहशी दरिन्दों का अंत अपनी आँखों से देखे। वह अवश्य जानती रही होगी कि वह अकेली स्त्री नहीं है, जिसके साथ ऐसा घिनौना, क्रूरतम, पाशविक, अत्याचार हुआ है। देश के सभी हिस्सों में रोज़-रोज़ घटने वाली ऐसी घटनाओं की ख़बर हर दिन उसे भी विचलित किया करती थी। पर उसने यह कहाँ सोचा होगा कि देश की राजधानी के उस हिस्से में उसके साथ ऐसा होगा, जो बेहद व्यस्ततम और मुख्य मार्ग पर है और तब जबकि वह अकेले नहीं किसी पुरुष के साथ है। उसने कहाँ सोचा होगा कि यातायात के सबसे सुरक्षित साधन 'बस' में उसके साथ ऐसा होगा। 
 
उस वक़्त सिर्फ़ एक लड़की का बलात्कार नहीं हुआ; बल्कि समस्त स्त्री जाति के साथ बलात्कार हुआ। उस वक़्त सिर्फ़ उसका पुरुष साथी बेबस और घायल नहीं हुआ; बल्कि समस्त मानवता बेबस और घायल हुई। हर एक आह के साथ इंसानियत पर से भरोसा टूटता रहा। भीड़ का कोलाहल उनकी चीख को अपने दामन में समेटकर न सिर्फ़ अनजान बना रहा; बल्कि अपना हिस्सा बनाकर हैवानियत को अंजाम देता रहा। क्षत-विक्षत तन-मन जिसमें कराहने की ताक़त भी न बची, बेजान वस्तुओं की तरह फेंक दिए गए। एक और कलंक दिल्ली के नाम। आख़िर वक़्त शर्मिन्दा हुआ और उसका सामना न कर सका, उसे दूसरे वतन में जाकर मरना पड़ा। एक बार फिर किसी को स्त्री होने की सज़ा मिली और समस्त स्त्री जाति ख़ुद को अपने ही बदन में समेट लेने को विवश हुई। 

अगर उसका जीवन बच जाता, तो क्या वह सामान्य जीवन जी पाती? क्या सब भूल पाती? मुमकिन है शारीरिक पीड़ा समय के साथ कम हो जाए, लेकिन मानसिक पीड़ा से वह आजीवन तड़पती। क्या वह आत्मविश्वास वापस आ पाता, जिसे लेकर अपने गाँव से राजधानी पहुँची थी? उसने भी तो पढ़ा और सुना होगा कि ऐसी घटनाओं के बाद इसी समाज की न जाने कितनी लड़कियों ने आत्महत्या की है। क्या वह भी आत्महत्या कर लेती? क्या पता इतनी यातना सहने के बाद जीवन में और संघर्ष सहन करने की क्षमता न बचती। जीवनभर लोगों की दया की पात्र बनकर जीना होता। क्या मालूम उसकी मनःस्थिति कैसी होती? क्या वह इस दुनिया को कभी माफ़ कर पाती? क्या ईश्वर को कटघरे में खड़ा नहीं करती, जिसने ऐसे संसार की रचना की और ऐसे पुरुष बनाए।   

न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि देश के सभी हिस्सों में स्त्री की स्थिति लगभग एक-सी है। सामाजिक हालात के कारण सभी स्त्रियाँ अँधेरे में अकेले चलने से डरती हैं; सम्भव हो तो किसी को साथ लेकर ही चलती हैं। सभी जानते हैं कि एक अकेला पुरुष भीड़ से नहीं लड़ सकता, फिर भी पुरुष के साथ होने पर अपराध की सम्भावना कम हो जाती है; भले साथ चलने वाला पुरुष छोटा बच्चा ही क्यों न हो। 
 
अक्सर किसी और के साथ होने वाली दुर्घटना के बाद हम सोचते हैं कि हम बच गए और आशंकित रहते हैं कि कहीं हमारे साथ या हमारे अपनों के साथ कोई दुःखद घटना न घट जाए। किसी भी परिस्थिति का आकलन कर उसे समझना और उस परिस्थिति में ख़ुद होना बिल्कुल अलग एहसास है। स्त्रियों के पास पाने के लिए कुछ हो न हो, परन्तु खोने के लिए सब कुछ होता है। बिना ग़लती किए स्त्री गुनहगार होती है स्त्री का स्त्री होना सबसे बड़ा गुनाह है स्त्री उस गुनाह की सज़ा पाती है, जिसे वह अपनी मर्ज़ी से नहीं करती ।  

बलात्कार की इस घटना से एक तरफ़ पूरा देश स्तब्ध, आहत और आक्रोशित है, तो दूसरी तरफ़ इसी समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के लिए स्त्री को दोषी ठहराते हैं। कोई पाश्चात्य संस्कृति को ऐसे अपराध का कारण मानता है, तो कोई स्त्री को ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी देने का परिणाम कहता है। कुछ का कहना है कि पुरुषों के बराबर अधिकार मिलने के कारण स्त्रियाँ देर रात तक घर से बाहर रहती हैं, तो ये सब तो होगा ही। कुछ का कहना है कि स्त्रियाँ दुपट्टा नहीं ओढ़तीं और कम कपड़े पहनती हैं, जिसे देखकर पुरुष में काम वासना जागृत होती है। यह भी कहा जाता है कि स्त्रियाँ लक्ष्मण रेखा पार करेंगी, तो ऐसी घटनाएँ होना स्वाभाविक है। बलात्कार जैसे अपराध के लिए भी अंततः स्त्रियाँ ही दोषी सिद्ध की जाती हैं और ऐसे मुद्दे पर भी राजनीति होती है।  

सभी स्त्रियों की शारीरिक संरचना एक-सी होती है चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, भाषा या देश की हो, हमारी आराध्य दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, पार्वती, सीता हो या अहल्या, मेनका, द्रौपदी, सावित्री, शूपर्णखा हो या राजनीतिज्ञ, अभिनेत्री, व्यवसायी, वेश्या या आम स्त्री हो। अगर नग्नता के कारण कामुकता पैदा होती है, तो खजुराहो को मन्दिर कहने पर भी आपत्ति होनी चाहिए। कृष्ण और राधा के रिश्ते की भर्त्सना होनी चाहिए। कालीदास की शकुन्तला को वासना भरी नज़रों से देखना चाहिए। साड़ी पहनने पर स्त्री के शरीर का कुछ अंग और उभार अपने पूरे आकार के साथ नज़र आता है, तो निश्चित ही भारतीय परम्परा से साड़ी को हटा देना चाहिए। बलात्कारी की माँ, बहन, बेटी का बदन भी वैसा ही है जैसा बलात्कार पीड़ित किसी स्त्री का, तो मुमकिन है हर बलात्कारी अपनी माँ, बहन, बेटी को हवस का शिकार बना सकता है। जन्मजात कन्या को उसके बाप-भाई के सामने नहीं लाना चाहिए, क्योंकि उस कन्या के नंगे बदन को देख उसका बाप-भाई भी कामुक हो सकता है। किसी पुरुष को स्त्री रोग विशेषज्ञ भी नहीं होना चाहिए। 

धिक्कार सिर्फ़ बलात्कारियों को नहीं उन सभी को है, जिनकी नज़र में बलात्कार का कारण मानसिक विकृति नहीं बल्कि स्त्री है। बलात्कार एक ऐसा अपराध है जिसे सदैव पुरुष करता है और अपने से कमज़ोर शरीर वालों के साथ करता है, चाहे वह किसी भी उम्र की स्त्री हो या छोटा बालक। कमज़ोर पर अपनी ताक़त दिखाने का सबसे आसान तरीक़ा बलात्कार करना है। भले इसे हम मानसिक विकृति कहें या दिमाग़ी रोग, लेकिन ऐसे अपराधियों के लिए कारावास, जुर्माना या शारीरिक दण्ड निःसन्देह सज़ा के रूप में कम है। बलात्कार के अधिकतर मामले दबा दिए जाते हैं, जो सामने आए भी तो गवाह के अभाव में अपराधी छूट जाते हैं। बलात्कार का अपराध साबित हो जाने पर सज़ा का प्रावधान इतना कम है कि अपराधी को कानून का ख़ौफ़ नहीं होता। अगर बलात्कार पीड़िता की मृत्यु हो जाए, तो ही फाँसी का प्रावधान है। समाज और कानून की कमज़ोरी और संवेदनहीनता के कारण हर रोज़ न जाने कितनी स्त्रियाँ आत्महत्या कर लेती हैं या ज़िन्दा लाश बन जाती हैं।     

इस घटना से पहली बार एक साथ सामाजिक चेतना की लहर जागी है। देश के अधिकतर हिस्सों में आक्रोश और क्रोध दिख रहा है। गुनहगारों की सज़ा के लिए हर लोगों की अपनी-अपनी राय है, पर इस बात पर सभी एकमत हैं कि गुनाहगारों को फाँसी दी जाए। उन बलात्कारियों को सज़ा इसलिए मिल पाएगी, क्योंकि उन्होंने बलात्कार करने के बाद सबूत को पूरी तरह नहीं मिटाया और उसका पुरुष-साथी बच गया। दामिनी की मृत्यु के कारण अब फाँसी होना तय है; लेकिन अगर वह जीवित बच जाती तो निश्चित ही कानून में सार्थक बदलाव आता।  

बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के कानून में बदलाव और संशोधन के लिए मंत्रालयों, आयोगों, नेताओं, सामाजिक संस्थाओं, जनता सभी से राय माँगी गई है। उस लड़की की क़ुर्बानी विफल होगी, आम जनता की मुहीम राजनीति की भेंट चढ़ेगी, कानून में सार्थक संशोधन और बदलाव होगा यह आने वाला समय बताएगा। सख़्त कानून के साथ कानून के रखवालों का भी सख़्त, सतर्क और निष्पक्ष होना ज़रूरी है। किसी भी कानून की आड़ में कानून से खिलवाड़ करने वाले भी होते हैं, ऐसे में निष्पक्ष न्याय के लिए कड़े और प्रभावी क़दम उठाए जाने होंगे, ताकि हर इंसान बेख़ौफ़ जीवन जी सके और हर अपराधी मनोवृति वाला कठोर दण्ड के डर से अपराध न करे। 

-जेन्नी शबनम (18.1.2013)
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Wednesday, December 19, 2012

41. बलात्कार की स्त्रीवादी परिभाषा

अजीब होती है हमारी ज़िन्दगी। शांत व सुकून देने वाला दिन बीत रहा होता है कि अचानक ऐसा हादसा हो जाता कि हम स्तब्ध हो जाते हैं। हर कोई किसी-न-किसी दुर्घटना के पूर्वानुमान से सदैव आशंकित और आतंकित रहता है। कब कौन-सा वक़्त देखने को मिले कोई नहीं जानता, न इसकी कोई भविष्यवाणी कर सकता है। यों लगता है जैसे हम सभी किसी भयानक दुर्घटना के इंतिज़ार में हैं, और जब तक ऐसा कुछ हो न जाए तब तक उस पर विमर्श और बचाव के उपाय भी नहीं करते हैं। 
 
कोई हादसा हो जाए तो अख़बार, टी.वी., नेता, आम आदमी सभी में सुगबुगाहट आ जाती है। हादसा ख़बर का रूप इख़्तियार कर हलचल पैदा कर देता है। किसी भी घटना का राजनीतिकरण उसको बड़ा बनाने के लिए काफ़ी है और उतना ही ज़रूरी घटना पर मीडिया की तीक्ष्ण दृष्टि। छोटी-से-छोटी घटना मीडिया और नेताओं की मेहरबानी से बड़ी बनती है, तो कई बड़ी और संवेदनशील घटनाएँ नज़रअंदाज़ किए जाने के कारण दब जाती है। यों लगता है जैसे न सिर्फ़ हमारी ज़िन्दगी दूसरों की मेहरबानियों पर टिकी है, बल्कि हम अपने अधिकार की रक्षा भी अकेले नहीं कर सकते। सरकार, कानून, पुलिस के होते हुए भी हम असुरक्षित हैं और अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर।

रोज़-रोज़ घटने वाली शर्मनाक और क्रूर घटना फिर से घटी है। इंसानियत पर से भरोसा एक बार फिर टूटा है। दिल्ली में घटी दिल दहला देने वाली बलात्कार की घटना एक सामान्य दुर्घटना नहीं है; बल्कि मनुष्य की हैवानियत और हिंसा का बर्बर उदाहरण है, स्त्री जाति के साथ किया जाने वाला क्रूरतम अपराध है। आम जनता, पुलिस, मीडिया, सरकार, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता सभी सदमे और सकते में हैं। कोई सरकार को दोष दे रहा है, तो कोई पुलिस को; क्योंकि सुरक्षा देने में दोनों ही नाकाम रही है। कोई स्त्रियों के जीने के तरीक़े को इस घटना से जोड़कर देख रहा है, तो कोई सांस्कृतिक ह्रास का परिणाम कह रहा है। कारण और कारक जो भी हों, ऐसी शर्मनाक और घृणित घटनाएँ रोज़-रोज़ घट रही हैं और हम सब बेबस हैं। ऐसी हर दुर्घटना न सिर्फ़ स्त्री के अस्तित्व पर सवाल है, बल्कि समस्त पुरुष वर्ग को कटघरे में खड़ा कर देती है; क्योंकि बलात्कार ऐसा वीभत्स अपराध है, जिसे सिर्फ़ पुरुष ही करता है। 
 
पुरुष की मानसिक विकृति का परिणाम है कि जन्म से ही स्त्री असुरक्षित होती है और हर पुरुष को सन्देह से देखती है। कुछ ख़ास पुरुष की मानसिक कुण्ठा, मानसिक विकृति या रुग्णता के कारण समस्त पुरुष जाति से घृणा नहीं की जा सकती और न इस अपराध के लिए कसूरवार ठहराया जा सकता है। हर स्त्री किसी-न-किसी की माँ, बहन, बेटी है और हर पुरुष किसी-न-किसी का पिता, भाई, बेटा; फिर भी ऐसी पाश्विक घटनाएँ घटती हैं। मनुष्य की अजीब मानसिकता है कि हर बलात्कारी अपनी माँ, बहन, बेटी की सुरक्षा चाहता है और उसकी माँ, बहन, बेटी उसको इस अपराध की सज़ा से बरी करवाना चाहती है। 

बलात्कार की शिकार स्त्री तमाम उम्र ख़ुद को दोषी मानती है और हमारा समाज भी। एक तरफ़ वह शारीरिक और मानसिक यातना की शिकार होती है, तो दूसरी तरफ़ समाज की क्रूर मानसिकता की। समाज उसे घृणा की नज़र से देखता है और उसमें ऐसी कितनी वज़हें तलाशता है, जब उस स्त्री को दोषी साबित कर सके। समाज की सोच है कि पुरुष ऐसे होते ही हैं, स्त्री को सँभलकर रहना चाहिए। अब सँभलना में क्या-क्या करना है और क्या-क्या नहीं, इसे कोई परिभाषित नहीं कर पाता। स्त्री का रहन-सहन, पहनावा, चाल-ढाल को सदैव उसके चरित्र के साथ जोड़कर देखा जाता है। पुरुष की ग़लती की सज़ा स्त्री भुगतती है। कई बार तो घर का ही अपना कोई सगा बलात्कारी होता है। जिस उम्र में लड़की यह नहीं जानती कि स्त्री-पुरुष क्या होता है, ऐसे में अगर बलात्कार की शिकार हो, तो फिर दोष किसका? क्या उसका स्त्री होना?

हमारे देश में कानून की लचर प्रणाली अपराधों के बढ़ने में सहूलियत देता है। किसी भी तरह का अपराधी आज कानून से नहीं डरता है। कई सारे अपराधी ऐसे हैं, जो सबूत और गवाह के अभाव में बाइज्ज़त बरी हो जाते हैं और पीड़ित को इसका ख़म्याज़ा भुगतना पड़ता है। आजीवन सश्रम कारावास की सज़ा पाया क़ैदी भी जेल में शान का जीवन जीता है। जेल में भोजन-वस्त्र तो मिलता ही है, बीमार होने पर सरकारी ख़र्चे पर इलाज भी और घर वालों से मिलते रहने की छूट भी। अगर जो लाग-भाग वाला अपराधी है, तब तो जेल का कमरा उसके लिए साधारण होटल के कमरे की तरह हो जाता है, जहाँ टी.वी., फ्रीज, फ़ोन और पसन्द का खाना सभी कुछ उपलब्ध हो जाता है।

बलात्कारी को मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास की सज़ा देना निश्चित ही कम है; क्योंकि मृत्यु सारी समस्याओं से नजात पाने का नाम है। बलात्कार जैसे क्रूरतम अपराध के लिए न तो मृत्युदण्ड पर्याप्त है, न आजीवन कारावास। बलात्कारी को ऐसी सज़ा मिले, जिससे अपराधी मनोवृत्ति के लोगों पर ख़ौफ़ के कारण अंकुश लगे। 
 
हमारे देश में फाँसी की सज़ा देकर भी फाँसी देना मुमकिन नहीं होता है। न जाने कितने मामले क्षमा याचना के लिए लम्बित रहते हैं। सबसे पहली बात कि जब एक बार अपराध साबित हो गया और फाँसी की सज़ा मिल गई, तो उसे क्षमा याचना के लिए आवेदन का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। फाँसी सार्वजनिक रूप से दी जानी चाहिए, ताकि कोई दूसरा ऐसे अपराध करने के बारे में सोच भी न सके। बलात्कारी को फाँसी देने से ज़्यादा उचित होगा कि उसे नपुंसक बनाकर सार्वजनिक मैदान में सेल बनाकर फाँसी के दिन की लम्बी अवधि तक रखा जाए, ताकि हर आम जनता उसे घृणा से देख सके।शारीरिक पीड़ा देने से ज़्यादा ज़रूरी है मानसिक यातना देना, ताकि तिल-तिलकर उसका मरना सभी देखें और कोई भी ऐसे अपराध करने की हिम्मत न करे।  

डर और ख़ौफ़ के साए में तमाम उम्र जीना बहुत कठिन है, पर हर स्त्री ऐसे ही जीती है, उसे जीना ही पड़ता है। सरकारी शब्दावली में ख़ास जाति में जन्म लेने वाला दलित है, जबकि वास्तविक रूप में मनुष्य की सिर्फ़ एक जाति दलित है, और वह है स्त्री; चाहे किसी भी जाति या मज़हब की हो।दलित और दलित के अधिकारों की बात करने वाले हमारे देश में सभी को इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि आख़िर दलित है कौन? क्या स्त्री से भी बढ़कर कोई दलित है?

-जेन्नी शबनम (18.12.2012)
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Wednesday, December 12, 2012

40. समय की सीधी समझ (स्त्री) (12.12.12)

समय में न जाने कौन-सा पहिया लगा होता है कि पलक झपकते कई वर्ष घूम आता है और कई बार ऐसा कि धकेलते रहो, धकेलते रहो, पर सब कुछ स्थिर, तटस्थ समय का पहिया शायद हमारे मन के द्वारा संचालित होता है।सबका अपना-अपना मन, अपना-अपना समय, कभी उड़न्तु घोड़ा तो कभी अड़ियल मगरमच्छ मन होता ही ऐसा है कि कई युग एक साथ फलाँग जाए, तो कभी कई सदियों-सा एक-एक दिन जिए समय यायावर है, जाने कहाँ-कहाँ भटकता फिरता है और हम उसके पीछे भागते-भागते थक जाते हैं। समय के साथ क़दम-ताल मिलाना चाहकर भी कई बार मुमकिन नहीं होता, तो कई बार समय ख़ुद-ब-ख़ुद अपना क़दम हमारे क़दम के साथ साध लेता है। सुना है कि समय पर किसी का ज़ोर नहीं, पर कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे समय हमारे साथ दोहरी चाल चलता है।

यों महसूस होता है जैसे समय का पहिया सिर्फ़ स्त्रियों के लिए चलता है और अपनी रफ़्तार मनमाफ़िक़ बदलता है। कई बार ऐसा घूमता है कि स्तब्ध कर जाता है। होनी-अनहोनी, आशंकाएँ, दुविधा आदि न जाने क्यों सबसे ज़्यादा स्त्रियों के हिस्से में है। न समय साथ देता है, न ज़माना। फिर भी स्त्रियाँ अपने पल्लू में अपने लिए समय को बाँधे रखती हैं और अपने हिसाब से अपनी रफ़्तार तेज़-धीमी करती रहती हैं। हालाँकि स्त्री के साथ समय नहीं होता, पर स्त्री के पास समय के साथ होने के भ्रम को बनाए रखने के ढेर सारे तजवीज़ होते हैं। प्रेम, ममता, त्याग, स्थिरता, संकोच, समर्पण, सेवा भावना आदि ऐसे हथियार हैं, जो स्त्री के स्त्री होने के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट है और इससे ही वार कर अक्सर उसे कमज़ोर बनाया जाता है।

जन्म के पहले से स्त्री के यायावरी की कहानी शुरू होती है पिता, पति, पुत्र के घर से होते हुए स्त्री अंततः परलोक को अपना स्थायी निवास मानने लगती है। स्त्री की ज़िन्दगी सदैव मेहरबानियों पर टिकी होती है। अपनी ख़ुशी के लिए ग़ैरों की ख़ुशामद में सारी ज़िन्दगी बिता देती है। अगर किसी घर में पुत्र-पुत्री की परवरिश समान रूप से होती है, तो आगे चलकर उस स्त्री की ज़िन्दगी ज़्यादा दुःखद हो जाती है। उस स्त्री को समाज रूपी समय समझा देता है कि स्त्री का समय अलग होता है और पुरुष का अलग। स्त्री को अपने समय के हिसाब से चलना ही चाहिए, वर्ना समय का कुचक्र स्त्री का सबकुछ छीन लेता है। हमारी परम्पराएँ और रूढ़ियाँ सदैव पुरुष के पक्ष व हित में स्थापित की गईं, और इसका ख़म्याज़ा स्त्री पूरी ज़िन्दगी चुकाती रहती है।
  
हमारी संस्कृति हमारे जीवन को राह दिखाती है और हमारे संस्कार राह पर चलने के तरीक़े। हमारी संस्कृति और संस्कार बनाने और पोषित करने वाले भी तो हमारे जैसे ही लोग रहे होंगे। सामयिक ज़रूरत के हिसाब से स्थापित मूल्यों और आदर्शों को परम्परा के नाम पर हम पर थोप दिया गया, भले वह आज के समय के हिसाब से अतार्किक और असंगत हो। स्त्रियों के लिए स्पष्टतः कर्त्तव्य निर्धारित किए गए और पाप-पुण्य की कसौटी पर सारे कार्य बाँट दिए गए। एक लक्ष्मण रेखा जन्म से खींच दी गई, जिसे पार करना निषिद्ध है। निर्देशित मर्यादा का पालन करना होगा, अगर न किया तो पाप की सज़ा ऐसी कि मृत्युदण्ड से भी पूरी न हो।

धीरे-धीरे समय ने ज़रा-सी ज़हमत की और स्त्री के हक़ में ज़रा-सा बोलना शुरू किया। फिर भी समय अपनी ताक़त दिखाता रहा और पुरुष को कुरेद-कुरेदकर स्त्री के विरुद्ध सुलगाता रहा स्त्री को उसका अपना शरीर एक शाप के रूप में मिला और साथ ही पूँजी के रूप में भी, जिसका इस्तेमाल पुरुष करता रहा अपने फ़ायदे के लिए और कभी-कभी स्त्री भी अपने फ़ायदे और मज़बूरी में। स्त्री अपने शरीर की सुरक्षा में जीवनभर जुटी रहती है; क्योंकि उसका बदन अगर किसी ग़ैर ने छू भी लिया तो पापी कहलाएगी स्त्री की कोख से स्त्री का जन्म लेना भी समाज को सह्य नहीं।और जहाँ स्त्री को स्त्री-जन्म का अधिकार मिला, तो ऐसे जैसे बहुत बड़ा एहसान किया गया हो। एहसानों तले दबी स्त्री किस-किस के एहसान से दबती रही, कौन जाने। दोनों हथेलियों से समय और समाज के आगे गुहार लगाती स्त्री अंततः ख़ाली मुट्ठी को भरा हुआ मान मुट्ठी बाँध लेती है और मुट्ठी में सुख सहेजे रहने का भ्रम ख़ुद को और समय को देती है। 

समय को शायद शाप है अबूझ बने रहने का और किसी के भी क़ाबू में न आने का। सबसे बड़ा कार्य जो समय ने पुरुष के पक्ष में किया वह है पुरुष को पुरुष का बदन देना। वैसे हर युग में स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना गया, चाहे शरीर के रूप में हो या मन के। शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण एक दूसरे के पूरक माने गए। लेकिन आम पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक नहीं बन सके। अगर कोई बनना चाहे तो बनने नहीं दिया जाता है। बहुत सारे निषेध हैं जिनका पालन अनिवार्य है और यह माना जाता है कि पुरुष का पुरुषत्व स्त्री के बराबरी से कम हो जाता है। स्त्री पर अपना आधिपत्य बनाए रखना पुरुषोचित गुण है, भले इसके लिए स्त्री का शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाए। सिर्फ़ एक अवसर है जब स्त्री को सम्मान मिलता है और वह है धार्मिक क्रिया-कलाप।

समय कभी-कभी बेरहम मज़ाक भी करता है और स्त्री को स्त्री बने रहने का सबूत देना पड़ता है। स्त्री को अपनी समस्त मर्यादाओं का पालन बिना सवाल किए करना होता है और आजीवन अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए पुरुषों की कृपा पर निर्भर रहना होता है। वह कृपा चाहे एक पिता करे या पति या पुत्र। सामाजिक सोच ऐसी बन चुकी है कि पुरुष अपनी सफलता का श्रेय ख़ुद को देता है और विफलता का दोष स्त्री को। एक ही स्त्री किसी पुरुष के लिए नरक का द्वार है, तो किसी के लिए स्वर्ग का। अब ये समय की टेढ़ी नज़र है या समय का कतरा हुआ पर, कौन जाने।

समय कभी-कभी ख़ुद को बड़ा असमंजस में पाता है कि आख़िर किसका साथ दे और कैसे दे। जब किसी स्त्री ने स्त्री के हक़ की बात की, तो उसे ऐसे फेमिनिस्ट कहा जाता है जैसे वह अछूत हो और गाली की हक़दार हो।अगर कोई पुरुष स्त्री के अधिकार के लिए आवाज़ उठाए या बराबरी की बात करे, तो उसे जोरू का ग़ुलाम या नामर्द कहा जाता है। 
 
आजकल जब समय ने अपनी एक आँख खोली और थोड़ा जागरूक हुआ, तो स्त्री के हक़ की बात करना फ़ैशन बन गया। स्त्री को समान शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन आदि का अधिकार देना और इसका ढोल पीटना सम्मान पाने का एक नया तरीक़ा ईजाद हुआ और संवेदनशील होने का प्रमाण बन गया। सब समय की कृपा है।

समय के पहिया में पंख लग गया और बदलाव के इस युग में क्रान्तियाँ फुर्र से उड़ गईं। मेरे अपने देखे और जाने 45 साल में कुछ नहीं बदला है। उन दिनों भी स्त्री महज़ स्त्री थी और आज भी स्त्री सिर्फ़ स्त्री है, जैसी सतयुग में रही होगी। समय तो अपने आँख-कान बंद कर लेता है, जब उसके पास जवाब नहीं होते। लेकिन स्त्री अपने सवालों से कैसे पीछा छुड़ाए, किससे पूछे अपनी त्रासदी का सबब और किससे करे वेदना भरे सवाल। समय वाचाल है। स्त्री हार-हार जाती है फिर उठकर अपने जीवन का औचित्य तलाशती है। स्त्री अपना औचित्यहीन जीवन कभी प्रेम, कभी पूजा, कभी त्याग में व्यतीत करती है। वह एक-एक पल गिनती रहती है जब वह अपने स्थायी घर (स्वर्ग) जा सके और इस इन्तिज़ार में जीवन काटती है। लम्पट समय मुस्कुराता है और पुरुष के सम्मान में स्त्री के लिए मर्सिया गाता है।

समय दौड़ता-भागता, उड़ता-नाचता, गिरता-पड़ता, अपना खेल खेलता है।जीवन इसी में चलता है, कभी समय के साथ, कभी समय के पीछे। समय के आगे तो कोई चल न सका। समय तो समय है, लिंग-भेद से परे और लिंग-भेद करता हुआ, सदियों का इतिहास ख़ुद में समेटे पल-पल इतिहास बनाता हुआ। आज यों लगता है जैसे समय ने अपने क़दम की रफ़्तार को संयमित कर लिया है और सभी के लिए अपने क़दम के लय को सुगम बना लिया है; क्योंकि आज की तारीख़ 12.12.12 रोचक और दुर्लभ है, अद्भुत संयोग है।समय स्थिर होकर सब नज़ारा देख रहा है। आज के जश्न में शामिल समय इस अद्भुत तारीख़ के आवभगत के लिए ख़ुद को पिछली सदी से ही तैयार कर चुका है। अगली सदी में एक नए इतिहास के साथ जब आज का समय आज को याद करेगा, तब तक शायद समय भी चेत जाए और सबके लिए एक-सा सुखद और आनन्ददायक बन जाए

-जेन्नी शबनम (12.12.12)
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Monday, November 12, 2012

39. तिथियों की तिकड़म (10.11.12)

आज एक ग़ज़ल बार-बार गुनगुनाने को मन कर रहा है "एक ब्राह्मण ने कहा है कि साल अच्छा है...।" ज्योतिषियों के अनुसार आज की तिथि 10.11.12 अंक के बढ़ते क्रम के अनुसार होने के कारण बहुत शुभ है और यह दिन उनके लिए ज़्यादा सौभाग्यशाली है, जिनका जन्म आज हुआ है या आज होगा। यह तारीख़ इस सदी की ऐसी तारीख़ है जो दुबारा नहीं आएगी। हाँ! यह सच है कि कोई ख़ास तारीख़ हमारे जीवन में ख़ास महत्व रखती है। यों तो हर बीता लम्हा दुबारा नहीं आता, पर हर लम्हा ख़ास होते हुए भी ख़ास नहीं होता, आम दिनों-सा हर दिन बीत जाता है। लेकिन ख़ास तारीख़ का हमें इन्तिज़ार रहता है। ख़ास तारीख़ पर देश ही नहीं दुनिया के तमाम ज्योतिष अपनी-अपनी भविष्यवाणी करते हैं। शुभ क्या-क्या है और क्या-क्या हो सकता है, ये तो कोई नहीं जानता, लेकिन शुभ-अशुभ जानना हर कोई चाहता है। शुभ-दिन, शुभ-घड़ी, शुभ-तिथि, शुभ-साल, शुभ शुभ शुभ...! 

हर कोई अपने लिए शुभ चाहता है और दूसरों को शुभ का सन्देश देता है। लेकिन शुभ-अशुभ की ठीक-ठीक व्याख्या न कोई ज्योतिष कर पाता है न कोई इंसान निर्धारित कर सकता है। एक ही घड़ी-नक्षत्र में जन्म लिए हुए दो व्यक्ति का जीवन दो दिशा में चला जाता है। कोई सुख-सुविधा से परिपूर्ण जीवन पाता है, तो कोई आजीवन कष्ट में जीवन यापन करता है। कोई बिना लड़े दुनिया जीत लेता है, तो कोई जीवटता से लड़ते हुए न सिर्फ़ जंग हारता है; बल्कि जीवन भी हार जाता है। किसी की पूरी ज़िन्दगी काँटों भरी राह पर चलते हुए गुज़रती है, तो किसी की राहों में सिर्फ़ फूल-ही-फूल बिछे होते हैं। तमाम जद्दोजहद के बाद भी किसी का जीवन बिना जिए ख़त्म हो जाता है, तो कोई जीवन ख़त्म करने के सारे उपाय करके भी जीवन ढोता रहता है।किसी के जीवन में सिर्फ़ अँधेरा-ही-अँधेरा होता है, तो कोई अँधेरों में ख़ुद को ही जलाकर रोशनी करना सीख जाता है। आख़िर ऐसी तक़दीर कैसे? किसने बनाई? अगर तक़दीर बदल सकती है, तो फिर ऐसी तक़दीर मिली ही क्यों? बहुत सारे क्यों हैं, इस क्यों के निवारण के लिए ज्योतिष के पास जाना होगा।

ज्योतिषियों ने कहा कि पिछले जन्म के पाप-पुण्य इस जन्म की तक़दीर का निर्धारण करते हैं। किसी का जन्म सम्पन्न परिवार में होगा या विपन्न, कौन किस जाति में जन्म लेगा, किसका जीवन आनन्ददायक होगा और कौन आजीवन कष्ट भोगेगा, इन सबका कारण पिछले जन्म का किया गया हमारा कर्म है। मृत्यु के बाद स्वर्ग में जाना या नरक में, इसका निर्धारण भी इस जन्म का हमारा कर्म करेगा। अगर हमारे तक़दीर में कोई कमी है, तो उसके निवारण का उपाय इन ज्योतिषियों के पास है। 
 
हमारी कुण्डली में यह निर्दिष्ट होता है कि कौन सा ग्रह हम पर क्या असर डालेगा और क्या करने से किसी ख़ास ग्रह के प्रकोप से बचा जा सकता है जीवन में अकस्मात् कोई घटना घट जाए जो बुरी हो या कोई बुरी घटना न घटे इसके लिए एक नहीं कई उपाय हैं। जैसे अलग-अलग मरज़ के लिए अलग-अलग डॉक्टर, वैसे ही अलग-अलग मरज़ के लिए अलग-अलग उपाय। 

अक्सर सुना है कि ये बुरा वक़्त और ये अच्छा वक़्त है। अब बुरा में क्या-क्या होगा ये कैसे पता चले। जीवन सहजता-सरलता से चलता रहे, तो अच्छा वक़्त और जीवन में ज़रा भी बाधा या विघ्न आए तो बुरा वक़्त। कभी भी कोई ज्योतिष स्पष्टतः यह नहीं बताता कि अच्छा या ख़राब में क्या-क्या शामिल किया जाए। कई बार जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब लगता कि जीवन बस अब यहीं ख़त्म; लेकिन वही कारण किसी दूसरे के लिए महत्वपूर्ण नहीं होते, और उनके हिसाब से ये जीवन के अंत की वज़ह नहीं हो सकते। कई बार बिलकुल सामान्य-सी लगने वाली घटना किसी का जीवन पूरी तरह से बदल देती है, तो वही घटना किसी के लिए अर्थहीन होती है। कोई अनहोनी किसी का सम्पूर्ण जीवन बदल देती है, तो कई बार कोई अनहोनी किसी को उसके राह से डिगा नहीं पाती है। 

मुमकिन है हमारी संवेदनाएँ इन सब के लिए ज़िम्मेदार हों। मगर ज्योतिष? क्या किसी मनुष्य में इतनी ताक़त है कि वह भविष्य के बारे में बता सके? किसी अँगूठी में इतनी क्षमता है कि ईश्वर द्वारा लिखी हुई तक़दीर को हमारी इच्छा और कामना के अनुरूप बदल सके? क्या कोई तिथि शुभ-अशुभ होती है? अगर होती है, तो इसकी जानकारी रखने वाला क्यों नहीं स्पष्ट रूप से बता देता कि क्या-क्या शुभ होगा और क्या-क्या अशुभ। अगर अशुभ होने के संकेत मिले, तो उसे शुभ में बदलने के उपाय समय रहते ही कर लिए जाएँ; फिर इस पृथ्वी पर कोई असंतुष्ट न रहेगा। मुमकिन है ऐसा इसलिए नहीं करते होंगे कि अगर सभी सुखमय हो जाएँ, तो दुखी मन कहाँ से आए, जिन्हें राहत देने के लिए इन भविष्यवक्ताओं के बाज़ार क़ायम रहे। स्वार्थ की पूर्ती के लिए अगर इन पर भरोसा कर एक-आध अँगूठी पहन ली जाए तो इसमें बुरा क्या है। ऐसी सोच... घोर अनर्थ... आख़िर ये भी तो जीविका के साधन हैं और जीवन यापन का सभी को अधिकार है। भला इसमें ग़लत क्या है? अब कोई ज्योतिष तो किसी के पीछे नहीं पड़ता कि भई अपना भविष्य जान लो। लोग अपनी इच्छा से आते हैं ताकि जीवन सँवार सकें, अब इसमें बेचारे ज्योतिषियों का क्या दोष?

यों अब भविष्यवाणी पर ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। समय के साथ सब कुछ बदल गया है। जो भी चाहे ज्योतिष शास्त्र पढ़कर इस पेशा को अपना सकता है और धन अर्जित कर सकता है। बस इतना कोई बता दे आज के दिन क्या-क्या अच्छा होगा और आने वाली कौन सी ख़ास तारीख़ क्या-क्या ख़ास ख़ुशियाँ देंगी। इस सदी के इस अनोखे दिन में दुनिया में क्या-क्या ख़ास होने वाला है, ये जानने का इन्तिज़ार है। वैसे भी आज का दिन अच्छा है, तो भई शुभ-शुभ बोलो! अब ब्राह्मण ने कहा है तो मान लेते हैं कि आज का दिन शुभ है। आज का दिन शुभ हो!

-जेनी शबनम (10.11.12)
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Thursday, June 21, 2012

38. क्योंकि वह ताजमहल नहीं था

साइनबोर्ड 
एक बार फिर रोई अमृता, फूट-फूटकर रोई। इमरोज़ के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़कर झिंझोड़कर पूछा- ''क्यों नहीं बचाया मेरा घर? क्यों नहीं लड़ सके तुम मेरे लिए?'' ''बोलो इमा, क्यों नहीं रोका तुमने उन लोगों को, जो मेरी ख़्वाहिशों को उजाड़ रहे थे, हमारे प्रेम के महल को ध्वस्त कर रहे थे? हर एक कोने में मैं जीवित थी तुम्हारे साथ, क्यों छीन लेने दिया मेरा संसार?'' 
इमरोज़ जी
इमरोज़ निःशब्द! इमरोज़ बेबस! ख़ामोशी से अपनी माझा को रोते हुए देखते रहे। आँखें भीग गईं, फिर तड़पकर कहा- ''माझा, मैं क्या करता, मेरा हक़ तो सिर्फ़ तुम पर था न, उस घर पर नहीं। मैं कैसे रोकता उन्हें?'' ''माझा! मैं घर को बचा नहीं सका, मैं किसके पास जाकर गिड़गिड़ाता? जिन लोगों ने तुमको इतना सम्मान दिया, पुरस्कृत किया, उन लोगों में से कोई भी तुम्हारे धरोहर को बचाने नहीं आया।'' ''माझा! उस घर को मैं अपने सीने में समेट लाया हूँ। हमारे घर के ऊपर बने विशाल बहुमंजिली इमारत में वे ईंटें दफ़्न हैं, जिन्हें तुमने जोड़ा था और मैंने रंगों से सजाया था।'' ''ये देखो माझा! हमारी वह तस्वीर ले आया, जब पहली बार तुम मेरे लिए रोटी सेंक रही थी, तुम्हें कितना अच्छा लगता था मेरे लिए खाना बनाना। ये देखो! वह कप भी मैं ले आया हूँ, जिसमें हर रात मैं तुमको चाय देता हूँ; रात में तुम अब भी लिखते समय चाय पीना चाहती हो न। वह देखो! उस तस्वीर में तुम कितनी सुन्दर लग रही हो, जब पहली बार हम मिले थे। वह देखो! हमारे घर का नेम-प्लेट 'अमृता प्रीतम, के-25', और देखो वह तस्वीर जिसे बनाने में मुझे पाँच साल लगे थे, जिसे तुम्हारे कहने पर मैंने बनाया था 'वुमेन विद माइंड'।'' ''माझा, मैं अपनी तक़लीफ़ किसे दिखाऊँ? मेरी लाचारी तुम समझती हो न! तुम तो चली गई, मुझे अकेला छोड़ गई। सभी आते हैं और मुझमें तुमको ढूँढते हैं, पर मैं तुमको कहाँ ढूँढूँ?'' ''माझा!  मेरा मन बस अब तुम्हारा घर है, क्योंकि अब तुम सीधे मेरे पास आती हो, पहले तो तुम जीवन के हर खट्टे-मीठे अनुभव के बाद मुझ तक आई थी। तुम्हारी यादें और मैं अब मेरा घर है।''     
बिकने के बाद टूटकर बन रहा k-25
किसी जीवित घर का मिटाया जाना विधि का विधान नहीं, न नियति का क्रूर मज़ाक है; बल्कि मनुष्य के असंवेदनशील होने का प्रमाण है। उस घर का बाशिंदा कितना तड़पा होगा, जब उससे वह घर छीन लिया गया होगा, जिसमें उसकी प्रियतमा की हर निशानी मौजूद है ये सब अतीत की कथा नहीं बल्कि उसका वर्तमान जीवन है। कितना रोया होगा वह। कितना पुकारा होगा वह अपनी प्रियतमा को, जिसने अकेला छोड़ दिया यादों के सहारे जीने के लिए पर उसने सदैव उसे अपने साथ महसूस किया है, उसे सोचा नहीं; बल्कि उसके साथ जी रहा है। कितनी बेबस हुई होगी उस स्त्री की आत्मा जब उसके सपनों का घर टूट रहा होगा और उसका हमसफ़र उसकी निशानियों को चुन-चुनकर समेट रहा होगा। तोड़ दिया गया प्रेम का मन्दिर। फफक पड़ी होंगी दीवार की एक-एक ईंटें। चूर हो गया किसी स्त्री की ख़्वाहिशों का संसार। कैसे दिल न पिघला होगा उसका, जिसने इस पवित्र घर को नष्ट कर दिया। क्या ज़रा भी नहीं सोचा कि अमृता की आत्मा यहाँ बसती है? अमृता को उसके ही घर से बेदख़ल कर दिया गया और उसकी निशानियों को सदा के लिए मिटा दिया गया। 
कुछ यादें- अमृता-इमरोज़
हौज़ ख़ास के मकान नम्बर k-25 के गेट में घुसते ही सामने खड़ी मारुती कार, जिसे अमृता-इमरोज़ ने साझा खरीदा था, अब कभी नहीं दिखेगी। घंटी बजाने पर कुर्ता-पायजामा और स्पोर्ट्स शू पहने ज़ीने से उतरकर दरवाज़ा खोलते हर्षित इमरोज़, जो बहुत ख़ुश होकर पहली मंजिल पर ले जाते और सामने लगी खाने की मेज़-कुर्सी पर बिठाते हुए कहते हैं- ''देखो वहाँ अमृता अभी सो रही है'', साथ लगी उस रसोई में ख़ुद चाय बनाते, जिस रसोई में न जाने कितनी बार अमृता ने रोटी पकाई होगी; अब कभी न दिखेगी। रसोई में रखी काँच की छोटी-छोटी शीशियाँ भी उस वक़्त की गवाह हैं, जब अमृता रसोई में अपने हाथों से कुछ पकाती थीं और इमरोज़ उसे निहारते थे। अमृता का वह कमरा जहाँ अमृता ने कितनी रचनाएँ गढ़ीं, जहाँ इमरोज़ की गोद में अन्तिम साँस ली; अब कभी नहीं दिखेगा। कैनवस पर चित्रित अमृता-इमरोज़ की साझी ज़िन्दगी का इन्द्रधनुषी रंग जो उस घर के हर हिस्से में दमकता था, अब कभी नहीं दिखेगा। सफ़ेद फूल जो अमृता को बहुत पसन्द है, इमरोज़ हर दिन लाकर सामने की मेज़ पर सजा देते थे; अब उस मेज़ की जगह बदल चुकी है। अमृता की रूह शायद अब भी उस जगह भटक रही होगी; मेज़, फूल और फूलदान को तलाश रही होगी। छत के पास अब भी पंछी आते होंगे कि शायद इमरोज़ आ जाएँ और दाना-पानी दे जाएँ, पर अब जब छत ही नहीं रहा तो पखेरू दर्द भरे स्वर में पुकारकर लौट जाते होंगे। 
साहिर-अमृता
अमृता का जीवन, अमृता का प्रेम, अमृता की रचनाएँ, अमृता के बच्चों की किलकारियाँ, अमृता के हमसफ़र की जुम्बिश, चाय की प्याली, कैनवस पर इमरोज़ का जीवन- अमृता, रसोईघर में चाय बनाते इमरोज़, रोटी सेंकती अमृता, बच्चों को स्कूटर पर स्कूल छोड़ते इमरोज़, हर शाम पंछियों को दाना-पानी देते इमरोज़, पूरी दुनिया में अपनी रचनाओं के द्वारा सम्मानित अमृता जो अपने बिस्तर पर लाचार पड़ी है - वृद्ध अशक्त अमृता का सहारा बनते इमरोज़, हर एक तस्वीर जिसमें अमृता है का विस्तृत विवरण देते इमरोज़; अमृता और अमृता का साझा-संसार जो उनके मन में सिमट गया है इमरोज़ जो बिना थके कई बार नीचे दरवाज़ा खोलने, कभी छत पर पौधों में पानी डालने, कभी सबसे ऊपर की छत पर पंछियों का कलरव देखने आते जाते रहते। इमरोज़ के माथे पर न शिकन न शिकायत, बदन में इतनी स्फूर्ति मानो अमृता ने अपनी सारी शक्ति सहेजकर रखी हो और विदा होते वक़्त अन्तिम आलिंगन में सौंप दिया हो और चुपके से कहा हो ''मेरे इमा, मैं इस शरीर को छोड़कर जा रही हूँ, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी, तुम कभी थकना नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूँ, पग-पग पर, पल-पल में, वक़्त के उस आख़िरी छोर तक जब तक तुम इस शरीर में हो, सामने वाले कमरे में बैठी मैं हर रात तुम्हारे लिए गीत रचूँगी और जिसे तुम अपने हाथों से नज़्म का रूप दोगे। मैं तुम्हारी माझा, तुम्हारे लिए सदैव वर्तमान हूँ, यों भी तुम इमरोज़ हो जिसका अर्थ है आज, तुम मेरे आज हो, मेरी ख़्वाहिशों को तुम पालना, हमारे इस घर में मैं हर जगह मौजूद रहूँगी, तुम जीवन का जश्न जारी रखना, तुम्हारे कैनवस पर और तुम्हारी नज़्मों में मैं रहूँगी, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।'' 
मुश्किलों से जूझती अमृता का 'अमृता प्रीतम' बनना इतना सहज नहीं हुआ होगा। पति से अलग हुई एक आम औरत जिसके दो छोटे बच्चे, जीवन सरल नहीं रहा होगा। टूटी-हारी 40 वर्षीया अमृता को इमरोज़ का साथ और फिर समाज की मान्यताओं और प्रतिमानों से जूझना बेहद कठिन हुआ होगा। रेडियो स्टेशन में कामकर घर चलाती अमृता ने कैसे-कैसे दिन देखे होंगें, ये तो बस वे जानती हैं या इमरोज़। अमृता का सम्पूर्ण अस्तित्व जो उस एक घर में बना, पसरा, फिर सिमटा, कितनी क्रूरता से मिटा दिया गया।इमरोज़ के लिए नहीं, तो कम-से-कम उस औरत, जिसकी हर ख़्वाहिशें और ज़िन्दगी यहाँ मौजूद थी, पर तो रहम किया होता। प्रेम की दुहाई देने वाले और अमृता-इमरोज़ के प्रेम की मिसाल देने वाले कहाँ गए? क्या जीवन के बाद ऐसे ही भुला दिया जाता है उसकी हस्ती को, जिसने समाज को एक नई सोच और दिशा दी, जिसने स्त्री होने के अपराधबोध से ग्रस्त होना नहीं सीखा और स्त्री को गौरव प्रदान किया, पुरुष को सिर्फ़ एक मर्द नहीं, बल्कि एक इंसान और सच्चे साथी के रूप में समझा।   
नए फ्लैट का एक कोना
अब कहाँ ढूँढूँ उस घर को? प्रेम के उस मन्दिर को? वह घर टूटकर बहुमंजिली इमारत में तब्दील हो चुका है। अमृता बहुत रो रही थी और अपने इमरोज़ को समझा रही थी- ''वह सिर्फ़ एक मकान नहीं था इमा, हमारा प्रेम और संसार बसता था वहाँ। मेरे अपनों ने मुझे मेरे ही घर से बेदख़ल कर दिया। हाँ इमा! जानती हूँ तुम्हारी बेबसी, मेरे घर के कानूनी हक़दार तुम नहीं हो न! दुनिया के रिवाज से तुम मेरे कोई नहीं, ये बस मैं जानती हूँ कि तुम मेरे सब कुछ हो, जानती हूँ तुम यहाँ मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहे होगे पर कानून... उफ़!''
नए घर के एक आईने में मैं और इमरोज़ जी
इमरोज़ जी से पूछने पर कि उस घर को क्यों बेच दिया गया, वे कहते हैं- ''जीवन में 'क्यों' कभी नहीं पूछना, हर 'क्यों' का जवाब भी नहीं होता है, जो होता है ठीक ही होता है।'' ''अगर अमृता होती तो उनको कैसा लगता?'' पूछने पर बहुत संजीदगी से मुस्कुराते हुए कहते हैं- ''अगर अमृता होती तो वह घर बिकता ही नहीं।'' ''ये घर भी बहुत बड़ा है और बच्चों को जो पसन्द मुझे भी पसन्द, अपने बच्चों के साथ ही मुझे रहना है।'' 
विस्तार से घर दिखाते इमरोज़ जी और मैं
इमरोज़ के साथ अमृता अब नए घर में आ चुकी है। अमृता के परिवार के साथ दूसरे मकान में शिफ्ट होते समय इमरोज़ जी ने अमृता की हर निशानी को अपने साथ लाया है और पुराने मकान की तरह यहाँ भी सजा दिया है।हर कमरे में अमृता, हर जगह अमृता। चाहे उनके पेंटिंग करने का कमरा हो या उनका शयन कक्ष, गैलरी, भोजन कक्ष, या फिर अन्य कमरा अमृता को देखना या महसूस करना हो, तो हमें के-25 या एन-13 नहीं बल्कि इमरोज़ से मिलना होगा। इमरोज़ जी के साथ अमृता हर जगह हैं, चाहे वे जहाँ भी रहें। 
इमरोज़ जी और मैं
-जेन्नी शबनम (21.6.2012)
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Friday, June 8, 2012

37. विकलांगों का गाँव

''न चल सकते, न सो सकते, न बैठ सकते हैं, कैसे जीवन काटें?'' कहते-कहते गीता देवी की आँखों में आँसू भर आते हैं। मेरे पास कोई जवाब नहीं, क्या दूँ इस सवाल का जवाब मैं पूछती हूँ ''कब से आप बीमार हैं?'' 50 वर्षीया शान्ति देवी विकलांग हो चुकी हैं, रो-रोकर बताती हैं ''जब से सरकार ने चापाकल गाड़ा है, ज़हर पी-पीके हमारा ई हाल हुआ है।'' वे अपने दोनों पाँव को दिखलाती हैं, जिसकी हड्डियाँ टेढ़ी हो चुकी हैं। उन्होंने कहा ''जब तक चापाकल नहीं गाड़ा गया था, तब तक पानी का बहुत दिक्क़त था।लेकिन अब लगता है कि ये चापाकल ही हमारा जान ले लेगा, तो हम कभी इसका पानी नहीं पीते।'' खटिया पर बैठे हुए वह अपने घर का चापाकल दिखाती हैं और इशारा करती हैं उन डब्बों की ओर जिसमें पानी भरकर रखा हुआ है। वे कहती हैं कि सरकार थोड़ा-बहुत पानी का इन्तिज़ाम की है, वहीं से पानी लाकर रखते हैं, बाक़ी काम तो इसी ज़हर वाले पानी से करना पड़ता है।''
45 वर्षीया गीता देवी का पूरा बदन सूख गया है, दोनों हाथ-पाँव की हड्डियाँ टेढ़ी होकर अकड़ गई हैं, ख़ुद से कुछ नहीं कर सकतीं। अपना व्यक्तिगत काम करने में भी असमर्थ हैं। उनकी बीमारी के कारण देखकर लगता है जैसे वह 60 साल की हों। उनसे पूछने पर कि यह बीमारी कब से है, वे ऐसे देखती हैं मानो उनके कान सुन्न पड़ चुके हैं और ज़ुबाँ भी ख़ामोश, बस बेचारगी से चुपचाप देखती हैं। उनके पति बताते हैं कि क़रीब दो-तीन साल पहले बीमार हुई और धीरे-धीरे पूरा देह सूखकर अकड़ गया। वे बताते हैं कि वही ज़हर जो पूरे गाँव को एक-एक करके खा रहा है उसी से ऐसा हाल हुआ है।
डी.पी.एस. भागलपुर के प्रधानाध्यापक श्री राकेश सिंह और हिन्दी की शिक्षिका श्रीमती अलका सिंह के साथ मैं भागलपुर शहर से क़रीब 15 किलोमीटर दूर जगदीशपुर प्रखंड के कोलाखुर्द गाँव में पहुँची। राकेश सिंह के एक मित्र जो भागलपुर में फिजियोथेरेपिस्ट हैं और उस गाँव के मरीजों को देखने जाते हैं, हमारे साथ थे। गाँव में घुसते ही 20-25 लोग इकट्ठे हो गए। सभी का अपना-अपना दर्द, कुछ बदन की पीड़ा कुछ मन की पीड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि तक़रीबन 2000 की आबादी वाले इस गाँव में लगभग 100 व्यक्ति पूर्णतः या अंशतः विकलांग हो चुके हैं। कितने बड़े-बड़े नेता आए, कितने पेपरों में छपा। देश में कई जगहों पर यहाँ का पानी टेस्ट हुआ और सभी रिपोर्ट में आर्सनिक और फ्लोराइड होने की पुष्टि हुई। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। अब भी ज़हर वाला पानी पी रहे हैं सभी। फ्लोराइड और आर्सनिक के कारण लगभग सभी को जोड़ में दर्द और हड्डी की समस्या है। रीढ़ की हड्डी धनुष की तरह मुड़ गई है। कई लोगों ने गाँव को छोड़ दिया है। ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता, न यहाँ की बेटी से कोई जल्दी ब्याह करना चाहता है। अपना खेत होते हुए भी कई लोग खेती छोड़कर पंजाब, गुजरात, दिल्ली पलायन कर चुके हैं। उनकी कमाई इतनी कम है कि घरवालों को ले नहीं जा सकते और जितना कमाते हैं परिवार वालों की बीमारी पर ख़र्च हो जाता है। छोटे-छोटे बच्चों का पाँव टेढ़ा हो गया है, वे सीधे चल नहीं पाते हैं। सरकार योजना तो बनाती है; लेकिन कितने लोगों को अपाहिज बनाने के बाद कुछ करेगी क्या पता।
कोलाखुर्द गाँव जहाँ अधिकांश राजपूत हैं और सभी के पास खेत है; परन्तु सिंचाई के अभाव में खेत-खलिहान बंजर पड़े हुए हैं। सभी घरों में एक-न-एक व्यक्ति ज़रूर है, जिसे आर्सनिक और फ्लोराइड के दुष्प्रभाव ने मरीज़ बना दिया है। तक़रीबन 30 वर्षों से यहाँ यह समस्या है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने यहाँ पर स्वच्छ पानी के लिए मिनी प्लांट बिठाया है जिसमें कोई ख़ास दवा डाली जाती है, जिससे पानी शुद्ध होता है। इस दवा की क़ीमत लाखों में हैसरकार द्वारा नियुक्त ठीकेदार अपनी मनमानी करता है और समय पर दवा नहीं डालता, जिसके कारण ये पानी भी ज़हरीला है। जिन-जिन चापाकलों के पानी में आर्सनिक या फ्लोराइड की मात्रा ज़्यादा है, उन चापाकलों पर लाल निशान लगा दिए गए हैं और पानी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। परन्तु सभी लोग इन चापाकलों के पानी का उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि मिनी प्लांट समुचित पानी देने में असमर्थ है। लाल निशान वाले एक चापाकल से एक चुल्लू पानी पीकर मैंने देखा कि पीने में ये कैसा लगता है। स्वाद में सामान्य पानी जैसा ही रंगहीन गंधहीन। लेकिन ऐसे रसायन का समिश्रण जिससे इंसान की ज़िन्दगी में तक़लीफ़ और दर्द का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है, जो मृत्युपर्यन्त रहता है।   
इस गाँव से एक किलोमीटर की दूरी पर नारायणपुर कोलाखुर्द गाँव है, जहाँ एक कुआँ है, जिसके पानी में न तो फ्लोराइड है न आर्सनिक। सरकार ने एक योजना बनाई है जिसके तहत इस कुआँ के पास एक बड़ा कुआँ खोदकर पाईप लाइन द्वारा घर-घर पानी की आपूर्ति जाएगी। लेकिन हर सरकारी योजनाओं की तरह यह योजना भी फाइलों में दबी पड़ी है। यहाँ के लोगों के द्वारा बार-बार माँग करने पर सरकार ने तीन महीने के अंदर योजना के कार्यान्वयन की बात कही थी, लेकिन तीन महीने गुज़र चुके हैं।ग्रामीणों की स्थिति और भी विकट होती जा रही है। 
भागलपुर का यह जगदीशपुर प्रखंड कतरनी चावल के उत्पादन के लिए समूचे देश में प्रसिद्ध है। लेकिन इसका कोलाखुर्द गाँव न अनाज उपजाता है न कोई सब्ज़ी; क्योंकि सिंचाई तो इसी पानी से करनी होगी। सिर्फ़ वर्षा के पानी पर निर्भर होकर खेती सम्भव नहीं है। जिन्हें भी सम्भव हो सका वे गाँव छोड़कर चले गए। जो बिल्कुल असमर्थ हैं शारीरिक या आर्थिक रूप से, धीरे-धीरे ख़ुद को ख़त्म होते देख रहे हैं। अधिकांश मरीज़ ऐसे हो चुके हैं जिनका इलाज सम्भव नहीं है। न उठ सकते, न हिल सकते, न स्वयं दैनिक क्रिया-कलाप कर सकते, ख़ामोशी से मृत्यु का इन्तिज़ार कर रहे हैं।
इस गाँव से लगा हुआ मध्य विद्यालय है, जिसमें 145 बच्चे और चार शिक्षक हैं। कितने बच्चों को विकलांगता है, यह पूछने पर शिक्षकों ने अनभिज्ञता जताई। पाँच बच्चे वहीं सामने दिख गए, जिनके पाँव की हड्डी टेढ़ी हो गई हैस्कूल परिसर में मध्याह्न भोजन बनता है और बच्चों को खिलाया जाता है। आज भात (चावल) और दाल फ्राई बना, जिसमें दाल कम और पीला पानी ज़्यादा था। खाना बनाने वाली हमें देखकर डर गई कि कहीं सरकार की तरफ़ से कोई जाँच-पड़ताल तो नहीं। राकेश सिंह ने वहाँ की भाषा (अंगिका) में उसे समझाया कि डरो नहीं हम लोग सरकार के यहाँ से नहीं आए हैं, बस घूमने आए हैं। बहुत कहने पर भी वह खाना दिखाने से डरती रही, फिर वहीं के एक छात्र ने ढक्कन खोलकर खाना दिखाया। मेनू के हिसाब से खाना बना है; लेकिन मात्रा और पोषकता को कोई नहीं देखता। बीच-बीच में इसका भी अकस्मात अवलोकन और परीक्षण आवश्यक है।
कोलाखुर्द का दर्द पिघल-पिघलकर पूरे देश के अख़बार की ख़बरों का हिस्सा बनता है; लेकिन किसी इंसान के दिल को नहीं झकझोरता, न तो सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाता है। यहाँ स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है। भागलपुर जाकर इलाज कराना इनके लिए मुमकिन नहीं; क्योंकि आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि रोज़गार छोड़कर अपने घर वालों का अच्छा इलाज करा सकें। सरकार ने उन चापाकलों पर लाल निशान लगा दिए हैं, जिसका पानी दूषित है। प्लांट में समुचित पानी नहीं आता है, जिससे पूरे गाँव को पानी मिल सके; यों प्लांट भी दवा के अभाव में अशुद्ध पानी ही दे रहा है।ग्रामीणों के पास दो विकल्प हैं, या तो ज़हर पी-पीकर धीरे-धीरे पीड़ा से मरें या गाँव छोड़ दें। एक और विकल्प है जिससे कोलाखुर्द को बचाया जा सकता है और वह है सामूहिक आंदोलन, जिसके लिए समस्त ग्रामीणों को एकजुट होकर हिम्मत दिखानी होगी। फिर शुद्ध पानी-सप्लाई की ठण्डी योजना फ़ाइल से निकल कोलाखुर्द तक पहुँचेगी और एक गाँव मिटने से बच जाएगा। कई बार अधिकार न मिले तो छीनना पड़ता है और शुद्ध पानी हक़ हमारा कानून हमें देता है ।
एक सवाल जो मेरे ज़ेहन में आया और मैं पूछने से ख़ुद को रोक न सकी कि जब सभी जान चुके हैं कि पानी ज़हरीला है, तो महज एक किलोमीटर दूर जहाँ शुद्ध पानी है, वहाँ से कम-से-कम पीने का पानी तो हर घर में लाया जा सकता है, जब तक सरकार योजना पर अमल नहीं करती है। यों भी सरकार द्वारा चापाकल गड़वाने से पहले यहाँ के ग्रामीण उसी कुआँ से पानी लाते थे। ज़िन्दगी दाँव पर लगा सकते हैं, लेकिन थोड़ा अधिक मेहनत नहीं कर सकते। सरकार तो अपनी ही रफ़्तार से चलती है, लेकिन हमें अपनी रफ़्तार तो बढ़ानी और बदलनी चाहिए।
अलका सिंह, राकेश सिंह और मैं

-जेन्नी शबनम (8.6.2012)
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