Wednesday, December 12, 2012

40. समय की सीधी समझ (स्त्री) (12.12.12)

समय में न जाने कौन-सा पहिया लगा होता है कि पलक झपकते कई वर्ष घूम आता है और कई बार ऐसा कि धकेलते रहो, धकेलते रहो, पर सब कुछ स्थिर, तटस्थ समय का पहिया शायद हमारे मन के द्वारा संचालित होता है।सबका अपना-अपना मन, अपना-अपना समय, कभी उड़न्तु घोड़ा तो कभी अड़ियल मगरमच्छ मन होता ही ऐसा है कि कई युग एक साथ फलाँग जाए, तो कभी कई सदियों-सा एक-एक दिन जिए समय यायावर है, जाने कहाँ-कहाँ भटकता फिरता है और हम उसके पीछे भागते-भागते थक जाते हैं। समय के साथ क़दम-ताल मिलाना चाहकर भी कई बार मुमकिन नहीं होता, तो कई बार समय ख़ुद-ब-ख़ुद अपना क़दम हमारे क़दम के साथ साध लेता है। सुना है कि समय पर किसी का ज़ोर नहीं, पर कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे समय हमारे साथ दोहरी चाल चलता है।

यों महसूस होता है जैसे समय का पहिया सिर्फ़ स्त्रियों के लिए चलता है और अपनी रफ़्तार मनमाफ़िक़ बदलता है। कई बार ऐसा घूमता है कि स्तब्ध कर जाता है। होनी-अनहोनी, आशंकाएँ, दुविधा आदि न जाने क्यों सबसे ज़्यादा स्त्रियों के हिस्से में है। न समय साथ देता है, न ज़माना। फिर भी स्त्रियाँ अपने पल्लू में अपने लिए समय को बाँधे रखती हैं और अपने हिसाब से अपनी रफ़्तार तेज़-धीमी करती रहती हैं। हालाँकि स्त्री के साथ समय नहीं होता, पर स्त्री के पास समय के साथ होने के भ्रम को बनाए रखने के ढेर सारे तजवीज़ होते हैं। प्रेम, ममता, त्याग, स्थिरता, संकोच, समर्पण, सेवा भावना आदि ऐसे हथियार हैं, जो स्त्री के स्त्री होने के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट है और इससे ही वार कर अक्सर उसे कमज़ोर बनाया जाता है।

जन्म के पहले से स्त्री के यायावरी की कहानी शुरू होती है पिता, पति, पुत्र के घर से होते हुए स्त्री अंततः परलोक को अपना स्थायी निवास मानने लगती है। स्त्री की ज़िन्दगी सदैव मेहरबानियों पर टिकी होती है। अपनी ख़ुशी के लिए ग़ैरों की ख़ुशामद में सारी ज़िन्दगी बिता देती है। अगर किसी घर में पुत्र-पुत्री की परवरिश समान रूप से होती है, तो आगे चलकर उस स्त्री की ज़िन्दगी ज़्यादा दुःखद हो जाती है। उस स्त्री को समाज रूपी समय समझा देता है कि स्त्री का समय अलग होता है और पुरुष का अलग। स्त्री को अपने समय के हिसाब से चलना ही चाहिए, वर्ना समय का कुचक्र स्त्री का सबकुछ छीन लेता है। हमारी परम्पराएँ और रूढ़ियाँ सदैव पुरुष के पक्ष व हित में स्थापित की गईं, और इसका ख़म्याज़ा स्त्री पूरी ज़िन्दगी चुकाती रहती है।
  
हमारी संस्कृति हमारे जीवन को राह दिखाती है और हमारे संस्कार राह पर चलने के तरीक़े। हमारी संस्कृति और संस्कार बनाने और पोषित करने वाले भी तो हमारे जैसे ही लोग रहे होंगे। सामयिक ज़रूरत के हिसाब से स्थापित मूल्यों और आदर्शों को परम्परा के नाम पर हम पर थोप दिया गया, भले वह आज के समय के हिसाब से अतार्किक और असंगत हो। स्त्रियों के लिए स्पष्टतः कर्त्तव्य निर्धारित किए गए और पाप-पुण्य की कसौटी पर सारे कार्य बाँट दिए गए। एक लक्ष्मण रेखा जन्म से खींच दी गई, जिसे पार करना निषिद्ध है। निर्देशित मर्यादा का पालन करना होगा, अगर न किया तो पाप की सज़ा ऐसी कि मृत्युदण्ड से भी पूरी न हो।

धीरे-धीरे समय ने ज़रा-सी ज़हमत की और स्त्री के हक़ में ज़रा-सा बोलना शुरू किया। फिर भी समय अपनी ताक़त दिखाता रहा और पुरुष को कुरेद-कुरेदकर स्त्री के विरुद्ध सुलगाता रहा स्त्री को उसका अपना शरीर एक शाप के रूप में मिला और साथ ही पूँजी के रूप में भी, जिसका इस्तेमाल पुरुष करता रहा अपने फ़ायदे के लिए और कभी-कभी स्त्री भी अपने फ़ायदे और मज़बूरी में। स्त्री अपने शरीर की सुरक्षा में जीवनभर जुटी रहती है; क्योंकि उसका बदन अगर किसी ग़ैर ने छू भी लिया तो पापी कहलाएगी स्त्री की कोख से स्त्री का जन्म लेना भी समाज को सह्य नहीं।और जहाँ स्त्री को स्त्री-जन्म का अधिकार मिला, तो ऐसे जैसे बहुत बड़ा एहसान किया गया हो। एहसानों तले दबी स्त्री किस-किस के एहसान से दबती रही, कौन जाने। दोनों हथेलियों से समय और समाज के आगे गुहार लगाती स्त्री अंततः ख़ाली मुट्ठी को भरा हुआ मान मुट्ठी बाँध लेती है और मुट्ठी में सुख सहेजे रहने का भ्रम ख़ुद को और समय को देती है। 

समय को शायद शाप है अबूझ बने रहने का और किसी के भी क़ाबू में न आने का। सबसे बड़ा कार्य जो समय ने पुरुष के पक्ष में किया वह है पुरुष को पुरुष का बदन देना। वैसे हर युग में स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक माना गया, चाहे शरीर के रूप में हो या मन के। शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण एक दूसरे के पूरक माने गए। लेकिन आम पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक नहीं बन सके। अगर कोई बनना चाहे तो बनने नहीं दिया जाता है। बहुत सारे निषेध हैं जिनका पालन अनिवार्य है और यह माना जाता है कि पुरुष का पुरुषत्व स्त्री के बराबरी से कम हो जाता है। स्त्री पर अपना आधिपत्य बनाए रखना पुरुषोचित गुण है, भले इसके लिए स्त्री का शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाए। सिर्फ़ एक अवसर है जब स्त्री को सम्मान मिलता है और वह है धार्मिक क्रिया-कलाप।

समय कभी-कभी बेरहम मज़ाक भी करता है और स्त्री को स्त्री बने रहने का सबूत देना पड़ता है। स्त्री को अपनी समस्त मर्यादाओं का पालन बिना सवाल किए करना होता है और आजीवन अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए पुरुषों की कृपा पर निर्भर रहना होता है। वह कृपा चाहे एक पिता करे या पति या पुत्र। सामाजिक सोच ऐसी बन चुकी है कि पुरुष अपनी सफलता का श्रेय ख़ुद को देता है और विफलता का दोष स्त्री को। एक ही स्त्री किसी पुरुष के लिए नरक का द्वार है, तो किसी के लिए स्वर्ग का। अब ये समय की टेढ़ी नज़र है या समय का कतरा हुआ पर, कौन जाने।

समय कभी-कभी ख़ुद को बड़ा असमंजस में पाता है कि आख़िर किसका साथ दे और कैसे दे। जब किसी स्त्री ने स्त्री के हक़ की बात की, तो उसे ऐसे फेमिनिस्ट कहा जाता है जैसे वह अछूत हो और गाली की हक़दार हो।अगर कोई पुरुष स्त्री के अधिकार के लिए आवाज़ उठाए या बराबरी की बात करे, तो उसे जोरू का ग़ुलाम या नामर्द कहा जाता है। 
 
आजकल जब समय ने अपनी एक आँख खोली और थोड़ा जागरूक हुआ, तो स्त्री के हक़ की बात करना फ़ैशन बन गया। स्त्री को समान शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन आदि का अधिकार देना और इसका ढोल पीटना सम्मान पाने का एक नया तरीक़ा ईजाद हुआ और संवेदनशील होने का प्रमाण बन गया। सब समय की कृपा है।

समय के पहिया में पंख लग गया और बदलाव के इस युग में क्रान्तियाँ फुर्र से उड़ गईं। मेरे अपने देखे और जाने 45 साल में कुछ नहीं बदला है। उन दिनों भी स्त्री महज़ स्त्री थी और आज भी स्त्री सिर्फ़ स्त्री है, जैसी सतयुग में रही होगी। समय तो अपने आँख-कान बंद कर लेता है, जब उसके पास जवाब नहीं होते। लेकिन स्त्री अपने सवालों से कैसे पीछा छुड़ाए, किससे पूछे अपनी त्रासदी का सबब और किससे करे वेदना भरे सवाल। समय वाचाल है। स्त्री हार-हार जाती है फिर उठकर अपने जीवन का औचित्य तलाशती है। स्त्री अपना औचित्यहीन जीवन कभी प्रेम, कभी पूजा, कभी त्याग में व्यतीत करती है। वह एक-एक पल गिनती रहती है जब वह अपने स्थायी घर (स्वर्ग) जा सके और इस इन्तिज़ार में जीवन काटती है। लम्पट समय मुस्कुराता है और पुरुष के सम्मान में स्त्री के लिए मर्सिया गाता है।

समय दौड़ता-भागता, उड़ता-नाचता, गिरता-पड़ता, अपना खेल खेलता है।जीवन इसी में चलता है, कभी समय के साथ, कभी समय के पीछे। समय के आगे तो कोई चल न सका। समय तो समय है, लिंग-भेद से परे और लिंग-भेद करता हुआ, सदियों का इतिहास ख़ुद में समेटे पल-पल इतिहास बनाता हुआ। आज यों लगता है जैसे समय ने अपने क़दम की रफ़्तार को संयमित कर लिया है और सभी के लिए अपने क़दम के लय को सुगम बना लिया है; क्योंकि आज की तारीख़ 12.12.12 रोचक और दुर्लभ है, अद्भुत संयोग है।समय स्थिर होकर सब नज़ारा देख रहा है। आज के जश्न में शामिल समय इस अद्भुत तारीख़ के आवभगत के लिए ख़ुद को पिछली सदी से ही तैयार कर चुका है। अगली सदी में एक नए इतिहास के साथ जब आज का समय आज को याद करेगा, तब तक शायद समय भी चेत जाए और सबके लिए एक-सा सुखद और आनन्ददायक बन जाए

-जेन्नी शबनम (12.12.12)
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Monday, November 12, 2012

39. तिथियों की तिकड़म (10.11.12)

आज एक ग़ज़ल बार-बार गुनगुनाने को मन कर रहा है "एक ब्राह्मण ने कहा है कि साल अच्छा है...।" ज्योतिषियों के अनुसार आज की तिथि 10.11.12 अंक के बढ़ते क्रम के अनुसार होने के कारण बहुत शुभ है और यह दिन उनके लिए ज़्यादा सौभाग्यशाली है, जिनका जन्म आज हुआ है या आज होगा। यह तारीख़ इस सदी की ऐसी तारीख़ है जो दुबारा नहीं आएगी। हाँ! यह सच है कि कोई ख़ास तारीख़ हमारे जीवन में ख़ास महत्व रखती है। यों तो हर बीता लम्हा दुबारा नहीं आता, पर हर लम्हा ख़ास होते हुए भी ख़ास नहीं होता, आम दिनों-सा हर दिन बीत जाता है। लेकिन ख़ास तारीख़ का हमें इन्तिज़ार रहता है। ख़ास तारीख़ पर देश ही नहीं दुनिया के तमाम ज्योतिष अपनी-अपनी भविष्यवाणी करते हैं। शुभ क्या-क्या है और क्या-क्या हो सकता है, ये तो कोई नहीं जानता, लेकिन शुभ-अशुभ जानना हर कोई चाहता है। शुभ-दिन, शुभ-घड़ी, शुभ-तिथि, शुभ-साल, शुभ शुभ शुभ...! 

हर कोई अपने लिए शुभ चाहता है और दूसरों को शुभ का सन्देश देता है। लेकिन शुभ-अशुभ की ठीक-ठीक व्याख्या न कोई ज्योतिष कर पाता है न कोई इंसान निर्धारित कर सकता है। एक ही घड़ी-नक्षत्र में जन्म लिए हुए दो व्यक्ति का जीवन दो दिशा में चला जाता है। कोई सुख-सुविधा से परिपूर्ण जीवन पाता है, तो कोई आजीवन कष्ट में जीवन यापन करता है। कोई बिना लड़े दुनिया जीत लेता है, तो कोई जीवटता से लड़ते हुए न सिर्फ़ जंग हारता है; बल्कि जीवन भी हार जाता है। किसी की पूरी ज़िन्दगी काँटों भरी राह पर चलते हुए गुज़रती है, तो किसी की राहों में सिर्फ़ फूल-ही-फूल बिछे होते हैं। तमाम जद्दोजहद के बाद भी किसी का जीवन बिना जिए ख़त्म हो जाता है, तो कोई जीवन ख़त्म करने के सारे उपाय करके भी जीवन ढोता रहता है।किसी के जीवन में सिर्फ़ अँधेरा-ही-अँधेरा होता है, तो कोई अँधेरों में ख़ुद को ही जलाकर रोशनी करना सीख जाता है। आख़िर ऐसी तक़दीर कैसे? किसने बनाई? अगर तक़दीर बदल सकती है, तो फिर ऐसी तक़दीर मिली ही क्यों? बहुत सारे क्यों हैं, इस क्यों के निवारण के लिए ज्योतिष के पास जाना होगा।

ज्योतिषियों ने कहा कि पिछले जन्म के पाप-पुण्य इस जन्म की तक़दीर का निर्धारण करते हैं। किसी का जन्म सम्पन्न परिवार में होगा या विपन्न, कौन किस जाति में जन्म लेगा, किसका जीवन आनन्ददायक होगा और कौन आजीवन कष्ट भोगेगा, इन सबका कारण पिछले जन्म का किया गया हमारा कर्म है। मृत्यु के बाद स्वर्ग में जाना या नरक में, इसका निर्धारण भी इस जन्म का हमारा कर्म करेगा। अगर हमारे तक़दीर में कोई कमी है, तो उसके निवारण का उपाय इन ज्योतिषियों के पास है। 
 
हमारी कुण्डली में यह निर्दिष्ट होता है कि कौन सा ग्रह हम पर क्या असर डालेगा और क्या करने से किसी ख़ास ग्रह के प्रकोप से बचा जा सकता है जीवन में अकस्मात् कोई घटना घट जाए जो बुरी हो या कोई बुरी घटना न घटे इसके लिए एक नहीं कई उपाय हैं। जैसे अलग-अलग मरज़ के लिए अलग-अलग डॉक्टर, वैसे ही अलग-अलग मरज़ के लिए अलग-अलग उपाय। 

अक्सर सुना है कि ये बुरा वक़्त और ये अच्छा वक़्त है। अब बुरा में क्या-क्या होगा ये कैसे पता चले। जीवन सहजता-सरलता से चलता रहे, तो अच्छा वक़्त और जीवन में ज़रा भी बाधा या विघ्न आए तो बुरा वक़्त। कभी भी कोई ज्योतिष स्पष्टतः यह नहीं बताता कि अच्छा या ख़राब में क्या-क्या शामिल किया जाए। कई बार जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब लगता कि जीवन बस अब यहीं ख़त्म; लेकिन वही कारण किसी दूसरे के लिए महत्वपूर्ण नहीं होते, और उनके हिसाब से ये जीवन के अंत की वज़ह नहीं हो सकते। कई बार बिलकुल सामान्य-सी लगने वाली घटना किसी का जीवन पूरी तरह से बदल देती है, तो वही घटना किसी के लिए अर्थहीन होती है। कोई अनहोनी किसी का सम्पूर्ण जीवन बदल देती है, तो कई बार कोई अनहोनी किसी को उसके राह से डिगा नहीं पाती है। 

मुमकिन है हमारी संवेदनाएँ इन सब के लिए ज़िम्मेदार हों। मगर ज्योतिष? क्या किसी मनुष्य में इतनी ताक़त है कि वह भविष्य के बारे में बता सके? किसी अँगूठी में इतनी क्षमता है कि ईश्वर द्वारा लिखी हुई तक़दीर को हमारी इच्छा और कामना के अनुरूप बदल सके? क्या कोई तिथि शुभ-अशुभ होती है? अगर होती है, तो इसकी जानकारी रखने वाला क्यों नहीं स्पष्ट रूप से बता देता कि क्या-क्या शुभ होगा और क्या-क्या अशुभ। अगर अशुभ होने के संकेत मिले, तो उसे शुभ में बदलने के उपाय समय रहते ही कर लिए जाएँ; फिर इस पृथ्वी पर कोई असंतुष्ट न रहेगा। मुमकिन है ऐसा इसलिए नहीं करते होंगे कि अगर सभी सुखमय हो जाएँ, तो दुखी मन कहाँ से आए, जिन्हें राहत देने के लिए इन भविष्यवक्ताओं के बाज़ार क़ायम रहे। स्वार्थ की पूर्ती के लिए अगर इन पर भरोसा कर एक-आध अँगूठी पहन ली जाए तो इसमें बुरा क्या है। ऐसी सोच... घोर अनर्थ... आख़िर ये भी तो जीविका के साधन हैं और जीवन यापन का सभी को अधिकार है। भला इसमें ग़लत क्या है? अब कोई ज्योतिष तो किसी के पीछे नहीं पड़ता कि भई अपना भविष्य जान लो। लोग अपनी इच्छा से आते हैं ताकि जीवन सँवार सकें, अब इसमें बेचारे ज्योतिषियों का क्या दोष?

यों अब भविष्यवाणी पर ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं रहा। समय के साथ सब कुछ बदल गया है। जो भी चाहे ज्योतिष शास्त्र पढ़कर इस पेशा को अपना सकता है और धन अर्जित कर सकता है। बस इतना कोई बता दे आज के दिन क्या-क्या अच्छा होगा और आने वाली कौन सी ख़ास तारीख़ क्या-क्या ख़ास ख़ुशियाँ देंगी। इस सदी के इस अनोखे दिन में दुनिया में क्या-क्या ख़ास होने वाला है, ये जानने का इन्तिज़ार है। वैसे भी आज का दिन अच्छा है, तो भई शुभ-शुभ बोलो! अब ब्राह्मण ने कहा है तो मान लेते हैं कि आज का दिन शुभ है। आज का दिन शुभ हो!

-जेनी शबनम (10.11.12)
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Thursday, June 21, 2012

38. क्योंकि वह ताजमहल नहीं था

साइनबोर्ड 
एक बार फिर रोई अमृता, फूट-फूटकर रोई। इमरोज़ के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़कर झिंझोड़कर पूछा- ''क्यों नहीं बचाया मेरा घर? क्यों नहीं लड़ सके तुम मेरे लिए?'' ''बोलो इमा, क्यों नहीं रोका तुमने उन लोगों को, जो मेरी ख़्वाहिशों को उजाड़ रहे थे, हमारे प्रेम के महल को ध्वस्त कर रहे थे? हर एक कोने में मैं जीवित थी तुम्हारे साथ, क्यों छीन लेने दिया मेरा संसार?'' 
इमरोज़ जी
इमरोज़ निःशब्द! इमरोज़ बेबस! ख़ामोशी से अपनी माझा को रोते हुए देखते रहे। आँखें भीग गईं, फिर तड़पकर कहा- ''माझा, मैं क्या करता, मेरा हक़ तो सिर्फ़ तुम पर था न, उस घर पर नहीं। मैं कैसे रोकता उन्हें?'' ''माझा! मैं घर को बचा नहीं सका, मैं किसके पास जाकर गिड़गिड़ाता? जिन लोगों ने तुमको इतना सम्मान दिया, पुरस्कृत किया, उन लोगों में से कोई भी तुम्हारे धरोहर को बचाने नहीं आया।'' ''माझा! उस घर को मैं अपने सीने में समेट लाया हूँ। हमारे घर के ऊपर बने विशाल बहुमंजिली इमारत में वे ईंटें दफ़्न हैं, जिन्हें तुमने जोड़ा था और मैंने रंगों से सजाया था।'' ''ये देखो माझा! हमारी वह तस्वीर ले आया, जब पहली बार तुम मेरे लिए रोटी सेंक रही थी, तुम्हें कितना अच्छा लगता था मेरे लिए खाना बनाना। ये देखो! वह कप भी मैं ले आया हूँ, जिसमें हर रात मैं तुमको चाय देता हूँ; रात में तुम अब भी लिखते समय चाय पीना चाहती हो न। वह देखो! उस तस्वीर में तुम कितनी सुन्दर लग रही हो, जब पहली बार हम मिले थे। वह देखो! हमारे घर का नेम-प्लेट 'अमृता प्रीतम, के-25', और देखो वह तस्वीर जिसे बनाने में मुझे पाँच साल लगे थे, जिसे तुम्हारे कहने पर मैंने बनाया था 'वुमेन विद माइंड'।'' ''माझा, मैं अपनी तक़लीफ़ किसे दिखाऊँ? मेरी लाचारी तुम समझती हो न! तुम तो चली गई, मुझे अकेला छोड़ गई। सभी आते हैं और मुझमें तुमको ढूँढते हैं, पर मैं तुमको कहाँ ढूँढूँ?'' ''माझा!  मेरा मन बस अब तुम्हारा घर है, क्योंकि अब तुम सीधे मेरे पास आती हो, पहले तो तुम जीवन के हर खट्टे-मीठे अनुभव के बाद मुझ तक आई थी। तुम्हारी यादें और मैं अब मेरा घर है।''     
बिकने के बाद टूटकर बन रहा k-25
किसी जीवित घर का मिटाया जाना विधि का विधान नहीं, न नियति का क्रूर मज़ाक है; बल्कि मनुष्य के असंवेदनशील होने का प्रमाण है। उस घर का बाशिंदा कितना तड़पा होगा, जब उससे वह घर छीन लिया गया होगा, जिसमें उसकी प्रियतमा की हर निशानी मौजूद है ये सब अतीत की कथा नहीं बल्कि उसका वर्तमान जीवन है। कितना रोया होगा वह। कितना पुकारा होगा वह अपनी प्रियतमा को, जिसने अकेला छोड़ दिया यादों के सहारे जीने के लिए पर उसने सदैव उसे अपने साथ महसूस किया है, उसे सोचा नहीं; बल्कि उसके साथ जी रहा है। कितनी बेबस हुई होगी उस स्त्री की आत्मा जब उसके सपनों का घर टूट रहा होगा और उसका हमसफ़र उसकी निशानियों को चुन-चुनकर समेट रहा होगा। तोड़ दिया गया प्रेम का मन्दिर। फफक पड़ी होंगी दीवार की एक-एक ईंटें। चूर हो गया किसी स्त्री की ख़्वाहिशों का संसार। कैसे दिल न पिघला होगा उसका, जिसने इस पवित्र घर को नष्ट कर दिया। क्या ज़रा भी नहीं सोचा कि अमृता की आत्मा यहाँ बसती है? अमृता को उसके ही घर से बेदख़ल कर दिया गया और उसकी निशानियों को सदा के लिए मिटा दिया गया। 
कुछ यादें- अमृता-इमरोज़
हौज़ ख़ास के मकान नम्बर k-25 के गेट में घुसते ही सामने खड़ी मारुती कार, जिसे अमृता-इमरोज़ ने साझा खरीदा था, अब कभी नहीं दिखेगी। घंटी बजाने पर कुर्ता-पायजामा और स्पोर्ट्स शू पहने ज़ीने से उतरकर दरवाज़ा खोलते हर्षित इमरोज़, जो बहुत ख़ुश होकर पहली मंजिल पर ले जाते और सामने लगी खाने की मेज़-कुर्सी पर बिठाते हुए कहते हैं- ''देखो वहाँ अमृता अभी सो रही है'', साथ लगी उस रसोई में ख़ुद चाय बनाते, जिस रसोई में न जाने कितनी बार अमृता ने रोटी पकाई होगी; अब कभी न दिखेगी। रसोई में रखी काँच की छोटी-छोटी शीशियाँ भी उस वक़्त की गवाह हैं, जब अमृता रसोई में अपने हाथों से कुछ पकाती थीं और इमरोज़ उसे निहारते थे। अमृता का वह कमरा जहाँ अमृता ने कितनी रचनाएँ गढ़ीं, जहाँ इमरोज़ की गोद में अन्तिम साँस ली; अब कभी नहीं दिखेगा। कैनवस पर चित्रित अमृता-इमरोज़ की साझी ज़िन्दगी का इन्द्रधनुषी रंग जो उस घर के हर हिस्से में दमकता था, अब कभी नहीं दिखेगा। सफ़ेद फूल जो अमृता को बहुत पसन्द है, इमरोज़ हर दिन लाकर सामने की मेज़ पर सजा देते थे; अब उस मेज़ की जगह बदल चुकी है। अमृता की रूह शायद अब भी उस जगह भटक रही होगी; मेज़, फूल और फूलदान को तलाश रही होगी। छत के पास अब भी पंछी आते होंगे कि शायद इमरोज़ आ जाएँ और दाना-पानी दे जाएँ, पर अब जब छत ही नहीं रहा तो पखेरू दर्द भरे स्वर में पुकारकर लौट जाते होंगे। 
साहिर-अमृता
अमृता का जीवन, अमृता का प्रेम, अमृता की रचनाएँ, अमृता के बच्चों की किलकारियाँ, अमृता के हमसफ़र की जुम्बिश, चाय की प्याली, कैनवस पर इमरोज़ का जीवन- अमृता, रसोईघर में चाय बनाते इमरोज़, रोटी सेंकती अमृता, बच्चों को स्कूटर पर स्कूल छोड़ते इमरोज़, हर शाम पंछियों को दाना-पानी देते इमरोज़, पूरी दुनिया में अपनी रचनाओं के द्वारा सम्मानित अमृता जो अपने बिस्तर पर लाचार पड़ी है - वृद्ध अशक्त अमृता का सहारा बनते इमरोज़, हर एक तस्वीर जिसमें अमृता है का विस्तृत विवरण देते इमरोज़; अमृता और अमृता का साझा-संसार जो उनके मन में सिमट गया है इमरोज़ जो बिना थके कई बार नीचे दरवाज़ा खोलने, कभी छत पर पौधों में पानी डालने, कभी सबसे ऊपर की छत पर पंछियों का कलरव देखने आते जाते रहते। इमरोज़ के माथे पर न शिकन न शिकायत, बदन में इतनी स्फूर्ति मानो अमृता ने अपनी सारी शक्ति सहेजकर रखी हो और विदा होते वक़्त अन्तिम आलिंगन में सौंप दिया हो और चुपके से कहा हो ''मेरे इमा, मैं इस शरीर को छोड़कर जा रही हूँ, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी, तुम कभी थकना नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूँ, पग-पग पर, पल-पल में, वक़्त के उस आख़िरी छोर तक जब तक तुम इस शरीर में हो, सामने वाले कमरे में बैठी मैं हर रात तुम्हारे लिए गीत रचूँगी और जिसे तुम अपने हाथों से नज़्म का रूप दोगे। मैं तुम्हारी माझा, तुम्हारे लिए सदैव वर्तमान हूँ, यों भी तुम इमरोज़ हो जिसका अर्थ है आज, तुम मेरे आज हो, मेरी ख़्वाहिशों को तुम पालना, हमारे इस घर में मैं हर जगह मौजूद रहूँगी, तुम जीवन का जश्न जारी रखना, तुम्हारे कैनवस पर और तुम्हारी नज़्मों में मैं रहूँगी, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।'' 
मुश्किलों से जूझती अमृता का 'अमृता प्रीतम' बनना इतना सहज नहीं हुआ होगा। पति से अलग हुई एक आम औरत जिसके दो छोटे बच्चे, जीवन सरल नहीं रहा होगा। टूटी-हारी 40 वर्षीया अमृता को इमरोज़ का साथ और फिर समाज की मान्यताओं और प्रतिमानों से जूझना बेहद कठिन हुआ होगा। रेडियो स्टेशन में कामकर घर चलाती अमृता ने कैसे-कैसे दिन देखे होंगें, ये तो बस वे जानती हैं या इमरोज़। अमृता का सम्पूर्ण अस्तित्व जो उस एक घर में बना, पसरा, फिर सिमटा, कितनी क्रूरता से मिटा दिया गया।इमरोज़ के लिए नहीं, तो कम-से-कम उस औरत, जिसकी हर ख़्वाहिशें और ज़िन्दगी यहाँ मौजूद थी, पर तो रहम किया होता। प्रेम की दुहाई देने वाले और अमृता-इमरोज़ के प्रेम की मिसाल देने वाले कहाँ गए? क्या जीवन के बाद ऐसे ही भुला दिया जाता है उसकी हस्ती को, जिसने समाज को एक नई सोच और दिशा दी, जिसने स्त्री होने के अपराधबोध से ग्रस्त होना नहीं सीखा और स्त्री को गौरव प्रदान किया, पुरुष को सिर्फ़ एक मर्द नहीं, बल्कि एक इंसान और सच्चे साथी के रूप में समझा।   
नए फ्लैट का एक कोना
अब कहाँ ढूँढूँ उस घर को? प्रेम के उस मन्दिर को? वह घर टूटकर बहुमंजिली इमारत में तब्दील हो चुका है। अमृता बहुत रो रही थी और अपने इमरोज़ को समझा रही थी- ''वह सिर्फ़ एक मकान नहीं था इमा, हमारा प्रेम और संसार बसता था वहाँ। मेरे अपनों ने मुझे मेरे ही घर से बेदख़ल कर दिया। हाँ इमा! जानती हूँ तुम्हारी बेबसी, मेरे घर के कानूनी हक़दार तुम नहीं हो न! दुनिया के रिवाज से तुम मेरे कोई नहीं, ये बस मैं जानती हूँ कि तुम मेरे सब कुछ हो, जानती हूँ तुम यहाँ मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहे होगे पर कानून... उफ़!''
नए घर के एक आईने में मैं और इमरोज़ जी
इमरोज़ जी से पूछने पर कि उस घर को क्यों बेच दिया गया, वे कहते हैं- ''जीवन में 'क्यों' कभी नहीं पूछना, हर 'क्यों' का जवाब भी नहीं होता है, जो होता है ठीक ही होता है।'' ''अगर अमृता होती तो उनको कैसा लगता?'' पूछने पर बहुत संजीदगी से मुस्कुराते हुए कहते हैं- ''अगर अमृता होती तो वह घर बिकता ही नहीं।'' ''ये घर भी बहुत बड़ा है और बच्चों को जो पसन्द मुझे भी पसन्द, अपने बच्चों के साथ ही मुझे रहना है।'' 
विस्तार से घर दिखाते इमरोज़ जी और मैं
इमरोज़ के साथ अमृता अब नए घर में आ चुकी है। अमृता के परिवार के साथ दूसरे मकान में शिफ्ट होते समय इमरोज़ जी ने अमृता की हर निशानी को अपने साथ लाया है और पुराने मकान की तरह यहाँ भी सजा दिया है।हर कमरे में अमृता, हर जगह अमृता। चाहे उनके पेंटिंग करने का कमरा हो या उनका शयन कक्ष, गैलरी, भोजन कक्ष, या फिर अन्य कमरा अमृता को देखना या महसूस करना हो, तो हमें के-25 या एन-13 नहीं बल्कि इमरोज़ से मिलना होगा। इमरोज़ जी के साथ अमृता हर जगह हैं, चाहे वे जहाँ भी रहें। 
इमरोज़ जी और मैं
-जेन्नी शबनम (21.6.2012)
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Friday, June 8, 2012

37. विकलांगों का गाँव

''न चल सकते, न सो सकते, न बैठ सकते हैं, कैसे जीवन काटें?'' कहते-कहते गीता देवी की आँखों में आँसू भर आते हैं। मेरे पास कोई जवाब नहीं, क्या दूँ इस सवाल का जवाब मैं पूछती हूँ ''कब से आप बीमार हैं?'' 50 वर्षीया शान्ति देवी विकलांग हो चुकी हैं, रो-रोकर बताती हैं ''जब से सरकार ने चापाकल गाड़ा है, ज़हर पी-पीके हमारा ई हाल हुआ है।'' वे अपने दोनों पाँव को दिखलाती हैं, जिसकी हड्डियाँ टेढ़ी हो चुकी हैं। उन्होंने कहा ''जब तक चापाकल नहीं गाड़ा गया था, तब तक पानी का बहुत दिक्क़त था।लेकिन अब लगता है कि ये चापाकल ही हमारा जान ले लेगा, तो हम कभी इसका पानी नहीं पीते।'' खटिया पर बैठे हुए वह अपने घर का चापाकल दिखाती हैं और इशारा करती हैं उन डब्बों की ओर जिसमें पानी भरकर रखा हुआ है। वे कहती हैं कि सरकार थोड़ा-बहुत पानी का इन्तिज़ाम की है, वहीं से पानी लाकर रखते हैं, बाक़ी काम तो इसी ज़हर वाले पानी से करना पड़ता है।''
45 वर्षीया गीता देवी का पूरा बदन सूख गया है, दोनों हाथ-पाँव की हड्डियाँ टेढ़ी होकर अकड़ गई हैं, ख़ुद से कुछ नहीं कर सकतीं। अपना व्यक्तिगत काम करने में भी असमर्थ हैं। उनकी बीमारी के कारण देखकर लगता है जैसे वह 60 साल की हों। उनसे पूछने पर कि यह बीमारी कब से है, वे ऐसे देखती हैं मानो उनके कान सुन्न पड़ चुके हैं और ज़ुबाँ भी ख़ामोश, बस बेचारगी से चुपचाप देखती हैं। उनके पति बताते हैं कि क़रीब दो-तीन साल पहले बीमार हुई और धीरे-धीरे पूरा देह सूखकर अकड़ गया। वे बताते हैं कि वही ज़हर जो पूरे गाँव को एक-एक करके खा रहा है उसी से ऐसा हाल हुआ है।
डी.पी.एस. भागलपुर के प्रधानाध्यापक श्री राकेश सिंह और हिन्दी की शिक्षिका श्रीमती अलका सिंह के साथ मैं भागलपुर शहर से क़रीब 15 किलोमीटर दूर जगदीशपुर प्रखंड के कोलाखुर्द गाँव में पहुँची। राकेश सिंह के एक मित्र जो भागलपुर में फिजियोथेरेपिस्ट हैं और उस गाँव के मरीजों को देखने जाते हैं, हमारे साथ थे। गाँव में घुसते ही 20-25 लोग इकट्ठे हो गए। सभी का अपना-अपना दर्द, कुछ बदन की पीड़ा कुछ मन की पीड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि तक़रीबन 2000 की आबादी वाले इस गाँव में लगभग 100 व्यक्ति पूर्णतः या अंशतः विकलांग हो चुके हैं। कितने बड़े-बड़े नेता आए, कितने पेपरों में छपा। देश में कई जगहों पर यहाँ का पानी टेस्ट हुआ और सभी रिपोर्ट में आर्सनिक और फ्लोराइड होने की पुष्टि हुई। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। अब भी ज़हर वाला पानी पी रहे हैं सभी। फ्लोराइड और आर्सनिक के कारण लगभग सभी को जोड़ में दर्द और हड्डी की समस्या है। रीढ़ की हड्डी धनुष की तरह मुड़ गई है। कई लोगों ने गाँव को छोड़ दिया है। ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता, न यहाँ की बेटी से कोई जल्दी ब्याह करना चाहता है। अपना खेत होते हुए भी कई लोग खेती छोड़कर पंजाब, गुजरात, दिल्ली पलायन कर चुके हैं। उनकी कमाई इतनी कम है कि घरवालों को ले नहीं जा सकते और जितना कमाते हैं परिवार वालों की बीमारी पर ख़र्च हो जाता है। छोटे-छोटे बच्चों का पाँव टेढ़ा हो गया है, वे सीधे चल नहीं पाते हैं। सरकार योजना तो बनाती है; लेकिन कितने लोगों को अपाहिज बनाने के बाद कुछ करेगी क्या पता।
कोलाखुर्द गाँव जहाँ अधिकांश राजपूत हैं और सभी के पास खेत है; परन्तु सिंचाई के अभाव में खेत-खलिहान बंजर पड़े हुए हैं। सभी घरों में एक-न-एक व्यक्ति ज़रूर है, जिसे आर्सनिक और फ्लोराइड के दुष्प्रभाव ने मरीज़ बना दिया है। तक़रीबन 30 वर्षों से यहाँ यह समस्या है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने यहाँ पर स्वच्छ पानी के लिए मिनी प्लांट बिठाया है जिसमें कोई ख़ास दवा डाली जाती है, जिससे पानी शुद्ध होता है। इस दवा की क़ीमत लाखों में हैसरकार द्वारा नियुक्त ठीकेदार अपनी मनमानी करता है और समय पर दवा नहीं डालता, जिसके कारण ये पानी भी ज़हरीला है। जिन-जिन चापाकलों के पानी में आर्सनिक या फ्लोराइड की मात्रा ज़्यादा है, उन चापाकलों पर लाल निशान लगा दिए गए हैं और पानी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। परन्तु सभी लोग इन चापाकलों के पानी का उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि मिनी प्लांट समुचित पानी देने में असमर्थ है। लाल निशान वाले एक चापाकल से एक चुल्लू पानी पीकर मैंने देखा कि पीने में ये कैसा लगता है। स्वाद में सामान्य पानी जैसा ही रंगहीन गंधहीन। लेकिन ऐसे रसायन का समिश्रण जिससे इंसान की ज़िन्दगी में तक़लीफ़ और दर्द का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है, जो मृत्युपर्यन्त रहता है।   
इस गाँव से एक किलोमीटर की दूरी पर नारायणपुर कोलाखुर्द गाँव है, जहाँ एक कुआँ है, जिसके पानी में न तो फ्लोराइड है न आर्सनिक। सरकार ने एक योजना बनाई है जिसके तहत इस कुआँ के पास एक बड़ा कुआँ खोदकर पाईप लाइन द्वारा घर-घर पानी की आपूर्ति जाएगी। लेकिन हर सरकारी योजनाओं की तरह यह योजना भी फाइलों में दबी पड़ी है। यहाँ के लोगों के द्वारा बार-बार माँग करने पर सरकार ने तीन महीने के अंदर योजना के कार्यान्वयन की बात कही थी, लेकिन तीन महीने गुज़र चुके हैं।ग्रामीणों की स्थिति और भी विकट होती जा रही है। 
भागलपुर का यह जगदीशपुर प्रखंड कतरनी चावल के उत्पादन के लिए समूचे देश में प्रसिद्ध है। लेकिन इसका कोलाखुर्द गाँव न अनाज उपजाता है न कोई सब्ज़ी; क्योंकि सिंचाई तो इसी पानी से करनी होगी। सिर्फ़ वर्षा के पानी पर निर्भर होकर खेती सम्भव नहीं है। जिन्हें भी सम्भव हो सका वे गाँव छोड़कर चले गए। जो बिल्कुल असमर्थ हैं शारीरिक या आर्थिक रूप से, धीरे-धीरे ख़ुद को ख़त्म होते देख रहे हैं। अधिकांश मरीज़ ऐसे हो चुके हैं जिनका इलाज सम्भव नहीं है। न उठ सकते, न हिल सकते, न स्वयं दैनिक क्रिया-कलाप कर सकते, ख़ामोशी से मृत्यु का इन्तिज़ार कर रहे हैं।
इस गाँव से लगा हुआ मध्य विद्यालय है, जिसमें 145 बच्चे और चार शिक्षक हैं। कितने बच्चों को विकलांगता है, यह पूछने पर शिक्षकों ने अनभिज्ञता जताई। पाँच बच्चे वहीं सामने दिख गए, जिनके पाँव की हड्डी टेढ़ी हो गई हैस्कूल परिसर में मध्याह्न भोजन बनता है और बच्चों को खिलाया जाता है। आज भात (चावल) और दाल फ्राई बना, जिसमें दाल कम और पीला पानी ज़्यादा था। खाना बनाने वाली हमें देखकर डर गई कि कहीं सरकार की तरफ़ से कोई जाँच-पड़ताल तो नहीं। राकेश सिंह ने वहाँ की भाषा (अंगिका) में उसे समझाया कि डरो नहीं हम लोग सरकार के यहाँ से नहीं आए हैं, बस घूमने आए हैं। बहुत कहने पर भी वह खाना दिखाने से डरती रही, फिर वहीं के एक छात्र ने ढक्कन खोलकर खाना दिखाया। मेनू के हिसाब से खाना बना है; लेकिन मात्रा और पोषकता को कोई नहीं देखता। बीच-बीच में इसका भी अकस्मात अवलोकन और परीक्षण आवश्यक है।
कोलाखुर्द का दर्द पिघल-पिघलकर पूरे देश के अख़बार की ख़बरों का हिस्सा बनता है; लेकिन किसी इंसान के दिल को नहीं झकझोरता, न तो सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाता है। यहाँ स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है। भागलपुर जाकर इलाज कराना इनके लिए मुमकिन नहीं; क्योंकि आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि रोज़गार छोड़कर अपने घर वालों का अच्छा इलाज करा सकें। सरकार ने उन चापाकलों पर लाल निशान लगा दिए हैं, जिसका पानी दूषित है। प्लांट में समुचित पानी नहीं आता है, जिससे पूरे गाँव को पानी मिल सके; यों प्लांट भी दवा के अभाव में अशुद्ध पानी ही दे रहा है।ग्रामीणों के पास दो विकल्प हैं, या तो ज़हर पी-पीकर धीरे-धीरे पीड़ा से मरें या गाँव छोड़ दें। एक और विकल्प है जिससे कोलाखुर्द को बचाया जा सकता है और वह है सामूहिक आंदोलन, जिसके लिए समस्त ग्रामीणों को एकजुट होकर हिम्मत दिखानी होगी। फिर शुद्ध पानी-सप्लाई की ठण्डी योजना फ़ाइल से निकल कोलाखुर्द तक पहुँचेगी और एक गाँव मिटने से बच जाएगा। कई बार अधिकार न मिले तो छीनना पड़ता है और शुद्ध पानी हक़ हमारा कानून हमें देता है ।
एक सवाल जो मेरे ज़ेहन में आया और मैं पूछने से ख़ुद को रोक न सकी कि जब सभी जान चुके हैं कि पानी ज़हरीला है, तो महज एक किलोमीटर दूर जहाँ शुद्ध पानी है, वहाँ से कम-से-कम पीने का पानी तो हर घर में लाया जा सकता है, जब तक सरकार योजना पर अमल नहीं करती है। यों भी सरकार द्वारा चापाकल गड़वाने से पहले यहाँ के ग्रामीण उसी कुआँ से पानी लाते थे। ज़िन्दगी दाँव पर लगा सकते हैं, लेकिन थोड़ा अधिक मेहनत नहीं कर सकते। सरकार तो अपनी ही रफ़्तार से चलती है, लेकिन हमें अपनी रफ़्तार तो बढ़ानी और बदलनी चाहिए।
अलका सिंह, राकेश सिंह और मैं

-जेन्नी शबनम (8.6.2012)
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Monday, May 14, 2012

36. मुझे नहीं जीना ऐसी दुनिया में (व्यथा-कथा)

रात के लगभग आठ बजे थे। प्राइवेट नर्सिंग होम में एक स्त्री को इमरजेंसी में भर्ती कराया गया और उसका अल्ट्रासाउंड हो रहा था। स्त्री लगातार दर्द से रो रही थी और बीच-बीच में अँगरेज़ी में डॉक्टर से कुछ-कुछ पूछ रही थीडॉक्टर ने कान में आला लगाकर बच्चे की धड़कन सुनने की कोशिश की। तभी भ्रूण ने चिल्लाकर कहा ''डॉक्टर, मुझे मार डालो, मैं इस दुनिया में नहीं आना चाहती, मेरी हत्या कर दो।'' डॉक्टर ने कहा ''ऐसा क्यों कह रही हो, तुम तीन महीने की हो चुकी हो, अब यह मुमकिन नहीं और ऐसा मैं क्यों करूँ?'' भ्रूण ने बेहद कातर स्वर में कहा ''डॉक्टर, आप नहीं जानतीं मेरी माँ की स्थिति, मुझे बचाने के लिए वे कितनी पीड़ा सह रही हैं, जबकि वे जानती भी नहीं कि मैं कन्या-भ्रूण हूँ।'' डॉक्टर हतप्रभ! वह स्त्री न तो ग़रीब परिवार की दिख रही, न अशिक्षित, धड़ाधड़ अँगरेज़ी में मेडिकल टर्म के शब्द बोल रही है और किसी तरह बच्चे को बचा लेने के लिए अनुरोध कर रही है। डॉक्टर समझ नहीं पा रही कि एक शिक्षित संपन्न माँ की कन्या-भ्रूण क्यों दुनिया में आना नहीं चाहती है

भ्रूण ने बताया कि जब उसकी माँ को पहली बार यह पता चला कि वह पेट से है, तो ख़ुश होकर अपने पति को बताने गई। दो झन्नाटेदार चाँटा गाल पर। माँ सहम गई। उसका पति चिल्लाने लगा कि बच्चा पैदा करने किसने बोला, उसने बच्चा पैदा करने के लिए शादी नहीं की है। उसे रोज़ उसका बदन चाहिए न कि बच्चा। बहुत रोई माँ। दूसरे दिन जब ऑफ़िस गई तो सभी ने पूछा- ''अरे फिर से ये क्या हो गया तुमको, गाल पर चोट के निशान।'' माँ ने बताया कि वह फिर से बाथरूम में फिसल गई, बहुत स्लीपरी है न बाथरूम। कई बार चोट के नीले निशान तथा हाथ और चेहरे पर खरोंच भी देखा था सभी ने, पर हर बार माँ यही कहती कि कभी सीढ़ी से गिर गई, कभी रास्ते पर हड़बड़ी में चलते हुए गिर गई, कभी पड़ोस के शिशु ने नाखून से नोच दिया। वह कैसे कहती कि उसका पति जिससे उसने प्रेम विवाह किया है, हर रात उसमें शैतान उतर आता है। 

दूसरे दिन शाम को माँ के ऑफ़िस से लौटने के बाद उसका पति उसे डॉक्टर के पास ले गया और लिंग जाँच कराया, तो पता चला कि कन्या है। रात को उसके पति ने जबरन शराब पिलाई और उसमें नींद की 8-10 गोलियाँ डाल दीं। रात में तबीयत बिगड़ने पर किसी डॉक्टर के पास ले गया और हमल गिरवा दिया। सुबह जब उसकी नींद खुली वह समझ गई कि उसका बच्चा नहीं रहा। फिर वही नियम, घर का काम-काज, ऑफ़िस, और फिर वही रातें जिनमें उसे ख़रीदी हुई वेश्या बन जाना होता है, जिसका फ़र्ज़ है ग्राहक को ख़ुश करना।

इस बार जब गर्भ रह गया तो माँ ने किसी को नहीं बताया। किसी तरह तीन महीना गुज़र गया। जिसमें से एक महीना वह अपने सास-ससुर के पास रही; क्योंकि सास अस्वस्थ थी और अच्छी परिचारिका होने के कारण पति ने वहाँ भेज दिया था। सास को पता चल गया कि वह पेट से है। ख़ुशी में ख़ूब लड्डू बाँटे और पोता ही जनने की धमकी दे डाली। बेटे को बताया तो बेटा ख़ुश हुआ और पत्नी को उलाहना दिया कि तुमने मुझे क्यों नहीं बताया। माँ सोची कि शायद इस बार सब ठीक हो गया है। सास भी वारिस का मुँह देखने साथ यहाँ आ गई। आज शाम को पति बोला कि चलो डॉक्टर को दिखा लो और जो भी सावधानी चाहिए, पता कर लो। माँ चली गई डॉक्टर के पास।फिर उसके पति ने डॉक्टर से पता कर लिया कि गर्भ में इस बार भी कन्या है। घर आकर माँ को बहुत मारा और पेट के बल धक्का दे दिया। सास खड़ी होकर तमाशा देखती रही। तभी उसके पति का एक दोस्त घर आया, उसने देखा कि माँ नीचे पड़ी कराह रही है और रक्त बह रहा है। दोस्त को देखते ही उसका पति बोला कि माँ सीढ़ी से गिर गई है और फिर झट से माँ को उठाया और गाड़ी में लेकर यहाँ आया।

भ्रूण ने कहा ''मैं कन्या हूँ न! इतने से मार से मैं खत्म नहीं हो पाई, दोस्त अंकल के कारण मैं बच गई। लेकिन दूसरे के भरोसे कितने दिन मैं बचूँगी अगर बच भी गई, तो माँ रोज़ ऐसे ही पिटेगी, नहीं सह पाती हूँ ये सब देखना।'' डॉक्टर ने भ्रूण को बहुत समझाया कि तीन महीने की तुम हो चुकी हो, ऐसा करना पाप है और अपराध भी। भ्रूण ने कहा कि आप नहीं कर सकतीं, पर दूसरे डॉक्टर तो यह करते ही हैं। किसी डॉक्टर ने ही तो बताया था कि माँ के पेट में कन्या है, तभी तो माँ के साथ इतना क्रूर बर्ताव हुआ है।माँ को जब उसका पति मार रहा था तो बोला ''अगर पैदा ही करना है, तो लड़का पैदा करो, मेरा वंश तो चलेगा। लड़की की रखवाली हर वक़्त कौन करेगा, कहीं रेप-वेप हो गया तो किसको मुँह दिखाएँगे, लड़की पैदा करके क्या दहेज में अपनी सारी सम्पत्ति किसी ग़ैर को दे दूँ?'' 

''डॉक्टर, आप ही बताइए क्या ऐसे घर में मेरा जन्म लेना मुनासिब है? अगर इन सब के बाद बच गई, तो जन्म के बाद जाने क्या हो? जाने कब कौन हवस का शिकार बना ले। हर वक़्त बदन के अंदर झाँकती नज़रों से कहाँ बच पाऊँगी। इन सबसे गुज़रते हुए बड़े होने पर अगर कोई मन को भा जाए, तो क्या पता मुझे इसकी क्या सज़ा मिले, मुमकिन है हमदोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए। ये भी सम्भव है कि किसी के इसरार पर इंकार करूँ तो तेज़ाब से जलाकर मुझे विकृत कर दे। अगर इन सब हादसों से बच जाऊँ और विवाह की बात हो, तो दहेज की जुगाड़ में माँ-बाप के अवसाद की वज़ह बनूँगी और फिर मेरा मन कुण्ठाग्रस्त हो जाएगा। अगर ये भी सही सलामत निपट जाए तो क्या मालूम और ज़्यादा दहेज के लिए जला दी जाऊँ, चरित्रहीन बताकर निष्काषित कर दी जाऊँ, मुझे आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़े। यह भी मुमकिन है कि किसी की धूर्तता से मैं भी माँ-सी बन जाऊँ, जिसे इस आरोप में बार-बार प्रताड़ित किया जाए कि पेट से क्यों हुई या पेट में कन्या-भ्रूण क्यों?'' 

''डॉक्टर, मुझे नहीं जीना ऐसी दुनिया में, मुझे नहीं बनना अपनी माँ की तरह और न चाहती हूँ ऐसी ख़ौफ़नाक ज़िन्दगी, जिसमें हर पल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए वार और आघात सहूँ। लोगों के तिरस्कार और घृणा की पात्र बनूँ। भ्रूण से लेकर जन्म होने और उसके बाद मृत्यु तक तमाम उम्र ख़ौफ़ के साए में जियूँ। अपने जीवन के वास्ते दूसरों की मेहरबानी के लिए याचना करती रहूँ और एक-एक दिन यह सोचकर व्यतीत करूँ कि चलो आज तो सुरक्षित रही। जानती हूँ मुझे मार ही दिया जाना है, चाहे तुम मारो या दूसरी डॉक्टर। माँ के साथ मैं भी हर वक़्त डरी होती हूँ कि कब क़त्ल कर दी जाऊँ। पल-पल मृत्यु की प्रतीक्षा बहुत ख़ौफ़नाक होती है। मैं नहीं आना चाहती ऐसे घृणित और डरावने संसार में।'' 

''डॉक्टर, तुम ही सोचो दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती को पूजने वाले भी अपने लिए कन्या नहीं चाहते। यह माना जाता है कि बिना ईश्वर-कृपा कुछ नहीं होता, फिर तो ईश्वर की इच्छा से ही कन्या-भ्रूण भी माँ के गर्भ में आती है न! पर अब लगता है कि शायद ईश्वर के हाथ में जीवन-मृत्यु नहीं, डॉक्टर चाहे तो परखनली द्वारा भ्रूण को जन्म दे-दे और जब चाहे किसी को मृत्यु। मैं जन्म नहीं लेना चाहती डॉक्टर, मुझे मार दो।''

जो डॉक्टर पाप-पुण्य और कानून की बात सुनाकर क़त्ल करने से मना कर रही थी, उसी ने पैसे से पाप को पुण्य में बदल दिया। भ्रूण की मृत्यु-याचना के कारण नहीं; बल्कि स्त्री के पति के पैसे से उसने पुण्य कमाया डॉक्टर ने कसाई बनकर माँ के बदन से भ्रूण को निकाला। एक चीख और फिर निःस्तब्धता! स्त्री और मानवता फिर से हारी, पुरुष जीत गया।

-जेन्नी शबनम (8.3.2006)
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Thursday, March 8, 2012

35. आधी दुनिया अधूरे ख़्वाब


चित्र - मेरे द्वारा
शायद 21वीं सदी का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि विकास के तमाम आयामों को प्राप्त करने और सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को निरन्तर मज़बूत बनाए रखने की सफल कोशिशों के बावजूद स्त्री-विमर्श ज़िन्दा है। ये न सिर्फ़ किताबों, कहानियों, कविताओं तक सीमित है, बल्कि हर पढ़े-लिखे और अनपढ़ नागरिकों के मन में पुरज़ोर ढंग से चल रहा है। आज जब हम महिलाओं के पिछड़ेपन की बात करते हैं, तो इसका सबसे बड़ा कारण मातृसत्तात्मक समाज का ख़त्म होना और पितृसत्तात्मक समाज का उदय होना दिखाई पड़ता है। जैसे-जैसे समाज पुरुष-प्रधान बनता गया स्त्री हमेशा के लिए पुरुष-वर्ग की 'सर्वहारा' बनती गई। एक-एककर स्त्री के सारे अधिकार पुरुष को मिलते गए और स्त्री ग़ुलाम बनती गई। सत्ता के हस्तान्तरण ने स्त्री की अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। धीरे-धीरे स्त्री सम्पत्ति बनती गई, जिसका स्वामी उसका निकट सम्बन्धी होने लगा। पुरुष की सुविधा, विलासिता और स्वेच्छाचारिता के लिए स्त्री उपभोग की वस्तु बन गई। 
 
पूँजीवाद और साम्राज्यवाद तेजी से विकसित हो रहे थे, तब औद्योगीकरण का प्रभाव बढ़ने लगा। महिलाओं का आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से शोषण बढ़ता जा रहा था। पूँजीवाद के कारण आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा और फिर घर सँभालने के साथ मज़दूरी करने का दोहरा बोझ स्त्री पर पड़ा। स्त्रियाँ रोज़गार के लिए घर से बाहर निकलने लगीं, कारख़ानों और लघु उद्योगों में काम करने लगीं। एक तरफ़ घर की ज़िम्मेदारियाँ, दूसरी तरफ़ मालिकों-महाजनों का क़हर। सामान्य अधिकारों से वंचित ये स्त्रियाँ टूट रही थीं और ख़ुद को स्थापित करने के लिए एकजुट हो रही थीं। उन्हें कारख़ानों में समान काम के लिए पुरुष से कम वेतन मिलता था, काम के घंटे अधिक थे, प्रसव-काल में अलग से कोई सुविधा नहीं दी जाती थी। स्त्रियों के सवाल भी एक और दास्ताँ भी एक। धीरे-धीरे महिलाएँ अपनी अस्मिता और अपने अधिकार के लिए सचेत और संगठित होने लगीं। चिनगारी सुलगने लगी। महिलाओं द्वारा अपने अधिकार के लिए उठाई गई आवाज़ को कुचल दिया जा रहा था। स्थिति असह्य और विस्फोटक होती गई और महिलाओं का संघर्ष क्रान्ति का रूप लेने लगा। 
 
चित्र - मेरे द्वारा
महिलाओं के शोषण पर 19वीं शताब्दी के अंत से सवाल उठने शुरू हुए और 20वीं शताब्दी के शुरुआत में एक आन्दोलन का रूप ले लिया। समाजवादी और कम्युनिस्ट आन्दोलन ने सबसे पहले महिलाओं के मुद्दे को अपने कार्यक्रम में व्यापक रूप से शामिल किया। जर्मनी में वर्ष 1890 में समाजवादी महिला आन्दोलन की शुरुआत हुई, जिसमें काम के घंटों में कमी, पुरुषों के बराबर मज़दूरी, बाल मज़दूरी का उन्मूलन, महिलाओं को मत देने का अधिकार आदि मुद्दों को शामिल किया गया। वर्ष 1908 में न्यूयार्क के कपड़ा-मिल मज़दूर महिलाओं ने अपने काम के घंटे में कमी, बेहतर वेतन और वोट के अधिकार के लिए विशाल प्रदर्शन किया। 28 फरवरी 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमेरिका द्वारा पहली बार 'नेशनल वुमेन डे' मनाया गया, तब तक दुनिया भर में स्त्री चेतना का संघर्ष निर्णायक दौर में पहुँच चुका था। तत्पश्चात वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में महिलाओं के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का निर्णय लिया गया और वर्ष 1911 में पहली बार 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' मनाया गया। इस दिन ऑस्ट्रिया, जर्मनी, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड में लाखों की तादाद में महिलाओं ने रैली निकाली और प्रदर्शन किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शान्ति स्थापित करने के लिए महिलाओं ने इस दिन महिला दिवस मनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1977 में सरकारी तौर पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मान्यता प्रदान कर प्रस्ताव पारित किया कि विश्व के समस्त देश इस दिन को महिलाओं के अधिकार के लिए समर्पित करें और महिला दिवस मनाएँ। 
बाएँ से - मैं, ग्रामीण स्त्री, सहयोगी शिक्षिका
महिलाओं के अधिकारों के लिए किया जाने वाला संघर्ष पूर्णतः सफल नहीं हो पाया। अपितु बहुत सारे अधिकार प्रदान किए गए और स्थिति में काफ़ी बड़ा परिवर्तन आया। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से स्त्री को पुरुष के बराबर अधिकार मिले। वेतन, वोट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में स्त्री को बराबर की भागीदारी मिली। क़ानून द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार के लिए क़ानून में कई सुधार और संशोधन किए गए। हर क्षेत्र में महिलाओं के लिए समान अवसर निश्चित किए गए। ग़ौरतलब है कि महिलाओं के संघर्ष-आन्दोलन को पश्चिमी देशों में जितनी मान्यता और सफलता मिली अन्य जगहों में नहीं।
ग्रामीणों द्वारा उत्सव नृत्य
महिलाओं के संघर्ष की गाथा जितनी पुरानी है, उतनी ही बेमानी लगती है क़ानून से प्राप्त अधिकारों के साथ महिला की ज़िन्दगी। काग़ज़ पर सारे अधिकार मिल गए; लेकिन वास्तविक रूप में स्थिति आज भी शोचनीय है। हमारे देश में आज भी स्त्रियाँ दोयम दर्जे की ज़िन्दगी जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में आज भी स्त्रियाँ पुरुष के मुक़ाबले बहुत पीछे हैं। बाल विवाह, अशिक्षा, दोहरी मानसिकता, दहेज, बलात्कार आदि समस्या दिन-ब-दिन विकराल रूप लेती जा रही है। भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, अंधविश्वास के कारण प्रताड़ना और हत्या, ऑनर किलिंग आदि घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। बड़े-बड़े महानगरों के अपवाद को छोड़ दें, तो सम्पूर्ण देश की महिलाओं की हालत आज भी एक जैसी त्रासद है।
मेरे साथ ग्रामीण बच्चे और सहयोगी
आज महिला आन्दोलन को महिला आरक्षण तक सीमित किया जा रहा है और शासक की इस चाल को समझते हुए भी महिला दिवस मनाकर संतोष कर लिया जाता है। हर साल की तरह हर साल महिला दिवस मनाया जाता है। कुछ औपचारिक कार्यक्रम, भाषण, व्याख्यान, स्त्री सशक्तीकरण के कुछ उदाहरण पर संतुष्टि, आरक्षण का मुद्दा और फिर 'महिला दिवस' एक साल तक के लिए समाप्त।
ग्रामीणों के साथ मेरी सहयोगी
स्त्री सशक्तीकरण और स्त्रियों के अधिकार की लड़ाई महज़ महिला दिवस मना लेने से कतई सम्भव नहीं है। जब तक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होगा, महिलाओं की स्थिति यथावत् रहेगी। ये तय है कि महिलाओं को सम्पूर्ण आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक अधिकार समाजवाद से ही सम्भव है। इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं, जिससे महिलाओं की स्थिति पर गम्भीरता से विचार किया जाएसिर्फ़ कानून बनाकर सरकार द्वारा कर्तव्यों की इतिश्री न समझी जाए। जितने भी स्त्री उत्थान के लिए कानून बने, सभी विफल हुए या फिर उस कानून की आड़ में सदैव मनमानी की गई, चाहे स्त्री द्वारा या पुरुष द्वारा। कानून असफल हो गए, नियम  ध्वस्त हो गए। आज स्त्री जिस कुण्ठा में जी रही है, उससे निःसन्देह समाज में अस्थिरता आएगी। स्त्री को प्रारब्ध से मिले असंगति का निवारण न सरकार कर पाती है न समाज न तथाकथित ईश्वर।
होली मिलन - ग्रामीणों के साथ मैं
-जेन्नी शबनम (8.3.2012)
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