Saturday, March 8, 2025

123. महिला साहित्यकारों की समस्याएँ

साहित्यकार होना बहुत बड़ी उपलब्धि है, विशेषकर महिलाओं के लिएक्योंकि महिला साहित्यकार सिर्फ़ साहित्यकार नहीं होती, उससे पहले वह एक स्त्री होती है। स्त्री जिसके लिए समाज में ढेरों नियम व क़ायदे बनाए गए हैंजिनका पालन करते हुए अपने को साहित्य की दुनिया में समावेश करना बेहद कठिन होता है। फिर भी आज महिला साहित्यकारों की बहुत बड़ी संख्या है और समाज में उनकी पहचान भी है। एक आम स्त्री की जो समस्या है, वह तो महिला साहित्यकारों के लिए भी है, साथ-ही-साथ साहित्य की दुनिया में स्वयं को स्थापित करने के लिए अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता हैचाहे यह समस्या घर से शुरू हो या समाज द्वारा दी जाए। सबसे ज़्यादा उन महिला साहित्यकारों को समस्या होती है, जिनकी पहचान साहित्यकार के रूप में नहीं बन पाई है। उन्हें न घर में साहित्यकार  माना जाता है, न समाज में पहचान होती है। 


पितृसत्तात्मक परिवेश में स्त्रियों की महत्वाकांक्षाएँ अक्सर ढह जाती हैंबहुत कम स्त्रियाँ हैं, जो विषम परिस्थितियों में ख़ुद को स्थापित करने का साहस कर पाती हैं। घर-परिवार का बन्धन ऐसा होता हैजहाँ अक्सर स्त्रियों को अपनी योग्यताअपने शौक़ और ख़ूबियों की तिलांजलि देनी पड़ती है। कई सारे सुअवसर आते हैं; लेकिन मज़बूरियाँ हौसला डिगा देती हैं। हमारी सामाजिक अवधारणा के अनुसार स्त्रियों का दायित्व सर्वप्रथम उसका परिवार हैउसके बाद ही स्वयं के प्रति कोई दायित्व है। इस अवधारणा को स्त्री के मन में इस तरह रोप दिया गया है कि इसके बाहर जाने का साहस बहुत कम स्त्रियाँ कर पाती हैं। हमारे समाज का वैचारिक दिवालियापन स्त्री को आगे बढ़ने से क़दम-क़दम पर रोकता है। स्त्री बेबाकी से कुछ कह नहीं पाती। स्त्री अगर साहित्यकार है, तब तो राहें और भी दुश्वार हैं। स्त्रियाँ अगर अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो उपेक्षाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। 


काफ़ी साल पहले की एक घटना मुझे अब भी याद है। एक सुबह मेरी एक मित्रजो सामान्य गृहिणी हैं और शौक़ से थोड़ा-बहुत लिखती हैंमेरे घर आईं और ख़ूब रोती रहीं। जब थोड़ी शांत हुईं, तो बताया कि किसी रविवार के दिन उन्हें एक काव्य-गोष्ठी में जाना था। उन्होंने अपने पति को बता दिया था कि 11 बजे कुछ मित्र के साथ वे काव्य-गोष्ठी में जाएँगी। रविवार की सुबह से ही उनके पति पुरानी बातें याद कर-करके लड़ते रहे। वे रोती रहीं और घड़ी देखती रहीं। नियत समय पर उनके अन्य मित्र उन्हें लेने सपरिवार आ गए। उनके पति यह जानने के बाद भी कि अतिथि आ चुके हैंलड़ाई बन्द नहीं कर रहे थे। आधे घंटे तक वे सभी इन्तिज़ार करते रहे और लड़ाई थी कि ख़त्म ही नहीं हो रही थी। रो-रोकर उनका चेहरा सूज गया थाऐसे में वे कैसे सबके सामने जाएँगी और कैसे कवि-गोष्ठी में जाएँगीसमझ नहीं पा रही थीं। फिर वे चेहरा धोकरकाजल लगाकर, चश्मा पहनकर और जबरन मुस्कान ओढ़कर गईं और उन लोगों से क्षमा के साथ आग्रह किया कि जबतक वे लोग चाय पिएँवे 10 मिनट में तैयार हो जाएँगी। हालाँकि वे लोग उनके चेहरे और आधे घंटे तक बाहर न आने के कारण समझ गए थे कि परिस्थिति सामान्य नहीं है। बाद में उन लोगों ने उन्हें कहा भी कि क्षमा की ज़रूरत नहीं हैहम लोग समझ गए थे कि कुछ और बात है; इसलिए आपको देर हो रही है। अंततः वे गोष्ठी में गईं; लेकिन अपनी कविता तक पढ़ न सकींक्योंकि मन सहज हो नहीं पा रहा था। वे मुझसे कहने लगी कि अब मैं लिखना बन्द कर दूँगी और न किसी गोष्ठी में जाऊँगी। मैंने उन्हें समझाया कि लेखनी उनकी पहचान हैअतः ऐसा न करेंलेखन जारी रखें। अब तो वे लिखती हैं और ख़ूब लिखती हैं। 


एक घटना मेरे साथ हुईजिससे आज भी मेरा मन क्षुब्ध हो जाता है। पुस्तक मेले में जाने की पूरी तैयारी एक दिन पहले ही मैंने कर रखी थी और घर में भी सभी को बता दिया था कि एक साझा-संकलन का विमोचन होना है, जिसमें मेरी भी रचनाएँ हैं। सुबह अपना सारा काम, जो मेरे लिए ज़रूरी होता हैकर लिया और 12 बजे घर से निकलने के लिए तैयार हो ही रही थी कि कुछ रिश्तेदार घर पर आ गए। उन्होंने पहले से बताया भी नहीं था कि वे लोग आने वाले हैंतो मैं उन्हें आज न आने के लिए कह सकती थी। मन-ही-मन बहुत ग़ुस्सा आयालेकिन मेहमान का स्वागत तो मुस्कान से ही करना होता है। मेहमाननवाज़ी के नाम चढ़ गया मेरा सारा उत्साह। यों पुस्तक बाद में मुझे मिल गई; लेकिन पुस्तक मेले में जाना और विमोचन में साहित्यकार मित्रों से मिलना एक अलग ही सुख देता है। 


ऐसी कितनी ही घटनाएँ व समस्याएँ हैं, जिन्हें मैं देखती आ रही हूँ। प्रतिष्ठित साहित्यकार के लिए शायद समस्याएँ कम होती होंगी; लेकिन उन महिला साहित्यकारों के लिए समस्याएँ बहुत ज़्यादा हैं, जो अभी पहचान बना नहीं पाई हैं। उनके लिए अपना कोई समय नहीं होता, जब वे लिख-पढ़ सकें। एक महिला की ज़िम्मेदारी सबसे पहले उसका घर और परिवार है। परिवार के सभी सदस्यों के समय के अनुसार ही कोई स्त्री अपने लिए समय निकाल पाती है। अगर कामकाजी स्त्री है, तब तो परिवारनौकरी और अपने शौक़ का संतुलन बना पाना बड़ा ही कठिन हो जाता है। ऐसे में अगर पति या परिवार सहयोगी हुआतब तो फिर भी स्त्री थोड़ा वक़्त कभी-कभी अपने लिए निकाल लेती है। समस्या तब ज़्यादा होती हैजब स्त्री का पति उसके साहित्यकार रूप को सम्मान नहीं देता है। मेरी एक मित्र को उसका पति कहता है कि उसे समाज में उसके अच्छा लिखने के कारण सम्मान नहीं मिलता है; बल्कि उसके पति के पद और पैसे के कारण उसे सम्मान मिलता है। उसके आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को घर में ही चोट पहुँचाई जाती है। अब ऐसे में स्त्री क्या सोचे, क्या करेघर में अपना सम्मान बचाए रखे या समाज में पहचान बनाएहालाँकि ऐसी परिस्थितियों में कई बार स्त्री अंगार रूप में फट पड़ती है और यही अंगार उसकी लेखनी को और उसे पहचान भी दिला देता है। 


महिला साहित्यकारों की एक बहुत बड़ी समस्या यह भी है, जब किसी साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन दूसरे शहर में हो रहा हो। पिता या पति अगर सहयोगी विचार के हैं, तो वे जाने की इजाज़त दे देते हैं या फिर वे स्वयं साथ जाते हैं; लेकिन अगर संकीर्ण विचार के हुए तो बहुत मुश्किल होता है, दूसरे शहर में जाकर अपनी पहचान को बनाए रखना। यों कई मित्रों को जानती हूँ, जिनके पिता और पति न सिर्फ़ साथ जाते हैं; बल्कि ऐसे आयोजनों में जाने के लिए प्रेरित भी करते हैं। संकीर्ण परिवेश में रह रही स्त्रियों को तो अकेले कहीं भी जाने की इजाज़त नही मिलती। या तो परिवार का कोई पुरुष उसे पहुँचा आए या कोई महिला मित्र के साथ वह जाए। ऐसे में बहुत सारी स्त्रियों ने सामाजिक दायरे में ख़ुद को क़ैद कर लिया। किसी तरह कुछ गोष्ठियों में उपस्थित हो पाईं तो ठीक हैअन्यथा कोई-न-कोई बहाना बनाकर अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया। अगर किसी तरह एक-दो किताबें प्रकाशित हो गईं, तो बस इतने से ही संतोष करना पड़ा कि चलो क़िस्मत में इतना भी हो पायाअन्यथा यह भी असंभव ही था। 


महिला साहित्यकारों की एक मानसिक पीड़ा जो मैं महसूस करती हूँ कि अगर कोई पति-पत्नी दोनों ही लेखक हैंतो अधिकतर पति अपनी पत्नी को कमतर आँकता हैभले ही वह स्त्री कितना ही अच्छा लिखती हो। ऐसे में स्त्री का मनोबल टूटने लगता है। उसे एहसास होने लगता है कि जब उसका पति ही कहता है कि वह अच्छा नहीं लिखतीतो निश्चित ही वह बकवास लिखती हैकूड़ा लिखती है। ऐसे में धीरे-धीरे या तो लिखना बन्द कर देती है या फिर लिखती भी है, तो किसी को नहीं दिखाती। कोई दोस्त-मित्र या बच्चे जब एहसास दिलाते हैं कि वह तो एक लेखिका थीलिखना क्यों बन्द कियातब उसे एहसास होता है कि वह तो बेवज़ह ख़ुद को बन्द कर बैठी थी, ख़ुद को घर की परिधि में समेट ली थी और तब पुरुष की चालाकी उसे समझ आती है और वह फिर से साहित्य कि दुनिया में प्रवेश करती है। हाँ! यह ज़रूर है कि जो मानसिक पीड़ा से वह गुज़री थीजो समय उसने गँवाया थायह सब उसे दुःख देता हैपर जीवन का यह सत्य उसे नई ऊँचाइयों की ओर ले भी जाता है। 


आज सामाजिक नेटवर्क हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। एक तरफ़ जहाँ इससे हम समाज, देश, परदेश से जुड़ जाते हैंतो वहीं कई बार इसका बहुत बड़ा नुक़सान भी उठाना पड़ता है। सभी की हर एक गतिविधि की ख़बर सभी को मिलती रहती है। महिला साहित्यकारों को एक तरफ़ तो नेटवर्क के कारण बहुत बड़ा मंच मिलता है और बड़े पैमाने पर सराहना मिलती है, तो वहीं कुछ लोगों की नज़र में उसकी सफलता खटकने भी लगती है। कुछ लोग नेटवर्क पर अमर्यादित टिप्पणियाँ करने लगते हैं। यदि कोई महिला साहित्यकार बोल्ड महिला है और काफ़ी साहसिक विषयों पर लिखती है या उन विषयों पर लिखती हैजिन्हें परदे के अन्दर रहना समाज द्वारा जाएज़ माना जाता हैतब तो सामान्य स्त्री-पुरुष उसके पीछे ऐसे पड़ जाते हैं जैसे कि वह कोई गुनाह कर रही हो। उसको और उसके चरित्र को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। हाँ! अब यह ख़ुशी की बात है कि ऐसी बहुत सारी महिला साहित्यकार हैं, जो बेझिझक और बेख़ौफ़ इन विषयों पर लिख रही हैं और दूसरों  द्वारा निर्धारित लक्ष्मण रेखाओं एवं बन्दिशों को तोड़ रही हैं। यों ऐसी साहित्यकार बहुत कम हैंपर जितनी भी हैंअंततः उन्होंने सम्मान अर्जित किया है और लोग उन्हें सम्मान देने लगे हैं; भले ही यहाँ तक पहुँचने में ढेरों बाधाएँ और कठिनाइयाँ आईं। एक मुक़ाम हासिल कर लेने के बाद वही लोग जो कभी असंवेदनशील थे, अब सम्मान देने लगते हैं। 


अनगिनत अग्निपरीक्षाओं का सामना अक्सर महिला साहित्यकारों को करना पड़ता है। स्त्री के व्यक्तिव का आकलन अक्सर उसकी लेखनी के आधार पर लोग करने लगते हैं। कविता-कहानी में सत्य के साथ ही काल्पनिकता का भी समावेश होता हैफिर भी लोग कविता-कहानी के भाव को उस स्त्री की अपनी संवेदना बताते हैं। अगर विषय प्रेम हो, तो लोग कहेंगे कि वह स्त्री किसी के प्रेम में हैअगर वेदना लिख रही, तो यह माना जाता है कि उस स्त्री के स्वयं के जीवन की वेदना है। जिस भी भाव की लेखनी होगी, उस भाव को स्त्री के व्यक्तिगत जीवन से जोड़कर लोग देखते हैं। ऐसे में स्त्री सोचती है कि क्या लिखे, जो लोग कोई अनुमान न लगाएँ। अगर कोई आकर्षक व्यक्तित्व की महिला हैतो उसकी लेखनी से ज़्यादा उसकी सुन्दरता उसके लेखनी का मापदण्ड बन जाता हैयह बहुत दु:खद और आपत्तिजनक है। यों लोगों की सोच में काफ़ी सकारात्मक बदलाव आए हैंमहिला साहित्यकारों को अब पुरुषों के बराबर माना जाने लगा है; फिर भी समयाभाव और सामाजिक परिवेश महिला साहित्यकारों को पुरुष साहित्यकारों के साथ बराबरी पर रहने नहीं देता है। 


महिला साहित्यकारों में सबसे ज़्यादा मैं जिनसे प्रभावित हुई हूँ वे हैं अमृता प्रीतम। अमृता जी से मिलने का सौभाग्य मुझे मिला, परन्तु उस अवस्था में जब वे जीवन के अन्तिम पड़ाव पर थीं। वहीं इमरोज़ जी से मेरा मिलना हुआ और उनसे ही मैंने अमृता जी को एक स्त्री के रूप में देखा। अमृता जी का अमृता प्रीतम तक पहुँचना इतना सरल नहीं था। उस समाज में अमृता जी ने ख़ुद को स्थापित कियाजब स्त्री को घर की चहारदीवारी में क़ैद रहना होता था और अपनी विडम्बनाओं के साथ जीना पड़ता था। अमृता जी की बहुत आलोचना हुईबहुत परेशानियों का सामना कियामगर अमृता जी अंततः अमृता प्रीतम बनी। निःसंदेह अमृता जी हमारी और बहुतों की प्रेरणा हैंफिर भी उनकी तरह हिम्मत और हौसला सभी के बस की बात नहीं। अमृता जी का व्यक्तित्व एवं लेखनी हम स्त्रियों के लिए मील का पत्थर है। 


कई मित्रों को जानती हूँजो बहुत अच्छा लिखती हैंलेकिन कभी किसी को नहीं बताती हैंडायरी के पन्नों में सबसे छुपाकर रखती हैं। यों मैं भी कॉलेज के दिनों से लिखती थीपर कभी किसी को बताया नहीं। अमृता प्रीतम को पढ़ने से पहले शिवानी को बहुत पढ़ती थी। एक बार अमृता जी का उपन्यास 'मोतीसागर और सीपियाँपढ़ने को मिला। उस उपन्यास के बाद तो जैसे अमृता जी को पढ़ने का चस्का मुझे लग गया। ढेरों किताबें ख़रीदी और पढ़ी। एक दिन पता लगा कि वे मेरे घर के नज़दीक ही हौज़ ख़ास में रहती हैंतो मिलने के लिए कई बार फ़ोन कियालेकिन मुलाक़ात नहीं हो पा रही थी; क्योंकि वे बीमार चल रही थीं। मैं भी अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहती थी। अमृता जी की मृत्यु से कुछ ही दिन पहले की बात हैएक दिन फिर फ़ोन कियातो संयोग से इमरोज़ जी ने कहा कि आ जाओ मिलने। अमृता जी इतनी बीमार थीं कि देखकर मुझे रुलाई आ गई। अमृता जी को एक बार एक कॉन्फ्रेंस में देखा था। गज़ब का व्यक्तित्व था उनका और आज इस स्थिति में। इमरोज़ जी से काफ़ी बातें हुईं। उनको जब मैंने बताया कि मैं लिखती हूँलेकिन कभी किसी को न बताया न सुनाया। उन्होंने कहा कि तुम अपनी कविता लेकर आओ किसी दिन। मैं अपनी डायरी लेकर उनके घर गईतो उन्होंने कहा कि वे हिन्दी पढ़ नहीं सकतेतो मैं पढ़कर कुछ सुनाऊँ उन्हें। मैंने पाँच-छह कविताएँ पढ़कर सुनाईं। वे बहुत ख़ुश हुए। मुझे बहुत झिझक हो रही थी; लेकिन इमरोज़ जी के सामने मैं अपनी कविता पढ़कर सुना रही थी, यही मेरे लिए बहुत था। उन्होंने कहा कि अपनी किताब छपवाओ। मैंने बताया कि बहुत झिझक होती है किसी को बताने में कि मैं कविता लिखती हूँपता नहीं मैं जो लिखती हूँवह कैसा हैछपने के लायक है भी कि नहीं। इमरोज़ जी ने मुस्कुराकर देखा और कहा- ''तुम जो भी लिखती हो, सोचो कि सबसे अच्छा लिखती होकौन क्या सोचता है इसकी परवाह मत करो।'' जब भी उनसे मिलतीवे पूछते कि किताब दी छपने के लिए और हर बार मैं कहती कि नहीं। एक दिन दोपहर में उनका फ़ोन आया कि यह नम्बर नोट करो और इससे बात करोपैसे तो ज़रूर ज़्यादा लेता है; लेकिन किताब अच्छी छापता है। इमरोज़ जी के इतना प्रोत्साहित करने पर यह ज़रूर हुआ कि मेरी रचनाएँ सार्वजनिक होने लगीं। बहुत सारे साझा-संकलन में मेरी रचनाएँ छपने लगे और मेरी हिचक भी दूर हुई। मैं यह मानती हूँ कि इमरोज़ जी से मेरी मुलाक़ात ने मुझे हौसला दिया कि मैं जो भी लिखूँ उस पर गर्व करूँ और सार्वजनिक करूँ। मैं जानती हूँ ऐसी ढेरों स्त्रियाँ हैंजो बहुत अच्छा लिखती हैंलेकिन उन्हें कोई प्रेरणा देने वाला नहीं हैक्योंकि उन्हें कोई इमरोज़ नहीं मिला। 


साहित्य की दुनिया में इतनी ज़्यादा मेहनत और होड़ है कि ख़ुद को इस रेस में बनाए रखने के लिए सदैव तत्परता और चतुराई दिखाना होता है। कितना भी अच्छा आप लिखते हों, अगर प्रशंसक नहीं और पहचान नहींतो कोई पूछेगा नहीं। सदैव स्वयं और अपने लेखन को साबित करते रहना होता हैअगर आप प्रतिष्ठित साहित्यकार नहीं हैं तो। वाहवाही और शाबाशी की दुनिया है यह, जितनी ज़्यादा लाइक मिलेंगे, उसे उतना ही सफल रचनाकार मान लिया जाता है। यहाँ तो यों है जैसे लेन-देन का मामला। आप मुझे प्रोत्साहित करें, हम आपको; भले ही लेखनी का स्तर कैसा भी हो। महिला साहित्यकारों के साथ यह बहुत बड़ी दुविधा है कि समयाभाव और घरेलू ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए साहित्यिक संसार में स्वयं को कैसे तत्पर और सामयिक रखा जाए। फिर भी तमाम कोशिशों के बाद कुछ ही महिला साहित्यकार एक ख़ास मुक़ाम हासिल कर पाती हैंबशर्ते कि परिवार उनके इस कार्य को महत्त्व और सहयोग दे। ब्लॉग या अन्य माध्यमों पर लगातार जाना और सभी को पढ़ना तथा स्वयं लिखनायह अपने आप में पूर्ण कार्य हैकिन्तु इस कार्य में कोई मानदेय नहीं। अतः मुख्य कार्य के रूप में यह कर पाना एक आम स्त्री के लिए मुमकिन नहीं होता हैभले ही वह कामकाजी स्त्री न होकर गृहिणी हो। 


महिला साहित्यकारों के लिए साहित्य का डगर बहुत सरल नहीं है। यहाँ पर भी गुटबन्दी बहुत ज़्यादा है। अपना काम निकालकर दूसरे को गिरा देना एक आम भावना है, जिससे यह जगह अछूता नहीं। हालाँकि यह सब महिला-पुरुष दोनों के साथ होता है। फिर भी महिलाएँ इससे ज़्यादा पीड़ित होती हैं; क्योंकि सीमित समय में साहित्य के लिए ख़ुद को समर्पित करती हैं और ऐसे में किसी गुटबन्दी की शिकार हो जाएँकिसी की दुर्भावना का शिकार हो जाएँतो ऐसे में वह घर से भी बात सुनती है और जगहँसाई होती है सो अलग। हालाँकि अब ऐसी समस्या कम हो रही है; लेकिन अब भी यह हो रहा है और इससे महिलाएँ बहुत आहत होती हैं। लिखना छोड़ देती हैं। आत्मविश्वास अगर बचा भी है तो किस-किस के सामने अपना दुखड़ा रोएँ। न घर में कोई परवाह करता है, न समाज में स्वीकृत हैं। अगर प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं, तो भी गुटबन्दी की शिकार होते हुए भी वे इससे ख़ुद को बाहर कर लेती हैंक्योंकि उन्हें अब तक यह गुर आ चुका होता है। लोग प्रतिष्ठित साहित्यकारों के आगे-पीछे करते ही रहते हैं। 


महिला साहित्यकारों की एक अहम समस्या है कि बहुत मेहनत से वह अपने घर और परिवार की ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए कुछ लिखती हैं और बदले में न तो पारिश्रमिक मिलता हैन प्रोत्साहन। लेखनी तो एक कला है और जिसे यह आता है वह पारिश्रमिक का इन्तिज़ार नहीं करती है; बल्कि लेखन जारी रखती हैभले ही समाज उसका सम्मान दे, न दे। कुछ पत्रिकाएँ पारिश्रमिक भी देती हैं, परन्तु सभी जगह से नहीं मिलता है। कई बार बस छप जाए, यही बहुत बड़ी संतुष्टि होती है। हिन्दी साहित्यकारों के लिए समस्याएँ और भी ज़्यादा हैं। 


प्रकाशकों का मनमाना और अव्यावहारिक रवैया महिला साहित्यकारों को क्षुब्ध कर देता है। कई सारे प्रकाशक हैं, जो बहुत पैसे लेते हैं एक छोटी-सी पुस्तक छापने के लिएजबकि वे काफ़ी कमाते हैं उस पुस्तक से। लेखक के शारीरिक और मानसिक मेहनत के बाद भी उसे ही पैसे ख़र्च कर किताब छपवानी होती है। अगर आप बड़े साहित्यकार हैंचाहे स्त्री हों या पुरुषतब तो प्रकाशक मुँहमाँगी क़ीमत देकर आपकी किताब छापते हैं। पुस्तक प्रकाशन ऐसा व्यवसाय बन गया हैजिसमें घाटे का सौदा कभी होता ही नहीं। बस लेखक ही नुक़सान में रहता है। प्रकाशकों का एकाधिकार है इस क्षेत्र में और वे इसका फ़ायदा उठाते हैं। पैसे ख़र्च करना साथ ही भागदौड़ करना, हर महिला के लिए सम्भव नहीं होता है। और ऐसी साहित्यकारों की पुस्तकें उनके अपने रफ़ कॉपी में ही काल्पनिक रूप से जीती हैं। निःसंदेह प्रकाशकों को इस सन्दर्भ में सहयोगी रवैया अपनाना चाहिए, ताकि महिला साहित्यकार अपनी पुस्तक छपवा सकें। 


महिला साहित्यकार एक आम स्त्री है, जो अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को जो इसी समाज से उसे मिलता हैदुनिया के सामने लाती है। साहित्य हर युग की दशा और दिशा बताता है। महिला साहित्यकार की लेखनी में समाज का वह कोना होता है, जहाँ किसी की निगाह नहीं पहुँचती है। पुरुषवादी सोच अमूमन स्त्री साहित्यकारों को पुरुष का विरोधी मान लेते हैंलेकिन यह कहीं से भी न सत्य है न वाज़िब। महिला साहित्यकार अपने जीवन में हारे या जीते, लेकिन जो भी वह लिखती है, उसके जीवन की सोच और अनुभूतियों का सच होता हैभले ही वह काल्पनिक हो। निःसंदेह महिला साहित्यकारों को साहित्यकार का सम्मानित दर्जा जिस दिन मिल पाएगाहमारा समाज ज़्यादा संवेदनशीलता से समस्याओं को समझ सकेगा। 


-जेन्नी शबनम (14.8.2019)

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Friday, February 28, 2025

122. युद्ध

चित्र - गूगल से साभार 
फ़िल्म 'छावा' देखकर मन व्याकुल हो गया यह जानते हुए कि यह फ़िल्म है और क्रूरता के दृश्य फिल्माए गए हैं परन्तु उन ख़ौफ़नाक दृश्यों की कल्पना करके रूह काँप जाती है ऐसी बहुत सी ऐतिहासिक घटनाओं पर फ़िल्म बन चुकी है, जिसमें छल-बल के द्वारा युद्ध, युद्ध की विभीषिका और ख़ौफ़नाक मंज़र देख चुके हैं।  

हज़ारों युद्ध से हमारा इतिहास भरा पड़ा है साम्राज्य के विस्तार के लिए युद्ध, सत्ता पाने के लिए युद्ध, एक साम्राज्य द्वारा दूसरे को अधीन करने के लिए युद्ध, दूसरे साम्राज्य से अपने साम्राज्य को बचाए रखने के लिए युद्ध, अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए युद्ध, द्वेष के कारण युद्ध, दूसरे साम्रज्य की संपत्ति हड़पने के लिए युद्ध, स्त्री को लेकर युद्ध, सत्ता के लिए भाई-भाई में युद्ध इत्यादि जो राजा युद्ध जीतता है, वह अमानवीयता की सारी हदें पार कर जाता है वह हारे हुए राजा की नृशंसता से हत्या कर देता है या बन्दी बना लेता, क्रूरतम यातनाएँ देता है, बन्दी सैनिकों की बेरहमी और बर्बरता से हत्या करता है, हारे हुए राजा की रानियों और सैनिकों की पत्नियों पर अत्याचार करता है हर युद्ध का यही परिणाम होता है

शासन, सत्ता और आधिपत्य की लालसा तथा अहंकार के कारण मनुष्य क्रूरता की सारी हदें पार कर देता है; लेकिन यह ऐसी भूख है कि मिटती नहीं अगर वश चले तो पृथ्वी ही नहीं आकाश भी अपने अधीन कर लेमिथक कथाओं, लोक कथाओं, जातक कथाओं, पौराणिक कथाओं तथा ऐतिहासिक कथाओं में ऐसे अनेक युद्धों की गाथा हम सुनते हैं इतिहास गवाह है कि हर सम्राट का मक़सद अपने साम्राज्य का विस्तार और अपना आधिपत्य स्थापित करना रहा है; चाहे किसी भी देश या काल-खण्ड की बात हो सुर-असुर का संग्राम, राम-रावण का युद्ध, कौरव-पाण्डव का युद्ध इत्यादि सत्ता और अहंकार का ही युद्ध है। वैदिक काल का सबसे बड़ा युद्ध कुरुक्षेत्र का युद्ध माना जाता है, जो कौरवों और पाण्डवों के बीच सत्ता तथा अपमान के कारण हुआ 

लगभग 200 बार हिन्दुस्तान पर विदेशी शासकों द्वारा आक्रमण हुआ हैभारत के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण और ख़ौफ़नाक युद्ध ईसा पूर्व 261 में कलिंग का युद्ध है; हालाँकि कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और वे बौद्ध धर्म अपना लिए, ऐसा अमूमन किसी और राजा का नहीं हुआ सम्राट अशोक ने भी सत्ता पाने के लिए अपने भाइयों की क्रूरता से हत्या की थी 1192 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी के बीच युद्ध हुआ, जिसमे गोरी की जीत के साथ ही मुग़ल सल्तनत की नींव राखी गई 1526 ईस्वी में बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच युद्ध हुआ1556 ईस्वी में अकबर और हेम चंद्र विक्रमादित्य के बीच युद्ध हुआ 1576 ईस्वी में हल्दीघाटी का युद्ध अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुआ1689 ईस्वी में औरंगज़ेब और छत्रपति संभाजी महाराज के बीच युद्ध हुआ, जिसमें औरंगज़ेब ने बेहद क्रूरता से संभाजी की हत्या की 1704 ईस्वी में गुरु गोविन्द सिंह और मुग़ल सेना के बीच युद्ध हुआ 1761 ईस्वी में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ जो मराठा साम्राज्य और अहमद शाह अब्दाली के बीच हुआ यह युद्ध 18वीं सदी की सबसे ख़तरनाक ख़ूनी लड़ाई थी, जिसमें एक लाख से ज़्यादा सैनिक शामिल थे 1757 ईस्वी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और सिराजुद्दौला के बीच युद्ध हुआ1858 ईस्वी में झांसी का युद्ध हुआ जिसमें  अँग्रेज़ी सेना द्वारा लक्ष्मी बाई की हत्या हुई1887 ईस्वी में ब्रिटिश और भारतीय सिपाही के बीच युद्ध हुआ भारत की आज़ादी तक कई बार अँग्रेज़ी सरकार के साथ संघर्ष और युद्ध हुए वर्ष 1962 में चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ। वर्ष 1965, 1971,1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ द्वितीय विश्वयुद्ध मानव इतिहास का सबसे क्रूर युद्ध था, जिसमे कई करोड़ लोग मारे गए, जिनमें से अधिकांश सोवियत संघ और चीन के नागरिक थे

युद्ध की विभीषिका और बेरहम हत्याओं को देखकर ऐसा लगता है कि इतिहास बार-बार स्वयं को दोहराता रहता है सम्पूर्ण विश्व में कहीं-न-कहीं युद्ध जारी है। कई देश आपस में युद्ध कर रहे हैं, जिससे समस्त मानवता विनाश के कगार पर खड़ी है। युद्धरत कोई भी देश न समझौता के लिए तैयार है न युद्ध विराम के लिए। कोई भी देश अपनी सरहद के भीतर शान्ति से रहना नहीं चाहता इन युद्धों में न सिर्फ़ सैनिक मारे जा रहे हैं; बल्कि बेबस आम नागरिक भी मारे जा रहे हैं। निःसन्देह अब युद्ध के तरीक़े बदले हैं, पर मंशा नहीं। बम, तोप, असलहा ही नहीं रासायनिक और जैविक हथियार, परमाणु बम, साइबर हमले, रोबोट, ड्रोन इत्यादि द्वारा भी युद्ध में हमले होने लगे हैं

मुग़ल शासकों के बारे में कहा जाता है कि वे न सिर्फ़ सत्ता हथियाते थे; बल्कि हारे हुए राजाओं के मुस्लिम न बनने पर मार देते थे 'छावा' में औरंगज़ेब संभाजी से कहता है कि वह धर्म परिवर्तन कर ले और उसका साथ दे हालाँकि मेरा अनुमान है कि यह इतिहास की बात नहीं, यह फ़िल्म बनाने वाले के अपने विचार हैं अगर धर्म परिवर्तन ही मुद्दा होता तो मुग़ल शासन के दौरान जितने भी हिन्दू थे मुस्लिम बन चुके होते और हिन्दुस्तान मुस्लिम राष्ट्र होता। उसी तरह अँग्रेज़ी हुकूमत के बाद हिन्दुस्तान पूर्णतः ईसाई राष्ट्र बन गया होता किसी भी शासन के काल में हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही सैनिक रहे हैं और अपने-अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित रहे हैं। धर्म नहीं बल्कि सम्राट के प्रति वफ़ादारी होती है। सत्ता की राह में मन्दिर या मस्जिद, जो भी बाधा बने उसे नष्ट कर दिया गया। यह धार्मिक नफ़रत के कारण नहीं बल्कि सत्ता के लिए होता है। किसी भी धर्म के राजा हों, सभी का इतिहास एक जैसा रहा है। 

किसी भी युद्ध में दोनों पक्ष के सैनिकों के मन में एक ही भावना होती है कि अपनी मृत्यु से पूर्व दुश्मन पक्ष के जितना ज़्यादा हो सके सैनिकों को मार गिराना है यही युद्ध-नीति है और युद्ध-रीति भी जो जितना बड़ा घात सहकर प्रतिघात करे वह उतना ही बहादुर माना जाता है जो पक्ष जीत गया उसके हज़ारों सैनिक मरकर जीत दिलाते हैं हारे हुए पक्ष के सैनिक जो जीवित बच गए, उन्हें जैसी यातना दी जाती है कि उससे बेहतर युद्ध में मारा जाना है युद्ध में गए राजा और सैनिकों की पत्नियों की मानसिक दशा का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता हैहारने वाले पक्ष के राजा, उनकी प्रजा, सैनिक और स्त्रियों पर मानों क़हर टूट पड़ता है ऐसे में अपने बचाव के लिए जौहर, आत्मदाह, सामूहिक आत्महत्या ही उपाय बचता है। जीते या हारे, हर हाल में सैनिक ही मिटता है

अब राज घराना न रहा, न राजाओं का शासन; लेकिन राजाओं का स्थान अब राजनेताओं ने ले लिया है शासन, सत्ता, पैसा और वर्चस्व की भूख ने एक ऐसे युद्ध को जन्म दिया है जिसमें मनुष्य मनुष्य का दुश्मन बन चुका है जल-थल-वायु सभी सेनाओं की ज़िन्दगी सदा दाँव पर लगी रहती है साज़िश का माहौल ऐसा बन चुका है कि अब हर व्यक्ति दूसरे को तथा हर देश दूसरे को संदिग्ध दृष्टि से देखता है चीन और पाकिस्तान जब-न-तब सुरक्षा में सेंध लगाते रहते हैं 

हर युद्ध में जान की बाज़ी लगा देना देश के प्रति कर्त्तव्य है, चाहे वह राजाओं के काल की बात हो या अब के प्रजातंत्र में राजाओं के युद्ध में राजा की हार-जीत मायने रखती थी, सैनिकों की नहीं। परन्तु अब दो देशों के युद्ध में सिर्फ़ सैनिकों की जान जाती है सभी देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अन्य बड़े अधिकारी अगर चाहें तो दो देशों के बीच की समस्या का समाधान बातचीत के द्वारा कर सकते हैं लेकिन वर्चस्व की लड़ाई में हर देश के सैनिक मारे जा रहे हैं देश की सीमाओं पर सैनिक रात दिन पहरेदारी करते हैं, कब कहाँ आक्रमण हो जाए नहीं मालूम कब कौन मारा जाए नहीं मालूम। कब तीसरा विश्व युद्ध छिड़ जाए नहीं मालूम। ख़त्म तो मनुष्यता ही होगी

जेन्नी शबनम (28.2.2025)
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Monday, February 3, 2025

121. 'सन्नाटे के ख़त' (काव्य-संग्रह) की काव्यात्मक समीक्षा -आर. सी. वर्मा 'साहिल'

जनवरी 72025 को मेरे छठे काव्य-संग्रह के विमोचन के अवसर पर आर. सी. वर्मा 'साहिल' जी उपस्थित हुए। साहिल जी हिन्दी और उर्दू के सम्मानीय कवि हैं। इन्होंने राम चरित मानस का मन्ज़ूम-तर्जुमा यानी काव्यात्मक अनुवाद कर ऐतिहासिक कार्य किया है। मैंने साहिल जी से आग्रह किया कि मेरी इस पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रया दें एवं काव्यात्मक समीक्षा करें। मात्रा तीन दिन में उन्होंने यह लिखकर मुझे भेज दिया। इतनी सुन्दर समीक्षा के लिए साहिल जी का हार्दिक धन्यवाद।

प्रस्तुत है उनकी काव्यात्मक समीक्षा:     

'सन्नाटे के ख़त' (काव्य-संग्रह) की काव्यात्मक समीक्षा 

हैं हाथों में मेरे 'सन्नाटे के ख़त', काव्य की पुस्तक
जहाँ सन्नाटे भी देते दिलों पर भारी इक दस्तक
यह डॉ.  जेन्नी शबनम के लिए है प्यारी कविताएँ 
मुझे लगतीं मगर सारी की सारी बहती सरिताएँ 
या लगता सारे पृष्ठों पर टँके हों क़ीमती गौहर
या इसमें उतरा है कश्मीर का गुलमर्गो-गुलमोहर
मैं करता जा रहा जैसे ही कविताओं का अवलोकन
प्रफुल्लित और हैराँ भी हुआ जाता है मेरा मन
अलंकारित अनूठी भाषा हर कविता में है दिखती
विद्वत्ता और प्रतिभा जेन्नी जी की है हमें मिलती
कहीं है ओज कविता में, कहीं है यास कविता में
कहीं संकट की बातें हैं, कहीं है आस कविता में
कहीं हैं फ़लसफ़े गहरे औ गहरी सोच कविता में
कहीं सख़्ती नज़र आती, कहीं है लोच कविता में
कि अभिव्यक्ति बहुत ही स्पष्ट व सुन्दर नज़र आती
किसी कविता में तो नज़रें ठहर जातीं, ठहर जातीं
यहाँ 'अनुबंध' में अनुबंध कितने ही नज़र आते
है 'भीड़' में भीड़ इतनी ख़ुद को भी हम न नज़र आते
'नाइन्साफी' ख़ुदा की भी नज़र आती है कविता में
'नहीं लिख पाई ख़ुद पे कविता' भी आती है कविता में
बुलाना 'देव' को जो चल दिए घर से विमुख होकर
बताना कष्ट भी उनको, गये जो घर के सुख खोकर
यह है माहौल कैसा 'अब हवा ख़ून-ख़ून कहती है'
न ठण्डक देती है, बस आग के दरिया-सी बहती है
या रब 'इक चूक मेरी' कर गई क्या-क्या सितम मुझ पर
था उनके हाथ में जो भी, गिरा वो बनके ग़म मुझ पर
सनम अब क्यों न हम भी 'लौट के चलते हैं गाँव अपने'
कि झूठे और टूटे हैं शहर के जो भी थे सपने
न 'जाने कैसे' छोटी जात के संग खा निवाला इक
कोई हो जाता छोटा पीके पानी का पियाला इक
मैं अपनी 'भूमिका' ही तो निभाती आ रही अब तक
किए संवाद जो कण्ठस्थ वो दोहरा रही अब तक
यह सच है 'कवच' अपना-अपना हम ख़ुद ही बनाते हैं
और उसमें आदतन फिर क़ैद ख़ुद हम हो ही जाते हैं
यों लगता है कि जैसे आए हैं हम दूर से चल कर
बिताने वक़्त ख़ुद के साथ आए 'वापस अपने घर'
कि मन ये चाहता है भूले-भटके लेके इक तोहफ़ा
मेरे घर भी तो कोई काश! आज 'इक सांता आ जाता'
इसी तरह सभी कविताओं के रंग हैं बहुत गहरे
फ़लसफ़े बहुत गहरे सोच गहरी ढंग बहुत गहरे
बहुत मजबूर करती कविताएँ कुछ सोचने को भी
समझने, सीखने को भी ये और कुछ बोलने को भी
दुआ है जेन्नी जी आइन्दा भी लिखती रहें ऐसे
बढ़ें आगे ही इस पथ पर, क़लम चलती रहे ऐसे

-आर. सी. वर्मा 'साहिल'
तिथि: 10.1.2025
फ़ोन: 9968414848
-0- 

-जेन्नी शबनम (3.2.2025)
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Monday, January 27, 2025

120. इमरोज़ की चाय

इमरोज़ जी का जन्मदिन 26 जनवरी को होता है। उनके जन्मदिन पर एक संस्मरण लिखी हूँ, जो 2024 के अभिनव इमरोज़ पत्रिका के चाय विशेषांक में प्रकाशित हुई। यों इमरोज़ जी के साथ मेरे ढेरों संस्मरण हैं; परन्तु चाय वाला संस्मरण मुझे रोमांचित करता है। 

इमरोज़ की चाय 

अमृता जी के देहावसान के बाद भी मैं उनके घर जाती और इमरोज़ जी से मिलती रही। जाने क्यों जब भी इमरोज़ जी से मिलती तो यूँ लगता मानो अमृता जी से मिल रही हूँ। कई सवाल जो मुझे अमृता जी से पूछने थे, इमरोज़ जी से पूछती थी। सोचती कि अमृता जी होतीं तो क्या जवाब देतीं, मुमकिन है वे मेरे सवाल का जवाब किसी कविता के रूप में देतीं या मेरे सवाल के जवाब में मुझसे ही सवाल करतीं। जब भी वहाँ जाती मेरे इर्द-गिर्द इमरोज़, इमरोज़ द्वारा बनाई अमृता की पेंटिंग्स, अमृता की बातें तथा चाय की चुस्कियाँ होतीं। 

मैं जब परेशान या उदास होती तो अक्सर इमरोज़ जी से मिलने उनके घर पहुँच जाती थी। जब भी जाती तो दरवाज़ा वही खोलते और मुझे पहली मंजिल पर ले जाते थे। जाड़े के दिनों में छत पर फूल व धूप के साथ हम बैठते, बातें करते व चाय पीते। कभी हम डाइनिंग रूम बैठते तो कभी उनके कमरे में। उन्हें मेरी समस्याओं की जानकारी थी, इसलिए वे जीवन जीने के लिए ढेरों बातें बताते थे। ऐसा नहीं कि वे सिर्फ़ मुझसे ऐसी बातें करते थे, वे सभी के प्रिय थे व सबसे प्रेम करते थे और सबसे खुलकर बात करते थे, चाहे उनके और अमृता के आपसी रिश्ते की बात हो या दुनियादारी की।   

एक दिन मन बहुत उदास था। हर बार की तरह इमरोज़ जी से मिलने मैं वक़्त पर पहुँच गई। वे घर पर अकेले थे। उस दिन हमलोग डाइनिंग रूम में बैठे। फिर इमरोज़ जी ने कहा ''तुम बैठो मैं चाय बनाकर लाता हूँ।'' मैंने कहा ''चाय मैं बनाती हूँ, आप बैठिए और अमृता जी की बातें करते रहिए।'' वे बोले ''तुम भी चलो किचन में, देखो मैं कैसे चाय बनाता हूँ।'' एक बर्तन में चाय का पानी डाला उन्होंने फिर मुझसे कहा ''वहाँ कप है ले आओ।'' मैं कप लेकर आई। चाय बनाते हुए बताते रहे कि अमृता और वे साथ मिलकर कैसे रसोई में काम करते हैं या अन्य कोई काम करते हैं। अमृता जी के लिए वे कभी भी थी नहीं बोलते थे। उन्होंने बताया कि अमृता के लिए वे रात में चाय बनाते हैं और चुपचाप उनके कमरे में रख आते हैं, जब अमृता कुछ लिखती होतीं हैं। अमृता के जाने के बाद भी वे दो कप चाय बनाते हैं अमृता और ख़ुद के लिए। इमरोज़ जी बोले ''अमृता तो नहीं हैं, आज तुम चाय पी लो।'' चाय बन रही थी। इमरोज़ जी मुझे रसोईघर दिखाते रहे और बताते रहे कि रसोईघर को किस तरह उन दोनों ने आकर्षक बनाया।

इमरोज़ जी द्वारा बनाई हुई चाय मैं पीने वाली हूँ, यह सोचकर मैं रोमांचित हो रही थी और यह सभी क्षण मैं अपने कैमरे में क़ैद करती रही। चाय बन गई तो मैं दोनों कप उठाकर डायनिंग टेबल पर ले आई। हम चाय पीते रहे और इमरोज़ जी से मैं जीवन को समझती रही। उन्होंने कुछ कविताएँ सुनाईं। कुछ अनछपी कविताएँ जो पन्नों पर टाइप की हुई थीं, मुझे दी। उनकी कविताओं और पेंटिंग से बनाया हुआ एक कैलेंडर भी उन्होंने दिया।

चाय ख़त्म हो चुकी थी, वे कप उठाने लगे। झट से मैं कप उठाकर किचन के सिंक में ले गई और कप धोने लगी। वे बोले ''कप मुझे दो मैं धोऊँगा, चाय पीता हूँ तो कप भी धो देता हूँ।'' मैंने कहा ''चाय आप बनाए हैं तो मुझे कप धोने दीजिए।'' अंततः मैंने दोनों कप धोया और उन्होंने सॉसपैन।  डाइनिंग रूम में हम घंटों बैठे रहे; इमरोज़ और इमरोज़ की अमृता की बातों के साथ मैं।

सोचती हूँ कुछ यादें मन को कितना आनन्दित करती हैं। यूँ चाय पर कई संस्मरण है, पर इमरोज़ जी द्वारा मेरे लिए चाय बनाना और मेरा उन पलों को जीना, मेरे लिए बहुत सुखद क्षण था।

(30.8.2024)
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-जेन्नी शबनम (26.1.2025)
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Thursday, January 16, 2025

119. ख़त, जो मन के उस दराज़ में रखे थे -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

आदरणीय रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा लिखी भूमिका:
काव्य में कल्पना के पुष्प खिलते हैंभावों की कलिकाएँ मुस्कुराती हैं, सुरभित हवाएँ आँचल लहराते हुए अम्बर की सीमाएँ नाप लेती हैं। जीवन इन्द्रधनुषी रंगों से रँग जाता है। चिट्ठियों की मधुर सरगोशियाँ नींद छीन लेती हैं। क्या वास्तविक जीवन ऐसा ही हैकदापि नहीं। भावों की कलिकाओं को जैसे ही गर्म लू के थपेड़े पड़ते हैंतो यथार्थ जीवन के दर्शन होते हैं। जीवन की पगडण्डी बहुत पथरीली हैजिस पर नंगे पाँव चलना हैतपती दोपहर में। आसपास कोई छतनार गाछ नहीं हैजिसके नीचे बैठकर पसीना सुखा लिया जाए। चारों तरफ़ सन्नाटा है। कोई बतियाने वालाराह बताने वाला नहीं है। उस समय पता चलता है कि जो हम कहना चाहते थेवह कभी उचित समय पर कहा नहीं। जो सहना चाहते थेवह सहा नहीं। जिसे अपना बनाकर रखना चाहते थेवह कभी अपना था ही नहीं। जब इस जगत्-सत्य का पता चलता हैतब पता चला कि मुट्ठी से रेत की मानिन्द समय निकल गया। चारों तरफ़ बचा केवल सन्नाटा। जीवन के कटु क्षणों के वे ख़तजो कभी लिखे ही नहीं गए। जो लिखे भी गएकभी भेजे ही नहीं गए। ज़ुहूर नज़र के शब्दों में-

              वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देखकर

              मैंने उसको आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं।


डॉ. जेन्नी शबनम के कुछ इसी प्रकार के 105 ‘सन्नाटे के ख़त’ हैंजो समय-समय पर चुप्पी के द्वारा लिखे गए हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम जिससे प्रेम करते हैंउसे सही समय पर अभिव्यक्त नहीं करते। जिसे घृणा करते हैंसामाजिक दबाव में उसको कभी होंठों पर नहीं लाते। परिणाम होता हैजीवन को भार की तरह ढोते हुए चलते जाना।


ये ख़त मन के उस दराज़ में रखे थेजिसे कभी खोलने का अवसर ही नहीं मिला। अब जी कड़ा करके पढ़ने का प्रयास कियाक्योंकि ये वे ख़त हैंजो कभी भेजे ही नहीं गए। किसको भेजने थेस्वयं को ही भेजने थे। अब तक जो अव्यक्त थाउसे ही तो कहना था। पूरा जीवन तो जन्म-मृत्युप्रेम घृणास्वप्न और यथार्थ के बीच अनुबन्ध करने और निभाने में ही चला गया-

              एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच

              कभी साथ-साथ घटित न होना

              एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच

              कभी साथ-साथ फलित न होना

              एक अनुबन्ध है स्वप्न और यथार्थ के बीच

              कभी सम्पूर्ण सत्य न होना


जीवनभर कण्टकाकीर्ण मार्ग पर ही चलना पड़ता है; क्योंकि जिसे हमने अपना समझ लिया हैउसका अनुगमन करना था। मन की दुविधा व्यक्ति को अनिर्णय की स्थिति में लाकर खड़ा कर देती हैजिसके कारण सही मार्ग का चयन नहीं हो पाताजबकि-

              उस रास्ते पर दोबारा क्यों जाना

              जहाँ पाँव में छाले पड़ेंसीने में शूल चुभें

              बोझिल साँसें जाने कब रुकें।


निराश होकर हम आगे बढ़ने का मार्ग ही खो बैठते हैं। आधे-अधूरे सपने ही तो सब कुछ नहीं। सपनों से परे भी तो कुछ है। कवयित्री ने जीवन में एक अबुझ प्यास को जिया है। मन की यह प्यास किसी सागरनदी या झील से नहीं बुझ सकती।


घर बनाने में और उसको सँभालने में ही हमारा सारा पुरुषार्थ चुक जाता है। इसी भ्रम में जीवन के सारे मधुर पल बीत जाते हैं-

              शून्य को ईंट-गारे से घेरघर बनाना

              एक भ्रम ही तो है

              बेजान दीवारों से घर नहींमहज़ आशियाना बनता है

              घरों को मकान बनते अक्सर देखा है

              मकान का घर बनना, ख़्वाबों-सा लगता है।


इन 105 ख़तों में मन का सारा अन्तर्द्वन्द्वअपने विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। आशा है पाठक इन ख़तों को पढ़कर अन्तर्मन में महसूस करेंगे।


दीपावली: 31.10.2024                                                     -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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- जेन्नी शबनम (16.1.2025)

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Friday, January 10, 2025

118. 'सन्नाटे के ख़त' का लोकार्पण











जनवरी माह की सात तारीख़ मेरे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और यादगार है। वर्ष 2000 में आज के दिन मेरी बेटी का जन्म हुआ। मेरी पहली पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में जनवरी 7, 2020 को हुआ। मेरी दूसरी पुस्तक 'प्रवासी मन' जनवरी 7, 2021 को मुझे प्राप्त हुई, जिसका अनौपचारिक विमोचन मेरी बेटी और मैंने किया। जनवरी 10, 2021 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 'हिन्दी हाइकु' एवं 'शब्द सृष्टि' के संयुक्त तत्वाधान में गूगल मीट और फेसबुक पर आयोजित पहला ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मलेन हुआ, जिसमें मेरी पुस्तक 'प्रवासी मन' का औपचारिक लोकार्पण हुआ।

  
आज मेरे दिल्ली आवास पर मेरी बेटी के वर्षगाँठ के अवसर पर मेरी छठी पुस्तक 'सन्नाटे के ख़त' का लोकार्पण हुआ। अत्यन्त अनौपचारिक माहौल में पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण हुआ। लोकार्पण के अवसर पर श्री बी. के. वर्मा 'शैदी', डॉ. पुष्पा सत्यशील, श्री आर. सी. वर्मा 'साहिल', श्रीमती नरेश बाला वर्मा, श्री अनिल पाराशर 'मासूम', श्रीमती शानू पाराशर, श्रीमती अनुपमा त्रिपाठी, डॉ. राजीव रंजन गिरि, श्री आवेश तिवारी, सुश्री संगीता मल्लिक, सुश्री शिल्पा पाटिल, श्री विभोर चौधरी, श्रीमती सोमवती शर्मा, श्रीमती दिशा शर्मा, श्री राजेश पाण्डेय, श्री राजेश कुमार श्रीवास्तव, श्री अभिज्ञान सिद्धांत, सुश्री परान्तिका दीक्षा सम्मिलित हुए।
सबसे पहले बेटी ने केक काटकर आयोजन का शुभारम्भ किया। शैदी जी व साहिल जी ने बेटी के जन्मदिन पर अपनी लिखी विशेष रचना द्वारा बेटी को आशीर्वाद दिया। मेरी रचना, जिसे मैंने बेटी के जन्मदिन पर लिखी, अनिल जी ने पढ़कर सुनाया। शैदी जी, साहिल जी एवं मासूम जी ने अपनी-अपनी रचनाएँ पढ़ीं। अनुपमा त्रिपाठी जी एवं राजेश श्रीवास्तव जी ने गीत गाए। आवेश जी ने अपनी रचना सुनाई। विभोर चौधरी जी ने हास्य व व्यंग्य द्वारा मनोरंजन किया। राजेश पाण्डेय जी ने हमारी छवियाँ अपने कैमरे में उतारीं ताकि यह दिन कभी विस्मृत न हो।  










आदरणीय शैदी जी द्वारा अँग्रेज़ी में माहिया और शुभकामना सन्देश-

कुछ तो है बात, बनाती हैं जो विशेष इसे
साल-भर जिसका कि इस दिल को इंतज़ार रहे।
आज के दिन ही तो उठती हैं उमंगें दिल में,
जनवरी सात का दिन क्यों न यादगार रहे??


माहिये-

Today is January seven
It's really Special Day 
for some special one.

We are enjoying completely
You have invited all of us 
we are grateful Jenny Ji.

Year two thousand twenty five
Will surely be better 
we shall better survive.
-0-

आदरणीय साहिल जी द्वारा काव्य-गीत द्वारा शुभकामनाएँ-

प्रिय बेटी 'ख़ुशी' के जन्मदिन के पावन अवसर पर आशीर्वाद और शुभकामनाओं के कुछ उद्गार: 07/01/2025 

-साहिल 

बधाई जन्मदिन की कर लो तुम स्वीकार ऐ बेटी
हमेशा दूँ तुम्हें आशीष और अपना प्यार ऐ बेटी
यह दिन लाता रहे हर वर्ष इक रंगत नई तुम पर
बने जीवन तुम्हारा फूलों से गुलज़ार ऐ बेटी। 

ग़मों से, आफ़तों से खेलने का नाम है जीवन
इन्हीं से ज़िन्दगी है और इन्हीं का नाम है जीवन
ख़ुशी दो दिन की है, इसको हमेशा न समझ अपना
जो जीवन में मुसीबत है, उसी का नाम है जीवन। 

ग़मों से गर उबर जाओ, इन्हीं के बाद खुशियाँ हैं
मुसीबतें झेल लो पहले, इन्हीं के बाद खुशियाँ हैं
डरो न इनसे बेटी, ये बनाएँगी तुम्हें पुख़्ता
यक़ीं मानो इन्हीं के बाद तो खुशियाँ ही खुशियाँ हैं। 

यह दिन आता रहे जीवन में तेरे हर ख़ुशी लेकर
महक लेकर चमक लेकर हँसी और ताज़गी लेकर
रहे तू स्वस्थ हरपल, चाँदनी उतरे तेरे आँगन 
तेरे जीवन में आए हर नया दिन ज़िन्दगी लेकर। 

मनाओ जन्मदिन अपना ख़ुशी से झूमकर गाओ
ये ग़म तो आने-जाने हैं ग़मों को भूलकर गाओ
जो अपने पास है अपना है, जो खोया गया समझो
न इन बातों में उलझो, आज के दिन झूमकर गाओ। 

मनाती तू रहे हर साल अपना जन्मदिन यूँ ही
मनाएँ हम भी तेरे साथ तेरा जन्मदिन यूँ ही
रहे बढ़ता सभी का प्यार जीवन में तेरे हरपल
रहे लाता नई आशा तेरा हर आज और हर कल। 
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पुस्तक लोकार्पण के बाद गीत-ग़ज़ल के साथ दिन का भोजन हुआ। सभी उपस्थित विद्वजनों का स्नेह और आशीर्वाद मेरी पुस्तक और मेरी बेटी को मिला, यह मेरा सौभाग्य है। सभी का हार्दिक धन्यवाद व आभार! 

-जेन्नी शबनम (7.1.2025)
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