Wednesday 1 May 2013

45. मजदूर महिलाएँ : मूल्यहीन श्रम

जब से होश सँभाला तब से फैज़ की यह नज़्म सुनती और गुनगुनाती रही हूँ...
''हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे 
इक खेत नहीं इक देश नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे...''
उन दिनों सोचती थी कि आखिर मेहनत तो सभी करते हैं, फिर कौन किससे हिस्सा माँग रहा ? ये दुनिया आखिर है किसकी ? दुनिया है किसके पास ? कोई एक जब पूरी दुनिया ले लेगा तो बाकी लोग कहाँ जाएँगे ? अजीब-अजीब-से सवाल...पर सब मन में ही इकट्ठे होते रहे ।

मई दिवस पर बैठक होती थी, मैं भी शामिल होती थी अपने माता-पिता के साथ । गोष्ठियाँ होती थी, बड़ी-बड़ी रैली होती थी जिसमें शहर के साथ ही गाँव के किसान और श्रमिक भी शामिल होते थे । झंडे, पोस्टर, बैनर आदि होते थे । पुरजोर नारे लगाए जाते थे - ''दुनिया के मजदूरों एक हो'', ''जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है'', ''इन्कलाब जिंदाबाद पूँजीवाद मुर्दाबाद'' आदि । उन दिनों मई दिवस जैसे जश्न का दिन होता था । 

समय के साथ जब ज़िन्दगी की परिभाषाएँ समझ में आईं और अपने सवालों के जवाब, तब खुद पर हँसी आई और ढेरों सवाल उगाने लगे जिनके जवाब भी मुझे मालूम होते हैं । मेरे पैदा होने से बहुत पहले जब ये दुनिया बनी होगी तब स्त्री और पुरुष दो जाति रही होगी । श्रम के आधार पर पुरुषों की स्वतः ही दो जातियाँ बन गई होंगी । एक जो श्रम करते होंगे और एक जो श्रम नहीं करते होंगे । जो श्रम नहीं करते होंगे वे जीवन यापन के लिए बल प्रयोग के द्वारा जर, जोरू और ज़मीन हथियाने लगे होंगी । बाद में इनके ही हिस्से में शिक्षा आई, सुविधा और सहूलियत भी । और ये कुलीन वर्ग कहलाने लगे । स्त्री को पुरुषों ने अपने अधीन कर लिया क्योंकि स्त्री शारीरिक रूप से पुरुषों से कमजोर होती है । धीरे-धीरे स्त्री ने भी अधीनता स्वीकार कर ली, क्योंकि इसमें जोखिम कम था और सुरक्षा ज्यादा थी । कितना वक़्त लगा, कितने अफ़साने बने, कितनी ज़िन्दगी इन सब में मिट गई, कितनी जानें गई, कितनों ने खुद को मिटा दिया ! और अंततः सारी शक्तियाँ कुछ ख़ास के पास चली गईं । स्त्रियाँ और कामगार श्रमिक कमजोर होते गए और सताए जाने लगे, बँधुआ बन गए, उत्पादन करके भी वंचित रहे । वो वर्ग जिसके बल पर दुनिया के सभी कार्य होते थे सर्वहारा बन गए । इस व्यवस्था परिवर्तन ने सर्वहारा वर्ग को तोड़ दिया । धीरे-धीरे हक़ के लिए आवाजें उठने लगी, सर्वहारा के अधिकारों के लिए क्रांतियाँ होने लगी । मज़दूर-किसान और स्त्रियों के अधिकार के लिए हुई क्रांतियों ने कानूनी अधिकार दे दिए लेकिन सामाजिक ढाँचे में ख़ास बदलाव नहीं आया । आज भी मनुष्य को मापने के दोहरे माप दंड हैं ।  
पुरुषों के दो वर्ग हैं शासक और शोषित लेकिन स्त्रियों का सिर्फ एक वर्ग है शोषित । दुनिया की तमाम स्त्रियाँ आज भी अपने अधिकार से वंचित है, भले ही कई देशों ने बराबरी का अधिकार दिया हो । कोई भी स्त्री हो उत्पादन का कार्य करती ही है । चाहे खेत में अनाज उपजाए या पेट में बच्चा । शिक्षित हो या अशिक्षित; घरलू कार्य की जवाबदेही स्त्री की ही होती है । फिर भी स्त्री को कामगार या श्रमिक नहीं माना जाता है । खेत, दिहाड़ी, चौका-बर्तन, या अन्य जगह काम करने वाली स्त्रियों को पारिश्रमिक मिलता है; भले पुरुषों से कम । लेकिन एक आम घरेलू स्त्री जो सारा दिन घर का काम करती है, संतति के साथ ही आर्थिक उपार्जन में मदद करती है; परन्तु उसके काम को न सिर्फ नज़रंदाज़ किया जाता है बल्कि एक सिरे से यह कह कर खारिज कर दिया जाता है कि ''घर पर सारा दिन आराम करती है, खाना पका दिया तो कौन-सा बड़ा काम किया, बच्चे पालना तो उसकी प्रकृति है, यह भी कोई काम है ।'' एक आम स्त्री के श्रम को कार्य की श्रेणी में रखा ही नहीं जाता है; जबकि सत्य है कि दुनिया की सारी स्त्री श्रमिक है, जिसे उसके श्रम के लिए कभी कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता है ।

मजदूर दिवस आते ही मजदूरों, श्रमिकों या कामगारों की जो छवि आँखों में तैरती है उनमें खेतों में काम करने वाले, दिहाड़ी पर काम करने वाले, रिक्शा-ऑटो चालाक, कुली, सरकारी गैर सरकारी संस्था में कार्यरत चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी आदि होते हैं । हर वो श्रमिक है जो दूसरे के लिए श्रमदान करता है और बदले में पारिश्रमिक का हकदार होता है । लेकिन एक आम स्त्री को श्रमिक अब तक नहीं माना गया है और न श्रमिक कहने से घर में घरेलू काम-काज करती बच्चे पालती स्त्री की छवि आँखों में उभरती है । 

मई दिवस आज भी वैसे ही मनेगा जैसे बचपन से देखती आई हूँ । कई सारे औपचारिक कार्यक्रम होंगे, बड़े-बड़े भाषण होंगे, उद्घोषणाएँ की जाएँगी, आश्वासन दिए जाएँगे, बड़े-बड़े सपने दिखाए जाएँगे । कल का अखबार नहीं आएगा । और इन सबके बीच श्रमिक स्त्री हमेशा की तरह आज भी गूँगी बहरी बनी रहेगी, क्योंकि माना जाता है कि यही उसकी प्रकृति और नियति है ।
समय आ गया है कि स्त्रियों के श्रम को मान्यता मिले और इसके लिए संगठित प्रयास आवश्यक है । इसमें हर उस इंसान की भागीदारी आवश्यक है; जो स्त्रियों को इंसान समझते हैं, चाहे वो किसी भी धर्म, भाषा, प्रांत के हों । स्त्रियों के द्वारा किए गए कार्य का पारिश्रमिक देना तो मुमकिन नहीं है और न यह उचित है; क्योंकि फिर स्त्री अपने ही घर में श्रमिक और उसका पिता या पति मालिक बन जाएगा । अतः स्त्री के कार्य को श्रम की श्रेणी में रखा जाए और उसके कार्य की अवधि की समय सीमा तय की जाए । स्त्री को उसके श्रम के हिसाब से सुविधा मिले और आराम का समय सुनिश्चित किया जाए । स्त्री को उसके अपने लिए अपना वक़्त मिले; जब वो अपनी मर्जी से जी सके और अपने समय का अपने मन माफिक उपयोग सिर्फ अपने लिए कर सके । शायद फिर हर स्त्री को उसके श्रमिक होने पर गर्व होगा और कह पाएगी ''मजदूर दिवस मुबारक हो'' ! 

- जेन्नी शबनम (मजदूर दिवस 1. 5. 2013)

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11 comments:

प्रतिभा सक्सेना said...

कितना अच्छा हो ऐसा संभव हो जाए !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (02-05-2013) दो मई की दिलबाग विर्क की चर्चा - 1232 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

PRAN SHARMA said...

PRABHAAVSHALEE LEKH KE LIYE AAPKO
BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA .

Sunita Agarwal said...

waaah sarthak prastuti .... sach kaha aapne bahut kuchh kiya gaya majduo or striyo ki dasha sudharne hetu .. par keval kagaj ke panno par hi ..samajik sanrchna aj bhi wahi hai

सहज साहित्य said...

'मज़दूर महिलाएँ : मूल्यहीन श्रम'लेख का एक -एक शब्द तर्कपूर्ण और वैचारिक चिन्तन को उद्वेलित करने वाला है । ताकतवर होना ही सुविधाओं पर काबिज़ होने का कारण बन गया है । वह ताकत नियम , कानून , सम्प्रदाय , जाति , पद , क़द किसी की भी तरह की हो ।जो कमज़ोर हो गया वह, शक्तिशाली का शिकार बन गया । समय के साथ लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में भी आकर्षक घोषणाओं का काला पक्ष नज़र आता है , जब मामूली- सी पेंशन पाने के लिए रोटी के लिए तरसती विधवा को घूस देनी पड़ती है। श्रम का मूल्य हड़पने के लिए तो बहुत सारी कम्पंनियाँ रात-दिन मालामाल होती जा रही हैं और जो बदहाल थे वे और अधिक बुरी ज़िन्दगी जीने के लिए त्रस्त हैं। कानून को ठेंगा दिखाने वाले तर माल उड़ाने में लगे रहते हैं, छ्द्म विज्ञापन झूठे सपनों का संसार रोज़ तमाशे की तरह दिखाते रहते हैं । डॉ जेन्नी शबनम जी को इस लेख के लिए बहुत बधाई !

ashok andrey said...

aapke itne sargarbhit aalekh ko pada.kayaa vastav men esaa sambhav ho paegaa.agar esaa huaa to duniya kitni khubsurat ho jaaegee.

Aziz Jaunpuri said...

संभव होना ही अच्छा है

Sarik Khan said...

LAL SALAM

Aditya Tikku said...

too good--***

Kuldeep Thakur said...

आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 25/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।

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मदन मोहन सक्सेना said...

Nice sharing