Friday, May 1, 2020

75. हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे

आज अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस है हर साल यह दिन आता है और ऐसे चला जाता है जैसे रोज़ सुबह का उगता सूरज अपने नियत समय पर शाम क ढ़ल जाता है कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं, कहीं कोई शोर नहीं, बदलाव के लिए पूरज़ोर आवाज़ नहीं मज़दूरों किसानों के लिए कहीं कोई इंतजाम नहीं, उनके जीने के लिए कोई सहूलियत नहीं यूँ सत्ता पर आसीन हर सरकार किसानों मजदूरों के लिए बड़ी-बड़ी बातें, बड़ी-बड़ी योजनाएँ, बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करती है लेकिन धरातल पर कहीं कुछ नहीं होता है साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की पार्टियाँ किसानों मज़दूरों के हक़ के लिए शुरू से प्रतिबद्ध है और समय-समय पर इनके लिए सरकार से लड़ती रही है। लेकिन वह नारों से इतर मजदूरों की स्थिति बदलने में नाकाम रही है आज किसानों मजदूरों के हित के लिए जो भी सहूलियत है, भले बहुत कम सही, पर इनके ही बदौलत है।   

बचपन से फैज़ अहमद फैज़ का मशहूर गीत, जिसे सुन-सुनकर हम बड़े हुए हैं बरबस ही आज के दिन मुझे याद आ जाता है -

हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे  
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया माँगेंगे 
वो सेठ व्यापारी रजवाड़े, दस लाख तो हम हैं दस करोड़ 
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा माँगेंगे  

आज के दिवस पर 5 साल पुरानी एक घटना याद आ रही है। हम लोग घूमने के लिए लन्दन गए और वहाँ एक होटल में ठहरे थे बाथरूम का फ्लश ख़राब हो गया था, तो मैंने रिसेप्शन पर ठीक करवाने के लिए कह दिया कुछ मिनट ही बीते होंगे कि दरवाज़े की घंटी बजी, जाकर मैंने दरवाज़ा खोला सामने एक लंबा-सा नौजवान खड़ा था, जिसने शर्ट, पैंट, कोट, चमचमाता जूता और हाथ में दस्ताना पहना हुआ था उसने पूछा कि आपने रिसेप्शन पर कॉल किया था मैं बोली कि हाँ, कॉल किया था, बाथरूम का फ्लश खराब हो गया है, कृपया किसी को ठीक करने भेज दीजिए वह बोला ठीक है, एक मिनट में आया फिर वह एक बैग लेकर आया और बाथरूम ठीक करने लगा मैं हतप्रभ हो गई मैं तो उसे होटल का मेनेजर समझ रही थी उसे देखकर मैं सोचने लगी कि हमारे देश में अगर होता तो उसका वस्त्र कैसा होता शर्ट पैंट तो ठीक है परन्तु चमचमाता जूता और हाथ में दस्ताना, यह तो मैंने आज तक नहीं देखा मैं सोचने लगी हमारे देश में गंदे नाले की सफाई में हर साल कितने लोगों की मृत्यु हो जाती है हमारे यहाँ स्वीपर या सफाईकर्मियों को सबसे निम्न दर्ज़ा प्राप्त है। हमारी सरकार को इनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए कड़े नियम बनाने होंगे अगर ये न हों तो हमारे लिए जीवन नामुमकिन हो जाएगा निश्चित ही सफाईकर्मियों का महत्व हम सभी को इस कोरोनाकाल में अच्छी तरह समझ आ गया है शायद अब इनके हालात में थोड़ा ही सही पर सुधार हो।   

किसानों की ज़मीन लेकर बड़े उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिए दी गई किसानों की खेती की ज़मीन सस्ते में लेकर उसपर मॉल बनाए जा रहे हैं, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनाई जा रही हैं यह तो तय है कि इन सबका निर्माण मज़दूर करता है, और उन्हीं के पास अपना सिर छिपाने के लिए छत नहीं होता है जिनकी खेती की ज़मीन ले ली गई, उनके भरण पोषण के लिए कोई निदान नहीं किया गया वे या तो पलायन कर जाते हैं या फिर किसी तरह उम्र काटने के लिए आसमान की तरफ हाथ उठाए दुआओं में ज़िन्दगी खपाते हैंकिसान का ऋण उनके जीवन का ऋण होता है, जिसे चुकाने में वे अपनी जान की बाज़ी लगा देते हैं परन्तु मौसम की मार, सरकार की बेरुखी और निरंकुशता किसानों को तोड़ देती है और वे कभी उससे बाहर नहीं आ पाते हैं    

इंसान की पाँच बुनियादी ज़रूरतें भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य है, जिसके बिना एक सुसंस्कृत और विकसित देश की कल्पना संभव नहीं है परन्तु आज भी हमारे देश में इन विषयों पर सरकार का ध्यान नहीं जाता है सरकारी योजनाओं का फ़ायदा उच्च वर्ग और पूंजीपतियों को ही मिलता है आम लोग जिनमें निम्न वर्ग, आदिवासी, दलितो, किसान, मजदूर, असंगठित कामगार आदि को इसका कोई लाभ नहीं मिलता है    

छोटे शहरों और गाँव में आज भी अस्पताल नहीं है वहाँ आज भी ऐसे स्वास्थ्यकर्मी नहीं है, जो लोगों को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक कर सकें। यहाँ का कोई निवासी बीमार हो तो छोटा ही सही कोई अस्पताल तो हो ताकि बिना इलाज़ वह मरें नहीं अगर किसी को कोई बड़ी बीमारी हो गई तो बड़े शहर जाकर इलाज़ कराना बहुत कठिन होता है। इसलिए उन पिछड़े इलाकों में इलाज़ के अभाव में मृत्यु बहुत ज्यादा होती है अस्पताल और प्रशिक्षित दाई न होने के कारण गाँव में आज भी अधिकांश बच्चों का जन्म घर में ही होता है, जिसे गाँव की अप्रशिक्षित दाई करवाती है जच्चा बच्चा राम भरोसे।   

गाँव हो या शहर (दिल्ली को छोड़कर) जहाँ भी सरकारी स्कूल है, वहाँ के शिक्षा का स्तर तो सभी को मालूम ही है सरकार से अनुदान मिलने पर भी भ्रष्टाचार का दीमक सब चट कर जाता है देश में दो तरह की शिक्षा पद्धति जब तक रहेगी, समाज के दोनों वर्गों की खाई कभी नहीं भरेगी पूरे देश में सिर्फ एक माध्यम से पढाई होनी चाहिए और अमीर हों या गरीब सभी की शिक्षा निःशुल्क एक साथ हो हमारे देश में जब हिन्दू-हिन्दू करने वाली सरकार बनी तो मुझे सिर्फ एक बात की उम्मीद थी, कि यह पार्टी जो खुद को भारतीय संस्कृति की अकेली पैरोकार मानती है, भारतीय परिधान और हिन्दी पर जोर देती है, तो शायद हिन्दी को हमारे देश की राष्ट्रभाषा ज़रूर बनाएगी पर ऐसा कुछ न हुआ, आज भी हम अंग्रेजी की गुलामी कर रहे हैं।   

जब से राम मंदिर प्रकरण शुरू हुआ है, देश का साम्प्रदायिक सौहार्द इस तरह बिगड़ गया है कि लोगों में आपसी प्रेम पनपना नामुमकिन है हर घटना को हिन्दू मुस्लिम के ही चश्मे से देखा जाता है यह हिन्दू मुस्लिम करवाने वाली तो राजनीतिक पार्टियाँ हैं, लेकिन करने वाले वे बेरोजगार और अशिक्षित हैं जिनके पास कोई काम नहीं या यूँ कहें कि कि इन्हें ऐसा करने के लिए पोषित किया जाता है और हर पार्टी में ऐसे लोगों का संगठित हूजुम है जो हर वक़्त हिन्दू मुसलमान करता रहता है जिनके पास पेट भरने के लिए नहीं वे लोग सहज इस अपराध में शामिल हो जाते हैं दंगा हो या आतंकवाद, इसके जड़ में अशिक्षा और बेरोजगारी ही हैजाति और साम्प्रदायिक आधार पर किसानों मजदूरों को बाँटने का काम करके वोट बैंक तैयार होता है और उनके द्वारा जन विरोधी कार्य करवाए जाते हैं।   

हमारी सभी आशाएँ मिट चुकी हैं। अँधेरा गहराता जा रहा है। फिर भी उम्मीद की एक किरण है जो कभी-कभी दिख जाती है। महीनों से कोरोना संकट से जूझ रहे प्रवासी कामगारों, श्रमिकों, मजदूरों, छात्रों और वे सब जो अपने-अपने घरों से दूर हैं; उनमें से कुछ के लिए सरकार द्वारा घर वापसी का प्रबंध किया गया है। आज एक ट्रेन रवाना हुई है, जिसमें काफी लोग, जो घर पहुँच पाने की उम्मीद छोड़ चुके थे, अपने-अपने घरों को जा रहे हैं; भले ही कोरोना से बचाव के लिए कुछ और जाँच किए जाएँगे। काफी देर से पर सरकार ने एक सही कदम उठाया है। इस देरी के कारण न जाने कितने लोगों की जान चली गई है। जिनके पास घर नहीं, पैसा नहीं, खाना नहीं वे कैसे गुजारा करते, कैसे व्यक्तिगत दूरी का पालन करते हुए खुद को कोरोना से बचाते? भय और आशंका के कारण कामगारों ने जान जोखिम में डाल कर, एक झोले में अपना पूरा घर समेटकर कितने-कितने किलोमीटर नंगे पाँव चल दिए। पर उनमें से बहुत कम ही अपने प्रांत या घर पहुँच पाए। किसी-किसी का भूख से दम निकला, तो किसी-किसी का शरीर इतनी लम्बी दूरी चलना सह नहीं पाया और काल-कवलित हो गया। अधिकांश तो लॉकडाउन तोड़ने के जुर्म में पुलिस से मार भी खाए और शेल्टर होम की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ ठहराए भी गए। कई मेहनतकश ने तो मुफ्त का रहना स्वीकार न किया और अपने हुनर का इस्तेमाल कर उस स्थान को रंग रोगन कर सुन्दर बना कर एक अच्छा उदाहरण पेश किया। आज के दिन बस यही कामना है कि जितने भी लोग घर से दूर अपने घर जाने की बाट जोह रहे हैं, सरकार उन्हें सुरक्षित तरीके से उनके घर पहुँचवा दे।   

मजदूर दिवस की शुभकामनाएँ!   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2020)   
____________________________________________ 

Thursday, April 30, 2020

74. ऋषि नॉट आउट

ऋषि कपूर का जाना मन को बेचैन कर गया है कल से इरफ़ान खान की मृत्यु के शोक में हम सभी डूबे हुए हैं, ऐसे में आज ऋषि कपूर का चला जाना, हम सभी स्तब्ध हो गए हैं। यह बहुत दुःख भरा समय है। कोई शब्द नहीं सूझ रहा कि ऐसे वक़्त में क्या कहा जाए एक कलाकार के चले जाने से उसके देह का अंत भले हो जाता है, मगर उसका काम सदा हमारे साथ जीवित रहता है ऋषि कपूर फ़िल्मी जगत के उस प्रतिष्ठित परिवार से हैं, जहाँ से फिल्मी कलाकारों की कई पुश्तें आई हैं। पृथ्वी राज कपूर और राज कपूर की विरासत को बहुत कुशलता और संजीदगी से सँभालने और आगे बढ़ाने में ऋषि कपूर की भूमिका स्मरणीय और सराहनीय है। वे जितने कुशल अभिनेता थे उतने ही संजीदा और जिंदादिल इंसान थे कपूर खानदान का प्यारा और सिने जगत का खिलखिलाता हुआ सितारा चिंटू आज सभी को अलविदा कह गया।   
ऋषि कपूर सही मायने में मेरे ज़माने के हीरो थे जब फिल्म को देखने और समझने की मेरी उम्र हुई, उस दौर में वे अभिनेता के साथ ही हीरो बन चुके थे। लेकिन उस उम्र में हमें फिल्में नहीं दिखाई जाती थी। हाँ, हमारे स्कूल में कुछ फिल्में ज़रूर दिखाई जाती थी, जो या तो देश प्रेम की होती थी या फिर किसी ऐसे चरित्र पर जिसने समाज को प्रेरित किया हो। मुझे याद है स्कूल में संत ज्ञानेश्वर कई बार दिखाई गई थी। कॉलेज के समय में मैंने खूब फिल्में देखी हैं। सन 1973 में ऋषि कपूर की फिल्म 'बॉबी', जिसमें डिम्पल कापड़िया अभिनेत्री थी, बहुत हिट हुई। इसका गाना 'झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो'', यह हम बच्चों का पसंदीदा गाना था, जिसे अन्ताक्षरी में ख़ास जगह मिलती थी। हालाँकि इस गाना के अर्थ पर हमारा कभी ध्यान नहीं गया, हमें तो बस झूठ बोले कौआ काटे से ही मतलब था।   
4 सितम्बर 1952 को मुंबई में जन्मे ऋषि कपूर को एक रोमांटिक अभिनेता के रूप में शोहरत और पहचान मिली। ऋषि कपूर की अमर अकबर एंथोनी, प्रेम रोग, सरगम, लैला मजनू, चाँदनी, कभी-कभी, सागर, दामिनी, क़र्ज़, हम किसी से कम नहीं आदि ढ़ेरों फिल्में आई और लगभग सभी फिल्में काफी सराही गई। ऋषि कपूर की काफी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर खूब नाम कमाया है। कुछ फिल्में फ्लॉप भी हुई, पर ऋषि ने उनमें भी बहुत कमाल का अभिनय किया है। 'कपूर एंड संस' तथा '102 नॉट आउट' उनकी ऐसी फिल्म है जो मुझे बेहद पसंद है। ऋषि कपूर ने '102 नॉट आउट' में 102 वर्षीय पिता जो अमिताभ बच्चन हैं, के 75 वर्षीय बुज़ुर्ग बेटे का किरदार निभाया है। इस फिल्म को देखकर लगा ही नहीं कि वे इसमें अभिनय कर रहे हैं। बहुत ही सहज, सरल और  जीवंत अभिनय किया है उन्होंने। जैसे-जैसे ऋषि कपूर की उम्र बढ़ी उनके अभिनय ने एक अलग ही मुकाम हासिल किया। यूँ मुझे बहुत शुरू की उनकी फिल्में बहुत पसंद नहीं आती थी, लेकिन प्रौढ़ होने के बाद की उनकी सभी फिल्में मुझे बेहद पसंद हैं, चाहे वह जिस भी किरदार में हों।   
ऋषि कपूर एक ऐसे वरिष्ठ और दिग्गज अभिनेता हैं जो 3 साल की उम्र में राज कपूर की फिल्म 'श्री 420' में काम करना शुरू कर चुके थे। 'मेरा नाम जोकर' में वे बाल कलाकार के रूप में खूब चर्चित हुए और इस फिल्म के लिए उन्हें सन 1970 में नेशनल फिल्म अवार्ड मिला। सन 1973 में आई फिल्म 'बॉबी' ने बहुत धूम मचाया, और इसके लिए सन 1974 में उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर अवार्ड मिला। सन 2008 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला। सन 2009 में रशियन सरकार द्वारा सिनेमा में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। सन 2017 में 'कपूर एंड संस' के लिए कई सारे अवार्ड मिले। लगातार अलग-अलग जगहों से उन्हें ढ़ेरों सम्मान और पुरस्कार मिलते रहे हैं, जैसे कि जी सिने अवार्ड, स्क्रीन अवार्ड, टाइम्स ऑफ़ इंडिया फिल्म अवार्ड आदि।   
ऋषि कपूर की आत्माकथा 'खुल्लम खुल्ला : ऋषि कपूर अनसेंसर्ड' का लोकार्पण 15 जनवरी 2017 को हुआ जिसे ऋषि कपूर ने मीना अय्यर के साथ लिखा है, जिसे हार्पर कॉलिन्स ने प्रकाशित किया है। निःसंदेह ऋषि के चाहने वालों के लिए यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें ऋषि के जीवन के वह पहलू भी मिलेंगे जिन्हें हम लोग नहीं जानते हैं या कैमरा के सामने आने या सार्वजनिक होने से बच गया है।   
ऋषि कपूर किसी भी मुद्दे पर अपनी निष्पक्ष और बेबाक राय रखने के लिए मशहूर रहे हैं। वे काफी चर्चित हुए थे जब उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा था कि उन्होंने गाय का माँस खाया है। इसके विरोध में बजरंग दल वालों ने काफी हंगामा किया और उनसे माफी माँगने को कहा था। कश्मीर के मुद्दे पर फारूक अब्दुल्ला के एक ट्वीट पर ऋषि कपूर ने रीट्वीट किया, जिसके विरोध में उनपर एफ आई आर भी दर्ज हुआ था। ऋषि कपूर अपने बयानों से काफी विवादित रहे हैं। हालाँकि वे अपने बयानों पर सदैव अडिग रहे हैं, यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता है। इसका अर्थ है कि वे काफी सोच समझ कर ही कुछ भी बयान दिया करते रहे हैं।   
ऋषि कपूर को 2018 में बोनमैरो कैंसर हुआ जिसका इलाज न्यूयॉर्क में चलता रहा। अमेरिका से इलाज़ कराने के बावज़ूद वे स्वस्थ न हो सके और आज उनकी मृत्यु ने हम सभी को झकझोर दिया है। ऐसे समय में जब देश में कोरोना के कारण लॉकडाउन है, उनकी मृत्यु पर उनके सभी परिवार वाले, उनके सभी मित्र, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग, उनके प्रशंसक उनकी अंतिम यात्रा में शामिल न हो सके। बहुत कम लोग ही उपस्थित हो सकें जिन्हें सरकार से इजाज़त मिली।   
ज़िन्दगी की क्षणभंगुरता से हम सभी इंकार नहीं कर सकते। चार दिन की ज़िन्दगी में कब चौथा दिन आ जाता है पता ही नहीं चलता है। इरफ़ान और ऋषि कपूर की मृत्यु का कारण कैंसर था। सन 2018 में ही इन दोनों को अपनी बीमारी का पता चला। इलाज़ कराने इरफ़ान लन्दन गए और ऋषि न्यूयॉर्क। दोनों स्वस्थ होकर लौटे लेकिन कैंसर को हरा नहीं सके और एक दिन के अंतर में दोनों हमें अलविदा कह गए। अब यह बात मुझे समझ आ गई है कि लन्दन हो या अमेरिका, कोई फ़र्क नहीं पड़ता। कहीं भी चले जाओ जीवन के कुछ जंग में हमें हारना ही होता है। शोहरत या दौलत कुछ भी काम नहीं आती है। मृत्यु अंतिम सच है, इससे कोई बच नहीं सकता। मन बहुत विचलित है। जीवन-मृत्यु के अटल सत्य को समझते हुए भी न स्वीकारने का मन है। ऋषि अब हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु उनकी फिल्में, उनके ट्वीट, उनके विचार हमारे बीच है। उन्होंने ज़िन्दगी की अपनी पारी बिना नॉट आउट हुए बहुत अच्छी खेली है। ऋषि कपूर के लिए हम कह सकते हैं कि इस संसार से वे भले ही चले गए, पर वे नॉट आउट हैं और नॉट आउट ही रहेंगे।   

- जेन्नी शबनम (30. 4. 2020)   

__________________________________________________

Wednesday, April 29, 2020

73. अलविदा मक़बूल

सिनेमा हॉल का दरवाज़ा बंद था। खुलने के निर्धारित समय से ज्यादा वक़्त हो चला था। तभी एक गेटकीपर बाहर आया, उससे मैंने पूछा कि बहुत ज्यादा देर हो रही है, मूवी शुरू में देर क्यों है? उसने बताया कि थोड़ी देर हो जाएगी क्योंकि फिल्म के प्रोमोशन के लिए इस फिल्म के लोग आए हुए हैं। सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग मेरे साथ ही उस गेट के बाहर इकत्रित हो गए। मन में बहुत उत्सुकता थी कि एक झलक कलाकारों को देख लूँ। यूँ भी मैं सिनेमा की बेहद शौक़ीन रही हूँ और फर्स्ट डे और कभी-कभी तो फर्स्ट डे फर्स्ट शो भी देखती थी। साथ देखने वाला कोई न भी हो परवाह नहीं, अकेले जाकर देखती थी। अब भीड़ भी बढ़ गई और मैं खड़े-खड़े थक भी गई। जैसे ही सोचा कि जाकर थोड़ी देर बैठूँ, कि हॉल का गेट खुला और ढ़ेर सारे लोग बाहर निकलने लगे। देखी कि भीड़ के साथ अर्जुन रामपाल और उनके साथ इरफ़ान खान आ रहे हैं। बाकी और कौन-कौन थे साथ में, किसी पर मेरी नज़र नहीं ठहरी, क्योंकि ये दोनों ही मेरे पसंदीदा कलाकार हैं। जैसे ही मैं इरफ़ान को देखी तो बेटी को ज़रा जोर से बोली कि देखो मक़बूल आ रहा है। कुछ लोग मेरी बातों पर हँस भी दिए। मैं बस मक़बूल को देखती रही, और वे सामने से मुस्कुराते हुए गुजर गए। अर्जुन तो हैण्डसम हैं ही लेकिन इरफ़ान की खूबसूरती देख कर मैं दंग रह गई। कत्थई रंग का सूट पहने हुए, घुंघराला सुनहरा बाल, बड़ी-बड़ी आँखें और मुस्कुराता चेहरा, लंबा छरहरा बदन। रील के चेहरे से ज्यादा ख़ूबसूरत रियल का चेहरा।यह बात है 2013 की, फिल्म का नाम 'डी-डे', दिल्ली के साकेत स्थित सेलेक्ट सिटी मॉल का पी वी आर सिनेमा हॉल।   
सन 2004 में एक फिल्म आई थी 'मक़बूल', जिसमें मक़बूल का किरदार इरफ़ान खान ने निभाया था। बड़ी अच्छी लगी थी फिल्म। यूँ अब फिल्म की कहानी याद नहीं, बस इतना याद है कि क्राइम पर आधारित फिल्म थी और इरफ़ान के साथ तब्बू के कुछ सीन याद रह गए मुझे। मुझे उनका असली नाम कभी याद नहीं रहता है, तो जब भी इरफ़ान कि कोई फिल्म आई और देखने जाना हो तो कोई पूछे कि फिल्म में कौन-कौन एक्टर है, तो मैं मक़बूल ही बोलती हूँ। इरफ़ान की लगभग सभी फिल्में देखी है मैंने और अब भी मक़बूल ही बोलती हूँ, जाने क्यों।   
7 जनवरी 1967 को जयपुर, राजस्थान में जन्मे इरफ़ान खान हिन्दी और अंग्रेजी सिनेमा तथा टेलीविजन के बहुत कुशल अभिनेता थे। बॉलीवुड तथा हॉलीवुड में इरफ़ान एक जाना पहचाना नाम है। इरफ़ान को 'हासिल' फिल्म के लिए सन 2004 में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार मिला है। सन 2008 में बेस्ट ऐक्टर इन सपोर्टिंग रोल का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला है। अभिनय के लिए सन 2011 में इरफ़ान पद्मश्री से सम्मानित हो चुके हैं। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2012 में फिल्म 'पान सिंह तोमर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। सन 2017 में फिल्म 'हिन्दी मीडियम' के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। 
सन 2018 में जब इरफ़ान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हुआ था तब इरफ़ान ने अपने प्रशंसकों के लिए एक बेहद भावुक नोट लिखा था -
''हम जो उम्मीद करते हैं उसे पूरा करने के लिए ज़िन्दगी किसी दबाव में नही है, जो हम चाहें वो हमें मिले ही अप्रत्याशित घटनाएँ हमें बड़ा करती है जो कि पिछले दिनों का मेरा हाल रहा है। डायग्नोसिस में न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर का पाता लगाने के बाद इसे स्वीकार करना काफी मुश्किल है। लेकिन आस पास मौजूद प्यार और ताकत है जिसे मैं अपने भीतर महसूस करता हूँ, इससे उम्मीद जगी है। मुझे देश से बाहर जाना पड़ रहा है और मैं हर किसी से गुजारिश करता हूँ कि वे अपनी दुआएँ भेजते रहें। अफवाहों की बात करें तो न्यूरो हमेशा दिमाग के बारे में नहीं होता और रिसर्च के लिए गूगल करना सबसे आसान तरीका है। जो मेरे शब्दों का इंतज़ार कर रहे हैं, उम्मीद है कि मैं ढ़ेर सारी कहानियाँ लेकर लौटूँगा।' 
इरफ़ान अपनी बीमारी के इलाज़ के लिए लन्दन गए थे। जब वहाँ से लौटे और अंग्रेजी मीडियम फिल्म किया, तो मुझे लगा कि वे पूर्णतः स्वस्थ हो चुके हैं, क्योंकि मेरा अनुमान था कि कई कैंसर ठीक भी हो जाते हैं और चिकित्सा के लिए लन्दन के अस्पताल अच्छे माने जाते हैं। 'अंग्रेजी मीडियम' फिल्म अब उनकी आखिरी फिल्म हो गई है। लॉकडाउन के कारण यह फिल्म सिनेमा हॉल तक न जा सकी और ऑनलाइन रिलीज़ हुई। 'हिन्दी मीडियम' की ही तरह 'इंग्लिश मीडियम' भी हिन्दी और अंगरेजी भाषा की विषमताओं पर आधारित बहुत ही संवेदनशील फिल्म है। इरफ़ान अपनी इस फिल्म की सफलता जो सिनेमा हॉल में मिलती, न देख पाए। इरफ़ान का आखिरी ट्वीट 12 अप्रैल को, जिसे उन्होंने अपनी अंतिम फिल्म 'अंग्रेजी मीडियम' के ऑन लाइन रिलीज़ होने पर किया था - ''मिस्टर चम्पक की मनःस्थिति : अंदर से प्यार, कोशिश करूँगा कि बाहर से दिखा सकूँ।' (''Mr. Champak's state of mind : Love from the inside, making sure to show it outside.'')   
इरफ़ान एक कलाकार के रूप में गज़ब का अभिनय करते हैं। आँखों से भाव को अभिव्यक्त करने में उन्हें महारत हासिल है। जिस भी किरदार में होते हैं जीवंत कर देते हैं, चाहे वह पान सिंह हो या मक़बूल हो। उनकी सभी फिल्में और उनका अभिनय बेहतरीन है। हिन्दी फिल्मों में मक़बूल, रोग, पान सिंह तोमर, लंच बॉक्स, हिन्दी मीडियम, अंग्रेजी मीडियम आदि है जो बहुत सफल है और मुझे बेहद पसंद है।  टी वी पर चाणक्य, भारत एक खोज आदि धारावाहिक में वे काम कर चुके हैं। हिन्दी फिल्म हो या अंगरेजी या टी वी का धारावाहिक, सभी में उनका अभिनय बहुत उत्कृष्ट रहा है और उन्होंने हर जगह अपनी छाप छोड़ी है।   
आज इरफ़ान की मृत्यु की ख़बर पढ़कर स्तब्ध रह हूँ। अभी 4 दिन पहले 25 तारीख को उनकी माँ गुजर गई थीं, परन्तु कोरोना के कारण देशव्यापी लॉकडाउन की वज़ह से इरफ़ान अपनी माँ की अंतिम यात्रा में शामिल न हो पाए थे। कल उनकी तवियत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया और आज ही ज़िन्दगी से बिना जंग किए मौत के साथ वे इस दुनिया से चले गए। सिर्फ फ़िल्मी दुनिया या उनके अपनों के लिए नहीं बल्कि उनके चाहनेवालों और प्रशंसकों के लिए बहुत बड़ा सदमा है। ऐसा सदमा जो हमें इरफ़ान को कभी भूलने न देगा। उनकी फिल्में, उनके किरदार, उनका अभिनय, उनकी आँखें, उनकी आँखों की भाषा, उनकी हँसी, उनकी अदाकारी सब कुछ यहाँ हमारे लिए वे छोड़ गए हैं। जब चाहे इन फिल्मों या धारावाहिक में उन्हें अभिनय करते हुए हम देख सकते हैं, पर इस बात का दुःख हमेशा रहेगा कि अब उनकी कोई नई फिल्म नहीं आएगी और अब के बाद हम में से कोई भी उन्हें कभी भी नहीं देख पाएगा। 

अलविदा मक़बूल!  

- जेन्नी शबनम (29. 4. 2020)  

____________________________________________________________________

Monday, April 6, 2020

72. क़ातिल कोरोना का क़हर

भारत तथा विश्व की वर्तमान परिस्थिति पर ध्यान दें तो ऐसा लग रहा है कि प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है कि अब बहुत हुआ, अब तो चेत जाओ, वापस लौट जाओ अपनी-अपनी जड़ों की तरफ, जिससे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर एक सुन्दर दुनिया निर्मित हो सके सिर्फ भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व आधुनिकता की दौड़ में इस तरह उलझ चुका है कि थोड़ी देर रुककर चिन्तन, मनन, आत्मविश्लेषण करने को तैयार नहीं है। अगर ज़रा देर रुके तो शेष दुनिया न जाने कितनी आगे निकल जाएगी, कितना कुछ छूट जाएगा, जाने कितना नुकसान हो जाएगा। पैसा, पद, प्रतिष्ठा, पहचान, पहुँच आदि सफलता के नए मानदंड बन गए हैं। सफल होना तभी संभव है जब प्रतिस्पर्धा की दौड़ में खुद को सबसे आगे रखा जाए। प्रतिस्पर्धा में जीतना ही आज के समय में दुनिया जीतने का मंत्र है।  

जीव जंतु तो सदैव अपनी प्रकृति के साथ ही जीवन जीते हैं, भले ही आज के समय में उन्हें हम मनुष्यों ने प्रकृति से दूर किया है।  परन्तु मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध प्रकृति को हथियार बना कर विजयी होना चाहता है। इस कारण एक तरफ प्रकृति का दोहन हो रहा है तो दूसरी तरफ हम प्रकृति से दूर होते चले गए हैं। हम भूल गए हैं कि मनुष्य हो या कोई भी जीव जंतु, सभी प्रकृति के अंग हैं और प्रकृति पर ही निर्भर हैं। प्राकृतिक संसाधन हमें प्रचुर मात्रा में मिला है लेकिन हमारी प्रवृत्ति ने हमें आज विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। हमारी जीवन शैली ऐसी हो चुकी है कि हम एक दिन भी सिर्फ़ प्रकृति के साथ नहीं गुजार सकते। अप्राकृतिक जीवन चर्या के कारण हमारी शारीरिक क्षमताएँ धीरे-धीरे कम हो रही हैं। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित हो गई है जिससे रोग प्रतिरोधक शक्ति भी कम हो गई है।  

सभी जानते हैं कि हानिकारक जीवाणु (बैक्टीरिया) हो या कोई भी विषाणु (वायरस) इसका प्रसार संक्रमण के माध्यम से ही होता है। कोरोना वायरस के संक्रमण से आज पूरी दुनिया संकट में है और असहाय महसूस कर रही है। अज्ञानता, मूढ़ता, भय, लापरवाही, अतार्किकता, असंवेदनशीलता आदि के कारण जिस तरह कोरोना का संक्रमण बढ़ता जा रहा है, निःसंदेह यह न सिर्फ चिंता का विषय है बल्कि हमारी विफलता भी है। कोरोना से मौत का आँकड़ा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। टी वी और अखबार के समाचार के मुताबिक़ सिर्फ चीन जहाँ से कोरोना के संक्रमण की शुरुआत हुई थी, वहाँ स्थिति नियंत्रण में है। शेष अन्य देशों की स्थिति गंभीर होती जा रही है।  

आम जनता को कोरोना की भयावहता का अनुमान शुरू में नहीं हुआ था। मार्च 22 को जब एक दिन का जनता कर्फ़्यू लगा और ताली, थाली, घंटी आदि बजाने का आह्वाहन प्रधानमंत्री जी ने किया, तब इसका भय लोगों में बढ़ा। फिर भी काफी सारे लोगों के लिए ताली-थाली-घंटी बजाना मनोरंजन का अवसर रहा और वे अपने-अपने घरों से निकलकर मानो उत्सव मनाने लगे। यूँ जैसे ताले-थाली-घंटी पीटने से कोरोना की हत्या की जा रही हो, या यह कोई जादू टोना हो जिससे कि कोरोना समाप्त हो जाएगा। अप्रैल 5 को जब प्रधानमंत्री जी ने रात के 9 बजे घर की बत्ती बुझाकर दीया जलाने को कहा, तो लोगों ने इसे दीपोत्सव बना दिया। दीये भी जलाए गए, आतिशबाजी भी खूब हुई, मोदी जी के लिए खूब नारे लगे। यूँ लग रहा था मानो यह कोई त्योहार हो। अगर प्रधानमंत्री जी एक दीया जलाकर, जो लोग इस महामारी में मारे गए हैं, उनके लिए 2 मिनट का मौन रखने को कहते तो शायद लोग इसे गंभीरता से लेते और भीड़ इकट्ठी कर न पटाखे फोड़ते न दिवाली मनाते। हम भारतीय इतने असंवेदनशील कैसे होते जा रहे हैं? कोरोना कोई एक राक्षस नहीं है जिसे भीड़ इकट्ठी कर अग्नि से डरा कर ललकारा जाए और वो मनुष्यों की एकजुटता और उद्घोष से डर कर भाग जाए।  

प्रधानमंत्री जी द्वारा लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के बाद जिस तरह अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हुआ उससे कोरोना का संक्रमण और भी फ़ैल गया। अधिकतर लोग बाज़ार से महीनों का सामान घर में भरने लगे। जिससे बाज़ार में ज़रूरी सामानों की किल्लत हो गई और दुकानों में भीड़ इकट्ठी होने लगी। चारो तरफ अफरातफरी का माहौल हो गया। क्वारंटाइन, आइसोलेशन, सोशल डिसटेनसिंग, घर से बाहर न निकलना आदि को लेकर ढ़ेरों भ्रांतियाँ फैलने लगी। लोग भय और आशंका से पलायन करने लगे; जिससे ट्रेन, बस इत्यादि में संक्रमण और फैलने लगा।  

जनवरी के अंत में जब भारत में पहला कोरोना का मामला आया तभी सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए था। विदेशों से जितने भी लोग आ रहे थे उसी समय उन्हें क्वारंटाइन करना चाहिए था। देश में जितने भी समारोह, सम्मलेन, सभा का आयोजन जिसमें भीड़ इकट्ठी होनी थी, तुरंत बंद कर देना चाहिए था। कोरोना का मामला आने के बाद भी ढ़ेरों सरकारी कार्यक्रम हुए जिनमें देश विदेश से लोगों ने शिरकत की, कहीं भी किसी तरह की भीड़ इकत्रित होने पर पाबंदी नहीं लगाई गई। लगभग दो महीने से थोड़े कम दिन में जब कोरोना के संक्रमण का फैलाव बहुत ज्यादा हुआ और मौत का सिलसिला शुरू हुआ तब सरकार जाग्रत हुई। इतने विलम्ब से लॉकडाउन के निर्णय का कारण समझ से परे है। क्योंकि वास्तविक स्थिति का अंदाजा तो स्वास्थ्य मंत्रालय के पास रहा ही होगा। अगर स्वास्थ्य मंत्रालय इसकी भयावहता से अनभिज्ञ था तो यह भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश के लिए शर्म की बात है।  

लॉकडाउन होने के बाद भी दिल्ली से पलायन करने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग इकत्रित हो गए। इनमें दूसरे राज्यों से आए दिहाड़ी मज़दूरों की संख्या ज्यादा थी। निःसंदेह अफ़वाहों और सरकार के प्रति अविश्वसनीयता के कारण वे सभी ऐसा करने के लिए विवश हुए होंगे। न काम है, न अनाज है, न पैसा है, न घर है; ऐसे में कोई क्या करे? सरकार खाना देगी यह गारंटी कौन किसे दे? गरीबों की सुविधा का ध्यान कभी किसी सरकार ने रखा ही कब? हालाँकि पहली बार यह हुआ है कि दिल्ली में सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से बहुत अच्छी हुई है। रैनबसेरा, सस्ता खाना आदि का प्रबंध उत्तम हुआ है। फिर भी राजनीति, नेता और सरकार पर विश्वास शीघ्र नहीं होता है। ऐसे में उन्हें यही विकल्प सूझा होगा कि किसी तरह अपने-अपने घर चले जाएँ ताकि कम से कम ज़िंदा तो रह सकें। इनमें सभी जाति और धर्म के लोग शामिल थे। लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद सरकार अपने खर्च पर सुरक्षित तरीके से सभी को अपने-अपने गाँव या शहर पहुँचा देती तो समस्याएँ इतनी विकराल रूप नहीं लेती। शेल्टर में रहकर कोई कितने दिन समय काट सकता है?  

निज़ामुद्दीन स्थित मरकज में तब्लीगी जमात के लोगों की गतिविधियाँ बेहद शर्मनाक है। लॉकडाउन के बावज़ूद वे सभी इतनी बड़ी संख्या में साथ रह रहे थे। जब उन्हें जबरन जाँच के लिए ले जाया जा रहा था तब और अस्पताल में जाने के बाद जिस तरह की घिनौनी हरकत कर रहे हैं, उन्हें कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। सरकार द्वारा निवेदन और चेतावनी के बावज़ूद निज़ामुद्दीन के अलावा देश में कई स्थानों पर अब भी भीड़ इकट्ठी हो रही है। कई जगह स्वास्थ्यकर्मियों एवं पुलिस के साथ बदसलूकी की जा रही है। कई सारे मामले ऐसे हो रहे हैं जब संक्रमित व्यक्ति को आइसोलेशन में रखा गया तो वे भाग गए या ख़ुद को ख़त्म कर लेने की धमकी दे रहे हैं। कुछ लोग कोई न कोई जुगाड़ लगा कर लॉकडाउन के बावज़ूद घर से बहार निकल रहे हैं। जबकि सभी को मालूम है कि जितना ज्यादा सोशल डिसटेनसिंग रहेगा संक्रमण से बचाव होगा। ऐसे लोग जान बुझकर जनता, सरकारी व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। लॉकडाउन से कोरोना के रफ़्तार में जो कमी आती उसे इनलोगों ने न सिर्फ़ रोक दिया है बल्कि ख़तरा को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है।  

राजनीति और सियासत का खेल हर हाल में जारी रहता है, भले ही देश में आपातकाल की स्थिति हो। एक दिन अख़बार में फोटो के साथ ख़बर छपी कि दिल्ली सरकार एक लड्डू, ज़रा-सा अचार के साथ सूखी पूड़ी बाँट रही है। अब देश में महा समारोह तो नहीं चल रहा कि पकवान बना-बना कर सरकार परोसेगी। यहाँ अभी किसी तरह ज़िंदा और सुरक्षित रहने का प्रश्न है। ऐसे हालात में दो वक़्त दो सूखी रोटी और नमक या खिचड़ी मिल जाए, तो भी काम चलाया जा सकता है। अगर अच्छा भोजन उपलब्ध हो सके तो इससे बढ़कर ख़ुशी की बात क्या होगी। अफवाह यह भी फैला कि खाना मिल ही नहीं रहा है, भूख से लोग मर रहे हैं। जबकि दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, ढ़ेरों संस्थाएँ, सामाजिक कार्यकर्ता आदि इस काम में पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं।  

देश और दुनिया के हालात से सबक लेकर हमें अपनी जीवन शैली में सुधार करना होगा। खान पान हो या अन्य आदतें प्रकृति के नज़दीक जाकर प्रकृति के द्वारा खुद को सुधारना होगा। भले ही कोरोना चमगादड़ से फैला है लेकिन कई सारे जानवरों से दूसरे प्रकार का संक्रमण फैलता है। ऐसे में सदा मांसाहार को त्याग कर शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए। योग, व्यायाम तथा उचित दैनिक दिनचर्या का पालन करना चाहिए ताकि हमारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़े। संचार माध्यमों के इस्तेमाल के साथ ही आपसी रिश्ते को मजबूती से थामे रखा जाए ताकि कहीं कोई अवसाद में न जाए।  

कोरोना के क़हर से बचाव के लिए हम सभी को स्वयं खुद का और सरकार का सहयोग देना होगा। सिर्फ़ सरकार पर दोषारोपण कहीं से जायज नहीं है। हम देशवासियों को भी अपना कर्त्तव्य समझना चाहिए। जिन्हें संक्रमण की थोड़ी भी आशंका हो, उन्हें स्वयं ही ख़ुद को आइसोलेट कर लेना चाहिए या क्वारंटाइन के लिए चला जाना चाहिए। इस राष्ट्रीय और वैश्विक आपदा की घड़ी में अपने-अपने घरों में रहकर हम आवश्यक और मनवांछित कार्य कर सकते हैं। मनोरंजन के ढ़ेरों साधन घर पर उपलब्ध है, ऐसे में बोरियत का सवाल ही नहीं है। एकांतवास से अच्छा और कोई अवकाश नहीं होता जब हम चिन्तन मनन कर सकते हैं और कार्य योजना बना सकते हैं। आत्मवलोकन, आत्मविश्लेषण और कुछ नया सीखने का भी यह बहुत अच्छा मौका है। यूँ तो कोरोना के कारण मन अशांत और खौफ़ में हैं परन्तु इससे कोरोना का ख़तरा बढ़ेगा ही कम नहीं होगा। बेहतर है कि हम इस समय का सदुपयोग करें स्वयं, परिवार, समाज, देश और विश्व के उत्थान के लिए।  

- जेन्नी शबनम (6. 4. 2020)

____________________________________________________

Sunday, March 8, 2020

71. एक बार फिर बीत गया महिलाओं का एक दिन

महिला दिवस के उपलक्ष्य में रंगारंग कार्यक्रम अपने चरम पर था तय समय से ज्यादा वक़्त हो गया परन्तु कार्यक्रम पूरा नहीं हो पाया था शाम के 7 बज गए थे, सभी महिलाएँ अब जाने को बेताब हो रही थी, इस लिए कार्यक्रम को शीघ्र ख़त्म करने का बार-बार आग्रह कर रही थी आयोजक मंडली भी जल्दी-जल्दी सभी कार्यक्रम निपटा रही थी और हर वक़्ता को संक्षिप्त में बोलने का आग्रह कर रही थी कुछ प्रतियोगिता भी रखी गई थी, जिसे शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँचाया जा रहा था, ताकि परिणाम घोषित हो सके सभी तबके की महिलायें यहाँ आमंत्रित थी कार्यक्रम पूर्ण होने से पहले ही तकरीबन आधी महिलाएँ वहाँ से जा चुकी थी जो मुख्य अतिथि और वक्ता थी, वे सभी बार-बार मोबाइल पर वक़्त देख रही थी एक महिला से यह पूछने पर कि अभी तो सिर्फ 7 ही बजे हैं, इतनी जल्दी क्या है, उन्होंने कहा ''वे जबतक घर जाकर चाय नहीं बनाएँगी उनके पति चाय नहीं पीएँगे, भले ही कितनी भी देर हो जाए यूँ वे कुछ कहेंगे नहीं कि देर क्यों हुई, लेकिन हमारी परवरिश ऐसी हुई है कि शाम के बाद घर से बाहर रहने की आदत नहीं है कोई कुछ भी न कहे फिर भी मन में एक अपराधबोध होने लगता है'' किसी महिला को रात के खाना की चिंता हो रही है, किसी को उसके बच्चे की चल रही परीक्षा की, किसी को बाज़ार से होली का सामान खरीदना है, किसी को यह डर कि घर में सास ससुर नाराज़ होंगे किसी महिला का पति लेने पहुँच चुका है, तो उस महिला को मानसिक रूप से दबाव लग रहा कि उसका पति उसके कारण इन्तिज़ार में खड़ा है मुश्किल से 10 महिलाएँ होंगी जो देरी होने के बावजूद बेफिक्र होकर कार्यक्रम में भागीदारी कर रही हैं।   

समय की पाबंदी तो निःसंदेह आज की ज़रुरत है, लेकिन यह सिर्फ औरतों के लिए ही क्यों? यूँ ढेरों पुरुष हैं जो घर में बहुत योगदान देते हैं और एक समय सीमा के भीतर घर आ जाते हैं घर, बच्चों और पत्नी की जवाबदेही भी बखूबी निभाते हैं अगर कभी देर हो तो वे घर पर बता देते हैं कि देर होगी, ऐसे में घर लौटने के बाद पत्नी या बच्चे प्रश्नसूचक दृष्टि से नहीं देखते हैं न उनके देर हो जाने से कोई कार्य रुकता है, न ही देर से आने से पुरुष को कोई ग्लानि होती है पर इसके उलट स्त्रियों के लिए वह सब होता है जो पुरुष के लिए नहीं होता वह अगर देर तक बाहर है तो कहाँ होगी, कौन-कौन वहाँ होंगे, कैसे जाएगी, कैसे लौटेगी, कितने बजे लौटेगी इत्यादि प्रश्नों के बीच घिर जाती है हाँ, यह ज़रूर है कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह सब जानना लाजिमी है, परन्तु यह सभी प्रश्न पुरुषों के लिए भी उतने ही ज़रूरी हैं पुरुष भी उतने ही असुरक्षित हैं जितनी स्त्रियाँ इन सबके बावजूद स्त्री पुरुष के लिए नियमों के अलग-अलग पैमाने तय हो चुके हैं और यह सर्व मान्य है।   

शिक्षा, स्वास्थ्य, पहनावा, रहन-सहन इत्यादि हर पहलू पर ध्यान दें तो पता चलता है कि हमारा समाज स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग मापदंड रखता है और दोरंग नीति अपनाता है। स्त्रियों को उसके विरासत में स्त्री होना सिखाया जाता है और उनसे तय नियमों पर खरा उतरने की अपेक्षा की जाती है वहीं पुरुषों के लिए बिल्कुल अलग दृष्टिकोण है। शिक्षित समाज में पुरुषों से बस इतनी ही अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षा प्राप्त कर एक अच्छी नौकरी पा ले। अशिक्षित समाज में परिवार के भरण पोषण की जिम्मेवारी उठाना पुरुष के लिए वांछित होता है, बाकी कुछ भी आवश्यक नहीं है। परन्तु स्त्रियों के लिए चाहे वह शिक्षित समाज हो या अशिक्षित, स्त्रियोचित गुण के साथ उन सारी जवाबदेहियों का पालन करना आवश्यक है जिसे समाज ने उनके लिए निर्धारित किये हैं। अजीब बात तो यह है कि कोई भी व्यक्ति इस बात की पुष्टि नहीं करता कि ऐसे नियम स्थापित हैं स्त्रियों की यह कसौटी पत्नी और माँ, बहु और बेटी में अंतर कर देती है जो कायदे किसी की पत्नी के लिए मानने आवश्यक हैं वे उस पुरुष की माँ, बहन, बेटी के लिए ज़रूरी नहीं होते हैं रिश्तों के साथ सारे समीकरण बदल जाते हैं ऐसे में एक स्त्री गहन पीड़ा और अकुलाहट से भर जाती है कि यह ऐसा क्यों है? जो किसी के लिए वाज़िब दूसरे के लिए ज़रूरी क्यों नहीं?  समाज या कानून में ऐसे नियम व कायदे नहीं बने हैं किन्तु व्यावाहारिक रूप से यही मान्य है।   

जीवन का समीकरण आखिर कैसे तय किया जाए? किन नियमों के तहत जीवन को ढ़ाला जाए ताकि समय के साथ कदमताल मिलाया जा सके? हम स्त्री व पुरुष की बराबरी की बात करते हैं, लेकिन यह तब तक संभव नहीं है जब तक स्त्री व पुरुष को बुनियादी रूप से बराबर न माना जाए। सामजिक संरचना, सामाजिक दृष्टिकोण, प्रथाएँ, परम्पराएँ आदि हमारी सोच को इस तरह प्रभावित करती हैं कि हम कब इन नियमों को मानने लग जाते हैं, पता भी नहीं चलता है। यों वह सारे नियम जो एक स्त्री के लिए मान्य है अगर पुरुष भी पालन करने लग जाए तो निःसंदेह समाज में समानता आ जाएगी जो गलत नियम या परम्पराएँ स्थापित हो चुकी हैं, उन्हें स्त्री-पुरुष को मिलकर ध्वस्त करना चाहिए जो तरीके या नियम पुरुष के लिए गैरज़रूरी है वह स्त्री के लिए भी गैरवाज़िब होने चाहिए। 

बहरहाल जीवन प्रवाहमान है, असंतुलन बना हुआ है, स्त्री विमर्श की चर्चा हर जगह होती ही रहती है, कहीं स्त्री तो कहीं पुरुष प्रताड़ित होते रहते हैं, स्त्रियों की समस्याएँ विकराल और वीभत्स रूप से सामने आ रही हैं; इन सभी विषयों पर पूरे समाज को जागरूक होकर सोचने और निर्णय पर पहुँचने की ज़रुरत है। शायद तभी मुमकिन है कि समाज में स्त्री व पुरुष बराबर हों और एक दूसरे का सम्मान कर पाएँ।   

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2020)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
______________________________________________________  

Friday, February 21, 2020

70. फाँसी की फाँस


वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह का बयान कि जैसे सोनिया गाँधी ने राजीव गाँधी के हत्यारे को माफ़ किया है, वैसे ही निर्भया की माँ निर्भया के बलात्कारियों को माफ़ कर दें एक स्त्री होकर वकील साहिबा ऐसा कैसे सोच सकी? राजीव गाँधी की हत्या और निर्भया के बलात्कार का अपराध एक श्रेणी में कैसे माना जा सकता है? मानवीय दृष्टि से किसी की मौत के पक्ष में होना सही नहीं है। परन्तु बलात्कार ऐसा अमानवीय अपराध है जिसमें पीड़ित स्त्री के जीवन और जीने के अधिकार का हनन हुआ है, ऐसे में बलात्कारी के लिए मानवीय दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता है इस अपराध के लिए सज़ा के तौर पर शीघ्र मृत्यु दंड से कम कुछ भी जायज़ नहीं है। 
  
निर्भया के मामले में डेथ वारंट जारी होने के बाद फाँसी में देरी कानूनी प्रावधानों का ही परिणाम है किसी न किसी नियम और प्रावधान के तहत फाँसी का दिन बढ़ता जा रहा है अभी चारो अपराधी जेल में हैं, ढेरों सुरक्षाकर्मी उनके निगरानी के लिए नियुक्त हैं, उनकी मानसिक स्थिति ठीक रहे इसके लिए काउन्सिलिंग की जा रही है, शरीर स्वस्थ्य रहे इसके लिए डॉक्टर प्रयासरत हैं, उनके घरवालों से हमेशा मिलवाया जा रहा हैआखिर यह सब क्यों? जेल मैनुअल के हिसाब से दोषी का फाँसी से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना ज़रूरी है यह कैसे संभव है कि फाँसी की सजा पाया हुआ मुजरिम बिल्कुल स्वस्थ हो? भले ही जघन्यतम अपराध किया हो परन्तु फाँसी की सज़ा सुनकर कोई सामान्य कैसे रह सकता है? बलात्कारी की शारीरिक अवस्था और मानसिक अवस्था कैसी भी हो फाँसी की सज़ा में कोई परवर्तन या तिथि को आगे बढ़ाना अनुचित है निर्भया के बलात्कारियों को अविलम्ब फाँसी पर लटका देना चाहिए    

ऐसा नहीं है कि बलात्कार की घटनाएँ पहले नहीं होती थी। परन्तु विगत कुछ वर्षों से ऐसी घटनाओं में जिस तरह से बेतहाशा वृद्धि हुई है, बेहद अफसोसनाक और चिंताजनक स्थिति है। क़ानून बने, सामजिक विरोध बढ़े परन्तु स्थिति बदतर होती जा रही है कुछ लोगों का विचार है कि आज की लड़कियाँ फैशनपरस्त हैं, कम कपड़े पहनती हैं, शाम को अन्धेरा होने पर भी घर से बाहर रहती हैं, लड़कों से बराबरी करती हैं आदि-आदि; इस लिए छेड़खानी और बलात्कार जैसे अपराध होते हैं इनलोगों की सोच पर हैरानी नहीं होती है बल्कि इनकी मानसिक स्थिति और सोच पर आक्रोश होता हैअगर यही सब वजह है बलात्कार के, तो दुधमुही बच्ची या बुज़ुर्ग स्त्री के साथ ऐसा कुकर्म क्यों होता है?   

अगर सिर्फ स्त्री को देखकर कामोत्तेजना पैदा हो जाती होती तो हर बलात्कारी को अपनी माँ बहन बेटी में रिश्ता नहीं बल्कि उनका स्त्री होना ही नज़र आता और वे उनके साथ भी कुकर्म करते परन्तु ऐसा नहीं है 
कोई बलात्कारी अपनी माँ बहन बेटी के साथ बलात्कार होते हुए सहन नहीं कर सकता है हालाँकि ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जब रक्त सम्बन्ध को भी कुछ पुरुषों ने नहीं छोड़ा है वैज्ञानिकों के लिए यह खोज का विषय है कि दुष्कर्मी में आख़िर ऐसा कौन-सा रसायन उत्पन्न हो जाता है जो स्त्री को देखकर उसे वहशी बना देता है ताकि अपराधी मनोवृति पर शुरूआत में ही अंकुश लगाया जा सके    

हमारी न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और इसके ढेरों प्रावधान के कारण अपराधियों में न सिर्फ भय ख़त्म हुआ है बल्कि मनोबल भी बढ़ता जा रहा है यह सही है कि क़ानून हर अपराधी को अधिकार देता है कि वह अपने आप को निरपराध साबित करने के लिए अपना पक्ष रखे तथा अपनी सज़ा के खिलाफ याचिका दायर करे समस्त कानूनी प्रक्रियाओं के बाद जब सज़ा तय हो जाए, और सज़ा फाँसी की हो, तब ऐसे में दया याचिका का प्रावधान ही गलत है दया याचिका राष्ट्रपति तक जाए ही क्यों? ऐसा अपराधी दया का पात्र हो ही नहीं सकता है सरकार का समय और पैसा इन अपराधियों के पीछे बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं है सज़ा मिलते ही 10 दिन के अन्दर फाँसी दे देनी चाहिए कानूनविदों को इस पर विचार-विमर्श एवं शोध करने चाहिए ताकि न्यायिक प्रक्रिया के प्रावधानों की आड़ में कोई अपराधी बच न पाए मानवीय दृष्टिकोण से सभी वकीलों को बलात्कारी का केस न लेने का संकल्प लेना चाहिए। अव्यावाहारिक और लचीले कानून में बदलाव एवं संशोधन की सख्त ज़रुरत है ताकि कानून का भय बना रहे, न्याय में विलम्ब न हो तथा कोई भी जघन्यतम अपराधी बच न पाए।   

- जेन्नी शबनम (20. 2. 2020)   

_______________________________________________

Tuesday, January 14, 2020

69. मेरी पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' का लोकार्पण



'लम्हों का सफ़र' को देखते ही मन ख़ुशी से झूम उठा। पुस्तक को हाथ में लेते ही एक अजीब-सा रोमांच और उत्साह महसूस हुआ। मेरी क्षमता, योग्यता और सृजन को जैसे मैंने हाथों में पकड़ रखा हो। यूँ मेरी 25 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो साझी पुस्तक है। लेकिन यह मेरा एकल कविता-संग्रह है, इसलिए भी शायद एक अलग एहसास हुआ मुझे। वर्षों से यह मेरी बहुप्रतीक्षित पुस्तक है, जिसका इंतज़ार मुझे तो था ही लेकिन मेरे मित्रो को मुझसे भी ज्यादा था   

मेरी पुस्तक 'लम्हों का सफ़र' जो मेरा प्रथम एकल कविता-संग्रह है, का लोकार्पण 7. 1. 2020 को विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में हुआ। डॉ. राजीव रंजन गिरि जी, जो राजधानी कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर हैं, के हाथों पुस्तक लोकार्पित हुई। 'लम्हों का सफ़र' हिन्द युग्म प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। लोकार्पण से पूर्व हिन्द युग्म के स्टूडियो में सौरभ जी के साथ पुस्तक से सम्बंधित बातचीत हुई, जिसे फेसबुक पर लाइव प्रसारित किया गया। लोकार्पण के बाद मैंने मेरी पुस्तक से कविता का पाठ किया।   
प्रोफ़ेसर डॉ. राजीव रंजन गिरि जी, शायर अनिल पराशर जी एवं उनकी पत्नी शानू पराशर जी, लेखिका नीलिमा शर्मा जी, लेखक नीलोत्पल मृणाल जी, हास्य कलाकार विभोर चौधरी जी, लेखिका पारुल सिंह जी, लेखिका सपना बंसल जी, हिन्द युग्म के प्रकाशक शैलेश भारतवासी जी, हिन्द युग्म की सम्पादक ज्योति दुबे जी, हिन्द युग्म से संलग्न एवं कार्यरत मित्र, मेरी पुत्री परान्तिका दीक्षा व उसके मित्रों तथा उन सभी मित्रों का आभार जिनके कारण यह आयोजन सफल हुआ। आदरणीय रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी शामिल न हो सके, इसका मुझे अफ़सोस है; परन्तु उनकी शुभकामनाएँ सदैव मेरे साथ हैं।   

लोकार्पण के इस सुखद अवसर पर मित्रों, लेखकों, पुस्तक प्रेमियों, दर्शकों तथा मेरी पुत्री और उसके मित्रों ने उपस्थित होकर मुझमें ऊर्जा का संचार किया है। लोकार्पण के इस सुखद समय में मेरे साथ रहकर जिन लोगों ने मुझमें उमंग भरा है, मैं उन सभी की दिल से आभारी हूँ। मुझे सम्मान व प्रेम देने तथा मुझमें विश्वास रखने के लिए सभी का दिल से धन्यवाद व आभार। 














- जेन्नी शबनम (14. 1. 2020)
________________________________________________ 

Wednesday, October 2, 2019

68. इतना मैं गाँधी को जानती हूँ

आज महात्मा गाँधी की 150वीं जयन्ती है आज फिर से वह गीत याद आ रहा है जिसे सुन-सुनकर मैं बड़ी हुई हूँ। - ''सुनो-सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी, वो बापू जो पूज्य है इतना जितना गंगा माँ का पानी...।'' मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गया हुआ यह गीत अब भी मेरी कानों में गूँजता रहता है। इस गाने के साथ मेरा बचपन जुड़ा हुआ है। मेरे पिता यह गाना रिकॉर्ड प्लेयर पर हमेशा बजाते थे। इतना ज्यादा कि इसके बोल याद हो गए मुझे। अक्सर सोचती हूँ काश, मेरा जन्म आज़ादी के आन्दोलन से पहले हुआ होता तो अवश्य ही मैं बापू के साथ जुड़ जाती। बापू मेरे हृदय में बसे हुए हैं क्योंकि मेरे पिता गाँधीवादी विचार के थे और उसी परिवेश में पली बढ़ी होने के कारण खुद को उनके बहुत करीब पाती हूँ। हालाँकि तमाम कोशिशों के बावजूद अपने पिता या बापू की जीवन शैली मैं अपना न सकी, इसका मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा। 
अक्सर सोचती हूँ कि बापू सच में कैसे दिखते होंगे? वे कैसे रहते होंगे? उनकी सोच ऐसी कैसे हुई होगी? जबकि वे भी तो आम भारतीय ही थे। काश! मैं सच में एक बार बापू को देख पाती। यूँ बचपन में प्रोजेक्टर पर गाँधी जी को देखती थी। न जाने क्यों सदैव उनकी तरफ एक खिंचाव महसूस होता रहा। शायद पिता के जीवन यापन का तरीका मेरी सोच पर प्रभावी हुआ होगा। उम्र और ज़रुरत ने मेरी सोच को अपना न रहने दिया। बापू को अपने जीवन में उतार न सकी, इसका दुःख अक्सर सालता है। बापू को पूर्णतः अपनाने के लिए एक साहस चाहिए जो मुझमें नहीं है। पर यह ज़रूर है कि मेरे मस्तिष्क में एक क्षीण काया का वह वृद्ध व्यक्ति अक्सर मेरे साथ होता है और मुझे कदम-कदम पर टोकता है, जिसने दिश को आजादी दिलाई थी।  
तारा जी और मैं 

तारा जी और मैं 
















मुझे याद है पिछले साल एक दिन मैं अपने किसी परिचित के कार्यक्रम (जहाँ उनकी किताब का विमोचन होना था) में गई थी। वहाँ एक बहुत बुज़ुर्ग महिला आई जो शुद्ध खादी के वस्त्रों में थी और सबसे अलग दिख रही थी। बहुत जिज्ञासा हुई जानने की कि वे कौन हैं? किसी परिचित से पता चला कि वे तारा गाँधी भट्टाचार्या हैं, महात्मा गाँधी के सबसे छोटे बेटे देवदास गाँधी की पुत्री। उनको देख कर मेरे मन इतना रोमांचित हुआ कि जाकर उनसे बात किए बिना न रह सकी। बहुत सरल हृदय की हैं वे। उन्होंने कहा भी कि जब भी चाहो घर पर आओ। सन 2014 में मैंने अपने पिता की पुस्तक 'सर्वोदया ऑफ़ गाँधी' का पुनर्प्रकाशन करवाया था। उस पुस्तक के विमोचन में तारा जी के आने की बात हुई थी, परन्तु अस्वस्थ होने के कारण वे नहीं आ सकी थीं। मैंने यह सब उन्हें बताया तो वे बहुत खुश हुईं यह सब सुनकर। उनसे मिलकर मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि लगा मानो बापू से न मिल सकी परन्तु उनके अंश से तो मिल ली। बापू के बारे में सोच कर मन एक अजीब से रोमांच से भर जाता है।   
मेरे पिता की पुस्तक 

मेरे पिता की पुस्तक 
महात्मा गाँधी की जीवन शैली और उनके द्वारा किए गए सत्य के प्रयोग के कारण उनकी काफी आलोचना होती है। यूँ तो मैं भी गाँधीवाद को जितना जान पाई हूँ अपने पिता के जीवन से जाना है। लेकिन इस बात को लेकर बिल्कुल विश्वास रखती हूँ कि गाँधीवाद न सिर्फ आज की ज़रुरत है बल्कि समाज के सकारात्मक उत्थान के लिए आवश्यक है। आज समाज में भ्रष्टाचार, दुराचार, असहनशीलता, अकर्मण्यता, दुराभाव, द्वेष, हिंसा, बलात्कार, मॉब लिंचिंग इत्यादि बढ़ते जा रहे है। इस स्थिति में न सरकार प्रभावी हो पा रही है न सामजिक संस्थाएँ कुछ कर पा रही है। ऐसे में सभी समस्याओं का समाधान गाँधीवाद को केंद्र में रखकर निकाला जा सकता है। लेकिन यह ज़रूरी है कि न केवल आम जनता बल्कि सत्ता और नौकरशाही भी गाँधी को जाने और उनको आत्मसात करे। यूँ बचपन से सभी को स्कूल में अच्छी शिक्षा मिलती है, लेकिन कुछ तो कमी रह जाती है जिससे समाज ऐसा होता चला जा रहा है। जीवन शैली और शिक्षा पद्धति में एक बहुत बड़े बदलाव की सख्त ज़रुरत है।   
बापू के जीवन के सिद्धांत या नियम इतने सहज, सरल और मानवीय हैं कि अगर कोई मन से चाहे तो अवश्य अपना सकता है। एक सुसभ्य, सम्मानित और आत्मनिर्भर व्यक्ति तथा समाज के निर्माण के लिए बापू की जीवन शैली अपनाना ही एक मात्र तरीका है। हमारा राष्ट्र अगर बापू के विचार का कुछ अंश भी हमारे कायदे कानून में सम्मिलित कर दे तो निःसंदेह एक सुन्दर समाज की कल्पना साकार हो सकती है।बापू के विचार समाज में समूल परिवर्तन कर एक आदर्श स्थिति को लाने में बेहद कारगार हो सकते हैं, जैसे कि आज़ादी की लड़ाई में गाँधी ने किया था।   

आज गाँधी जी की जयन्ती पर सरकार और समाज से यही उम्मीद है कि गाँधी को पढ़ें, समझें, और फिर अपनाएँ! बापू को सादर प्रणाम!   

महात्मा गाँधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जी को उनकी जयन्ती पर हार्दिक नमन!   

- जेन्नी शबनम (2. 10. 2019)   
(महात्मा गाँधी की 150वीं जयन्ती पर)
____________________________________________________       

Saturday, August 31, 2019

67. 100वाँ जन्मदिन मुबारक हो माझा

जन्मदिन मुबारक हो माझा! सौ साल की हो गई तुम, मेरी माझा। गर्म चाय की दो प्याली लिए हुए इमा अपनी माझा को जन्मदिन की बधाई दे रहे हैंमाझा कुछ नहीं कहती बस मुस्कुरा देती है इमा-माझा का प्यार शब्दों का मोहताज़ कभी रहा ही नहीं चाय धीरे-धीरे ठंडी हो रही है माझा अपने कमरे में नज़्म लिख रही है और इमा अपने कमरे में रंगों से स्त्री का चित्र बना रहे हैं; स्त्री के चेहरे से सूरज का तेज पिघल रहा है। बहुत धीमी आवाज़ आती है - इमा इमा इमा दौड़े आते हैं और पूछते हैं - तुमने चाय क्यों नहीं पी माझा? अच्छा अब उठो और चाय पीयो, देखो ठंडी हो गई हैतुम्हें रोज़ रात को चाय पीने की तलब होती है, मुझे मालूम है, तभी तो रोज़ रात को एक बजे तुम्हारे लिए चाय बना लाता हूँ इमा धीरे-धीरे दोनों प्याली पी जाते हैं मानों एक प्याली माझा ने पी लीफिर माझा को प्यार से सुलाकर अपने कमरे में चले जाते हैं रंगों की दुनिया में जीवन बिखेरने। 
हाँ! इमा, वही इमरोज़ हैं जिनके प्रेम में पड़ी अमृता की नज्मों को पढ़-पढ़कर एक पीढ़ी बूढ़ी होने को आई हैमाझा वह नाम है जिसे बड़े प्यार से उन्होंने दिया है अमृता-इमरोज़ ने समाज के नियम व कायदे के ख़िलाफ़ जाकर सुकून की दुनिया बसाई। वे एक मकान में आजीवन साथ रहे लेकिन कभी एक कमरे में न रहे। दोनों अपने-अपने काम मे मशगूल, कभी किसी की राह में अड़चन पैदा न की आपसी समझदारी की मिसाल रही यह जोड़ी; हालाँकि प्यार में समझदारी की बात लोग नहीं मानते हैं दोनों ने कभी प्यार का इज़हार न किया, लेकिन दोनों एक दूसरे के प्यार में इतने डूबे रहे कि कभी एक दूसरे को अलग माना ही नहीं अब भी इमरोज़ के लिया अमृता जीवित है और कमरे में बैठी नज्में लिखती है अब भी वे रोज़ दो कप चाय बनाते हैं और अमृता के लिए रखते हैं चाय के प्यालों में आज भी मचलता है अमृता इमरोज का प्यार।   
इमरोज़ अमृता से शिकायत करते हैं - ''अब तुम अपना ध्यान नहीं रखती हो माझा मैं तो हूँ नहीं वहाँ जो तुम्हारा ख्याल रखूँगा'' माझा मुस्कुरा देती है, कहती है - एक आखिरी नज़म सुन लो इमा, मेरी आखिरी नज़्म जो सिर्फ तुम्हारे लिए -   

मैं तुम्हें फिर मिलूँगी 
कहाँ कैसे पता नहीं  
शायद तेरे कल्पनाओं
की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
या सूरज की लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूँगी
या रंगो की बाँहों में बैठ कर
तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर तुझे ज़रुर मिलूँगी...   

बीच में ही टोक देते हैं इमरोज़ आह! मैं जानता हूँ मेरी माझा, तुम अपनी नज्मों में मुझे जीवित रखोगी और मैं अपने जीवन के पल-पल में तुम्हें सँभाले रखूँगा तुम गई ही कहाँ हो? जो मुझसे मिलोगी तुम मेरे साथ हो हाँ, अब हौज़ ख़ास का वह मकान न रहा जहाँ हमारी सभी निशानियाँ थीं, वक़्त ने वह छीन लिया मुझसे तुम भी तो नहीं थी उस वक़्त जो ऐसा होने से रोकती पर यह मकान भी अच्छा है तुम्हारे पसंद का सफ़ेद रंग यहाँ भी हैपरदे का रंग देखो, कैसे बदलता है, जैसा तुम्हारा मन चाहे उस रंग में परदे का रंग बदल दो इस मकान में मैं तुम्हें ले आया हूँ, और अपनी हर निशानी को भी अपने दिल में बसा लिया हूँ जानता हूँ तुम्हारी परवाह किसी को नहीं, अन्यथा आज हम अपने उसी घर में रहते, जिसे हमने प्यार से सजाया था हर एक कोने में सिर्फ तुम थी माझा, फिर भी किसी ने मेरा दर्द नहीं समझा हमारा घर हमसे छिन गया माझा अब तो ग्रेटर कैलाश के घर में भी कम ही रहता हूँ, जहाँ बच्चे कहें, वहाँ ही रहता हूँ पर तुम तो मेरे साथ हो मेरी माझा अमृता हँसते हुए कहती है - इमा, मेरे पूरी नज़्म पढ़ लेना 
बहुत अफ़सोस होता है, इतनी कोशिशों के बाद भी अमृता-इमरोज़ के प्रेम की निशानी का वह घर बच न सकाहर एक ईंट के गिराए जाने के साथ-साथ टुकड़े-टुकड़े होकर अमृता-इमरोज़ का दिल भी टूटा होगा किसी ने परवाह न की काश! आज वह घर होता तो वहाँ अमृता का 100 वाँ जन्मदिन मनाने वालों की भीड़ होती छत पर पक्षियों की टोली जिसे हर दिन शाम को इमरोज़ दाना पानी देते हैं, की चहकन होती और अमृता के लिए मीठी धुन में जन्मदिन का गीत गाती घंटी बजने पर सफ़ेद कुर्ता पायजामा में इमरोज़ आते और मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोलते और गले लगकर हालचाल लेते फिर खुद ही चाय बनाते और हमें पिलाते अमृता की ढेर सारी बातें करते अमृता का कमरा जहाँ वह अब भी नज्में लिखती हैं, दिखाते इमरोज़ को घड़ी पसंद नहीं, इसलिए वक़्त को वे अपने हिसाब से देखते हैं हाँ, वक़्त ने नाइंसाफी की और अमृता को ले गया काश! आज अमृता होती तो उनकी 100 वीं वर्षगाँठ पर इमरोज़ की लिखी नज़्म अमृता से सुनती बहुत-बहुत मुबारक हो जन्मदिन अमृता-इमरोज़!  

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2019)   

**************************************************************************