Friday 5 August 2016

55. आकांक्षाओं के बोझ तले सिमटता बचपन

वैश्विक बदलाव और तकनीकी उन्नति ने जहाँ एक तरफ जीवन को सरल और सुविधापूर्ण बनाया है वहीं समाज में कुछ ऐसे भी बदलाव हुए हैं जिसके कारण जीवन की सहजता खो गई है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है दुनिया एक-एक कदम आगे नहीं बढ़ रही बल्कि लम्बी-लम्बी छलाँग लगा रही है। यह परिवर्तन बेहद गहरा और ज़बरदस्त है जिसके कारण जीवन मूल्य तो खो ही रहा है मानवीय मूल्यों में भी गिरावट आ रही है। हर तरफ नज़र आ रहे सांस्कृतिक और सामाजिक क्षय के मूल में भी यही कारण है।  

आधुनिक समय में जहाँ एक तरफ प्रगति हो रही है और हम दुनिया को सम्पूर्णता में देख रहे हैं वहीं कहीं न कहीं हमारा जीवन एकाकी और संकुचित होता जा रहा है। सामाजिक बदलाव के कारण कई परिस्थितियाँ ऐसी हो गई हैं कि असमय बच्चे बड़ों के गुण सीख रहे हैं, उनकी तरह व्यवहार कर रहे हैं। सीधे कहें तो इस दौर में बचपन कहीं खो गया है। हालाँकि आज के बच्चों को यह सब न तो अनुचित लगता है न ही अभिभावक उम्र से पहले बच्चों के बचपन के खो जाने को गलत मानते हैं। वे इसे सामान्य स्थिति समझते हैं।
नए जमाने के माता पिता समाज और परिस्थिति के अनुरूप अपनी अतृप्त आकांक्षाओं को अपने बच्चे में पूरा होते हुए देखना चाहते हैं। फलतः उनपर मानसिक दबाव बढ़ जाता है। माता पिता की महत्वाकांक्षा बच्चे को कम उम्र में ही बड़ा बना देती है। प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता की भावना बचपन से ही बच्चों के मन में भर दी जाती है। अतः कम उम्र में ही बच्चा खुद को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर लेता है। छोटी कक्षा के बच्चे भी परीक्षाओं में एक-एक नंबर के लिए दबाव में रहते हैं। स्कूल के बाद ट्यूशन करना आज नितांत आवश्यक हो गया है अन्यथा बच्चा कक्षा में पिछड़ जाएगा। स्वयं को प्रतियोगिता के लिए तैयार कर अपने लक्ष्य को हासिल करना ही एकमात्र उनका ध्येय होता है।
प्रतियोगिता या स्पर्धा सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह गई है बल्कि खेल, गायन, नाट्य, नृत्य, कला, चित्रकारी, आदि हर क्षेत्र में है। खेलने की उम्र में बच्चे बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। माता पिता अपनी समस्त अधूरी कामनाओं को बच्चों में पूरा करने के लिए जी जान लगा देते हैं। हर बच्चा अपने आप में विशेष होता है लेकिन हर बच्चा हर क्षेत्र में निपुण हो यह आवश्यक नहीं। उनमें निपुणता लाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। एक तरफ पढाई में भी अव्वल आना है तो दूसरी तरफ प्रतियोगिताओं में भी सफल होना है। इन सबसे बच्चे इतने ज्यादा मासिक दबाव में होते हैं कि कभी-कभी यह दबाव उनके अवसाद की वज़ह बन जाता है।
आकांक्षाओं के बोझ तले सिमटते-सिमटते बच्चे समाज से इस कदर कट जाते हैं कि सामूहिकता के महत्व को ही भूल जाते हैं। सामूहिक खेल जो हमारे बच्चों के शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे अब मैदानों से गायब हो गए हैं। आज के जमाने के बच्चों को अगर पढने-लिखने से थोड़ा भी समय बचा तो वे आधुनिक तकनीकी उपकरण जैसे कंप्यूटर, मोबाइल, आई पैड आदि में व्यस्त हो जाते हैं। अतः धीरे-धीरे वे एकाकी होने लगते हैं। बच्चों के पास अब न खेलने का समय है न नातेदारों से मिलने जुलने का। उन्हें पिछड़ जाने का भय सताता रहता है। बच्चे बालक बालिका न होकर जैसे वक़्त की कठपुतली बन गए हैं। इनका हर एक मिनट बँधा रहता है।   

अपनी और घरवालों की आकांक्षाओं की पूर्ती हेतु बच्चे का भविष्य दाँव पर लग जाता है। बच्चे जानते हैं हर हाल में उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल करना है। इस दौड़ में जो सफल हो गए वे अगली दौड़ के लिए जुट जाते हैं। जो बच्चे इसमें पिछड़ जाते हैं वे अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। कई बच्चों को जब प्रतियोगिता में पिछड़ने का अनुमान होता है तो वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। या फिर झूठ बोलना, चोरी करना, जालसाजी करना आदि गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं।

महत्वाकांक्षाएँ होना आवश्यक है जीवन के लिए, वरना जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं मिलती है। लेकिन आकांक्षाएँ ऐसी भी न हों कि बच्चों का बचपना ही खो जाए और वे उम्र से पहले ही इतने समझदार हो जाएँ कि ज़िन्दगी उलझ जाए और जीवन को सहजता से न जी सकें। आकांक्षा बच्चे के मन, समझ, बुद्धि, विवेक के अनुसार रखनी चाहिए ताकि बच्चों का बचपना बना रहे और जीवन की प्रतियोगिताओं में मानसिक बोझ से दब कर नहीं अपितु आनंद से सहभागी बनें।

- जेन्नी शबनम (4. 8. 2016)

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Monday 16 November 2015

54. यमुना कोठी की जेन्नी (पहला भाग)


यमुना कोठी की जेन्नी 
(पहला भाग)

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यादों के बक्से में रेत-से सपने हैं जो उड़-उड़ कर अदृश्य हो जाते हैं और फिर भस्म होता है मेरा मैं, जो भाप की तरह शनै-शनै मुझे पिघलाता रहा है। न जाने खोने पाने का यह कैसा सिलसिला है जो साँसों की तरह अनवरत मेरे साथ चलता है। टुकड़ों में मिला प्रेम और खुद के ख़िलाफ़ मेरी अपनी शिकायतों की गठरी मेरे पास रहती है जो मुझे संबल देती रही है। रिश्तों की एक लम्बी फेहरिस्त है मेरे पास जिसमें अपने पराये का भेद मेरे समझ से परे है। ज़ेहन में अनकहे किस्सों का एक पिटारा है जो किसी के सुने जाने की प्रतीक्षा में रह-रह कर मन के दरवाज़े पर आ खड़ा होता है।

सोचती हूँ कैसे तय किया मैंने ज़िन्दगी का इतना लंबा सफ़र, एक-एक पल गिनते-गिनते जीते-जीते पूरे पचास साल। कभी-कभी यूँ महसूस होता मानो 50 वर्ष नहीं 50 युग जी आयी हूँ। जब कभी अतीत की ओर देखती हूँ तो लगता है जैसे मैंने जिस बचपन को जिया वो कोई सच्चाई नहीं बल्कि एक फिल्म की कहानी है जिसमें मैंने अभिनय किया था।

जन्म के बाद 2-3 साल तक की ज़िन्दगी ऐसी होती है जिसके किस्से हम खूब मनोयोग से दूसरों से सुनते हैं। इसके बाद शुरू होता है एक-एक दिन का अलग-अलग किस्सा जो मष्तिष्क के किसी हिस्से में दबा छुपा रहता है। अब जब फुरसत के पल आए हैं तो बात-बात पर अतीत के पन्नों को खोल कर मैं उस दुनिया में पहुँचना चाहती हूँ जहाँ से ज़िन्दगी की शुरुआत हुई थी।

उम्र के बारह साल ज़िन्दगी से कब निकल गए पता ही न चला। पढ़ना, खेलना, खाना, गाना सुनना, घूमना इत्यादि आम बच्चों-सा ही था। पर थोड़ी अलग तरह से हम लोगों की परवरिश हुई। चूँकि मेरे पिता गाँधीवादी और नास्तिक थे तो घर का माहौल भी वैसा ही रहा। ऐसे में गाँधी के विचारों को मैं भी आत्मसात करती चली गई। हमलोग भागलपुर के नया बाज़ार में यमुना कोठी में रहते थे। उन दिनों इस कोठी का अहाता बहुत बड़ा था। हमारे अलावा कई सारे किरायेदार यहाँ रहते थे। मोहल्ले के ढ़ेरों बच्चे इकत्रित होकर इसी अहाते में खेलने आते थे। सबसे ज्यादा पसंद का एक खेल था जिसमें हम दीवार पर पेंसिल से लकीर बना कर खेलते थे। एक्खट-दुक्खट, पिट्टो, नुक्का चोरी, कोना कोनी कौन कोना, ओक्का बोक्का, घुघुआ रानी कितना पानी, आलकी पालकी जय कन्हैया लाल की आदि खेलते थे। टेनी क्वेट, कैरम, बैडमिंटन, ब्लॉक, लूडो भी खेलते थे।

बचपन में भैया और मेरे बीच में मम्मी सोती थी और हम दोनों मम्मी से कहते थे कि वो मेरी तरफ देखे। ऐसे में मम्मी भी क्या करती भला? वो बिल्कुल सीधे सोती थी ताकि किसी एक की तरफ न देखे। मैं हर वक़्त मम्मी से चिपकी रहती थी। स्कूल जाने में बहुत रोती थी और हर रोज़ मम्मी को साथ जाना होता था। मम्मी के साथ खाना, मम्मी के साथ सोना, मम्मी के बिना फोटो तक नहीं खिंचवाती थी। हम दोनों भाई बहन हाथ पकड़ कर स्कूल जाते और लौटने में भी हाथ पकड़ कर ही आते थे। भाई एक साल बड़ा था और खूब चंचल था पर मैं बहुत शांत थी। धीमे-धीमे चलना, धीरे से बोलना, गंभीरता से रहना। खेल में भी झगड़ा पसंद नहीं था। अगर कोई बात पसंद नहीं तो बोलना बंद कर देती थी। 

अहाते में एक झा परिवार था। उनके तीन बेटा अरविन्द, रविन्द और गोविन्द तथा एक बेटी विभा थी, जो शायद मेरी पहली दोस्त रही होगी। एक बार खेलने में मैंने एक ईंट फेंका जो जाकर उसके सिर पर लग गया। मैं बहुत डर गई, लेकिन मुझे किसी ने नहीं डांटा। हम दोनों साथ ही झाडू की सींक पर स्वेटर बुनना सीखे। बाद में उसके पिता की बदली हो गई और वे लोग चले गए। फिर आज तक नहीं पता कि वो कहाँ है, उसे कुछ याद भी है या नहीं। अहाते में एक अग्रवाल परिवार था जिनके यहाँ ब्याह कर नयी बहु आयी थी। उन्हें मैं बिन्दु चाचीजी कहती थी और वो मुझे बहुत अच्छी लगती थी। उनके साथ हम कुछ बच्चे छोटे चूल्हे पर छोटे-छोटे बर्तन में खाना बनाते थे, गुड्डा-गुड़िया बनाते और खेलते थे।

मेरी एक मौसी भागलपुर शहर में ही रहती थी। उनके तीन बच्चे थे। अक्सर उनके घर हमलोग जाते और खूब खेलते थे। मौसा उच्च सरकारी पद पर थे तो हर सिनेमा हॉल में पास मिलता था। उन दिनों पिक्चर पैलेस एक हॉल था जिसके बॉक्स में कुछ कुर्सी और बिस्तर लगा हुआ था। कुछ फिल्में देखने हमें भी ले जाया जाता था और हम बच्चे बिस्तर पर बैठ कर सिनेमा देखते थे। 

मेरे पिता के एक मित्र थे प्रोफ़ेसर करुणाकर झा। उनको दो बेटे और चार बेटियाँ थी। तीसरे नंबर वाली नीलू मेरी दोस्त थी। वे लोग उन दिनों बूढ़ानाथ में रहते थे। हमलोग अक्सर एक दूसरे के घर गंगा के किनारे बने रास्ते से होकर जाते थे। घाट किनारे लोहे का रेलिंग बना था जिसपर हम लोग अवश्य झुला झूलते फिर आगे जाते थे। 

आदमपुर में छोटी सी. एम. एस. स्कूल से भैया और मैंने पढ़ाई की। फिर मैं 6 माह मोक्षदा स्कूल में पढ़ी। छुट्टियों में हम गाँव गए तो बाढ़ में फँस गए। फिर पापा ने हमलोगों को गाँव में ही दादी के पास छोड़ दिया। मेरे घर के सामने कभी पापा द्वारा ही खुलवाया हुआ प्राइमरी स्कूल था, उसमें मैं पढ़ने जाने लगी। वहाँ सभी बच्चे चट्टी (बोरा) बिछा कर बैठ कर पढ़ते थे और बेंच पर शिक्षक बैठते थे। मुझे खास सुविधा दी गई, और मास्टर साहब ने मुझे बेंच के दूसरी तरफ बैठाने का बंदोबस्त किया। वहाँ सिर्फ दो हो शिक्षक थे, नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन एक शिक्षक को सभी बकुलवा मास्टर कहते थे, क्योंकि उनकी गर्दन लम्बी थी बगुला जैसी। यहाँ कुछ ही दिन पढ़ाई की उसके बाद मेरे पिता के बड़े भाई जिन्हें हम बड़का बाबूजी कहते थे, पास के गाँव सुन्दरपुर में प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे, उनके साथ उनके स्कूल जाने लगी। वहाँ से परीक्षा पास कर 7 वीं में शिवहर मिडिल स्कूल में पढ़ने गई। मेरे क्लास में मुझे लेकर सिर्फ तीन लडकी थी. कालिंदी,    और मैं. छठी कक्षा में सिर्फ दो लड़की पढ़ती थी। दोनों क्लास में किसी का भी गेम पीरियड होता तो हम पाँचों को छुट्टी मिल जाती थी ताकि हम सभी एक साथ खेल सकें। हमलोग सबसे ज्यादा कैरम खेलते थे। मेरे क्लास में एक लड़का था उमेश मंडल जो यह गाना बहुत अच्छा गाता था - ''कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों''। मेरा भाई महुवरिया हाई स्कूल, शिवहर में पढ़ता था, मेरी 7वीं की परिक्षा का सेंटर वहीं पड़ा था। इसके बाद पापा मुझे भागलपुर ले आए लेकिन भाई को गाँव में ही पढ़ने को छोड़ दिए।  

गाँव का जीवन बड़ा ही सरल था। न भय न फिक्र। गुल्ली डंडा, पिट्टो, बैडमिन्टन, कबड्डी, लूडो, साँप-सीढ़ी आदि खूब खेलते थे। यहाँ लड़का लड़की का कोई भेद नहीं था। बड़का बाबूजी के दोनों बेटे अवधेश भैया और मिथिलेश, हम करीब-करीब साथ ही रहते थे; यूँ हमारा घर अलग-अलग था। मेरी सबसे बड़ी फुआ का एक बेटा कृष्ण बिहारी भैया जिसे मैंने नाम दिया था अमिया भैया, हमारे साथ ही रहता था। मेरी सबसे छोटी फुआ अक्सर गाँव आती तो महीनों रहती थी। उनके तीन बेटी और दो बेटे थे। उनकी बीच वाली बेटी बेबी दीदी से हम सबसे ज्यादा नज़दीक थे, दोस्त की तरह। भैया के हमउम्र दोस्त भी हमारे घर ही पढ़ने के लिए आ जाते थे क्योंकि हमारे घर में बिजली थी। हम सभी मिलकर साथ पढ़ते और खेलते थे। 

जो हमारे खेती का काम करता था उसमें एक का नाम था छकौड़ी महरा। उसकी पत्नी कहती कि पति का नाम नहीं लेना चाहिए। हमलोग ज़िद करते कि नाम बोलो, तो वो कहती कि छौ गो कौड़ी, और हम लोग ठहाके लगाते। एक और था लक्षण महतो। वह कभी-कभी किसी-किसी शब्द को बोलने में हकलाता था। एक दिन मेरी दादी से कहा - स स स सतुआ बा (सत्तू है)? तब से हमलोग उसे बार-बार ऐसा कहने के लिए कहते थे। हमारे एक पड़ोसी थे सियाराम महतो, जिनको हमलोग सियाराम चा कहते थे। वे थोड़ा पढ़े लिखे थे। उनको अंग्रेजी भाषा और ग्रामर की समझ थी। वे कुछ शब्द बोलते और उसका स्पेलिंग पूछते। एक शब्द था लेफ्टिनेंट जिसका स्पेलिंग अलग होता है और हिज्जा अलग। वे अक्सर सभी से यह शब्द ज़रूर पूछते। गाँव में एक थे परीक्षण गिरी। हम लोग उन्हें महन जी (महंत जी) कहते थे। वे जब भी दिखते हम लोग कहते ''गोड़ लागी ले महन जी'', तो वो कहते ''खूब खुस रह बऊआ, जुग-जुग जीअ''। एक थे बनारस पांड़े, जो हमारे यहाँ अक्सर आते और मेरी दादी उनसे पूजा पाठ करवाती और दान दक्षिणा देती थी। यूँ मेरे पापा पूजा-पाठ के ख़िलाफ़ थे लेकिन उन्हें कुछ देने से दादी को कभी नहीं रोकते थे। गाँव में एक वृद्ध स्त्री थी जिसका पति पुत्र कोई नहीं था, नितांत अकेली थी। उसे सभी लोग सनमुखिया कहते थे, मुमकिन है सही नाम सूर्यमुखी हो, वो मेरे घर का काम करती थी। वो साइकिल को बाईसिकिल कहती थी। हम कहते कि साइकिल बोलो तो कहती कि ''साइकिल बोलने नहीं आता है बाईसिकिल बोलने आता है''। हमलोग खूब हँसते क्योंकि वो साइकिल बोलती भी थी। मैंने उसे ही देखकर सिलबट्टे पर हल्दी पीसना सीखा था। गाँव में एक खूब तेज़ और होशियार स्त्री थी जिसे उसके बेटे के नाम के कारण सभी लोग 'बिसनथवा मतारी' (विश्वनाथ की माँ) बुलाते थे। वो रोज़ मेरे घर आती और कभी किस्सा तो कभी गाना सुनाती। कई ऐसे लोग हैं जो ज़ेहन में आज भी स्थापित हैं, भले किसी से मिलना नहीं होता है।      
   
मैं गाँव में जब तक रही या फिर जब भी गाँव जाती तो पापा के साथ दिन भर मज़दूरों के बीच ही रहती थी। उनके पनपियाई (खाना) के लिए मेरे यहाँ से जो भी खाना आता हम भी वही खाते थे। पेड़ से अमरुद तोड़ना, खेत से साग तोड़ना, सब्जी तोड़ना, फल तोड़ना, आदि दादी के साथ करती थी। मुझे मडुआ की रोटी बहुत पसंद थी, अक्सर सियाराम चाची मेरे लिए बना कर ले आती थी। हमारे घर से काफी दूर गाँव के अंत में मेरे छोटे चाचा रहते थे। वहीं हमारा पुराना घरारी था। यहीं मेरे पापा के अन्य चचेरे भाई रहते थे और सभी के घर हमलोग अक्सर आना जाना करते थे।

1977 में मैं भागलपुर आ गई। मेरे लिए दुनिया काफी बदली हुई थी। फिर से नए स्कूल में जाना। मेरा नामांकन घंटाघर स्थित मिशन स्कूल (क्राइस्ट चर्च गर्ल्स हाई स्कूल) में हुआ। इस साल से नई शिक्षा नीति लागू हुई थी। इस कारण मुझे पुनः 7 वीं में नामांकन लेना पड़ा जिसे उस समय 7 th new कहा जाता था। मेरे स्कूल की प्राचार्या मिस सरकार थी जिनसे हम छात्रा क्या शिक्षकगण भी ससम्मान डरते थे। 7 वीं में मेरी क्लास टीचर शीला किस्कु रपाज थी जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी। गाँव से लौटने के बाद मैं पहले से और ज्यादा शांत हो गई थी। उन दिनों ही मेरे पिता की बीमारी की शुरुआत हो रही थी। 

प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा इलाज के लिए हाजीपुर में कम्युनिष्ट पार्टी के श्री किशोरी प्रसन्न सिन्हा जिन्हें सभी किशोरी भाई कहते थे, जो काफी वृद्ध और सम्मानीय सदस्य थे, के घर हमलोग एक महीना रहे। फिर पापा ने आयुर्वेद के द्वारा अपनी बीमारी का ईलाज करवाया। लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही थी। सभी के बहुत मना करने पर भी वे विश्वविद्यालय जाना नहीं छोड़ रहे थे। और अंततः 1978 में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु क्या है मुझे तबतक नहीं पता था। पापा के श्राद्ध में यूँ लग रहा था मानो कोई पार्टी चल रही हो। पूजा-पाठ, भोज, और लोगों की बातें। यह सब जब खत्म हुआ तब लगा कि अरे पापा तो नहीं हैं अब क्या होगा। पर हम सभी धीरे-धीरे उनके बिना जीने के आदी हो गए।

यमुना कोठी के जिस हिस्से में हमलोग रहते थे उसका आधा हिस्सा अब बिक चुका है। चूँकि इसके मकान मालिक रतन सहाय हमारे दूर के रिश्तेदार हैं अतः इनके परिवार से सारे संपर्क यथावत हैं। अपनी यादों को दोहराने के लिए हम अक्सर वहाँ जाते रहते हैं। मकान के अन्दर आने के लिए लोहे का एक बड़ा-सा गेट था, जिसपर अक्सर हमलोग झुला झूलते थे। मकान का कुछ और हिस्सा बिक जाने से वह गेट भी अब न रहा। मकान में बाहर की तरफ एक बरामदा था जिसपर शतरंज के डिजाईन का फ्लोर बना था। इसपर हमलोग कोना कोनी कौन कोना का खेल खेलते थे।    

नया बाज़ार के ठीक चौराहे पर बंगाली बाबू का दूकान होता था जहाँ से हम कॉपी पेंसिल और टॉफ़ी खरीदते थे, विशेषकर पॉपिंस मुझे बहुत पसंद था। नया बाज़ार चौक पर नाई का वह दूकान बंद हो चुका है जहाँ मेरे पापा बाल कटवाते थे। चौराहे पर मिठाई की एक दूकान थी जहाँ से हम खूब छाली वाली दही और पेड़ा खरीदते थे, अब उसका जगह बदल गया है। यहीं पर एक मिल था जहाँ हम आटा पिसवाने आते थे। यहीं पर पंसारी का दूकान है जहाँ से सामान खरीदते थे। चौक पर ही निजाम टेलर है जिसके यहाँ अब भी मैं कपड़ा सिलवाती हूँ। निजाम टेलर मास्टर तो अब नहीं रहे उनके बेटे अब सिलाई का काम करते हैं। चौक और मेरे घर के सामने का मस्ज़िद अब भी है जहाँ सुबह शाम अजान हुआ करता था। शारदा टाकिज़ एक बहुत भव्य सिनेमा हॉल खुला था जो अब बंद हो चुका है। इसके मालिक महादेव सिंह जो निःसंतान थे, की मृत्यु के बाद यह विवाद में चला गया। यहाँ हमलोग खूब सिनेमा देखते थे। पिक्चर पैलेस भी बंद हो चुका है। एक अजन्ता टाकिज और दीप प्रभा है जहाँ हाल फिलहाल भी सिनेमा देखा है मैंने। नाथनगर में जवाहर टाकीज है जहाँ अपने पापा के साथ हम अंतिम फिल्म 'मेरे गरीब नवाज़' देखे थे.

वेराइटी चौक पर बीच में एक मंदिर है जिससे वहाँ चौराहा बनता है। यहीं पर आदर्श जलपान है, जहाँ गुलाब जामुन खाने मैं अक्सर जाती थी। नज़दीक ही आनंद जलपान था जहाँ का डोसा बहुत पसंद था मुझे, पर अब वह बंद हो चूका है। वेराइटी चौक पर लस्सी वाला और कुल्फी वाला है, जब भी हम बाज़ार जाते तो लस्सी या कुल्फी खाते थे। ख़लीफाबाग चौक पर चित्रशाला स्टूडियो है जो अब आधुनिक हो गया है। हमलोग फोटो यहीं साफ़ करवाते थे। यहीं भारती भवन, किशोर पुस्तक भण्डार आदि है जहाँ से किताबें खरीदते थे। यहाँ पर मैं झालमुढ़ी, भूँजा, मूँगफली, गुपचुप (गोलगप्पे) आदि ठेले वाले से खरीद कर खाती थी और अब भी कभी-कभी खाती हूँ।    

नया बाज़ार चौक पर हमारे पारिवारिक मित्र डॉ पवन कुमार अग्रवाल का क्लिनिक 'गरीब नवाज़' है जो अब छोटा सा अस्पताल का रूप ले चुका है। डॉ अग्रवाल शुरू से मुझे बेटी की तरह मानते थे। 1986 में जब मेरे अपेंडिक्स का ऑपरेशन उन्होंने किया तब ऑपरेशन से पहले मेरी बहुत सारी ज़िद थी जिसे उन्होंने पूरा किया फिर मैं ऑपरेशन के लिए राज़ी हुई थी। उनके साथ मैं अपनी समस्याओं पर विचार-विमर्श करती थी। 2008 में उनका देहांत हो गया। अब उनका दोनों डॉक्टर पुत्र अच्छी तरह क्लिनिक सँभालता है। मेरी माँ के सहकर्मी हैं मुस्तफा अयुब जो रामसर में रहते हैं। इनकी पत्नी राशिदा आंटी शुरू से मुझे बहुत मानती रहीं। हर सुख दुःख में इनलोगों का बहुत सहयोग मिला। मम्मी की एक मित्र उषा मौसी हैं जो गाना गाती थी ''ज़रा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाए'', जिसे तब भी मैं उनसे सुनती थी अब भी सुनती हूँ। 

स्कूल के बाद सुन्दरवती कॉलेज से ऑनर्स तक की पढ़ाई हुई। रोज़ जोगसर, शंकर टाकीज चौक, मानिक सरकार चौक, आदमपुर आदि से होते हुए खंजरपुर स्थित सुन्दरवती कॉलेज जाती थी। ऑनर्स में कुछ माह हॉस्टल में रही थी। लेकिन एक भी रूम मेट से दोबारा मिलना न हुआ टी. एन. बी. लॉ कॉलेज जो तिलकामाँझी में है, वहाँ लॉ क्लास के लिए जाती थी कॉलेज के बाद एम. ए. के लिए सराय होते हुए यूनिवर्सिटी जाती थी। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी अक्सर पैदल ही जाया करती थी। तब न ज्यादा गर्मी लगती थी न ठंड। बी. ए. तक मैं बहुत अंतर्मुखी थी। बस काम से काम, न गप्पे लड़ाना पसंद न बेवज़ह घूमना। स्कूल की सहपाठियों में नीलिमा, मृदुला, बिन्दु आदि से मिलना हुआ। कॉलेज की दोस्तों में पूनम और रेणुका से मिलती रही हूँ। यूनिवर्सिटी की किसी भी दोस्त से अब संपर्क नहीं रहा।           

ढेरों यादें और किस्से हैं, जिन्हें कभी भूलता नहीं मन। इतना ज़रूर है कि भागलपुर कभी छूटा नहीं। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी जाने का रास्ता जैसे अब भी अपना-सा लगता है। यह सब छूट कर भी नहीं छूटता मुझसे। शहर जाना भले न होता हो पर ज़िन्दगी जहाँ से शुरू हुई वहीं पर अटक गई है। 

नन्हा बचपन रूठा बैठा है...    

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अलमारी के निचले खाने में  
मेरा बचपन छुपा बैठा है  
मुझसे डरकर  
मुझसे ही रूठा बैठा है  
पहली कॉपी पर पहली लकीर  
पहली कक्षा की पहली तस्वीर  
छोटे-छोटे कंकड़ पत्थर  
सब हैं लिपटे साथ यूँ दुबके  
ज्यों डिब्बे में बंद ख़ज़ाना  
लूट न ले कोई पहचाना  
जैसे कोई सपना टूटा बिखरा है  
मेरा बचपन मुझसे हारा बैठा है,  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।     

ख़ुद को जान सकी न अबतक
ख़ुद को पहचान सकी न अबतक  
जब भी देखा ग़ैरों की नज़रों से
सब कुछ देखा और परखा भी
अपना आप कब गुम हुआ  
इसका न कभी गुमान हुआ  
खुद को खो कर खुद को भूल कर   
पल-पल मिटने का आभास हुआ  
पर मन के अन्दर मेरा बचपन  
मेरी राह अगोरे बैठा है,  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

देकर शुभकामनाएँ मुझको  
मेरा बचपन कहता है आज  
अरमानों के पंख लगा  
वो चाहे उड़ जाए आज  
जो-जो छूटा मुझसे अब तक  
जो-जो बिछुड़ा दे कर ग़म  
सब बिसूर कर  
हर दर्द को धकेल कर  
जा पहुँचूँ उम्र के उस पल पर  
जब रह गया था वो नितांत अकेला  
सबसे डरकर सबसे छुपकर  
अलमारी के खाने में मेरा बचपन  
मुझसे आस लगाए बैठा है,  
आलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

बोला बचपन चुप-चुप मुझसे  
अब तो कर दो आज़ाद मुझको  
गुमसुम-गुमसुम जीवन बीता  
ठिठक-ठिठक बचपन गुज़रा  
शेष बचा है अब कुछ भी क्या  
सोच विचार अब करना क्या  
अंत से पहले बचपन जी लो  
अब तो ज़रा मनमानी कर लो  
मेरा बचपन ज़िद किए बैठा है,  
आलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

आज़ादी की चाह भले है  
फिर से जीने की माँग भले है  
पर कैसे मुमकिन आज़ादी मेरी  
जब तुझपर है इतनी पहरेदारी  
तू ही तेरे बीते दिन है  
तू ही तो अलमारी है  
जिसके निचले खाने में  
सदियों से मैं छुपा बैठा हूँ  
तुझसे दब के तेरे ही अन्दर  
कैसे-कैसे टूटा हूँ  
कैसे-कैसे बिखरा हूँ  
मैं ही तेरा बचपन हूँ  
और मैं ही तुझसे रूठा हूँ  
हर पल तेरे संग जीया पर  
मैं ही तुझसे छूटा हूँ,  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2015)  
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Wednesday 7 October 2015

53. गैर-बराबरी बढ़ाता आरक्षण



आरक्षण के मुद्दे पर देश के हर प्रांत में उबाल है। आरक्षण के समर्थन और विरोध दोनों पर ही चर्चा नए विवादों को जन्म देती है सभी को आरक्षण चाहिए। इससे मतलब नहीं कि वास्तविक रूप से कोई ख़ास जाति आरक्षण की हकदार है। मतलब बस इतना है कि सभी जातियाँ खुद को आरक्षण की श्रेणी में लाकर वांछित फायदा उठाना चाहती हैं समय आ गया है कि अब इस मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ी जाए हमें निष्पक्ष रूप से इसपर अपना विचार बनना होगा ये आरक्षण किसके लिए है और किसके विरूद्ध है? क्या जातिगत आधार पर आरक्षण उचित है? कितनी जातियों को इसमें शामिल किया जाए? क्या वास्तविक रूप से उन्हें फायदा हो रहा है जो ज़रूरतमंद हैं? आरक्षण का आधार सामजिक क्यों? आरक्षण का आधार एकमात्र आर्थिक क्यों नहीं? आरक्षण सहूलियत नहीं बल्कि दया है जिसे किसी ख़ास जाति को दी जा रही है। किसी ख़ास जाति में जन्म लेने पर क्या दया की जानी चाहिए? 

यह न तो उचित है और न तर्कपूर्ण कि किसी ख़ास जाति या धर्म को मानने वाले को आरक्षण मिलना चाहिए। चाहे वो शिक्षा हो या किसी पद के लिए या किसी स्पर्धा वाली शिक्षा या नौकरी में आश्चर्य है कि खुद को पिछड़ा साबित करने की होड़ लग गई है निश्चित ही आरक्षण के नाम पर हमारे युवाओं को बहकाया जा रहा है और उनको गलत दिशा देकर राजनितिक पार्टियाँ अपना-अपना लाभ पोषित कर रही हैं

आरक्षण ने काबिलियत को परे धकेल कर जातिगत दुर्भावना को बढ़ाया है। आरक्षण का दंश देश का हर नागरिक झेल रहा है। आरक्षण से कोई फायदा अब तक न दिखा है और न दिखेगा। आरक्षण का लालच दिखा युवाओं का मतिभ्रम कर आवश्यक मुद्दे पर से ध्यान को भटकाया जा रहा है। युवाओं को धर्म और जाति का अफ़ीम खिला-खिला कर देश के बिगड़ते हुए सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक दशाओं से विमुख किया जा रहा है देश कई तरह के बाह्य और आतंरिक संकट से गुजर रहा है, ऐसे में आरक्षण देकर कुछ ख़ास जातियों को फ़ायदा पहुँचाने के एवज में संकट को और भी बढ़ावा दिया जा रहा है लड़ता और मरता तो आम युवा ही है और हानि जैसे भी हो हमारे ही देश की होती है     

आरक्षण जाति भेद की दुर्भावना पैदा करने का बहुत बड़ा कारण है। किसी ख़ास जाति को आरक्षण मिलने के कारण वह जगह मिल जाता है जो कोई दूसरा ज्यादा उपुयक्त होकर भी गँवा देता हैआरक्षण प्राप्त लोगों का आरक्षण मिलने के बाद कहीं से भी बौधिक बढ़ोतरी के प्रमाण मुझे देखने को नहीं मिले। उसी तरह आरक्षण से मुक्त जो भी जातियाँ हैं वो जन्म के कारण विशिष्ट गुणों वाली हों या वे सभी धनाढ्य हो यह भी नहीं देखा है। धर्म और जाति का बौद्धिकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता और न ही आरक्षण देकर किसी में बौद्धिकता और काबिलियत पैदा की जा सकती है। कहीं न कहीं मन का विभाजन आरक्षण के बाद ही शुरू हुआ

जिस तरह से अधिकांश जातियाँ आरक्षण पाने के लिए लालायित हैं ऐसा लगता है कि आने वाले समय में गिनती की दो-चार जातियाँ ही बचेंगी जो आरक्षण से बाहर सामान्य श्रेणी में रह जायेंगीआरक्षण श्रेणी की बहुत सी जातियाँ ऐसी हैं जो धनवान हैं ऐसी बहुत सी जातियाँ हैं जो कहने को तो उच्च कूल की हैं लेकिन खाने-खाने को मोहताज़ हैं ऐसे में विचारणीय है कि किसे आरक्षण की आवश्यकता है?

प्रतिस्पर्धा के युग में आरक्षण हर जाति के लिए रोग बन गया है। योग्यता का मूल्यांकन आरक्षण से होना स्वाभाविक-सा लगता है। आज अल्पज्ञान और अल्पबुद्धि का बोलबाला होता जा रहा है ज्ञान और बुद्धि पर आरक्षण भारी पड़ रहा है और इसका ख़ामियाजा आरक्षित श्रेणियों की जातियों को भी उठाना पड़ रहा है अगर किसी का उसकी अपनी योग्यता से स्पर्धा में चयन होता है फिर भी लोगों कि निगाहों में वो तिरस्कार पाता है और यही माना जाता है कि आरक्षण के कारण वह उतीर्ण हुआ है उसकी अपनी योग्यता आरक्षण की बलि चढ़ जाती है आज जब हम किसी डॉ के पास ईलाज के लिए जाते हैं तो मन में यह आशंका रहती है कि कहीं यह आरक्षण से आया हुआ तो नहीं है ऐसे में उस डॉ की योग्यता पर अपनी ज़िन्दगी दाँव पर लगी दिखती है। मुमकिन है कि आरक्षित श्रेणी का वह डॉक्टर सचमुच प्रतिभाशाली हो मगर आरक्षण की सुविधा से अनुपयुक्त का चयन उपयुक्त को भी कटघरे में खड़ा कर दे रहा है इस आरक्षण ने मन में संदेह पैदा कर दिया है और हम एक दूसरे को शक और असम्मान से देखने लगे हैं

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अगर आरक्षण देना ही है तो उसे आर्थिक आधार पर दिया जाए चाहे वो किसी भी जाति धर्म या सम्प्रदाय का क्यों न हो, और वह भी सिर्फ विद्यालय स्तर की शिक्षा तक। ताकि स्पष्टतः प्रतिभा की पहचान हो सके और उपयुक्त पात्र ही उपयुक्त स्थान ग्रहण करे समान अवसर, सुविधा और वातवरण मिलने पर ही हर नागरिक समान हो पाएगा देश के हर नागरिक के लिए समान क़ानून, समान न्याय, समान शिक्षा, समान सुविधा और समान कर्त्तव्य का होना आवश्यक है एक मात्र आर्थिक आधार ही आरक्षण का उचित आधार है और होना चाहिए

- जेन्नी शबनम (7. 10. 2015)

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Thursday 20 August 2015

52. सावन में बरसाती टोटके


बरसात का मौसम, सावन-भादो का महीना और ऐसे में बारिश। चारो तरफ हरियाली, बागों में बहार, मन में उमंग जाने क्या है इस मौसम में। रिमझिम बरसात… अहा! मन भींगने को करता है। बरसात के मौसम में उत्तर भारत में कजरी गाने की परम्परा  रही है। 

सावन ऐ सखी सगरो सुहावन 
रिमझिम बरसे ला मेघ रे 
सबके बलमउआ त आबे ला घरवा 
हमरो बलम परदेस रे  

सावन के महीने में कई-कई दिन लगातार बारिश हो, सूर्य कई दिनों तक नहीं दिखे तो इसे कहते हैं झपसी (लगातार मूसलाधार वर्षा) लगना।शहरी जीवन में तो ऐसे मौसम में लोग चाय के साथ पकौड़ी खाना, लिट्टी चोखा खाना, लॉन्ग ड्राइव पर जाना, पसंदीदा पुस्तक पढ़ना या गीत सुनना आदि पसंद करते हैं। ग्रामीण परिवेश में यह सब बदल जाता है। यूँ अब पहले की तरह गाँव नहीं रहे अतः काफी कुछ शहरों का देखा देखी होने लगा है। पहले चूल्हा में लकड़ी ही ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता था अतः बरसात में मेघौनी लगते ही जरना (लकड़ी) एकत्रित कर लिया जाता है। बूँदा-बाँदी में भी खेती के सारे काम होते हैं, क्योंकि इसमें नियत समय पर ही सब कुछ करना है। पशु पक्षी की देखभाल, उनके चारा का इंतज़ाम आदि सब पहले से कर लेना होता है। बाज़ार हाट का काम और खेती का काम भीगते हुए ही करना होता है।गाँव में कभी भी कोई असुविधा महसूस नहीं होती है। जब जो है उसमें ही जीवन को भरपूर जीया जाता है।  

यूँ तो परम्पराएँ गाँव हो या शहर दोनों जगह के लिए बनी हुई हैं लेकिन कुछ परम्पराएँ गाँवों तक सिमट गई हैं। गाँवों में जब मूसलाधार बारिश हो और पानी बरसते हुए कई दिन निकल जाए तो एक तरह का टोटका किया जाता है जिससे बारिश बंद हो और उबेर (बारिश बंद होकर सूरज निकालना) हो जाए।   

सीतामढ़ी ज़िले में झपसी लगाने पर एक अनोखी परम्परा है। कपड़े का दो पुतला (गुड्डा-गुड़िया) बनाते हैं, एक भाहो (छोटे भाई की पत्नी) और एक भैंसुर (पति का बड़ा भाई)।  फिर दोनों को छप्पर (छत) पर एक साथ रख देते हैं। फिर अक्षत और फूल चढ़ाकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि चूँकि भाहो और भैंसुर का सम्बन्ध ऐसा है जिसमें दूरी अनिवार्य है। इसलिए भाहो-भैंसुर का एक साथ होना और पानी में भींगना बहुत बड़ा पाप और अन्याय है। अतः भगवान इस अन्याय को देखें और पानी बरसाना बंद करें। इस गुड्डा-गुड़िया को बना कर वही लड़की पूजा करती है जिसको एक भाई होता है। 

इससे मिलती जुलती ही छपरा जिला की परंपरा है। इस टोटका में कपड़े से कनिया और दूल्हा (पति और पत्नी) बनाते हैं। फिर दूल्हा के कंधा पर एक गमछा (तौलिया) रख दिया जाता है जिसके एक छोर में खिचड़ी का सामान बाँध दिया जाता है। एक छोटा ईंट रखकर उस पर एक दीया जला देते हैं और उससे सटाकर कनिया व दूल्हा को खड़ा कर दिया जाता है। कनिया और दूल्हा भगवान से कहते हैं कि हमें परदेस जाना है, दिन रात पानी बरस रहा है, चारो तरफ अन्हरिया (अन्धेरा) है; हे भगवान! उबेर कीजिए, जिससे हमलोग खाना बना कर खाएँ और फिर परदेस जाएँ ताकि कमा सकें। मान्यता है कि जिस बच्ची का जन्म ननिहाल में होता है वही यह गुड्डा-गुड़िया बनाती है और पूजा करती है। 


अब इन टोटकों से क्या होता यह तो नहीं पता लेकिन सुना है कि टोटका करने के बाद पानी बरसना बंद होकर उबेर हो जाता है; भले थोड़ी देर के लिए ही सही। टोटका कहें या मान्यता या मन बहलाव का साधन, गाँव के लोग हर परिस्थिति का सामना अपने-अपने तरीके से करते हैं। प्रकृति के हर नियम के साथ तालमेल मिला कर जीते हैं। अब यह सब होता है या नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन है बड़ा अनूठा और दिलचस्प टोटका।  

-  जेन्नी शबनम (20. 8. 2015)

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Sunday 8 March 2015

51. जीना है तो मरना सीखो

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''काम किए बिना पेट नहीं भरता है मलकिनी । इस घर के सब आदमी का पेट नहीं कोठी है, कितना भी भरो भरता ही नहीं है । एगो अपना पेट त पलता नहीं है उस पर से बुढवा-बुढ़िया अमर होके आया है, काम काज त कौनो करता नहीं ऊपर से मेरे मरद को बोल के रोज़ महाभारत करवाता है । इतना भी नहीं होता कि बइठे-बइठे बचवो सबको देखे । एगो ऊ (पति) अभागा है, उसका त देह का आग ठन्डे नहीं होता है, हरामी रोज़ रात को पी के जाने कहाँ-कहाँ से मुँह मार के आता है और मेरा देह नोचता है । साले-साले 4 गो छौंड़ी (बेटी) हो गई, फेर दूगो छौंड़ा (बेटा) । सबसे छोटका को दुसरकी (दूसरे नंबर की बेटी) सँभालती है, बड़की (बड़ी बेटी) दू चार घर में काम कर आती है त तनिका आराम मिल जाता है । न त सब मिल के हमहीं को नोच के खा जाएगा ।'' 

''अभी दुइएगो त छौंड़ा (बेटा) है, उहो देबी माता से केतना माँगने पर । अभी फेर 7 वाँ महीना चढ़ गया है, गोसाईं से बोले कि दू गो और पूत दे दे, चार गो बेटा रहे त दोसरा कौनो से उधार कन्धा माँगना त नहीं पड़ेगा । एगो (एक) नहीं पूछेगा त दूसरा त पूछेगा । कुछो कर के त अपन बाल बच्चा के पालिए लेगा और हम दोनों का बुढ़ापा भी पार लगिए जाएगा ।'' 

''बाकी ई राँड़ सब का होगा नहीं मालूम । ई करमजली सब, केतनो उपाय किए मनता माँगे लेकिन करम में इहे लिखल था । आज का जमाना त मालूमे है आपको मलकिनी, लड़की जात का कौन ठिकाना, कब उसका इज्जत उसका अपना बापे भाई लूट ले कौन जानता है । कइसहूँ बच बचा के बियाह कर दिए त कौन जाने बसेगी कि नहीं, उसका मरद छोड़ के दोसर कर लेगा त फेर हमरे मत्थे पर । अभागिन सब जनम लेते मर काहे नहीं गई ।''

''रोज सुनती हैं न मलकिनी, टीभीयो में देखबे करती हैं कि कैसे इज्जत लूट के संढवा (सांड) जैसा छुटल घूमता है कमीना सब । कहियो बेटा-बेटी बराबर नहीं हो सकता है । ऊ हरामी सब का भरोसा नहीं, अपने ही माँ बहिन बेटी का शिकार करता होगा । तइयो आग नहीं बुझता होगा तब दोसर जनानी (स्त्री) पर हमला करता है । सरकार में दम होता त ई मादर...(गाली) सब को पकड़ के उसका अंगे काट देता । जो बुरा नज़र से देखे उसका आँखे फोड़ देना चाहिए । पर ई सब का दम नहीं है कौनो में । औरत आ गरीब दोनों का एके हाल है मलकिनी । कहूँ कौनो सुनवाई नहीं, न इहाँ न भगवाने के ऊहाँ ।''

यह सब सुनकर किसी आम स्त्री की मानसिक दशा का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है । यह पीड़ा न सिर्फ हमारे समाज के गरीब, अशिक्षित और निम्न मध्यमवर्गीय औरत की पीड़ा है जिसे साल दर साल बच्चा जन्म देने की मशीन बनाया जाता है या फिर जिसका उपयोग हर रात उस गोश्त की तरह किया जाता है जिसे हर रोज़ पकने के बाद भी ताज़ा रहना होता है बल्कि हर उस औरत की पीड़ा है जिसने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है । जाति, धर्म, प्रांत या प्रदेश ने इस पीड़ा का अबतक बँटवारा नहीं किया है । स्त्री का स्त्री होना ही अभिशाप है और यही यंत्रणा का कारण भी ।

इन उत्तरों ने कई सारे सवालों को जन्म दिया है, जो नए नहीं हैं लेकिन हमारी चेतना को कुरेदते ज़रूर हैं । काम के बोझ तले दबी औरत उस पति का कैसे आदर कर सकती है जो सिर्फ अपनी मर्जी से उसका भक्षण करता है । उस स्त्री को अपनी बेमन औलादों (लड़की) से प्रेम नहीं, ऐसा नहीं है, लेकिन उनके भविष्य की दुश्चिंता ने अपनी ही संतानों के प्रति क्रूर बना दिया है । उसे पुत्र इस लिए प्रिय है क्योंकि पुत्र न सिर्फ उसके बुढापे का सहारा होगा बल्कि मृत्यु के बाद पुत्र के काँधे पर अंतिम यात्रा सौभाग्य सूचक है । लड़कों के साथ वैसी कोई अनहोनी नहीं होगी जो लड़कियों के साथ कभी भी हो सकती है । लड़की भले ही कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करे फिर भी उसे वह सम्मान नहीं मिलता जो लड़का को मिलता है । 

यहाँ सबसे अहम् सवाल यह है कि उपार्जन में संलग्न होते हुए भी लड़की क्यों दुत्कारी जा रही है । जवाब भी यहीं पर है कि लड़की की ज़िन्दगी उसकी अपनी कभी नहीं है । सुरक्षा के तमाम उपाय के बावजूद जन्मजात कन्या तक का बलात्कार हो जाता है । इज्ज़त लुट जाने के बाद ब्याह की समस्या आती है, सुरक्षित ब्याह हो जाने के बाद पति पर अति निर्भरता और भविष्य की अनिश्चितता कि वो उसे रखेगा या निकाल देगा । दहेज़, परस्त्री सम्बन्ध, बीमारी, बार-बार गर्भवती होना आदि ऐसी बातें हैं जिसका दोषी पुरुष है लेकिन सज़ा स्त्री भुगतती है । अपमान, ठोकर, उपेक्षा, शारीरिक और मानसिक यंत्रणा स्त्री को जन्म के साथ ही जैसे उपहार में मिलता है ।

शिक्षा की प्रगति ने मनुष्य की सोच में कितना बदलाव लाया है इस बात का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है जब तथाकथित शिक्षित उच्च पदस्थ लोग बलात्कार के लिए स्त्री को, उसके पहनावे को, उसके चाल चलन को या फिर उसकी नियति को दोष देते हैं । हमारे प्रांत की तरफ बेटों की माएँ बड़े गर्व से कहती हैं ''हमारा घोड़ा (बेटा) छुटल दौड़ेगा, अपनी घोड़ी (लड़की) को सँभालो ।'' 

पुरुष चंगुल से स्त्री की आज़ादी मुमकिन नहीं दिखती । जिधर निगाह जाती है उधर हर लड़की की माएँ डरी सहमी दिखती हैं । हर लड़की का पिता डरा सहमा भी रहता है और क्रूर जेलर भी बना रहता है । कड़ी पाबन्दियों के बीच लड़कियाँ घुट-घुट के जीने को विवश रहती हैं । यूँ बराबरी का दावा करने वाले माता-पिता भी लड़की को उतनी आज़ादी नहीं देते जितना लड़के को देते हैं । हालाँकि इसके लिए उनकी मानसिकता नहीं बल्कि समाज दोषी है । एक अनजाना-सा खौफ़ हर वक़्त घेरे रहता है कि कहीं अबकी बार कोई अनहोनी या आफत उसके घर न आ जाए । 

समाज में चारों तरफ नज़र दौड़ाने के बाद इन समस्याओं के समाधान का न तो कोई रास्ता नज़र आता है न ही कोई विकल्प । कभी सोचती हूँ कुछ ऐसा किया जाए कि जन्म लेते ही सारी लड़कियों के दिमाग से सोचने समझने और दर्द सहने की क्षमता ख़त्म हो जाए । फिर वो ज़िंदा लाश बन जाएँगी, उसे जितना भोगो, जितना तड़पाओ, जितना नोचो खसोटो उफ़ नहीं करेंगी । बच्चे पैदा करेंगी, जैसे कहा जाएगा वैसे सारा काम करेंगी । न हक़ की कोई बात होगी न आज़ादी के लिए सुगबुगाहट, रोबोट बन कर पुरुष के उपयोग और उपभोग के लिए सदैव उपलब्ध रहेंगी । 

मनाव के दानव बन जाने का परिणाम है कि दुनिया से कई प्रजातियाँ मिट गईं हैं और अब शायद स्त्री की बारी है । सचमुच स्त्री मानव नहीं है बल्कि एक अलग प्रजाति है जिसका नष्ट होना पुरुषों और परम्पराओं के कारण तय है । कभी-कभी मन चाहता है कि दुनिया से स्त्री नामक प्रजाति का नाम मिट जाए और विज्ञान के चमत्कार से पुरुष ही स्त्री का सभी काम करे ।

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2015)

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Monday 1 December 2014

50. यह ह्त्या नहीं स्त्रियों का सामूहिक नरसंहार है

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छत्तीसगढ़ में नसबंदी के दौरान 14 स्त्रियों की मौत ने एक बार फिर सोचने को मजबूर किया कि हमारे देश में आम स्त्रियों की कीमत क्या है। न उनकी ज़िन्दगी का कोई मोल है न उनकी मृत्यु का कोई अर्थ ! हम ज़बरदस्त गैरबराबरी से जूझ रहे ऐसे संवेदनहीन और असभ्य समाज का हिस्सा जा रहे हैं जो वर्चस्व, सत्ता और प्रतिस्पर्धा को ही एक मात्र जीने का मूल मंत्र बना चुका है। अजीब ये है कि इन सबमें उसके सामने केवल स्त्री खड़ी है। 

छत्तीसगढ़ के इस हादसे के परिपेक्ष में विषयों पर विशेष रूप से सोचना होगा। पहला यह कि स्वास्थ्य शिविर में जाकर इलाज कराने वाला तबका कौन है। यह समाज का वो वर्ग है जिसे सरकारी खानापूर्ति की भरपाई के लिए लक्ष्य-पूर्ति का साधन बना दिया जाता है। असुरक्षित और अस्वस्थ माहौल में सीमित संसाधनों के द्वारा चिकित्सा करना या शल्य क्रिया को अंजाम देना निश्चय ही अमानवीय अपराध है। अजीब है कि यह अपराध वैधानिक तरीके से हो रहा है क्योंकि शिविरों के हालात का अंदाजा जनसाधारण को है। निर्धन जनता या ऐसे क्षेत्र के निवासी जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है, इन स्वास्थ्य केन्द्रों और शिविरों पर निर्भर होते हैं और अपनी जान जोख़िम में डालने को मजबूर होते हैं। 
  
समाज कल्याण से जुड़ी सरकारी योजनाओं के तहत लगने वाले नसबंदी शिविरों का सच किसी से छिपा नहीं है। इन शिविरों में एक-एक दिन में सौ-सौ ऑपरेशन किए जाते हैं । एक वरिष्ठ चिकित्सक होता है जिसके अंतर्गत कई प्रशिक्षु होते हैं जो यह काम निबटाते हैं। यह शिविर जहाँ भी लगता है वहाँ न तो आधुनिक ऑपरेशन थियेटर होता है न आपातकालीन चिकित्सा के लिए कोई यन्त्र न ही स्वच्छ वातावरण। यह हमारे भारत का सच है कि इन शिविरों में सिर्फ वही स्त्रियाँ या पुरुष जाते हैं जो आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर होते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति ज़रा भी ठीक हो, भले ही वह दिहाड़ी मजदूर ही क्यों न हो, वह भी निजी अस्पताल में ही जाकर इलाज कराता है। इस सच से न तो हमारे देश की जनता इंकार कर सकती है न ही सरकार।

दूसरा विषय यह है जिस पर न सिर्फ स्त्रियों को सोचना होगा बल्कि हमारे समाज और हमारे पुरुष वर्ग को भी सोचना होगा। आख़िर स्त्रियाँ ही आबादी बढ़ाने और रोकने का दंड क्यों पाती है? औरतों की ही नसबंदी क्यों, पुरुष की क्यों नहीं? क्या यह नसबंदी पुरुषों के लिए ज्यादा सुरक्षित और कारगार नहीं है? क्यों आज भी भारत की तमाम वर्ग की महिलाएँ ही नसबंदी कराती हैं पुरुष नहीं? स्त्रियों की नसबंदी का ऑपरेशन पुरुषों की तुलना में जटिल और मुश्किल होता है। जबकि पुरुष की नसबंदी स्त्रियों की तुलना में बहुत सरल है जिसमें न तो कोई जटिल प्रक्रिया है न किसी तरह का कोई ख़तरा न ही ऑपरेशन के बाद लम्बे अवधि तक विश्राम की आवश्यकता।      

आख़िर औरतों पर ही संतानोत्पत्ति और नसबंदी का सारा कारोबार आधारित क्यों है? क्या बिना पुरुष के स्त्रियाँ बच्चा पैदा करती हैं? जब पुरुष के बिना संतानोत्पत्ति संभव नहीं है फिर नसबंदी पुरुष क्यों नहीं कराते? न सिर्फ अशिक्षित बल्कि शिक्षित पुरुषों का भी मानना है कि नसबंदी कराने से पौरुष ताकत में कमी आ जाती है। जबकि वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका है कि यह सच नहीं सिर्फ अज्ञानता है। पुरुष नसबंदी के कई फायदों में एक अहम् फायदा यह भी है कि किसी कारण से यदि फिर से संतान चाहे तो संतान संभव है। लेकिन स्त्री के मामले में ऐसा संभव नहीं होता है।

हमारी परम्पराओं का हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है । अपनी पढ़ाई के दौरान मुझे परिवार नियोजन विषय पर कुछ महिलाओं से बात चीत करने का मौक़ा मिला था जिसमें एक स्तब्ध करने वाला सच मेरे सामने आया। एक स्त्री ने बताया कि उसके पति के नसबंदी कराने के बाद भी उसे बच्चा हुआ। डॉक्टर ने कहा कि सामान्यतः ऐसा नहीं होता है लेकिन कभी-कभी कुछ अपवाद हो जाते हैं, जिसमें वे भी हैं। डॉक्टर के कहने के बाद भी उसका पति उसके चरित्र पर शक करता रहता है। एक दूसरी स्त्री जो काफी पढ़ी लिखी थी उसका कहना था कि अगर किसी कारण उसके पति का नसबंदी ऑपरेशन असफल हुआ और वह गर्भवती हो गई तो आजीवन उसे शक से देखा जाएगा। इससे बेहतर है कि स्त्री स्वयं ही ऑपरेशन करा ले। एक छोटा सा तो ऑपरेशन है आजीवन एक डर और इल्जाम से तो बचा जा सकता है। एक अविवाहित स्त्री जो बहुत आधुनिक थी, का कहना था दो बच्चे के बाद ऑपरेशन करा लो, क्या पता पति का ऑपरेशन सफल न हुआ तो एक और बच्चे का बोझ सहो, या फिर गर्भपात काराओ, इतने झमेले से तो अच्छा है कि स्त्री ही ऑपरेशन करा कर हमेशा के लिए एक झंझट से मुक्त हो जाए और पति के शक से भी छुटकारा रहेगा। यूँ तो सभी स्त्रियों की राय यही थी कि स्त्री को ही ऑपरेशन करा लेना चाहिए अन्यथा फिर से गर्भवती होना या गर्भपात कराना पड़ सकता है।  

इन सभी पहलुओं पर विचार करें तो कहीं न कहीं हमारा समाज, हमारी सोच, हमारी मान्यताएँ और परम्पराएँ इन सबके लिए दोषी है। हमारा पुरुष समाज जो स्त्री का चरित्र उसके बदन में खोजता है और उसके बदन पर ही अपना चरित्र गँवाता है फिर भी उस स्त्री के लिए एक ज़रा सा जहमत उठाना नहीं चाहता; जबकि पुरुष नसबंदी में न पीड़ा होती है न वक़्त लगता है, ऑपरेशन के एक घंटे के बाद ही पुरुष काम पर वापस जा सकता है। सरकारी प्रचार प्रसार के बाद भी पुरुष इस बात को समझ नहीं पाता कि नसबंदी के बाद भी उसकी यौन-शक्ति वैसी ही रहेगी। कोई भी पुरुष सहजता से ऑपरेशन नहीं कराता। यह सिर्फ अशिक्षित समाज का चेहरा नहीं बल्कि शिक्षित और प्रगतिशील बिरादरी का भी चेहरा है।

हमारे समाज की संकीर्ण मानसिकता का परिणाम है कि न सिर्फ वे 14 स्त्री मारी गई बल्कि 14 परिवार बिखर गया और उनके बच्चे माताविहीन हो गए। इस घटना को दुर्घटना या लापरवाही कह कर आरोपी चिकित्सकों को कटघरे में खड़ा किया जाए या कानूनी सज़ा दी जाए या फिर मृत स्त्रियों के परिवार को मुआवजा दिया जाए; पर क्या इन सबसे उन मृत औरतों को वापस लाया जा सकता है ? क्या स्त्रियों के साथ हो रहे इन अपराधों और अमानवीय अत्याचारों का खात्मा कभी संभव है?  क्या यूँ ही शोषित वर्ग की शोषित स्त्रियों की बली चढ़ती रहेगी? 

- जेन्नी शबनम (1. 12. 2014)

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Tuesday 7 October 2014

49. मेरे गाँधी, अपने गाँधी

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महात्मा गाँधी के बारे में जब भी सोचती हूँ तो एक अजीब सा आकर्षण होता है। उन्हें जितना पढ़ती हूँ और भी ज्यादा जानने-समझने की उत्कंठा होती है। न जाने क्यूँ गाँधी जी का व्यक्तित्व सदैव चुम्बकीय लगता है मुझे। इतना सहज और सरल जीवन यापन करने वाला वृद्ध, महान चिन्तक ही नहीं बल्कि हमारे देश के सामाजिक राजनैतिक विचारधारा का मार्गदर्शक भी है। 

कुछ माह के लिए जब मैं शान्तिनिकेतन में रही थी तब वहाँ टैगोर के सभी पाँच घरों में घूमने गई, जिनमें से एक घर 'श्यामली' है, जो पूर्णतः मिट्टी का बना है। जब गाँधी जी शान्तिनिकेतन आए थे तब इसी घर में ठहरे थे। उस समय की स्मृतियाँ गाँधी जी और रबिन्द्रनाथ टैगोर की तस्वीर के रूप में वहाँ अब भी संजोई हुई है। श्यामली में जब पहली बार मैं गई तो लगा जैसे गाँधी जी यहीं कहीं आस पास होंगे और अचानक आकर कहेंगे ''बहुत थक गई होगी, हाथ पाँव धो लो, थोड़ा फल खा कर थोड़ी देर आराम कर लो, फिर उठ कर चरखा कातेंगे। '' 

मुझे मालूम है गाँधी जी को पूर्णतः समझ पाना मेरे लिए असंभव है। निःसंदेह अपने पिता के कार्य और विचार को जानने और समझने के कारण ही गाँधी जी को इतना भी समझ पाई हूँ। जब भी गाँधी जी के बारे में सोचती हूँ मुझे मेरे पिता याद आते हैं। यूँ मेरे पिता की स्मृतियाँ अब क्षीण होने लगी है, परन्तु जो भी यादें शेष हैं उनमें मेरे पिता के विचार, सिद्धांत और जीवन शैली है, जो वक़्त-वक़्त पर मुझे राह दिखाते रहे हैं। सच है कि गाँधीवाद की मान्य परिभाषा के हिसाब से मैं गाँधीवादी नहीं लेकिन मेरी नज़र में जो गाँधीवाद है उसके हिसाब से जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण गाँधीवादी है। मुमकिन है मेरे पिता का प्रभाव मुझपर पड़ा हो और शायद इसी कारण सोचने का तरीका भी ऐसा हो गया हो। 

मेरे पिता जैसे जीते थे वही उनका विचार था और जो उनका विचार था वही उनका जीवन जीने का तरीका। आचार्य कृपलानी, आचार्य विनोबा भावे, प्रो. गोरा आदि के नज़दीक रहे मेरे पिता पूरी तरह गाँधीवादी विचार के समर्थक थे। उनका गाँधीवादी सोच, सोच-विचार कर अपनाई गई जीवन शैली नहीं थी बल्कि उनके जीवन जीने का तरीका था जो उनके अपने विचार से प्रेरित था।           
मेरे पिता गाँधी जी के विचार से कब क्यों और कैसे प्रभावित हुए, यह तो मालूम नहीं। लेकिन मेरी दादी से अपने पिता के बचपन की कहानी जब सुनती तो आश्चर्य होता था। मेरे पिता बचपन से ही ऐसे जीवन जीते थे जिसे गाँधीवाद कहा जा सकता है। चाहे वो खानपान हो, पहनावा हो, समाज कल्याण की बात हो या फिर अधिकार और कर्तव्य की बात। मेरे पिता का अपना विचार था और जीवन जीने का अपना तरीका जो बहुत कुछ गाँधी जी के विचारों-सा था। मेरे पिता कई बार लोगों के द्वारा असमाजिक भी घोषित किए गए। क्योंकि कुछ ऐसी परम्पराएँ जो उनके मुताबिक़ अनुचित थी, किसी भी कीमत पर वे उसमें हिस्सा नहीं लेते थे। सड़ी गली परम्पराओं के विरुद्ध वे सदैव रहते थे। प्राकृतिक चिकित्सा को वे अपने जीवन में उतार चुके थे। मेरे पिता कई बार लोगों की नज़र में उपहास का कारण भी बनते थे, क्योंकि उस समय मेरे पिता का सोच आम परंपरावादी लोगों के सोच से बिलकुल अलग होता था। खुद खादी पहनते रहे और घर में भी सभी का खादी पहनना अनिवार्य था। सादा जीवन उच्च विचार के वे अनुयायी थे और दिखावा से हमेशा दूर रहते थे।

मेरे पिता के अपने लिए बहुत सारे नियम थे। वे चाहते थे कि हम सभी उन नियमों को माने लेकिन जबरन नहीं, बल्कि हमारी सोच ऐसी ही विकसित हो मेरे अपने बचपन में कई बार मुझे अजीब लगता था और कई बार गुस्सा भी आता था जंक फ़ूड खाने की मनाही थी ज़रूरत से ज्यादा कपड़े हमारे पास नहीं होते थे गाँव के स्कूल से मेरे भाई की शिक्षा हुई, और मैं भी कुछ वर्ष गाँव में रह कर पढ़ाई की गाँव में जैसे मेरे पिता की आत्मा बसती थी गाँव के लोगों पर मेरे पिता के विचार का इतना प्रभाव पड़ा कि कई लोगों ने परिवार नियोजन को अपनाया था। उन्होंने गाँव में स्कूल खुलवाया तो गाँव के लोग शिक्षा की ओर अग्रसर हुए  उन्होंने जाति और वर्ग भेद को मिटायाअंधविश्वास को प्रमाण के साथ साबित कर उसके उन्मूलन की बात वे करते थे मेरे पिता के विचारों में समाजवाद, साम्यवाद, गाँधीवाद और नास्तिकता का संयोग था। वे शुद्ध शाकाहारी थे और इसके प्रसार में सदैव लगे रहते थे उनके ही अथक प्रयास से गाँव में बिजली आई उन्होंने गाँव में लाइब्रेरी की स्थापना की आधुनिक वैज्ञानिक तरीके से खेती करने के लिए ग्रामीणों के बीच कई कार्यक्रम का आयोजन किया

गाँधी जी के लिए जितना महत्वपूर्ण था देश के प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करना उतना ही महत्वपूर्ण था किसी पशु की देखभाल करना या फिर किसी बच्चे के साथ खेलना या किसी आम गरीब की कोई समस्या सुनना जीवन का हर काम गाँधी जी के लिए समान रूप से महत्व रखता था गाँधी जी कहते थे ''ईश्वर सत्य है'', परन्तु प्रोफ़ेसर गोरा से इस पर चर्चा और बहस के बाद गाँधी जी ने कहा ''सत्य ही ईश्वर है'' मेरे अपने विचार से गाँधी जी का अपनी समझ को बदलना एक क्रान्ति जैसी बात है, जिसे आज हर इंसान को समझना चाहिए  

महात्मा गाँधी युग पुरुष थे सत्य अहिंसा के मार्ग पर चलकर सम्पूर्ण मानव और समाज के उत्थान की अवधारणा और सर्वोदय की कामना गाँधी जी का लक्ष्य था गाँधीजी न सिर्फ महान चिन्तक थे बल्कि मानवतावादी भी थे जीव जंतुओं के प्रति प्रेम और जाति धर्म से परे इंसानियत धर्म के अनुयायी गाँधी जी सदैव खुद पर परीक्षण और प्रयोग करते रहे और अंतिम सत्य की तलाश करते रहे। मेरे विचार से जिसे गाँधीवाद कहा गया वह कोई कठिन नियम या परिभाषित सोच नहीं है बल्कि जिन विचारों को मान कर गाँधी जी सहज जीवन जीते थे वही गाँधीवाद कहलाया। यूँ गाँधी जी यह कभी नहीं चाहते थे कि गाँधीवाद कहकर कोई ख़ास नियम बनाया जाए जो लोगों पर प्रभावी हो गाँधी जी शुरू से आत्म चिंतन और आत्मा नियंत्रण की बात करते रहे सत्य और अहिंसा उनके दो ऐसे शस्त्र थे जिनके द्वारा कोई भी जंग जीतना कठिन भले हो नामुमकिन नहीं होताभारत की आज़ादी का जंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है गाँधी जी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने आज़ादी से पूर्व और आज़ादी के बाद थे गाँधी जी मनुष्य की क्रियाशीलता पर ज्यादा जोर देते थे और मनुष्य का समग्र उत्थान चाहते थे 

गाँधी जी के कुछ कथन जो मुझे प्रभावित करते हैं -

''अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न कोई संगठन हो सकता है''. (महात्मा, भाग - 2, पृष्ठ 251) 

''अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्त्तव्य है''. (महात्मा, भाग 2, पृष्ठ 367)


''गाँधीवाद जैसी कोई विचारधारा नहीं है।'' ''गाँधीवाद नाम की कोई वस्तु है ही नहीं और न मैं अपने पीछे कोई सम्प्रदाय छोड़ जाना चाहता हूँ। मेरा यह दावा भी नहीं है कि मैंने कोई नए तत्व या सिद्धांत का आविष्कार किया है। मैंने तो केवल जो शाश्वत सत्य है, उसको अपने नित्य के जीवन और प्रश्नों पर अपने ढंग से उतारने का प्रयास किया है।'' (कहानियों में सत्य की साधना - डॉ. 
विनय)

मुझे ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं हमसे बहुत बड़ी चूक हुई है। अन्यथा आज़ादी के बाद समाज का इतना रुग्ण रूप देखने को न मिलता गाँधी और गाँधी के सिद्धांतों को एक सिरे से खारिज कर देने का परिणाम है कि आज मनुष्य इंसानियत की हर कसौटी से बाहर निकल चुका है हिंसा और असहिष्णुता का खामियाजा आज पूरा देश भुगत रहा है समाज में न स्त्री का कोई सम्मान है न आम आदमी का हालात बाद से बदतर होते जा रहे हैं संवेदनाएँ धीरे-धीरे मर रही है। हर आदमी डरा हुआ है और दूसरों को डरा रहा है अधर्म अपने परकाष्ठा पर पहुँच चुका है। पेट में भोजन नहीं, रहने को मकान नहीं लेकिन धर्म जाति के नाम पर आज का युवा मरने मारने पर आमादा है। भूख, गरीबी, शिक्षा, सभी का बजारीकरण और राजनीतिकरण हो चुका है  

गाँधी जी के विचार, सिद्धांत और सोच को एक बार पुनः स्थापित करने की ज़रुरत है ताकि एक सुखद, खुशहाल और संतुलित समाज बन सके। गाँधी जी ने कहीं पर कहा था कि अगर बिना हिंसा के साम्यवाद आता है तो उसका स्वागत है मेरा अपना विचार और विश्वास है कि अहिंसक साम्यवादी समाज से ही एक निपुण, पूर्ण और सफल देश बन सकता है जहाँ ऊँच नीच और स्त्री पुरुष का भेदभाव न होगा, पशु-पक्षी को भी जीने का हक़ मिलेगा; और इसके लिए गाँधी जी को एक बार फिर से जीवन में उतारना होगा। गाँधी जी की प्रासंगिकता को नाकारा नहीं जा सकता है और यही एक मात्र अंतिम उपाय बचा है जिससे हम अंतिम लक्ष्य पर पहुँच कर अमन चैन से जीवन यापन कर सकते हैं।

- जेन्नी शबनम (2. 10. 2014)

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