Thursday, September 14, 2017

58. हिन्दी बिटिया को अंग्रेजी की गुलामी से बचाओ

सुबह का व्यस्ततम समय, एक अनजाने नंबर से मोबाइल पर फ़ोन ''मे आई टॉक टू ...।'' मैंने कहा ''हाँ, बोलिए''! उसने कहा ''आई वांट टू डिस्कस ऐन इन्वेस्टमेंट प्लान विथ यू।'' मैंने कहा माफ़ कीजिएगा मुझे नहीं चाहिए। उसकी ज़िद कि मैं न लूँ पर सुन तो लूँ। बहुत तहज़ीब से उसने कहा '''इफ यू फ्री देन आई विल एक्सप्लेन रिगार्डिंग सम इन्वेस्टमेंट।'' मैंने कहा ''बहुत धन्यवाद, ज़रूरत होगी तो मैं आपसे समपर्क करुँगी'', और उसके अधूरे वाक्य ''थैंक्स मैड s...।'' एक दिन घर के नंबर पर फ़ोन आया ''मे आई टॉक टू ...।'' मैंने कहा ''वो घर में नहीं है'', कोई आवश्यक काम हो तो बताएँ।" उसने कहा ''आई ओनली टॉक टू हिम बिकॉज़ दिस कॉल इज़ रिगार्डिंग हिज़ क्रेडिट कार्ड्स।'' मैंने दोबारा कॉल करने का वक़्त बता दिया।  

बीते हिन्दी-पखवाड़े में ऐसे ही असमय मेरे लिए फ़ोन आया, सधा हुआ अंग्रेजी लहजा ''में आई टॉक टू ...'', उस दिन किसी कारण से मेरा मन खिन्न था और किसी से बात करने की इच्छा नहीं थी, मैंने कहा ''... मैडम घर में नहीं हैं, आप शाम को 6 बजे फ़ोन कीजिए।'' उसने अंग्रेजी में पूछा कि आप कौन बोल रही हैं। मैंने कहा ''साहब हम आपकी अंग्रेजी नहीं समझते हैं, हम यहाँ काम करते हैं चौका-बर्तन, आपको ज़रूरी है तो मैडम के मोबाइल पर बात कर लीजिए नहीं तो शाम को फ़ोन कीजिए।'' उसने कहा ''सॉरी, आई डिस्टर्ब यू।'' मुझे बेहद हँसी आई कि ये कैसे अंग्रेज पैदा हुए हैं देश में जो एक शब्द हिन्दी नहीं बोल सकते? उनके सॉरी को कामवाली समझ रही होगी उसे कैसे पता। कहना ही था तो ''क्षमा कीजिए'' या फिर ''ठीक है'' इतना तो बोल ही सकता था वो। एक कामवाली के कहने पर भी अंग्रेजी मे ही ''सॉरी'' बोल रहा है।  

अंग्रेजी जैसे हर भारतीयों की भाषा बन गई हो। फ़ोन करने वाला कैसे यह उम्मीद कर सकता है कि फ़ोन उठाने वाले को अंग्रेजी समझ आएगा ही? कम से कम दिल्ली और अन्य हिन्दी भाषी प्रदेश में रहने वाला हर कोई हिन्दी बोलना जानता है। मुमकिन है कि प्राइवेट और कॉरपोरेट सेक्टर में तहज़ीब का मतलब अंग्रेजी बन चुका हो। फिर भी यहाँ अब भी ऐसे भारतीय हैं जो कम से कम घर में तो हिन्दी बोलते हैं। शिक्षा पद्धति अंग्रेजी हो गई है फिर भी हिन्दी को जड़ से उखाड़ा नहीं जा सकता है।  

एक बार किसी बड़े रेस्तराँ में बच्चों के साथ खाना खाने गई, वेटरअंग्रेजी में ही बोल रहा था। अमूमन हर रेस्तराँ में वेटर को अंग्रेजी में ही बोलना होता है। मैं उससे हिन्दी में मेनू पूछ रही थी और वो अंग्रेजी में जवाब दे रहा था। बेवज़ह कोई अंग्रेजी बोलता है तो मुझे वैसे भी बड़ा गुस्सा आता है। मैंने उससे कहा क्या आप भरत से ही हैं या कहीं और से आए हैं? उसने अंग्रेजी में कहा कि वो उत्तर प्रदेश से है। मैंने कहा कि फिर आप हिन्दी में जवाब क्यों नहीं दे रहे? उसने कहा ''सॉरी मैडम'' फिर आधी हिन्दी और आधी अंग्रेजी में मुझे बताने लगा। मुझे उस पर नहीं खुद पर तरस आया कि भारत जो अंग्रेजी का गुलाम बन चुका है, मैं हिन्दी बोले जाने की उम्मीद क्यों रखती हूँ।  

मुझे याद है एक बार एक बहुत अच्छे प्रकाशक के पुस्तक विमोचन समारोह में गई थी। जहाँ बहुत सारी पुस्तकों का विमोचन होना था। इनमें एक कवयित्री जो पेशे से डॉक्टर थी की हिन्दी काव्य पुस्तक का विमोचन हुआ। पुस्तक के अनावरण के बाद उनसे कुछ कहने के लिए कहा गया। वो हिन्दी में कविता लिखती हैं लेकिन अपना सारा वक्तव्य अंग्रेजी में दिया। मुझे बेहद आश्चर्य और क्षोभ हुआ। बार-बार मेरे मन में आ रहा था कि उनसे इस बारे में कहूँ। पर मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन बेहद बुरा महसूस हुआ था।  

हिन्दी को लेकर एक और मेरा निजी अनुभव है जो मुझे अपने हिन्दी भाषी होने के कारण पीछे कर गया। विवाहोपरांत मैं दिल्ली आई तो सोचा कि मैं पी एच. डी. कर लूँ। शान्तिनिकेतन में श्यामली खस्तगीर एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिनके मैं बहुत ज्यादा नज़दीक थी। उन्होंने लेडी इरविन कॉलेज में किसी से (शायद प्रिंसिपल) मिलने के लिए कहा और पत्र भी दिया। मैं जब मिली तो वो बहुत खुश हुईं लेकिन उन्होंने बताया कि यहाँ सारी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से होती है और शोध कार्य पूरी तरह अंग्रेजी में होगा, चूँकि मेरी समस्त शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई है अतः बहुत मुश्किल हो सकता है। मैंने कहा कि शोध तो अंग्रेजी में लिख लूँगी लेकिन वाइवा में मुश्किल हो सकती है क्योंकि मुझमें इतनी क्षमता नहीं कि धारा-प्रवाहअंग्रेजी बोल सकूँ। अंततः मैंने भागलपुर विश्वविद्यालय से शोध कार्य किया जहाँ वाइवा हिन्दी में हुआ।  

अक्सर दिमाग में आता है कि आखिर अंग्रेजी की गुलामी कब तक? क्या अब भी वक़्त नहीं आया कि अन्य देश की भाँति हमारे देश की भी अपनी एक ही भाषा हो। अंग्रेजी को महज़ अन्य विदेशी भाषा की तरह पढ़ाया जाए। निःसंदेह ऐसा होना बेहद कठिन भरा होगा लेकिन असंभव नहीं। भारत सरकार निम्न 3 कदम सख्ती से उठाए तो मुमकिन है हमारी हिन्दी देश की राज्य भाषा से राष्ट्र भाषा बन जाएगी और जन-जन तक लोकप्रिय हो जाएगी।  

1.  
देश के हर विद्यालय में हिन्दी को अनिवार्य कर दिया जाए और सभी राज्य की उनकी भाषा को उनकी द्वितीय भाषा कर दी जाए। अंग्रेजी कोई पढ़ना चाहे तो एक विषय की तरह पढ़ सकता है।  

2.  
जब नर्सरी की पढ़ाई शुरू होती है तब से यह नियम लागू किया जाए, ताकि पहले से जो बच्चे अंग्रेजी में पढ़ रहे हैं वो अपनी पढ़ाई पुराने तरीके से ही पूरी करें। नए बच्चे जब शुरुआत ही ऐसे करेंगे तो कहीं से भी कोई दिक्कत नहीं आएगी।  

3.
जिन विषयों की किताबें अंग्रेजी में है चाहे वो विज्ञान की हो या मेडिकल इंजिनीयरिंग या विधि की, सभी का हिन्दी अनुवाद करा दिया जाए। फिर रोजगार में भी हिन्दी माध्यम वालों को कोई मुश्किल नहीं होगी।  

13 साल लगेंगे पूरी शिक्षा पद्धति को बदलने में लेकिन इससे हमारे देश की अपनी भाषा होगी और अंग्रेजियत की गुलामी से मुक्ति मिलेगी। हिन्दी भाषी लोगों को नौकरी में कितना अपमान सहना पड़ता है यह मैंने कई बार देखा है। न सिर्फ नौकरी में बल्कि घर में भी सदैव अपमानित किया जाता है। हिन्दी और अंग्रेजी के कारण देश दो वर्ग में बँट गया है। अमूमन हिन्दी माध्यम के स्कूल सरकारी स्कूल होते हैं जहाँ गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं और अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अमीरों के बच्चे। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे विचार, व्यवहार और संस्कार से अंग्रेजी की गुलामी ख़त्म नहीं हो रही है, यह बेहद अफसोसजनक है। हम भारतवासियों को अपनी हिन्दी पर गर्व होना चाहिए और हिन्दी के सम्मान में हर संभव प्रयास करना चाहिए। आखिर अंग्रेज भाग गए तो अंग्रेजी को क्यों नहीं भगा सकते।  

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2017)  
(हिन्दी दिवस) 
   
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Friday, July 21, 2017

57. ट्यूबलाईट फ्लॉप पर सलमान सुपरहिट


''मैं अपने यकीन से अपने भाई को भी वापस ले आऊँगा।'' वास्तविक जीवन में हमेशा जीतने वाला, कई विवादों में उलझा हुआ, बार-बार प्रेम में पड़ने वाला, लड़कियों का क्रश, तो लड़कों के लिए मसल्स मैन, फिल्म निर्माताओं के लिए पैसा कमाने की मशीन 'सलमान खान' जब ट्यूबलाईट में यह डाॅयलाग बोलता है, वह यकीन उसके चेहरे पर दिखाई देता है फिल्म फ्लॉप हुई है फिर भी तेजी से बढ़ती उम्र के इस हीरो की यह फ़िल्म गौर करने लायक है  

ट्यूबलाईट के रिलीज़ होने से पहले फ़िल्म प्रेमियों में हलचल थी। सलमान की लगभग सभी फिल्में हिट होती है भले ही वे किसी भी भूमिका में हों। अमूमन उनका चरित्र संवेदनशील होता है और अगर मारधाड़ भी कर रहे, तो वह भी कहानी के अनुरूप आवश्यक होता है। उनकी सभी फिल्में दर्शकों के अनुकूल होती है और सपरिवार फिल्म देखी जा सकती है। न तो उनकी फिल्मों में नंगापन होता है न तो फूहड़पन। फिल्म में अगर आइटम सॉन्ग है तो भी वो फूहड़ न लग कर मज़ेदार लगता है।  

ट्यूबलाईट के रिलीज़ होने के दिन फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने से खुद को रोक नहीं पाई। सुबह साढ़े नौ बजे का शो था, तो मुमकिन है इस कारण भीड़ बहुत नहीं थी, हॉल में कुछ सीट खाली भी रह गई।सलमान के स्क्रीन पर आते ही हमेशा की तरह युवा दर्शक ताली भी बजाए और खुश भी हुए। फिल्म क्रिटिक्स को पढ़ने से पता चला कि इस फिल्म को दर्शकों का उतना प्यार नहीं मिला जितना सलमान खान के नाम से मिलता है। मैं कोई कारण नहीं समझ पाई कि इस फिल्म के पसंद न किए जाने के पीछे की वजह क्या है। फिल्म का चित्रांकन, कहानी, पटकथा, लोकेशन, साज-सज्जा सभी बहुत आकर्षक और कहानी के अनुरूप है। कहानी बहुत छोटी है; लेकिन बेहद प्रभावशाली है। मेरे विचार से सलमान खान के सभी फिल्मों में सबसे ऊपर का स्थान मैं इस फिल्म को दूँगी; सलमान की भावनात्मक अदाकारी और मासूमियत के कारण।
  

ट्यूबलाईट एक भोले-भाले बच्चे लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) की कहानी है जो शारीरिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ है लेकिन मंदबुद्धि का है। कोई भी बात वह थोड़ी देर से समझता है और किसी भी चुनौती से घबरा जाता है, इस लिए सभी उसे ट्यूबलाईट कहते हैं। लक्ष्मण अपने भाई भरत (सुहेल खान) के साथ कुमाऊँ की एक शहरनुमा बस्ती जगतपुर में रहता है। वे अनाथ हैं अतः एक बुजुर्ग, जिन्हें वे बन्नी चाचा (ओम पुरी) कहते हैं, उनकी परवरिश करते हैं। कहानी में आज़ादी से पूर्व का भारत दिखाया गया है जब गाँधी जी लक्ष्मण के शहर आते हैं और लक्ष्मण उस समय स्कूल का विद्यार्थी है। गाँधी जी द्वारा कही गई बात वो मन में बैठा लेता है कि ''यकीन रखने से सब कुछ होता है, खुद पर यकीन हो, तो चट्टान भी हिलाई जा सकती है और यह यकीन दिल में होता है।'' लक्ष्मण के यकीन को पहली बार बल तब मिलता है जब शहर में एक जादूगर (शाहरुख़ खान) आता है। जादू दिखाने के दौरान जादूगर लक्ष्मण से एक बोतल को दूर से हिलाने लिए कहता है। दर्शक इस बात पर ट्यूबलाईट कह कर लक्ष्मण का मज़ाक उड़ाते हैं। काफ़ी कोशिश के बाद बोतल हिल जाता है। यूँ यह जादूगर के हाथ की सफाई है; लेकिन जादूगर उससे कहता है कि उसने अपने यकीन की ताकत से बोतल को हिलाया है। इसके बाद लक्ष्मण में आत्म विश्वास जागता है और कुछ भी कर सकने का यकीन उसमें प्रबल हो जाता है। उसकी आँखों में अपनी पहली सफलता पर विश्वास के आँसू आ जाते हैं और वह कहता है कि वह ट्यूबलाईट नहीं है।
  

1962 में भारत-चीन के युद्ध की पृष्ठभूमि पर फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है। भरत का चयन युद्ध में सैनिक के रूप में हो जाता है परन्तु लक्ष्मण का नॉक-नी (knock knee) के कारण चयन नहीं हो पाता है। लक्ष्मण का खुद पर से यकीन न टूटे इस लिए भरत उससे कहता है कि उसे जगतपुर का कप्तान बनाया गया है जिसका काम है इलाके की हर खबर रखना और जानकारी देना। युद्ध छिड़ चुका है और भरत जंग में शामिल होने चला जाता है। एक चीनी बच्चा अपनी माँ के साथ जगतपुर में रहने के लिए आता है। लक्ष्मण सबको सचेत करने के लिए बताता है कि चीनी आ गए हैं। फिर उसे पता चलता है कि उस चीनी स्त्री के परदादा चीन से आकार भारत में बस गए थे, अतः वे भी सबकी तरह भारतीय हैं। पर बस्ती के लोग माँ-बेटे को परेशान करते हैं और लक्ष्मण उन्हें बचाता है; क्योंकि वह उस बच्चे से प्यार करने लगता है। गाँधी जी की कही हुई बात पर उसे यकीन है कि ''अगर दिल में ज़रा भी नफरत रहेगी, तो तुम्हारे यकीन को खा जाएगी''। 

युद्ध के दौरान भरत की मृत्यु की सूचना आती है; लेकिन लक्ष्मण को यकीन है कि युद्ध ख़त्म होगा और भाई लौटेगा। लक्ष्मण कहता है ''मैं अपने यकीन से अपने भाई को भी वापस ले आऊँगा''। बन्नी चाचा से वह पूछता है कि और यकीन उसे कहाँ मिलेगा; क्योंकि भाई को लाने के लिए उसे बहुत यकीन चाहिए। बन्नी चाचा जानते हैं कि यकीन से कोई चमत्कार नहीं होता है। फिर भी मासूम लक्ष्मण का हौसला बढ़ाने के लिए कहते हैं ''गाँधी जी के कदमों पर चलो यकीन आएगा''। गाँधी जी के आदर्शों की फ़ेहरिस्त बना कर बन्नी चाचा उसे देते हैं, ताकि उसका खुद पर यकीन और बढ़ जाए। इसी बीच एक संयोग होता है। लक्ष्मण पूरे यकीन से चट्टान को खिसकाने की कोशिश करता है; क्योंकि गाँधी जी की बात को वह सच मानता है और उसे यकीन है कि वह चट्टान को खिसका देगा। उसके इस कोशिश के दौरान भूकंप आ जाता है और ज़मीन चट्टान सब काँपने लगता है। बस्ती वाले भी यकीन करने लगते हैं कि लक्ष्मण अपने यकीन से चट्टान को खिसका दिया है। किसी ग़लतफ़हमी के कारण भरत की मृत्यु की गलत सूचना आ गई थी। अब भरत वापस लौटता है। लक्ष्मण को पूर्ण विश्वास है कि उसके यकीन के कारण ही उसका भाई वापस लौटा है। 

आज जो परिस्थितियाँ हैं उसके सन्दर्भ में भी यह फिल्म प्रासंगिक है। भरत-चीन युद्ध के दौरान जिस तरह से सभी चीनी को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था अब वही स्थिति पुनः बन गई है। कोई भी जो यहाँ जन्म लिया है वह भारतीय है उस पर संदेह नहीं करना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। एक तरह से इस फिल्म का सन्देश यह भी है।  

हमारा समाज किसी फिल्म में क्या देखना चाहता है; इस विषय पर बहुत गंभीर सोच और बहस की ज़रूरत है। फिल्म का हीरो कभी हार नहीं माने, दस-दस गुंडों से अकेले भीड़ जाए, तो दर्शक सीटी बजाते हैं। अगर वही हीरो विवश या असहाय दिखता है, तो आज का दर्शक उसे अस्वीकार कर देता है। भले ही हीरो के उस किरदार में भावुकता और संवेदनाएँ भरी हुई हों या उस फिल्म की कहानी की माँग हो। आज के दर्शक हीरोइज्म में यकीन करते हैं और शारीरिक रूप से दबंग हीरो को देखने की चाह रखते हैं। मुमकिन है बजरंगी भाई जान की तरह इस फिल्म में भी सलमान चीन की सरहद को पार कर जाते या फिर चीनियों से युद्ध करके भाई को छुड़ा कर ले आते, तो शायद यह भी हिट फिल्मों में शुमार हो जाती।  

ट्यूबलाईट का फिल्मांकन, तो बेजोड़ है ही कलाकारों का अभिनय भी बहुत उम्दा है। सुहेल खान ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। सलमान खान के चेहरे पर इतनी मासूमियत और सौम्यता है कि किसी का भी दिल जीत ले। भावुकता और भोलापन सलमान के अभिनय में कहीं से भी जबरन नहीं लगता बल्कि सहज लगता है। सुहेल खान पहली बार इस फ़िल्म में मुझे अच्छे लगे हैं। सलमान और सुहेल असल ज़िन्दगी में भी भाई हैं, शायद इस कारण भी भाइयों के आपसी रिश्तों का दृश्य बहुत जानदार और भावुक बन गया है। शाहरुख खान ने अपनी छोटी-सी भूमिका में अच्छा प्रभाव छोड़ा है। ओम पुरी, तो यूँ भी एक उम्दा अभिनेता हैं, चाहे जिस भी चरित्र में वह हों। चीनी माँ-बेटे का किरदार भी दोनों कलाकारों ने बहुत अच्छा निभाया है।
  

आजकल बहुत अच्छी और प्रेरक कहानियों पर फिल्में बन रही हैं और उसे दर्शकों से सराहना भी मिल रही है। साथ ही मारधाड़ की फिल्में भी खूब नाम कमा रही है। इसलिए दर्शकों की नब्ज़ को पहचानना कई बार फिल्म निर्माता के लिए कठिन होता है। बहरहाल ट्यूबलाईट भले ही बॉक्स ऑफिस पर असफल कहलाए या सलमान के हिट फिल्मों में इसका नाम शामिल न हो, भले ही सफलता की दौड़ में सलमान खान एक बार हार गए हों, लेकिन सलमान के अभिनय के लिए निश्चित ही यह फिल्म याद रखी जाएगी।     

- जेन्नी शबनम (17. 7. 2017)

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Saturday, July 1, 2017

56. बन्दूक-बन्दूक का खेल

नक्सलवाद और मजहबी आतंकवाद में सबसे बड़ा बुनियादी फ़र्क उनकी मंशा और कार्यकलाप में है। आतंकवादी संगठन हिंसा के द्वारा आतंक फैला कर सभी देशों की सरकार पर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैंइनकी मांग न तो सत्ता के लिए है न बुनियादी जरूरतों के लिए है नौजवानों को गुमराह कर विश्व में एक ही मज़हब का वर्चस्व स्थापित करना इनका उद्देश्य है मजहबी आतंकवाद ने धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपने कब्जे में ले लिया है। नक्सलवाद इन आतंकी संगठनों से बिल्कुल विपरीत बुनियादी मांगों के लिए अस्तित्व में आया लेकिन आज नक्सलवाद का रूप क्रूरता के सभी हदों को पार कर चुका है इनकी मांग निःसंदेह जायज़ है पर तरीका अत्यंत क्रूरतम साम्यवादी सोच का ज़रा भी अंश नहीं इनमें। लाल झंडा उठा लेने से या लाल सलाम और कॉमरेड कह देने से इन्हें साम्यवादी नहीं कह सकते

दाँव पेंच हो या सत्ता की मज़बूरी, आज देश के हालात पर नियंत्रण सरकार के बूते से बाहर होती जा रही है। आम मध्यमवर्गीय जनता किसी तरह जीवन जी रही है। लेकिन खास आदमी डरा रहता है, उसे सरकारी तंत्र के साथ भी चलना है और हिंसक गतिविधियों से भी ख़ुद को बचाना है। निम्न वर्ग की जनता के पास कोई चारा नहीं है।मुख्य धारा से अलग कटे हुए आदिवासी प्रदेश के लोग अब इंसान नहीं रहे, एक ऐसे यांत्रिक मानव बन चुके हैं जिनके शरीर से चेतना निकाल कर बन्दूक जकड़ दी गई है, जिसका नियंत्रण उन कुछ गिने हुए लोगों के हाथ में है जो किसी नक्सलवादी सरगना या नेताओं के हाथ में है, जब जहाँ चाहे इस्तेमाल में ले आते हैं। सच्चाई यह है कि ये बेजुबान पेट की भूख़ के लिए ज़िन्दगी दाँव पर लगा बैठे हैं।
बन्दूक लेकर बन्दूक से लड़ाई हो तो सिर्फ बन्दूक नहीं ख़त्म होता, दोनों में से कोई एक मरता है, और जो मरता है वह भी हमारा ही कोई अपना है, चाहे वो सैनिक हो या नक्सलवादी। आज जब सैनिक मारे जाते हैं तो पूरा देश सुरक्षा-तंत्र की खामियाँ ढूँढता है। परन्तु हर दिन हजारों आदिवासी कभी भूख़ से मरते हैं, कभी नक्सली कह कर फ़र्जी मुठभेड़ में मार दिए जाते हैं, संदिग्ध नक्सली कह कर कितने असहाय और निरपराध जेल में बंद कर दिए जाते हैं।

हत्या करना, सरकारी संपत्ति को नष्ट करना, आतंक फैलाना, बस जैसे इतना ही मुद्दा रह गया है इन नक्सलियों का। आखिर क्यों ये मुख्य मुद्दा से दूर होकर सिर्फ हिंसा पर उतर आये हैं। आदिवासी क्षेत्रों से फैलते हुए सभी राज्यों में नक्सली अपना विस्तार कर रहे हैं। सरकारी शास्त्र को लूट कर अपनी शक्ति मज़बूत कर रहे हैं। आख़िर ये जंग किसके खिलाफ़ है? देश भी अपना सैनिक भी अपने, नक्सली भी इसी देश के वासी। क्या सरकार ग्रीन हंट के द्वारा नक्सली आन्दोलन ख़त्म कर पाएगी? सैनिकों को युद्ध का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि नक्सलियों से लड़ें। क्या आदिवासियों की बुनियादी ज़रूरत नक्सलियों की मृत्यु का पर्याय है?

नक्सलियों की क्रूरता और हिंसा को कोई भी देशवासी उचित नहीं कह रहा है। परन्तु सोच कई खेमों में बँट चुकी है। नक्सली के दिशा परिवर्तन या आदिवासी के उत्थान की बात जो कहता है उसे लाल झंडे के अन्दर मान लिया जाता है। लाल झंडा क्रान्ति की बात कहता है, न कि ख़ूनी-क्रान्ति का पक्षधर है या रहा है।

नक्सलवाद कोई एक दिन की उपज नहीं है, वर्षों की असंतुष्टि का प्रतिफल है जो हिंसा का क्रूरतम और आत्मघाती रूप ले चुका हैनक्सलबाड़ी में जब यह शुरू हुआ, उस समय हथियार और हिंसा की लड़ाई नहीं थी, बल्कि अधिकार की लड़ाई थी। धीरे-धीरे स्थिति और भी बदतर होती गई। किसी भी नक्सली क्षेत्र की बात करें तो वहाँ बुनियादी ज़रूरत भी पूरी नहीं होती है। सहनशक्ति तब तक रहती है जब इंसान ख़ुद भूखा रह जाए लेकिन उसका बच्चा कम से कम भर पेट खाना खा ले।और जब बच्चा भूख़ से दम तोड़ता है तो हथियार के अलावा उन्हें कुछ नहीं सूझता। क्रूरतम अपराध भले है लेकिन दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ तो हो जाता है। अब भी वक़्त है, उनकी ज़रूरत पूरी की जाए और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जाए तथा हर तरह का विकास हो। फिर कोई क्यों किसी की जान लेगा या देगा।

आख़िर क्या वजह है कि ये नक्सलवादी आदिवासी इलाकों में ही पनपते और जड़ जमाते हैं? आज़ादी के इतने सालों के बाद भी और राज्य के बँटवारे के बाद भी आख़िरकर छत्तीसगढ़, ओड़िसा और झारखंड में विकास क्यों नहीं हुआ? विकास गर हुआ भी तो आदिवासी इससे वंचित क्यों हैं? नक्सलवाद को जायज़ कोई नहीं कहता है जैसे अन्य अपराध है वैसे ही यह भी अपराध है गरीब आदिवासियों के लिए नक्सली बनना भी एक मज़बूरी है नक्सली न बनें तो नक्सली मार देंगे, बन गए तो पुलिस से मारे जाएँगे ज़िन्दगी तो दोनों हाल में दाँव पर लगी हुई है। आम आदमी कभी सरकार को या कभी नक्सली को दोषी कह कर पल्ला झाड़ लेता है, क्योंकि इस हिंसक लड़ाई में न तो नेता मरता है न कोई ख़ास आदमी यह तय है कि नक्सलियों की बुनियादी ज़रूरत जब पूरी होगी तब ही उनमें प्रजातंत्र में विश्वास जागेगा और तभी इस ख़ूनी क्रान्ति का खात्मा संभव है। 

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2017)

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Friday, August 5, 2016

55. आकांक्षाओं के बोझ तले सिमटता बचपन

वैश्विक बदलाव और तकनीकी उन्नति ने जहाँ एक तरफ जीवन को सरल और सुविधापूर्ण बनाया है, वहीं समाज में कुछ ऐसे भी बदलाव हुए हैं जिसके कारण जीवन की सहजता खो गई है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है दुनिया एक-एक कदम आगे नहीं बढ़ रही बल्कि लम्बी-लम्बी छलाँग लगा रही है। यह परिवर्तन बेहद गहरा और ज़बरदस्त है जिसके कारण जीवन मूल्य तो खो ही रहा है, मानवीय मूल्यों में भी गिरावट आ रही है। हर तरफ नज़र आ रहे सांस्कृतिक और सामाजिक क्षय के मूल में भी यही कारण है।  

आधुनिक समय में जहाँ एक तरफ प्रगति हो रही है और हम दुनिया को सम्पूर्णता में देख रहे हैं, वहीं कहीं न कहीं हमारा जीवन एकाकी और संकुचित होता जा रहा है। सामाजिक बदलाव के कारण कई परिस्थितियाँ ऐसी हो गई हैं कि असमय बच्चे बड़ों के गुण सीख रहे हैं, उनकी तरह व्यवहार कर रहे हैं। सीधे कहें तो इस दौर में बचपन कहीं खो गया है। हालाँकि आज के बच्चों को यह सब न तो अनुचित लगता है न ही अभिभावक उम्र से पहले बच्चों के बचपन के खो जाने को गलत मानते हैं। वे इसे सामान्य स्थिति समझते हैं।
नए जमाने के माता-पिता समाज और परिस्थिति के अनुरूप अपनी अतृप्त आकांक्षाओं को अपने बच्चे में पूरा होते हुए देखना चाहते हैं। फलतः उन पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है। माता-पिता की महत्वाकांक्षा बच्चे को कम उम्र में ही बड़ा बना देती है। प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता की भावना बचपन से ही बच्चों के मन में भर दी जाती है। अतः कम उम्र में ही बच्चा खुद को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर लेता है। छोटी कक्षा के बच्चे भी परीक्षाओं में एक-एक नंबर के लिए दबाव में रहते हैं। स्कूल के बाद ट्यूशन करना आज नितांत आवश्यक हो गया है अन्यथा बच्चा कक्षा में पिछड़ जाएगा। स्वयं को प्रतियोगिता के लिए तैयार कर अपने लक्ष्य को हासिल करना ही एकमात्र उनका ध्येय होता है।
प्रतियोगिता या स्पर्धा सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह गई है बल्कि खेल, गायन, नाट्य, नृत्य, कला, चित्रकारी, आदि हर क्षेत्र में है। खेलने की उम्र में बच्चे बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। माता-पिता अपनी समस्त अधूरी कामनाओं को बच्चों में पूरा करने के लिए जी-जान लगा देते हैं। हर बच्चा अपने आप में विशेष होता है लेकिन हर बच्चे हर क्षेत्र में निपुण हों यह आवश्यक नहीं। उनमें निपुणता लाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। एक तरफ पढाई में भी अव्वल आना है तो दूसरी तरफ प्रतियोगिताओं में भी सफल होना है। इन सबसे बच्चे इतने ज्यादा मासिक दबाव में होते हैं कि कभी-कभी यह दबाव उनके अवसाद की वज़ह बन जाता है।
आकांक्षाओं के बोझ तले सिमटते-सिमटते बच्चे समाज से इस कदर कट जाते हैं कि सामूहिकता के महत्व को ही भूल जाते हैं। सामूहिक खेल जो हमारे बच्चों के शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे, अब मैदानों से गायब हो गए हैं। आज के जमाने के बच्चों को अगर पढने-लिखने से थोड़ा भी समय बचा तो वे आधुनिक तकनीकी उपकरण जैसे कंप्यूटर, मोबाइल, आई पैड आदि में व्यस्त हो जाते हैं। अतः धीरे-धीरे वे एकाकी होने लगते हैं। बच्चों के पास अब न खेलने का समय है न नातेदारों से मिलने-जुलने का। उन्हें पिछड़ जाने का भय सताता रहता है। बच्चे बालक-बालिका न होकर जैसे वक़्त की कठपुतली बन गए हैं। इनका हर एक मिनट बँधा रहता है।   

अपनी और घरवालों की आकांक्षाओं की पूर्ती हेतु बच्चे का भविष्य दाँव पर लग जाता है। बच्चे जानते हैं हर हाल में उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल करना है। इस दौड़ में जो सफल हो गए वे अगली दौड़ के लिए जुट जाते हैं। जो बच्चे इसमें पिछड़ जाते हैं वे अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। कई बच्चों को जब प्रतियोगिता में पिछड़ने का अनुमान होता है तो वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। या फिर झूठ बोलना, चोरी करना, जालसाजी करना आदि गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं।

महत्वाकांक्षाएँ होना आवश्यक है जीवन के लिए, वरना जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं मिलती है। लेकिन आकांक्षाएँ ऐसी भी न हों कि बच्चों का बचपना ही खो जाए और वे उम्र से पहले ही इतने समझदार हो जाएँ कि ज़िन्दगी उलझ जाए और जीवन को सहजता से न जी सकें। आकांक्षा बच्चे के मन, समझ, बुद्धि, विवेक के अनुसार रखनी चाहिए ताकि बच्चों का बचपना बना रहे और जीवन की प्रतियोगिताओं में मानसिक बोझ से दब कर नहीं अपितु आनंद से सहभागी बनें।

- जेन्नी शबनम (4. 8. 2016)

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Monday, November 16, 2015

54. यमुना कोठी की जेन्नी (पहला भाग)


यमुना कोठी की जेन्नी 
(पहला भाग)

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यादों के बक्से में रेत-से सपने हैं जो उड़-उड़ कर अदृश्य हो जाते हैं और फिर भस्म होता है मेरा मैं, जो भाप की तरह शनै-शनै मुझे पिघलाता रहा है। न जाने खोने पाने का यह कैसा सिलसिला है जो साँसों की तरह अनवरत मेरे साथ चलता है। टुकड़ों में मिला प्रेम और खुद के ख़िलाफ़ मेरी अपनी शिकायतों की गठरी मेरे पास रहती है जो मुझे संबल देती रही है। रिश्तों की एक लम्बी फेहरिस्त है मेरे पास जिसमें अपने पराये का भेद मेरे समझ से परे है। ज़ेहन में अनकहे किस्सों का एक पिटारा है जो किसी के सुने जाने की प्रतीक्षा में रह-रह कर मन के दरवाज़े पर आ खड़ा होता है।

सोचती हूँ कैसे तय किया मैंने ज़िन्दगी का इतना लंबा सफ़र, एक-एक पल गिनते-गिनते जीते-जीते पूरे पचास साल। कभी-कभी यूँ महसूस होता मानो 50 वर्ष नहीं 50 युग जी आयी हूँ। जब कभी अतीत की ओर देखती हूँ तो लगता है जैसे मैंने जिस बचपन को जिया वो कोई सच्चाई नहीं बल्कि एक फिल्म की कहानी है जिसमें मैंने अभिनय किया था।

जन्म के बाद 2-3 साल तक की ज़िन्दगी ऐसी होती है जिसके किस्से हम खूब मनोयोग से दूसरों से सुनते हैं। इसके बाद शुरू होता है एक-एक दिन का अलग-अलग किस्सा जो मष्तिष्क के किसी हिस्से में दबा छुपा रहता है। अब जब फुरसत के पल आए हैं तो बात-बात पर अतीत के पन्नों को खोल कर मैं उस दुनिया में पहुँचना चाहती हूँ जहाँ से ज़िन्दगी की शुरुआत हुई थी।

उम्र के बारह साल ज़िन्दगी से कब निकल गए पता ही न चला। पढ़ना, खेलना, खाना, गाना सुनना, घूमना इत्यादि आम बच्चों-सा ही था। पर थोड़ी अलग तरह से हम लोगों की परवरिश हुई। चूँकि मेरे पिता गाँधीवादी और नास्तिक थे तो घर का माहौल भी वैसा ही रहा। ऐसे में गाँधी के विचारों को मैं भी आत्मसात करती चली गई। हमलोग भागलपुर के नया बाज़ार में यमुना कोठी में रहते थे। उन दिनों इस कोठी का अहाता बहुत बड़ा था। हमारे अलावा कई सारे किरायेदार यहाँ रहते थे। मोहल्ले के ढ़ेरों बच्चे इकत्रित होकर इसी अहाते में खेलने आते थे। सबसे ज्यादा पसंद का एक खेल था जिसमें हम दीवार पर पेंसिल से लकीर बना कर खेलते थे। एक्खट-दुक्खट, पिट्टो, नुक्का चोरी, कोना कोनी कौन कोना, ओक्का बोक्का, घुघुआ रानी कितना पानी, आलकी पालकी जय कन्हैया लाल की आदि खेलते थे। टेनी क्वेट, कैरम, बैडमिंटन, ब्लॉक, लूडो भी खेलते थे।

बचपन में भैया और मेरे बीच में मम्मी सोती थी और हम दोनों मम्मी से कहते थे कि वो मेरी तरफ देखे। ऐसे में मम्मी भी क्या करती भला? वो बिल्कुल सीधे सोती थी ताकि किसी एक की तरफ न देखे। मैं हर वक़्त मम्मी से चिपकी रहती थी। स्कूल जाने में बहुत रोती थी और हर रोज़ मम्मी को साथ जाना होता था। मम्मी के साथ खाना, मम्मी के साथ सोना, मम्मी के बिना फोटो तक नहीं खिंचवाती थी। हम दोनों भाई बहन हाथ पकड़ कर स्कूल जाते और लौटने में भी हाथ पकड़ कर ही आते थे। भाई एक साल बड़ा था और खूब चंचल था पर मैं बहुत शांत थी। धीमे-धीमे चलना, धीरे से बोलना, गंभीरता से रहना। खेल में भी झगड़ा पसंद नहीं था। अगर कोई बात पसंद नहीं तो बोलना बंद कर देती थी। 

अहाते में एक झा परिवार था। उनके तीन बेटा अरविन्द, रविन्द और गोविन्द तथा एक बेटी विभा थी, जो शायद मेरी पहली दोस्त रही होगी। एक बार खेलने में मैंने एक ईंट फेंका जो जाकर उसके सिर पर लग गया। मैं बहुत डर गई, लेकिन मुझे किसी ने नहीं डांटा। हम दोनों साथ ही झाडू की सींक पर स्वेटर बुनना सीखे। बाद में उसके पिता की बदली हो गई और वे लोग चले गए। फिर आज तक नहीं पता कि वो कहाँ है, उसे कुछ याद भी है या नहीं। अहाते में एक अग्रवाल परिवार था जिनके यहाँ ब्याह कर नयी बहु आयी थी। उन्हें मैं बिन्दु चाचीजी कहती थी और वो मुझे बहुत अच्छी लगती थी। उनके साथ हम कुछ बच्चे छोटे चूल्हे पर छोटे-छोटे बर्तन में खाना बनाते थे, गुड्डा-गुड़िया बनाते और खेलते थे।

मेरी एक मौसी भागलपुर शहर में ही रहती थी। उनके तीन बच्चे थे। अक्सर उनके घर हमलोग जाते और खूब खेलते थे। मौसा उच्च सरकारी पद पर थे तो हर सिनेमा हॉल में पास मिलता था। उन दिनों पिक्चर पैलेस एक हॉल था जिसके बॉक्स में कुछ कुर्सी और बिस्तर लगा हुआ था। कुछ फिल्में देखने हमें भी ले जाया जाता था और हम बच्चे बिस्तर पर बैठ कर सिनेमा देखते थे। 

मेरे पिता के एक मित्र थे प्रोफ़ेसर करुणाकर झा। उनको दो बेटे और चार बेटियाँ थी। तीसरे नंबर वाली नीलू मेरी दोस्त थी। वे लोग उन दिनों बूढ़ानाथ में रहते थे। हमलोग अक्सर एक दूसरे के घर गंगा के किनारे बने रास्ते से होकर जाते थे। घाट किनारे लोहे का रेलिंग बना था जिसपर हम लोग अवश्य झुला झूलते फिर आगे जाते थे। 

आदमपुर में छोटी सी. एम. एस. स्कूल से भैया और मैंने पढ़ाई की। फिर मैं 6 माह मोक्षदा स्कूल में पढ़ी। छुट्टियों में हम गाँव गए तो बाढ़ में फँस गए। फिर पापा ने हमलोगों को गाँव में ही दादी के पास छोड़ दिया। मेरे घर के सामने कभी पापा द्वारा ही खुलवाया हुआ प्राइमरी स्कूल था, उसमें मैं पढ़ने जाने लगी। वहाँ सभी बच्चे चट्टी (बोरा) बिछा कर बैठ कर पढ़ते थे और बेंच पर शिक्षक बैठते थे। मुझे खास सुविधा दी गई, और मास्टर साहब ने मुझे बेंच के दूसरी तरफ बैठाने का बंदोबस्त किया। वहाँ सिर्फ दो हो शिक्षक थे, नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन एक शिक्षक को सभी बकुलवा मास्टर कहते थे, क्योंकि उनकी गर्दन लम्बी थी बगुला जैसी। यहाँ कुछ ही दिन पढ़ाई की उसके बाद मेरे पिता के बड़े भाई जिन्हें हम बड़का बाबूजी कहते थे, पास के गाँव सुन्दरपुर में प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे, उनके साथ उनके स्कूल जाने लगी। वहाँ से परीक्षा पास कर 7 वीं में शिवहर मिडिल स्कूल में पढ़ने गई। मेरे क्लास में मुझे लेकर सिर्फ तीन लडकी थी. कालिंदी,    और मैं. छठी कक्षा में सिर्फ दो लड़की पढ़ती थी। दोनों क्लास में किसी का भी गेम पीरियड होता तो हम पाँचों को छुट्टी मिल जाती थी ताकि हम सभी एक साथ खेल सकें। हमलोग सबसे ज्यादा कैरम खेलते थे। मेरे क्लास में एक लड़का था उमेश मंडल जो यह गाना बहुत अच्छा गाता था - ''कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों''। मेरा भाई महुवरिया हाई स्कूल, शिवहर में पढ़ता था, मेरी 7वीं की परिक्षा का सेंटर वहीं पड़ा था। इसके बाद पापा मुझे भागलपुर ले आए लेकिन भाई को गाँव में ही पढ़ने को छोड़ दिए।  

गाँव का जीवन बड़ा ही सरल था। न भय न फिक्र। गुल्ली डंडा, पिट्टो, बैडमिन्टन, कबड्डी, लूडो, साँप-सीढ़ी आदि खूब खेलते थे। यहाँ लड़का लड़की का कोई भेद नहीं था। बड़का बाबूजी के दोनों बेटे अवधेश भैया और मिथिलेश, हम करीब-करीब साथ ही रहते थे; यूँ हमारा घर अलग-अलग था। मेरी सबसे बड़ी फुआ का एक बेटा कृष्ण बिहारी भैया जिसे मैंने नाम दिया था अमिया भैया, हमारे साथ ही रहता था। मेरी सबसे छोटी फुआ अक्सर गाँव आती तो महीनों रहती थी। उनके तीन बेटी और दो बेटे थे। उनकी बीच वाली बेटी बेबी दीदी से हम सबसे ज्यादा नज़दीक थे, दोस्त की तरह। भैया के हमउम्र दोस्त भी हमारे घर ही पढ़ने के लिए आ जाते थे क्योंकि हमारे घर में बिजली थी। हम सभी मिलकर साथ पढ़ते और खेलते थे। 

जो हमारे खेती का काम करता था उसमें एक का नाम था छकौड़ी महरा। उसकी पत्नी कहती कि पति का नाम नहीं लेना चाहिए। हमलोग ज़िद करते कि नाम बोलो, तो वो कहती कि छौ गो कौड़ी, और हम लोग ठहाके लगाते। एक और था लक्षण महतो। वह कभी-कभी किसी-किसी शब्द को बोलने में हकलाता था। एक दिन मेरी दादी से कहा - स स स सतुआ बा (सत्तू है)? तब से हमलोग उसे बार-बार ऐसा कहने के लिए कहते थे। हमारे एक पड़ोसी थे सियाराम महतो, जिनको हमलोग सियाराम चा कहते थे। वे थोड़ा पढ़े लिखे थे। उनको अंग्रेजी भाषा और ग्रामर की समझ थी। वे कुछ शब्द बोलते और उसका स्पेलिंग पूछते। एक शब्द था लेफ्टिनेंट जिसका स्पेलिंग अलग होता है और हिज्जा अलग। वे अक्सर सभी से यह शब्द ज़रूर पूछते। गाँव में एक थे परीक्षण गिरी। हम लोग उन्हें महन जी (महंत जी) कहते थे। वे जब भी दिखते हम लोग कहते ''गोड़ लागी ले महन जी'', तो वो कहते ''खूब खुस रह बऊआ, जुग-जुग जीअ''। एक थे बनारस पांड़े, जो हमारे यहाँ अक्सर आते और मेरी दादी उनसे पूजा पाठ करवाती और दान दक्षिणा देती थी। यूँ मेरे पापा पूजा-पाठ के ख़िलाफ़ थे लेकिन उन्हें कुछ देने से दादी को कभी नहीं रोकते थे। गाँव में एक वृद्ध स्त्री थी जिसका पति पुत्र कोई नहीं था, नितांत अकेली थी। उसे सभी लोग सनमुखिया कहते थे, मुमकिन है सही नाम सूर्यमुखी हो, वो मेरे घर का काम करती थी। वो साइकिल को बाईसिकिल कहती थी। हम कहते कि साइकिल बोलो तो कहती कि ''साइकिल बोलने नहीं आता है बाईसिकिल बोलने आता है''। हमलोग खूब हँसते क्योंकि वो साइकिल बोलती भी थी। मैंने उसे ही देखकर सिलबट्टे पर हल्दी पीसना सीखा था। गाँव में एक खूब तेज़ और होशियार स्त्री थी जिसे उसके बेटे के नाम के कारण सभी लोग 'बिसनथवा मतारी' (विश्वनाथ की माँ) बुलाते थे। वो रोज़ मेरे घर आती और कभी किस्सा तो कभी गाना सुनाती। कई ऐसे लोग हैं जो ज़ेहन में आज भी स्थापित हैं, भले किसी से मिलना नहीं होता है।      
   
मैं गाँव में जब तक रही या फिर जब भी गाँव जाती तो पापा के साथ दिन भर मज़दूरों के बीच ही रहती थी। उनके पनपियाई (खाना) के लिए मेरे यहाँ से जो भी खाना आता हम भी वही खाते थे। पेड़ से अमरुद तोड़ना, खेत से साग तोड़ना, सब्जी तोड़ना, फल तोड़ना, आदि दादी के साथ करती थी। मुझे मडुआ की रोटी बहुत पसंद थी, अक्सर सियाराम चाची मेरे लिए बना कर ले आती थी। हमारे घर से काफी दूर गाँव के अंत में मेरे छोटे चाचा रहते थे। वहीं हमारा पुराना घरारी था। यहीं मेरे पापा के अन्य चचेरे भाई रहते थे और सभी के घर हमलोग अक्सर आना जाना करते थे।

1977 में मैं भागलपुर आ गई। मेरे लिए दुनिया काफी बदली हुई थी। फिर से नए स्कूल में जाना। मेरा नामांकन घंटाघर स्थित मिशन स्कूल (क्राइस्ट चर्च गर्ल्स हाई स्कूल) में हुआ। इस साल से नई शिक्षा नीति लागू हुई थी। इस कारण मुझे पुनः 7 वीं में नामांकन लेना पड़ा जिसे उस समय 7 th new कहा जाता था। मेरे स्कूल की प्राचार्या मिस सरकार थी जिनसे हम छात्रा क्या शिक्षकगण भी ससम्मान डरते थे। 7 वीं में मेरी क्लास टीचर शीला किस्कु रपाज थी जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी। गाँव से लौटने के बाद मैं पहले से और ज्यादा शांत हो गई थी। उन दिनों ही मेरे पिता की बीमारी की शुरुआत हो रही थी। 

प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा इलाज के लिए हाजीपुर में कम्युनिष्ट पार्टी के श्री किशोरी प्रसन्न सिन्हा जिन्हें सभी किशोरी भाई कहते थे, जो काफी वृद्ध और सम्मानीय सदस्य थे, के घर हमलोग एक महीना रहे। फिर पापा ने आयुर्वेद के द्वारा अपनी बीमारी का ईलाज करवाया। लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही थी। सभी के बहुत मना करने पर भी वे विश्वविद्यालय जाना नहीं छोड़ रहे थे। और अंततः 1978 में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु क्या है मुझे तबतक नहीं पता था। पापा के श्राद्ध में यूँ लग रहा था मानो कोई पार्टी चल रही हो। पूजा-पाठ, भोज, और लोगों की बातें। यह सब जब खत्म हुआ तब लगा कि अरे पापा तो नहीं हैं अब क्या होगा। पर हम सभी धीरे-धीरे उनके बिना जीने के आदी हो गए।

यमुना कोठी के जिस हिस्से में हमलोग रहते थे उसका आधा हिस्सा अब बिक चुका है। चूँकि इसके मकान मालिक रतन सहाय हमारे दूर के रिश्तेदार हैं अतः इनके परिवार से सारे संपर्क यथावत हैं। अपनी यादों को दोहराने के लिए हम अक्सर वहाँ जाते रहते हैं। मकान के अन्दर आने के लिए लोहे का एक बड़ा-सा गेट था, जिसपर अक्सर हमलोग झुला झूलते थे। मकान का कुछ और हिस्सा बिक जाने से वह गेट भी अब न रहा। मकान में बाहर की तरफ एक बरामदा था जिसपर शतरंज के डिजाईन का फ्लोर बना था। इसपर हमलोग कोना कोनी कौन कोना का खेल खेलते थे।    

नया बाज़ार के ठीक चौराहे पर बंगाली बाबू का दूकान होता था जहाँ से हम कॉपी पेंसिल और टॉफ़ी खरीदते थे, विशेषकर पॉपिंस मुझे बहुत पसंद था। नया बाज़ार चौक पर नाई का वह दूकान बंद हो चुका है जहाँ मेरे पापा बाल कटवाते थे। चौराहे पर मिठाई की एक दूकान थी जहाँ से हम खूब छाली वाली दही और पेड़ा खरीदते थे, अब उसका जगह बदल गया है। यहीं पर एक मिल था जहाँ हम आटा पिसवाने आते थे। यहीं पर पंसारी का दूकान है जहाँ से सामान खरीदते थे। चौक पर ही निजाम टेलर है जिसके यहाँ अब भी मैं कपड़ा सिलवाती हूँ। निजाम टेलर मास्टर तो अब नहीं रहे उनके बेटे अब सिलाई का काम करते हैं। चौक और मेरे घर के सामने का मस्ज़िद अब भी है जहाँ सुबह शाम अजान हुआ करता था। शारदा टाकिज़ एक बहुत भव्य सिनेमा हॉल खुला था जो अब बंद हो चुका है। इसके मालिक महादेव सिंह जो निःसंतान थे, की मृत्यु के बाद यह विवाद में चला गया। यहाँ हमलोग खूब सिनेमा देखते थे। पिक्चर पैलेस भी बंद हो चुका है। एक अजन्ता टाकिज और दीप प्रभा है जहाँ हाल फिलहाल भी सिनेमा देखा है मैंने। नाथनगर में जवाहर टाकीज है जहाँ अपने पापा के साथ हम अंतिम फिल्म 'मेरे गरीब नवाज़' देखे थे.

वेराइटी चौक पर बीच में एक मंदिर है जिससे वहाँ चौराहा बनता है। यहीं पर आदर्श जलपान है, जहाँ गुलाब जामुन खाने मैं अक्सर जाती थी। नज़दीक ही आनंद जलपान था जहाँ का डोसा बहुत पसंद था मुझे, पर अब वह बंद हो चूका है। वेराइटी चौक पर लस्सी वाला और कुल्फी वाला है, जब भी हम बाज़ार जाते तो लस्सी या कुल्फी खाते थे। ख़लीफाबाग चौक पर चित्रशाला स्टूडियो है जो अब आधुनिक हो गया है। हमलोग फोटो यहीं साफ़ करवाते थे। यहीं भारती भवन, किशोर पुस्तक भण्डार आदि है जहाँ से किताबें खरीदते थे। यहाँ पर मैं झालमुढ़ी, भूँजा, मूँगफली, गुपचुप (गोलगप्पे) आदि ठेले वाले से खरीद कर खाती थी और अब भी कभी-कभी खाती हूँ।    

नया बाज़ार चौक पर हमारे पारिवारिक मित्र डॉ पवन कुमार अग्रवाल का क्लिनिक 'गरीब नवाज़' है जो अब छोटा सा अस्पताल का रूप ले चुका है। डॉ अग्रवाल शुरू से मुझे बेटी की तरह मानते थे। 1986 में जब मेरे अपेंडिक्स का ऑपरेशन उन्होंने किया तब ऑपरेशन से पहले मेरी बहुत सारी ज़िद थी जिसे उन्होंने पूरा किया फिर मैं ऑपरेशन के लिए राज़ी हुई थी। उनके साथ मैं अपनी समस्याओं पर विचार-विमर्श करती थी। 2008 में उनका देहांत हो गया। अब उनका दोनों डॉक्टर पुत्र अच्छी तरह क्लिनिक सँभालता है। मेरी माँ के सहकर्मी हैं मुस्तफा अयुब जो रामसर में रहते हैं। इनकी पत्नी राशिदा आंटी शुरू से मुझे बहुत मानती रहीं। हर सुख दुःख में इनलोगों का बहुत सहयोग मिला। मम्मी की एक मित्र उषा मौसी हैं जो गाना गाती थी ''ज़रा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाए'', जिसे तब भी मैं उनसे सुनती थी अब भी सुनती हूँ। 

स्कूल के बाद सुन्दरवती कॉलेज से ऑनर्स तक की पढ़ाई हुई। रोज़ जोगसर, शंकर टाकीज चौक, मानिक सरकार चौक, आदमपुर आदि से होते हुए खंजरपुर स्थित सुन्दरवती कॉलेज जाती थी। ऑनर्स में कुछ माह हॉस्टल में रही थी। लेकिन एक भी रूम मेट से दोबारा मिलना न हुआ टी. एन. बी. लॉ कॉलेज जो तिलकामाँझी में है, वहाँ लॉ क्लास के लिए जाती थी कॉलेज के बाद एम. ए. के लिए सराय होते हुए यूनिवर्सिटी जाती थी। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी अक्सर पैदल ही जाया करती थी। तब न ज्यादा गर्मी लगती थी न ठंड। बी. ए. तक मैं बहुत अंतर्मुखी थी। बस काम से काम, न गप्पे लड़ाना पसंद न बेवज़ह घूमना। स्कूल की सहपाठियों में नीलिमा, मृदुला, बिन्दु आदि से मिलना हुआ। कॉलेज की दोस्तों में पूनम और रेणुका से मिलती रही हूँ। यूनिवर्सिटी की किसी भी दोस्त से अब संपर्क नहीं रहा।           

ढेरों यादें और किस्से हैं, जिन्हें कभी भूलता नहीं मन। इतना ज़रूर है कि भागलपुर कभी छूटा नहीं। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी जाने का रास्ता जैसे अब भी अपना-सा लगता है। यह सब छूट कर भी नहीं छूटता मुझसे। शहर जाना भले न होता हो पर ज़िन्दगी जहाँ से शुरू हुई वहीं पर अटक गई है। 

नन्हा बचपन रूठा बैठा है...    

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अलमारी के निचले खाने में  
मेरा बचपन छुपा बैठा है  
मुझसे डरकर  
मुझसे ही रूठा बैठा है  
पहली कॉपी पर पहली लकीर  
पहली कक्षा की पहली तस्वीर  
छोटे-छोटे कंकड़ पत्थर  
सब हैं लिपटे साथ यूँ दुबके  
ज्यों डिब्बे में बंद ख़ज़ाना  
लूट न ले कोई पहचाना  
जैसे कोई सपना टूटा बिखरा है  
मेरा बचपन मुझसे हारा बैठा है,  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।     

ख़ुद को जान सकी न अबतक
ख़ुद को पहचान सकी न अबतक  
जब भी देखा ग़ैरों की नज़रों से
सब कुछ देखा और परखा भी
अपना आप कब गुम हुआ  
इसका न कभी गुमान हुआ  
खुद को खो कर खुद को भूल कर   
पल-पल मिटने का आभास हुआ  
पर मन के अन्दर मेरा बचपन  
मेरी राह अगोरे बैठा है,  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

देकर शुभकामनाएँ मुझको  
मेरा बचपन कहता है आज  
अरमानों के पंख लगा  
वो चाहे उड़ जाए आज  
जो-जो छूटा मुझसे अब तक  
जो-जो बिछुड़ा दे कर ग़म  
सब बिसूर कर  
हर दर्द को धकेल कर  
जा पहुँचूँ उम्र के उस पल पर  
जब रह गया था वो नितांत अकेला  
सबसे डरकर सबसे छुपकर  
अलमारी के खाने में मेरा बचपन  
मुझसे आस लगाए बैठा है,  
आलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

बोला बचपन चुप-चुप मुझसे  
अब तो कर दो आज़ाद मुझको  
गुमसुम-गुमसुम जीवन बीता  
ठिठक-ठिठक बचपन गुज़रा  
शेष बचा है अब कुछ भी क्या  
सोच विचार अब करना क्या  
अंत से पहले बचपन जी लो  
अब तो ज़रा मनमानी कर लो  
मेरा बचपन ज़िद किए बैठा है,  
आलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।   

आज़ादी की चाह भले है  
फिर से जीने की माँग भले है  
पर कैसे मुमकिन आज़ादी मेरी  
जब तुझपर है इतनी पहरेदारी  
तू ही तेरे बीते दिन है  
तू ही तो अलमारी है  
जिसके निचले खाने में  
सदियों से मैं छुपा बैठा हूँ  
तुझसे दब के तेरे ही अन्दर  
कैसे-कैसे टूटा हूँ  
कैसे-कैसे बिखरा हूँ  
मैं ही तेरा बचपन हूँ  
और मैं ही तुझसे रूठा हूँ  
हर पल तेरे संग जीया पर  
मैं ही तुझसे छूटा हूँ,  
अलमारी के निचले खाने में  
मेरा नन्हा बचपन रूठा बैठा है।  

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2015)  
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Wednesday, October 7, 2015

53. गैर-बराबरी बढ़ाता आरक्षण



आरक्षण के मुद्दे पर देश के हर प्रांत में उबाल है। आरक्षण के समर्थन और विरोध दोनों पर ही चर्चा नए विवादों को जन्म देती है सभी को आरक्षण चाहिए। इससे मतलब नहीं कि वास्तविक रूप से कोई ख़ास जाति आरक्षण की हकदार है। मतलब बस इतना है कि सभी जातियाँ खुद को आरक्षण की श्रेणी में लाकर वांछित फायदा उठाना चाहती हैं समय आ गया है कि अब इस मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ी जाए हमें निष्पक्ष रूप से इसपर अपना विचार बनना होगा ये आरक्षण किसके लिए है और किसके विरूद्ध है? क्या जातिगत आधार पर आरक्षण उचित है? कितनी जातियों को इसमें शामिल किया जाए? क्या वास्तविक रूप से उन्हें फायदा हो रहा है जो ज़रूरतमंद हैं? आरक्षण का आधार सामजिक क्यों? आरक्षण का आधार एकमात्र आर्थिक क्यों नहीं? आरक्षण सहूलियत नहीं बल्कि दया है जिसे किसी ख़ास जाति को दी जा रही है। किसी ख़ास जाति में जन्म लेने पर क्या दया की जानी चाहिए? 

यह न तो उचित है और न तर्कपूर्ण कि किसी ख़ास जाति या धर्म को मानने वाले को आरक्षण मिलना चाहिए। चाहे वो शिक्षा हो या किसी पद के लिए या किसी स्पर्धा वाली शिक्षा या नौकरी में आश्चर्य है कि खुद को पिछड़ा साबित करने की होड़ लग गई है निश्चित ही आरक्षण के नाम पर हमारे युवाओं को बहकाया जा रहा है और उनको गलत दिशा देकर राजनितिक पार्टियाँ अपना-अपना लाभ पोषित कर रही हैं

आरक्षण ने काबिलियत को परे धकेल कर जातिगत दुर्भावना को बढ़ाया है। आरक्षण का दंश देश का हर नागरिक झेल रहा है। आरक्षण से कोई फायदा अब तक न दिखा है और न दिखेगा। आरक्षण का लालच दिखा युवाओं का मतिभ्रम कर आवश्यक मुद्दे पर से ध्यान को भटकाया जा रहा है। युवाओं को धर्म और जाति का अफ़ीम खिला-खिला कर देश के बिगड़ते हुए सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक दशाओं से विमुख किया जा रहा है देश कई तरह के बाह्य और आतंरिक संकट से गुजर रहा है, ऐसे में आरक्षण देकर कुछ ख़ास जातियों को फ़ायदा पहुँचाने के एवज में संकट को और भी बढ़ावा दिया जा रहा है लड़ता और मरता तो आम युवा ही है और हानि जैसे भी हो हमारे ही देश की होती है     

आरक्षण जाति भेद की दुर्भावना पैदा करने का बहुत बड़ा कारण है। किसी ख़ास जाति को आरक्षण मिलने के कारण वह जगह मिल जाता है जो कोई दूसरा ज्यादा उपुयक्त होकर भी गँवा देता हैआरक्षण प्राप्त लोगों का आरक्षण मिलने के बाद कहीं से भी बौधिक बढ़ोतरी के प्रमाण मुझे देखने को नहीं मिले। उसी तरह आरक्षण से मुक्त जो भी जातियाँ हैं वो जन्म के कारण विशिष्ट गुणों वाली हों या वे सभी धनाढ्य हो यह भी नहीं देखा है। धर्म और जाति का बौद्धिकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता और न ही आरक्षण देकर किसी में बौद्धिकता और काबिलियत पैदा की जा सकती है। कहीं न कहीं मन का विभाजन आरक्षण के बाद ही शुरू हुआ

जिस तरह से अधिकांश जातियाँ आरक्षण पाने के लिए लालायित हैं ऐसा लगता है कि आने वाले समय में गिनती की दो-चार जातियाँ ही बचेंगी जो आरक्षण से बाहर सामान्य श्रेणी में रह जायेंगीआरक्षण श्रेणी की बहुत सी जातियाँ ऐसी हैं जो धनवान हैं ऐसी बहुत सी जातियाँ हैं जो कहने को तो उच्च कूल की हैं लेकिन खाने-खाने को मोहताज़ हैं ऐसे में विचारणीय है कि किसे आरक्षण की आवश्यकता है?

प्रतिस्पर्धा के युग में आरक्षण हर जाति के लिए रोग बन गया है। योग्यता का मूल्यांकन आरक्षण से होना स्वाभाविक-सा लगता है। आज अल्पज्ञान और अल्पबुद्धि का बोलबाला होता जा रहा है ज्ञान और बुद्धि पर आरक्षण भारी पड़ रहा है और इसका ख़ामियाजा आरक्षित श्रेणियों की जातियों को भी उठाना पड़ रहा है अगर किसी का उसकी अपनी योग्यता से स्पर्धा में चयन होता है फिर भी लोगों कि निगाहों में वो तिरस्कार पाता है और यही माना जाता है कि आरक्षण के कारण वह उतीर्ण हुआ है उसकी अपनी योग्यता आरक्षण की बलि चढ़ जाती है आज जब हम किसी डॉ के पास ईलाज के लिए जाते हैं तो मन में यह आशंका रहती है कि कहीं यह आरक्षण से आया हुआ तो नहीं है ऐसे में उस डॉ की योग्यता पर अपनी ज़िन्दगी दाँव पर लगी दिखती है। मुमकिन है कि आरक्षित श्रेणी का वह डॉक्टर सचमुच प्रतिभाशाली हो मगर आरक्षण की सुविधा से अनुपयुक्त का चयन उपयुक्त को भी कटघरे में खड़ा कर दे रहा है इस आरक्षण ने मन में संदेह पैदा कर दिया है और हम एक दूसरे को शक और असम्मान से देखने लगे हैं

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अगर आरक्षण देना ही है तो उसे आर्थिक आधार पर दिया जाए चाहे वो किसी भी जाति धर्म या सम्प्रदाय का क्यों न हो, और वह भी सिर्फ विद्यालय स्तर की शिक्षा तक। ताकि स्पष्टतः प्रतिभा की पहचान हो सके और उपयुक्त पात्र ही उपयुक्त स्थान ग्रहण करे समान अवसर, सुविधा और वातवरण मिलने पर ही हर नागरिक समान हो पाएगा देश के हर नागरिक के लिए समान क़ानून, समान न्याय, समान शिक्षा, समान सुविधा और समान कर्त्तव्य का होना आवश्यक है एक मात्र आर्थिक आधार ही आरक्षण का उचित आधार है और होना चाहिए

- जेन्नी शबनम (7. 10. 2015)

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Thursday, August 20, 2015

52. सावन में बरसाती टोटके


बरसात का मौसम, सावन-भादो का महीना और ऐसे में बारिश। चारो तरफ हरियाली, बागों में बहार, मन में उमंग जाने क्या है इस मौसम में। रिमझिम बरसात… अहा! मन भींगने को करता है। बरसात के मौसम में उत्तर भारत में कजरी गाने की परम्परा  रही है। 

सावन ऐ सखी सगरो सुहावन 
रिमझिम बरसे ला मेघ रे 
सबके बलमउआ त आबे ला घरवा 
हमरो बलम परदेस रे  

सावन के महीने में कई-कई दिन लगातार बारिश हो, सूर्य कई दिनों तक नहीं दिखे तो इसे कहते हैं झपसी (लगातार मूसलाधार वर्षा) लगना।शहरी जीवन में तो ऐसे मौसम में लोग चाय के साथ पकौड़ी खाना, लिट्टी चोखा खाना, लॉन्ग ड्राइव पर जाना, पसंदीदा पुस्तक पढ़ना या गीत सुनना आदि पसंद करते हैं। ग्रामीण परिवेश में यह सब बदल जाता है। यूँ अब पहले की तरह गाँव नहीं रहे अतः काफी कुछ शहरों का देखा देखी होने लगा है। पहले चूल्हा में लकड़ी ही ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता था अतः बरसात में मेघौनी लगते ही जरना (लकड़ी) एकत्रित कर लिया जाता है। बूँदा-बाँदी में भी खेती के सारे काम होते हैं, क्योंकि इसमें नियत समय पर ही सब कुछ करना है। पशु पक्षी की देखभाल, उनके चारा का इंतज़ाम आदि सब पहले से कर लेना होता है। बाज़ार हाट का काम और खेती का काम भीगते हुए ही करना होता है।गाँव में कभी भी कोई असुविधा महसूस नहीं होती है। जब जो है उसमें ही जीवन को भरपूर जीया जाता है।  

यूँ तो परम्पराएँ गाँव हो या शहर दोनों जगह के लिए बनी हुई हैं लेकिन कुछ परम्पराएँ गाँवों तक सिमट गई हैं। गाँवों में जब मूसलाधार बारिश हो और पानी बरसते हुए कई दिन निकल जाए तो एक तरह का टोटका किया जाता है जिससे बारिश बंद हो और उबेर (बारिश बंद होकर सूरज निकालना) हो जाए।   

सीतामढ़ी ज़िले में झपसी लगाने पर एक अनोखी परम्परा है। कपड़े का दो पुतला (गुड्डा-गुड़िया) बनाते हैं, एक भाहो (छोटे भाई की पत्नी) और एक भैंसुर (पति का बड़ा भाई)।  फिर दोनों को छप्पर (छत) पर एक साथ रख देते हैं। फिर अक्षत और फूल चढ़ाकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि चूँकि भाहो और भैंसुर का सम्बन्ध ऐसा है जिसमें दूरी अनिवार्य है। इसलिए भाहो-भैंसुर का एक साथ होना और पानी में भींगना बहुत बड़ा पाप और अन्याय है। अतः भगवान इस अन्याय को देखें और पानी बरसाना बंद करें। इस गुड्डा-गुड़िया को बना कर वही लड़की पूजा करती है जिसको एक भाई होता है। 

इससे मिलती जुलती ही छपरा जिला की परंपरा है। इस टोटका में कपड़े से कनिया और दूल्हा (पति और पत्नी) बनाते हैं। फिर दूल्हा के कंधा पर एक गमछा (तौलिया) रख दिया जाता है जिसके एक छोर में खिचड़ी का सामान बाँध दिया जाता है। एक छोटा ईंट रखकर उस पर एक दीया जला देते हैं और उससे सटाकर कनिया व दूल्हा को खड़ा कर दिया जाता है। कनिया और दूल्हा भगवान से कहते हैं कि हमें परदेस जाना है, दिन रात पानी बरस रहा है, चारो तरफ अन्हरिया (अन्धेरा) है; हे भगवान! उबेर कीजिए, जिससे हमलोग खाना बना कर खाएँ और फिर परदेस जाएँ ताकि कमा सकें। मान्यता है कि जिस बच्ची का जन्म ननिहाल में होता है वही यह गुड्डा-गुड़िया बनाती है और पूजा करती है। 


अब इन टोटकों से क्या होता यह तो नहीं पता लेकिन सुना है कि टोटका करने के बाद पानी बरसना बंद होकर उबेर हो जाता है; भले थोड़ी देर के लिए ही सही। टोटका कहें या मान्यता या मन बहलाव का साधन, गाँव के लोग हर परिस्थिति का सामना अपने-अपने तरीके से करते हैं। प्रकृति के हर नियम के साथ तालमेल मिला कर जीते हैं। अब यह सब होता है या नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन है बड़ा अनूठा और दिलचस्प टोटका।  

-  जेन्नी शबनम (20. 8. 2015)

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