Saturday, September 8, 2018

61. पहचान


मेरा लेख एक बड़ी पत्रिका में ससम्मान प्रकाशित हुआ। मैंने मुग्ध भाव से पत्रिका के उस लेख के पन्ने पर हाथ फेरा, जैसे कोई माँ अपने नन्हे शिशु को दुलारती है। दो महीने पहले का चित्र मेरी आँखों के सामने घूम गया।   

जैसे ही मैंने अपना कम्प्यूटर खोल पासवर्ड टाइप किया उसने अपना कम्प्यूटर बंद किया और ग़ैर ज़रूरी बातें करनी शुरू कर दीं। मैंने कम्प्यूटर बंद कर दिया और उसकी बातें सुनने लगी कि उसने अपना कम्प्यूटर खोलकर कुछ लिखना शुरू कर दिया और बोलना बंद कर दिया।   

आधा घंटा बीत गया। मुझे लगा बातें ख़त्म हुईं। मैंने फिर कम्प्यूटर खोला और दूसरी पंक्ति लिखना शुरू ही किया कि उसने अपना कम्प्यूटर बंद कर दिया और इस तरह मुझे घूरने लगा, मानो मैं कम्प्यूटर पर अपने ब्वायफ्रेंड से चैट कर रही होऊँ। 

मैंने धीरे से कहा - ''मुझे एक पत्रिका के लिए एक लेख भेजना है।'' 
उसने व्यंग्य-भरी दृष्टि से मेरी तरफ ऐसे देखा मानो मुझ जैसे मंदबुद्धि को लिखना आएगा भला। 

उसने पूछा - ''टॉपिक क्या है?'' 

मैंने बता दिया तो उसने कहा - ''ठीक है, मैं लिख देता हूँ, तुम अपने नाम से भेज दो। यूँ ही कुछ भी लिखा नहीं जाता समझ हो तो ही लिखनी चाहिए।'' 

मैंने कहा - ''जब आप ही लिखेंगे, तो अपने नाम से भेज दीजिए।'' फिर मैंने कम्प्यूटर बंद कर दिया। 

रात्रि में मैंने लेख पूरा करके पत्रिका में भेज दिया था। 

पत्रिका अभी भी मेरी टेबल पर रखी है। क्या करूँ! दिखाऊँ उसे! मन ही मन कहा - ''कोई फ़ायदा नहीं!''

पत्रिका अभी भी मेरी टेबल पर रखी है। जब वह इसे देखेगा तो? ... सोचते ही मेरा आत्मविश्वास और भी बढ़ गया।    

- जेन्नी शबनम (8. 9. 2018)   

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Wednesday, July 18, 2018

60. आज भी तुमसे शिकायत है

पापा 
पापा, तुमसे ढ़ेरों शिकायत है मैं बहुत गुस्सा हूँ, बहुत बहुत गुस्सा हूँ तुमसे। मैं रूसी (रूठी) हुई हूँ। अगर तुम मिले तो तुमसे बात भी नहीं करूँगी। पापा, तुमको याद है, मैं अक्सर रूस (रूठ) जाती थी और तुम मुझे मनाते थे इतनी भी क्या जल्दी थी तुमको? कम से कम मुझे आत्मनिर्भर तो बना दिए होते जाने से पहले देखो, मैं कुछ न कर सकी, हर दिन बस उम्र को धकेल रही हूँ क्यों उस समय में छोड़ गए तुम जब हमें तुम्हारी सबसे ज्यादा ज़रुरत थी न समझने का मौक़ा दिए न सँभलने का, बस चल दिए तुम  
पापा-मम्मी 
समय किसी की पकड़ में नहीं आया है कभी समय छलाँग लगा कर भागता है और हम धीरे-धीरे अपने कदमों पर चलते रहते हैं कि अचानक एक दिन पता चलता है, अरे! कितना वक़्त गुजर गया, और हम सभी चौंक जाते हैं आज से 40 साल पहले आज ही के दिन मेरे पापा इस संसार से हमेशा के लिए हम लोग को छोड़ कर चले गए थे हम सभी ज़िन्दगी को और ज़िन्दगी हम सभी को स्तब्ध होकर देखती रह गई थी न हमारे पास कहने को कुछ शेष था न ज़िन्दगी के पास कौन किससे क्या कहे? कौन किसे सांत्वना दे? 
मम्मी, भैया और मैं 
मेरे दादा तो मेरे जन्म से पूर्व ही गुजर चुके थे मेरी दादी लगभग 70 वर्ष की थी, जब उनके सबसे प्रिय पुत्र यानी मेरे पापा का निधन हुआ पापा की मृत्यु के समय मेरी माँ लगभग 32 वर्ष, मेरा भाई 13 वर्ष और मैं 12 वर्ष की थी हममे से कोई भी इस लायक नहीं था कि इस दुखद समय में एक दूसरे को सांत्वना दे सके फिर धीरे-धीरे हम चारों की ज़िन्दगी पापा के बिना चल पड़ी, या यूँ कहें कि हमने चलना सीख लिया हम सभी बहुत बार लड़खड़ाए, गिरे, संभले, और फिर चलते रहे यह हम लोगों की खुशनसीबी है कि हमारे सगे-सम्बन्धी, मम्मी-पापा के मित्र, मम्मी-पापा के सहकर्मी और पापा के छात्र सदैव हमलोगों के साथ रहे और आज भी हैं।
कहते हैं कि वक़्त ही घाव भी देता है और वक़्त ही मरहम भी लगाता है

वक़्त से मिला घाव यूँ तो ऊपर-ऊपर भर गया, पर मन की पीड़ा टीस बन गई हमारे लिए हम सभी को कदम-कदम पर पापा की ज़रूरत और कमी महसूस होती रही मेरे पापा स्त्री को स्वावलंबी बनाने के पक्षधर थे, तो उन्होंने अपने जीवन में ही मेरी माँ को हर तरह से सक्षम बना दिया था उन दिनों मेरी माँ इंटर स्कूल में शिक्षिका थी और सन 1988 में प्राचार्या बनी मेरे पापा की कामना थी कि मेरा भाई बड़ा होकर विदेश में पढ़ाई करेऔर यह सुखद संयोग ही रहा कि मेरे भाई ने आई. आई. टी. कानपुर से पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप पर अमेरिका चला गया मैंने एम. ए, एल. एल. बी और पी एच. डी कर अपनी शिक्षा पूर्ण की; यूँ यह अलग बात कि अलग-अलग कई तरह के कार्य मैंने किए परन्तु कोई भी कार्य सुनियोजित और नियमित रूप से नहीं कर सकी जिससे कि मैं आत्मनिर्भर बन पाती अंततः मैं हर क्षेत्र में असफल रही मेरे पापा जीवित होते तो निःसंदेह उन्हें मेरे लिए दुःख होता  

लगभग 2 वर्ष पापा की बीमारी चली थी इन दो वर्षों में पापा ने प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा अपना इलाज कराया और अंततः सुधार नहीं होने पर आयुर्वेद की दवा खाते रहेएलोपैथ पद्धति पर उन्हें विश्वास न था अंततः जब बीमारी बहुत बढ़ गई तब दिल्ली में एम्स में एक माह तक भर्ती रहे जहाँ डॉक्टर ने शायद ठीक न हो सकने की बात कही थी वे भागलपुर लौट आए और उनके अधीन जितने छात्र पी एच. डी कर रहे थे उनका काम उन्होंने शीघ्र पूरा कराया अपनी बीमारी की चर्चा वे किसी से नहीं करते थे अतः उनकी बीमारी की स्थिति का सही अंदाज़ा किसी को नहीं था लीवर सिरोसिस इतना ज्यादा बढ़ चुका था कि अंत में वे कौमा में चले गए और लगभग 10 दिन अस्पताल में रहने के बाद सदा के लिए हमें छोड़ गए  
एक पुस्तक जिसमें पापा की चर्चा है 

पापा का लेटर हेड 

पापा द्वारा हस्तलिखित 

पापा द्वारा हस्तलिखित 

























मेरे पापा को घुमना, गाना सुनना और फोटो खींच कर खुद साफ़ करने का शौक़ था. मम्मी के साथ पूरे देश का वे भ्रमण कर चुके थे, और हर जगह की तस्वीर सिर्फ मेरी माँ की थी मम्मी की तस्वीर को बड़ा करा कर फ्रेम करा कर पूरे घर के दीवारों में लगवाए थे। वे शिक्षा, राजनीति और सामजिक कार्यों से अंतिम समय तक जुड़े रहे जब तक होश में रहे  
थीसिस 


बैग 

जरनल 

पापा के पी एच. डी का खबर पेपर में 

























पापा के गुजर जाने के बाद मैं हर जगह पापा की निशानी तलाशती रहीपरन्तु एक भी तस्वीर उनकी नहीं है जिसमें वे हमलोगों के साथ हों यूँ पापा की निशानी के तौर पर मेरी माँ, मेरा भाई और मेरे अलावा उनके उपयोग में लाया गया कुछ ही सामान बचा है मसलन एक बैग जिसे लेकर वे यूनिवर्सिटी जाते थे, उनकी एक डायरी, उनके कुछ जर्नल, एक दो कपड़े, घड़ी आदि।  
पापा का शर्ट 

पापा का शर्ट 

पापा का पैंट 

पापा की घड़ी 


















पापा का बैग 
पापा की एक डायरी 
















मेरी दादी की मृत्यु 102 वर्ष की आयु में सन 2008 में हुई दादी जब तक जीवित रही एक दिन ऐसा न गुजरा जब वो पापा को याद कर न रोती होपापा के जाने के बाद मेरी माँ के लिए मेरी दादी बहुत बड़ा संबल रहीसमय ने इतना सख्त रूप दिखाया कि अगर मेरी दादी न होती तो मम्मी का क्या हाल होता पता नहीं भाई ने काफी बड़ा ओहदा पाया लेकिन पिता के न होने के कारण शुरू में उसे भी में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था
दादी 
हम सभी पापा को याद कर एक-एक दिन गुजारते रहे बहुत सारे अच्छे दिन आए बहुत सारे बुरे दिन बीते हर दिन आँखें रोती रही जब भी पापा के न होने के कारण जीवन में हम सभी को पीड़ा मिली बिना बाप की बेटी होने के कारण मैं अपमानित और प्रताड़ित भी हुई हूँ मेरा मनोबल हर एक दिन के साथ कम होता जा रहा है मेरा मन अब  शिकायतों की पोटली लिए पापा का इंतज़ार कर रहा है, मानों मैं अब भी 12 साल की लड़की हूँ और पापा आकर सब ठीक कर देंगे     
विश्वविद्यालय का सोफा जिसपर खाली पीरियड में पापा सोते थे 

राजनीति शास्त्र विभाग का क्लास रूम 

पापा की पुनर्प्रकाशित पुस्तक  

पुस्तक का बैक कवर 



















कई बार सोचती हूँ कि काश कुछ ऐसा होता कि मेरी परेशानियों का हल मेरे पापा सपने में आकर कर जाते या फिर कहीं किसी मोड़ पर कोई ऐसा मिल जाता जो पापा का पुनर्जन्म होता जानती हूँ यह सब काल्पनिकता है लेकिन मन है कि अब भी हर जगह पापा को ढूँढता है यूँ अब खुद मेरी आधी उम्र बीत गई है, पर अब भी अक्सर मैं छोटी बच्ची की तरह एकांत में पापा के लिए रोती रहती हूँ पापा, मुझे आज भी तुमसे ढ़ेरों शिकायत है ताउम्र शिकायत रहेगी पापा ! 

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2018)

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Thursday, March 8, 2018

59. औरत की आज़ादी का मतलब


'हमें चाहिए आज़ादी', 'हम लेकर रहेंगे आज़ादी', किसे नहीं चाहिए आज़ादी? हम सभी को चाहिए आज़ादी सोचने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, विचार की आज़ादी, प्रथाओं से आज़ादी, परम्पराओं से आज़ादी, मान्यताओं से आज़ादी, काम में आज़ादी, हँसने की आज़ादी, रोने की आज़ादी, प्रेम करने के आज़ादी, जीने की आज़ादी...स्त्री के तौर पर जन्म लेने की आज़ादी  

कभी-कभी मेरे दिमाग़ की नसें कुलबुलाती हैं, ढ़ेरों विचार छलाँग मारते हैं, जेहन में अजीब-अजीब से ख़याल आते हैं, साँसें घुटती है, लफ़्ज़ों की पाबंदी उफ़ान मारती है अघोषित नियमों की पहरेदारी में अस्तित्व मिट रहा है सपने मर रहे हैं, आक्रोश उन्माद और अवसाद एक साथ घेरे हुए है। कभी-कभी सोचती हूँ कहीं ये पागलपन तो नहीं; पर यह सब बाह्य नहीं अंतस में व्याप्त है निःसंदेह चेतनाशून्य हो जाने का मन होता है अवचेतन मन पर जो भी प्रभाव हो पर व्यक्त रूप से प्रभाव नहीं पड़ने देना होगा हर हाल में हमें स्वयं पर नियंत्रण रखना ही होगा हमारी मान्यताएँ और मर्यादा इसकी अनुमति नहीं देती है  

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत के 109 साल हो रहे हैं। हर साल स्त्रियों की उपलब्धि और सम्मान के लिए दुनिया भर में न सिर्फ महिलाएँ बल्कि पुरुष भी इस दिन को मनाते हैं। परन्तु यह दिन महज़ अब एक ऐसा दिन बन कर रह गया है जब सरकारी और गैर सरकारी संगठन स्त्रियों के पक्ष में कुछ बातें कहेंगे, कुछ नई योजनायें बनाई जाएँगी, विचार विमर्श होंगे और फिर 'दुनिया की महिलाएँ एक हों' के उद्घोष के साथ 8 मार्च के दिन की समाप्ति हो जाएगी। फिर वही आम दिन की तरह कहीं किसी स्त्री का बलात्कार, किसी का दहेज़ उत्पीड़न, किसी का जबरन विवाह, कहीं कन्या भ्रूण हत्या, कहीं एसिड से जलाया जाएगा तो कहीं परम्परा के नाम पर बलि चढ़ेगी।  

महिला दिवस मनाने का अब मेरा मन नहीं होता है। न उल्लास होता है न उमंग। सब कुछ यांत्रिक-सा लगने लगा है। टी वी और अखबार द्वारा महिला दिवस के आयोजन को देखकर मुझे यूँ महसूस होता है जैसे हम स्त्रियों का मखौल उड़ाया जा रहा है। बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर जहाँ स्त्रियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए जैसे बीज मंत्र लिख दिया गया हो। प्रचार पढ़ो और देखो फिर मान लो कि स्त्रियों की स्थिति सुधर गई हैबाजारीकरण का स्पष्ट असर दिखता है इस दिन कपड़े, आभूषण इत्यादि पर छूट! तरह तरह के प्रलोभन! न कुछ बदला है न बदलेगा! ढाक के वही तीन पात!  

सही मायने में अब तक स्त्रियों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है; भले ही हम स्त्री सशक्तीकरण की कितनी भी बातें करें। स्त्री शिक्षा और उसके अस्तित्व को बचाने के लिए ढेरों सरकारी योजनाएँ बनी। सरकारी और गैर सरकारी संगठन के तमाम दावों के बावज़ूद स्त्रियों की स्थिति सोचनीय बनी हुई है। हालात बदतर होते जा रहे हैं। महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की परियोजनाएँ फाइलों में ही खुलती और बंद होती हैं। ग्रामीण और निम्न वर्गीय महिलाओं की स्थिति में महज़ इतना ही सुधार हुआ है कि उनके हाथों में झाड़ू और हँसुआ के साथ ही मोबाइल भी आ गया है। निःसंदेह मोबाइल को प्रगति का पैमाना नहीं माना जा सकता है।   

सामजिक मूल्यों के ह्रास का असर स्त्री के शारीरिक शोषण के रूप में और भी विकराल रूप में उभर कर सामने आया है। शारीरिक अत्याचार दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। मेरा अनुमान है कि 99% महिलाएँ कभी न कभी अवश्य ही शारीरिक शोषण का शिकार हुई हैं। चाहे वो बचपन में हो या उम्र के किसी भी पड़ाव पर। घर, स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, स्पताल, बाज़ार, सड़क, बस, ट्रेन, मंदिर, कहीं भी स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं। शोषण करने वाला कोई भी पुरुष हो सकता है। उसका अपना सगा, रिश्तेदार, पति, पिता, दोस्त, पड़ोसी, परिचित, अपरिचित, सहकर्मी, सहयात्री, शिक्षक, धर्मगुरु इत्यादि।       

परतंत्रता को आजीवन झेलना स्त्री के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है स्त्री को त्याग और ममता की देवी कहकर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाता है ताकि वह सहनशील बनी रहकर अत्याचार सहन करती रहे और अगर न कर पाए तो आत्मग्लानि में जिए कि स्त्री के लिए निर्धारित मर्यादा का पालन वह नहीं कर पाई यह एक तरह की साजिश है जो रची गई है स्त्री के ख़िलाफ़ स्त्री को अपेक्षित कर्तव्यों के पालन के लिए मानसिक रूप से विवश किया जाता है स्त्रियाँ अपना कर्तव्य निभाते-निभाते और मर्यादाओं का पालन करते-करते दम तोड़ देती हैं, लेकिन आजीवन मनचाहा जीवन नहीं जी पाती हैं  

समाज का निर्माण कदापि मुमकिन नहीं अगर स्त्री को समाज से विलग या वंचित कर दिया जाएइसका तात्पर्य यह नहीं कि पुरुष की अहमियत नहीं है या पुरुष के ख़िलाफ़ कोई साजिश है परन्तु पुरुष के वर्चस्व का ख़ामियाज़ा न सिर्फ स्त्री भुगतती है बल्कि पूरा समाज भुगतता है मानवता धीरे-धीरे मर रही है असंतोष, आक्रोश और संवेदनशून्यता की स्थिति बढ़ती जा रही है कौन किससे सवाल करे? कौन उन बातों का जवाब दे जिसे हर कोई सोच रहा है? भरोसा करने का कारण नहीं दिखता, क्योंकि कहीं न कहीं हर स्त्री ने चोट खाई है परिपेक्ष्य में चाहे कुछ भी हो परन्तु संदेह के घेरे में सदैव स्त्री ही आती है और आरोपित भी वही होती है अपनी घुटन, छटपटाहट, पीड़ा, भय, अपमान आदि किससे बाँटे? वह नहीं समझा सकती किसी को कि वह सब अनुचित है जिससे किसी स्त्री को तौला और परखा जाता है  
ऐसा नहीं कि सदैव स्त्रियाँ ही सही होती हैं और हर पुरुष गलत अक्सर मैंने देखा है कि जहाँ पुरुष कमज़ोर है या स्त्री के सामने झुक जाता है वहाँ स्त्रियाँ इसका फ़ायदा उठाती हैं; वैसे ही जैसे स्त्री की कमजोरी का फ़ायदा पुरुष उठाता है स्त्रियों के अधिकार की रक्षा के लिए बहुत सारे कानून बने हैं और इन कानूनों का नाज़ायज़  फ़ायदा ऐसी स्त्रियाँ उठाती हैं मेरे विचार से ऐसी महिलाएँ मानसिक रूप से कुंठा की शिकार हैं। अमूमन जब किसी को पावर (शक्ति) मिल जाता है तो वह अभिमानी और निरंकुश हो जाता है इसी कारण कुछ महिलाएँ जिन्हें पावर मिल जाता है वे पुरुषों को प्रताड़ित करने लगती हैं अधिकांशतः पति और अधीनस्थ कर्मचारी महिलाओं द्वारा प्रताड़ित किए जाते हैं इसलिए मेरे विचार से मुद्दा स्त्री पुरुष का नहीं बल्कि शक्ति और सामर्थ्य का है  
आखिर क्यों नहीं स्त्री-पुरुष एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं और एक दूसरे को बराबर समझते हैं ताकि कोई किसी से न कमतर हो न कोई किसी के अधीन रहे ऐसे में हर दिन महिला दिवस होगा और हर दिन पुरुष दिवस भी मनाया जाएगा।  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2018)
(अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस)


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Thursday, September 14, 2017

58. हिन्दी बिटिया को अंग्रेजी की गुलामी से बचाओ

सुबह का व्यस्ततम समय, एक अनजाने नंबर से मोबाइल पर फ़ोन ''मे आई टॉक टू ...।'' मैंने कहा ''हाँ, बोलिए''! उसने कहा ''आई वांट टू डिस्कस ऐन इन्वेस्टमेंट प्लान विथ यू।'' मैंने कहा माफ़ कीजिएगा मुझे नहीं चाहिए। उसकी ज़िद कि मैं न लूँ पर सुन तो लूँ। बहुत तहज़ीब से उसने कहा '''इफ यू फ्री देन आई विल एक्सप्लेन रिगार्डिंग सम इन्वेस्टमेंट।'' मैंने कहा ''बहुत धन्यवाद, ज़रूरत होगी तो मैं आपसे समपर्क करुँगी'', और उसके अधूरे वाक्य ''थैंक्स मैड s...।'' एक दिन घर के नंबर पर फ़ोन आया ''मे आई टॉक टू ...।'' मैंने कहा ''वो घर में नहीं है'', कोई आवश्यक काम हो तो बताएँ।" उसने कहा ''आई ओनली टॉक टू हिम बिकॉज़ दिस कॉल इज़ रिगार्डिंग हिज़ क्रेडिट कार्ड्स।'' मैंने दोबारा कॉल करने का वक़्त बता दिया।  

बीते हिन्दी-पखवाड़े में ऐसे ही असमय मेरे लिए फ़ोन आया, सधा हुआ अंग्रेजी लहजा ''में आई टॉक टू ...'', उस दिन किसी कारण से मेरा मन खिन्न था और किसी से बात करने की इच्छा नहीं थी, मैंने कहा ''... मैडम घर में नहीं हैं, आप शाम को 6 बजे फ़ोन कीजिए।'' उसने अंग्रेजी में पूछा कि आप कौन बोल रही हैं। मैंने कहा ''साहब हम आपकी अंग्रेजी नहीं समझते हैं, हम यहाँ काम करते हैं चौका-बर्तन, आपको ज़रूरी है तो मैडम के मोबाइल पर बात कर लीजिए नहीं तो शाम को फ़ोन कीजिए।'' उसने कहा ''सॉरी, आई डिस्टर्ब यू।'' मुझे बेहद हँसी आई कि ये कैसे अंग्रेज पैदा हुए हैं देश में जो एक शब्द हिन्दी नहीं बोल सकते? उनके सॉरी को कामवाली समझ रही होगी उसे कैसे पता। कहना ही था तो ''क्षमा कीजिए'' या फिर ''ठीक है'' इतना तो बोल ही सकता था वो। एक कामवाली के कहने पर भी अंग्रेजी मे ही ''सॉरी'' बोल रहा है।  

अंग्रेजी जैसे हर भारतीयों की भाषा बन गई हो। फ़ोन करने वाला कैसे यह उम्मीद कर सकता है कि फ़ोन उठाने वाले को अंग्रेजी समझ आएगा ही? कम से कम दिल्ली और अन्य हिन्दी भाषी प्रदेश में रहने वाला हर कोई हिन्दी बोलना जानता है। मुमकिन है कि प्राइवेट और कॉरपोरेट सेक्टर में तहज़ीब का मतलब अंग्रेजी बन चुका हो। फिर भी यहाँ अब भी ऐसे भारतीय हैं जो कम से कम घर में तो हिन्दी बोलते हैं। शिक्षा पद्धति अंग्रेजी हो गई है फिर भी हिन्दी को जड़ से उखाड़ा नहीं जा सकता है।  

एक बार किसी बड़े रेस्तराँ में बच्चों के साथ खाना खाने गई, वेटरअंग्रेजी में ही बोल रहा था। अमूमन हर रेस्तराँ में वेटर को अंग्रेजी में ही बोलना होता है। मैं उससे हिन्दी में मेनू पूछ रही थी और वो अंग्रेजी में जवाब दे रहा था। बेवज़ह कोई अंग्रेजी बोलता है तो मुझे वैसे भी बड़ा गुस्सा आता है। मैंने उससे कहा क्या आप भरत से ही हैं या कहीं और से आए हैं? उसने अंग्रेजी में कहा कि वो उत्तर प्रदेश से है। मैंने कहा कि फिर आप हिन्दी में जवाब क्यों नहीं दे रहे? उसने कहा ''सॉरी मैडम'' फिर आधी हिन्दी और आधी अंग्रेजी में मुझे बताने लगा। मुझे उस पर नहीं खुद पर तरस आया कि भारत जो अंग्रेजी का गुलाम बन चुका है, मैं हिन्दी बोले जाने की उम्मीद क्यों रखती हूँ।  

मुझे याद है एक बार एक बहुत अच्छे प्रकाशक के पुस्तक विमोचन समारोह में गई थी। जहाँ बहुत सारी पुस्तकों का विमोचन होना था। इनमें एक कवयित्री जो पेशे से डॉक्टर थी की हिन्दी काव्य पुस्तक का विमोचन हुआ। पुस्तक के अनावरण के बाद उनसे कुछ कहने के लिए कहा गया। वो हिन्दी में कविता लिखती हैं लेकिन अपना सारा वक्तव्य अंग्रेजी में दिया। मुझे बेहद आश्चर्य और क्षोभ हुआ। बार-बार मेरे मन में आ रहा था कि उनसे इस बारे में कहूँ। पर मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन बेहद बुरा महसूस हुआ था।  

हिन्दी को लेकर एक और मेरा निजी अनुभव है जो मुझे अपने हिन्दी भाषी होने के कारण पीछे कर गया। विवाहोपरांत मैं दिल्ली आई तो सोचा कि मैं पी एच. डी. कर लूँ। शान्तिनिकेतन में श्यामली खस्तगीर एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिनके मैं बहुत ज्यादा नज़दीक थी। उन्होंने लेडी इरविन कॉलेज में किसी से (शायद प्रिंसिपल) मिलने के लिए कहा और पत्र भी दिया। मैं जब मिली तो वो बहुत खुश हुईं लेकिन उन्होंने बताया कि यहाँ सारी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से होती है और शोध कार्य पूरी तरह अंग्रेजी में होगा, चूँकि मेरी समस्त शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई है अतः बहुत मुश्किल हो सकता है। मैंने कहा कि शोध तो अंग्रेजी में लिख लूँगी लेकिन वाइवा में मुश्किल हो सकती है क्योंकि मुझमें इतनी क्षमता नहीं कि धारा-प्रवाहअंग्रेजी बोल सकूँ। अंततः मैंने भागलपुर विश्वविद्यालय से शोध कार्य किया जहाँ वाइवा हिन्दी में हुआ।  

अक्सर दिमाग में आता है कि आखिर अंग्रेजी की गुलामी कब तक? क्या अब भी वक़्त नहीं आया कि अन्य देश की भाँति हमारे देश की भी अपनी एक ही भाषा हो। अंग्रेजी को महज़ अन्य विदेशी भाषा की तरह पढ़ाया जाए। निःसंदेह ऐसा होना बेहद कठिन भरा होगा लेकिन असंभव नहीं। भारत सरकार निम्न 3 कदम सख्ती से उठाए तो मुमकिन है हमारी हिन्दी देश की राज्य भाषा से राष्ट्र भाषा बन जाएगी और जन-जन तक लोकप्रिय हो जाएगी।  

1.  
देश के हर विद्यालय में हिन्दी को अनिवार्य कर दिया जाए और सभी राज्य की उनकी भाषा को उनकी द्वितीय भाषा कर दी जाए। अंग्रेजी कोई पढ़ना चाहे तो एक विषय की तरह पढ़ सकता है।  

2.  
जब नर्सरी की पढ़ाई शुरू होती है तब से यह नियम लागू किया जाए, ताकि पहले से जो बच्चे अंग्रेजी में पढ़ रहे हैं वो अपनी पढ़ाई पुराने तरीके से ही पूरी करें। नए बच्चे जब शुरुआत ही ऐसे करेंगे तो कहीं से भी कोई दिक्कत नहीं आएगी।  

3.
जिन विषयों की किताबें अंग्रेजी में है चाहे वो विज्ञान की हो या मेडिकल इंजिनीयरिंग या विधि की, सभी का हिन्दी अनुवाद करा दिया जाए। फिर रोजगार में भी हिन्दी माध्यम वालों को कोई मुश्किल नहीं होगी।  

13 साल लगेंगे पूरी शिक्षा पद्धति को बदलने में लेकिन इससे हमारे देश की अपनी भाषा होगी और अंग्रेजियत की गुलामी से मुक्ति मिलेगी। हिन्दी भाषी लोगों को नौकरी में कितना अपमान सहना पड़ता है यह मैंने कई बार देखा है। न सिर्फ नौकरी में बल्कि घर में भी सदैव अपमानित किया जाता है। हिन्दी और अंग्रेजी के कारण देश दो वर्ग में बँट गया है। अमूमन हिन्दी माध्यम के स्कूल सरकारी स्कूल होते हैं जहाँ गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं और अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अमीरों के बच्चे। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे विचार, व्यवहार और संस्कार से अंग्रेजी की गुलामी ख़त्म नहीं हो रही है, यह बेहद अफसोसजनक है। हम भारतवासियों को अपनी हिन्दी पर गर्व होना चाहिए और हिन्दी के सम्मान में हर संभव प्रयास करना चाहिए। आखिर अंग्रेज भाग गए तो अंग्रेजी को क्यों नहीं भगा सकते।  

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2017)  
(हिन्दी दिवस) 
   
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Friday, July 21, 2017

57. ट्यूबलाईट फ्लॉप पर सलमान सुपरहिट


''मैं अपने यकीन से अपने भाई को भी वापस ले आऊँगा।'' वास्तविक जीवन में हमेशा जीतने वाला, कई विवादों में उलझा हुआ, बार-बार प्रेम में पड़ने वाला, लड़कियों का क्रश, तो लड़कों के लिए मसल्स मैन, फिल्म निर्माताओं के लिए पैसा कमाने की मशीन 'सलमान खान' जब ट्यूबलाईट में यह डाॅयलाग बोलता है, वह यकीन उसके चेहरे पर दिखाई देता है फिल्म फ्लॉप हुई है फिर भी तेजी से बढ़ती उम्र के इस हीरो की यह फ़िल्म गौर करने लायक है  

ट्यूबलाईट के रिलीज़ होने से पहले फ़िल्म प्रेमियों में हलचल थी। सलमान की लगभग सभी फिल्में हिट होती है भले ही वे किसी भी भूमिका में हों। अमूमन उनका चरित्र संवेदनशील होता है और अगर मारधाड़ भी कर रहे, तो वह भी कहानी के अनुरूप आवश्यक होता है। उनकी सभी फिल्में दर्शकों के अनुकूल होती है और सपरिवार फिल्म देखी जा सकती है। न तो उनकी फिल्मों में नंगापन होता है न तो फूहड़पन। फिल्म में अगर आइटम सॉन्ग है तो भी वो फूहड़ न लग कर मज़ेदार लगता है।  

ट्यूबलाईट के रिलीज़ होने के दिन फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने से खुद को रोक नहीं पाई। सुबह साढ़े नौ बजे का शो था, तो मुमकिन है इस कारण भीड़ बहुत नहीं थी, हॉल में कुछ सीट खाली भी रह गई।सलमान के स्क्रीन पर आते ही हमेशा की तरह युवा दर्शक ताली भी बजाए और खुश भी हुए। फिल्म क्रिटिक्स को पढ़ने से पता चला कि इस फिल्म को दर्शकों का उतना प्यार नहीं मिला जितना सलमान खान के नाम से मिलता है। मैं कोई कारण नहीं समझ पाई कि इस फिल्म के पसंद न किए जाने के पीछे की वजह क्या है। फिल्म का चित्रांकन, कहानी, पटकथा, लोकेशन, साज-सज्जा सभी बहुत आकर्षक और कहानी के अनुरूप है। कहानी बहुत छोटी है; लेकिन बेहद प्रभावशाली है। मेरे विचार से सलमान खान के सभी फिल्मों में सबसे ऊपर का स्थान मैं इस फिल्म को दूँगी; सलमान की भावनात्मक अदाकारी और मासूमियत के कारण।
  

ट्यूबलाईट एक भोले-भाले बच्चे लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) की कहानी है जो शारीरिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ है लेकिन मंदबुद्धि का है। कोई भी बात वह थोड़ी देर से समझता है और किसी भी चुनौती से घबरा जाता है, इस लिए सभी उसे ट्यूबलाईट कहते हैं। लक्ष्मण अपने भाई भरत (सुहेल खान) के साथ कुमाऊँ की एक शहरनुमा बस्ती जगतपुर में रहता है। वे अनाथ हैं अतः एक बुजुर्ग, जिन्हें वे बन्नी चाचा (ओम पुरी) कहते हैं, उनकी परवरिश करते हैं। कहानी में आज़ादी से पूर्व का भारत दिखाया गया है जब गाँधी जी लक्ष्मण के शहर आते हैं और लक्ष्मण उस समय स्कूल का विद्यार्थी है। गाँधी जी द्वारा कही गई बात वो मन में बैठा लेता है कि ''यकीन रखने से सब कुछ होता है, खुद पर यकीन हो, तो चट्टान भी हिलाई जा सकती है और यह यकीन दिल में होता है।'' लक्ष्मण के यकीन को पहली बार बल तब मिलता है जब शहर में एक जादूगर (शाहरुख़ खान) आता है। जादू दिखाने के दौरान जादूगर लक्ष्मण से एक बोतल को दूर से हिलाने लिए कहता है। दर्शक इस बात पर ट्यूबलाईट कह कर लक्ष्मण का मज़ाक उड़ाते हैं। काफ़ी कोशिश के बाद बोतल हिल जाता है। यूँ यह जादूगर के हाथ की सफाई है; लेकिन जादूगर उससे कहता है कि उसने अपने यकीन की ताकत से बोतल को हिलाया है। इसके बाद लक्ष्मण में आत्म विश्वास जागता है और कुछ भी कर सकने का यकीन उसमें प्रबल हो जाता है। उसकी आँखों में अपनी पहली सफलता पर विश्वास के आँसू आ जाते हैं और वह कहता है कि वह ट्यूबलाईट नहीं है।
  

1962 में भारत-चीन के युद्ध की पृष्ठभूमि पर फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है। भरत का चयन युद्ध में सैनिक के रूप में हो जाता है परन्तु लक्ष्मण का नॉक-नी (knock knee) के कारण चयन नहीं हो पाता है। लक्ष्मण का खुद पर से यकीन न टूटे इस लिए भरत उससे कहता है कि उसे जगतपुर का कप्तान बनाया गया है जिसका काम है इलाके की हर खबर रखना और जानकारी देना। युद्ध छिड़ चुका है और भरत जंग में शामिल होने चला जाता है। एक चीनी बच्चा अपनी माँ के साथ जगतपुर में रहने के लिए आता है। लक्ष्मण सबको सचेत करने के लिए बताता है कि चीनी आ गए हैं। फिर उसे पता चलता है कि उस चीनी स्त्री के परदादा चीन से आकार भारत में बस गए थे, अतः वे भी सबकी तरह भारतीय हैं। पर बस्ती के लोग माँ-बेटे को परेशान करते हैं और लक्ष्मण उन्हें बचाता है; क्योंकि वह उस बच्चे से प्यार करने लगता है। गाँधी जी की कही हुई बात पर उसे यकीन है कि ''अगर दिल में ज़रा भी नफरत रहेगी, तो तुम्हारे यकीन को खा जाएगी''। 

युद्ध के दौरान भरत की मृत्यु की सूचना आती है; लेकिन लक्ष्मण को यकीन है कि युद्ध ख़त्म होगा और भाई लौटेगा। लक्ष्मण कहता है ''मैं अपने यकीन से अपने भाई को भी वापस ले आऊँगा''। बन्नी चाचा से वह पूछता है कि और यकीन उसे कहाँ मिलेगा; क्योंकि भाई को लाने के लिए उसे बहुत यकीन चाहिए। बन्नी चाचा जानते हैं कि यकीन से कोई चमत्कार नहीं होता है। फिर भी मासूम लक्ष्मण का हौसला बढ़ाने के लिए कहते हैं ''गाँधी जी के कदमों पर चलो यकीन आएगा''। गाँधी जी के आदर्शों की फ़ेहरिस्त बना कर बन्नी चाचा उसे देते हैं, ताकि उसका खुद पर यकीन और बढ़ जाए। इसी बीच एक संयोग होता है। लक्ष्मण पूरे यकीन से चट्टान को खिसकाने की कोशिश करता है; क्योंकि गाँधी जी की बात को वह सच मानता है और उसे यकीन है कि वह चट्टान को खिसका देगा। उसके इस कोशिश के दौरान भूकंप आ जाता है और ज़मीन चट्टान सब काँपने लगता है। बस्ती वाले भी यकीन करने लगते हैं कि लक्ष्मण अपने यकीन से चट्टान को खिसका दिया है। किसी ग़लतफ़हमी के कारण भरत की मृत्यु की गलत सूचना आ गई थी। अब भरत वापस लौटता है। लक्ष्मण को पूर्ण विश्वास है कि उसके यकीन के कारण ही उसका भाई वापस लौटा है। 

आज जो परिस्थितियाँ हैं उसके सन्दर्भ में भी यह फिल्म प्रासंगिक है। भरत-चीन युद्ध के दौरान जिस तरह से सभी चीनी को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था अब वही स्थिति पुनः बन गई है। कोई भी जो यहाँ जन्म लिया है वह भारतीय है उस पर संदेह नहीं करना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। एक तरह से इस फिल्म का सन्देश यह भी है।  

हमारा समाज किसी फिल्म में क्या देखना चाहता है; इस विषय पर बहुत गंभीर सोच और बहस की ज़रूरत है। फिल्म का हीरो कभी हार नहीं माने, दस-दस गुंडों से अकेले भीड़ जाए, तो दर्शक सीटी बजाते हैं। अगर वही हीरो विवश या असहाय दिखता है, तो आज का दर्शक उसे अस्वीकार कर देता है। भले ही हीरो के उस किरदार में भावुकता और संवेदनाएँ भरी हुई हों या उस फिल्म की कहानी की माँग हो। आज के दर्शक हीरोइज्म में यकीन करते हैं और शारीरिक रूप से दबंग हीरो को देखने की चाह रखते हैं। मुमकिन है बजरंगी भाई जान की तरह इस फिल्म में भी सलमान चीन की सरहद को पार कर जाते या फिर चीनियों से युद्ध करके भाई को छुड़ा कर ले आते, तो शायद यह भी हिट फिल्मों में शुमार हो जाती।  

ट्यूबलाईट का फिल्मांकन, तो बेजोड़ है ही कलाकारों का अभिनय भी बहुत उम्दा है। सुहेल खान ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। सलमान खान के चेहरे पर इतनी मासूमियत और सौम्यता है कि किसी का भी दिल जीत ले। भावुकता और भोलापन सलमान के अभिनय में कहीं से भी जबरन नहीं लगता बल्कि सहज लगता है। सुहेल खान पहली बार इस फ़िल्म में मुझे अच्छे लगे हैं। सलमान और सुहेल असल ज़िन्दगी में भी भाई हैं, शायद इस कारण भी भाइयों के आपसी रिश्तों का दृश्य बहुत जानदार और भावुक बन गया है। शाहरुख खान ने अपनी छोटी-सी भूमिका में अच्छा प्रभाव छोड़ा है। ओम पुरी, तो यूँ भी एक उम्दा अभिनेता हैं, चाहे जिस भी चरित्र में वह हों। चीनी माँ-बेटे का किरदार भी दोनों कलाकारों ने बहुत अच्छा निभाया है।
  

आजकल बहुत अच्छी और प्रेरक कहानियों पर फिल्में बन रही हैं और उसे दर्शकों से सराहना भी मिल रही है। साथ ही मारधाड़ की फिल्में भी खूब नाम कमा रही है। इसलिए दर्शकों की नब्ज़ को पहचानना कई बार फिल्म निर्माता के लिए कठिन होता है। बहरहाल ट्यूबलाईट भले ही बॉक्स ऑफिस पर असफल कहलाए या सलमान के हिट फिल्मों में इसका नाम शामिल न हो, भले ही सफलता की दौड़ में सलमान खान एक बार हार गए हों, लेकिन सलमान के अभिनय के लिए निश्चित ही यह फिल्म याद रखी जाएगी।     

- जेन्नी शबनम (17. 7. 2017)

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Saturday, July 1, 2017

56. बन्दूक-बन्दूक का खेल

नक्सलवाद और मजहबी आतंकवाद में सबसे बड़ा बुनियादी फ़र्क उनकी मंशा और कार्यकलाप में है। आतंकवादी संगठन हिंसा के द्वारा आतंक फैला कर सभी देशों की सरकार पर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैंइनकी मांग न तो सत्ता के लिए है न बुनियादी जरूरतों के लिए है नौजवानों को गुमराह कर विश्व में एक ही मज़हब का वर्चस्व स्थापित करना इनका उद्देश्य है मजहबी आतंकवाद ने धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपने कब्जे में ले लिया है। नक्सलवाद इन आतंकी संगठनों से बिल्कुल विपरीत बुनियादी मांगों के लिए अस्तित्व में आया लेकिन आज नक्सलवाद का रूप क्रूरता के सभी हदों को पार कर चुका है इनकी मांग निःसंदेह जायज़ है पर तरीका अत्यंत क्रूरतम साम्यवादी सोच का ज़रा भी अंश नहीं इनमें। लाल झंडा उठा लेने से या लाल सलाम और कॉमरेड कह देने से इन्हें साम्यवादी नहीं कह सकते

दाँव पेंच हो या सत्ता की मज़बूरी, आज देश के हालात पर नियंत्रण सरकार के बूते से बाहर होती जा रही है। आम मध्यमवर्गीय जनता किसी तरह जीवन जी रही है। लेकिन खास आदमी डरा रहता है, उसे सरकारी तंत्र के साथ भी चलना है और हिंसक गतिविधियों से भी ख़ुद को बचाना है। निम्न वर्ग की जनता के पास कोई चारा नहीं है।मुख्य धारा से अलग कटे हुए आदिवासी प्रदेश के लोग अब इंसान नहीं रहे, एक ऐसे यांत्रिक मानव बन चुके हैं जिनके शरीर से चेतना निकाल कर बन्दूक जकड़ दी गई है, जिसका नियंत्रण उन कुछ गिने हुए लोगों के हाथ में है जो किसी नक्सलवादी सरगना या नेताओं के हाथ में है, जब जहाँ चाहे इस्तेमाल में ले आते हैं। सच्चाई यह है कि ये बेजुबान पेट की भूख़ के लिए ज़िन्दगी दाँव पर लगा बैठे हैं।
बन्दूक लेकर बन्दूक से लड़ाई हो तो सिर्फ बन्दूक नहीं ख़त्म होता, दोनों में से कोई एक मरता है, और जो मरता है वह भी हमारा ही कोई अपना है, चाहे वो सैनिक हो या नक्सलवादी। आज जब सैनिक मारे जाते हैं तो पूरा देश सुरक्षा-तंत्र की खामियाँ ढूँढता है। परन्तु हर दिन हजारों आदिवासी कभी भूख़ से मरते हैं, कभी नक्सली कह कर फ़र्जी मुठभेड़ में मार दिए जाते हैं, संदिग्ध नक्सली कह कर कितने असहाय और निरपराध जेल में बंद कर दिए जाते हैं।

हत्या करना, सरकारी संपत्ति को नष्ट करना, आतंक फैलाना, बस जैसे इतना ही मुद्दा रह गया है इन नक्सलियों का। आखिर क्यों ये मुख्य मुद्दा से दूर होकर सिर्फ हिंसा पर उतर आये हैं। आदिवासी क्षेत्रों से फैलते हुए सभी राज्यों में नक्सली अपना विस्तार कर रहे हैं। सरकारी शास्त्र को लूट कर अपनी शक्ति मज़बूत कर रहे हैं। आख़िर ये जंग किसके खिलाफ़ है? देश भी अपना सैनिक भी अपने, नक्सली भी इसी देश के वासी। क्या सरकार ग्रीन हंट के द्वारा नक्सली आन्दोलन ख़त्म कर पाएगी? सैनिकों को युद्ध का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि नक्सलियों से लड़ें। क्या आदिवासियों की बुनियादी ज़रूरत नक्सलियों की मृत्यु का पर्याय है?

नक्सलियों की क्रूरता और हिंसा को कोई भी देशवासी उचित नहीं कह रहा है। परन्तु सोच कई खेमों में बँट चुकी है। नक्सली के दिशा परिवर्तन या आदिवासी के उत्थान की बात जो कहता है उसे लाल झंडे के अन्दर मान लिया जाता है। लाल झंडा क्रान्ति की बात कहता है, न कि ख़ूनी-क्रान्ति का पक्षधर है या रहा है।

नक्सलवाद कोई एक दिन की उपज नहीं है, वर्षों की असंतुष्टि का प्रतिफल है जो हिंसा का क्रूरतम और आत्मघाती रूप ले चुका हैनक्सलबाड़ी में जब यह शुरू हुआ, उस समय हथियार और हिंसा की लड़ाई नहीं थी, बल्कि अधिकार की लड़ाई थी। धीरे-धीरे स्थिति और भी बदतर होती गई। किसी भी नक्सली क्षेत्र की बात करें तो वहाँ बुनियादी ज़रूरत भी पूरी नहीं होती है। सहनशक्ति तब तक रहती है जब इंसान ख़ुद भूखा रह जाए लेकिन उसका बच्चा कम से कम भर पेट खाना खा ले।और जब बच्चा भूख़ से दम तोड़ता है तो हथियार के अलावा उन्हें कुछ नहीं सूझता। क्रूरतम अपराध भले है लेकिन दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ तो हो जाता है। अब भी वक़्त है, उनकी ज़रूरत पूरी की जाए और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जाए तथा हर तरह का विकास हो। फिर कोई क्यों किसी की जान लेगा या देगा।

आख़िर क्या वजह है कि ये नक्सलवादी आदिवासी इलाकों में ही पनपते और जड़ जमाते हैं? आज़ादी के इतने सालों के बाद भी और राज्य के बँटवारे के बाद भी आख़िरकर छत्तीसगढ़, ओड़िसा और झारखंड में विकास क्यों नहीं हुआ? विकास गर हुआ भी तो आदिवासी इससे वंचित क्यों हैं? नक्सलवाद को जायज़ कोई नहीं कहता है जैसे अन्य अपराध है वैसे ही यह भी अपराध है गरीब आदिवासियों के लिए नक्सली बनना भी एक मज़बूरी है नक्सली न बनें तो नक्सली मार देंगे, बन गए तो पुलिस से मारे जाएँगे ज़िन्दगी तो दोनों हाल में दाँव पर लगी हुई है। आम आदमी कभी सरकार को या कभी नक्सली को दोषी कह कर पल्ला झाड़ लेता है, क्योंकि इस हिंसक लड़ाई में न तो नेता मरता है न कोई ख़ास आदमी यह तय है कि नक्सलियों की बुनियादी ज़रूरत जब पूरी होगी तब ही उनमें प्रजातंत्र में विश्वास जागेगा और तभी इस ख़ूनी क्रान्ति का खात्मा संभव है। 

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2017)

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Friday, August 5, 2016

55. सिमटता बचपन

वैश्विक बदलाव और तकनीकी उन्नति ने जहाँ एक तरफ जीवन को सरल और सुविधापूर्ण बनाया है, वहीं समाज में कुछ ऐसे भी बदलाव हुए हैं जिसके कारण जीवन की सहजता खो गई है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है दुनिया एक-एक कदम आगे नहीं बढ़ रही बल्कि लम्बी-लम्बी छलाँग लगा रही है। यह परिवर्तन बेहद गहरा और ज़बरदस्त है जिसके कारण जीवन मूल्य तो खो ही रहा है, मानवीय मूल्यों में भी गिरावट आ रही है। हर तरफ नज़र आ रहे सांस्कृतिक और सामाजिक क्षय के मूल में भी यही कारण है।  

आधुनिक समय में जहाँ एक तरफ प्रगति हो रही है और हम दुनिया को सम्पूर्णता में देख रहे हैं, वहीं कहीं न कहीं हमारा जीवन एकाकी और संकुचित होता जा रहा है। सामाजिक बदलाव के कारण कई परिस्थितियाँ ऐसी हो गई हैं कि असमय बच्चे बड़ों के गुण सीख रहे हैं, उनकी तरह व्यवहार कर रहे हैं। सीधे कहें तो इस दौर में बचपन कहीं खो गया है। हालाँकि आज के बच्चों को यह सब न तो अनुचित लगता है न ही अभिभावक उम्र से पहले बच्चों के बचपन के खो जाने को गलत मानते हैं। वे इसे सामान्य स्थिति समझते हैं।
नए जमाने के माता-पिता समाज और परिस्थिति के अनुरूप अपनी अतृप्त आकांक्षाओं को अपने बच्चे में पूरा होते हुए देखना चाहते हैं। फलतः उन पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है। माता-पिता की महत्वाकांक्षा बच्चे को कम उम्र में ही बड़ा बना देती है। प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता की भावना बचपन से ही बच्चों के मन में भर दी जाती है। अतः कम उम्र में ही बच्चा खुद को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर लेता है। छोटी कक्षा के बच्चे भी परीक्षाओं में एक-एक नंबर के लिए दबाव में रहते हैं। स्कूल के बाद ट्यूशन करना आज नितांत आवश्यक हो गया है अन्यथा बच्चा कक्षा में पिछड़ जाएगा। स्वयं को प्रतियोगिता के लिए तैयार कर अपने लक्ष्य को हासिल करना ही एकमात्र उनका ध्येय होता है।
प्रतियोगिता या स्पर्धा सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह गई है बल्कि खेल, गायन, नाट्य, नृत्य, कला, चित्रकारी, आदि हर क्षेत्र में है। खेलने की उम्र में बच्चे बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। माता-पिता अपनी समस्त अधूरी कामनाओं को बच्चों में पूरा करने के लिए जी-जान लगा देते हैं। हर बच्चा अपने आप में विशेष होता है लेकिन हर बच्चे हर क्षेत्र में निपुण हों यह आवश्यक नहीं। उनमें निपुणता लाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। एक तरफ पढाई में भी अव्वल आना है तो दूसरी तरफ प्रतियोगिताओं में भी सफल होना है। इन सबसे बच्चे इतने ज्यादा मासिक दबाव में होते हैं कि कभी-कभी यह दबाव उनके अवसाद की वज़ह बन जाता है।
आकांक्षाओं के बोझ तले सिमटते-सिमटते बच्चे समाज से इस कदर कट जाते हैं कि सामूहिकता के महत्व को ही भूल जाते हैं। सामूहिक खेल जो हमारे बच्चों के शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे, अब मैदानों से गायब हो गए हैं। आज के जमाने के बच्चों को अगर पढने-लिखने से थोड़ा भी समय बचा तो वे आधुनिक तकनीकी उपकरण जैसे कंप्यूटर, मोबाइल, आई पैड आदि में व्यस्त हो जाते हैं। अतः धीरे-धीरे वे एकाकी होने लगते हैं। बच्चों के पास अब न खेलने का समय है न नातेदारों से मिलने-जुलने का। उन्हें पिछड़ जाने का भय सताता रहता है। बच्चे बालक-बालिका न होकर जैसे वक़्त की कठपुतली बन गए हैं। इनका हर एक मिनट बँधा रहता है।   

अपनी और घरवालों की आकांक्षाओं की पूर्ती हेतु बच्चे का भविष्य दाँव पर लग जाता है। बच्चे जानते हैं हर हाल में उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल करना है। इस दौड़ में जो सफल हो गए वे अगली दौड़ के लिए जुट जाते हैं। जो बच्चे इसमें पिछड़ जाते हैं वे अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। कई बच्चों को जब प्रतियोगिता में पिछड़ने का अनुमान होता है तो वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। या फिर झूठ बोलना, चोरी करना, जालसाजी करना आदि गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं।

महत्वाकांक्षाएँ होना आवश्यक है जीवन के लिए, वरना जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं मिलती है। लेकिन आकांक्षाएँ ऐसी भी न हों कि बच्चों का बचपना ही खो जाए और वे उम्र से पहले ही इतने समझदार हो जाएँ कि ज़िन्दगी उलझ जाए और जीवन को सहजता से न जी सकें। आकांक्षा बच्चे के मन, समझ, बुद्धि, विवेक के अनुसार रखनी चाहिए ताकि बच्चों का बचपना बना रहे और जीवन की प्रतियोगिताओं में मानसिक बोझ से दब कर नहीं अपितु आनंद से सहभागी बनें।

- जेन्नी शबनम (4. 8. 2016)

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