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Friday, March 8, 2024

110. स्त्री-रोबोट


चित्र गूगल से साभार 
दरवाज़े की घंटी बजी। बहुत क़रीने से साड़ी पहनी हुई एक स्त्री ने मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोल आने का कारण पूछा। फिर बड़े तहज़ीब से बैठक में बिठा पानी लेकर आई। पानी का ग्लास देने के बाद घर के भीतर गई और उस सदस्य को सूचना दी, जिससे मिलना था। फिर वह मुस्कुराती हुई आई और चाय देकर चली गई। अमूमन आम घरों का यह एक सामान्य चलन है। लेकिन जब पता चले कि वह स्त्री जीवित इंसान नहीं बल्कि रोबोट है, तो निःसन्देह हम चौंक जाएँगे या डर जाएँगे, मानो भूत देख लिया हो। 

सुना है कि ऐसे-ऐसे रोबोट बन गए हैं जो हर काम चुटकियों में कर देते हैं, और वह भी उत्तम तरीक़े से। विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य का विकल्प रोबोट बनाया है। ऐसे रोबोट बन गए हैं जो स्त्री का विकल्प ही नहीं बल्कि स्त्री ही है, जो हर वह काम करेगी जो एक स्त्री करती है। घर के सारे काम से लेकर पुरुष के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का कार्य वह बेहिचक और पूरी तन्मयता से करेगी। स्त्री-रोबोट देखने में ख़ूबसूरत और सुडौल होगी, आपके पसन्द का परिधान पहनेगी, आपके पसन्द का भोजन पकाएगी, जो गीत आप सुनना चाहें वह गाएगी, ऑनलाइन आपके बैंक के कार्य करेगी, बाज़ार से ऑनलाइन सामान मँगाएगी, आपके हर कार्य का हिसाब रखेगी, आपके रूटीन का ध्यान रखेगी, खाना-दवा सही वक़्त पर देगी। आपके मनोभाव के अनुरूप वह हर काम करेगी, जिससे आपको आनन्द आए और जीवन सुचारू रूप से चले। बस वह बच्चा पैदा नहीं कर सकती।  

अभी एक फ़िल्म आई थी 'तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया'। इसमें स्त्री पात्र का चरित्र एक ख़ूबसूरत स्त्री-रोबोट का है, जिसके प्रेम में फ़िल्म का नायक पड़ जाता है; यहाँ तक कि उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध भी बनाता है। उस स्त्री-रोबोट से विवाह करने को व्यग्र हो जाता है और विवाह करने के लिए एक सुघड़ सुसंस्कृत बहु के रूप में घरवालों से मिलवाता है। ख़ैर... यह तो फ़िल्म है, जो हमें हमारे समाज के भविष्य का रूप दिखा रहा है। ऐसा सचमुच कब होगा मालूम नहीं, जब हम एक आम स्त्री और रोबोट में फ़र्क़ न कर पाएँ। हालाँकि फ़िल्म में इसके दुष्परिणाम भी दिखाए गए हैं; लेकिन यह तो सत्य है कि हर पुरुष ऐसी ही रोबोट स्त्री चाहता है, जो बिना थके बिना किसी शिकायत किए चौबीस घंटा उसके लिए मुस्कुराती हुई उपलब्ध रहे।  
चित्र गूगल से साभार 
समाज में स्त्रियों की जो स्थिति है ऐसे में मुनासिब है कि संसार से स्त्री प्रजाति मिट जाए और उसकी जगह स्त्री-रोबोट ले ले। हमारे पुरुषप्रधान समाज में सैकड़ों सालों से स्त्री जीवन के सुधार के लिए कार्य किए गए; लेकिन नतीज़ा सिफ़र। कुछ ख़ास तबक़े और वर्ग को छोड़ दें, तो हज़ारों साल से स्त्री की वास्तविक स्थिति में ज़्यादा सुधार नहीं हुआ है। हाँ! अब स्त्री पढ़ रही है, कार्य करती है, बच्चे सँभालती है और पुरुष को बराबर का सहयोग देती है। परन्तु यह सब इतना कम है कि अगर सही मायने में सर्वे हो, तो सारी बातें स्पष्ट रूप से सामने आएँगी। 

बलात्कार व बलात्कार के बाद हत्या, दहेज़ के लिए प्रताड़ना व हत्या, भ्रूण हत्या, अशिक्षा, बाल विवाह, घरेलु हिंसा, छेड़खानी इत्यादि दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। हज़ारों प्रयत्न के बाद भी स्त्रियों को आज़ादी एवं सुरक्षा नहीं मिल सकी है। स्त्री का जीवन माँ के गर्भ में आने से लेकर मृत्युपर्यन्त ख़तरे में रहता है। दोष सिर्फ़ पुरुष समाज का नहीं, हम सभी की इसमें बराबर भागीदारी है। 

'तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया' फ़िल्म देखकर यह ख़याल आया कि सचमुच ऐसे रोबोट बनाए जाएँ, जो पूर्णतः शारीरिक और मानसिक रूप से स्त्री हो, ताकि पुरुष अपने मनमाफ़िक़ उसका संचालन और उपयोग करे। स्त्री-रोबोट 24 घण्टे हर काम के लिए उपलब्ध रहेगी। घर का काम, बैंक का काम या कोई गुप्त कार्य वह आसानी से करेगी। उसे न भूख लगेगी न प्यास, न आँसू बहाएगी न कोई शिकायत करेगी, न उसे कोई तकलीफ़ होगी, न कोई अपेक्षा रखेगी। जितना मर्ज़ी उसके साथ हमबिस्तर हुआ जा सकता है। अगर बलात्कार भी हो, तो वह न चीखेगी न चिल्लाएगी। पुरुष जो भी कार्य का आदेश देगा वह करेगी। 

अधिकतर पति को अपनी पत्नी से शिकायत रहती है। ढेरों चुटकुले बने हैं पत्नी पीड़ित पुरुष द्वारा स्त्री के लिए। पुरुष के अनुसार पत्नी अपने पति को ग़ुलाम बनाकर रखना चाहती है, उसकी आज़ादी छीन लेती है, उसपर हमेशा सन्देह करती है, निराधार आरोप लगाती है, सिर्फ़ पति के पैसे से मतलब रखती है इत्यादि। ऐसे में स्त्री-रोबोट सचमुच बहुत बढ़िया विकल्प है। पुरुष की सारी ज़रूरत स्त्री-रोबोट पूरी करेगी। अगर ऐसा हो जाए तो पुरुषों की दुनिया बहुत अच्छी और आनन्दमय हो जाएगी।  

जहाँ तक सवाल है कि रोबोट बच्चे पैदा नहीं कर सकती, जो एक जीवित स्त्री का कार्य है; तो इसके लिए रोबोटिक्स के इंजीनियर थोड़ी और मेहनत करें और बच्चा पैदा करने वाली स्त्री-रोबोट का आविष्कार करें। फिर इस संसार से सारी स्त्री ख़त्म हो जाएगी। यों स्त्री की हत्या कई कारणों से होती रहती है- माँ के गर्भ में, दहेज के लिए ससुराल में, प्रेम के लिए हामी न भरने पर पागल प्रेमी द्वारा, बलात्कार करके, प्रतिष्ठा के लिए (ऑनर किलिंग)। स्त्री-रोबोट आ जाने से ये सारे अपराध बन्द हो जाएँगे।

स्त्री को यों भी नरक का द्वार कहा गया है। न रहेगा द्वार न कोई प्रवेश करके जाएगा नरक में। स्त्री मुक्त संसार से यह दुनिया स्वर्ग बन जाएगी। फिर सारे पुरुष स्वर्ग में निवास करेंगे। 

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ। 

चित्र गूगल से साभार 
-जेन्नी शबनम (8.3.2024)
(अन्तर्रष्ट्रीय महिला दिवस)
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Monday, September 14, 2020

79. मेरी हिन्दी, प्यारी हिन्दी

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था ''अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है, हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है'' ''हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है''  

भारत की आज़ादी और गांधी जी के इंतकाल के कई दशक बीत गए; लेकिन आज भी हिन्दी को न सम्मान मिल सका, न बापू की बात को महत्त्व दिया गया हिन्दी पर, हिन्दी भाषियों तथा देश पर जैसे एक मेहरबानी की गई और हिन्दी को राजभाषा बना दिया गया बापू ने कहा था ''राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है'' सचमुच हमारा राष्ट्र गूँगा हो गया है, कहीं से पुर-ज़ोर आवाज़ नहीं आती कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाई जाए दुनिया के सभी देशों की अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा है; लेकिन भारत ही ऐसा देश है जिसके पास अनेकों भाषाएँ हैं लेकिन राष्ट्रभाषा नहीं है जबकि भारत में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है  

काफ़ी साल पहले की बात है, मैं अपनी पाँच वर्षीया बेटी के साथ ट्रेन से भागलपुर जा रही थी ट्रेन में एक युवा दंपती अपने तीन-साढ़े तीन साल के बेटे के साथ सामने की बर्थ पर बैठे थे, जिनका पहनावा काफ़ी आधुनिक था वे अपने घर पटना जा रहे थे बच्चा मेरी बेटी के साथ ख़ूब खेल रहा थादोनों बच्चे बिस्किट खाना चाहते थे मेरी बेटी ने मुझसे कहा ''माँ हाथ धुला दो, बिस्किट खाएँगे'' मैंने कहा ''ठीक है चप्पल पहन लो, चलो'' सामने वाली स्त्री बेटे से बोली ''फर्स्ट वाश योर हैंड्स, देन आई विल गिव यू बिस्किट्स।'' वह बच्चा अपना दोनों हाथ दिखाकर बोला ''मम्मा, माई हैंड्स नो डर्टी।'' उस स्त्री ने अपने पति से अंग्रेज़ी में कहा कि वह बेटे का हाथ धुला दे। दोनों बच्चे बिस्किट खा रहे थे। हाथ का बिस्किट ख़त्म होने पर उस बच्चे ने अपनी माँ से और भी बिस्किट माँगा, कहा कि ''मम्मा गिव बिस्किट'' माँ ने अंग्रेज़ी में बच्चे से कहा कि पहले प्रॉपर्ली बोलो ''गिव मी सम मोर बिस्किट्स'' बच्चा किसी तरह बोल पाया फिर उसे बिस्किट मिला 

मैं यह सब देख रही थी मुझे बड़ा अजीब लगा कि इतने छोटे बच्चे को प्रॉपर्ली अंग्रेज़ी बोलने के लिए अभी से दबाव दिया जा रहा है। मैंने कहा कि अभी यह इतना छोटा है, कैसे इतनी जल्दी सही-सही बोल पाएगा? उस स्त्री ने कहा कि अभी से अगर नहीं बोलेगा, तो दिल्ली के प्रतिष्ठित स्कूल में एडमिशन के लिए इंटरव्यू में कैसे बोलेगा; इसलिए वे लोग हर वक़्त अंग्रेज़ी में बात करते हैं। बातचीत से जब उन्हें पता चला कि मैं दिल्ली में रहती हूँ और मैंने पी-एच.डी. किया हुआ है, तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं अपनी बेटी से हिन्दी में बात करती हूँ और बेटी भी अच्छी हिन्दी बोलती है। मैं सोचने लगी कि क्या उस माता-पिता का दोष है, जो बच्चे के एडमिशन के लिए अभी से बच्चे पर अंग्रेज़ी बोलने का दबाव डाल रहे हैं, या दोष हमारी शिक्षा व्यवस्था का है, जिस कारण अभिभावक प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ाने के लिए बच्चे के जन्म के समय से ही मानसिक तनाव झेलते हैं। 

निःसन्देह हमारे देश का ताना-बाना और सामजिक व्यवस्था का स्वरूप ऐसा बन चुका है, जिससे अंग्रेज़ी के बिना काम नहीं चल पाता है। अगर जीवन में सफलता यानी उच्च पद और प्रतिष्ठा चाहिए तो अंग्रेज़ियत ज़रूरी है। हिन्दी के पैरोकार कहते हैं कि हिन्दी बोलने से ऐसा नहीं है कि आदमी सफल नहीं हो सकता। मैं भी ऐसा मानती हूँ। लेकिन विगत 30-35 सालों में जिस तरह से सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव हुए हैं, हिन्दी माध्यम से कोई सफलता प्राप्त कर भी ले, पर समाज में उसे वह सम्मान नहीं मिलता जो अंग्रेज़ी बोलने वाले को मिलता है। यों अपवाद हर जगह है। अब तो गाँव-कस्बों में भी अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल खुलते जा रहे हैं; क्योंकि सफलता का मापदण्ड अंग्रेज़ी भाषा बोलना हो गया है। आम जीवन में अक्सर मैंने भी यह महसूस किया है। किसी दूकान, रेस्त्राँ, सिनेमा हॉल, मॉल, किसी समारोह इत्यादि में ''एक्सक्यूज मी'' बोल दो, तो सामने वाला पूरे सम्मान के साथ आपकी बात पहले सुनेगा और ध्यान देगा। हिन्दी में भइया-भइया कहते रह जाएँ, वे उसके बाद ही आपकी बात सुनेंगे। अमूमन हिन्दी बोलने वाला अगर सामान्य कपड़ों में है, तब तो उसे जाहिल या गँवार समझ लिया जाता है।   

शिक्षा पद्धति ऐसी है कि बच्चे हिन्दी बोल तो लेते हैं; परन्तु समझते अंग्रेज़ी में हैं। हिन्दी में अगर कोई स्क्रिप्ट लिखना हो तो रोमन लिपि में लिखते हैं। पर इसमें दोष उनका नहीं है, दोष शिक्षा पद्धति का है; क्योंकि हिन्दी की उपेक्षा होती रही है। सभी विषयों की पढ़ाई अंग्रेज़ी में होती है, तो स्वाभाविक है कि बच्चे अंग्रेज़ी पढ़ना, लिखना और बोलना सीखेंगे। हिन्दी एक विषय है, जिसे किसी तरह पास कर लेना है; क्योंकि आगे काम तो उसे आना नहीं है, चाहे आगे की पढ़ाई हो या नौकरी या सामान्य जीवन।   

वर्ष 1986 में नई शिक्षा नीति लागू की गई थी, जिसमें 1992 में कुछ संशोधन किये गए थे। अब दशकों बाद 2020 में नई शिक्षा नीति लागू की गई है, जिसमें मातृभाषा पर ज़ोर दिया गया है। इसमें पाँचवीं कक्षा तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात की गई है। यह भी कहा गया है कि किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाएगा। अब इस नीति से हिन्दी को कितना बढ़ावा मिलेगा, यह कहना कठिन है। हिन्दी प्रदेशों के सरकारी विद्यालयों में हिन्दी माध्यम से पढ़ाई होती है; लेकिन पूरे देश के सभी निजी विद्यालयों में अंग्रेज़ी माध्यम से ही पढ़ाई होती है। इस नई शिक्षा नीति के तहत ग़ैर-हिन्दी प्रदेश और निजी विद्यालय किस तरह हिन्दी को अपनाते हैं यह समय के साथ पता चलेगा।   

अंग्रेज़ी की ज़ंजीरों  में जकड़े हुए हम भारतीयों को न जाने कब और कैसे इससे आज़ादी मिलेगी। बहुत अफ़सोस होता है जब अपने ही देश में हिन्दी और हिन्दी-भाषियों का अपमान होते देखती हूँ। आख़िर हिन्दी को उचित सम्मान व स्थान कब मिलेगा? कब हिन्दी हमारे देश की राष्ट्रभाषा बनेगी? क्या हम यों ही हर साल एक पखवारा हिन्दी दिवस के नाम करके अंग्रेज़ी का गीत गाते रहेंगे? जिस तरह हमारे देश में अंग्रेज़ों ने हम पर अंग्रेज़ी थोप दिया और पूरा देश अंग्रेज़ी का गुणगान करने लगा, क्या उसी तरह हमारी सरकार नीतिगत रूप से हिन्दी को पूरे देश के लिए अनिवार्य नहीं कर सकती? लोग अपनी-अपनी मातृभाषा बोलें; साथ ही हमारी राष्ट्रभाषा को जानें, सीखें, समझें और बोलें।  

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ!

-जेन्नी शबनम (14.9.2020)
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Friday, June 5, 2020

76. बेज़ुबानों की हत्या

महात्मा गांधी ने कहा था कि व्यक्ति अगर हिंसक है, तो वह पशु के समान है। यों लगता है जैसे मानव पशु बन चुका है और पशु मानव से अधिक सभ्य है। यदि पशुओं को चोट न पहुँचाया जाए, तो वे कुछ नहीं करते हैं। पशुओं में न लोभ है, न द्वेष, न ईर्ष्या, न प्रतिकार का भाव, न मान-सम्मान-अपमान की भावना। प्रकृति के साथ प्रकृति के बीच सहज जीवन ही पशु की मूल प्रवृत्ति है। परन्तु मनुष्य अपनी प्रकृति के बिल्कुल विपरीत हो चुका है। मनुष्य की मनुष्यता समाप्त हो चुकी है। मनुष्य में क्रूरता, पाश्विकता, अधर्म, क्रोध, आक्रोश, निर्दयता का गुण भरता जा रहा है। वह पतित, दुराग्रही, पाखण्डी, असहिष्णु, पाषाण-हृदयी हो गया है। वह हिंसक ही नहीं क्रूर हिंसक और बर्बर बन चुका है।  


आए दिन कोई-न-कोई घटना ऐसी हो जाती है कि मन व्याकुल हो उठता है। केरल में गर्भवती हथिनी को अनानास में विस्फोटक रखकर खिला दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। यानी कि उसकी हत्या कर दी गई। लोगों का कहना है कि खेतों को जंगली सूअर से बचाव के लिए इस तरह मारने की विधि अपनाई जाती है। क्या जंगली सूअर जीवित प्राणी नहीं हैं, जिन्हें इतने दर्दनाक तरीक़े से मारा जाता है? अगर हथिनी आबादी वाले क्षेत्र में आ गई थी, तो वन विभाग को पता कैसे न चला? वन विभाग की लापरवाही और आदमी की हिंसक प्रवृत्ति के कारण हथिनी को ऐसी मौत मिली। मनुष्य इतना क्रूर और आतातयी क्यों हो जाता है बेज़ुबानों के साथ? चाहे वह निरीह पशु हो या निर्बल इंसान।  


केवल इस हथिनी की बात नहीं है। ऐसे हज़ारों मामले हैं जब बेज़ुबान जीव-जन्तुओं और पशु-पक्षियों के साथ क्रूरता हुई है और लगातार होती रहती है। हाथी-दाँत के कारोबारी बड़ी संख्या में हाथियों के साथ क्रूरता करते हैं। चमड़ा का व्यवसाय करने वाले उससे सम्बन्धित पशुओं को तड़पा-तड़पाकर मारते हैं। गाय, बैल, भैंस को मारकर खाया जाता है और निर्यात भी किया जाता है। सूअर की हत्या बेहद क्रूरता से की जाती है। बकरी और मुर्गा की तो गिनती ही नहीं है कि हर दिन कितने मारे जाते हैं। कहीं झटका देकर काटते हैं, तो कहीं ज़बह करके मारते हैं।

 

मात्र अपने स्वाद के लिए इन पशुओं की हत्या की जाती है। कुछ मन्दिरों में बलि के नाम पर पशुओं की हत्या होती है, तो बक़रीद पर बकरियों को क्रूरता से मारा जाता है। होली में बकरी का मांस खाना जैसे परम्परा बन चुकी है। मछली को पानी से निकालकर पटक-पटककर मारते हैं या जीवित ही उसका पकवान बनाते हैं। मछली की हत्या कर उसे खाना कैसे शुभ हो सकता है? यह सब प्रथा और परम्परा के नाम पर होता है और सदियों से हो रहा है। किसी जानवर को मारकर कैसे कोई स्वाद ले सकता है? कैसे किसी जीव की हत्या कर जश्न या त्योहार मनाया जा सकता है? यह असंवेदनशीलता है और क्रूरता का चरमोत्कर्ष है। 

 

अक्सर मैं सोचती हूँ कि जिन लोगों ने कुत्ता, बिल्ली, गाय, तोता या कोई भी पशु-पक्षी को पालतू बनाया है और उसे ख़ूब प्यार-दुलार देते हैं, वे अन्य जानवरों को कैसे मारकर खाते हैं? किसी जानवर को मारकर उसका मांस अपने पालतू जानवर को खिलाना क्या संवेदनहीनता नहीं है? अन्य दूसरे जानवरों की पीड़ा उन्हें महसूस क्यों नहीं होती है? अपने पसन्द और स्वाद के अनुसार जानवरों को पालना और मारना, यह कैसी सोच है, कैसी मानसिकता और परम्परा है? 


गर्भिणी हथिनी को लेकर ख़ूब राजनीति हो रही है। निःसन्देह यह मामला बेहद दर्दनाक और अफ़सोसनाक है। परन्तु जैसे हथिनी को लेकर लोगों का आक्रोश है अन्य जानवरों के लिए क्यों नहीं? पशुओं के अधिकार को लेकर आवाज़ उठाने वाले संस्थान, सभी पशुओं के लिए क्यों नहीं आवाज़ उठाते हैं? सभी पशुओं-पक्षियों को मनुष्य की तरह ही जीने का अधिकार है। जंगली जानवर हों या पालतू, सभी को उनकी प्रकृति के अनुरूप जीवन और सुरक्षा मिलनी चाहिए। सभी जंगलों के चारों तरफ़ काफ़ी ऊँचा बाड़ बना दिया जाए, तो इन जंगली जानवरों से आघात की संभावना ही न हो। ये बेख़ौफ़ और आज़ाद अपने जंगल में अपनी प्रकृति के साथ रहेंगे। न जानवरों से किसी को भय न जानवरों को मनुष्य का ख़ौफ़।  


अपने से कमज़ोर और ग़ैरों के प्रति दया और करुणा जबतक मनुष्य में नहीं जागेगी, तब तक ऐसे ही निरपराध जानवरों और मनुष्यों की हत्या होती रहेगी। चाहे वह मॉब लिंचिंग में किसी आदमी की हत्या हो या किसी स्त्री का उसके स्त्री होने के कारण हत्या हो। चाहे वह गर्भिणी हथिनी की हत्या हो या बकरी या मुर्गे की हत्या हो। ऐसे हर हत्या को गुनाह मानना होगा और हर गुनाहगार को दण्डित करना होगा।

 

-जेन्नी शबनम (5.6.2020)
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Sunday, March 8, 2020

71. एक बार फिर बीत गया महिलाओं का एक दिन

महिला दिवस के उपलक्ष्य में रंगारंग कार्यक्रम अपने चरम पर था तय समय से ज़्यादा वक़्त हो गया, पर कार्यक्रम पूरा नहीं हो सका शाम के सात बज गए सभी महिलाएँ जाने को बेताब हो रही थीं; इसलिए कार्यक्रम को शीघ्र ख़त्म करने का बार-बार आग्रह कर रही थीं आयोजक मंडली भी जल्दी-जल्दी सभी कार्यक्रम निपटा रही थी और हर वक़्ता को संक्षिप्त में बोलने का आग्रह कर रही थी कुछ प्रतियोगिताएँ भी हुई थीं, जिसे शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँचाया जा रहा था, ताकि परिणाम घोषित हो सकेसभी तबक़े की महिलाएँ यहाँ आमंत्रित थीं 
 
कार्यक्रम पूर्ण होने से पहले ही तक़रीबन आधी महिलाएँ जा चुकी थीं जो मुख्य अतिथि और वक्ता थीं, वे बार-बार मोबाइल पर वक़्त देख रही थीं एक महिला से यह पूछने पर कि अभी तो सिर्फ़ सात ही बजे हैं, इतनी जल्दी क्या है उन्होंने कहा, ''वे जब तक घर जाकर चाय नहीं बनाएँगी, उनके पति चाय नहीं पिएँगे, भले ही कितनी देर हो जाए यों वे कुछ कहेंगे नहीं कि देर क्यों हुई; लेकिन हमारी परवरिश ऐसी हुई है कि शाम के बाद घर से बाहर रहने की आदत नहीं है कोई कुछ न कहे फिर भी मन में एक अपराधबोध-सा होने लगता है'' किसी महिला को रात के खाने की चिन्ता हो रही है, किसी को उसके बच्चे की चल रही परीक्षा की, किसी को बाज़ार से होली के सामान ख़रीदने हैं, किसी को यह डर कि घर में सास-ससुर नाराज़ होंगेकिसी महिला का पति लेने पहुँच चुका है, तो उस महिला को मानसिक रूप से दबाव लग रहा कि उसका पति उसके कारण इन्तिज़ार में खड़ा हैमुश्किल से 10 महिलाएँ होंगी जो देर होने के बावजूद बेफ़िक्र होकर कार्यक्रम में सक्रिय योगदान कर रही थीं।   

समय की पाबन्दी निःसन्देह आज की ज़रूरत है; लेकिन यह सिर्फ़ महिलाओं के लिए क्यों? यों ढेरों पुरुष हैं जो घर के कार्यों में योगदान करते हैं और एक समय सीमा के भीतर घर आ जाते हैं घर, बच्चे और पत्नी की जवाबदेही बख़ूबी निभाते हैं अगर कभी देर हो, तो वे घर पर बता देते हैं, ऐसे में घर लौटने के बाद पत्नी या बच्चे प्रश्नसूचक दृष्टि से नहीं देखते उनके देर हो जाने से कोई कार्य नहीं रुकता, न देर से आने से पुरुष को कोई ग्लानि होती है पर इसके उलट स्त्रियों के लिए वह सब होता है, जो पुरुष के लिए नहीं होता वह अगर देर तक बाहर है तो कहाँ होगी, कौन-कौन वहाँ होंगे, कैसे जाएगी, कैसे लौटेगी, कितने बजे लौटेगी इत्यादि प्रश्नों के बीच घिर जाती है हाँ, सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह सब जानना लाज़िमी है; परन्तु ये सभी प्रश्न पुरुषों के लिए भी उतने ही ज़रूरी हैं पुरुष भी उतने ही असुरक्षित हैं जितनी स्त्रियाँ इन सबके बावजूद स्त्री-पुरुष के लिए नियमों के अलग-अलग पैमाने तय हो चुके हैं, जो सर्वमान्य हैं।   

शिक्षा, स्वास्थ्य, पहनावा, रहन-सहन इत्यादि हर पहलू पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि हमारा समाज स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अलग-अलग मापदण्ड रखता है और दोहरी नीति अपनाता है। स्त्रियों को उसके विरासत में स्त्री होना सिखाया जाता है, जिसमें तय नियमों पर खरा उतरने की उससे अपेक्षा की जाती है वहीं पुरुषों के लिए बिल्कुल अलग दृष्टिकोण हैशिक्षित समाज में पुरुष से बस इतनी अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षा प्राप्त कर एक अच्छी नौकरी पा ले। अशिक्षित समाज में परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाना पुरुष के लिए वांछित होता है, बाक़ी कुछ भी आवश्यक नहीं है। परन्तु स्त्रियों के लिए चाहे वह शिक्षित समाज हो या अशिक्षित, स्त्रियोचित गुण के साथ उन सारी ज़िम्मेदारियों का पालन करना आवश्यक है, जिसे समाज ने उनके लिए निर्धारित किए हैं। अजीब बात यह है कि कोई भी व्यक्ति इस बात की पुष्टि नहीं करता कि ऐसे नियम समाज में स्थापित हैंस्त्रियों की यह कसौटी पत्नी और माँ, बहु और बेटी में अंतर कर देती है जो क़ायदे किसी की पत्नी के लिए मानने आवश्यक हैं, वे उस पुरुष की माँ, बहन, बेटी के लिए ज़रूरी नहीं होते रिश्तों के साथ सारे समीकरण बदल जाते हैं ऐसे में स्त्री गहन पीड़ा और अकुलाहट से भर जाती है कि ऐसा क्यों है जो बातें किसी स्त्री के लिए वाजिब हैं, पुरुष के लिए ज़रूरी क्यों नहीं? समाज या कानून में ऐसे कोई नियम या क़ायदे नहीं बनाए गए हैं, किन्तु व्यावाहारिक रूप से यही मान्य है और सत्य भी।   

जीवन का समीकरण आख़िर कैसे तय किया जाए? किन नियमों के तहत जीवन को ढाला जाए ताकि समय के साथ क़दमताल मिलाया जा सके? हम स्त्री व पुरुष की बराबरी की बात करते हैं, लेकिन यह तब तक सम्भव नहीं है, जब तक स्त्री व पुरुष को बुनियादी रूप से बराबर न माना जाएसामजिक संरचना, सामाजिक दृष्टिकोण, प्रथाएँ, परम्पराएँ आदि हमारी सोच को इस तरह प्रभावित करती हैं कि कब हम इन नियमों को मानने लग जाते हैं, पता ही नहीं चलता। यों वह सारे नियम जो एक स्त्री के लिए मान्य है, यदि पुरुष भी पालन करने लग जाएँ, तो निःसन्देह समाज में समानता आ जाएगी जो ग़लत नियम या परम्पराएँ स्थापित हो चुकी हैं, उन्हें स्त्री-पुरुष को मिलकर ध्वस्त करना चाहिए जो तरीक़े या नियम पुरुष के लिए ग़ैरज़रूरी हैं, वह स्त्री के लिए भी ग़ैरवाजिब होने चाहिए। 

बहरहाल जीवन प्रवाहमान है असंतुलन बना हुआ है स्त्री-विमर्श की चर्चा हर जगह होती ही रहती है कहीं स्त्री, तो कहीं पुरुष प्रताड़ित होते रहते हैं स्त्रियों की समस्याएँ विकराल और वीभत्स रूप से सामने आ रही हैं इन सभी विषयों पर पूरे समाज को जागरूक होकर सोचने और निर्णय पर पहुँचने की ज़रूरत हैयह तभी मुमकिन है जब समाज में स्त्री-पुरुष बराबर हों और एक दूसरे का सम्मान करें।   

-जेन्नी शबनम (8.3.2020)
(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस)
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Wednesday, October 2, 2019

68. इतना मैं गांधी को जानती हूँ

आज महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती है आज फिर से वह गीत याद आ रहा है, जिसे सुन-सुनकर मैं बड़ी हुई हूँ- ''सुनो-सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी, वो बापू जो पूज है इतना जितना गंगा माँ का पानी...।'' मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गाया और राजेन्द्र कृष्ण द्वारा लिखा यह गीत मेरे कानों में गूँजता रहता है। इस गाने के साथ मेरा बचपन जुड़ा हुआ हैमेरे पिता यह गाना रिकॉर्ड प्लेयर पर हमेशा बजाते थे। इतना ज़्यादा कि इसके बोल याद हो गए मुझे। अक्सर सोचती हूँ काश! मेरा जन्म आज़ादी से पहले हुआ होता, तो मैं अवश्य बापू के साथ जुड़ जाती। बापू मेरे हृदय में बसे हुए हैं; क्योंकि मेरे पिता गांधीवादी विचार के थे और उस परिवेश में पलने-बढ़ने के कारण ख़ुद को उनके क़रीब पाती हूँ। परन्तु तमाम कोशिशों के बावजूद अपने पिता या बापू की जीवन शैली मैं अपना न सकी। 
मेरे पिता
अक्सर सोचती हूँ कि बापू सच में कैसे दिखते होंगे? वे कैसे रहते होंगे? उनके सोच-विचार ऐसे कैसे हुए होंगे? जबकि वे भी तो आम भारतीय ही थे। काश! मैं सच में एक बार बापू को देख पाती। यों बचपन में प्रोजेक्टर पर गांधी जी को देखती थी। न जाने क्यों सदैव उनकी तरफ़ एक खिंचाव-सा महसूस होता रहा। शायद पिता के जीवन यापन का तरीक़ा मेरे सोच पर प्रभावी हुआ होगा। उम्र और ज़रूरत ने मेरी सोच को अपना न रहने दिया। बापू को अपने जीवन में उतार न सकी, इसका दुःख अक्सर सालता है। बापू को पूर्णतः अपनाने के लिए एक साहस चाहिए, जो मुझमें नहीं है। यह ज़रूर है कि मेरे मस्तिष्क में एक क्षीण काया का वह वृद्ध व्यक्ति अक्सर मेरे साथ होता है और मुझे क़दम-क़दम पर टोकता है, जिसने दिश को आज़ादी दिलाई।  
तारा जी और मैं
तारा गाँधी भट्टाचार्या और मैं

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
पिछले वर्ष मैं एक पुस्तक विमोचन में गई। वहाँ एक बुज़ुर्ग महिला आईं, जो शुद्ध खादी के वस्त्रों में थीं और सबसे अलग दिख रही थीं। जिज्ञासा हुई जानने की कि वे कौन हैं किसी परिचित से पता चला कि वे तारा गांधी भट्टाचार्या हैं, महात्मा गांधी के सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी की पुत्री। उनको देखकर मेरा मन इतना रोमांचित हुआ कि जाकर उनसे बात किए बिना रह न सकी। बहुत सरल हृदय की हैं वे। उन्होंने कहा कि जब चाहो घर पर आओ। सन 2014 में मैंने अपने पिता की पुस्तक 'सर्वोदया ऑफ़ गाँधी' (Sarvodaya of Gandhi) का पुनर्प्रकाशन करवाया था। उस पुस्तक के विमोचन में तारा जी के आने की बात हुई थी; परन्तु अस्वस्थ होने के कारण वे नहीं आ सकीं। मैंने यह बताया, तो सुनकर वे बहुत ख़ुश हुईं। उनसे मिलकर मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि लगा मानो बापू से न मिल सकी, परन्तु उनके अंश से तो मिल ली। बापू के बारे में सोचकर मन एक अजीब से रोमांच से भर जाता है।
   
मेरे पिता की पुस्तक
मेरे पिता की पुस्तक
महात्मा गांधी की जीवन शैली और उनके द्वारा किए गए सत्य के प्रयोग के कारण उनकी काफ़ी आलोचना होती है। यों मैं गांधीवाद को जितना जान पाई हूँ अपने पिता के जीवन से जाना है। मैं इस बात को लेकर विश्वास रखती हूँ कि गांधीवाद न सिर्फ़ आज की ज़रूरत है, बल्कि समाज के सकारात्मक उत्थान के लिए आवश्यक है। आज समाज में भ्रष्टाचार, द्वेष, हिंसा, दुराचार, असहनशीलता, अकर्मण्यता, दुराभाव, बलात्कार, मॉब लिंचिंग इत्यादि बढ़ते जा रहे है। इस स्थिति में न सरकार प्रभावी हो पा रही है, न सामजिक संस्थाएँ कुछ कर पा रही हैं। ऐसे में सभी समस्याओं का समाधान गांधीवाद को केन्द्र में रखकर निकाला जा सकता है। यह ज़रूरी है कि न केवल आम जनता बल्कि सत्ता और नौकरशाही भी गांधी को जानें, समझें और आत्मसात करें। वैसे बचपन से सभी को स्कूल में अच्छी शिक्षा दी जाती है; लेकिन कुछ तो कमी है, जिससे समाज ऐसा होता चला जा रहा है। जीवन शैली और शिक्षा पद्धति में बड़े बदलाव की सख़्त ज़रूरत  है।
   
बापू के जीवन के सिद्धांत या नियम इतने सहज, सरल और मानवीय हैं कि अगर कोई मन से चाहे तो अवश्य अपना सकता है। एक सुसभ्य, सम्मानित और आत्मनिर्भर व्यक्ति तथा समाज के निर्माण के लिए बापू की जीवन शैली अपनाना ही एकमात्र तरीक़ा है। हमारा राष्ट्र अगर बापू के विचार का कुछ अंश भी हमारे क़ायदे-कानून में शामिल कर दे, तो निःसन्देह एक सुन्दर समाज की कल्पना साकार हो सकती है। बापू के विचार समाज में समूल परिवर्तन कर एक आदर्श स्थिति को लाने में बेहद कारगर हो सकते हैं, जैसे कि आज़ादी की लड़ाई में गांधी जी ने किया था।   

आज गांधी जयन्ती पर सरकार और समाज से यही उम्मीद है कि गांधी को पढ़ें, समझें, फिर अपनाएँ बापू को सादर प्रणाम!   

महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जी को उनकी जयन्ती पर हार्दिक नमन!   

-जेन्नी शबनम (2.10.2019)   
(महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती पर)
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Thursday, August 1, 2019

66. जीवन का आनन्द

आनन्द
रविवार का दिन! अलसाया- सा मन! मौसम बहुत सुहावना है। रात ख़ूब बारिश हुई थी और अभी भी हल्की-हल्की फुहारें पड़ रही हैं। हम सुस्ती से उठकर चाय पी ही रहे थे कि अचानक ख़याल आया- क्यों न इस मौसम का आनन्द लेने हम लॉन्ग-ड्राइव पर चलें। लाल रंग की मारुति 800 से निकल पड़े हम, बिना पूर्व कार्यक्रम की रूपरेखा बनाए। कहाँ जाना है नहीं मालूम, पर बतकही करते हुए चले जा रहे हैं। हल्की भूख लगी तो झालमुढ़ी ख़रीदकर काग़ज़ के ठोंगे से निकाल-निकालकर खा लिया। प्यास लगी तो सड़क किनारे किसी चापाकल पर अँजुरी से ठण्डा-ठण्डा पानी पी लिया। चाय की तलब लगी तो किसी चाय की टपरी पर कुल्हड़ में सुड़क-सुड़ककर इलायची वाली चाय पी ली। स्टीरियो पर कोई मधुर गीत बज रहा है और साथ में हम गुनगुना रहे हैं कभी कोई मज़ाक या कोई मज़ेदार चुटकुला। ज़ोर की भूख लगी तो किसी सस्ते से ढाबे पर रोटी, तरकारी, दही खा लिया। कोई फ़िक्र नहीं कि लोग क्या सोचेंगे, जो मन को भाया वह कर रहे हैं। क्या मस्त दिन और ज़िन्दगी का मज़ा! कितना सुन्दर और सुखद है न! और इसपर बारिश तेज़ हो जाए। अहा! सोने में सुगन्ध! 
बरसात

पानी
 
 
अब भी याद है बचपन की वह झमाझम बारिश। ख़ूब जीभरकर बारिश में नहाना और पेड़-पौधों को दुलराना। घर के सभी बर्तनों में बारिश का पानी भरकर रखना। छत को ख़ूब रगड़-रगड़कर धोना। छत की नाली को बंदकर एक छोटा तरणताल का रूप देकर उसमें छप-छप कूदना और काग़ज़ की नाव बनाकर तैराना। अँजुरी से पानी उलीच-उलीचकर घर के सभी लोगों को भिगो देना। घंटो कैसे निकल जाते, पता ही नहीं चलता था। सड़क पर लोगों का बारिश से बचने के लिए क्या-क्या जतन करते हुए देखना मन को बहुत भाता था। रिक्शावाला ख़ुद भीगकर सवारी को प्लास्टिक में छुपाए हुए है; लेकिन बारिश है कि अपने बौछारों से प्लास्टिक को उड़ा दे रही है। साइकिल-सवार तेज़ी से भाग रहा है और बग़ल से गुज़रने वाली गाड़ी के छींटे से कीचड़ में सन गया है। छोटे-छोटे बच्चे बारिश में उछल-कूद कर रहे हैं और उनकी माताएँ ग़ुस्सा हो रही हैं कि ज़्यादा भीगने से वे बीमार होंगे। चिड़िया बारिश से छुपने के लिए ओसारे में छुप गई है और चीं-चीं कर अपने साथियों को छिपने के लिए बुला रही है। सब कुछ बहुत सुहावना होता था।  
मज़ा
मस्ती


 
 
ऐसा दिन भी होता था कभी, जब हम बेफ़िक्र होते थे। न कोई डर, न किसी से रंजिश। जीवन बस जीवन - चहकना, महकना और खिलखिलाना। धीरे-धीरे समय को तेज़ी का रोग लग गया। अब वह ठहरता ही नहीं; न अपने लिए, न किसी अपनों के लिए। समय के पीछे हम सभी बेतहाशा भाग रहे हैं। यह सब बेसबब नहीं; लेकिन वक़्त की कसौटी ने ऐसे ही परखने का मन बना लिया है। हम भाग रहे हैं, बस भाग रहे हैं। न समय ठहरता है, न मन, न मानव। ठहर गए, तो हार गए। भले इसके लिए सुकून को तिलांजली दे दी गई। बस एक ही धुन कि सबसे आगे हम। आख़िर कब तक? जब समझ आया कि जीवनभर हम भागते रहे, ख़ुद को ख़र्च करते रहे और हाथ आया तो बस मलाल तब सोचते, काश! थोड़ा थमकर थोड़ा जीकर जीवन का लुत्फ़ उठाए होते
पड़ाव

सफ़र
ज़िन्दगी

उत्सव
अक्सर सोचती हूँ कितना छोटा और सीमित होता है जीवन। सभी को काल कवलित होना ही है। फिर क्यों है इतना त्राहिमाम्? जन्म के बाद से ही ख़ुद को साबित करने के लिए भेड़चाल में घुसना पड़ता है। कैसे सबसे आगे आया जाए। कितनी सुख-सुविधा जुटाई जाए। राह चलें, तो दस लोग बोलें कि देखो वह कोई ख़ास जा रहा है। अमीरी दिखाने के लिए बड़ी और महँगी गाड़ियाँ, विशाल कोठी, ब्रांडेड कम्पनी के वस्त्र, ज़बरदस्ती का रुआब। विशिष्ठ वर्ग का दिखने और उस जीवन-स्तर को बनाए रखने में आदमी सामान्य जीवन जी नहीं पाता है। धीरे-धीरे मनुष्य इतना दम्भी होता जा रहा है कि जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियों का आनन्द नहीं ले पाता है। आदमी ने ख़ुशी और आनन्द को तवज्जोह न देकर शोहरत-दौलत को दिया। ख़ूब कमाया और शान से लुटाया। पर अंत समय में सब कुछ हाथ से फिसल जाता है। परहेज़ी-खाना, नियमित रूटीन, दवा, डॉक्टर और घरवालों पर बोझ। जिनके लिए जीवनभर कमाया और जीवन गँवाया, वे भी अब दूर भागते हैं। यही जीवन का वर्तमान परिदृश्य और यही जीवन का सत्य!  

जीवन की अन्तिम यात्रा - बनारस
आज चारों तरफ़ कोहराम मचा है। आपाधापी के इस माहौल में हर आदमी दूसरे को गिराकर ख़ुद ऊपर उठना चाहता है। ईर्ष्या-द्वेष ने हर आदमी के मन में घर बसा लिया है। सभी एक दूसरे को सन्देह से देखते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बात पर आपा खो देते हैं। दूसरों के विचारों को सम्मान देना तो अब ऐसा लगता है जैसे यह हमारी परम्परा का हिस्सा ही नहीं रह गया है। स्त्री और बच्चे बहुत ज़्यादा असुरक्षित हो चुके हैं। आज हर लोग डरे हुए हैं कि कब हमारे साथ क्या हो जाए। छोटी-छोटी बातों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं। ऐसी-ऐसी हिंसक घटनाएँ हो रही हैं कि मन विचलित हो जाता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम सभी ख़ुद को बेबस महसूस करते हैं। कैसे इन सबसे नजात पाया जाए? 
दुःख व आँसू (हमारा सीज़र)
जहाँ तक मैं सोचती हूँ कि मनुष्य की मनोवृत्ति को सुधारा जाएगा, तभी उसकी प्रवृत्ति सुधरेगी और समाज में समुचित बदलाव हो सकता है। इस बदलाव की शुरुआत निःसन्देह घर और स्कूल से ही सम्भव है। हालाँकि इस दिशा में स्वयंसेवी संस्थाएँ एवं समाज-सुधारक प्रयासरत हैं। फिर भी हम असफल हो रहे हैं और समाज में नफ़रत का वातवरण बढ़ता जा रहा है। हर माता-पिता और स्कूल अपने बच्चों को प्रेम व सम्मान देने का बीजारोपण बचपन से करें, तो मुमकिन है कि बदलाव को एक नई दिशा मिलेगी। हर माता-पिता निःसंकोच मनोविश्लेषक से मिलकर बच्चे की मनोवृत्ति का पता करें और उनके निर्देशों का पालन करें। हर सरकारी अस्पतालों में मनोविश्लेषण का विभाग होना चाहिए; जैसे बच्चों का टीकाकरण अनिवार्य होता है, वैसे ही यह भी अनिवार्य होना चाहिए।  
 
उमंग

उत्साह
प्रकृति द्वारा प्रदत्त और हमारे द्वारा सृजित समस्त वस्तुएँ प्रकृति की अक्षुण्ण सम्पदा हैं। सूर्य, हवा, पानी, जंगल, ज़मीन, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और भी बहुत कुछ हमें प्रकृति ने दिया है। प्रकृति ने जीभरकर हमें दिया है; लेकिन हम हैं कि प्रकृति और जीवन का अपमान करते हैं। जबकि जीवन कितना ख़ूबसूरत है। अलौकिक है। खुश रहना, आनन्दित रहना, दूसरों को सुख देना हमारी आन्तरिक सम्पत्ति है यह ऐसी सम्पदा है, जिसे हम छू नहीं सकते; बल्कि एहसास कर सकते हैं। सबसे बड़ी ख़ूबी जो हम मानव को प्रकृति ने दी है, वह है हमारा मस्तिष्क एवं सोचने, समझने और महसूस करने की शक्ति। तो क्यों नहीं हम प्रकृति के इस तोहफ़े का आनन्द उठाएँ? जब जागो तभी सवेरा। उठो और निकल पड़ो प्रेम पाने और प्रेम लुटाने, ख़ुशियाँ बटोरने और ख़ुशियाँ पसारने। इंसानी जीवन बहुत नेमत से मिलता है, इसे बहुत सोच-समझकर आनन्द के साथ ख़र्च करना चाहिए; ताकि अंत समय में हम ख़ाली हाथ न रहें, बल्कि प्रेम और आनन्द की पुड़िया हमारी मुट्ठी में बंद हो, जब हमारी आँखें बंद हों।  
प्रफुल्लित

-जेन्नी शबनम (1.8.2019)
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Saturday, December 22, 2018

62. नसीर के डर की वज़हें वाज़िब हैं, मैं भी डरी हुई हूँ

गूगल से साभार
न जाने आज बहुत आलस-सा लग रहा थारोज़ की तरह सात बजे उठकर नियमित क्रमानुसार सारे कार्य करने का मन भी नहीं हुआ। सब छोड़कर एक कप चाय के साथ एक हिन्दी अख़बार लेकर पढ़ने बैठीअख़बार में अधिकांशतः नकारात्मक ख़बरें होती हैं; मगर देश-दुनिया की थोड़ी सकारात्मक ख़बरें भी मिल जाती हैंजैसे कुछ नई उम्मीद, कुछ अनोखा ज्ञान, कुछ अजूबे, कुछ शिक्षा, देश-दुनिया की प्रगति की कुछ बातें आदि-आदि। 

हत्या, सड़क दुर्घटना, बलात्कार, राहजनी, लूट, एक गर्भवती स्त्री द्वारा पंखे से लटककर आत्महत्या और पंखे से लटके में ही उसके बच्चे का जन्म जो दो घंटे तक मृत माँ के साथ गर्भनाल से लटका रहा ओह! सुबह-सुबह ये दिल दहलाने वाली ख़बरें; पर यह तो रोज़ की बात है एक और ख़बर जिस पर दो दिनों से बहुत ज़्यादा चर्चा है कि महान अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने बुलंदशहर गोकशी काण्ड पर कहा कि ''मुझे देश के हालात पर ग़ुस्सा आता है और अपने बच्चों के लिए डर लगता है'' मुझे याद है एक बार आमिर खान द्वारा असुरक्षा और असहिष्णुता पर दिए गए बयान पर काफ़ी बवाल मचा था, जिसमें वे बताते हैं कि उनकी पत्नी कहती हैं कि उन्हें भारत से बाहर चले जाना चाहिए। 

मुझे इन दोनों के डर का कारण कहीं से भी ग़लत नहीं लगा वे इसलिए नहीं डरे हुए हैं कि मुसलमान हैं, बल्कि इसलिए डरे हुए हैं कि हमारे देश में अराजकता का वातावरण है मन्दिर-मस्जिद के मसले में हज़ारों हत्याएँ हो चुकी हैं गाय के नाम पर कितने क़त्ल हो चुके हैं मॉब लिंचिंग की घटनाएँ आम हैं चोरी के शक में बेगुनाहों की हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार और बलात्कार के बाद हत्या, न सिर्फ़ बालिकाएँ बल्कि बालकों का भी अप्राकृतिक यौन शोषण, छेड़खानी, एसिड अटैक, रंगदारी न देने पर हत्या, पैसों के लिए अपहरण, बेलगाम गाड़ियों या बस-ट्रक द्वारा दुर्घटना या हत्या आदि-आदि क्या-क्या और कितना गिनाएँ! नए-नए क़िस्म के अपराध देश में हर तरफ़ नज़र आते हैं।  
एक दिन मैं कहीं जा रही थी बग़ल से एक छोटी गाड़ी शायद टाटा इंडिका गुज़री, जिसपर कार की तरफ़ से लिखा हुआ था कि अगर किसी ने मुझे छुआ भी तो जान ले लूँगी अब कोई गाड़ी तो ऐसा न कहेगी, गाड़ी के मालिक की मंशा इससे स्पष्ट होती है दिल्ली में इतनी ज़्यादा गाड़ियाँ हैं कि ज़रा-सा टकरा जाना तो आम बात है यों जानबूझकर कोई अपनी या दूसरे की गाड़ी का नुक़सान नहीं पहुँचाता है, फिर भी दुर्घटना हो जाती है क्या ऐसे में हत्या कर दी जाए?
निःसन्देह भारत की स्थिति बेहद चिन्ताजनक है सबसे ज़्यादा अराजकता राजनीतिक पार्टियों के गुंडों द्वारा की जाती है उन्हें किसी का डर नहीं मन्दिर और गाय के नाम पर इंसानों की बलि चढ़ाते उन्हें देर नहीं लगती और न दंगा फैलाते देर लगती है ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और बढ़ती जनसंख्या के कारण आज के युवा इन सब के लिए सहज उपलब्ध हो जाते हैं। इनके गर्म ख़ून को ज़रा-सी हवा देने की देर है कि लहलहाकर जलते हैं और राख के ढेर की तरह भरभराकर भस्म होते हैं।  

देश की सामाजिक और राजनैतिक स्थिति ऐसी है कि देश में कहीं कोई ऐसी जगह नहीं, जहाँ कोई सुरक्षित और सहज जीवन जी सके ऐसे में कोई आम नागरिक कहे कि उसे अपने बच्चों के लिए डर लगता है, तो उसकी बात पर बवाल खड़ा कर दिया जाता है किसे डर नहीं लगता है? हमारे बच्चे घर से बाहर निकलते हैं, तो सारा दिन डर में बीतता है, जब तक बच्चे सुरक्षित घर नहीं आ जाते इस डर से ग़रीब-अमीर सभी फ़िक्रमन्द हैं और ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ अमन-चैन हो।  
आमिर खान की पत्नी हो या नसीरुद्दीन शाह या हम, हम सभी का डर वाज़िब है। देश के हुक्मरान इस हालात को क्यों नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, यह समझ नहीं आता है अगर उन लोगों को डर नहीं है, तो फिर अराजकता के इस वातावरण को ख़त्म हो जाना चाहिए था राम राज्य तो एक दिन में आ जाता है; अब तक तो देश में राम राज्य आ जाना चाहिए था।  

-जेन्नी शबनम (22.12.2018)
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Thursday, March 8, 2018

59. स्त्री की आज़ादी का मतलब


''हमें चाहिए आज़ादी!'', ''हम लेकर रहेंगे आज़ादी!'' किसे नहीं चाहिए आज़ादी हम सभी को चाहिए आज़ादी सोचने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, विचार की आज़ादी, प्रथाओं से आज़ादी, परम्पराओं से आज़ादी, मान्यताओं से आज़ादी, काम में आज़ादी, हँसने की आज़ादी, रोने की आज़ादी, प्रेम करने के आज़ादी, जीने की आज़ादी, स्त्री के तौर पर जन्म लेने की आज़ादी 

कभी-कभी मेरे दिमाग़ की नसें कुलबुलाती हैं, ढेरों विचार छलाँग मारते हैं, ज़ेहन में अजीब-अजीब से ख़याल आते हैं, साँसें घुटती हैं, लफ़्ज़ों की पाबन्दी उफ़ान मारती है अघोषित नियमों की पहरेदारी में अस्तित्व मिट रहा हैसपने मर रहे हैं आक्रोश, उन्माद और अवसाद एक साथ घेरे हुए है। कभी-कभी सोचती हूँ, कहीं ये पागलपन तो नहीं; परन्तु बाह्य नहीं यह अंतस् में व्याप्त है निःसंदेह चेतनाशून्य हो जाने का मन होता है अवचेतन मन पर जो भी प्रभाव हो, पर व्यक्त रूप से प्रभाव नहीं पड़ने देना होगा हर हाल में हमें स्वयं पर नियंत्रण रखना ही होगा हमारी मान्यताएँ और मर्यादा इसकी अनुमति नहीं देती है  

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत के 109 साल हो रहे हैं। हर वर्ष आठ मार्च को महिला दिवस स्त्रियों की उपलब्धि और सम्मान के लिए दुनिया भर में न सिर्फ़ महिलाएँ, बल्कि पुरुष भी मनाते हैं। परन्तु यह दिन महज़ अब एक ऐसा दिन बनकर रह गया है, जब सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठन स्त्रियों के पक्ष में कुछ बातें कहेंगे, कुछ नई योजनायें बनाई जाएँगी, विचार-विमर्श होंगे और फिर ''दुनिया की महिलाएँ एक हों!'' के उद्घोष के साथ आठ मार्च के दिन की समाप्ति हो जाएगी। फिर वही आम दिन की तरह कहीं किसी स्त्री का बलात्कार, किसी का दहेज उत्पीड़न, किसी का जबरन विवाह, कहीं कन्या भ्रूण-हत्या, कहीं एसिड से जलाया जाएगा तो कहीं परम्परा के नाम पर स्त्री बलि चढ़ेगी।  

महिला दिवस मनाने का अब मेरा मन नहीं होता है। न उल्लास, न उमंग।सब कुछ यांत्रिक-सा लगने लगा है। टी.वी. और अख़बार द्वारा महिला दिवस के आयोजन को देखकर मुझे यों महसूस होता है ज्यों हम स्त्रियों का मखौल उड़ाया जा रहा है। बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर, जहाँ स्त्रियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए जैसे बीज-मंत्र लिख दिया गया हो। प्रचार पढ़ो, देखो और फिर मान लो कि स्त्रियों की स्थिति सुधर गई हैबाज़ारीकरण का स्पष्ट असर दिखता है इस दिन कपड़े, आभूषण इत्यादि पर छूट! तरह-तरह के प्रलोभन! न कुछ बदला है, न बदलेगा! ढाक के वही तीन पात!  

सही मायने में अब तक स्त्रियों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, भले हम स्त्री सशक्तीकरण की कितनी ही बातें करें। स्त्री-शिक्षा और उसके अस्तित्व को बचाने के लिए ढेरों सरकारी योजनाएँ बनीं। सरकारी और ग़ैर-सरकारी संगठन के तमाम दावों के बावजूद स्त्रियों की स्थिति शोचनीय बनी हुई है। हालात बदतर होते जा रहे हैं। महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की परियोजनाएँ फाइलों में ही खुलती और बंद होती हैं। ग्रामीण और निम्न वर्गीय महिलाओं की स्थिति में महज़ इतना ही सुधार हुआ है कि उनके हाथों में झाड़ू और हँसुआ के साथ मोबाइल भी आ गया है। निःसन्देह मोबाइल को प्रगति का पैमाना नहीं माना जा सकता है।   

सामजिक मूल्यों के ह्रास का असर स्त्री के शारीरिक शोषण के रूप में और भी विकराल रूप में उभरकर सामने आया है। शारीरिक अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। मेरा अनुमान है कि 99% महिलाएँ कभी-न-कभी शारीरिक शोषण का शिकार हुई हैं। चाहे वह बचपन में हो या उम्र के किसी भी पड़ाव पर। घर, स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, अस्पताल, बाज़ार, सड़क, बस, ट्रेन, मन्दिर, कहीं भी स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं हैं। शोषण करने वाला कोई भी पुरुष हो सकता है; उसका अपना सगा, रिश्तेदार, पति, पिता, दोस्त, पड़ोसी, परिचित, अपरिचित, सहकर्मी, सहयात्री, शिक्षक, धर्मगुरु इत्यादि।       
परतंत्रता को आजीवन झेलना स्त्री के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप हैस्त्री को त्याग और ममता की देवी कहकर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जाता है, ताकि वह सहनशील बनी रहकर अत्याचार सहन करती रहे और अगर न कर पाए तो आत्मग्लानि में जिए कि स्त्री के लिए निर्धारित मर्यादा का पालन वह नहीं कर पाई यह एक तरह की साज़िश है, जो स्त्री के ख़िलाफ़ रची गई है। स्त्री को अपेक्षित कर्त्तव्यों के पालन के लिए मानसिक रूप से विवश किया जाता है स्त्रियाँ अपना कर्त्तव्य निभाते-निभाते और मर्यादाओं का पालन करते-करते दम तोड़ देती हैं; लेकिन मनचाहा जीवन आजीवन जी नहीं पाती हैं।  

समाज का निर्माण कदापि मुमकिन नहीं, अगर स्त्री को समाज से विलग या वंचित कर दिया जाए इसका तात्पर्य यह नहीं कि पुरुष की अहमियत नहीं है या पुरुष के ख़िलाफ़ कोई साज़िश है परन्तु पुरुष के वर्चस्व का ख़म्याज़ा न सिर्फ़ स्त्री भुगतती है, बल्कि पूरा समाज भुगतता है मानवता धीरे-धीरे मर रही है असंतोष, आक्रोश और संवेदनशून्यता की स्थिति बढ़ती जा रही है कौन किससे सवाल करे? कौन उन बातों का जवाब दे, जिसे हर कोई सोच रहा है भरोसा करने का कारण नहीं दिखता; क्योंकि कहीं-न-कहीं हर स्त्री ने चोट खाई है परिपेक्ष्य चाहे कुछ भी हो; परन्तु सन्देह के घेरे में सदैव स्त्री आती है और आरोपित भी वही होती है अपनी घुटन, छटपटाहट, पीड़ा, भय, अपमान आदि किससे बाँटे? वह नहीं समझा सकती किसी को कि वह सब अनुचित है, जिससे किसी स्त्री को तौला और परखा जाता है  
ऐसा नहीं कि सदैव स्त्रियाँ सही होती हैं और हर पुरुष ग़लत अक्सर देखा है कि जहाँ पुरुष कमज़ोर है या स्त्री के सामने झुक जाता है, वहाँ स्त्रियाँ इसका फ़ायदा उठाती हैं; वैसे ही जैसे स्त्री की कमज़ोरी का फ़ायदा पुरुष उठाता है स्त्रियों के अधिकार की रक्षा के लिए बहुत सारे कानून बने हैं और इन कानूनों का नाज़ायज़  फ़ायदा ऐसी स्त्रियाँ उठाती हैं मेरे विचार से ऐसी महिलाएँ मानसिक रूप से कुण्ठा की शिकार हैं। अमूमन जब किसी को पावर (शक्ति) मिल जाता है, तो वह अभिमानी और निरंकुश हो जाता है इसी कारण कुछ महिलाएँ जिन्हें पावर मिल जाता है, वे पुरुषों को प्रताड़ित करने लगती हैं अधिकांशतः पति और अधीनस्थ कर्मचारी महिलाओं द्वारा प्रताड़ित किए जाते हैं इसलिए मेरे विचार से मुद्दा स्त्री-पुरुष का नहीं बल्कि शक्ति और सामर्थ्य का है  
आखिर क्यों नहीं स्त्री-पुरुष एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं और एक दूसरे को बराबर समझते हैं ताकि कोई किसी से न कमतर हो, न कोई किसी के अधीन रहे ऐसे में हर दिन महिला दिवस होगा और हर दिन पुरुष दिवस भी मनाया जाएगा।  

-जेन्नी शबनम (8.3.2018)
(अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस)
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