Saturday, May 8, 2010

8. ईश्वर के होने और न होने के बीच...

''नास्तिकता सहज है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। आस्तिकता हम सिखाते हैं, जन्मजात कोई भी आस्तिक नहीं होता।'' आज सुबह-सुबह मेल देखने के लिए मैं अपना मेलबॉक्स खोली, मित्र संजय ग्रोवर द्वारा 'नास्तिकों का एक ब्लॉग' पर लिखे गए लेख में यह पढने को मिला| पसंद का विषय देख सारा काम छोड़ मैं पूरा लेख पढ़ गई, फिर लोगों की प्रतिक्रिया, उत्तर-प्रत्युत्तर भी पढ़ गई| मुझे लगा इस बात पर विचार ज़रूर करना चाहिए कि कहीं हमारी आस्तिकता हमें ज़िन्दगी को पुरज़ोर तरीके से जीने में बाधा तो नहीं बन रही है|


मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई है जिससे मेरी अपनी सोच विकसित हो सकी और कभी कोई विचार प्रभावी न हो सका मुझपर| मेरे विचार या सोच सही है या गलत ये मैं नहीं जानती, लेकिन मेरे लिए ये उपयुक्त है और ये मेरी अपनी समझ से विकसित हुई है| ऐसा नहीं कि मैं अपनी सोच के प्रति कट्टर हूँ लेकिन किसी को आहत किये बिना अपनी सोच पर कायम रहती हूँ| धर्म से जुड़े विषय पर सभी को पढ़ती और समझने का प्रयत्न करती हूँ, जहाँ जो विचार मेरे तर्क की कसौटी पर खरे लगे ख़ुद के जीवन में अपना लेती हूँ| हालाँकि इसे लेकर अक्सर मेरी आलोचना भी होती है तथा मुझे अपरिपक्व, अधार्मिक और गैर-सामाजिक होने का ख़िताब भी मिलता है| आलोचना हो या प्रशंसा मैं इसपर ज्यादा नहीं सोचती, लेकिन यह उम्मीद ज़रूर रहती है कि कोई तर्क से मुझे समझाए कि मैं क्यों गलत हूँ| परन्तु सदैव लोगों के पास तर्क नहीं होता, महज़ परम्पराओं, प्रथाओं और तथाकथित आदर्श में गूँथे नियम क़ानून होते हैं, जो कभी मुझे स्वीकार्य नहीं हुए|


मेरे बचपन की कुछ बातें हैं जो आज यह सब लिखते-लिखते याद आ गई; जो शायद इस सन्दर्भ में लिखना उचित भी हो, क्योंकि मेरी सोच को परिष्कृत करने में ये सहायक रहे हैं| मेरे बचपन की बातें हैं जो बहुत हल्की-सी याद है और कुछ बातें बाद में मेरी माँ से मुझे पता चली| विजयवाड़ा के एक बहुत बड़े नास्तिक थे 'प्रोफ़ेसर गोरा' (गोपाराजु रामचन्द्र राव) जिनका पूरा नाम तब नहीं जानती थी, जिनकी एक पत्रिका निकलती थी 'atheist', मेरे पिता के वो बहुत घनिष्ट मित्र थे; यूँ वो उम्र में काफ़ी बड़े थे पर सोच की समानता उनके घनिष्टता की वज़ह थी| जब मैं एक वर्ष की थी तो विजयवाड़ा उनके घर 15 दिन रह कर आई थी, और मैं छोटी ही थी लगभग 2-3 साल की तब वो भागलपुर (बिहार) मेरे घर भी आये थे| मेरे पिता की मृत्यु 1978 में हो गई फिर सभी से धीरे-धीरे संपर्क टूटता चला गया और एल्बम में संजोये प्रोफ़ेसर गोरा और उनके परिवार की तस्वीरों से ही मैंने यह सब जाना और समझा|


मुझे याद है बचपन में विजयवाड़ा नाम मुझे अटपटा सा लगता था| मेरे भाई और मैंने जाने कहाँ से कहना सीख लिया था... ''अट्टा-पट्टा-विजय-वाड़ा'', और अक्सर हम ये कहते रहते और हाथ पटक-पटक कर खेलते थे| बाद में मेरे पापा ये कहकर चिढ़ाया भी करते थे|


अट्टा-पट्टा-विजय-वाड़ा के साथ गोरा जी कब हमारे खेल से मेरे ज़ेहन में उतर गये मुझे भी नहीं पता चला| पिता के विचार और जीवन जीने का तरीका भी आम लोगों से अलग था| जब कुछ समझने लायक हुई तो न पिता रहे न गोरा जी और न उनसे सम्बंधित कोई संपर्क रह गया| लेकिन नास्तिकता-आस्तिकता की बात ज़रूर सोचने और समझने लगी|


मेरे पिता नास्तिक थे तो घर में कोई भी धार्मिक क्रिया कलाप नहीं होता था| शायद मेरे ज़ेहन में भी नास्तिकता उन्हें देख कर बैठ गई हो| पिता काफी पहले चल बसे तो मन में होता था कि कहीं वो नास्तिक थे इसलिए तो नहीं ऐसा हुआ? जिन लोगों को हर वक़्त ईश्वर में लिप्त देखी वो भी असामयिक मौत मरे, बहुत पीड़ा से गुजरे, विपदाओं में घिरे| पर जब बाद में अपनी समझ बढ़ी तब भी ईश्वर के प्रति न मेरी आस्था जागी न कोई रुझान|


यूँ मेरी दादी से मैं अपने बचपन से ही धार्मिक ग्रंथों की कहानियाँ सुनती रही हूँ| मेरी दादी नास्तिक नहीं थीवो धार्मिक पुस्तकें बहुत पढ़ती थी, ईश्वर में आस्था भी थी उनकी, लेकिन धार्मिक क्रिया कलाप में उन्होंने कभी हिस्सा नहीं लिया | दादी की मृत्यु 102 वर्ष की अवस्था में 2 साल पहले हुई|


मैं नहीं जानती कि कोई ईश्वर कहीं है, अगर कभी हुआ भी हो तो अब तक तो जिंदा न होगा| संभव है कि कुछ पुराने वृक्ष की तरह सैकड़ों साल जीया हो, या ये भी मुमकिन कि ऐसा कुछ नहीं हुआ हो| प्रकृति की हर बात में या जीवन के हर कार्य में जब हम तर्क ढूंढ़ते हैं तो ईश्वर के सम्बन्ध में तर्क ढूँढना भी जायज़ है|


अगर ईश्वर ने सब बनाया फिर उसे कौन बनाया? अगर ईश्वर ने ख़ुद को बना लिया फिर इस दुनिया की रचना की, तो इस दुनिया की रचना का क्या औचित्य था? अगर कोई औचित्य हो जो ईश्वर ही जनता हो तो दुनिया क्यों विनाश की तरफ बढ़ रही है? अगर सब ईश्वर की इच्छा से होता तो दुनिया में इतना वर्ग-विभेद क्यों, इतनी अशांति क्यों? बहुत प्रश्न हैं, और बहुत प्रश्न ऐसे भी हैं जो किसी के मन में न आये, पर कभी न कभी आयेंगे ज़रूर|


मैं नास्तिक हूँ, लेकिन परिवार के साथ धार्मिक स्थल भी जाती हूँवहाँ आस्था के माहौल में उपजी शान्ति देखती हूँ, लोगों का अंधविश्वास देखती हूँ, धर्म के नाम पर लोगों का पागलपन देखती हूँ, आस्था के नाम पर डर देखती हूँलोग अपने सुख समृधि के लिए अपनी हैसियत से ज्यादा चढ़ावा चढ़ाते यानि कि ईश्वर को घूस देते, मन्नत माँगने कहाँ-कहाँ की ख़ाक नहीं छानते, कभी भूखे रहकर तो कभी व्रत-अनुष्ठान करके अपना कोई फ़ायदा (सुख) माँगते, कोई मुराद पूरी हो तो उसके लिए फिर चादर चढ़ाते, या फिर एक नयी कामना या मनौती तैयार हो जाती ईश्वर से माँगने के लिए|


आख़िर ये गरीब और कट्टर धार्मिक क्यों नहीं अपनी दशा सुधार पाते, जबकि वो सारा समय ईश्वर का नाम और माला जपते रहते हैं| हालाँकि इसका भी जवाब उनके पास है कि ये पिछले जन्म का फल है जो इस जन्म में भुगत रहे| हर मनुष्य किसी न किसी धर्म (सम्प्रदाय) में विश्वास रखता है, फिर क्या वज़ह है कि 21 वीं सदी तक भी पाप चल रहा है| क्यों नहीं गरीबी दूर होती, क्यों समाज में आज भी जाति और वर्ग भेद है?


आज सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद के अलग-अलग संगठन से तबाह है, जो किसी खास धर्म के नुमाइंदे हैं| देश के भीतर सांप्रदायिक दंगा या फिर कोई भी क्रूरतम अपराध आख़िर क्यों है? क्यों नहीं इन आस्तिकों को खौफ़ होता है?


धर्म में पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का डर एक ऐसा मूल मंत्र है जो हर लोगों को डरा देता है| साथ ही इससे पार पाने का उपाय भी किया गया है ताकि लोग पाप करें और पुण्य के लिए हमारे पंडित, पादरी, मुल्ला बैठे हैं जो उनके पाप को पुण्य में बदलने के लिए ईश्वर तक पहुँच रखते हैं; जैसे की दलाली का धंधा होता है| सभी धार्मिक स्थल के बाहर भिखारियों की बड़ी जमात होती है जो भीख भी माँगते हैं और ईश्वर-ईश्वर का जाप भी करते हैं| लेकिन न जाने क्यों ईश्वर की कृपा दृष्टि उनकी तरफ होती ही नहीं, न तो खाना-कपड़ा ही मुहैया होता है, घर और नौकरी तो दूर की बात है| शायद इसलिए भी कि अगर ग़रीब न हो तो फिर पुण्य पाने के लिए दान किसे किया जायेगा| ईश्वर के नाम पर बिना मेहनत गुजारा भी हो जाता है, तो ये धंधा भी अच्छा है|


नास्तिकों के पास पाप कर के पुण्य में बदलने का उपाय या विकल्प नहीं होता है, इसलिए वो इस एक जीवन को अपनी सोच और समझ से जीते हैं, न पाप करते हैं न पुण्य के लिए दर-दर की ख़ाक छानते हैं| इंसानियत ही एक जाति और धर्म होता है, और यही इनकी पहचान होती है| अपवाद एक अलग बात है|

मैं न आस्तिकता को उचित मानती हूँ न नास्तिकता को; क्योंकि 'कुछ है' तभी तो हम उसके पक्ष या विपक्ष में हैं या ख़ुद को नास्तिक या आस्तिक मान रहे हैं|


नास्तिकता को एक नयी परिभाषा की ज़रूरत है, जिसमें आस्तिकता के विपरीत न बहस हो न सोच हो| बल्कि एक ऐसी वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण अकाट्य सोच हो जिसमें किसी से तुलना या सार्थकता पर बहस न होकर सिर्फ इंसानियत की बात हो, प्रकृति की बात हो, उत्थान की बात हो, जीवन की बात हो, प्रेम की बात हो, और यही नास्तिकता की नई परिभाषा हो|


- जेन्नी शबनम (8. 5. 2010)


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