Friday 17 December 2010

15. लुप्त होते लोकगीत

हमारी लोक-संस्कृति हमेशा से हमारी परम्पराओं के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती रही है| कुछ दशक पूर्व तक आम भारतीय इसकी कीमत भी समझते थे और इसको संजो कर रखने का तरीका भी जानते थे| लेकिन आज ये चोटिल है, आर्थिक उदारवाद से उपजे सांस्कृतिक संक्रमण ने सब कुछ जैसे ध्वस्त कर दिया है| हम नक़ल करने में माहिर हो चुके हैं, वहीं अपनी स्वस्थ परंपरा का निर्वहन करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं| आश्चर्य की बात है कि हर व्यक्ति यही कहता कि हमारी संस्कृति नष्ट हो गई है, उसे बचाना है, पाश्चात्य संस्कृति ने इसे ख़त्म कर दिया है| लेकिन शायद लोक परम्पराओं के इस पराभव में वो ख़ुद शामिल है| कौन है जो हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा है? हमारी हीं संस्कृति क्यों प्रभावित हो रही दूसरे देशों की क्यों नहीं? आज भी दुनिया के तमाम देश अपनी लोक परम्पराओं को जतन से संजोये रखे हैं| दोष हर कोई दे रहा लेकिन इसके बचाव में कोई कदम नहीं, बस दोष देकर कर्त्तव्य की इतिश्री|


लोक संस्कृति के जिस हिस्से ने सर्वाधिक संक्रमण झेला है वो है लोकगीत| आज लोकगीत गाँव, टोलों, कस्बों से गायब हो रहे हैं| कान तरस जाते हैं नानी दादी से सुने लोकगीतों को दोबारा सुनने के लिए|
हमारे यहाँ हर त्यौहार और परंपरा के अनुरूप लोकगीत रहे हैं और आज भी ग्रामीण और छोटे शहरी क्षेत्रों में रहने वाले बड़े बुज़ुर्गों में इनकी अहमियत बनी हुई है| विवाह के अवसर पर राम-सीता और शिव-पार्वती के विवाह-गीत के साथ हीं हर विधि के लिए अलग अलग गीत, शिशु जन्म पर सोहर, बिरहा, कजरी, सामा-चकवा, तीज, भाई दूज, होली पर होरी, छठ पर्व पर छठी मइया के गीत, रोपाई बिनाई के गीत, धान कूटने के गीत, गंगा स्नान के गीत आदि सुनने को मिलते थे| जीवन से जुड़े हर शुभ अवसर, महत्वपूर्ण अवसर के साथ हीं रोज़मर्रा के कार्य केलिए भी लोक गीत रचे गए हैं|


एक प्यारे से गीत के बोल याद आ रहे हैं जो अपने गाँव में बचपन में सुनी हूँ…
चूए ओठ से पानी ललन सुखदायी,
पुआ के बड़ाई अपन फुआ से कहिय,
ललन सुखदायी,
चूए ओठ से पानी ललन सुखदायी,
कचौड़ी के बड़ाई अपन भउजी से कहिय,
ललन सुखदायी …
खाना पर बना ये गीत बड़ा मज़ा आता था सुनने में| इसमें सभी नातों और खाने को जोड़ कर गाते हैं, जिसमें दुल्हा अपने ससुराल आया हुआ है और उसे कहा जा रहा कि यहाँ जो कुछ भी स्वागत में खाने को मिला वो सभी इतना स्वादिष्ट था कि अपने घर जाकर अपने सभी नातों से यहाँ के खाने की बड़ाई करना|


एक और गीत है जिसे भाई दूज के अवसर पर गाते हैं| इसमें पहले तो बहनें अपने भाई को श्राप देकर मार देती हैं फिर जीभ में काँटा चुभा कर स्वयं को कष्ट देती हैं कि इसी मुंह से भाई को श्राप दिया और फिर भाई की लम्बी आयु केलिए आशीष देती हैं…
जीय जीय ( भाई का नाम) भईया लाख बारिस
(बहन का नाम लेकर) बहिनी देलीन आसीस हे…
मुझे याद है गाँव में आस पास की सभी औरतें इकठ्ठी हो जाती थीं और सभी मिलकर एक एक कर अपने अपने भाइयों केलिए गाती थीं| मैं तो कभी ये की नहीं, लेकिन मेरे बदले मेरी मईयाँ (बड़ी चाची) शुरू से करती थी| अब तो सब विस्मृत हो चुका, मेरे ज़ेहन से भी और शायद इस लोक गीत को गाने वाले लोगों की पीढ़ी के ज़ेहन से भी|




पारंपरिक लोकगीत न सिर्फ अपनी पहचान खो रहा है बल्कि मौज़ूदा पीढ़ी इसके सौंदर्य को भी भूल रही है| हर प्रथा, परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार लोक गीत होता है, और उस अवसर पर गाया जाने वाला गीत न सिर्फ महिलाओं को बल्कि पुरुष को भी हर्षित और रोमांचित करता रहा है| लेकिन जिस तरह किसी त्योहार या प्रथा का पारंपरिक स्वरुप बिगड़ चुका है उसी तरह लोकगीत कह कर बेचे जाने वाले नए उत्पादों में न तो लोकरंग नज़र आता है न गीत| जहाँ सिर्फ लोक गीत होते थे अब उनकी जगह फ़िल्मी धुन पर बने अश्लील गीत ले चुके हैं| अब सरस्वती पूजा हो या दुर्गा पूजा, पंडाल में सिर्फ फ़िल्मी गीत हीं बजते हैं| होली पर गाये जाने वाला होरी तो अब सिर्फ देहातों तक सिमट चूका है| गाँव में भी रोपनी या कटनी के समय अब गीत नहीं गूंजते| सोहर, विरही, झूमर, आदि महज़ टी.वी चैनल के क्षेत्रीय कार्यक्रम में दीखता है| विवाह हो या शिशु जन्म या फिर कोई अन्य ख़ुशी का अवसर फ़िल्मी गीत और डी.जे का हल्ला गूंजता है| यहाँ तक कि छठ पूजा जो कि बिहार का सबसे बड़ा पर्व माना जाता, उसमें भी लाउड स्पीकर पर फ़िल्मी गाना बजता है| यूँ औरतें अब भी छठी मइया का हीं पारंपरिक गीत गातीं हैं| अब तो आलम ये है कि भजन भी अब किसी प्रचलित फ़िल्मी गाना की धुन पर लिखा जाने लगा है| किसी के पास इतना समय नहीं कि सम्मिलित होकर लोकगीत गायें| विवाह भी जैसे निपटाने की बात हो गई है| पूजा-पाठ हो या फिर त्योहार, करते आ रहे इसलिए करना है और जिसका जितना बड़ा पंडाल, जितना ज्यादा खर्च वो सबसे प्रसिद्द| लोक गीतों का वक़्त अब टी.वी ने ले लिया है| गाँव गाँव में टी.वी पहुँच चुका है, भले हीं कम समय केलिए बिजली रहे पर जितनी देर रहे लोग एक साथ होकर भी साथ नहीं होते, उनकी सोच पर टी.वी हावी रहता है| अब तो कुछ आदिवासी क्षेत्र को छोड़ दें तो कहीं भी हमारी पुरानी परंपरा नहीं बची है न पारंपरिक लोकगीत| अब अगर जो बात की जाए कि कोई लोकगीत सुनाओ तो बस भोजपुरी अश्लील गाना सुना दिया जाता, जैसे कि ये लोकगीत का पर्याय बन चुका हो|


नहीं मालूम लोकगीत का पुनरागमन होगा कि नहीं, लेकिन पूर्वी भारत में लोक गीतों का लुप्त होना इस सदी का सबसे बड़ा सांस्कृतिक क्षय है क्योंकि परिवार और समाज की टूटन कहीं न कहीं इससे हीं प्रभावित है| गाँव से पलायन, शहरीकरण और औद्द्योगीकरण इस सांस्कृतिक ह्रास का बहुत बड़ा कारण है| हम किसी संस्कृति को दोष नहीं दे सकते कि उसके प्रभाव से हमारी संस्कृति नष्ट हुई है| बल्कि हम स्वयं इन सबको छोड़ रहे और जिंदगी को जीने केलिए नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा में झोंक रहे हैं| पारंपरिक लोकगीत गाने वाले अब बहुत कम लोग बचे हैं और आज की पीढ़ी सीखना भी नहीं चाहती| ऐसे में लोक गीत का भविष्य क्या होगा? क्या यूँ हीं अपनी पहचान खोकर कहीं किसी कोने में पड़े पड़े अपने हीं लिए गाये शोक गीत?
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Sunday 17 October 2010

14. ये डिग्रियाँ ये तमगे भला किस काम के






ढ़ेर सारी डिग्रियाँ, प्रशंसा पत्र, कार्य-कुशलता प्रमाण पत्र और अन्य सर्टिफिकेट्स की भरमार! 


 फिर ऐसा क्यों है कि जीवन के हर क्षेत्र में सिर्फ हार मिलती है। क्या ये डिग्रियाँ  महज़ कागज़ का टुकड़ा है, या फिर उस वक़्त की सक्षमता, अध्ययनशीलता और  कार्यकुशलता की निशानी जो अब अक्षमता में बदल चुकी है ऐसा क्यों होता है? बचपन से अब तक की सभी सफलताएँ यूँ अचानक कैसे असफलता में बदल जातीं है? ऐसा कैसे हो जाता है? क्यों हो जाता है? क्यों हर वक़्त उम्मीद की जाती है कि शिक्षित स्त्री से कभी कोई गलती हो ही नहीं सकती? जीवन के हर क्षेत्र में उसके 'परफेक्ट' होने की न सिर्फ उम्मीद बल्कि उसे 'होना ही है' ऐसा माना जाता है कोई चूक नहीं होनी चाहिए, चाहे वह उसके शिक्षा प्राप्ति का विषय रहा हो या नहीं, या फिर उसने उस सम्बन्ध में कभी नहीं जाना हो हर वक़्त हर अपेक्षाओं की हर कसौटी पर खरा उतरने की न सिर्फ उम्मीद बल्कि खरा सोना की तरह 24 कैरेट खरा होने की बाध्यता भी होती है  
 
इससे भली तो वो स्त्रियाँ हैं जिन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली हैं। उनका जीवन न तो अवसाद में बीतता है न पति या ससुराल वालों को शिकायत रहती है कि वो कोई भी गैर वाज़िब माँग कर सकती है। इनके मन में भले ही शिकायत हो पर जुबां पर लाने का साहस नहीं करती हैं। इनसे सिर्फ घर चलाने, पति और ससुराल वालों के सत्कार की उम्मीद की जाती है भले ही बात-बात पर ताना सुनती है कि कैसी गँवार से पाला पड़ा है, मुर्ख कोई बात ही नहीं समझती है पति की हमबिस्तर होने के दौरान सोने के कोई जेवर या कोई उपहार माँग ले तो पति भी सोचता है चलो फिर भी ये सस्ते का सौदा है, जेवर या उपहार के बदले में पत्नी और भी अच्छी गुलाम बन के रहेगी वेश्या के पास जाओ तो शायद इससे ज्यादा की माँग कर बैठती और एक-एक पल का हिसाब चुकता करना पड़ता। घर के काम के लिए अगर कामवाली को रखो तो हर काम के लिए अलग-अलग पैसे दो समाज में मुफ़्त में तारीफ़ भी मिल जाती है कि वो कितना अच्छा पति है अपनी गँवार और अनपढ़ पत्नी को कितना मानता है। इधर पत्नी भी खुश, इठलाते हुए अपना तोहफा सबको दिखाती है की एक और जेवर या उपहार पति परमेश्वर ने दिया। साथ ही मन में सोचती है कि उसकी माँग पर ये भी तो हो सकता था जेवर तो दूर की बात दो चार थप्पड़ जड़ देता तो? क्या ये कम नहीं कि हर पर्व त्यौहार पर जब अपनी माँ के लिए साड़ी खरीदता है अपनी पत्नी को भी साड़ी देता है, और कभी कभार की मार भूल जाए तो उसे जलाया तो नहीं गया न, क्या ये कम एहसान है ससुराल वालों का या पति परमेश्वर का। जब भी पति के लिए तीज का व्रत रखो तो पति महोदय के चेहरे की मुस्कान और पत्नी के साथ सुबह-सुबह उठकर उसके खाने के प्रबंध में हिस्सा लेना क्या ये कम बड़ी बात हुई भला साल में ऐसा मौक़ा बार-बार तो आता नहीं जब पूजा के कारण सम्मान मिले, इसलिए इस पक्के फ़ायदे का लाभ उठाने से चूकना भी नहीं चाहिए एक तो नयी साड़ी, उसपर से पति का प्यार। वाह वाह! 



अरे निरक्षर होने का बहुत फ़ायदा है एक तो मलाल नहीं रहता कि इतना पढ़ लिख कर क्या किए, क्या यही चुल्हा-चौका! अब चुल्हा-चौका को क्या पता कि काम करने वाली स्त्री शिक्षित है कि अशिक्षित? चुल्हा तो हर हाल में जलेगा और चौका है तो खाना पकेगा ही, घर के लोग शिक्षा देख कर भूख़ पर नियंत्रण थोड़े न रखेंगे अब भला भूख़ का भी शिक्षा से क्या सम्बन्ध? खाना स्वादिष्ट होना चाहिए बस, भले विटामिन को पानी में धोकर बहा दिया जाए या कि प्रोटीन को चुल्हा पर जला दिया जाए पति को पौष्टिक खाना नहीं बल्कि थाली में कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन और पत्नी का गर्व से मुस्कुराता चेहरा दिखना चाहिए बस। भले इससे पति महोदय हाथी से टक्कर लेने लगे और शरीर में रोग को न्योता देने लगे आजकल घर में एक काम वाली ज़रुर होती है क्योंकि अब ये आम मध्यम वर्ग का ज़रूरी हिस्सा है अन्यथा लोग सोचेंगे कि निम्न वर्ग का घर है, भले ही घर में कई लोग हों काम करने के लिए

तो बस इनके फायदे देखिए काम वाली ने सारा घर और रसोई साफ़ कर दिया, कपड़े भी साफ़ कर दिए एक कप चाय और दो पावरोटी दे दो तो सब्जी भी कटवा लो और आँटा भी गूँथवा लो अब कपड़ा तो आयरन करने वाले को दे दिया क्योंकि साहब को कड़क आयरन चाहिए, साथ में बच्चों का कपड़ा भी क्योंकि स्कूल में साफ़ और अच्छा आयरन किया हुआ  ड्रेस चाहिए तो इन सब काम से छुटकारा अब पत्नी पढ़ी लिखी नहीं तो पैसे के हिसाब-किताब से मुक्ति न बाज़ार हाट करना है, न किसी सामान के ख़त्म होने या पैसा के कम होने की चिंता करनी है पति महोदय को जब समय मिले सामान खरीद कर लाएँगे बस लिस्ट लिखवा देना है न उधो का लेना न माधो का देना कोई चिक-चिक नहीं कि तुम ज्यादा खर्च करती हो बस फिर क्या, सुबह फटाफट नाश्ता, टिफिन और बच्चे को तैयार कर देना है फिर निश्चिन्त होकर चाहे तो सो जाओ या टी.वी देखो। बच्चे दिन में आएँगे तो वक़्त पर जाकर उनको ले आना है और खाना खिला दिया, फिर कोई काम नहीं। सारा दिन पड़ोसी से गप्पे करो या फिर अपनी सहेली से, कौन पूछता है। बच्चों को पढ़ाने से भी छुटकारा, अनपढ़ माँ कैसे पढ़ा पाएगी बच्चे को? बच्चे भी मज़े में कि माँ को क्या पता कि वे क्या पढ़ रहे हैं, कंप्यूटर पर पढ़ रहे हैं या मस्ती कर रहे हैं शाम को पति के आते ही सजकर पत्नी तैयार और मुस्कुराती हुई सामने हाज़िर ऑफिस में मूड खराब हो तो बेवज़ह दो चार झाड़ पड़ भी गया तो क्या शाम को गरम पकौड़े और चाय के बाद सब गुस्सा ख़त्म आजकल तो और भी अच्छा है, बच्चो ने ज़िद की कि बाहर का खाना खायेंगे, तो फिर कभी-कभी खाना पकाने से भी आराम सास ससुर बुज़ुर्ग हुए तो 8-10 साल के बाद तो वैसे भी चिल्लाना कम कर देते हैं। उन्हें तो बस उनके पसंद का खाना चाहिए और बेटा जब ऑफिस से आए तो बहु के पास नहीं जाना चाहिए इतना होता रहे तो किस बात का झगड़ा, सब मामला अपने आप निबट और निबह जाता है कि बेटा अब भी बदला नहीं, आज भी ऑफिस से आकार पहले उन्हें मिलता है फिर घर में जाता है बहु से मिलने कभी कभार बेटा से कह कर बहु को 2-4 गाली गलौज सुनवा दो और पूरे रोब दाब में रहो, फिर तो बहु जीवन भर सेवा करेगी ही मुफ़्त में और बहु रानी भी ''जी माँ'' ''जी पापा'' कह कर अपने पति को खुश करती रहती है, भले ही मन में सास ससुर से नाराज़गी हो काम करने का मन न हो तो ढ़ेरों बहाना है तवियत खराब होने का। सिर में खूब सारा तेल चुपड़ कर चुपचाप पति के सामने शाम को जाएगी और चाय के साथ सुखा बिस्किट दे दिया पति समझ गए कि श्रीमती जी की तवियत ठीक नहीं फिर आह ओह करते हुए बिस्तर पर लेट गई आज तो पति का झाड़ भी न मिलेगा और काम से फुर्सत सो अलग खाना बनाने के समय ये उठेंगी और आह आह करते हुए रसोई में प्रवेश करेंगी ताकि पति जी सुन लें कि अब वो चौका में जा रही है पति कहेंगे कि छोड़ दो आज खाना बाहर से मँगवा लेते हैं तुम्हारी तवियत ठीक नहीं। और ये मारा तीर निशाने पर ''नहीं-नहीं दवा ले लिया है, ठीक हो जाएगी तवियत, काहे को पैसा बर्बाद करना, बस 10 मिनट में खाना बन जाएगा, तब तक आप टी.वी. देखिए न''। बढ़िया निशाना लगा, पति महोदय उठकर आएँगे बच्चों के पास बच्चे भी होशियार वक़्त फ़ायदा उठाते हुए ''पापा आज बाहर से खाना मँगाओ न रोज़-रोज़ घर का खाना खाकर बोर हो गए हैं और मम्मी बीमार भी तो है।'' क्या मारा, एक तीर कई निशाना, काम से आराम भी और बाहर का खाना बिना कहे आ गया। और सब पर धाक भी जम गया कि घर के प्रति हम कितने जिम्मेवार हैं, देखो हम तो खाना बना ही रहे थे आप ही लोग बाहर से मँगवाए न 

तो बात अब सीधी-सी है कि शिक्षित स्त्री भली कि अशिक्षित? दोनों के अपने-अपने फ़ायदे और नुकसान अब ज़रा बेचारी शिक्षित स्त्री का मशीनी इंसान बनना देखिए

शिक्षित स्त्री से हर काम में अपेक्षा होती है कि वो उसे सही-सही निपटाए। कभी गुस्सा न हो, पति या ससुराल वाले दो चार बात सुना भी दें तो क्या वो तो पढ़ी लिखी समझदार है, उसे सहन शक्ति रखनी चाहिए अब चूल्हा चौका और घर का काम तो छूटता नहीं चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित इस पर अधिकार और एक छत्र राज़ करने का वरदान ईश्वर ने तो सिर्फ स्त्रियों को ही दिया है, तो भला पुरुष का प्रवेश कैसे हो? अब आजकल के कुछ नए युवा समझते नहीं, बस बीबी का हाथ बँटाने पहुँच जाते हैं चौका में। फिर देखो घर का कोहराम, अगर घर में सास ननद हो इस कोहराम से तो भला है कि चौका को मंदिर की तरह दूर से ही प्रणाम कर लें ऐसे घर के पति महाराज। अब बीवी शिक्षित है तो उम्मीद यही होती कि वो कमा कर भी लाए, खाना भी पकाए, बच्चों को भी पढ़ाए, आस पड़ोस से अच्छा सम्बन्ध भी रखे सास, ससुर और उनके रिश्तेदारों तथा पति के मित्रों से प्रेम तथा शालीनता से पेश आए; भले वो लोग दुर्व्यवहार करें या कटाक्ष करें शिक्षित कन्या तो इसी लिए लाये हैं न कि उसमें सहन शक्ति हो, वरना क्या कमी पड़ी थी लड़की की एक-एक पैसा सोच समझ कर खर्च करे, बच्चे बीमार पड़े तो उसका ही दोष कि उसे बच्चे को सँभालना नहीं आता है खाना में कई पकवान न हो तो पति का गुस्सा दो चार दिन पर निकलता ही है दो-चार चांटा न पड़े तो दो चार अपशब्द ही सही, पर पति का अधिकार है सुनाना और पत्नी का कर्तव्य है सुनना

घर की स्थिति में और सुधार लाना हो या फिर स्त्री अगर कैरियर कॉनशस हुई तो ऐसे में उसका नौकरी करना लाजिमी है उम्मीद भी की जाती है कि पढ़ी लिखी लड़की घर लाई किस लिए गई, जब कमा कर घर में और पैसा न लाए जब नौकरी के लिए बाहर जाती है तो न सिर्फ पति बल्कि सास ससुर और ननद देवर भी शक से देखेंगे कि कहीं चक्कर तो नहीं चला रही है बाहर बात-बात पर ये शब्द कान में दे दिया जाएगा कि पता नहीं नौकरी करती है या गुलछर्रे उड़ाती है, इतना सज कर क्यों जाती है। थक कर वो आए तो कोई एक कप चाय भी न पूछे उसके आने से पहले सभी लोग चाय पी लेंगे ताकि उसके लिए न बनाना पड़े अब वो अकेले के लिए तो बनाएगी नहीं, सबसे पूछेगी ''आप लोग चाय पिएंगे'', सभी कहेंगे ''हमने तो पी लिया अब अगर तुम पूछ रही हो तो पी लेंगे'', जैसे कि चाय पीकर वे सभी उसपर एहसान करेंगे अगर कामवाली न आए तो चौका में सारा दिन का बर्तन ज्यों का त्यों पड़ा हुआ होगा जबकि काम वाली 4 बजे आती है, लेकिन तब से सास ननद किसी को समय नहीं कि बर्तन धो ले, और जब बहु रानी चाय पीकर बर्तन धोने जाएगी तो वो कहेंगी ''हम तो इंतज़ार कर रहे थे कि कामवाली शायद देर से आये, बस अब धोने ही जा रहे थे बर्तन, कि तुम दोनों आ गई'' पति भी खुश कि अहा माँ को कितनी चिंता है बहु की अब बहु तो पढ़ी लिखी, उसे संस्कारी भी तो बनना है। शिष्टाचार भी तो बहु के लिए ही तय होता है न सास ननद से बर्तन धुलवाए? भले थक कर और काम कर-कर के पीठ और कमर का दर्द आजीवन मोल ले ले 

सभी काम से निपट कर सोने जाओ तो बिस्तर पर पति को पत्नी नहीं बल्कि कोई नवयौवना चाहिए जो न सिर्फ उत्तेजित करे बल्कि पूर्ण काम-संतुष्टि दे जैसा कि पांच सितारा होटल की मँहगी कॉल गर्ल देती हों अगर वैसी संतुष्टि न मिले तो ये सुनिए ''अरे काम और नौकरी तो दोनों करके आए हैं, तुमने घर में दो-चार बर्तन क्या धो लिए और 4  रोटी क्या बना ली कि इतनी थक गई, क्या रोज़ रात में होटल में सोने जाऊँ?'' अब इसका क्या जवाब दे भला एक कथित शिक्षित नारी जो पति की नज़र में बेकार है। नहीं मालूम क्यों नहीं समझ पाती ये शिक्षित स्त्रियाँ कि नारी का जन्म सिर्फ भोगने के लिए हुआ है, उसे अपने मन और ज़रूरत को समझाने का हक नहीं मिला 

अब पढ़ी लिखी माँ है तो यह जवाबदेही भी है कि बच्चों को वो ही पढ़ाए, बच्चों की सभी ज़रूरतें पूरी करे, बच्चों का मनोविज्ञान समझे घर में कोई कितना भी कुछ कह दे अपनी छवि ऐसी बनाये रखनी है ताकि बच्चों पर ऐसा असर न हो कि उसकी माँ पढ़ी लिखी होकर भी ज़ाहिल है आखिर माँ ही तो बच्चों की प्रथम शिक्षिका है और घर प्रथम पाठशाला तो घर को मर्यादा में रखने की जवाबदेही भी उसी स्त्री की हुई। अब नौकरी करती है तो पाई-पाई का हिसाब जोड़ेगी ही, कोई भी फ़ालतू खर्च हुआ तो जुबां खोल दी लो अब आ गई आफ़त ''इतनी हिम्मत जो पति से पैसे का हिसाब किया, अरे मर्द है कमाता है, क्या वो अपने बाप के घर से लेकर आई है जो उसने पूछने की हिम्मत की?'' अब पैसा जितना है काम वाली तो रखना मुश्किल है तो भाई मेहनत तो करनी ही पड़ेगी कभी बीमार पड़ जाओ तो और भी बड़ा कोहराम घर में अब तनख्वाह कटेंगे सो अलग, काम न हो पाने से सारा दिन सबका ताना सुनना होगा सो अलग, पति महोदय अगर बाहर से खाना लेकर आ गए तो सीधा इल्ज़ाम कि वो बीवी का गुलाम हो गया ओह हो! किसी में कोई चारा नहीं बीमारी में भी घर से बाहर रहना ही भला पर दिन भर पति की जासूस आँखें पीछा कहाँ छोड़ती है बीमारी में भी नौकरी पर चल दी मैडम, बात पक्की है कि कोई चक्कर चला रही है घर में घुसते ही सबकी नज़रें एक्स-रे की तरह। अब किसके बात का कौन जवाब और कहाँ से हो जवाब

क्या करें क्या न करें बड़ी मुश्किल हाय। पढ़ लिख कर नौकरी करो तो अलग समस्या, पढ़ी लिखी न हो तो रोज़ ताने कि कैसी अनपढ़ से पाला पड़ा। एक उपाय है बचपन से लेकर शादी तक पढ़ाई ऐसी पढ़ो कि बस वक़्त गुज़रे और जब नौकरी खोजो तो तुरंत मिल जाए। न माँ बाप का नुकसान हो न अनपढ़ का लेबल लगे और शादी भी फटाफट हो जाए। बस शादी होते ही पति को गिरफ्त में करना है और पति को लेकर दूसरे शहर ट्रांसफर सबसे पहली सीख कि झूठ और बहाना के लिए कोई नई वेब साईट खोजो, जिससे ऐसी एक्टिंग करो कि बेचारा पति क्या महेश भट्ट और राजश्री प्रोडक्शन वाले भी धोखा खा जाएँ। तो बस काम हो गया। नौकरी भी पक्की, पैसा भी कमाओ, ऐश-मौज-मस्ती सब बाहर और घर में घुसते ही आह... ओह... आउच... पति दौड़ेगा... ''क्या हुआ जानू''?... 


- जेन्नी शबनम (16. 10. 2010)

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Tuesday 12 October 2010

13. अम्माँ की बिटिया









आज दिनांक 10.10.10 है| मुझे याद भी न रहा आज का ये दिन, जाने कैसे भूल गई, जबकि मेरी बेटी और बेटा अक्सर याद दिलाते रहते थे| जानती हूँ कि आज का ये दिन दोबारा नहीं आएगा मेरे जीवन में| वैसे सच कहा जाए तो कोई भी पल जो गुज़र जाता दोबारा नहीं आता| फिर भी कोई एक ख़ास तारीख़, कोई ख़ास बात यादों का हिस्सा बन जाती है| आज हीं मैं एक कविता लिखी ''जीवन के बाद रूह का सफ़र'' और जब तिथि देखी तो कहा अरे वाह... मेरी एक निशानी... आज के दिन केलिए| जब भी इस कविता को पढूंगी ये दिन 10.10.10 भी दिखेगा और ये भी याद रहेगा की आज ख़ुशी यहाँ नहीं| ख़ुशी मेरी बेटी, जो आजकल मुझसे दूर है, अपने पिता के साथ भागलपुर में खुशियाँ बाँट रही है|

यूँ मैं हर दिन को कोई न कोई खास दिन हीं मानती हूँ, और चाहती हूँ कि हर दिन खुशहाल बीते| पर इधर कुछ दिनों से अस्वस्थ हूँ, चलने और लिखने में भी परेशानी हो रही| फिर भी कोशिश करती रहती हूँ कि लिखना जारी रखूं, वरना और भी उदासी छा जाएगी| एक तो तवियत की वज़ह से दुखी हूँ और उस पर मेरी बेटी ख़ुशी अपने पापा के साथ भागलपुर चली गई, क्योंकि कॉमन वेल्थ गेम्स केलिए उसके स्कूल बंद हैं| उसे भागलपुर में ज्यादा मज़ा भी आता क्योंकि वहां पूरी आज़ादी है, बेफिक्र होकर खेलती रहती है अपने मित्रों के साथ| 

मेरे बेटे अभिज्ञान की ए लेवल (12 वीं) की बोर्ड परीक्षा 13 अक्टूबर से शुरू हो रही, इसलिए मैं नहीं जा सकती थी इन छुट्टियों में| तो बस मैं और मेरा बेटा घर में अकेले| वो अपने कमरे में बंद रहता, कभी परीक्षा के लिए पढ़ता, कभी किन्डल ( ई.बुक) पर कोई ई किताब पढता, कभी गिटार बजाता, कभी पी.एस.पी पर कोई गेम खेलता या फिर कंप्यूटर में व्यस्त रहता और बीच बीच में आकर अपना चेहरा दिख देता और मेरा हाल पूछ लेता| 

जिस दिन मेरी बेटी भागलपुर गई उसी दिन कॉमन वेल्थ गेम्स के शुरुआत का समारोह था| यूँ चलने में मुझे बहुत परेशानी थी, बावज़ूद अपने पति से कह कर पास का प्रबंध कराया| पास भी मिल गया| मैंने कह दिया था अपने पति से कि चाहे पास का प्रबंध करो या टिकट का, पर मुझे जाना हीं है देखने| क्योंकि अपने पाँव को लेकर मैं बहुत परेशान थी और लगा कि शायद अब कभी ऐसा समारोह देख पाऊं कि नहीं, पता नहीं मेरे हाँथ पाँव का क्या हो, इसलिए इस मौका को गंवाना नहीं है| पर 2 घंटा खड़ा रहना मेरे लिए और भी बड़ी मुसीबत बन गया, ख़ैर रुक रुक कर धीमे धीमे मैं और मेरा बेटा वहां तक पहुंचे और समारोह ख़त्म होने तक जी भर कर आनंद लिए और अपने बड़े से कैमरे से खूब सारी तस्वीर लिए|

दूसरे दिन घर में जैसे सन्नाटा पसरा हो| कहीं कोई आवाज़ नहीं कोई चहल पहल नहीं| मेरी बेटी स्कूल से आते हीं खाना खाना और और टी.वी देखना एक साथ शुरू करती है| सी.आई.डी उसका सबसे प्रिय सीरियल है और जबतक मै मना न करूँ वो देखती हीं रहती है| चुप होकर भी घर में हो तो लगता कि घर भरा हुआ है| 

आज तक कभी ऐसा न हुआ कि वो मुझसे अलग कहीं दूर गई हो| जब वो 4 साल की थी तब से हीं मैं उसे छोड़ कर भागलपुर जाती रही, भागलपुर में काफ़ी काम रहता था उनदिनों| जब मैं जाती थी छोड़कर तो मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि उसे कैसा लग रहा होगा| शुरू में रोती थी बाद में उसके एक चाचा उसे घुमाने ले जाते और एक डेरी मिल्क जिसे वो काकू कहती, उसको दे देते और वो काकू पाकर मगन| थोड़ी बड़ी हुई तो ख़ुद कहती कि जाओ तुम और वो चाचा - चाची के साथ काफ़ी खुश रहती थी| अब तो उसे ज़्यादा फ़िक्र नहीं कि मैं कहाँ हूँ, अगर शहर से बाहर भी हूँ तो उसे कोई मुश्किल नहीं| अगर यहाँ हूँ तो स्कूल से आने के बाद बस इतना कि मैं घर में होनी चाहिए और वो टी.वी में मस्त|

जाने क्यों बार बार यही सोच रही कि वो होती तो ये करती वो करती, हम सिनेमा जाते आज, या फिर वो कुछ मेरे पसंद का कुछ खाने को बना कर लाती| कभी शाहरुख़ खान या सलमान खान अगर दिख जाए टी.वी में तो दौड़ कर आकर टी.वी खोल देती कि जल्दी देखो तुम्हारा फेबरिट हीरो| वो जानती है कि मैं कभी टी.वी नहीं देखती लेकिन अगर वो दोनों हों तो ज़रुर देखती| 

भागलपुर उसके दादा दादी भी साथ गए हैं और नानी तो वहीं रहती है| कभी नानी के घर तो कभी अपने घर घूम रही| मेरे पति काफी बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा करते तो खूब धूम मचा है वहां| उसे फ़ोन करूँ तो जल्दी से बात करके भागेगी, जैसे कि क्या न छूट रहा हो| सोचती हूँ अच्छा है वो मुझ जैसी नहीं बन रही| अभी से अपना अलग व्यक्तित्व और अपना एक अलग स्थान चाहती है|

एक बेटी का घर में होना कितना ज़रूरी है, अब समझ में आ रहा| मेरी माँ मेरी शादी से पहले कहती थी कि जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तो घर कौन देखेगा, कौन रोज़ सुबह स्कूल जाने से पहले मेरी साड़ी के प्लीट ठीक करेगा| आज मैं भी सोच रही कि एक एक कर वो मेरी तरह घर की जवाबदेही लेने लगी है| मैं तो फिर भी 12 साल के बाद ये सब करने लगी थी और वो तो 8 साल से हीं जैसे मेरी माँ बन गई है| कहेगी ये पहनो वो पहनो, तरह तरह के सामान लाएगी| अभी 3 दिन के लिए स्कूल से घुमने केलिए जयपुर गई थी तो मेरे लिए वहाँ की प्रसिद्ध लाह की चूड़ी लाई|

जानती हूँ वो भी एक दिन इसी तरह से इस घर से चली जाएगी, जैसे एक दिन मैं अपना घर छोड़ आई| मैं भी उसी तरह से उदास होउंगी जैसे मेरी माँ रहती थी| मैं जिस तरह व्यस्त हूँ अपने घर और काम में, एक दिन वो भी हो जायेगी| और जैसे मेरी माँ को आदत हो गई मेरे बिना रहने की, मुझे भी हो जायेगी| अपना बचपन याद आता है मुझे| एक गाना है ''बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले'', मेरे पापा अक्सर ये गाना सुनते और रो देते थे, मेरी माँ से कहते थे कि जेन्नी भी एक दिन चली जायेगी इस घर से| अब जब भी मैं ये गाना सुनती हूँ तो समझ आता कि मेरे पापा और मम्मी को कैसा महसूस होता होगा मुझे सोचकर|

अपनी बेटी के बारे में सोचकर आँखें भर जाती है, मेरी भी और उसके पापा की भी, जब भी ये गाना हम सुनते हैं... 
बाबा की रानी हूँ

आँखों का पानी हूँ,
बह जाना है जिसे
दो पल कहानी हूँ!
अम्माँ की बिटिया हूँ
आँगन की मिटिया हूँ,
टुक टुक निहारे जो
परदेस चिठिया हूँ!


पर अभी जानती हूँ वो पूजा के बाद आएगी, मेरा घर फिर चहकेगा| घर भी जैसे उदास हो गया है ख़ुशी के जाने से| बेटियाँ सच में रौनक होती हैं किसी भी घर की| मेरी बेटी का तो घर का नाम भी ख़ुशी है, तो जहाँ जाती है ख़ुशी भी अपने साथ लिए जाती  है| अब जल्दी पूजा ख़त्म हो और वो वापस आये, यही इंतज़ार है|


__ जेन्नी शबनम __ 10. 10. 10


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Wednesday 29 September 2010

12. हर दिन खुशियों का दिन



लो आ गया जश्न का एक सप्ताह 'जॉय ऑफ़ गिविंग वीक' (joy of giving week) जो 26 सितम्बर से 2 अक्टूबर तक दुनिया भर में मनाया जाएगा इस नए जश्न भरे सप्ताह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी मुझे। हाँ, ये ज़रुर याद आया कि सितम्बर का तीसरा रविवार 'डॉटर्स डे' (daughters day) यानि बेटियों का दिन होता है। अच्छा है, अब पूरा एक सप्ताह ख़ुशी लेने और देने में बीतेगा हमारा पर इसके लिए कोई हंगामा क्यों नहीं? अरे...

मुझे याद है हर साल जब भी वेलेंटाइन डे, रोज़ डे, चाकलेट डे... आदि का एक सप्ताह आता है तो कुछ ख़ास सोच के लोगों द्वारा इसका बहिष्कार होता है और बार-बार चेतावनी भी कि ये हमारी संस्कृति को नष्ट करने के तरीके हैं, इससे हम पथभ्रष्ट हो रहे हैं आदि-आदि; अतः इस विदेशी संस्कृति को न अपनाएँ
 यहाँ बहिष्कार का मतलब सिर्फ वैचारिक विरोध से नहीं होता बल्कि इन विशेष दिनों को मनाने वालों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी दी जाती है क्योंकि इनके हिसाब से ये देश की परंपरा और संस्कृति का अपमान है अब वेलेंटाइन डे को ही लें, इसकी आड़ में वो पति पत्नी को भी नहीं बख्शते और जबरदस्ती राखी बँधवा कर रिश्तों का अपमान करते हैं 

हर साल यह भी कहा जाता है कि लोग वेलेंटाइन डे मनाते हैं लेकिन भगत सिंह या दूसरे क्रांतिकारियों या देश के शहीदों को क्यों नहीं याद करते? नेट और मोबाइल पर ऐसे संदेशों की भरमार होती है कई बार मैं इस बहस में पड़ चुकी हूँ लोग किसी भी बात को सही और सार्थक दिशा में क्यों नहीं सोचते? आज भी मैं यही सोच रही हूँ कि इस बार एक भी सन्देश न आया कि ये 'जॉय डे' क्यों मनाया जा रहा है? एक दिन नहीं बल्कि एक पूरा सप्ताह इसके नाम। आज भगत सिंह का जन्मदिन है फिर आज क्यों भूल गए ये तथाकथित देश प्रेमी? एक भी सन्देश नहीं न तो चेतावनी क्या सिर्फ इसलिए कि इसमें प्रेम शब्द शामिल नहीं है? पर ख़ुशी शब्द तो शामिल है न। लोगों को प्रेम देंगे और हमें प्रेम मिलेगा तभी खुश रह सकते हैं हम 

अब इस 'जॉय वीक' को कैसे मनाया जाए? परिवार के साथ मिलकर जैसे मन हो वैसे जश्न मनाएँ परिवार के साथ अपनी अनुभूतियाँ बाँटें और अन्य सदस्यों के मन के अनुरूप कोई योजना बनायें ताकि सभी प्रसन्न हों। परिवार के अलावा दोस्त और परिचित के साथ भी हम खुशियाँ बाँट सकते हैं और उनको ख़ुशी दे सकते हैं 

मेरी माँ दो दिन पहले ही मुझे 'पुत्री दिवस' (daughters day) की बधाई दी और मैंने अपनी बेटी को कल 'पुत्री दिवस' की बधाई दी। मैं एक माँ की बेटी हूँ और एक बेटी की माँ। दोनों रिश्ते समझती हूँ और कहीं न कहीं उनसे खुद को गहरे में जुड़ा महसूस करती हूँ मैं, मेरा बचपन और मेरी ज़िन्दगी इन तीनों को मिलाकर सम्पूर्ण 'मैं' हूँ, जिसमें मेरी माँ अपनी ख़ुशी ढूँढ़ती है। वैसे ही अब मैं अपनी बेटी में खुद को ढूँढने लगी हूँ 

मेरे जीवन में इतने ज्यादा उतार चढ़ाव आये कि ख़ुशी के ज्यादातर पल विस्मृत हो गए, जो पल दर्द दे गए वो ज्यादा याद रहते हैं मुझे ऐसा नहीं कि जीवन में कोई ख़ुशी नहीं मिली, ख़ुशी भी भरपूर मिली लेकिन शायद मानव स्वभाव है कि दुःख ज्यादा याद रहता है और ख़ुशी कम कोशिश तो यही होती है कि सभी खुश रहें, घर ही नहीं बल्कि मुझसे जुड़े सभी लोग खुश रहें और मैं भी इन सब में खुश रहूँ ऐसे में जब भी कोई ऐसा ख़ास दिन आता है तो मुझे बेहद ख़ुशी होती है, चाहे वो बाल दिवस, वेलेंटाइन डे, रोज डे, चाकलेट डे, मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेंडशिप डे, किसी का बर्थ डे, या फिर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, या फिर ख़ास पर्व या त्योहार या कोई खास दिन को समर्पित एक दिन इसी बहाने इन ख़ास दिनों में मन में उमंग और उत्साह होता है, कुछ ख़ास करने का मन होता है या फिर किसी नए तरीके से मनाने की योजना बनाई जाती है

जद्दोज़हद से भरी ज़िन्दगी में कुछ नया पाने, देखने, सोचने की ऐसी कोई भी कोशिश जो मानवीय संबंधों को और भी ख़ूबसूरत बनाए खराब कैसे हो सकती है जब भी ऐसा कोई मौका आता है तब बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है तरह-तरह की फ़रमाइश होती है, ख़ास दिन के लिए ख़ास कपड़े और तोहफ़ा हर बार जब भी कोई ख़ास दिन आता है तब मैं सोचती हूँ कि क्यों नहीं हर दिन को किसी खास दिन को समर्पित कर दिया जाए हर दिन खुशियों का, जश्न का और जीने का दिन हो

- जेन्नी शबनम (27. 9. 2010)

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Thursday 26 August 2010

11. आज की ताज़ा ख़बर...


रोज़ की तरह आज भी बहुत ही अनमने मन से अखबार पढ़ने बैठी एक सरसरी नज़र से सब देख गई नया कुछ तो होता नहीं

हर दिन अखबार में एक-सी ख़बर...अमुक जगह ये घटना तो वहाँ ये दुर्घटना, किसी की हत्या हुई तो किसी ने आत्महत्या की, कहीं शहर बंद के दौरान कितनी संपत्ति नष्ट की गई तो विरोध में कितनी जानें गई और जानें ली गई, कहीं छात्र ने ख़ुदकुशी की तो कहीं छात्र के पास हथियार बरामद, प्रेम विवाह करने पर नव विवाहित की हत्या तो कहीं विवाह न कर पाने की वजह से पिता ने की आत्महत्या, भूख़ से मृत्यु तो कहीं शराब के सेवन से मृत्यु, अवैध संबंधों से आहत पति ने पत्नी का खून किया तो कहीं पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति का क़त्ल किया, कहीं बलात्कार हुआ तो किसी ने दहेज़ के लिए अपनी पत्नी को जला कर मार दिया, लावारिश जन्मजात कन्या कचरे पर पाई गई तो कहीं पुत्र के लिए पुत्री की बलि चढ़ाई गई, सड़क दुर्घटना में मौत तो अस्पताल में असंवेदनशीलता से मौत, सरकार की असफलता की कहानी तो कभी किसी प्रांत के असफल सरकार की बयानबाजी, सत्ता का खेल तो विपक्षी पार्टियों का दोषारोपण, कहीं बारिश न होने से सूखे की आपदा तो कहीं बाढ़ से त्राहि, अज़ब ख़बर अज़ब तमाशा...अब क्या-क्या गिनाएँ ?

रोज़ यह सब पढ़-पढ़ कर अखबार पढ़ने से मेरा मन उचट गया है लेकिन आदत है कि बिना एक नज़र डाले रहा भी नहीं जाता, भले ही रात के 12 बज जाएँ घर में 4 अख़बार आता है सबमें वही ख़बर फिर भी आदत से पढ़ती हूँ मन से नहीं और रोज़ खिन्न मन से कहती हूँ कि आज से न पढूँगी और फिर दूसरे दिन...अखबार...


दूरदर्शन पर भी यही सब या फिर... बेमकसद बेतूका सीरियल जिसका आम जीवन से कोई मतलब नहीं। समाचार भी ऐसा कि सुबह से शाम तक एक ही खबर बार-बार जिससे आम जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी जनता को दिखाने के लिए संसद में सांसदों का चिल्लाना या फिर नाटकबाजी, किसी बड़े नेता या अभिनेता की शादी या बीमारी का ज़िक्र देश का सबसे बड़ा ख़बर बन जाता, कोई-कोई कार्यक्रम ऐसा कि खौफ़ के बारे में बताने वाला ख़ुद ही खौफ़नाक लगता, या फिर प्रतयोगिता वाला कार्यक्रम जिसमें एक को विजयी होना है और अन्य को पराजित विद्यालय में अगर बच्चा अपने वर्ग में एक स्थान नीचे आ जाता है तो न सिर्फ बच्चा बल्कि उसके माता पिता भी सहन नहीं कर सकते; और यहाँ तो सार्वजनिक रूप से उसका पराजय दिखाया जाता है जो एक साथ करोड़ों लोग देखते हैं पराजित होने वाले की मनोदशा कैसी होती होगी उस समय... उफ्फ ! नहीं अच्छा लगता मुझे कि कोई हारे या कोई जीते, महज़ मनोरंजन हो तो कोई बात है छोड़ दिया मैंने दूरदर्शन का भी दर्शन करना


समस्याएँ तो हम सभी गिना देते, लिख देते और दिखा देते, लेकिन इससे निज़ात पाने के लिए चिंतन और सुझाव किसी के पास नहीं होता आख़िर देश और समाज में ऐसा क्यों हो रहा है? हमारी असंतुष्टि और असहनशीलता की कुछ तो वज़ह है सभी बदहाल हैं फिर भी किसी तरह निबाह रहे, हर परिस्थिति में मन मारकर जी रहे शायद समझौतों में जीने की आदत पड़ चुकी है या फिर नयी उम्मीद की किरण अस्त हो चुकी है। ख़तरे और जोख़िम के लिए हम में से कोई राज़ी नहीं, बने बनाए नियम पर चलने में सुविधा होती है समूह के साथ चलने की आदत पड़ चुकी है हमें या फिर हम उस भीड़ का हिस्सा बनते हैं जिसका मकसद नव निर्माण नहीं बल्कि सिर्फ विध्वंश है


कभी-कभी सुखद बदलाव की गुंजाइश दिख जाती है जब ताज़ा खबर में पाती हूँ कि किसी दुर्गम स्थान पर कोई सार्थक कार्य हो रहा है, ग्रामीण अंचल या फिर पिछड़े इलाके तक पहुँच कर कोई उनके लिए कुछ सोच रहा है रोज़ इसी उम्मीद के साथ ताज़ा खबर पढ़ती हूँ कि शायद आज कोई सरोकार से जुड़ी खबर पढ़ने को मिले; मगर ऐसा होता नहीं लेकिन यह तय है कि मेरी अखबार पढ़ने की न आदत छूटेगी न ताज़ा खबरों में कोई माकूल खबर होगी


- जेन्नी शबनम (26. 8. 2010) 


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Friday 6 August 2010

10. टूटता भरोसा बिखरता इंसान...

कहीं पढ़ा था ''जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम ख़ुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं| हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं|''


सच है कि इंसानी रिश्तों का मनोविज्ञान बिल्कुल बदल चुका है| आज हर रिश्ते असंवेदी हो चुके हैं, हम किसी पर भी यकीन नहीं करते| ''मुँह में राम बगल में छुरी'' वाली कहावत चरितार्थ होती दिखती है| कब कौन किसका भरोसा तोड़ दे, कब कौन किसे सरे आम लूट ले, दोस्त बन कर कौन दगा दे जाए, रिश्ते की ओट में कब कौन रिश्ता नापाक कर जाए| सच है कि आज हम किसी पर भरोसा नहीं करते, न हमपर कोई भरोसा करता है| खून का रिश्ता हो या धर्म का नाता सब छिन्न-भिन्न हो चुका है| सच है... अजब हो गया सब नाता है, नहीं यहाँ अब कोई अपना, बन गया सब पराया है|


ऐसा नहीं है कि भरोसा टूटने की कोई एक वज़ह है या फिर अन्य गलत बातों की तरह धड़ाक से कह दिया जाए कि पश्चिमी संस्कृति का कुपरिणाम है| आज हर गलत परिणति को विदेशी संस्कृति के प्रभाव का परिणाम कह देने का चलन या यूँ कहें कि फैशन बन चुका है| एक तरफ तो शिक्षा, विकास और प्रगति के लिए वैश्वीकरण की बात की जाती है वहीं दूसरी तरफ हम अपने आप में सिमटते जा रहे हैं| जब कोई बात हाथ से बाहर हो जाए तो दोष किसी और पर मढ़ देना ये हमारी पुरानी परंपरा है| चाहे आम घरेलू जीवन की बात करें या शासन सत्ता की बात करें|


व्यक्ति, समाज और देश सभी एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं| अगर समाज ऐसा बन चुका है जहाँ हम भरोसा करना छोड़ चुके हैं तो दोषी कौन है? कोई ख़ास समाज या सरकार या समूह दोषी नहीं है, बल्कि समस्त मानवता जिम्मेवार है| महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ चुकी है कि लोग रिश्तों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर ऊपर चढ़ जाना चाहते हैं, और जब कहीं पहुँच जाएँ फिर उन्हीं रिश्तों को रौंद डालते हैं| रिश्तों को ताक पर रखकर कोई भी कुकर्म कर जाते हैं| किसी पर कोई कैसे यकीन करे?


रिश्तों की अहमियत खो चुकी है, चाहे वो बच्चों से हो या माता-पिता से या सगे सम्बन्धी से या दोस्त या फिर पड़ोसी से हो| पति पत्नी में तो आत्मिक रिश्ता कभी दिखता ही नहीं, मन में कड़वाहट भरी होती है लेकिन ऊपर से प्रेम में कमी नहीं होती| वो पुरुष जो दहेज़ लेकर सामान की तरह देख-परखकर विवाह करेगा उसे कैसे कोई स्त्री प्रेम कर सकती है? दहेज़ के लिए या फिर सिर्फ बेटी जन्म देने के कारण विवाह के कई साल बाद भी स्त्री को मार दिया जाता है| जन्मजात कन्या से लेकर मृत्यु के द्वार पर खड़ी औरत असुरक्षित होती है| कब वो शारीरिक शोषण का शिकार हो जाए, नहीं मालुम| और ये भरोसा स्त्री का उसके अपने ही घर में अपने ही नज़दीकी रिश्तों द्वारा तोड़ा जाता है| ऐसा नहीं कि शारीरिक शोषण की शिकार सिर्फ स्त्री होती है बल्कि छोटे लड़के भी कई बार इसके शिकार हो जाते हैं, लेकिन ऐसे मामले में बात आगे नहीं बढ़ती क्योंकि लड़के (पुरुष) बच्चे पैदा नहीं कर सकते| इस प्राकृति संरचना के कारण स्त्री आजीवन इस भय में जीती रहती है लेकिन पुरुष नहीं|


प्रेमी प्रेमिकाओं के तार भी मन से और आत्मा की गहराइयों से जुड़े नहीं होते, वैसे में प्रेम महज़ प्रदर्शन का ज़रिया बन जाता है| अगर ऐसा नहीं होता तो कैसे कोई प्रेमी या प्रेमिका जिसने इतने भरोसे से रिश्ता जोड़ा हो, उससे ही बदला ले लेता है| अक्सर सुनने में आता है कि विवाह के लिए राज़ी न होने पर लड़की को उसके प्रेमी ने एसिड से जला दिया या धोखे से हत्या कर दिया, या फिर प्रेम जाल में फंसा कर लम्बे समय तक उसका शारीरिक शोषण करता रहा और बाद में उसे या तो बेच दिया या फिर उसका नाजायज़ इस्तेमाल करता रहा| प्रेम में पड़ जाने वाली उस लड़की ने भी तो भरोसा ही किया होगा| अगर कोई प्रेमी विवाह कर भी ले तो मानो कि बड़ा एहसान कर दिया हो, परन्तु फिर भी दहेज़ चाहिए होता है| कैसे कोई स्त्री ऐसे पुरुष को प्रेम करे या उस पर भरोसा करे?


जीवन में एक बार भी भरोसा टूटता है तो आजीवन किसी पर भी भरोसा नहीं हो पाता| शक और संदेह के कारण हम खुद में सिकुड़ते चले जाते हैं, क्योंकि खुद के बाहर की दुनिया में सभी अविश्वश्नीय दिखने लगते हैं| मन में डर बैठ जाता कहीं एक और धोखा न मिल जाए या कोई और भरोसा न तोड़ जाए| और ये डर न तो सहज जीवन जीने देता और न खुलकर जीने देता| प्रेम, दोस्ती, रिश्ते सबको संदेह की नज़र से देखते हैं| और खुद में इतने सिमट जाते कि खुद पर यकीन नहीं रह जाता कि वो क्या करे कि धोखा न मिले, और शायद भरोसा खुद पर से भी उठ जाता है| आत्म विश्वास के साथ ही इंसानी रिश्तों से भरोसा ख़त्म हो जाता है |


- जेन्नी शबनम (अगस्त 5, 2010)


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