Tuesday, October 12, 2010

13. अम्माँ की बिटिया









आज दिनांक 10.10.10 है| मुझे याद भी न रहा आज का ये दिन, जाने कैसे भूल गई, जबकि मेरी बेटी और बेटा अक्सर याद दिलाते रहते थे| जानती हूँ कि आज का ये दिन दोबारा नहीं आएगा मेरे जीवन में| वैसे सच कहा जाए तो कोई भी पल जो गुज़र जाता दोबारा नहीं आता| फिर भी कोई एक ख़ास तारीख़, कोई ख़ास बात यादों का हिस्सा बन जाती है| आज हीं मैं एक कविता लिखी ''जीवन के बाद रूह का सफ़र'' और जब तिथि देखी तो कहा अरे वाह... मेरी एक निशानी... आज के दिन केलिए| जब भी इस कविता को पढूंगी ये दिन 10.10.10 भी दिखेगा और ये भी याद रहेगा की आज ख़ुशी यहाँ नहीं| ख़ुशी मेरी बेटी, जो आजकल मुझसे दूर है, अपने पिता के साथ भागलपुर में खुशियाँ बाँट रही है|

यूँ मैं हर दिन को कोई न कोई खास दिन हीं मानती हूँ, और चाहती हूँ कि हर दिन खुशहाल बीते| पर इधर कुछ दिनों से अस्वस्थ हूँ, चलने और लिखने में भी परेशानी हो रही| फिर भी कोशिश करती रहती हूँ कि लिखना जारी रखूं, वरना और भी उदासी छा जाएगी| एक तो तवियत की वज़ह से दुखी हूँ और उस पर मेरी बेटी ख़ुशी अपने पापा के साथ भागलपुर चली गई, क्योंकि कॉमन वेल्थ गेम्स केलिए उसके स्कूल बंद हैं| उसे भागलपुर में ज्यादा मज़ा भी आता क्योंकि वहां पूरी आज़ादी है, बेफिक्र होकर खेलती रहती है अपने मित्रों के साथ| 

मेरे बेटे अभिज्ञान की ए लेवल (12 वीं) की बोर्ड परीक्षा 13 अक्टूबर से शुरू हो रही, इसलिए मैं नहीं जा सकती थी इन छुट्टियों में| तो बस मैं और मेरा बेटा घर में अकेले| वो अपने कमरे में बंद रहता, कभी परीक्षा के लिए पढ़ता, कभी किन्डल ( ई.बुक) पर कोई ई किताब पढता, कभी गिटार बजाता, कभी पी.एस.पी पर कोई गेम खेलता या फिर कंप्यूटर में व्यस्त रहता और बीच बीच में आकर अपना चेहरा दिख देता और मेरा हाल पूछ लेता| 

जिस दिन मेरी बेटी भागलपुर गई उसी दिन कॉमन वेल्थ गेम्स के शुरुआत का समारोह था| यूँ चलने में मुझे बहुत परेशानी थी, बावज़ूद अपने पति से कह कर पास का प्रबंध कराया| पास भी मिल गया| मैंने कह दिया था अपने पति से कि चाहे पास का प्रबंध करो या टिकट का, पर मुझे जाना हीं है देखने| क्योंकि अपने पाँव को लेकर मैं बहुत परेशान थी और लगा कि शायद अब कभी ऐसा समारोह देख पाऊं कि नहीं, पता नहीं मेरे हाँथ पाँव का क्या हो, इसलिए इस मौका को गंवाना नहीं है| पर 2 घंटा खड़ा रहना मेरे लिए और भी बड़ी मुसीबत बन गया, ख़ैर रुक रुक कर धीमे धीमे मैं और मेरा बेटा वहां तक पहुंचे और समारोह ख़त्म होने तक जी भर कर आनंद लिए और अपने बड़े से कैमरे से खूब सारी तस्वीर लिए|

दूसरे दिन घर में जैसे सन्नाटा पसरा हो| कहीं कोई आवाज़ नहीं कोई चहल पहल नहीं| मेरी बेटी स्कूल से आते हीं खाना खाना और और टी.वी देखना एक साथ शुरू करती है| सी.आई.डी उसका सबसे प्रिय सीरियल है और जबतक मै मना न करूँ वो देखती हीं रहती है| चुप होकर भी घर में हो तो लगता कि घर भरा हुआ है| 

आज तक कभी ऐसा न हुआ कि वो मुझसे अलग कहीं दूर गई हो| जब वो 4 साल की थी तब से हीं मैं उसे छोड़ कर भागलपुर जाती रही, भागलपुर में काफ़ी काम रहता था उनदिनों| जब मैं जाती थी छोड़कर तो मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि उसे कैसा लग रहा होगा| शुरू में रोती थी बाद में उसके एक चाचा उसे घुमाने ले जाते और एक डेरी मिल्क जिसे वो काकू कहती, उसको दे देते और वो काकू पाकर मगन| थोड़ी बड़ी हुई तो ख़ुद कहती कि जाओ तुम और वो चाचा - चाची के साथ काफ़ी खुश रहती थी| अब तो उसे ज़्यादा फ़िक्र नहीं कि मैं कहाँ हूँ, अगर शहर से बाहर भी हूँ तो उसे कोई मुश्किल नहीं| अगर यहाँ हूँ तो स्कूल से आने के बाद बस इतना कि मैं घर में होनी चाहिए और वो टी.वी में मस्त|

जाने क्यों बार बार यही सोच रही कि वो होती तो ये करती वो करती, हम सिनेमा जाते आज, या फिर वो कुछ मेरे पसंद का कुछ खाने को बना कर लाती| कभी शाहरुख़ खान या सलमान खान अगर दिख जाए टी.वी में तो दौड़ कर आकर टी.वी खोल देती कि जल्दी देखो तुम्हारा फेबरिट हीरो| वो जानती है कि मैं कभी टी.वी नहीं देखती लेकिन अगर वो दोनों हों तो ज़रुर देखती| 

भागलपुर उसके दादा दादी भी साथ गए हैं और नानी तो वहीं रहती है| कभी नानी के घर तो कभी अपने घर घूम रही| मेरे पति काफी बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा करते तो खूब धूम मचा है वहां| उसे फ़ोन करूँ तो जल्दी से बात करके भागेगी, जैसे कि क्या न छूट रहा हो| सोचती हूँ अच्छा है वो मुझ जैसी नहीं बन रही| अभी से अपना अलग व्यक्तित्व और अपना एक अलग स्थान चाहती है|

एक बेटी का घर में होना कितना ज़रूरी है, अब समझ में आ रहा| मेरी माँ मेरी शादी से पहले कहती थी कि जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तो घर कौन देखेगा, कौन रोज़ सुबह स्कूल जाने से पहले मेरी साड़ी के प्लीट ठीक करेगा| आज मैं भी सोच रही कि एक एक कर वो मेरी तरह घर की जवाबदेही लेने लगी है| मैं तो फिर भी 12 साल के बाद ये सब करने लगी थी और वो तो 8 साल से हीं जैसे मेरी माँ बन गई है| कहेगी ये पहनो वो पहनो, तरह तरह के सामान लाएगी| अभी 3 दिन के लिए स्कूल से घुमने केलिए जयपुर गई थी तो मेरे लिए वहाँ की प्रसिद्ध लाह की चूड़ी लाई|

जानती हूँ वो भी एक दिन इसी तरह से इस घर से चली जाएगी, जैसे एक दिन मैं अपना घर छोड़ आई| मैं भी उसी तरह से उदास होउंगी जैसे मेरी माँ रहती थी| मैं जिस तरह व्यस्त हूँ अपने घर और काम में, एक दिन वो भी हो जायेगी| और जैसे मेरी माँ को आदत हो गई मेरे बिना रहने की, मुझे भी हो जायेगी| अपना बचपन याद आता है मुझे| एक गाना है ''बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले'', मेरे पापा अक्सर ये गाना सुनते और रो देते थे, मेरी माँ से कहते थे कि जेन्नी भी एक दिन चली जायेगी इस घर से| अब जब भी मैं ये गाना सुनती हूँ तो समझ आता कि मेरे पापा और मम्मी को कैसा महसूस होता होगा मुझे सोचकर|

अपनी बेटी के बारे में सोचकर आँखें भर जाती है, मेरी भी और उसके पापा की भी, जब भी ये गाना हम सुनते हैं... 
बाबा की रानी हूँ

आँखों का पानी हूँ,
बह जाना है जिसे
दो पल कहानी हूँ!
अम्माँ की बिटिया हूँ
आँगन की मिटिया हूँ,
टुक टुक निहारे जो
परदेस चिठिया हूँ!


पर अभी जानती हूँ वो पूजा के बाद आएगी, मेरा घर फिर चहकेगा| घर भी जैसे उदास हो गया है ख़ुशी के जाने से| बेटियाँ सच में रौनक होती हैं किसी भी घर की| मेरी बेटी का तो घर का नाम भी ख़ुशी है, तो जहाँ जाती है ख़ुशी भी अपने साथ लिए जाती  है| अब जल्दी पूजा ख़त्म हो और वो वापस आये, यही इंतज़ार है|


__ जेन्नी शबनम __ 10. 10. 10


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12 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत ही मार्मिक पोस्ट है!
--
13 अक्टूबर के चर्चा मंच पर इसकी चर्चा लगाई है!
http://charchamanch.blogspot.com/

आवेश said...

ये सिर्फ एक पोस्ट नहीं है ,दुनिया भर की माओं का अपनी बेटियों के प्रति प्रेम की थाती भी है|बधाई

shikha varshney said...

ओह हो हो हो ..तो बेटी की याद आ रही है :).अब क्या करें बेटियां कम्ब्बख्त होती ही ऐसी हैं.पर आप खुश रहिये ये सोचकर कि वह वहां मस्त है :).
और आपकी तबियत को क्या हुआ?जल्दी ठीक हो जाइये ये लिखना कभी बंद नहीं हो सकता.

rasaayan said...

beautiful....feelings in words...we all are in the same boat....missing the presence of daughter/s...nice simple poem...
wishes to you and Khushi...

prritiy---------sneh said...

Sabse pehle bitiya khushi ko janamdin ki [der se hi sahi] dhero shubhkamnayen.
Jennyji, kehte hai mehsoos karne ke liye mehsoos karna chahiye aur mujhe mehsoos hua aap khushi ko kitna yaad kar rahi hain, palkein bheeg gai.

aane wali hai ab khushi jaldi, ab tayyar ho jayiye uske 'order' ka palan karne ke liye..........[:)]

shubhkamnayen

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बेटियां मन का सुकून होती हैं ...बहुत अच्छी पोस्ट ...मन की भावनाओं को उडेलती हुई ..

अनुपमा पाठक said...

touching post!
missing my mummy ..... will call her now!
regards,

ALOK KHARE said...

betiyaan/ hoti hi aisi hain. lekin ek bat aap puchhna apni bitiya se ki wo CID me ais akya he jo dekhti he/ meri beti bhi CID dekhti he/ but i do;t knoe th e reason why she likr it /....

sundar lekhan

वन्दना said...

यही तो बेटियों की खूबी होती है हर घर आँगन मे खुशियाँ ही खुशियाँ उँडेलती हैं……………बहुत सुन्दरता से भावनाओं को व्यक्त किया है।

उपेन्द्र " the invincible warrior " said...

बहुत ही भाव विभोर कर देने वाला संस्मरण...

Anonymous said...

Sach main maa or bete ki yehi kahani hai beteyaan bahot payaari hoti hain

Madhu Rani said...

बहुत सही लिखा है, जेन्नी,बेटियाँ तो होती ही हैं घर की रौनक, तेरे दु:ख के साथ मैंने भी अपना दु:ख साझा कर लिया।