Sunday 11 December 2011

32. दिल्ली के 100 साल



दिल्ली के 100 साल...! नहीं नहीं दिल्ली तो तब से है जब से पृथ्वी है I जाने कितने युग- काल की साक्षी यहाँ की ज़मीन और आबो-हवा का अपना वज़ूद रहा है I भले हीं पहले यहाँ जंगल, पहाड़, खेत-खलिहान रहा हो या फिर कोई अनजान बेनाम बस्ती रही हो I नदी के किनारे ही आबादी बसती है, तो निःसंदेह यहाँ भी यमुना के किनारे आबादी रही होगी I कितनी संस्कृति बदली और नाम बदला I महाभारत काल का इन्द्रप्रस्थ धीरे- धीरे बदलते- बदलते अंत में देहली और फिर दिल्ली में परिणत हुआ I न जाने कितने बदलाव और बिखराव को देखा है दिल्ली ने I धीरे धीरे बसी दिल्ली ने हम सभी को ख़ुद में समाहित कर लिया I भले ही हम किसी भी प्रदेश या भाषा के हों, सभी का स्वागत किया है दिल्ली ने I पुरानी दिल्ली तो सदियों से वही है I बाज़ार, मकान, इमारत, मन्दिर, मस्ज़िद, पीढ़ियों को हस्तांतरित नाम और पहचान के साथ बदलती हुई सुदृढ पुरानी दिल्ली I किसी एक या किसी ख़ास की नहीं रही है दिल्ली, विशेषकर नयी दिल्ली I वक़्त वक़्त पर कितने नाम बदले होंगे इसके, कितने राज घराने, कितने राजशाही और सत्ताधारी को देखा इसने I घने जंगल कटे होंगे, कच्ची सड़कें पक्की हुई होंगी, राजमार्ग बने होंगे, यातायात के साधन बढ़े होंगे, ऐतिहासिक धरोहरें विकसित हुई होंगी I लोग बदलते गए और बढ़ते गए I दिल्ली भी अपनी निशानियों के साथ बदलती रही बढ़ती रही I पर दिल्ली की मिट्टी जो अब ईंट- कंक्रीट में पूरी तरह बदल चुकी है, आज भी सभी के दिलों पर राज करती है और सभी को पनाह देती है I आज भी दिल्ली में सुकून देने वाले उद्यान हैं, हरियाली है तो प्रकृति की समस्त ऊर्जा भी है I
दिल्ली दिल वालो का शहर है, दिल्ली सभी को अपना लेती है, अमीर हो या ग़रीब दिल्ली सभी की है, दिल्ली किसी की अपनी नहीं, दिल्ली की बेरुखी के चर्चे, लोगों की संगदिली के चर्चे, दिल्ली के ठग भी मशहूर हुए, दिल्ली की चकाचौंध, दिल्ली की रातें, दिल्ली की गर्मी, दिल्ली की ठण्ड आदि आदि कितनी शोहरत और बदनामी का दाग लिए दिल्ली अपनी जगह कायम है I जितने लोग सभी का अपना नज़रिया I कभी कोई यहाँ से हार कर गया तो किसी ने दुनिया जीत ली I अब ये दिल्ली की किस्मत नहीं दिल्लीवालों की तकदीर है कि किसको क्या मिला I

मेरे लिए दिल्ली आज भी उतनी हीं प्रिय है जितनी बचपन में थी I 21 साल से दिल्ली में हूँ लेकिन आज भी मन में दिल्ली के लिए एक अनोखा एहसास रहता है I ऐसा लगता है मानो दिल्ली कोई सुदूर देश का स्थान हो और जहाँ की दुनिया हमसे बहुत अलग और निराली है I वो जगह जहाँ आज़ादी के बाद स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया गया होगा, वो जगह जहाँ देश के प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति रहते हैं, वो जगह जहाँ नागरिकों द्वारा चुने गए देश को चलाने वाले प्रतिनिधि रहते हैं, वो जगह जहाँ देश की राजधानी है, वो जगह जहाँ...
जब छोटी थी तो क्या क्या नहीं सोचती थी इस शहर के बारे में I मेरे पिता को घूमने और तस्वीर लेने का बहुत शौक था I जब हम दोनों भाई बहन छोटे थे तो हमें दादी के पास छोड़ मेरी माँ को साथ लेकर वो देश के अधिकतर शहर घूम आये I जहाँ भी जाते खूब सारी तस्वीरें लेते I मेरे पिता को तस्वीर लेने के साथ हीं उसे साफ़ करने का भी शौक था I जब भी घूम कर आते तो अपनी ली गई तस्वीरों को साफ़ करते I हम दोनों भाई बहन बैठ कर कौतूहल से रील को निगेटिव और फिर पॉजेटिव बनते हुए देखते I सारी तस्वीरों पर वो जगह का नाम और तिथि लिखते थे I हमलोग दिल्ली का लाल किला, कुतुबमीनार, जंतर-मंतर, इंडिया गेट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, गांधी समाधि इत्यादि की तस्वीर देखते और तरह तरह के सवाल पूछते I दिल्ली गेट, दरियागंज, गोलचा सिनेमा हॉल का नाम खूब सुना था I
बचपन में दिल्ली कब आई ये तो याद नहीं लेकिन शायद 1986 का साल था जब पहली बार अपने होश में अपनी माँ के साथ मैं एन.ऍफ़.आई.डब्लू (NFIW) के राष्ट्रीय कांफ्रेंस में दिल्ली आयी, जिसमें कई महान हस्तियों के साथ हीं अमृता प्रीतम को भी देखी I अमृता की फैन मैं उनके साथ तस्वीर खिंचवाने में भी हिचकती रही और वो अपना भाषण देकर चली गई I भले मारग्रेट अल्वा के साथ फोटो खिंचवा ली क्योंकि लडकियाँ उनके साथ तस्वीर लेने में दिलचस्पी ले रही थी I कालान्तर में अमृता प्रीतम से मिली भी तो उनकी अवस्था ऐसी अशक्त थी कि तस्वीर और बात करना तो दूर उनको देख कर हीं आँखें भर आई I दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कांफ्रेंस था और इसके साथ हीं हमलोग कुछ ख़ास जगह घूमने भी गए I ऐसा लगा जैसे कि किसी अनोखे शहर में आ गए हों I भाषा वही हिंदी, परन्तु उच्चारण अलग, पहनावा वही जैसा हमलोग पहनते थे, खान पान भी वही I मैं इस अलग दुनिया को जीभर कर देख रही थी कि क्या क्या है यहाँ जो मेरी सोच से अलग है I 

1987 में हम लोग फिर से दिल्ली आये, मेरा भाई छात्रवृति पर आगे की पढ़ाई करने अमेरिका जा रहा था I मेरे पिता के मित्र श्री रामाचार्य गांधी समाधि के इंचार्ज थे I उन के घर पर हीं हमलोग रुकते थे I भाई को विदा करने के बाद दूसरे दिन हम लोग एन.ई.एक्सप्रेस जो सुबह 6 बजे चलती थी से पटना के लिए चले I दिल्ली स्टेशन पर हीं गाड़ी खड़ी थी और हमारे दो सूटकेस चोरी हो गए I हमारा सारा सामान जिसमें मेरी माँ के और मेरे कपड़े थे चोरी चले गए I ट्रेन छोड़नी पड़ी I घंटो बाद रेल थाना में एफ.आई.आर दर्ज हो पाया I फिर रामाचार्य चाचा ने कनाट प्लेस के खादी भण्डार से मेरे लिए कपडे खरीदे, क्योंकि पहनने को भी कपडे नहीं रह गए थे I दूसरे दिन हम लौट आये, पूरी ज़िन्दगी के लिए एक टीस साथ लिये I चोरी गए सामान में मेरे पसंदीदा कैसेट, सभी अच्छे कपड़े, कुछ किताबें भी थी I पैसे की तंगी थी तो दोबारा ये सब खरीदना मुश्किल था I उसके बाद से जब भी पहाडगंज जाती तो ढूँढ़ती कि शायद हमारा वो टूरिस्टर सूटकेस मिल जाए I 

1988 में फिर दिल्ली आई I मेरे भाई ने मुझे ओहियो पढ़ने के लिए बुलाया था I लेकिन वीजा रिजेक्ट हो गया क्योंकि मैं बालिग़ थी और मेरे नाम अपने देश में कोई संपत्ति नहीं थी I फिर 1989 में मेरी शादी तय हो गई उसके बाद अक्सर दिल्ली आना लगा रहा I जब भी आती खूब घूमती 

1991 में शादी के बाद दिल्ली के बेर सराय में हम रहे फिर मुनिरका फिर सावित्री नगर (मालवीय नगर) के मकान नंबर 1 में किराए पर हम रहने लगे I शुरू में मकान- मालकिन को यकीन हीं नहीं होता था कि हम शादी शुदा हैं जबकि मेरे ससुराल के लोग वहाँ आ चुके थे I 1992 में मेरी नौकरी यूनिटेक लिमिटेड में हो गई जिसका कार्यालय साकेत में था I बस से आना जाना करती थी क्योंकि ऑटो के लिए पैसे नहीं होते थे I बस में इतनी भीड़ कि खड़ा होना भी आफत I काम से तीस हजारी कोर्ट जाना होता था I ऑफिस के चपरासी से मैं बस नंबर और रूट पूछ कर बस से जाती थी I वो अक्सर कहता कि जब आपको ऑटो का किराया मिलता है तो बस से क्यों जाती हैं? एक घटना के बाद मुझे ऑटो से अकेले जाने में बहुत डर लगता था I एक बार मैं अपने पति के साथ परिक्रमा होटल में रात का खाना खाने गई I वापसी में काफ़ी रात हो गई I बस मिली नहीं, एक ऑटो मिला, जाने के लिए तुरत तैयार हो गया I जैसे हीं मैं बैठी कि उसने ऑटो चला दिया, मैं चिल्लाने लगी और मेरे पति एक हाथ से ऑटो पकड़ कर दौड़ते रहे I कुछ दूर जाकर उसने रोका, जहाँ करीब 20-25 की संख्या में ऑटो चालाक खड़े थे I वो सभी ऑटो के पास आ गए I संयोग से सामने से एक पुलिस वैन आ रही थी जो भीड़ देखकर रुक गई I फिर हम पुलिस की गाड़ी से उस ऑटो वाले को लेकर पार्लियामेंट स्ट्रीट थाना गए I बाद में पुलिस वालों ने दूसरा ऑटो किया और रात को एक बजे घर पहुँचे I उस दिन से हीं ऑटो पर जाने से डर लगने लगा I कहीं जाना हो बस में चली जाती लेकिन ऑटो में नहीं I
जिन दिनों मेट्रो और फ़्लाइओवर के लिए सड़कें खोदी जा रही थीं, लोग कहते कि सरकार दिल्ली में हर तरफ गड्ढ़े करवा रही है, दिल्ली कि सड़कें गड्ढ़े में तब्दील I जब मेट्रो और फ़्लाइओवर बन गया तब मैं उन सबसे कहती कि अब किसे फ़ायदा हो रहा? क्या सरकार के मंत्री आ रहे इस मेट्रो में? या फिर फ़्लाइओवर पर सिर्फ नेता- मंत्री चलेंगे? आम जनता को बहुत सुविधा हुई मेट्रो से I कहीं भी जाना अब आसान लगता है I मेट्रो, फ़्लाइओवर, सुन्दर बसें, माल, सिनेमा हॉल देखकर अच्छा लगता है I सड़कें साफ़ सुथरी हैं I माल में सिनेमा देखना मेरा सबसे प्रिय शौक है I अब तो इतने सारे माल बन गए हैं I सिनेमा देखने लक्ष्मी नगर और गुड़गाँव तक चली जाती हूँ I क्या करूँ दिल है कि मानता नहीं I घर में ऊब जाओ तो अकेले भी माल में जाकर सिनेमा देख कर कुछ वक़्त बीता कर लौटने पर मन को अच्छा लगता है I सरोजनी नगर, मालवीय नगर, ग्रीन पार्क आज भी मेरा पसंदीदा बाज़ार है I गौतम नगर का वीर बाज़ार और साकेत का सोम बाज़ार अब भी लगता है और अभी भी सब्जी वहाँ से मँगाती हूँ I आदत है कि जाती नहीं I   
दिल्ली की भीड़ देखकर मन घबड़ाता है I दिन ब दिन भीड़ बढ़ती जा रही है I आये दिन ट्रैफिक जाम I कहीं जाना हो तो जाम के लिए अलग से समय लेकर जाना होता है I कभी कभी लगता है कि यहाँ किसी को दूसरे की फ़िक्र नहीं I अगर अकेले भी हैं तो यहाँ कोई नहीं पूछता कि अकेले क्यों? अगर उदास हैं तो कोई नहीं पूछता कि उदास क्यों? कोई दुर्घटना हो जाए तो भी शायद कोई नहीं देखे कि क्या हुआ I सभी अपने आप में व्यस्त, ख़ुद के लिए समय नहीं, दूसरे की परवाह कौन करे? कभी ये भी अच्छा लगता है जैसे चाहो रहो कोई टोकता नहीं I हर पहलू का अपना अपना रंग I
अब तो 21 साल हो गए दिल्ली को देखते- जानते- समझते I कई बार अपनी सी लगती है तो कई बार बेगानी I दिल्ली ने बहुत कुछ दिया है मुझे I सपने देखना भी सिखाया दिल्ली ने और जीना भी I आधी से ज्यादा ज़िन्दगी तो यहीं बीत गई I हर सुख़- दुःख की साथी रही है दिल्ली I उन दिनों भी दिल्ली ने हमारा साथ दिया जब एक वक़्त का खाना भी मुश्किल था, और अब भी जब सब कुछ है I ये सब दिल्ली का हीं दिया हुआ है I दिल्ली दिल्ली है, सच है दिल्ली देश का दिल है I 

- जेन्नी शबनम ( 11. 12. 2011)

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Wednesday 16 November 2011

31. कल सुनना मुझे

ज़िन्दगी जाने किन किन राहों से गुजरी, कितने चौक चौराहे पर ठिठकी, कभी पगडण्डी कभी कच्ची तो कभी सख्त राह से गुजरी I ज़ेहन में न जाने कितनी यादें हैं जो समय समय पर हँसाती है, रुलाती है तो कभी गुदगुदाती है I उम्र के हर पड़ाव पर जब भी पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो ज़िन्दगी इतनी दूर नज़र आती कि लगता है जैसे वो लड़की मैं नहीं हूँ जिसके अतीत से मेरी यादें जुड़ी है, विशेषकर जन्मदिन की यादें I


भागलपुर के नयाबाजार में हमलोग किराए के जिस मकान में रहते थे वो एक ज़मींदार का बहुत बड़ा मकान है और यमुना कोठी के नाम से प्रसिद्द है I उस मकान की पूरी पहली मंज़िल हमलोगों ने किराए पर लिया था I खूब बड़ा बड़ा 4 छत, 6 कमरे, खूब बड़ा बरामदा I बरामदे में लोहे का पाया था जिसे पकड़कर गोल गोल घूमना मेरा हर दिन का खेल था I उस मकान के नीचे के हिस्से में अलग अलग कई किरायेदार थे I सभी से बहुत आत्मीय सम्बन्ध थे I मुझे अब भी याद है जब मैं दो साल की थी एक किरायेदार की शादी हुई I न जाने कैसे उस उम्र में हुई ये शादी मुझे अच्छी तरह याद है जबकि सभी कहते हैं कि इस उम्र की बातें याद नहीं रहती I जिनकी शादी हुई उनको मैं चाचा कहती थी और उनकी पत्नी मुझे इतनी अच्छी लगती थी कि मैं उनको मम्मी कहने लगी I जब थोड़ी और बड़ी हुई तब उन्हें चाची जी कहने लगी I सरोज चाचा से बड़े वाले भाई को ताऊ जी और उनकी बड़ी बहन को बुआ जी कहती थी I बचपन में मुझे समझ हीं नहीं था कि ये लोग मेरे सगे चाचा चाची या ताऊ बुआ नहीं हैं I स्कूल से घर आते हीं पहले उनके घर जाती थी फिर अपने घर I छुट्टी के दिनों में उनके साथ खूब खेलती थी I मिट्टी का छोटा चूल्हा, खाना बनाने के छोटे छोटे बर्तन, छोटा छोटा छोलनी कलछुल, चकला बेलना तावा चिमटा, छोटा सूप (चावल साफ़ करने के लिए), बाल्टी आदि सभी कुछ मेरे पास था I उन दिनों कोयला और गोयठा (गाय भैंस के गोबर से बना उपला) चूल्हा में जला कर खाना बनाया जाता था I मेरे छोटे चूल्हे में बिंदु चाची ताव (चूल्हा जलाना) देती थीं I फिर छोटे छोटे पतीले में भात (चावल), दाल, तरकारी (सब्जी) या कभी खिचड़ी बनाती थी I बड़ा मज़े का दिन होता था वो I मेरे पिता रोज़ 12 बजे यूनिवर्सिटी जाते थे और मेरी माँ अक्सर कार्य से बाहर रहती थी और मैं बिंदु चाची के साथ खूब खेलती थी I सभी बच्चे उनसे खूब हिले मिले थे I


जन्मदिन के मौके पर अपने बचपन का बीता हुआ एक जन्मदिन अब भी याद है I ये तो याद नहीं कि उम्र क्या थी मेरी लेकिन लगभग 5-6 साल की रही हूँगी I जन्मदिन पर केक काटने का रिवाज़ नहीं था मेरे घर में और न हीं आज की तरह कोई पार्टी होती थी I चाहे मेरा जन्मदिन हो या मेरे भाई का घर में बहुत बड़ा भोज होता था जिसमें मेरे पिता के भागलपुर विश्वविद्द्यालय में कार्यरत सहकर्मी शिक्षक, कर्मचारी, विभागाध्यक्ष, पिता के मित्र और स्थानीय रिश्तेदार आमंत्रित होते थे I पुलाव, दाल, तरकारी (सब्जी) खीर, दल-पूरी (दाल भरी हुई पूरी) ज़रूर बनती थी I दो फीट चौड़ी खूब लम्बी लम्बी चटाई ज़मीन पर बिछाई जाती थी जिसे पटिया कहते हैं, उस पर पंक्तिबद्ध बैठ कर सभी लोग खाना खाते थे I उपहार लाने की सभी को मनाही होती थी लेकिन कुछ बहुत अपने लोग उपहार ले हीं आते थे I मुझे याद है ताऊ जी (किरायेदार) ने एक खिलौना दिया था जो गोल लोहे का था और तार बाँध कर उसपर उसे चलाते थे I जाने क्यों वो मुझे बड़ा प्रिय था I मेरे भाई के जन्मदिन पर किसी ने घर बनाने का प्लास्टिक का अलग अलग रंग और आकार का ईंट दिया था जिससे घर बनाना भी बड़ा अच्छा लगता था I और अक्सर मैं अपने भाई के साथ घर बनाने का खेल खेलती थी I


पिता के देहांत के बाद भी जन्मदिन मनता रहा लेकिन वो जश्न, धूमधाम और भोज का आयोजन बंद हो गया I मेरे हर जन्मदिन पर मेरी दादी मेरे पापा को याद कर रोती थी, क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद पैसे भी नहीं थे और पापा के समय के सभी अपने भी बेगाने हो गए थे I दादी कहती थी ''बऊआ रहते तो कितना धूमधाम से जन्मदिन मनाते'', मेरी दादी मेरे पापा को बऊआ हीं कहती थी I स्कूल और कॉलेज के दिनों में मेरी किसी से बहुत मित्रता नहीं थी, अतः जन्मदिन पर कोई मेहमान नहीं आते थे I स्कूल के दिनों में बहुत ख़ास कोई सिनेमा दिखाने पापा ले जाते थे I जब कॉलेज गई तो हमारे माकन मालिक की बहन के साथ खूब सिनेमा देखती थी और बाद में सिनेमा देखना मेरा शौक बन गया I जन्मदिन के अवसर पर मम्मी के साथ सिनेमा देखना बाद में एक नियम सा बन गया I दिन में सिनेमा देखती थी और रात के खाना पर मम्मी के स्कूल के कुछ सहकर्मी आ जाते थे I और बस जन्मदिन ख़त्म !


एक जन्मदिन (1986) पर मुझे मेरी एक ज़िद अब तक याद है I हमारे पारिवारिक मित्र डॉ.पवन कुमार अग्रवाल जो भागलपुर मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और सर्जन थे, मेरे पिता तुल्य थे, एक जन्मदिन पर उन्होंने एक कैसेट उपहारस्वरूप दिया I उन्होंने कहा कि जो भी गाना चाहिए रिकॉर्ड करवा देंगे I ''कितने पास कितने दूर'' फिल्म का एक गाना ''मेरे महबूब शायद आज कुछ नाराज़ हैं मुझसे'' मेरा बहुत प्रिय गाना था, लेकिन उनदिनों ये नहीं मालूम कि ये किस फिल्म का गाना है I कुछ गाना के साथ हीं ये गाना भी मैंने उनसे कहा कि रिकॉर्ड करवा दें I चूकि फिल्म का नाम मालूम नहीं था तो गाना ढूंढ़ पाना कठिन था, और मेरी ज़िद कि वो गाना चाहिए हीं चाहिए I मैं शुरू की जिद्दी I अपने पिता के बाद एक मात्र वही थे जिनसे मैं बहुत सारी ज़िद करती थी और वो पूरा भी करते थे, क्योंकि अपनी बेटी की तरह मानते भी थे मुझे I ख़ैर वो गाना कई दिन के मशक्कत के बाद उनको मिल पाया और मेरी ख़्वाहिश पूरी हुई I


अब भी सिनेमा देखना मेरा सबसे प्रिय शौक है. कई जन्मदिन ऐसा आया जब मेरे पति शहर से बाहर थे I बच्चों के स्कूल जाने के बाद मैं अकेली सिनेमा देखने चली जाती थी I अपने लिए अपने पसंद का उपहार ख़ुद खरीदना और ख़ुद को देना अब भी मुझे बहुत पसंद है I


बचपन में मुझे भी हर जन्मदिन में और बड़े होने का उत्साह होता था जैसे अब मेरे बच्चों को होता है I लेकिन अब... ज़िन्दगी का सफ़र जारी है जन्मदिन आता है चला जाता है I पार्टी होती है, कभी घर पर कभी बाहर I आज यहाँ भागलपुर में हूँ I रात की पार्टी की तैयारी चल रही है I संगीत की धुन सुनायी पड़ रही है I काफी सारे लोग आने वाले हैं I मेरी बेटी ख़ुशी ने सुबह से धमाल मचाया हुआ है I बेटा सिद्धांत दिल्ली में है, कॉलेज खुले हैं वो आ नहीं सकता I पति ने खूब सारी तैयारी कर रखी है I काफी सारे लोगों ने फ़ोन पर बधाई दिया I मेरे भाई भाभी जो इन दिनों हिन्दुस्तान से बाहर हैं का फ़ोन आया I मेरी माँ का फ़ोन आया, बोलते बोलते रोने लगी क्योंकि वो भागलपुर में नहीं है I इन सबके बावजूद न जाने क्यों मन भारी सा है I जानती हूँ पार्टी है हंसना चहकना है, यूँ पार्टी खूब एन्जॉय भी करती हूँ I लेकिन न जाने क्यों बचपन मेरा पीछा नहीं छोड़ता I क्यों बार बार मन वहीं भाग जाता है जहां की वापसी का रास्ता बंद हो जाता है I बचपन की खीर पूरी और भोज याद आ रहा है I अब तो जन्मदिन मनाना औपचारिकता सा लगता है I कुछ फ़ोन कुछ सन्देश बधाई के और जवाब शुक्रिया...


- जेन्नी शबनम (16. 11. 2011)


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Friday 11 November 2011

30. तारीखों का तसव्वुर (11. 11. 11)

11. 11. 11 तारीख का पूरी दुनिया में हो रहा बेसब्री से इंतज़ार अब ख़त्म हुआ I यूँ इस तरह की कोई भी तिथि जब भी आती है जीवन में एक अलग सा उत्साह नज़र आता है I ऐसी ख़ास तिथियों को पढ़ना, बोलना और याद करना सहज लगता है I दिन, महीना और साल के अंक तो वही रहते हैं 1 से 30/31, 1 से 12 और 1 से 100 सिर्फ सन (ईस्वी) बदलता है I हर एक पल एक बार गुजरने के बाद जैसे वापस नहीं आता वैसे हीं एक बार आई हुई कोई भी तिथि कभी दोबारा नहीं आती और बहुत ख़ास होती है I इस तरह की तिथि जब भी आती है कुछ ख़ास होने का एहसास होता हीं है I साल में एक बार हीं ऐसा दिन आता है जब दिन महीना और साल का अंक एक हीं हो I पर ये भी सिर्फ 12 तक हीं होना है I और पूरी एक सदी के बाद फिर से ऐसी तिथि दोहराई जाएगी, लेकिन सदी का अंक बदल जाएगा I मुझे याद है बचपन में भी जब ऐसी कोई तिथि आती थी तो मन में एक अजीब सा उमंग आ जाता था I अक्सर सोचती थी कि अब ये तिथि दोबारा नहीं आएगी I

कोई ख़ास तिथि और कोई ख़ास दिन को हम सभी ख़ुद हीं अपने अपने हिसाब से महत्वपूर्ण बना लेते हैं I अपने नाम के लकी नंबर के हिसाब से बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किये जाते हैं, जैसा कि ज्योतिषियों का परामर्श होता है, या फिर कुछ ख़ास दिन निर्धारित किये जाते हैं कि कब कोई शुभ कार्य किया जाए कब नहीं किया जाए I कुछ ख़ास रंगों का प्रयोग वर्जित कर दिया जाता है तो कुछ ख़ास रंग दिन के हिसाब से तय किया जाता है I परन्तु ये सभी व्यक्तिगत सोच और आस्था के साथ चलती है I इसे सिर्फ अंध विश्वास नहीं कह सकते बल्कि कार्य की सफलता की उत्तम संभावना के लिए किया गया एक प्रयास भी कह सकते हैं  I कई बार ऐसा होता है कि मान्यताएं और विश्वास हममें आत्मविश्वास पैदा करती हैं भले कार्य फलीभूत न हो, फिर भी एक संतुष्टि रहती है कि हर संभव प्रयास किया गया I तिथियों का महत्व इस लिए और भी ज्यादा होता है कि हर एक पल हमारा अपना इतिहास बन जाता है I इस लिए ख़ास तिथि को किया गया ख़ास कार्य हमारे जीवन में यादगार बन जाए बस इतनी सी बात है I

मुझे याद है ऐसी हीं एक ख़ास तिथि 1. 1. 2000 और उससे पहले का वक़्त I मेरे लिए भी यह मिलेनियम साल ख़ास महत्व रखता था I उस साल मिलेनियम बेबी की चाह ने देश के सभी अस्पतालों में जैसे सैलाब ला दिया था I सभी अस्पताल, नर्सिंग होम और डॉक्टर पहले से बुक हो चुके थे I जिन बच्चों का जन्म 1. 1. 2000 से 10 दिन आगे पीछे होना था सभी माता पिता चाहते थे कि उनके बच्चे का जन्म उसी दिन हो I मुझे याद है मैंने अपनी डॉक्टर से कहा कि मैं भी 1 जनवरी को हीं अपने बच्चे को जन्म देना चाहती हूँ, जबकि उसका जन्म का दिन 6 या 7 तारीख निर्धारित था I डॉक्टर ने कहा कि कई सारे कम्प्लिकेशंस मेरे साथ हैं अतः ये रिस्क होगा I मेरी बेटी मिलेनियम बेबी बने हीं ये तो कहना मुश्किल था क्योंकि उस दिन करोड़ों बच्चे जन्म लेने वाले थे I

31 दिसंबर 1999 की रात एक ख़ास यादगार रात थी क्योंकि हम दूसरी सदी में प्रवेश करने वाले थे I एक अनोखा उत्साह पूरी दुनिया में व्याप्त था I हमें भी दो सदी में अपनी उपस्थिति का एहसास बड़ा अच्छा लग रहा था I बसंत विहार का एक होटल जो उन दिनों बसंत कॉन्टिनेंटल कहलाता था में बहुत बड़ा आयोजन होना था I मैं भी अपने परिवार के साथ वहाँ गई I भीड़ इतनी कि ख़ुद को संभालना मुश्किल, और मेरे गर्भ का अंतिम सप्ताह I कई लोगों ने मना किया, मैंने कहा कि जो होगा देखेंगे, कुछ हुआ तो हॉस्पिटल चल देंगे I भीड़ में सभी एक दूसरे से अलग हो गए, मेरे साथ सिर्फ मेरी माँ रह गयी I उन दिनों मेरे पास फ़ोन भी नहीं था और न पैसा लेकर चले थे I किसी तरह भीड़ में घुसकर रात का खाना खाया क्योंकि मधुमेह के कारण खाना खाना अतिआवश्यक था I एक भी कार्यक्रम नहीं देख सकी, क्योंकि वहाँ तक भीड़ में पहुंचना किसी दुर्घटना का शिकार होना था I अंत में किसी सज्जन से फ़ोन मांग कर अपने पति को फ़ोन किया और फिर हम घर वापस आये I थकावट के कारण 1. 1. 2000 को मुझे अस्पताल जाना पड़ा I डॉक्टर ने कहा कि अगर इतनी हीं इच्छा है तो आज भी डेलिवरी की जा सकती है लेकिन अगर 7 को हो तो बेहतर है I सब कुछ ठीक ठाक था अतः मिलेनियम साल के पहले दिन की इच्छा को त्याग कर निर्धारित 7 जनवरी को हीं बेटी का जन्म हुआ I

आज का दिन 11. 11. 11 यूँ तो अब 100 साल के बाद आएगा पर आज का दिन बाज़ार के लिए बहुत अच्छा साबित हो रहा है I ज्योतिषियों ने भी कहा है कि आज के दिन गाड़ी-ज़मीन-मकान का क्रय, बच्चे का जन्म, कोई महत्वपूर्ण कार्य आदि शुभ है I  सुना है कि अदाकारा एश्वर्या रॉय के बच्चे का जन्म आज हीं होगा I आज क्या क्या ख़ास होता है देखते हैं I अक्सर सोचती हूँ कि प्रकृति का नियम है सबकुछ अपने तय वक़्त पर होना I सभी तारीख और दिन अपने तय वक़्त पर आयेगा हीं और ये भी मानना चाहिए कि जब जो होता है अच्छे के लिए हीं होता है I आज कि तिथि 11. 11. 11 के लिए सभी को शुभकामनाएं, सभी के लिए आज का दिन ख़ास हो !

- जेन्नी शबनम 11. 11. 11

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Tuesday 1 November 2011

29. 'बोल' के बोल

''मारना ज़ुर्म है तो पैदा करना क्यों नहीं ?'' ''नाजायज़ बच्चा पैदा करना गुनाह है तो जायज़ बच्चों की लम्बी कतार जिसकी परवरिश नहीं कर सकते गुनाह क्यों नहीं है ?'' ये सवाल ऐसे हैं जिससे दुनिया के किसी भी मुल्क़ का विवेकशील इंसान जो ज़रा भी इंसानियत से इत्तेफ़ाक़ रखता है के ज़ेहन में कौंध सकता है I अगर नहीं कौंधता तो शर्मनाक है, इंसानियत के लिए भी, इंसानी कौम के लिए भी और मुल्क़ के लिए भी I पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' की नायिका जिसे ह्त्या के आरोप में फाँसी की सज़ा होती है, की आख़िरी ख़्वाहिश के मुताबिक़ मीडिया वालों के सामने फाँसी से पहले कुछ कहना चाहती है, जबकि उसने किसी भी न्यायालय में अपनी ज़ुबान नहीं खोली और अपना गुनाह कबूल किया है I वो ये सवाल सिर्फ अपने देश के राष्ट्रपति से नहीं कर रही बल्कि आम अवाम से कर रही है I आख़िर क्यों सम्मान के नाम पर बेटियों को अनपढ़ रखा जाए और जानवरों सी ज़िन्दगी जीने के लिए विवश किया जाए ? ''जब औरत के सामने मर्द लाजवाब (निरुत्तर) हो जाता है तो हाथ उठाता है'', ये सिर्फ 'बोल' की नायिका का कथन हीं नहीं बल्कि हर मर्द की आदत है I अपनी शक्ति दिखा कर स्त्री को अधीन में रखना पूरी दुनिया की औरतों की नियति है और पुरुष का व्यभिचार ! आख़िर कब तक सहन करे ?


पुत्र मोह में बेटियाँ ज्यादा हो तो उसे जानवरों सी ज़िन्दगी जीने पर विवश होना पड़ता है I पुत्र अगर मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग हो तो भी उसे स्वीकार किया जाता है I लेकिन पुत्र अगर पुरुष न होकर स्त्री का गुण ले ले तो न सिर्फ समाज से बल्कि घर में भी तिरस्कृत होता है I 'बोल' की नायिका का भाई जिसमें स्त्री के गुण हैं, पिता द्वारा सदैव तिरस्कृत रहता है I यहाँ तक कि पिता उसे देखना भी बर्दाश्त नहीं करता है, अतः माँ और बहनों का वह लाडला पिता के सामने कभी नहीं आता है I समाज का एक कुरूप चरित्र है कि वैसे पुरुष को भी पुरुष से हीं बचना होता है, क्योंकि मौक़ा पाकर उसे भी हवस का शिकार बना लिया जाता है I नायिका के भाई का बलात्कार होता है, और फिर नायिका के सामने हीं उसका पिता अपने पुत्र की ह्त्या कर देता है I समाज में हिजड़ों को सम्मान नहीं मिलता, जबकि किसी का भी स्त्री, पुरुष या हिजड़ा होना प्रकृति या ईश्वर द्वारा प्रदत्त गुण है I नायिका प्रतिशोध में कुछ नहीं कर पाती क्योंकि उसकी माँ का वह खाबिन्द है, सिर्फ अपने पिता से नफ़रत करती है I
एक तरफ बाप इसलिए शादी कर रहा है ताकि अपने बेटे के क़त्ल को छुपाने के लिए रिश्वत के पैसे का इंतजाम कर सके और बदले में उसे इसलिए शादी करनी है क्योंकि बेटियां पैदा करने में उसे महारत हासिल है I जिस दिन सबसे छुपकर एक कोठे वाली से बाप शादी करता है उसी दिन उसकी दूसरे नंबर की बेटी अपनी माँ और बहनों के सहयोग से अपने प्रेमी जो कि उसकी जाति से अलग जाति का है से शादी करती है I जब शाम को बाप घर आता है तो बड़ी बेटी (नायिका) जो अपने पति के घर से निष्कासित होकर मायके में रहती है, बताती है कि उसने बहन का विवाह करा दिया क्योंकि वो नहीं चाहती कि उसकी बहन की ज़िन्दगी भी उसके जैसी हो I बाप जो ख़ुद गुनाहगार है और दूसरी शादी करके आता है बड़ी बेटी और बीबी को मारता है कि उसने छोटी बेटी का विवाह दूसरी जाति में क्यों कराया I बड़ी बेटी से नफ़रत करता पिता अब छोटी बेटी से भी नफ़रत करता है I यूँ वो अपनी सभी बेटियों से नफ़रत करता है और अपनी बीबी से भी I


नायिका के बाप की दूसरी बीबी जो वेश्या है एक बेटी की माँ बनती है, छुप कर बच्ची को बाप के घर पहुँचा देती है क्योंकि उसे भी वेश्या बना दिया जायेगा और कोई भी माँ अपनी बच्ची को वेश्या के रूप में सहन नहीं कर सकती I पहली बीबी और बेटियाँ अवाक् है बाप के इस घिनौने हरकत पर I पर उस बच्ची का क्या दोष, सभी उसे अपना लेती है I वेश्यालय चलाने वाला बच्ची के गुम होने पर बाप को ढूंढने आता है, और तब तक बाप उस बच्ची की ह्त्या करने जाता है क्योंकि वो ह्त्या कर देना पसंद करेगा लेकिन अपनी बेटी का वेश्या होना नहीं I बच्ची की ह्त्या होने से नायिका बचा लेती है लेकिन बदले में बाप को मार देती है, अगर नहीं मारती तो उस मासूम बच्ची को भी उसका खुनी और क्रूर बाप मार देता I अचानक हुए ऐसे आघात से नायिका स्तब्ध है, और ख़ुद को गुनहगार मान समर्पण कर देती है I
फाँसी से पहले जब नायिका अपने परिवार से मिलती है तो कहती है ''उतार फेंको बुर्का'' और बहनों के सिर से बुर्का खींच कर फेंक देती है I जिस वक़्त मीडिया के सामने नायिका अपने गुनाह और ज़िन्दगी की कहानी सुनाती है, सभी का मन द्रवित हो जाता है I एक स्त्री पत्रकार नायिका को अपने बाप के क़त्ल के लिए गुनहगार नहीं मानती और हर संभव कोशिश करती है कि किसी तरह नायिका की सज़ा माफ़ हो जाए I लेकिन सरकारी महकमे की चाटुकारिता और असंवेदनशीलता के कारण राष्ट्रपति तक बात नहीं पहुँच पाती और नायिका को फांसी हो जाती है I


नायिका के सभी सवाल अपनी जगह तटस्थ हैं I जवाब की अपेक्षा हर पुरुष से, समाज से, धर्म के नुमायेंदे से और सत्ता वर्ग से है I ये सवाल पाकिस्तान की उस नायिका के चरित्र से निकल दुनिया की सभी स्त्रियों के ज़ेहन और ज़िन्दगी में दाखिल होता है कि आख़िर कब तक स्त्रियाँ यूँ ज़िन्दगी जियेंगी ? पुरुष के दंभ और औरत को उसकी औकात बताने वाला पुरुष कब अपनी औकात समझेगा ? आख़िर कब तक स्त्रियाँ  गुलाम रहेंगी ? चाहे वो बुर्का की गुलामी हो या फिर पुरुष की गुलामी या फिर धर्म के नाम पर किया जाने वाला जुल्म हो I बोल की नायिका का सवाल दुनिया की हर औरत का सवाल है I


- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 28, 2011)


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Saturday 27 August 2011

28. अन्ना-अनशन-आन्दोलन

अन्ना हजारे का आन्दोलन अंततः ख़त्म हो गया है I सरकार कितने वक़्त में जन लोकपाल को अमली जामा पहनाएगी, यह तो अपने तय वक़्त पर ही हम सबके सामने आएगा I पर इतना तो निश्चित ही हम कह सकते हैं कि इस आन्दोलन में जनता की भागीदारी ने ये साबित कर दिया है कि आज पूरा देश जिस तरह भ्रष्टाचार से त्रस्त और आहत है इससे निज़ात पाने के लिए हर मुमकिन रूप अख्तियार किया जा सकता है I अन्ना के समर्थन में तमाम विपक्षी पार्टियाँ, सामाजिक संगठन और देश की पूरी जनता है I इस पर कहीं कोई दो मत नहीं कि भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर ख़त्म करना चाहिए I सरकार हो या आम जनता या ख़ास जनता या फिर विपक्षी पार्टियाँ सभी चाहते हैं कि देश से भ्रष्टाचार दूर हो और हमने जिस आज़ाद प्रगतिशील भारत का सपना देखा है वो पूरा हो I


अन्ना हजारे के अनशन को सभी अपने-अपने तरीके से ले रहे थे I मकसद तो यही है कि भ्रष्टाचार दूर हो लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या सिर्फ जन लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा? अन्ना के अनशन के दसवें दिन मैं राम लीला मैदान गयी यह देखने कि आम जनता पर इसका असर कैसा है और वो किस तरह इस आन्दोलन से खुद को जोड़ते हैं I सामान्य जनता के लिए अलग पंक्ति बनी थी, जिससे रामलीला मैदान में प्रवेश कर सकते हैं I अपने पुत्र के साथ एक पंक्ति में मैं भी लग गयी I एक दूसरी पंक्ति भी थी जो साथ ही आगे बढ़ रही थी I कुछ लोग मेरी कतार से निकल कर दूसरी कतार में दौड़ कर चले जा रहे थे क्योंकि उन्हें लगा कि उसे पहले जाने दिया जाएगा I कुछ कार्यकर्ता उन लोगों को वहाँ से पकड़ कर वापस उनकी पंक्ति में ला रहे थे, तब तक दूसरा दौड़ जा रहा था I मज़ा भी आ रहा था देखकर लेकिन मैं सोचने लगी कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ यहाँ आन्दोलन हो रहा है वहीं पहुँचने के लिए लोग अपना आचरण गलत कर रहे हैं I 'दिल्ली पुलिस' के नाम से प्रचलित गलत छवि को पुलिस वाले आज पूरी तरह साफ़ करने के मूड में दिख रहे थे, किसी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं, कोई झुंझलाहट नहीं, आवाज़ में भी तल्खी नहीं, मुस्कुराते हुए, सुरक्षा के लिए तैनात दिख रहे थे I स्कूल ड्रेस पहने स्कूली बच्चे, छात्र, युवा, दफ़्तर से काम के बाद लौटने वाले कर्मचारी या अधिकारी, हर तबके और उम्र के पुरुष और महिलायें, मज़दूर, रेड लाईट पर भीख माँगने वाले आदि भीड़ में शामिल दिखे I कहीं अफरातफरी नहीं पर लोगों में आक्रोश बहुत अधिक था I  

मैदान में प्रवेश करते ही बदबू का भभका नाक में घुसा I बारिश के पानी से जहाँ-तहाँ पानी लगा था I अन्ना-रसोई का मुफ़्त भोजन वितरण की अलग पंक्ति जो ख़त्म ही नहीं हो रही थी 
I मैदान में खाने की प्लेट, पानी का ग्लास, केले का छिलका बिखरा पड़ा था I एक तरफ सफाई कर्मचारी साफ़ करने में भिड़े थे तो दूसरी तरफ लोग खा-पीकर जहाँ-तहाँ गंदगी फैला रहे थे I

अन्ना के मंच की तरफ बढ़ने पर 25-26 वर्षीय छोटे कद का एक नवयुवक दिखा जिसने दोनों हाथों से एक बड़ा सा कागज़ पकड़ा हुआ था I जैसे ही नज़दीक गई तो मैं रुक कर पढ़ने लगी I उसमें लिखे का अर्थ था कि सोनिया गाँधी जैसा चाहती हैं मनमोहन सिंह वैसा ही करते हैं, लेकिन भाषा बहुत ही अभद्र थी I बहुत उत्साहित और जोश में वो पूछने लगा ''आंटी कैसा लगा? मैंने लिखा है, बहुत दिमाग लगाया फिर लिखा है, सही है न ?'' मैंने उससे पूछा कि आप क्या करते हैं? उसने बताया कि वो गंगा राम हॉस्पिटल में डॉक्टर है, फिर पूछने लगा ''आंटी बताइए न ठीक लिखा है मैंने?'' मैंने पूछा कि ऐसा क्यों लिखा है? उसने कहा ''आंटी आपको एक चुटकुला सुनाऊँ?'' मैंने मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाया I उसने सुनाया कि एक हिन्दू एक मुस्लिम और एक सिख मरने के बाद स्वर्ग गए I वहाँ सबसे पूछा गया कि तुमने क्या-क्या किया, ज़िन्दगी कैसी कटी, आराम था न? हिन्दू ने बताया कि उसने पूजा पाठ किया, तीर्थ यात्रा की और आनंद से ज़िन्दगी जीया 
I मुस्लिम ने कहा कि उसने नमाज़ पढ़ा, रोजा रखा और मक्का गया, वो ख़ुश है उसने अपनी ज़िन्दगी बहुत आराम से जीया है I सिख बोला ''कैसा आराम? आपने कैसी ज़िन्दगी दी मुझे? मुझे टॉफी बना दिया, नीचे से भी मरोड़ा जाता है ऊपर से भी I'' मैं समझ नहीं पाई कि इसमें चुटकुला क्या है I मैंने उससे पूछा कि इसका अर्थ क्या हुआ I उसने कहा कि मनमोहन सिंह है न ! वो दोनों हाथ नचा-नचा कर बताने लगा कि जैसे टॉफी को दोनों तरफ से मरोड़ कर बंद करते हैं वैसे ही (अर्थात सरदारों के बाल और दाढ़ी) I आश्चर्य हुआ एक डॉक्टर की भाषा और सोच पर, ये कैसा आन्दोलन कर रहे जिसमें प्रधानमंत्री के बारे में ऐसी भाषा I

आगे बढ़ने पर भीड़ बढ़ती जा रही थी I एक व्यक्ति चुपचाप एक चार्ट पेपर लेकर खड़ा था और जो भी सामने से गुज़रता उधर घूम कर उसे पढ़ाता I लिखा था- ''सावधान सावधान, अभी अभी हमें पता चला है कि पाकिस्तान के दो सूअर हमारे देश के किसी नाले में घूस गए हैं, बचकर रहना I उनके नाम हैं कपिल सिब्बल मनीष तिवारी I'' मैं अवाक् होकर उसे देखने लगी I पर उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं I बड़ा अजीब लगा कि ये कैसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, व्यक्तिगत टिप्पणी वो भी इतना घटिया I
आगे बढ़ने पर रामदेव बाबा का बड़ा सा बैनर दिखा जिसपर उन्होंने कहा है कि काला धन वापस आएगा तो हमारे देश को क्या-क्या लाभ होगा I बाबा का आकलन और अनुमान देखकर आश्चर्य हुआ I उस बैनर की तस्वीर हमने ले ली; जब कला धन वापस आ जाएगा तो याद रहेगा कि बाबा के अनुमान के मुताबिक़ क्या-क्या हो पाया और क्या नहीं I

धीरे-धीरे भीड़ में घुसते गए हम I बहुत बुरा हाल था I मीडिया के मंच तक भी नहीं पहुँच पाए कि लगा कि अब बेदम हो जायेंगे I एक तरफ अन्ना के मंच पर बिहार के भोजपुरी फिल्म अभिनेता-गायक मनोज तिवारी का देश भक्ति गीत गूँज रहा था तो दूसरी तरफ कुछ लोग नारा लगा रहे थे - ''सोनिया जिसकी मम्मी है वो सरकार निकम्मी है'', ''मनमोहन जिसका ताऊ है वो सरकार बिकाऊ है I''

वहाँ से ही वापस हो गयी क्योंकि अन्ना के मंच तक पहुँचना असंभव था I पंडाल में एक जगह कुछ ग्रामीण महिलायें बैठी दिखी और साथ में गेरुआ वस्त्र पहने दाढ़ी वाले दो बाबा I वो जन लोकपाल बिल को और इस आन्दोलन को कितना समझती हैं ये जानने के लिए मैं उनसे बात करने लगी I वे सभी 'भारतीय किसान यूनियन' सतना, मध्य प्रदेश, से थे I एक गेरुआधारी का नाम लालमन कुशवाहा है I मैं जिनसे बात कर रही थी उनका नाम शान्ति कुशवाहा है I शान्ति ने बताया कि किसान यूनियन के नेता ईश्वरचंद्र त्रिपाठी के साथ वे सभी आये हैं I मैंने पूछा कि यहाँ क्या हो रहा है, आप क्या करने आयी हैं? शान्ति ने बताया कि हमलोग अन्ना का साथ देने के लिए आये हैं, भ्रष्टाचार दूर करने के लिए I मैंने पूछा कि आपके गाँव में भ्रष्टाचार है? तो एक दूसरी महिला जो शांति के बगल में बैठी थी उत्तेजित होकर कहने लगी कि ''कहाँ नहीं है भ्रष्टाचार? सबको घूस देना पड़ता है तब कोई काम होता है, कहाँ से लाये हम पैसा?'' शान्ति से मैंने पूछा कि क्या आपको कभी घूस देना पड़ा है? उसने कहा ''नहीं हम तो नहीं दिए हैं लेकिन मुखिया और थाना में और अस्पताल में पैसा देना होता है तभी कोई काम होता है I'' मैंने पूछा कि आपको यहाँ कोई दिक्कत? कब से आये हैं आप लोग? उसने बताया कि ''आजे सुबह ही आये हैं, खाना भी मिला है और कोई दिक्कत नहीं है, जब ईश्वरचंद्र जी कहेंगे तभी हम लोग यहाँ से जायेंगे I'' बगल वाली महिला अपना बैज और कार्ड दिखाने लगी जिसपर मेंबर भारतीय किसान यूनियन लिखा था I मैंने कहा कि जन लोकपाल बिल क्या है आपको मालूम है? वो बोली कि ''हम नहीं जानते नेता जी जानते हैं, वही हम लोग को लाये हैं उनके साथ ही हम आये हैं अन्ना का साथ देने''I सच भी है ये ग्रामीण महिलायें लोकपाल बिल क्या जाने, बस इतना जानती है कि अन्ना का साथ देंगे तो देश से भ्रष्टाचार दूर होगा I अन्ना-आन्दोलन को सक्रिय सहयोग देने के लिए शुभकामना देकर हम पंडाल से बाहर आये I पंडाल में ही एक जगह ''यादव वंश का इतिहास'' नामक किताब की बिक्री हो रही थी जिसकी मात्र 3 प्रति ही वहाँ बच गयी थी, बगल में बड़ा-बड़ा पोस्टर उस इतिहास को बताने के लिए लगा था I

सामने दो युवक मुस्कुराता हुआ अपना बैनर लिए खड़ा दिखा, फिर मुझे देखकर नज़दीक आया, किसी के भी आने से वो नज़दीक जा रहा था ताकि उसका बैनर पढ़ा जा सके, मैं पढ़कर स्तब्ध रह गयी ''एच.आई.वी से ज्यादा खतरनाक है कपिल सिब्बल I'' बेटे से मैंने कहा कि फोटो ले लो, तो उन दोनों ने पूरे जोश में आकर फोटो खिंचवाया I 

आन्दोलनकर्ता के साथ ही मुफ़्त खाना खाने वालों की भीड़ वैसी ही बनी हुई थी I केला लेने के लिए अलग एक लम्बी कतार थी, कुछ लोग उनमें से एक बार लेने के बाद खाकर वहीं छिलका फेंक फिर दोबारा पंक्ति में लग जा रहे थे I सच ही है भूख हो तो किसी का भी ईमान भ्रष्ट हो जाता है और कोई मौक़ा चूकने नहीं देता भले वो भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलता हो या फिर भ्रष्टाचार से त्रस्त हो I बाहर निकलने वाले गेट पर एक पोस्टर टंगा था जिसमें लिखा था ''संसद का घेराव करो, जल्दी चलो, जय भारत माता की'', ''अन्ना भूखा है, कुत्ते पार्टी करते हैं''I

अन्ना का अनशन भ्रष्टाचार के विरुद्ध है और हर बार वो हिंसा नहीं करने की गुजारिश करते थे I शारीरिक हिंसा तो कहीं नहीं है इस आन्दोलन में परन्तु मानसिक और भाषाई हिंसा सभी जगह नज़र आ रहा है I सरकार की गलत नीतियाँ और उनके विरुद्ध आवाज़ उठाना हर नागरिक का अधिकार भी है और कर्तव्य भी, लेकिन व्यक्तिवादी गाली देना या अशिष्ट भाषा का प्रयोग करना कहीं से जायज़ नहीं है I निःसंदेह अन्ना के साथ पूरा देश है क्योंकि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पूरा देश है, लेकिन अन्ना को क्या पता कि उनके समर्थक और उनको चाहने वाले उन्हीं के आन्दोलन के पंडाल में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए खुद अपना आचरण भ्रष्ट कर रहे हैं I गाँधी और अन्ना को एक कहने वाले कभी गाँधी को पढ़ लें तो शायद अहिंसा, अनशन और आन्दोलन का अर्थ समझ जायेंगे I

- जेन्नी शबनम (अगस्त 27, 2011)

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Saturday 20 August 2011

27. कठपुतलियों वाली श्यामली दी



श्यामली दी हम सभी को छोड़ कर चली गयीं और इसके साथ ही गुरुदेव की सोच की एक और विरासत का अंत हुआ अभी एक महीने भी तो नहीं हुए जब उनसे मिली थी, कागज़ों और रंगों से खेलती हुई सबकी प्यारी श्यामली दी समझ में नहीं आ रहा इस घटना को किस रूप में लूँ? 20 सालों से दोबारा शान्तिनिकेतन जाने का सपना पाल रखी थी, और जब गई तो सभी से मिली भी और आने के दिन ही श्यामली दी को लकवा (paralysis) का अटैक आया अंतिम दिनों में शायद मुझे उनसे मिलना था बस एक दिन पहले उनके साथ काफी हाउस में बैठ कर कॉफ़ी पी थी, उनके साथ दूकान गयी थी जहाँ से उन्होंने मेरे लिए किताब लिए, और उनके साथ ही एक मित्र के घर बाउल का गाना सुनने और रात्री भोजन के लिए गयी थी, जहाँ उनकी ख़ुद की बनाई ख़ास सब्जी (चचरी) भी थी अटैक से ठीक पहले वो मेरे और मेरे बेटे केलिए नाश्ते की तैयारी कर रही थीं आधा खाना बना चुकी थीं, आधा वैसे ही कटा खुला रखा हुआ था मेरे पहुँचने तक सिर्फ उनके दाहिने हाथ और पैर पर असर हुआ था, चेहरा ठीक था और बोल पा रही थीं  मेरे पहुँचने से पहले उन्होंने ख़ुद मनीषा को फ़ोन कर बताया कि उन्हें अटैक आया है और वो जल्दी आ जाए उन्होंने मंजू दी से जो संयोग से मेरे साथ ही उनसे मिलने आई थीं क्योंकि काफी दिनों से वो मिली नहीं थीं, अपना थैला मँगा कर उसमें रखे पैसे उन्हें दिए जिसे मनीषा को दे देने के लिए कहा ताकि उनका इलाज़ उनके अपने पैसों से हो, किसी और की मदद वो लेना नहीं चाहती थीं जब हम लोग वहाँ पहुँचे तो पूरे होश में थीं और बताई कि कैसे यह सब हुआ और बोलते-बोलते आवाज़ लड़खड़ाने लगी साँस लेने में उन्हें बहुत तकलीफ़ हो रही थी मंजू दी और मैंने बहुत कहा कि अस्पताल चलिए, लेकिन वो राज़ी नहीं थीं फिर उन्होंने कहा कि ठीक है डॉक्टर को बुला लो मंजू दी ने डॉक्टर को फ़ोन किया लेकिन डॉक्टर शान्तिनिकेतन में उपलब्ध नहीं थे तब तक मनीषा आ गई और फिर ज़िद कर हम सबने उन्हें गाड़ी से अस्पताल भेजा गाड़ी में बैठते हुए उनकी साँसे भी अटक रही थी, बहुत मुश्किल से उनको बिठाया गया जाते-जाते भी मनीषा और मंजू दी से वे कहती रहीं कि मुझे ज़रूर से खाना खिला दे जो कुछ भी वो बना पाई हैं इशारे से वो मुझे कह रही थीं कि घर जाकर खा लो बहुत कोशिश कर भी वो कुछ बोल नहीं पा रहीं थीं अस्पताल में प्राथमिक चिकित्सा किया गया, और देखते ही देखते शरीर का समूचा दाहिना हिस्सा काम करना बंद कर दिया  


स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्हें दूर्गापुर ले जाने का निर्णय लिया गया जब ये बात श्यामली दी को बताया गया तो बहुत जोर से चिल्लाने लगी कि उन्हें शान्तिनिकेतन में ही रहना है कहीं बहार नहीं जाना है, जबकि उनकी आवाज़ स्पष्ट नहीं थी पर इशारे में भी वो यही कहती रहीं एक मित्र ने उन्हें कहा कि आप फिक्र न करें सारा इंतजाम हो जाएगा, तो और भी गुस्सा हो गईं उन्हें शायद लगा कि अस्पताल में ख़र्च ज़्यादा होगा और किसी और का पैसा खर्च न हो, इसलिए इशारे में कही कि मनीषा के पास पैसा है, किसी और से पैसा नहीं लेना है मैंने और मंजू दी ने समझाया कि आपके ही पैसे से इलाज़ हो रहा है आप फ़िक्र न करें  


शान्तिनिकेतन जहाँ प्रकृति, शिक्षा, कला, संस्कृति और विद्वता का केंद्र है, एक अच्छा अस्पताल नहीं, जहाँ सामान्य बीमारी से अलग किसी गम्भीर बीमारी का इलाज किया जा सके एम्बुलेंस ऐसी स्थिति में नहीं कि उस से श्यामली दी को दूर्गापुर भेजा जा सके। वहाँ मेरी गाड़ी भी थी और मनीषा की भी लेकिन आपातकालीन प्राथमिक चिकित्सा के बिना श्यामली दी को दूर्गापुर ले जाना संभव नहीं था। उन्हें साँस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी, लगातार ऑक्सीजन दिया जा रहा था दूर्गापुर से एम्बुलेंस चल चुका था इस बीच सत्य (श्यामली दी के एक मित्र) ने साथ जाने का फैसला लिया तो श्यामली दी के पैसे और झोला उन्हें दे दिया गया। इस बीच श्यामली दी के मित्र और शुभचिंतक जमा हो चुके थे और सभी बहुत दुखी थे  

अभी एम्बुलेंस के आने में 2 घंटा और लगना था मनीषा ने कहा कि मैं भी जाकर खाना खा लूँ और इस बीच उसके कुछ सेमीनार होने थे वो सम्मिलित होकर शीघ्र आ जाएगी खाना खाकर वापस आकर मैंने श्यामली दी को बता दिया कि उनके घर जाकर उनका बनाया खाना मैंने खा लिया है और अब आप चिंता न करें वो बस मुस्कुरा दी और मुझे देखने लगीं उनकी आँखों में आँसू थे, शायद अपनी असमर्थता की पीड़ा पर बोलने की बहुत चेष्टा करती रहीं लेकिन आवाज़ गले में अटक रही थी मैंने उन्हें दिलासा दिया कि आप शीघ्र स्वस्थ हो जाएँगी आप दूसरे अस्पताल में चलिए कुछ नहीं बोली बस डबडबाई आँखों से देखती रहीं  

मनीषा से लगातार मैं संपर्क में थी, दूर्गापुर में उनके सिर का ऑपरेशन हुआ कोई सुधार तो नहीं लेकिन स्थिर थीं लगातार वेंटिलेटर पर रहीं तब तक उनका पुत्र आनंदा भी कनाडा से आ गया फिर उनको कोलकाता ले जाया गया क्योंकि स्थिति दिन ब दिन बिगड़ रही थी। 18 जुलाई को उनको अटैक आया था और तब से लगतार अस्पताल में उनका इलाज चलता रहा मनीषा कई बार जाकर उनको देख चुकी थी मनीषा के लिए श्यामली दी बहुत महत्व रखती हैं, मनीषा के लिए जैसे सिर पर से साया उठ गया हो यूँ मनीषा के अपने माता पिता जीवित हैं परन्तु मानसिक संबल सदैव श्यामली दी से मिलता था 15 अगस्त को श्यामली दी ने अंतिम साँस लिया 

श्यामली दी का पूरा नाम श्यामली खस्तगीर है वो एंटी न्यूक्लिअर एक्टिविस्ट के साथ ही लोक-कला-संस्कृति जिसमें पेपर क्राफ्ट, कठपुतली (पपेट), मूर्तिकला, चित्रकला आदि के प्रसार केलिए भी काम करती रहीं वो समाज सेविका के साथ ही लेखिका, कलाकार, चित्रकार, शिल्पकार आदि कलाओं में निपुण मर्मज्ञ के रूप में प्रसिद्द हैं अपने घर 'पलाश' जो कि शान्तिनिकेतन के पूर्व पल्ली में स्थित है, गरीब बच्चों को पढ़ाती थीं इस घर में सभी तरफ इनके पिता और इनकी कला के नमूने कुछ सहेजे कुछ बिखरे हुए देखे जा सकते हैं इनके पिता श्री सुधीर खस्तगीर प्रसिद्द शिल्पकार और चित्रकार थे, साथ ही गाँधीवादी और समाजवादी विचारधारा के व्यक्ति थे शुरूआती दिनों में देहरादून के प्रसिद्द दून स्कूल में 20 साल वे कला के शिक्षक रहे फिर लखनऊ के जी.सी.ए कॉलेज में प्रिंसिपल रहे श्यामली दी की माँ बनारस के एक ब्राह्मण परिवार से थीं श्यामली दी के सिर से माँ का साया बचपन में ही उठ गया था उनका बचपन देहरादून में बीता बाद में शान्तिनिकेतन से उन्होंने कला की पढ़ाई की विश्वविद्यालय के चीना भवन के विभागाध्यक्ष के पुत्र 'तान ली' जो कि कनाडा के मशहूर आर्किटेक्ट हैं से विवाह किया और साथ हीं कनाडा चली गईं वहाँ जाने के बाद वे भारत के साथ ही अमेरिका और कनाडा के शान्ति आन्दोलन से भी जुड़ गईं और अमेरिका में इस आन्दोलन के कारण उनकी गिरफ्तारी भी हुई कनाडा के वैभवशाली जीवन से जल्द ही उब गईं और फिर अपने पति से अलग होकर वापस शान्तिनिकेतन आ गईं अपनी सोच और विचारधारा के कारण वो मेधा पटकर और बाबा आमटे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता के संपर्क में आईं और साथ मिलकर काम करती रहीं 44 वर्षीय आनंदा जो उनके एक मात्र पुत्र हैं कनाडा में अपने परिवार के साथ रहते हैं  
शान्तिनिकेतन से 10 किलो मीटर दूर तिलुतिया गाँव में एक आश्रम को शयमाली दी ने अपनी मृत्यु के बाद दाह संस्कार के लिए तय कर रखा है उनके चाहने और जानने वाले देश-विदेश से आज यहाँ शान्तिनिकेतन में इकत्रित हो चुके हैं श्यामली दी का शरीर आज शान्तिनिकेतन में ज़मींदोज़ कर दिया गया और उसी जगह पर एक पेड़ लगाया गया जैसा कि श्यामली दी की अंतिम इच्छा थी  
शान्तिनिकेतन जैसे उनके जिस्म का कोई हिस्सा हो, या फिर वज़ूद का शान्तिनिकेतन से बाहर वो रहने का सोच भी नहीं सकती थीं अपनी पूरी ज़िन्दगी उन्होंने शान्तिनिकेतन को समर्पित कर दिया और आज ख़ामोशी से अपने चाहने वालों को छोड़ सदा के लिए शान्तिनिकेतन में समाहित हो गईं 

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 16, 2011)
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Monday 15 August 2011

26. स्मृतियों से शान्तिनिकेतन


ये जाना पहचाना रास्ता अब अनजान था, शायद वक्त पहचान को अजनबियत में भी बदल देता है सड़क के दोनों ओर हरे-हरे पेड़, बीच में कुछ दूर छोटे बड़े शांत पहाड़, तेज़ भागती गाड़ी और किसी बौलीवुड की फिल्म की तरह तेजी से आँखों से गुजरता फ्लैश बैक मन में उमंग, उत्सुकता और उल्लास बीच-बीच में मनीषा (मनीषा बनर्जी जो मेरी मित्र है और पास के गाँव के एक सरकारी इंटर स्कूल में शिक्षिका है) का फ़ोन आता कि हमलोग कहाँ तक पहुँचे? यूँ तो भागलपुर से शान्तिनिकेतन 210 किलोमीटर ही है, पर सड़क की बदहाल स्थिति के कारण हमें 6 घंटे लग गए भागलपुर से बांका, मंदारहिल, दुमका, सिउरी होते हुए हम शान्तिनिकेतन पहुँचे शान्तिनिकेतन का रतनपल्ली, जहाँ आज से 20 साल पहले मैं कई महीने रह चुकी हूँ बिल्कुल पहचान ही नहीं पाई सबकुछ बदला-बदला लग रहा था अपरिचित-सा अचानक एक दूकान पर नज़र पड़ी 'रंजनी', मैंने चौंक कर कहा ''अरे ये तो हाशिम भाई की दूकान है (लुत्फा दी के शौहर) जिनके मकान में मैं रहती थी पर कालो की दूकान कहाँ है? जहाँ गौर दा के साथ अक्सर खाने के लिए जाती थी'' मैं चारो तरफ देख रही थी, कितना कुछ बदल गया है यहाँ मैं भी तो पूर्णतः बदल गई हूँ, जब यहाँ से गई थी तो अविवाहित थी, और दोबारा यहाँ आई हूँ अपने 18 साल के  बेटे के साथ मन में सोच कर ख़ुद ही हँसी भी आई और ख़ुद पर तरस भी सच वक़्त और दूरी सब कुछ बदल देता है, शायद अपनापन भी तब तक मनीषा अपनी बेटी मेघना जो 9 वर्ष की है के साथ वहाँ तक आ चुकी थी और फिर उसके साथ हमलोग उसके घर गए मनीषा से मेरा परिचय भागलपुर में हुआ था जब भागलपुर दंगा (अक्टूबर 1989) के बाद गौर दा एक टीम बनाकर हमारे घर आए थे, और बाद में 1990 में मुझे शान्तिनिकेतन लेकर गए जहाँ बानी दी और मनीषा के साथ मैं रही थी उन दिनों मनीषा अंग्रेजी में एम.ए कर रही थी और मृणालिनी छात्रावास में रहती थी अब वो रतनपल्ली में अपना मकान खरीद ली है जहाँ पति से अलग होने के बाद अपनी एक मात्र बेटी के साथ रहती है 
मनीषा ने मेरे लिए शुद्ध शाकाहारी खाना बनवा रखा था और मेरे बेटे के लिए मछली यूँ मनीषा भी शाकाहारी है मैंने कहा भी कि सिद्धांत (मेरा बेटा अभिज्ञान सिद्धांत) के लिए मछली क्यों बनवाई, तो बोली कि बंगाल आए और मछली न खाए ऐसा कैसे होगा। मनीषा का घर बड़ा प्यारा है ऊपर के कमरे में हमारे रहने का प्रबंध किया था उसने खाना खाकर हम बात कर ही रहे थे कि लुत्फा दी (लुत्फा मुंशी) आ गईं वे हिन्दी नहीं बोल पाती और मैं अब ठीक से बँगला नहीं बोल पाती मुझे देखकर बेहद आश्चर्य हुआ उन्हें कि एक लड़की दुबली पतली चुप-चुप-सी रहने वाली, वो अब एक औरत है, जिसका छेले (बेटा) 18 साल का, थोड़ी मोटी-मोटी-सी हँसती खिलखिलाती हुई थोड़ी देर बातें हुईं फिर घर आने का कह कर वो चली गईं  


शाम को हमलोग प्रकृति गए, जहाँ क्राफ्ट मेला लगता है छोटे पौष मेले जैसा, लेकिन वैसा ही मन मोहक मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, आदि से बना कान का गले का हार, हाथ से बना पेपर, बाटिक प्रिंट के कपड़े, बाऊल के गीत सब कुछ थे वहाँ। फिर वहाँ से श्यामली दी (श्यामली खस्तगीर जो एक सामजिक कार्यकर्ती, लेखिका, चित्रकार, हस्तकला और लोककला की मर्मज्ञ हैं) से मिलने मनीषा के साथ हम लोग पास के एक कॉफी हाउस गए, जहाँ से श्यामली दी के साथ एक मित्र के घर जाना था, जहाँ रात्रि भोजन भी और बाऊल गान भी होना था मैं, मनीषा, मेघना और सिद्धांत कुछ खाने का ऑर्डर कर श्यामली दी के आने का इंतज़ार कर रहे थे थोड़ी देर में श्यामली दी उसी पुराने अंदाज़ में आईं सूती साड़ी, दोनों कंधे पर दो झोला, पर इस बार उनको चप्पल पहने भी देखा मुझे याद है उन दिनों वो शान्तिनिकेतन में बिना चप्पल के रहती थीं मैंने पाँव छुए तो गले से लगा ली, फिर मेरी मम्मी का हाल पूछने लगीं वहाँ से वे एक किताब की दूकान में हमें ले गईं जहाँ से उन्होंने 5 किताब खरीदे और एक अपनी लिखी हुई किताब जो वो साथ लाई थीं, मुझे तोहफ़े में दिया साथ ही सेरेमिक की एक छोटी सी प्याली और एक सुराही भी दी जो सजावट के लिए होती है और शान्तिनिकेतन के पॉटरी में बनता है फिर वहाँ से हम लोग सत्य शिवरमन के घर गए जो अभी हाल ही में शान्तिनिकेतन रहने आए हैं और पेशे से पत्रकार हैं वहाँ 5 -6 बाऊल (गेरुआ वस्त्र पहनते हैं, एक तारा से धुन बजाते हैं और भक्ति गाना गाते हैं जो सूफी संगीत की तरह होता है) पहले से आ चुके थे, बस हम लोग के आने का इंतज़ार हो रहा था सबसे नमस्कार के बाद उनका गाना शुरू हुआ, हम सभी डूब रहे थे उनके गाने में गाने के बाद खाना लगाया गया सत्य और उनकी मित्र मधुमिता ने ख़ुद ही सारा खाना बनाया था और श्यामली दी की बनाई हुई एक ख़ास सब्जी भी थी खाने के बाद श्यामली दी को उनके घर पर छोड़ कर हम मनीषा के घर आए  

दूसरे दिन विश्वभारती विश्वविद्यालय घूमने जाना था साथ ही पुराने एक दो मित्र से मिलना भी था नाश्ते के बाद मनीषा के साथ हम लोग हिन्दी भवन गए हिन्दी भवन की विभागाध्यक्ष मंजू दी (मंजू रानी सिंह) से मिले, वो भागलपुर की रहने वाली हैं और उनकी शिक्षा भी विश्वभारती में ही हुई है जब मैं यहाँ रहती थी तो अक्सर उनसे मिलती थी सुभाष (सुभाष चन्द्र राय) जो अब हिन्दी भवन में ही व्याख्याता हैं (बेगुसराय के रहने वाले हैं, उन दिनों यहाँ के छात्र थे और वी.पी.सिंह का गहरा प्रभाव होने के कारण उनकी ही तरह कुरता पायजामा और टोपी पहनते थे) को भी मंजू दी ने बुला लिया सुभाष अब भी वो वैसे ही हैं, पर अब टोपी उतार दिया है बानी दी( जिनके घर पर मैं एक महीना रही थी) के घर अक्सर छात्रों का जमावड़ा होता था जिनमें सुभाष भी होता था रात को मंजू दी ने खाने पर बुलाया और फिर रात में मिलने का कहकर मैं सिद्धांत को लेकर टैगोर का घर दिखाने ले गई टैगोर का पाँचो घर- उदयना, कोणार्क, श्यामली, पुनश्च और उदीची हमने देखा 'बिचित्र' जिसे रबिन्द्र भवन भी कहते हैं और जहाँ टैगोरे का म्यूजियम है इनदिनों बंद हैं, सुरक्षा के कड़े प्रबंध के लिए कुछ निर्माण कार्य चल रहा है संगीत भवन और कला भवन भी हम घूम आए फिर मृणालिनी छात्रावास (कुछ दिन वहाँ भी मनीषा के साथ रही थी) देखते हुए मनीषा के घर वापस आए मनीषा ने साड़ी, कुर्ता, बैग, फ़ाइल होल्डर, मिट्टी का गले-कान का सेट आदि मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए तोहफ़े में दिया जो उसने वहीं के कॉपरेटिव स्टोर से लिया था खाना खाकर हम और मनीषा बातें करने बैठ गए बीती ज़िन्दगी की बातें जिनमें मनीषा की मुश्किलों भरी ज़िन्दगी और गौर दा (गौर किशोर घोष जो आनंद बाज़ार पत्रिका के सिनियर एडिटर, कहानीकार और लेखक थे, 1981 में उन्हें पत्रकारिता, साहित्य तथा सृजनात्मक सम्प्रेषण कला के लिए मैग्सेसे सम्मान मिला था तथा सामाजिक कार्यकर्ता भी थे) की बातें प्रमुख थी गौर दा ही थे जो मुझे शान्तिनिकेतन लेकर आए थे क्योंकि मैं उन दिनों बहुत परेशान रहती थी फिर मनीषा का एक मित्र रेहान आया, जो मनीषा का सहकर्मी है, जिससे बातें कर हमलोग लुत्फा दी के घर गए 
लुत्फा दी के घर में किराए लेकर मैं बिलकुल अकेले कई माह रही थी। बड़ी-सी खुली छत पर एक कमरा 'एल' आकर का उससे लगा एक बड़ा-सा रसोईघर, बाहर दरवाजे से लगा शौचालय मेरे पास सामान के नाम पर एक चटाई और पतला तोसक (गद्दा), एक तकिया, कुछ कपड़े, एक छोटा सूटकेस, एक स्टोव, एक कूकर, कुछ बर्तन, एक वाकमैन और ढ़ेर सारे कैसेट थे। मैं अपने घर पर इतना डरती थी कि अकेले सो भी नहीं सकती थी और यहाँ अकेले रह रही थी बड़े प्यारे दिन थे वो भी कुछ जल्दी-जल्दी बना खा लिया और चल पड़े किसी तरह का कोई डर नहीं उन्हीं दिनों सुनीता गुप्ता नाम की एक छात्रा जो हॉस्टल में रहती थी, से मेरी दोस्ती हुई उसके बाल बहुत लम्बे थे घुटने से भी ज्यादा बड़े जब भी कोई पर्यटक उसे देखता तो कहता देखो बंगाली लड़की का बाल, और हम दोनों हँस देते थे, क्योंकि वो बंगाली नहीं थी, गोरखपुर की रहने वाली थी पूरे पौष मेला में हम दोनों मेरे घर पर खिचड़ी बना कर खा लेते और निकल जाते, दिन भर मेला देखते रहते पता नहीं वो कहाँ है आजकल उसका पता नहीं मिल पाया मुझे लुत्फा दी ने ढ़ेर सारी तैयारी कर रखी थी खाने की पहले मुझे वो कमरा देखना था जहाँ मैं रहती थी बहुत उत्साह से पूरा घर दिखाया उन्होंने अब वहाँ पर एक और कमरा बन गया है जिसमें उनकी एक मात्र बेटी जब ससुराल से आती है तो रहती है मेरे बाद कोई और नहीं रहा वहाँ फिर हमलोगों ने नाश्ता किया बहुत अच्छा खाना बनाती हैं लुत्फा दी उन दिनों भी अक्सर कुछ न कुछ खिलाती थी मुझे मेरे लिए शान्तिनिकेतन का एक बैग और सिद्धांत के लिए एक वालेट तोहफ़ा में दिया उन्होंने अपनी लिखी पुस्तक (बांग्ला लिपि में) जो उनकी आत्मकथा है मुझे दिया दोबारा आने का कह कर हमलोग वहाँ से विदा हुए ठीक उनके मकान से लगा हुआ बानी दी (बानी सिन्हा, 92 वर्षीया, गौर दा की मित्र, जिनके घर मैं एक महीना से भी ज्यादा रही थी) का घर था, अब वो दूसरे मकान में रहती हैं और अस्वस्थ होने के कारण इन दिनों कोलकाता में अपनी बहन के पास रह रही हैं, बाहर से खड़े होकर उस मकान को देख लिया फिर हम बोलपुर बाज़ार चल पड़े यहाँ का कुछ ख़ास सामान यादगार स्वरुप लेने के लिए 

रात्रि भोजन के लिए हमलोग मंजू दी के घर के लिए निकले
 रास्ते में अमर्त्य सेन का घर आया, गाड़ी थोड़ी धीमी कर हमने उस घर को ठीक से देख लिया मंजू दी के घर कविताओं पर थोड़ी चर्चा हुई मंजू दी और मनीषा ने अपनी-अपनी स्वरचित कविता सुनायी. मैं भी अपनी उसी दिन की लिखी हुई कविता सुनायी जो शान्ति निकेतन पर लिखी थी कविता के भाव इस तरह है जैसे कि शान्तिनिकेतन और मेरे बीच वार्ता हो रही हो कि क्यों छोड़ गई थी शान्तिनिकेतन, फिर से दोबारा आना वक़्त निकाल कर कुछ दिनों के लिए, साथ-साथ यादों को जिएँगे 

उन्हीं दिनों की तरह...

*******
चौंक कर उसने कहा
''जाओ लौट जाओ  

क्यों आयी हो यहाँ  
क्या सिर्फ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?  
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें  
क्यों छोड़ गई थी हमें?''  
मैं अवाक्  
निरुत्तर!  
फिर भी कह उठी  
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी  
गवाह तो थे न तुम,   
जीवन की दशा और दिशा को   
तुमने ही तो बदला था,   
सब जानते तो थे तुम   
तब भी और अब भी   
सच है   
तुम भी बदल गए हो   
वो न रहे   
जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं,   
एक भूल भुलैया   
या फिर अपरिचित सी फ़िज़ा   
जाने क्यों लग रही है मुझे    
तुम न समझो   
पर अपना सा लग रहा है मुझे   
थोड़ा-थोड़ा ही सही,   
आस है   
शायद   
तुम वापस अपना लो मुझे   
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ   
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे,   
और तुमने बेझिझक   
सहारा दिया था मुझे   
ये जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ   
और हमेशा रहूँगी,   
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी   
और मैं बेफ़िक्र   
ज़िन्दगी के नए रूप देख रही थी   
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी   
सब कुछ बदल गया है   
वक़्त के साथ,   
जानती हूँ   
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ   
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे   
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ,   
फ़र्क सिर्फ वज़ह का है   
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है   
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ   
तनिक सुकून दे दो   
फिर लौट जाना है मुझे   
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में   
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी   
तुमसे दूर   
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी   
अब तक जीवित हूँ   
मत कहो -   
''जाओ लौट जाओ'',   
एक बार कह दो -   
''शब, तुम वही हो   
मैं भी वही   
फिर आना   
कुछ वक़्त निकालकर   
एक बार साथ-साथ जिएँगे   
फिर से   
उन्हीं दिनों की तरह   
कुछ पल!''
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मंजू दी से सुबह ही दूर्गा का पता करने को कहा था
। मैं जब यहाँ रह रही थी तब एक महीना तक रोज़ एक घंटा दुर्गा दा से गाना सीखती थी जिस दिन यहाँ से वापस गई किसी से मिल न पाई, दुर्गा दा को धन्यवाद भी न दे सकी थी मुझे उनका पूरा नाम भी मालूम न था, सिर्फ दुर्गा दा ही जानती थी मंजू दी ने उनके घर का पता लगा लिया था सुबह 8 बजे मिलने का वक़्त दिया उन्होंने एक उलझन यह भी थी कि क्या ये वही दुर्गा दा हैं या कोई और हैं, और इसका समाधान उनसे मिलने के बाद ही होना था तय हुआ कि सुबह मंजू दी के साथ जाऊँगी और अगर वो न हुए तो फिर उनसे पता करुँगी ख़ैर पता भी सही था और दुर्गा दा भी वही थे वो  बहुत ख़ुश हुए मुझसे मिलकर पर पहचानने में थोड़ा वक़्त लगा उन्हें बानी दी का नाम कहने पर तब याद कर सके वो मुझे क्योंकि बानी दी ने ही मेरे संगीत शिक्षा के लिए उनसे बात किया था 

आज वापस लौटना था
 श्यामली दी ने सुबह अपने घर नाश्ते पर बुलाया था। नाश्ते के बाद सीधे वहीं से भागलपुर लौट जाने की बात तय हुई थी। दुर्गा दा से मिलने के बाद मेरे साथ ही मंजू दी मनीषा के घर आ गईं, काफ़ी दिनों से वो श्यामली दी से मिली नहीं थी तो मेरे साथ ही उनके घर चलेंगी मनीषा बाद में आने का बोली क्योंकि उस दिन उसे 3-4 सेमीनार में जाना था जहाँ उसे बोलना भी था। हम अपना सारा सामान लेकर चल दिए क्योंकि श्यामली दी के घर से ही भागलपुर के लिए निकल जाना था  
श्यामली दी का घर 'पलाश' जहाँ मैं बहुत आया करती थी, और लाल चन्दन बीज से गहने बनाना सीखी थी, आज भी गेट के भीतर घुसते ही गिरा हुआ दिखा बेटे को मैंने कहा कि कुछ बीज उठा लो, कैसे बनाती थी याद करुँगी जैसे ही हम लोग उनके घर के बरामदे में पहुँचे कि एक अफ्रिकन जो उनका मित्र है घबराया हुआ बाहर आया और बताया कि श्यामली दी को अटैक आया है हम सभी दौड़ते हुए अन्दर पहुँचे एक कुर्सी पर वो निढ़ाल बैठी थी, एक पाँव और एक हाथ में लकवा (paralysis) का अटैक हो चुका था चेहरे पर उस समय तक नहीं हुआ था और बोल पा रही थीं हमारे पहुँचने से पहले ही उन्होंने मनीषा को फ़ोन कर दिया था कि उन्हें अटैक आया है हॉस्पिटल जाने को राजी नहीं थीं पर बहुत कहने पर राजी हुई कि शान्तिनिकेतन के ही हॉस्पिटल में जाएँगी बाहर नहीं एक कमरे की तरफ इशारा कर उन्होंने एक झोला मँगवाया और उसमें से पैसे निकाल कर मंजू दी को दिया कि मनीषा को दे देना मंजू दी से बार-बार कह रही थीं कि जेन्नी को खाना खिला देना धीरे-धीरे उनके चेहरे पर भी असर होने लगा तबतक मनीषा आ गई फिर हम सभी मिलकर मनीषा की गाड़ी से उनको अस्पताल भेजे फिर सत्य शिवरमन को सूचना दी गई, वो आए तो उन्हें लेकर हम अस्पताल पहुँचे अस्पताल में उनके मित्रों की भीड़ लग गई थी चूँकि कोई भी उनका रक्त सम्बन्धी नहीं था तो अस्पताल की कार्यवाही में दिक्कत आ रही थी, परन्तु डॉक्टर अपना काम कर रहे थे डॉक्टर ने उनको दूर्गापुर या कोलकाता ले जाने के लिए कहा क्योंकि स्थिति बहुत नाजुक थी शरीर का पूरा दाहिना हिस्सा लकवाग्रस्त हो चुका था और चेहरा भी वहाँ जब हम लोग मिलने गए तो उन्होंने इशारे से कहा कि खाना खा लेना और मंजू दी को कहा कि जेन्नी को खाना खिला देना हम लोगों ने कहा कि दूर्गापुर जाना है तो इस स्थिति में भी इंकार करने लगी कि शान्तिनिकेतन छोड़ कर नहीं जाना है तब तक दूर्गापुर से एम्बुलेंस लाने की व्यवस्था हो गई थी सत्य ने स्वयं उनके साथ एम्बुलेंस में जाने का निर्णय लिया  तत्पश्चात श्यामली दी का झोला जिसमें पैसा था सत्य को दे दिया गया  
मनीषा ने मुझसे कहा कि एम्बुलेंस आने में 2 घंटा लगेगा तब तक घर जाकर खा लो नहीं तो श्यामली दी को बहुत दुःख होगा, तबतक वो भी अपने सेमीनार से होकर आ जाएगी मंजू दी के साथ हम श्यामली दी के घर आए एक रिक्शावाला वहीं रहता है, उसने बताया कि श्यामली दी रात में बहुत देर तक जागी थीं और सुबह से हमारे लिए खाने की तैयारी कर रही थी खाना बनाने और खिलाने की शौक़ीन रही हैं श्यामली दी मिक्स पराठा बना चुकी थी, पनीर बना कर रखी थी, आलू उबला हुआ, प्याज आधा कटा हुआ, फ्रिज़ में कई तरह की सामग्री इस परिस्थिति में खाने का मन नहीं हो रहा था पर इंसुलिन लिए काफी देर हो चुका था तो खाना भी आवश्यक था फिर पनीर आलू को भूंज कर पराठा और अचार के साथ हम तीनों ने खाना खाया इस बीच मंजू दी ने सिद्धांत से कहा कि घर की तस्वीर ले लो, क्योंकि श्यामली दी के पिता सुधीर खस्तगीर एक बहुत बड़े शिल्पकार और चित्रकार थे, और ख़ुद श्यामली दी भी उनकी कीमती कलाकृति सब वैसे ही पड़ी हुई थी श्यामली दी के  पुत्र आनन्दो तान ली  कनाडा में रहते हैं, जब तक आ न जाए तब तक पता नहीं किसके पास घर की चाभी हो मैंने मनीषा से कहा कि उनके घर की चाभी वो रखे किसी और को न दे, क्योंकि मनीषा को श्यामली दी बहुत मानती थीं फिर वापस आकर मैंने श्यामली दी को बताया कि हम लोगों ने उनका बनाया खाना खा लिया है तो वो मुस्कुरा दीं और भर्राई हुई आवाज़ में कुछ कहा उन्होंने शब्द गले में अटके जा रहे थे, बहुत चेष्टा कर भी स्पष्ट बोल नहीं पा रही थीं आँखें भींग गई थी उनकी उस मुस्कराहट में लग रहा था जैसे कि उनके बनाए हुए खाने को मेरे खा लेने से उनको तसल्ली मिली हो इस अवस्था में भी उन्हें अपने से ज्यादा दूसरों की फिक्र थी अपना इलाज उन्हें अपने पैसे से ही कराने की ज़िद भी. 
करीब 3 बजे हम लोग भागलपुर के लिए चल दिए। मुझे अस्पताल में दुर्गा दा का फ़ोन आया कि रास्ते में उनका विद्यालय है, मिलते हुए जाना श्रीनिकेतन में रास्ते में उनसे मिलते हुए हम वापस भागलपुर के लिए रवाना हो गए, साथ में कुछ अच्छी और कुछ दुःख भरी यादों को साथ लिए गौर दा से तो हम मिल न पाए, 2000 में ही उनकी मृत्यु हो गई थी, जो मुझे 2003 में पता चला ज़िन्दगी में मैं ऐसी उलझी कि विवाह पूर्व के सारे रिश्ते खोते चले गए बानी दी भी अब बहुत ज्यादा अस्वस्थ हो चली हैं, शान्तिनिकेतन कम ही रहती हैं बाद में कोलकाता जाना हुआ तो टॉम दा (इन्द्रजीत रॉय चौधरी जो चित्रकार और पुराने वस्तु के संग्राहक हैं और बानी दी के भाई हैं) से मुलाक़ात हुई उन दिनों टॉम दा जब भी शान्तिनिकेतन आते थे तो मुझसे ज़रूर मिलते थे। जब मैं वहाँ रह रही थी तब अपने हाथों से बनायी हुई दो अंगूठी और बंगाल की एक साड़ी उपहारस्वरूप उन्होंने मुझे दिया था दोबारा एक बार और कोलकाता जाना हुआ तो उनकी माँ रेणुका रॉय चौधरी से मुलाक़ात हुई जो अपने समय की विख्यात उपन्यासकार थीं 

श्यामली दी का ऑपरेशन हो चुका है और लोगों को थोड़ा-थोड़ा पहचान रही हैं लेकिन स्थिति बहुत ही नाज़ुक बनी हुई है
 उनका बेटा भी आ चुका है और माँ का पूरा ख्याल रख रहा है अब श्यामली दी को कोलाकाता ले जाया गया है, लेकिन स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जा रहा है, अब भी वो वेंटीलेटर पर हैं जब तक बोल सकी और इशारे से अब भी शान्तिनिकेतन जाने की बात करती हैं आगे क्या होगा नहीं पता, लेकिन मुझे लगता है कि अब उन्हें वापस शान्तिनिकेतन ले ही आना चाहिए, कम से कम मानसिक रूप से तो वो मज़बूत महसूस करेंगी यूँ भी उनके प्राण शान्तिनिकेतन में ही बसते हैं, भले कुछ कहने में अब असमर्थ हो गईं हैं उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना सभी जानने और चाहने वाले कर रहे हैं स्वस्थ हो जाने के बाद एक बार फिर से शान्तिनिकेतन जाऊँगी श्यामली दी से मिलने 

- जेन्नी शबनम (11. 8. 2011)

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