Wednesday, September 29, 2010

12. हर दिन खुशियों का दिन

लो आ गया जश्न का एक सप्ताह 'जॉय ऑफ़ गिविंग वीक' (Joy of giving week) जो 26 सितम्बर से 2 अक्टूबर तक दुनिया भर में मनाया जाएगाइस नए जश्न भरे सप्ताह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी मुझेहाँ, यह ज़रूर याद आया कि सितम्बर का तीसरा रविवार 'डॉटर्स डे' (daughters day) यानी बेटियों का दिन होता है। अच्छा है, अब पूरा एक सप्ताह ख़ुशी लेने और देने में बीतेगा पर इसके लिए कोई हंगामा क्यों नहीं? अरे... 
 
मुझे याद है हर साल जब भी वेलेंटाइन डे, रोज़ डे, चाकलेट डे आदि का सप्ताह आता है, तो कुछ ख़ास सोच के लोगों द्वारा इसका बहिष्कार होता है बार-बार चेतावनी दी जाती है कि ये हमारी संस्कृति को नष्ट करने के तरीक़े हैं, इससे हम पथभ्रष्ट हो रहे हैं आदि-आदि; अतः इस विदेशी संस्कृति को न अपनाएँ यहाँ बहिष्कार का मतलब सिर्फ़ वैचारिक विरोध से नहीं है, बल्कि इन विशेष दिनों को मनाने वालों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी दी जाती है; क्योंकि इनके हिसाब से ये देश की परम्परा और संस्कृति का अपमान है अब वेलेंटाइन डे को ही लें, इसकी आड़ में वे पति-पत्नी को भी नहीं बख़्शते और ज़बरदस्ती राखी बँधवाकर रिश्तों का अपमान करते हैं  
 
हर साल कहा जाता है कि लोग वेलेंटाइन डे मनाते हैं, लेकिन भगत सिंह या दूसरे क्रांतिकारियों या देश के शहीदों को क्यों नहीं याद करते? नेट और मोबाइल पर ऐसे संदेशों की भरमार होती है कई बार मैं इस बहस में पड़ चुकी हूँ लोग किसी भी बात को सही और सार्थक दिशा में क्यों नहीं सोचते? आज भी मैं यही सोच रही हूँ कि इस बार एक भी सन्देश न आया कि ये 'जॉय डे' क्यों मनाया जा रहा है एक दिन नहीं बल्कि एक पूरा सप्ताह इसके नाम। आज भगत सिंह का जन्मदिन है फिर आज क्यों भूल गए ये तथाकथित देश प्रेमी? एक भी सन्देश नहीं न तो चेतावनी क्या सिर्फ़ इसलिए कि इसमें प्रेम शब्द शामिल नहीं? पर ख़ुशी शब्द तो शामिल है न! लोगों को प्रेम देंगे और हमें प्रेम मिलेगा तभी ख़ुश रह सकते हैं हम 

अब इस 'जॉय वीक' को कैसे मनाया जाए? परिवार के साथ मिलकर जैसे मन हो वैसे जश्न मनाएँ परिवार के साथ अपनी अनुभूतियाँ बाँटें और अन्य सदस्यों के मन के अनुरूप कोई योजना बनाएँ ताकि सभी प्रसन्न होंपरिवार के अलावा दोस्त और परिचित के साथ भी हम ख़ुशियाँ बाँट सकते हैं और उनको ख़ुशी दे सकते हैं  
 
मेरी माँ ने दो दिन पहले ही मुझे 'पुत्री दिवस' (daughters day) की बधाई दी और मैंने अपनी बेटी को आज 'पुत्री दिवस' की बधाई दी। मैं एक माँ की बेटी हूँ और एक बेटी की माँ। दोनों रिश्ते समझती हूँ और कहीं-न-कहीं उनसे ख़ुद को गहरे में जुड़ा महसूस करती हूँ मैं, मेरा बचपन और मेरी ज़िन्दगी इन तीनों को मिलाकर सम्पूर्ण 'मैं' हूँ, जिसमें मेरी माँ अपनी ख़ुशी ढूँढती हैं। वैसे ही अब मैं अपनी बेटी में ख़ुद को ढूँढने लगी हूँ  
 
मेरे जीवन में इतने ज़्यादा उतार-चढ़ाव आए कि ख़ुशी के ज़्यादातर पल विस्मृत हो गए, जो पल दर्द दे गए वह ज़्यादा याद रहते हैं ऐसा नहीं कि जीवन में कोई ख़ुशी नहीं मिली, ख़ुशी भी भरपूर मिली लेकिन शायद मानव स्वभाव है कि दुःख ज़्यादा याद रहता है और ख़ुशी कम कोशिश तो यही होती है कि सभी ख़ुश रहें, घर ही नहीं बल्कि मुझसे जुड़े सभी लोग ख़ुश रहें और मैं भी इन सब में ख़ुश रहूँ ऐसे में जब भी कोई ऐसा ख़ास दिन आता है, तो मुझे बेहद ख़ुशी होती है, चाहे वह बाल दिवस, वेलेंटाइन डे, रोज डे, चाॅकलेट डे, मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेंडशिप डे, किसी का बर्थ डे, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, कोई ख़ास पर्व या त्योहार, या कोई ख़ास दिन को समर्पित एक दिन इसी बहाने इन ख़ास दिनों में मन में उमंग और उत्साह होता है, कुछ ख़ास करने का मन होता है या फिर किसी नए तरीक़े से मनाने की योजना बनाई जाती है  
 
जद्दोजहद से भरी ज़िन्दगी में कुछ नया पाने, देखने, सोचने की ऐसी कोई भी कोशिश जो मानवीय सम्बन्धों को और भी ख़ूबसूरत बनाए ख़राब कैसे हो सकती है जब भी ऐसा कोई मौक़ा आता है तब बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है तरह-तरह की फ़रमाइशें होती हैं, ख़ास दिन के लिए ख़ास कपड़े और तोहफ़ा! हर बार जब भी कोई ख़ास दिन आता है, तब मैं सोचती हूँ कि क्यों नहीं हर दिन को किसी ख़ास दिन को समर्पित कर दिया जाए हर दिन खुशियों का, जश्न का और जीने का दिन हो

-जेन्नी शबनम (28.9.2010)
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Thursday, August 26, 2010

11. आज की ताज़ा ख़बर

रोज़ की तरह आज भी बहुत ही अनमने मन से अख़बार पढ़ने बैठी एक सरसरी नज़र से सब देख गई, नया कुछ तो होता नहींहर दिन अख़बार में एक-सी ख़बर- अमुक जगह ये घटना, वहाँ ये दुर्घटना, किसी की हत्या हुई, किसी ने आत्महत्या की, कहीं शहर बंद के दौरान कितनी संपत्ति नष्ट की गई तो विरोध में कितनी जानें गईं और जानें ली गईं, कहीं छात्र ने ख़ुदकुशी की तो कहीं छात्र के पास हथियार बरामद, प्रेम विवाह करने पर नव विवाहित की हत्या तो कहीं पुत्री का विवाह न कर पाने की वज़ह से पिता ने की आत्महत्या, भूख से मृत्यु तो कहीं शराब के सेवन से मृत्यु, अवैध सम्बन्धों से आहत पति ने पत्नी का ख़ून किया तो कहीं पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति का क़त्ल किया, कहीं बलात्कार हुआ तो किसी ने दहेज के लिए अपनी पत्नी को जलाकर मार दिया, लावारिश जन्मजात कन्या कचरे पर पाई गई तो कहीं पुत्र के लिए पुत्री की बलि चढ़ाई गई, सड़क दुर्घटना में मौत तो अस्पताल में असंवेदनशीलता से मौत, सरकार की असफलता की कहानी तो कभी किसी प्रांत के असफल सरकार की बयान-बाज़ी, सत्ता का खेल तो विपक्षी पार्टियों का दोषारोपण, कहीं बारिश न होने से सूखे की आपदा तो कहीं बाढ़ से त्राहि अजब ख़बर अजब तमाशा! अब क्या-क्या गिनाएँ! 
 
रोज़ यह सब पढ़-पढ़कर, अख़बार पढ़ने से मेरा मन उचट गया है; लेकिन आदत है कि बिना एक नज़र डाले रहा भी नहीं जाता, भले रात के 12 बज जाएँ घर में चार अख़बार आता है, सबमें वही ख़बर फिर भी आदत से पढ़ती हूँ मन से नहीं और रोज़ खिन्न मन से कहती हूँ कि आज से नहीं पढूँगी और फिर दूसरे दिन...अख़बार...ख़बर...उचाट मन  
 
दूरदर्शन पर बेतुका सीरियल जिसका आम जीवन से कोई मतलब नहींसमाचार भी ऐसा कि सुबह से शाम तक एक ही ख़बर बार-बार, जिससे आम जनता को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ताअपनी जनता को दिखाने के लिए संसद में सांसदों का चिल्लाना या फिर नाटकबाज़ी किसी बड़े नेता या अभिनेता की शादी या बीमारी का ज़िक्र देश की सबसे बड़ी ख़बर बन जाती है कोई-कोई कार्यक्रम ऐसा कि ख़ौफ़ के बारे में बताने वाला ख़ुद ही ख़ौफ़नाक लगता है प्रतयोगिता वाला कार्यक्रम जिसमें एक को विजयी होना है और अन्य को पराजित विद्यालय में अगर बच्चा अपने वर्ग में एक स्थान नीचे आ जाता है, तो न सिर्फ़ बच्चा बल्कि उसके माता-पिता भी सहन नहीं कर सकते, और यहाँ तो सार्वजनिक रूप से उसकी पराजय दिखाई जाती है, जिसे एक साथ करोड़ों लोग देखते हैं पराजित होने वाले की मनोदशा कैसी होती होगी उस समय उफ़! अच्छा नहीं लगता मुझे कि कोई हारे या कोई जीते, महज़ मनोरंजन हो तो कोई बात है छोड़ दिया मैंने दूरदर्शन का भी दर्शन करना  
 
समस्याएँ तो हम सभी गिना देते, लिख देते और दिखा देते; लेकिन इससे नज़ात पाने के लिए चिन्तन और सुझाव किसी के पास नहीं होता है। आख़िर देश और समाज में ऐसा क्यों हो रहा है? हमारी असंतुष्टि और असहनशीलता की कुछ तो वज़ह है सभी बदहाल हैं फिर भी किसी तरह निबाह रहे, हर परिस्थिति में मन मारकर जी रहे शायद समझौतों में जीने की आदत पड़ चुकी है या नई उम्मीद की किरण अस्त हो चुकी है। ख़तरे और जोख़िम के लिए हम में से कोई राज़ी नहीं, बने बनाए नियम पर चलने में सुविधा होती है समूह के साथ चलने की आदत पड़ चुकी है हमें या हम उस भीड़ का हिस्सा बनते हैं जिसका मक़सद नव-निर्माण नहीं बल्कि सिर्फ़ विध्वंस है  
 
कभी-कभी सुखद बदलाव की गुंजाइश दिख जाती है, जब ताज़ा खबर में पाती हूँ कि किसी दुर्गम स्थान पर कोई सार्थक कार्य हो रहा है, ग्रामीण अंचल या फिर पिछड़े इलाक़े तक पहुँचकर कोई उनके लिए कुछ सोच रहा है रोज़ इसी उम्मीद के साथ ताज़ा ख़बर पढ़ती हूँ कि शायद आज कोई सरोकार से जुड़ी ख़बर पढ़ने को मिले; मगर ऐसा होता नहीं लेकिन यह तय है कि मेरी अख़बार पढ़ने की न आदत छूटेगी, न ताज़ा ख़बरों में कोई माक़ूल ख़बर होगी

- जेन्नी शबनम (26.8.2010)
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Friday, August 6, 2010

10. टूटता भरोसा बिखरता इंसान

मैंने कहीं पढ़ा ''जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम ख़ुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं हम प्यार कम करते हैं और डरते ज़्यादा हैं''  
 
सच है, इंसानी रिश्तों का मनोविज्ञान बिल्कुल बदल चुका है आज हर रिश्ते असंवेदी हो चुके हैं, हम किसी पर यक़ीन नहीं करते ''मुँह में राम बग़ल में छुरी'' वाली कहावत चरितार्थ होती दिखती है कब कौन किसका भरोसा तोड़ दे, कब कौन किसे सरे-आम लूट ले, दोस्त बनकर कौन दग़ा दे जाए, रिश्ते की ओट में कब कौन रिश्ता नापाक कर जाए आज हम किसी पर भरोसा नहीं करते, न हमपर कोई भरोसा करता है ख़ून का रिश्ता हो या धर्म का नाता, सब छिन्न-भिन्न हो चुका है सच है, अजब हो गया सब नाता है, नहीं यहाँ अब कोई अपना, बन गया सब पराया है  
 
ऐसा नहीं है कि भरोसा टूटने की कोई एक वज़ह है या फिर अन्य ग़लत बातों की तरह तपाक से कह दिया जाए कि पश्चिमी संस्कृति का कुपरिणाम है आज हर ग़लत परिणति को विदेशी संस्कृति के प्रभाव का परिणाम कह देने का चलन फ़ैशन बन चुका है एक तरफ़ तो शिक्षा, विकास और प्रगति के लिए वैश्वीकरण की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ़ हम अपने-आप में सिमटते जा रहे हैं जब कोई बात हाथ से बाहर हो जाए, तो दोष किसी और पर मढ़ देना ये हमारी पुरानी परम्परा है; चाहे आम घरेलू जीवन की बात हो या शासन-सत्ता की बात  
 
व्यक्ति, समाज और देश एक दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित हैं अगर समाज ऐसा बन चुका है जहाँ हम भरोसा करना छोड़ चुके हैं, तो दोषी कौन है? कोई ख़ास समाज, सरकार या समूह दोषी नहीं है; बल्कि समस्त मानवता ज़िम्मेदार है महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ चुकी हैं कि लोग रिश्तों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर ऊपर चढ़ते हैं, और जब कहीं पहुँच जाएँ फिर उन्हीं रिश्तों को रौंद डालते हैं रिश्तों को ताक पर रखकर कोई भी कुकर्म कर जाते हैं किसी पर कोई कैसे यक़ीन करे?  
 
रिश्तों की अहमियत खो चुकी है, चाहे बच्चों से हो या माता-पिता से, सगे-सम्बन्धी से हो या दोस्त से, या पड़ोसी से पति-पत्नी में तो आत्मिक रिश्ता कभी दिखता ही नहीं, मन में कड़वाहट भरी होती है; लेकिन ऊपरी प्रेम में कमी नहीं दिखती वह पुरुष जो दहेज लेकर सामान की तरह देख-परखकर विवाह करेगा, उसे कैसे कोई स्त्री प्रेम कर सकती है? दहेज के लिए या सिर्फ़ बेटी जन्म देने के कारण विवाह के कई साल बाद भी स्त्री को मार दिया जाता है जन्मजात कन्या से लेकर मृत्यु के द्वार पर खड़ी स्त्री असुरक्षित होती है नहीं मालूम कब वह शारीरिक शोषण का शिकार हो जाए ये भरोसा स्त्री का उसके अपने ही घर में अपने ही नज़दीकी रिश्तों द्वारा तोड़ा जाता है ऐसा नहीं कि शारीरिक शोषण की शिकार सिर्फ़ स्त्री होती है, बल्कि छोटे लड़के भी कई बार इसके शिकार हो जाते हैं। परन्तु ऐसे मामलों में बात आगे नहीं बढ़ती; क्योंकि लड़के (पुरुष) बच्चे पैदा नहीं कर सकते इस प्राकृतिक शारीरिक संरचना के कारण स्त्री आजीवन इस भय में जीती रहती है, लेकिन पुरुष नहीं  
 
प्रेमी-प्रेमिकाओं के तार भी मन से और आत्मा की गहराइयों से जुड़े नहीं होते, वैसे में प्रेम महज़ प्रदर्शन का ज़रिया बन जाता है अगर ऐसा नहीं होता, तो कैसे कोई प्रेमी या प्रेमिका जिसने इतने भरोसे से रिश्ता जोड़ा हो, उससे बदला ले लेता है अक्सर सुनने में आता है कि विवाह के लिए राज़ी न होने पर लड़की को उसके प्रेमी ने एसिड से जला दिया या धोखे से हत्या कर दी, या प्रेम जाल में फँसाकर लम्बे समय तक उसका शारीरिक शोषण करता रहा और बाद में उसे या तो बेच दिया या उसका नाजायज़ इस्तेमाल करता रहा प्रेम में पड़ जाने वाली उस लड़की ने भी तो भरोसा ही किया होगा अगर कोई प्रेमी विवाह कर भी ले, तो मानो बड़ा एहसान कर रहा हो। प्रेम विवाह, फिर भी दहेज चाहिए कैसे कोई स्त्री ऐसे पुरुष को प्रेम करे या उस पर भरोसा करे?  
 
जीवन में एक बार भी भरोसा टूटता है, तो आजीवन किसी पर भी भरोसा नहीं हो पाता है शक और सन्देह के कारण हम ख़ुद में सिकुड़ते चले जाते हैं; क्योंकि ख़ुद के बाहर की दुनिया में सभी अविश्वश्नीय दिखने लगते हैं मन में यह डर बैठ जाता है कि कहीं एक और धोखा न मिल जाए या कोई और भरोसा न तोड़ जाएये डर न तो सहज जीवन जीने देता है और न खुलकर जीने देता है प्रेम, दोस्ती, रिश्ते सबको सन्देह की नज़र से देखने लगते हैं और इतने सिमट जाते हैं कि ख़ुद पर यक़ीन नहीं रह जाता कि वह क्या करे कि धोखा न मिले, और शायद भरोसा ख़ुद पर से भी उठ जाता है आत्मविश्वास के साथ ही इंसानी रिश्तों से भरोसा ख़त्म हो जाता है  
 
- जेन्नी शबनम (5.8.2010)
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Tuesday, July 20, 2010

9. वे जो मेरे पिता थे

पापा
पापा और आचार्य विनोबा भावे

पापा के लिए मन बहुत उदास है उनको गुज़रे हुए आज 32 साल हो गए हैं। फिर भी यादों में, बातों में, जीवन के हर क्षण में उनकी कमी और ज़रूरत महसूस होती है जानती हूँ, मेरी उम्र और वक़्त का वह सभी पल बीत चुका है, जब उनकी निहायत ज़रूरत थी; क्योंकि अब हम सभी को उनके बिना जीने की आदत पड़ चुकी है और ज़िन्दगी का बहुत लम्बा सफ़र हम उनके बिना तय कर चुके हैं यों तो शाश्वत नियम है जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना, लेकिन असमय मृत्यु असह्य होती है।  
 
मेरे पिता प्रोफ़ेसर डा. कृष्ण मोहन प्रसाद का लम्बी बीमारी के बाद असामयिक निधन हुआ था आज के दिन 17.7.1978 की काली रात कहें या 18.7.1978 की भोर, 1 बजकर 45 मिनट पर पापा हम सभी से बहुत दूर चले गए भागलपुर विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में शिक्षक मेरे पिता गांधी के सिद्धांतों और विचारों से काफ़ी गहराई से जुड़े रहे इस विषय पर उनके व्याख्यान इतने सहज ग्राह्य होते थे कि उनके छात्र लगातार घंटों उनको सुनना चाहते थे गांधीवाद और मार्क्सवाद पर व्याख्यान देने के लिए उन्हें कई संस्थाओं द्वारा बुलाया जाता था  
 
मुझे याद है मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह तक अस्पताल में वे अचेत रहे पहले जॉन्डिस (पीलिया) बाद में उन्हें लीवर सिरोसिस हो गया एक साल तक वे बीमार रहे; लेकिन जिस दिन अचेत हुए उस दिन तक वे साइकिल से विश्वविद्यालय जाते रहे, जबकि डाक्टर ने उन्हें पूर्ण आराम (बेड रेस्ट) करने को कहा था विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. हरिद्वार राय ने कहा कि कुछ दिनों की छुट्टी ले लें; परन्तु उन्हें ख़ुद से ज़्यादा अपने छात्रों की चिन्ता थी उन्हें शायद यह मालूम हो गया था कि उनकी ज़िन्दगी अब ख़त्म होने वाली है, अतः उनके अधीन जो छात्र शोध-कार्य कर रहे थे उनको सारी रात बिठाकर वे पढ़ाते और उनके कार्य में संशोधन करते थे  
 
अपने छात्रों के बीच वे बहुत लोकप्रिय थे, क्योंकि वे जो पढ़ाते या कहते थे, वैसे ही जीते थे विचार और व्यवहार में समानता के कारण एक आदर्श शिक्षक और व्यक्ति के रूप में उन्हें प्रतिष्ठा मिलती थी मुझे याद है जब वे अचेत होकर अस्पताल में भर्ती हुए, उनके छात्रों ने दो-दो घन्टे के अन्तराल पर अपना-अपना समय तय कर वहाँ रहना निश्चित किया था; क्योंकि अचेतावस्था में जिस हाथ में पानी (स्लाइन) चढ़ रहा था वे खींच लेते थे, तो उस हाथ को पकड़े रहना होता था दिन और रात उनके कोई-न-कोई छात्र वहाँ होते थे शुरू के दो दिन मेरी मम्मी, रिश्ते के एक चाचा और वे छात्र वहाँ थे दो दिन के बाद दादी और भाई भी आ गए; भाई दादी के साथ गाँव रहता था बाद में मेरे मामा और ननिहाल के कुछ रिश्तेदार भी आ गए हम दोनों भाई-बहन छोटे थे, हमें समझ नहीं आया कि पापा ठीक नहीं होंगे या नहीं लौटेंगे  
 
जिस रात पापा की मृत्यु हुई, उस रात उनके सभी छात्र मेरी मम्मी के साथ वहाँ मौजूद थे सुबह जब अपनी मौसी और भाई के साथ मैं अस्पताल गई, तो गेट पर किसी ने मौसी को बता दिया कि पापा नहीं रहे, पर हम भाई-बहन को किसी ने नहीं बताया पापा के मित्र प्रोफ़ेसर डॉ. जवाहर पाण्डेय, जो कभी पापा के छात्र और मम्मी के सहपाठी थे, मुझे और भैया को अपने घर ले गए, नाश्ता कराया और ख़ुद अस्पताल चले गए बाद में हमें अस्पताल लाया गया रात में जैसे ही पापा की मृत्यु हुई सभी छात्र एकत्रित हो गए और दाह-संस्कार का सारा इंतिज़ाम कर लिया बड़े से ट्रक में पापा को रखा जा चुका था और उनके सभी छात्र ट्रक में खड़े थे मुझे तब भी समझ नहीं आया कि पापा की मृत्यु हो चुकी है और उन्हें उस ट्रक में जलाने ले जाया जाएगा, जबकि मैंने उस ट्रक को देखा और तैयारी करते छात्रों को भी; परन्तु किसी ने मुझे पापा को नहीं दिखाया अस्पताल से मौसी अपनी गाड़ी से मुझे, मम्मी और दादी को लेकर घर आ गईं भैया को लेकर वे लोग गंगा के बरारी घाट पर गए, जहाँ दाह-संस्कार व क्रिया-कर्म किया गया पापा के विचारों के ख़िलाफ़ उनको अग्नि से जलाया गया, जबकि विद्युत से जलाए जाने को वे सदैव उचित कहते थे; मृत्यु के बाद उनकी बात कौन सुनता या मानता  
 
पापा अपने छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ गए थे पापा का जन्म ग्रामीण परिवेष में हुआ, जहाँ धार्मिक मान्यताओं और प्रथा-परम्परा को बहुत महत्व दिया जाता है बचपन से वे रूढ़िवादी परम्पराओं के विरोधी थे तथा शिक्षा को बहुत महत्व देते थे अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे संयुक्त परिवार से थे पापा का अपने पिता से बहुत ज़्यादा वैचारिक मतभेद रहा; क्योंकि उनकी सोच, उनकी कार्य-शैली व जीवन-शैली सभी से अलग थी तीक्ष्ण बुद्धि और अपने प्रखर सोच के कारण वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सके उन्होंने इतिहास और राजनीति शास्त्र में एम.ए., बी.एल., गांधी-विचार में पी-एच.डी. किया उनके पी-एच.डी. की मौखिक परीक्षा (viva) में एक बाह्य परीक्षक (external) आचार्य कृपलानी भी थे जब कृपलानी जी ने गांधी जी के प्रति उनके विचारों को सुना तो अवाक् रह गए और उन्होंने बहुत प्रशंसा की; हालाँकि उनके थीसिस के कुछ विचारों से उन्हें आपत्ति थी और दोबारा लिखने को कहा था  
 
पापा का राजनीतिक जीवन कम उम्र से शुरू हो गया था वर्ष 1942 के आन्दोलन में वे सक्रिय रहे। अपने एक बड़े भाई के साथ रेल की पटरी उखाड़ने में कामयाब रहे और पकड़े नहीं गए उनकी विचारधारा उसी समय से सोशलिस्ट पार्टी की तरफ़ बढ़ गई थी बाद में उनका रुझान वामपंथ की ओर हो गया और वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता हो गए एक आम भारतीय परम्परावादी परिवार में जन्म लेने के बाद भी वे नास्तिक थे; उनकी ये नास्तिकता उनके अपने सोच से थी, न कि किसी को देखकर विचार बने या बदले थे वे हर उस अंधविश्वास और ग़लत रूढ़ियों के ख़िलाफ़ थे, जिससे प्रगति में बाधा हो जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा और किसी भी धार्मिक क्रिया-कलाप के विरोधी थे यहाँ तक की वे अपनी शादी में खादी का धोती-कुर्ता पहने और एक रुपया भी लेने से इनकार कर दिए वे इसी शर्त पर शादी करने को राज़ी हुए थे कि मम्मी अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी  
 
साम्यवादी, गांधीवादी, नास्तिक और शिक्षक होने के साथ वे प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास रखते थे और शुद्ध शाकाहारी थे अपने सभी सिद्धांत जो वे कहते थे या अपने भाषण में बोलते थे, पहले ख़ुद पर प्रयोग कर चुके होते थे मुझे याद है कि पापा के विचारों से प्रभावित होकर कई लोगों ने सिर्फ़ एक बच्चे में परिवार नियोजन करा लिया था गाँव में अपनी ज़मीन पर उन्होंने एक प्राथमिक विद्यालय खोला, जो बाद में सरकारी हो गया उस विद्यालय में पापा का नाम कहीं नहीं है; क्योंकि गाँव के महाजन ने पापा के द्वारा दान की गई विद्यालय की ज़मीन की अदला-बदली कर अपने नाम करा ली और विद्यालय को वहाँ से उठाकर अपने परिसर में ले गए, जहाँ मैं भी कुछ दिन पढ़ी हूँ पापा की मृत्यु के बाद वह विद्यालय पुनः उसी ज़मीन पर बना जिसे मेरे पापा ने दान किया था, लेकिन अब वह ज़मीन महाजन की चालाकी से महाजन के नाम है विद्यालय में जाने का रास्ता अब भी हमारे ज़मीन से होकर ही है पापा ने एक पुस्तकालय भी खोला, जो बाद में बंद हो गया  
 
मैं तब बहुत छोटी थी जब गाँव में बिजली नहीं आई थी मैं पापा के साथ सीतामढ़ी गई, जो उस समय मेरे गाँव का ज़िला हुआ करता था, वहाँ से बिजली विभाग में आवेदन देकर बहुत दौड़-धूप करके बिजली का पोल लेकर हम गाँव आए और फिर पूरे गाँव में बिजली आई  
 
अपने गाँव और आस-पास के इलाक़ों में वे 'कन्हैया जी' के नाम से मशहूर थे ख़ुद खादी पहनते और मम्मी को भी खादी पहनने को कहते थे ज़रूरत से ज़्यादा कोई सामान हमारे घर में नहीं था फोटो खींचने के वे बहुत शौक़ीन थे और ख़ुद फोटो साफ़ भी करते किसी से भी निर्धारित समय पर वे मिलते थे, जो छुट्टी का दिन छोड़कर हर दिन शाम को चार से छह का होता था; भले ही कोई रिश्तेदार हो या बहुत बड़े ओहदे वाला व्यक्ति। सिर्फ़ उनके अपने छात्रों के लिए वक़्त की कोई पाबन्दी न थी  
 
सम्भवतः उन्हें अपनी बीमारी के ठीक न होने का अनुमान था मृत्यु से पूर्व वे दिल्ली के एम्स में एक माह भर्ती रहे, तब डाक्टर ने बहुत आश्चर्य किया कि शाकाहारी व्यक्ति जो चाय भी न पीता हो उसे लीवर सिरोसिस कैसे हुआ; बीमारी उस समय अन्तिम स्थिति में थी हम सभी से अपनी बीमारी या बीमारी की गम्भीरता के बारे में वे कोई चर्चा नहीं करते थे अपनी मृत्यु से पूर्व एक माह के भीतर उन्होंने अपना सारा काम पूरा कर लिया; चाहे अध्यापन-विषय (सिलेबस) को पूर्ण करना हो या शोधार्थी छात्रों की थीसिस की अन्तिम जाँच हो परन्तु घर और परिवार का सारा कार्य वे अधूरा छोड़ गए उस समय मैं 8वीं की छात्रा थी और भैया 10वीं का एक महत्वपूर्ण काम उन्होंने हमारे लिए किया था, जो उनके बाद हमारे जीने में मददगार हुआ, वह था मेरी मम्मी का स्कूल में शिक्षिका होना तथा सामजिक कार्यों में आगे बढ़ाना जब पापा की शादी हुई मम्मी बी.ए. में पढ़ती थीं शादी के बाद मम्मी ने एम.ए., बी.एल., बी.एड. किया पापा की मृत्यु के काफ़ी सालों बाद मम्मी ने एम.एड. किया  
 
'गांधी शान्ति प्रतिष्ठान केन्द्र' की भागलपुर शाखा को पापा ने वर्ष 1967 में शुरू किया, जिसकी फाउंडर सेक्रेटरी (चीफ़ वर्कर) मेरी माँ श्रीमती प्रतिभा सिन्हा थीं बाद में मम्मी स्कूल में शिक्षिका बनी, साथ-साथ समाज सेवा में सक्रिय रहीं मम्मी 1974 में शिक्षिका बनी, 1988 में इन्टर स्कूल की प्राचार्य बनी और एक साल पूर्व अवकाश प्राप्त हुई हैं  
 
अपनी मृत्यु से कुछ पहले पापा ने अपने थीसिस को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए किसी प्रकाशक को दिया था। पुस्तक प्रकाशन से सम्बन्धित सारी बातें हो गईं, प्रूफ-रीडिंग कर चुके थे; परन्तु किताब छप न सकी, उनकी मृत्यु हो गई मेरे पापा के मित्र प्रोफ़ेसर डा. रामजी सिंह, जो सांसद भी रह चुके हैं, ने पापा की पुस्तक किसी दूसरे प्रकाशक से प्रकाशित करवाई उन्होंने किताब का शीर्षक बदलकर 'सर्वोदया ऑफ गांधी' कर दिया यों किताब तो छप गई, पर न आज तक रॉयल्टी मिली न किताब के और छपने की जानकारी  
 
पापा ने हम दोनों भाई-बहन को पढ़ने के लिए गाँव भेज दिया था दो साल बाद मैं वापस भागलपुर आ गई, भैया वहीं रह गया पापा का मानना था कि गाँव में रहकर भी अच्छी शिक्षा ली जा सकती है पापा की मृत्यु के बाद भाई को मम्मी वापस भगलपुर ले आईं मेरा भाई पढ़ाई में काफी तेज़ था, तो गाँव से उसके शिक्षक आकर उसे वापस ले गए कि वह गाँव में पढ़ेगा; यह वही स्कूल है जिसमें मेरे पिता भी पढ़े थे मेरे पापा की सोच सही साबित हुई मेरा भाई गाँव से मैट्रिक करने के बाद पटना साइंस कॉलेज से आई.एस.सी. फिर आई.आई.टी. कानपुर से एम.एस.सी. और छात्रवृति पाकर आगे की पढ़ाई करने ओहिओ स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका चला गया  
पुरुष के बिना जीना समाज में कितना मुश्किल होता है, उस समय यह अनुमान न था जब पापा की मृत्यु हुई मेरी मम्मी मात्र 33 वर्ष की थीं सामजिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक परेशानी को झेलते हुए मम्मी को मैं देखती रही उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आता था, शायद यह उस ज़माने का फ़र्क़ था जबकि आज के बच्चे 10-12 साल में ही बहुत समझदार हो जाते हैं  
 
यों मेरी दादी, मम्मी के सहकर्मी और मेरे ननिहाल के सभी लोग बहुत सहयोगी रहे हैं पापा के सभी मित्र, चाहे राजनीतिक जीवन से जुड़े हों या सामाजिक, सभी ने सदैव हमारा साथ दिया हर वह वक़्त जब मम्मी का सामाजिक बहिष्कार होता, किसी शुभ व धार्मिक आयोजन से मम्मी को दूर कर दिया जाता, या कोई बेचारी समझ हम पर तरस खाता, तो पापा की हर बार बहुत याद आती थी अब भी जब किसी बात से मन दुःखी होता है, पापा ही याद आते हैं हर बार पापा से सवाल करती हूँ ''क्यों गए तुम? जाना ही था, तो कम-से-कम थोड़ा रुककर हमारे होश आने तक ठहर जाते बहुत सी बातें हैं पापा, जो सिर्फ़ तुमसे ही कह सकती या सिर्फ़ तुम ही कर सकते, फिर... पापा, बताओ किससे कहें?'' 
 
32 साल बीत गए पर कभी-कभी लगता है जैसे अभी-अभी की तो बात है, तुम यूनिवर्सिटी से साइकिल से लौटोगे और साथ में अमरूद, गाजर और पेड़ा लाओगे और पुकारोगे- जेन्नी...!

-जेन्नी शबनम (18.7.2010)
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Saturday, May 8, 2010

8. ईश्वर के होने और न होने के बीच

चित्र- गूगल से साभार
''नास्तिकता सहज है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। आस्तिकता हम सिखाते हैं, जन्मजात कोई भी आस्तिक नहीं होता।'' आज सुबह मैंने अपना मेल-बॉक्स खोला, तो एक मित्र द्वारा 'नास्तिकों का एक ब्लॉग' पर एक लेख में यह पढ़ने को मिला पसन्द का विषय देख सारा काम छोड़ मैं पूरा लेख पढ़ गई, फिर लोगों की प्रतिक्रिया, उत्तर-प्रत्युत्तर भी पढ़ गई मुझे लगा इस बात पर विचार ज़रूर करना चाहिए कि कहीं हमारी आस्तिकता हमें ज़िन्दगी को पुरज़ोर तरीक़े से जीने में बाधा तो नहीं बन रही है

मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जिससे मेरी अपनी सोच विकसित हो सकी और मुझ पर कभी कोई विचार प्रभावी न हो सका मेरे विचार या सोच सही हैं या ग़लत, यह मैं नहीं जानती; लेकिन मेरे लिए यह उपयुक्त है और यह मेरी अपनी समझ से विकसित हुई है ऐसा नहीं कि मैं अपनी सोच के प्रति कट्टर हूँ; लेकिन किसी को आहत किए बिना अपनी सोच पर क़ायम रहती हूँ धर्म से जुड़े विषय पर सभी को पढ़ती और समझने का प्रयत्न करती हूँ, जहाँ जो विचार मेरे तर्क की कसौटी पर खरे लगे ख़ुद के जीवन में अपना लेती हूँहालाँकि इसे लेकर अक्सर मेरी आलोचना होती है तथा मुझे अपरिपक्व, अधार्मिक और ग़ैर-सामाजिक होने का ख़िताब भी मिलता है आलोचना हो या प्रशंसा मैं इस पर ज़्यादा नहीं सोचती; लेकिन यह उम्मीद ज़रूर रहती है कि कोई तर्क से मुझे समझाए कि मैं क्यों ग़लत हूँ सदैव लोगों के पास तर्क नहीं होते, महज़ परम्पराओं, प्रथाओं और तथाकथित आदर्श में गूँथे नियम-क़ानून होते हैं, जो कभी मुझे स्वीकार्य नहीं हुए  
 
मेरे बचपन की कुछ बातें हैं जो आज यह सब लिखते-लिखते याद आ गईं, जो शायद इस सन्दर्भ में लिखना उचित भी हो; क्योंकि मेरी सोच को परिष्कृत करने में ये सहायक रहे हैं मेरे बचपन की बातें जो बहुत हल्की-सी याद है और कुछ बातें बाद में मेरी माँ से मुझे पता चलींविजयवाड़ा के एक बहुत बड़े नास्तिक थे 'प्रोफ़ेसर गोरा' (गोपाराजू रामचन्द्र राव) जिनका पूरा नाम तब नहीं जानती थी, जिनकी एक पत्रिका निकलती थी 'atheist', मेरे पिता के वे बहुत घनिष्ट मित्र थे; यों वे उम्र में काफ़ी बड़े थे, पर सोच की समानता उनके घनिष्टता की वजह थी मैं एक वर्ष की थी, तब अपने माता-पिता के साथ विजयवाड़ा उनके घर 15 दिन रही थी मैं लगभग 2-3 साल की, तब वे भागलपुर (बिहार) मेरे घर आए थे मेरे पिता की मृत्यु 1978 में हो गई, फिर सभी से धीरे-धीरे सम्पर्क टूटता चला गया और एल्बम में सँजोए प्रोफ़ेसर गोरा और उनके परिवार की तस्वीरों से ही मैंने यह सब जाना और समझा  
 
मैं, मेरी मम्मी, मेरा भाई, प्रो. गोरा (भागलपुर)
मुझे याद है बचपन में विजयवाड़ा नाम मुझे अटपटा-सा लगता था मेरे भाई और मैंने जाने कहाँ से कहना सीख लिया था ''अट्टा-पट्टा विजय-वाड़ा'' और अक्सर हम यह कहते रहते और हाथ पटक-पटककर खेलते थे पापा अक्सर यह कहकर हमें चिढ़ाया करते थे  
 
अट्टा-पट्टा विजय-वाड़ा के साथ गोरा जी कब हमारे खेल से मेरे ज़ेहन में उतर गए, मुझे भी पता नहीं चला। मेरे पिता के विचार और जीवन जीने का तरीक़ा आम लोगों से अलग था जब कुछ समझने लायक हुई, तो न पिता रहे न गोरा जी और न उनसे सम्बन्धित कोई सम्पर्क ही रह गया लेकिन नास्तिकता-आस्तिकता की बात ज़रूर सोचने और समझने लगी  
 
मेरे पिता नास्तिक थे, तो घर में कोई भी धार्मिक क्रिया-कलाप नहीं होता था शायद मेरे ज़ेहन में भी नास्तिकता उन्हें देखकर बैठ गई हो पिता काफ़ी पहले चल बसे, तो मन में होता था कि कहीं वे नास्तिक थे इसलिए तो नहीं ऐसा हुआ जिन लोगों को हर वक़्त ईश्वर में लिप्त देखी, वे भी असामयिक मौत मरे, बहुत पीड़ा से गुज़रे, विपदाओं में घिरे जब मेरी अपनी समझ बढ़ी, तब भी ईश्वर के प्रति न मेरी आस्था जागी, न कोई रुझान  
 
अपने बचपन से अपनी दादी द्वारा धार्मिक ग्रंथों की कहानियाँ सुनती रही हूँ मेरी दादी नास्तिक नहीं थीं वे धार्मिक पुस्तकें बहुत पढ़ती थीं, ईश्वर में आस्था थी उनकी; लेकिन धार्मिक क्रिया-कलाप में उन्होंने कभी हिस्सा नहीं लिया दादी की मृत्यु 102 वर्ष की अवस्था में 2 साल पहले हुई है।  
 
मैं नहीं जानती कि कोई ईश्वर कहीं है या था; अगर कभी हुआ भी हो, तो अब तक तो ज़िन्दा न होगा सम्भव है कि कुछ पुराने वृक्ष की तरह सैकड़ों साल जिया हो, या मुमकिन है कि ऐसा कुछ न हुआ हो प्रकृति की हर बात में या जीवन के हर कार्य में जब हम तर्क ढूँढते हैं, तो ईश्वर के सम्बन्ध में तर्क ढूँढना भी जायज़ है  
 
अगर ईश्वर ने सब बनाया फिर उसे किसने बनाया? अगर ईश्वर ने ख़ुद को बना लिया फिर इस दुनिया की रचना की, तो इस दुनिया की रचना का औचित्य क्या? अगर कोई औचित्य हो जो ईश्वर ही जानता हो, तो दुनिया विनाश की तरफ़ क्यों बढ़ रही है? अगर सब ईश्वर की इच्छा से होता है तो दुनिया में इतना वर्ग-भेद, वर्ग-संघर्ष, क्लेश, अशांति क्यों? बहुत सारे प्रश्न हैं बहुत प्रश्न ऐसे भी हैं जो किसी के मन में न आए हों, पर कभी-न-कभी आएँगे ज़रूर  
 
मैं नास्तिक हूँ, लेकिन परिवार के साथ धार्मिक स्थल जाती हूँ वहाँ आस्था के माहौल में उपजी शान्ति देखती हूँ, लोगों का अंधविश्वास देखती हूँ, धर्म के नाम पर लोगों का पागलपन देखती हूँ, आस्था के नाम पर डर देखती हूँ लोग अपने सुख-समृधि के लिए अपनी हैसियत से ज़्यादा चढ़ावा चढ़ाते यानी कि ईश्वर को घूस देते हैं मन्नत माँगने कहाँ-कहाँ की ख़ाक नहीं छानते हैं। कभी भूखे रहकर, तो कभी व्रत-अनुष्ठान करके अपना कोई फ़ायदा (सुख) माँगते हैं कोई मुराद पूरी हो, तो उसके लिए चादर चढ़ाते हैं, फिर कोई नई कामना या मनौती तैयार हो जाती है ईश्वर से माँगने के लिए  
 
आख़िर ये ग़रीब और कट्टर धार्मिक लोग क्यों नहीं अपनी दशा सुधार पाते है, जबकि वे सारा समय ईश्वर का नाम और माला जपते रहते हैं हालाँकि इसका भी जवाब उनके पास है कि यह पिछले जन्म का फल है, जो इस जन्म में भुगत रहे हैं हर मनुष्य किसी-न-किसी धर्म (सम्प्रदाय) में विश्वास रखता है, फिर क्या वजह है कि 21वीं सदी तक भी पाप चल रहा है क्यों नहीं ग़रीबी दूर होती, क्यों समाज में आज भी जाति और वर्ग भेद है?  
 
आज सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद के अलग-अलग संगठन से तबाह है, जो किसी ख़ास धर्म या सम्प्रदाय के नुमाइन्दे हैं देश के भीतर सांप्रदायिक दंगा या फिर कोई क्रूरतम अपराध आख़िर क्यों है? क्यों नहीं इन आस्तिकों को ख़ौफ़ होता है?  
 
धर्म में पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का डर एक ऐसा मूल-मंत्र है, जो हर लोगों को डरा देता है साथ ही इससे पार पाने के उपाय भी किए गए हैं, ताकि लोग पाप करें और पुण्य के लिए हमारे पण्डित, पादरी, मुल्ला बैठे हैं, जो उनके पाप को पुण्य में बदलने के लिए ईश्वर तक पहुँच रखते हैं; जैसे दलाली या बिचौलिया का धंधा होता है सभी धार्मिक स्थल के बाहर भिखारियों की बड़ी जमात होती है, जो भीख माँगते हैं और ईश्वर-ईश्वर का जाप करते हैं लेकिन न जाने क्यों ईश्वर की कृपा-दृष्टि उनकी तरफ़ होती ही नहीं, न तो खाना-कपड़ा ही मुहैया होता है, घर और नौकरी तो दूर की बात है शायद इसलिए भी कि अगर ग़रीब न हो, तो फिर पुण्य पाने के लिए दान किसे किया जाएगा ईश्वर के नाम पर बिना मेहनत गुज़ारा हो जाता है, तो यह धंधा भी अच्छा है  
 
नास्तिकों के पास पाप करके पुण्य में बदलने का उपाय या विकल्प नहीं होता है; इसलिए वे इस एक जीवन को अपनी सोच और समझ से जीते हैं न पाप करते हैं, न पुण्य के लिए दर-दर की ख़ाक छानते हैं इंसानियत ही एक जाति और धर्म होता है, यही इनकी पहचान होती है अपवाद एक अलग बात है  
 
मैं न आस्तिकता को उचित मानती हूँ, न नास्तिकता को; क्योंकि 'कुछ है' तभी तो हम उसके पक्ष या विपक्ष में हैं या ख़ुद को नास्तिक या आस्तिक मान रहे हैं मेरा स्वभाव है कि मैं किसी भी लकीर पर नहीं चल सकती।बिना अपने अनुभव किसी के कहे को सत्य नहीं मानती हूँ। जो उचित लगता है वही करती हूँ; समाज की नज़र में पाप हो या पुण्य
 
नास्तिकता को एक नई परिभाषा की ज़रूरत है, जिसमें आस्तिकता के विपरीत न बहस हो न सोच बल्कि एक ऐसी वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण अकाट्य सोच हो, जिसमें किसी से तुलना या सार्थकता पर बहस न होकर सिर्फ़ इंसानियत की बात हो, प्रकृति की बात हो, उत्थान की बात हो, जीवन की बात हो, प्रेम की बात हो, और यही नास्तिकता की नई परिभाषा हो


-जेन्नी शबनम (8.5.2010)
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