Friday, May 1, 2026

दान

रमन साहब लंच के समय घर आ जाते हैं फिर दोबारा ऑफिस नहीं जाते, हालाँकि ऑफ़िस शाम सात बजे बंद होता है। सभी स्टाफ को सख़्त आदेश है कि ऑफ़िस के समय कोई पर्सनल बात नहीं करनी है।  

शाम के छह बज रहे थे। रमन साहब कहीं जाने के लिए तैयार होकर बरामदे में बैठे थे। तभी गोपाल आया, जो ऑफिस में साफ़ सफ़ाई का कार्य करता है।  
''गुड इवनिंग सर जी!'' सकुचाते हुए गोपाल ने अभिवादन किया।  
घड़ी की तरफ़ देखते हुए साहब ने पूछा- ''क्या बात है, ऑफ़िस टाइम में क्यों आए हो?''
''बहुत अर्जेंट था, आपसे बात करनी है सर जी।'' गोपाल सिर झुकाए हुए बोला। 
''बोलो'' रूखे स्वर में साहब ने कहा। 
''सर जी, बात यह है कि मेरी बेटी की शादी ठीक हो गई है, कुछ एडवांस मिल जाता तो...
बात बीच में काटते हुए थोड़े क्रोधित स्वर में साहब बोले- ''तुम्हें मालूम है न कि किसी को एडवांस नहीं दिया जाता है।''    
दोनों हाथ जोड़कर गोपाल बोला- ''हाँ सर जी, जानते हैं। पर कहीं से कोई जुगाड़ नहीं हो पाया। अब आपका ही आसरा है सर जी। अच्छा लड़का मिल गया तो शादी ठीक कर दिए। आप तो जानते ही हैं कि बेटी का शादी कितना मुश्किल होता है।''
साहब का क्रोध बहुत बढ़ गया- ''काम तो ढ़ंग से सब करता नहीं और एडवांस माँगने आ जाता है कामचोर सब।''
 कुछ सोचते हुए कड़क लहजे में साहब ने पूछा- ''कितने पैसे चाहिए?''
''सर, एक लाख!'' सिर झुकाए हुए गोपाल धीमी आवाज़ में बोला।   
''एक लाख! साले मेरे घर में पैसा का पेड़ उगा है। तू चुका पाएगा एक लाख।'' ''अपनी औक़ात नहीं देखता है और मुँह उठाए चला आया पैसा माँगने।'' साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। 
''सर जी, एडवांस माँग रहे हैं। हर महीने जितना ज़्यादा होगा हम कटवा देंगे सैलरी से। एक-एक पाई चुका देंगे सर जी।''   
साहब ने मन में कुछ सोचा फिर अपनी पत्नी को आवाज़ लगाया- ''पूनम! 50 हज़ार रूपया लेकर आओ, मारो साले के मुँह पर।''
रजनी ने 50 हज़ार लाकर गोपाल के हाथ में थमा दिया। 
गोपाल अवाक! लगा जैसे चक्कर खाकर वही गिर पड़ेगा। फिर हाथ जोड़कर बोला- ''सर जी, 50 हज़ार में नहीं हो पाएगा, एक लाख रुपया कम पड़ रहा है। आप ही कोई गुंजाइश कर सकते हैं सर जी। एक लाख एडवांस दे दीजिए सर जी। हर महीने जितना चाहे आप काट लीजिएगा।''
''तेरे बाप की कमाई है जो तुझे एक लाख दे दें।'' चिल्लाते हुए साहब ने कहा। 
''सर जी, नहीं सर जी, आप मालिक हैं, आप ही से तो आस लगाएँगे न सर जी। हम पर भरोसा कीजिए सर जी। एक-एक पाई चुका देंगे सर जी।'' गोपाल की आँखों से आँसू बहने लगा।  
साहब के लहजे में थोड़ी नरमी और बोली में अहंकार- ''देख गोपाल, बेटी की शादी है इसलिए हम यह पैसा दान में दे रहे हैं। मेरी तरफ से बेटी की शादी में लगा दे। तुझे लौटना नहीं है।''
गोपाल गिड़गिड़ाते हुए बोला- ''सर जी, हमको दान नहीं चाहिए, हमको क़र्ज़ा दे दीजिए। एक लाख कम पड़ रहा है, इतने से नहीं हो पाएगा सर जी।''
''अबे साले, औक़ात नहीं था, तो ऐसा लड़का से काहे बेटी ब्याहने चला है। एक तो 50 हज़ार दान में दे रहे हैं और उस पर से तुझको और चाहिए। चल भाग यहाँ से।'' ग़ुस्से से साहब थरथराने लगे।बहुत हिम्मत जुटा कर गोपाल बोला- ''सर जी, हम बेईमान नहीं हैं, इतने साल से तो आप हमको देख रहे हैं न। ज़िन्दगी भर एहसान नहीं भूलेंगे।''
''चल भाग! भागता है कि नहीं यहाँ से, भाग साला।'' साहब इतनी ज़ोर से चिल्लाए कि गोपाल थर-थर काँपने लगा।   
गोपाल की आँखों में आँसू और हाथ में 50 हज़ार। बरामदे से बाहर आकर मेन गेट पर धम्म से बैठ गया। आँखों में अँधेरा, निरुपाय, असहाय!
''आप भी क्या करते हैं, 50 हज़ार दान देने से क्या फ़ायदा? एक लाख एडवांस दे देते तो उसकी बेटी की शादी भी हो जाती और पैसा भी चुका देता धीरे-धीरे।'' पूनम ने साहब को समझाया। 
''जितना तुम्हारा दिमाग़ है उतना ही लगाया करो। हम जो करते हैं सोचकर समझकर करते हैं। ग़रीब की बेटी की शादी में 50 हज़ार दान दिए हैं, सोचती हो समाज में मेरा कितना नाम होगा।'' साहब ने घमंड से कहा और घड़ी की तरफ देखकर बोले-   
''अरे यार रजनी, जल्दी तैयार हो जाओ। मंत्री जी की बेटी की शादी में जाना है। रास्ते से किसी ज्वेलर्स से उनके बेटी-दामाद के लिए हीरे की अँगूठी लेनी है।''
''और हाँ, गिफ्ट ऐसे देना ताकि सभी लोग देखे सकें। अरे काम पड़ता रहता है न उनसे।''
इस बीच गोपाल धीरे-से उठकर चला गया अपनी औक़ात के लोगों के बीच।

-जेन्नी शबनम (1.5.2026)
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