तीन साल की बच्ची सलवार-कुर्ती पहने और सिर पर दुपट्टा डाले हुए मेरे सामने से दौड़ते हुए गई। कमरे के भीतर से दो-तीन स्त्रियों को वह बाहर लेकर आई और उनमें से किसी एक स्त्री की साड़ी का पल्लू पकड़े रही। काफ़ी जर्ज़र हालत में वह मकान था। दरवाज़ा में घुसते ही सामने मोहम्मद मुन्ना साहब से मुलाक़ात हुई जो इस यतीमख़ाना के संचालक हैं। मैंने उन्हें कहा कि यतीमख़ाना देखना चाहती हूँ तथा जानना चाहती हूँ कि बच्चियाँ कैसे रहती हैं और क्या-क्या करती हैं। बेहद तंग गली में यह मकान है और हर मकान एक दूसरे से सटा हुआ है। आस-पास के मकानों से लोग देखने लगे कि क्या हुआ। कौन लोग हैं और क्यों आए हैं। कौतूहलवश थोड़ी भीड़-सी इकठ्ठी हो गई।
मुन्ना साहब ने बताया कि यहाँ जन्मजात कन्या से लेकर 12 साल तक की बच्ची रहती है, उसके बाद उन्हें बड़ी लड़कियों के यतीमख़ाने में भेज देते हैं। अभी तक़रीबन 25 लड़कियाँ यहाँ रह रही हैं। चार-पाँच को छोड़कर बाक़ी सभी बच्चियाँ दावत खाने कहीं गई हुई थीं। एक बच्ची जो करीब पाँच साल की थी, छत पर बने ओसारे में दो अन्य बच्ची के साथ पढ़ने बैठी थी। उससे नाम पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उससे उसकी किताब माँगी कि दिखाओ क्या पढ़ रही हो, तो चुपचाप उसने अपनी किताब मुझे दे दी।
मुन्ना साहब ने बताया कि यहाँ जन्मजात कन्या से लेकर 12 साल तक की बच्ची रहती है, उसके बाद उन्हें बड़ी लड़कियों के यतीमख़ाने में भेज देते हैं। अभी तक़रीबन 25 लड़कियाँ यहाँ रह रही हैं। चार-पाँच को छोड़कर बाक़ी सभी बच्चियाँ दावत खाने कहीं गई हुई थीं। एक बच्ची जो करीब पाँच साल की थी, छत पर बने ओसारे में दो अन्य बच्ची के साथ पढ़ने बैठी थी। उससे नाम पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उससे उसकी किताब माँगी कि दिखाओ क्या पढ़ रही हो, तो चुपचाप उसने अपनी किताब मुझे दे दी।
मुन्ना साहब ने बताया कि यहाँ दो शिक्षिकाएँ हैं, जो इन्हें पढ़ाती हैं। यहाँ सिर्फ़ उर्दू में पढ़ाई होती है। यहाँ दीनी-तालीम दी जाती है, जिसमें पाक क़ुरान पढ़ाया जाता है। साथ ही बहिश्ते-ज़ेबर की तालीम दी जाती है, जिसे दुनियावी तालीम भी कह सकते हैं। इसमें मुस्लिम परम्परा के अनुसार ज़िन्दगी जीने की कला और तहज़ीब बताई गई है। यह माना जाता है कि हर मुस्लिम बालिका के लिए ये दोनों तालीम निहायत ज़रूरी है।
मैंने मुन्ना साहब से बातों-बातों में पूछा कि इन बच्चियों को स्कूली शिक्षा देने के बारे में आप लोग क्यों नहीं सोचते? उन्होंने जो जवाब दिया वह चौंका देने वाला था। मुन्ना साहब ने कहा ''दीनी तालीम से ज़्यादा और क्या ज़रूरी है लड़की के लिए? यही पढ़ लें काफ़ी है। सामान्य स्कूली शिक्षा इन्हें नहीं दी जाती, फ़ायदा भी क्या है लड़कियों को पढ़ाने से?''
800 वर्ग फीट में बसा हुआ यह यतीमख़ाना बहुत ही ख़स्ताहाल दिखा। मात्र दो कमरे व छत, छत पर ओसारा बना हुआ था। इतने से जगह में सभी लडकियाँ, शिक्षिकाएँ और मोहम्मद मुन्ना रहते हैं। अभावग्रस्त इस यतीमख़ाने में सभी लड़कियाँ फिर भी ख़ुश थीं, क्योंकि उनके घर की भी वही स्थिति - किसी के वालिद नहीं रहे, किसी की अम्मी नहीं रही, किसी के अब्बा-अम्मी दोनों नहीं हैं, किसी के अम्मी या अब्बा की दूसरी शादी वज़ह बनी या फिर माता-पिता की ग़रीबी उन्हें यहाँ तक पहुँचा लाई। यतीम, दुर्रे यतीम के साथ ही वह बालिका भी यतीम हो गई जिनके अम्मी-अब्बू जीवित हैं। जाने कैसी नियति है कि पेट की ख़ातिर या बोझ या और कोई वज़ह, इतनी छोटी-छोटी बच्ची यतीम बन गई।
यह यतीमख़ाना भी ज़कात, फ़ितरा, अतीया और इम्दाद की रक़म से चलता है। शहरवासी वैसे भी कभी-कभी कुछ अपने मन से चंदा दे देते हैं। मुनासिब हर ज़रूरत यहाँ पूरी की जाती है।
जारी...
-जेन्नी शबनम (8.3.2011)
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