Saturday, August 15, 2026

140. इलाहाबाद बनाम प्रयागराज

गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती के संगम पर बसा हुआ ऐतिहासिक और धार्मिक शहर का प्राचीन नाम प्रयाग है। मुग़ल सम्राट अकबर ने वर्ष 1575 में संगम के पास क़िला बनवाया और वर्ष 1583 में इसका नाम इलाहाबास रखा, जिसका अर्थ है 'अल्लाह का शहर'। शाहजहाँ के शासनकाल में इसका नाम इलाहाबाद कर दिया गया। चूँकि यह धार्मिक तीर्थ स्थल है, इसलिए पुराने ज़माने से इस शहर को प्रयाग जी कहा जाता था। वर्ष 2018 में इसका नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया। यहाँ विश्वप्रसिद्ध कुम्भ मेला लगता है।
इलाहाबाद का नाम अब प्रयागराज हो गया परन्तु मुझे इलाहाबाद नाम ही पसन्द है। जिन नामों के साथ बचपन बीता हो, उसका नाम बदलना मुझे अच्छा नहीं लगता है। जैसे बम्बई बदलकर मुम्बई, कलकत्ता बदलकर कोलकाता, मद्रास बदलकर चेन्नई, बैंगलोर बदलकर बेंगलुरु, गुड़गाँव बदलकर गुरुग्राम इत्यादि। मैं आज भी इन सभी जगहों को पुराने नाम से ही बोलती हूँ। बदले हुए नाम से नई पीढ़ी बोलेगी; क्योंकि उन्होंने पुराने नाम के साथ बचपन नहीं बिताया है। बहरहाल मेरे लिए प्रयागराज आज भी इलाहबाद है और इलाहाबाद का मतलब मेरे लिए आनन्द भवन और चंद्रशेखर आज़ाद का शहीद स्थल है। 

23 जुलाई 2026 को 30 वर्ष बाद अपनी बेटी के साथ इलाहाबाद जाने का अवसर मुझे मिला। एयरपोर्ट से सिविल लाइन्स, जहाँ हमारा होटल था, का रास्ता बहुत ख़ूबसूरत है। कुछ स्थान पर ख़ूब हरियाली, तो कुछ रास्ते संकरा और गन्दगी से भरा हुआ। पान-गुटका की गन्दगी हर तरफ़ दिखती है। मुझे तो लगता है गुटका पर पूरे देश में पाबन्दी होनी चाहिए। पान हो, तो सिर्फ मीठा पान, ताकि उसे खाकर लोग निगल जाएँ, रास्ते को साफ़ रहने दें। यहाँ सवारी के लिए टोटो हर जगह उपलब्ध है। यह बहुत सस्ती सवारी है, जो ऑनलाइन भी बहुत आराम से मिल जाती है। 

रुद्राक्ष होटल पहुँचकर हमें तुरन्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय जाना था। न्यायालय की इमारत बहुत भव्य और बड़ी है। परन्तु वहाँ पान और गुटका के कारण अत्यन्त गन्दगी थी। बरसात बहुत तेज़ होने लगी। हर तरफ़ पानी से लबालब कीचड़ और गन्दगी। लोग उसी स्थिति में काम कर रहे थे। वहाँ एक सरकारी सुरक्षाकर्मी से मैं बैठकर बात करने लगी। पता चला कि सरकार द्वारा हर वर्ष सफाई के लिए पैसा आता है; लेकिन काम नहीं होता। उन्होंने बहुत सही कहा कि पान और गुटका हर कोई खाकर थूक रहा है, तो कौन किसे रोके।         
दूसरे दिन सबसे पहले हम आनन्द भवन गए; क्योंकि इसे देखने की हसरत बहुत ज़माने से थी, जो इस यात्रा में पूरी हुई। टिकट लेकर गेट के अन्दर जाते ही आनन्द भवन और स्वराज भवन को देखकर मैं अत्यंत उत्साहित हो गई। बहुत ख़ूबसूरत और विशाल परिसर में यह स्थित है। यह भवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहा है। मोतीलाल नेहरू ने इस भवन का निर्माण कराया था, जिसे उन्होंने कांग्रेस को दे दिया और नाम 'स्वराज भवन' रखा गया। वर्ष 1942 के आंदोलन में ब्रिटिश सरकार ने स्वराज भवन को ज़ब्त कर लिया और देश आज़ाद होने के बाद ही मुक्त हो सका था।


मोतीलाल नेहरू ने परिवार के रहने के लिए नया भवन बनवाया जिसका नाम रखा 'आनन्द भवन' रखा गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद वर्ष 1970 में इंदिरा गांधी ने आनन्द भवन को जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि को सौंप दिया। वर्ष 1971 में आनन्द भवन को एक स्मारक और संग्रहालय के रूप में दर्शकों के लिए खोल दिया गया। हमने साथ-साथ ही स्वराज भवन और आनन्द भवन के दर्शन किए।  
आनन्द भवन जाना मेरे लिए अत्यन्त रोमांचकारी अनुभव रहा। इस भवन में हमारी प्रिय प्रधानमंत्री आयरन लेडी स्वर्गीय इंदिरा गांधी का जन्म और विवाह हुआ था। यहाँ राजीव गांधी की तस्वीरों को देखकर मन हर्षित हो गया। यों मैं कांग्रेसी नहीं हूँ; लेकिन इंदिरा गांधी मेरे लिए एक स्त्री और प्रधानमंत्री पद की रोल मॉडल रही हैं। राजीव गांधी से ख़ूबसूरत मुझे अब तक कोई नहीं लगता। वे मेरे हीरो रहे हैं। मैं सोचती रही कि कैसे हत्यारे की आत्मा नहीं काँपी राजीव जी की हत्या करने में। वर्ष 1989 में भागलपुर में उन्हें बस एक झलक मैं देख सकी और उनकी ख़ूबसूरती पर फ़िदा हो गई। हालाँकि वोट मैं अपनी पार्टी को ही देती रही। सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी भी मुझे बेहद पसन्द आते हैं। अब तो मैं राहुल गांधी की बहुत बड़ी प्रशंसक बन चुकी हूँ। 



आनन्द भवन को निहारते हुए मुझे यह सोचकर बेहद अफ़सोस हो रहा था कि इस भवन के वारिस के दो पूर्वज देश के लिए मारे गए, उसी परिवार का अगला वंश इस भवन को अपना नहीं कह सकता; क्योंकि यह अब इस परिवार की निजी संपत्ति नहीं रही। जिस जगह इंदिरा जी का बचपन बीता, विवाह हुआ, गांधी जी जहाँ आया करते थे; यह सब अब उस परिवार का नहीं है। कितनी राजशाही ज़िन्दगी को त्यागकर इस नेहरू परिवार ने अपना सब कुछ दान में दे दिया। मेरा भवन होता तो शायद कुछ हिस्सा अपने लिए ज़रूर रख लेती, ताकि जब तक जियूँ अपनी यादों को उन जगहों पर जी सकूँ। मोतीलाल नेहरू से लेकर इनका पूरा वंश देश के लिए जितना त्याग और बलिदान दिया है, शायद इतना किसी ने नहीं किया होगा। 



इलाहबाद में मेरे भ्रमण का दूसरा पड़ाव 
अल्फ्रेड पार्क था, जहाँ चन्द्रशेखर आज़ाद का शहीद स्थल है। गेट से घुसते ही उनकी बड़ी-सी प्रतिमा दिखती है। इसी स्थल पर उन्होंने 27 फरवरी 1931 को गोली मारकर अपनी शहादत दी थी। पार्क बहुत बड़ा है; लेकिन मुझे सिर्फ़ वह स्थान देखना था, जहाँ वे शहीद हुए थे। उनकी प्रतिमा को सैल्यूट और प्रणाम कर मैं लौट आई।
अल्फ्रेड पार्क के बाद हमलोग संगम गए। नाव से हमलोग नदियों के धार के उस स्थान के थोड़ा समीप गए, जहाँ से गंगा और यमुना की दोनों धाराएँ अलग-अलग दिखती हैं। सरस्वती नदी तो विलुप्त हो चुकी है। इसके बाद हम अकबर का क़िला बाहर से देखे और वहीं अक्षयवट वृक्ष भी हमने देखा, जो अत्यंत प्राचीन काल से है। वहाँ से नागवासुकि मन्दिर गए, जिसकी सीढ़ियाँ चढ़ने की मेरी हिम्मत नहीं रही। घाट किनारे शाम की आरती देखकर हमलोग होटल लौट आए। एक ही दिन में इतने जगह जाकर बहुत थकान हो गई और हमलोग होटल लौट आए। पूरा इलाहाबाद एक दिन में देखना सम्भव नहीं है, फिर भी प्रमुख स्थलों को हमने देख लिया। शहर में अमिताभ बच्चा के नाम पर किसी संस्था का नाम पढ़ने को मिला। एअरपोर्ट पर हरिवंश राय बच्चन जी की रचना की कुछ पंक्तियों के साथ उनकी तस्वीर की बहुत सुन्दर चित्रकारी की गई है। 




रुद्राक्ष होटल में हमारी दो दिन की ही बुकिंग थी। ब्रिटिश कोठी नाम के एक होटल में हम शिफ्ट कर गए। यह कोठी ब्रिटिशकाल की है, जिसे कुम्भ मेला के समय होटल में परिवर्तित किया गया। आधुनिक होटल की तरह यहाँ सुविधा नहीं है। पुराने कोठी में रहने के मज़े लेने हों, तो ही यहाँ जाया जा सकता है। 26 जुलाई को हमलोग दिल्ली लौट आए। 
मैं कहीं भी जाती हूँ तो ढेरों तस्वीरें खिंचवाती हूँ; क्योंकि यह सोचकर जाती हूँ कि यहाँ अब दोबारा नहीं आना है। कोई भी स्थान मुझे पहली बार में जितना रोमांचित और हर्षित करता है दूसरी बार नहीं करता। हालाँकि कई बार मेरे साथ विपरीत हो जाता है। कुछ जगह न चाहते हुए भी बार-बार गई हूँ। मसूरी, लन्दन, वैष्णव देवी का मन्दिर इत्यादि बार-बार जाना पड़ा, इसलिए इन स्थानों में मेरी कोई रूचि न रही। मुमकिन है इसी नियम के तहत फिर से इलाहाबाद जाना हो। अगर गई तो जो स्थान छूट गया है, देख सकूँगी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ज़रूर देखने जाऊँगी, वहाँ जा नहीं सकी थी। आनन्द भवन फिर से देखना मुझे अच्छा लगेगा। इलाहाबाद में अपनी बेटी के साथ बिताया तीन दिन अविस्मरणीय है। 

-जेन्नी शबनम (15.8.2026)
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