डॉ. जेन्नी शबनम की यह पहली गद्य-कृति मेरे हाथ में है, जिसे इन्होंने सात अलग-अलग खण्डों में बाँटकर 'गद्य-विविधा' नाम दिया है। अब तक इनकी जो छह पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं वे सभी काव्यरूप में है; बल्कि एक तो हाइकु-संग्रह है। प्रस्तुत पुस्तक को भले ही इन्होंने गद्य-विविधा कहा है परन्तु मुझे तो इनके गद्य में भी पद्य की लय, नग़्मगी और ख़ुशबू का आभास हो रहा है। वैसे अमृता-इमरोज़ के प्यार में भी एक लघु कविता तथा 'उन्हीं दिनों की तरह', 'अम्मा के बच्चे' और 'उनकी निशानी' जैसी कुछ कविताएँ भी पुस्तक में देखने को मिल रहीं हैं। दर-अस्ल जेन्नी जी बुनियादी तौर पर तो कवयित्री ही हैं, इसलिए हर जगह कविता का फुदककर बीच में आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं।
Friday, May 8, 2026
136. श्री राम चन्द्र वर्मा 'साहिल' द्वारा साझा संसार की समीक्षा
सात खण्डों में पहला विषय जो इन्होंने चुना- वह है 'कथा/कहानी'। इसमें नारी जाति के बारे में कुछ लघुकथाएँ हैं, जैसे 'पहचान', 'माँ हो न' और 'जैनरेशन गैप' आदि जिनमें नारी की व्यथा, उसकी पीड़ा, उसका दर्द और उसका संघर्ष परिलक्षित होता है। वैसे मेरी सोच तो यह है कि आरम्भ से ही पुरुष वर्ग ने एक बेहद गहरी चाल चली है नारी को छलने की और उसे हमेशा दबाकर रखने की। 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' और 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ...' जैसे जुमले देकर उसे आभासी तौर पर बहुत ऊँचे पद पर बैठा दिया है, ताकि वह इन्हीं झुनझुनों से खेलती रहे, ख़ुश होती रहे, बहलती रहे और पुरुष अपना वर्चस्व क़ायम रखें। आज तक यही चला आ रहा है। वैसे नारी ने स्वयं भी ख़ुद को नीचा समझने में कोई झिझक महसूस नहीं की, यह उसका अपना दोष भी है।
दूसरे विषय 'स्त्री' में स्त्री के बारे में समाज को, समाज की सोच को, कानून को और समाज-सेवकों को जेन्नी जी ने जिस तरह से लताड़ा है, प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी।
'समाज' में युद्ध के विषय में गहन चर्चा है। युद्ध अब तक जो भी हुए हैं और आज भी पूरे विश्व में जो युद्ध छाया हुआ है, ध्यान से देखें तो मुद्दा कोई ख़ास नहीं होता जिसके लिए युद्ध छिड़ा है। यह सिर्फ़ दो सिरफिरे राष्ट्राध्यक्षों की उल्टी सोच का नतीजा होता है और अरबों-खरबों डॉलरों की कमाई का ज़रिया होता है और कुछ नहीं। पिटने वाली, मरने, झेलने वाली तथा नुक़सान उठाने वाली निर्दोष और निरीह जनता ही होती है। जीत किसी की भी हो, हारती दोनों (या कई) देशों की जनता ही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इसके घातक परिणामों पर भी विस्तृत जानकारी दी गई है। बच्चों के खोते बचपन, लोकगीतों का समाज के पटल से विलुप्त होना और समाज की टूटन पर भी प्रकाश डाला गया है।
'संस्मरण' में 'कठपुतलियों वाली श्यामली दी' बहुत ही सुन्दर रचना है। 'छुप-छुप खड़े हो', 'अलविदा मक़बूल' 'अमृता का इमरोज़' तथा 'रहस्यमय शरत' आदि बेहद ख़ूबसूरत और मार्मिक रचनाएँ हैं।
'व्यंग्य' में 'स्त्री-रोबोट' व्यंग्य तो है ही; लेकिन इसके ज़रिए समाज पर गहरी चोट भी है जो समाज को कुछ सोचने पर मजबूर करती है। 'शासक हाथी और शोषित कुत्ता' में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू बताए गए हैं जो समाज में व्याप्त हैं; लेकिन बल सकारात्मक पहलू पर ही होना चाहिए। 'तिथियों की तिकड़म' में आज के ज्योतिषियों पर गहरा प्रहार किया गया है, जो मेरे विचार में बिल्कुल सही है।
'फ़िल्म' वाले खण्ड में 'द केरला स्टोरी' में यह दर्शाया गया है कि कैसे फ़िल्मों के माध्यम से समाज में द्वेष फैलाया जा रहा है। 'डंकी' एक अच्छी सामाजिक फ़िल्म है जो समझाती है कि 'वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में' और यह बहुत बड़ा सच भी है।
अन्तिम तथा सातवाँ खण्ड है 'आत्मन' जिसमें लेखिका ने अपने परिजनों से जुड़े प्रसंगों का बहुत प्यारा चित्रण किया है।
कुल मिलाकर मैं कह सकता हूँ कि यह कृति बहुत ही प्यार से पढ़ने लायक़ है और यह ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक पहुँचनी भी चाहिए ताकि समाज का हर वर्ग और हर वर्ग का हर आदमी इससे लाभान्वित हो।
मुझे लगता है पुस्तक में जहाँ-जहाँ अत्यधिक पीड़ा है, वह लेखिका की नितांत निजी पीड़ा है जिसको दर्शाने के लिए कविताओं, कथाओं तथा लेखों का सहारा लिया गया है। वैसे मेरा मानना है कि जब तक लेखक के मन में पीड़ा रहेगी वह निरन्तर लिखता रहेगा; क्योंकि समाज की पीड़ा उसे तभी दिखेगी जब वह स्वयं पीड़ित होगा, दुःखी होगा और ज़ख़्मी होगा। उसके अन्दर संवेदना भी तभी बनी रहेगी। इस आशय का मेरा अपना एक शे'र भी है:
क़लम को ज़ोर देते हैं ये गहरे ज़ख़्म ही 'साहिल'
ये भर जाएँ तो लिखने वाले लिखना छोड़ देते हैं।
ख़ैर, अब तक तो पुस्तक के बारे में मैंने कहा जो भी, जैसा भी कहा। अब अन्त में कहना चाहुँगा कि जेन्नी जी स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और इसी तरह काव्य तथा साहित्य की सेवा करती रहें। इनका लेखन और भी अधिक प्रखर हो तथा पाठकों से इन्हें भरपूर प्यार, प्रशंसा तथा समर्थन मिलता रहे।
राम चन्द्र वर्मा 'साहिल'
131- न्यू सूर्य किरण अपार्टमेंट्स
दिल्ली-110092
मोबाइल- 9968414848
तिथि- 7.6.2026
-0-
Friday, May 1, 2026
135. दान
रमन साहब लंच के समय घर आ जाते हैं फिर दोबारा ऑफिस नहीं जाते, हालाँकि ऑफ़िस शाम सात बजे बंद होता है। सभी स्टाफ को सख़्त आदेश है कि ऑफ़िस के समय कोई पर्सनल बात नहीं करनी है।
शाम के छह बज रहे थे। रमन साहब कहीं जाने के लिए तैयार होकर बरामदे में बैठे थे। तभी गोपाल आया, जो ऑफिस में साफ़ सफ़ाई का कार्य करता है।
''गुड इवनिंग सर जी!'' सकुचाते हुए गोपाल ने अभिवादन किया।
घड़ी की तरफ़ देखते हुए साहब ने पूछा- ''क्या बात है, ऑफ़िस टाइम में क्यों आए हो?''
''बहुत अर्जेंट था, आपसे बात करनी है सर जी।'' गोपाल सिर झुकाए हुए बोला।
''बोलो'' रूखे स्वर में साहब ने कहा।
''सर जी, बात यह है कि मेरी बेटी की शादी ठीक हो गई है, कुछ एडवांस मिल जाता तो...
बात बीच में काटते हुए थोड़े क्रोधित स्वर में साहब बोले- ''तुम्हें मालूम है न कि किसी को एडवांस नहीं दिया जाता है।''
दोनों हाथ जोड़कर गोपाल बोला- ''हाँ सर जी, जानते हैं। पर कहीं से कोई जुगाड़ नहीं हो पाया। अब आपका ही आसरा है सर जी। अच्छा लड़का मिल गया तो शादी ठीक कर दिए। आप तो जानते ही हैं कि बेटी का शादी कितना मुश्किल होता है।''
साहब का क्रोध बहुत बढ़ गया- ''काम तो ढ़ंग से सब करता नहीं और एडवांस माँगने आ जाता है कामचोर सब।''
कुछ सोचते हुए कड़क लहजे में साहब ने पूछा- ''कितने पैसे चाहिए?''
''सर, एक लाख!'' सिर झुकाए हुए गोपाल धीमी आवाज़ में बोला।
''एक लाख! साले मेरे घर में पैसा का पेड़ उगा है। तू चुका पाएगा एक लाख।'' ''अपनी औक़ात नहीं देखता है और मुँह उठाए चला आया पैसा माँगने।'' साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था।
''सर जी, एडवांस माँग रहे हैं। हर महीने जितना ज़्यादा होगा हम कटवा देंगे सैलरी से। एक-एक पाई चुका देंगे सर जी।''
साहब ने मन में कुछ सोचा फिर अपनी पत्नी को आवाज़ लगाया- ''पूनम! 50 हज़ार रूपया लेकर आओ, मारो साले के मुँह पर।''
रजनी ने 50 हज़ार लाकर गोपाल के हाथ में थमा दिया।
गोपाल अवाक! लगा जैसे चक्कर खाकर वही गिर पड़ेगा। फिर हाथ जोड़कर बोला- ''सर जी, 50 हज़ार में नहीं हो पाएगा, एक लाख रुपया कम पड़ रहा है। आप ही कोई गुंजाइश कर सकते हैं सर जी। एक लाख एडवांस दे दीजिए सर जी। हर महीने जितना चाहे आप काट लीजिएगा।''
''तेरे बाप की कमाई है जो तुझे एक लाख दे दें।'' चिल्लाते हुए साहब ने कहा।
''सर जी, नहीं सर जी, आप मालिक हैं, आप ही से तो आस लगाएँगे न सर जी। हम पर भरोसा कीजिए सर जी। एक-एक पाई चुका देंगे सर जी।'' गोपाल की आँखों से आँसू बहने लगा।
साहब के लहजे में थोड़ी नरमी और बोली में अहंकार- ''देख गोपाल, बेटी की शादी है इसलिए हम यह पैसा दान में दे रहे हैं। मेरी तरफ से बेटी की शादी में लगा दे। तुझे लौटना नहीं है।''
गोपाल गिड़गिड़ाते हुए बोला- ''सर जी, हमको दान नहीं चाहिए, हमको क़र्ज़ा दे दीजिए। एक लाख कम पड़ रहा है, इतने से नहीं हो पाएगा सर जी।''
''अबे साले, औक़ात नहीं था, तो ऐसा लड़का से काहे बेटी ब्याहने चला है। एक तो 50 हज़ार दान में दे रहे हैं और उस पर से तुझको और चाहिए। चल भाग यहाँ से।'' ग़ुस्से से साहब थरथराने लगे।बहुत हिम्मत जुटा कर गोपाल बोला- ''सर जी, हम बेईमान नहीं हैं, इतने साल से तो आप हमको देख रहे हैं न। ज़िन्दगी भर एहसान नहीं भूलेंगे।''
''चल भाग! भागता है कि नहीं यहाँ से, भाग साला।'' साहब इतनी ज़ोर से चिल्लाए कि गोपाल थर-थर काँपने लगा।
गोपाल की आँखों में आँसू और हाथ में 50 हज़ार। बरामदे से बाहर आकर मेन गेट पर धम्म से बैठ गया। आँखों में अँधेरा, निरुपाय, असहाय!
''आप भी क्या करते हैं, 50 हज़ार दान देने से क्या फ़ायदा? एक लाख एडवांस दे देते तो उसकी बेटी की शादी भी हो जाती और पैसा भी चुका देता धीरे-धीरे।'' पूनम ने साहब को समझाया।
''जितना तुम्हारा दिमाग़ है उतना ही लगाया करो। हम जो करते हैं सोचकर समझकर करते हैं। ग़रीब की बेटी की शादी में 50 हज़ार दान दिए हैं, सोचती हो समाज में मेरा कितना नाम होगा।'' साहब ने घमंड से कहा और घड़ी की तरफ देखकर बोले-
''अरे यार रजनी, जल्दी तैयार हो जाओ। मंत्री जी की बेटी की शादी में जाना है। रास्ते से किसी ज्वेलर्स से उनके बेटी-दामाद के लिए हीरे की अँगूठी लेनी है।''
''और हाँ, गिफ्ट ऐसे देना ताकि सभी लोग देखे सकें। अरे काम पड़ता रहता है न उनसे।''
इस बीच गोपाल धीरे-से उठकर चला गया अपनी औक़ात के लोगों के बीच।
-जेन्नी शबनम (1.5.2026)
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