मम्मी की पाँचवीं पुण्यतिथि पर हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मम्मी के घर आई हूँ। इस बार भाई भी साथ है और पहली बार मम्मी की नज़दीकी मित्र उषा श्रीवास्तव भी आई हैं। उषा मौसी दरभंगा में मम्मी के साथ कॉलेज में पढ़ती थीं। संयोग ऐसा रहा कि विवाह के बाद इनकी मित्रता भागलपुर में भी बनी रही। मम्मी के जाने के बाद भी उनसे मेरा सम्बन्ध बना हुआ है।
मम्मी का घर आज भी वैसे ही है जैसे मम्मी के रहने पर था। फूल अब कम कर दिया गया है और तरकारी उपजाई जा रही है ताकि वर्ष में एक बार जब मैं आऊँ तो मम्मी के मेहनत के घर की ज़मीन में उपजाई हुई तरकारी खा सकूँ। मम्मी के जीवित रहते कभी भी इस घर में एक रात भी नहीं रही; परन्तु अब आकर रहती हूँ। मम्मी के घर में बहुत सुकून मिलता है।
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| मैं |
मम्मी को लोग भूलना चाहें भी, तो मैं भूलने नहीं देती हूँ। कुछ लोग जो मम्मी से संबद्ध थे, फेसबुक पर मम्मी के अपडेट पर प्रतिक्रिया देते हैं। मैंने फेसबुक पर मम्मी के प्रोफाइल को जीवित रखा है और प्रतिदिन की मेमोरी को पोस्ट करती हूँ। अपने प्रोफाइल से जाकर जिनकी भी प्रतिक्रिया मिलती है, उन्हें यथायोग्य धन्यवाद, प्रणाम और स्नेह देती हूँ।
समय और उम्र बढ़ने के साथ मम्मी की पुण्यतिथि पर कब तक भागलपुर जा सकूँगी, मालूम नहीं। इस बार मेरा एक पैर फ्रैक्चर हो गया है। पाँव में प्लास्टर लगा है। हालाँकि पाँच सप्ताह हो चुके हैं; लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि छह सप्ताह से पहले प्लास्टर नहीं खोला जा सकता है। ऐसा दुर्भाग्य रहा कि पैर फ्रैक्चर होने के दस दिन बाद यानी पहली जनवरी को स्नानघर में फिसलकर गिर गई। मुझे तो लग रहा था कि इस वर्ष नहीं आ सकूँगी; लेकिन विमान के व्हीलचेयर के सहारे मैं आराम से आ सकी।
जीवन-मृत्यु शाश्वत सत्य है; परन्तु इस सत्य को स्वीकार करना हमेशा से दुःखद रहा है। पापा, दादी, मम्मी और बहुत सारे रिश्तेदार इस संसार से चले गए। जब-जब वे सभी याद आते हैं, तो बहुत दुखः होता है। यही जीवन है और यूँ ही हम सभी का अंत होना है। मम्मी की यादें और जीवन मेरे लिए सदैव प्रेरक रहा है और जीवन को ज़िन्दादिली से जीने की प्रेरणा मिलती है।
मम्मी को सादर प्रणाम!
-जेन्नी शबनम (30.1.2026)
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नमन मां को |
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