रमन साहब का ऑफ़िस पटना के एक पॉश इलाक़े में है। वे हर दिन ऑफिस जाते हैं और लंच में घर आ जाते हैं, दोबारा ऑफ़िस नहीं जाते। ऑफ़िस शाम सात बजे बंद होता है। सभी स्टाफ़ को सख़्त आदेश है कि कार्यालय-समय में रमन साहब से कोई पर्सनल बात नहीं करनी है और न उनके घर आना है।
शाम के छह बजे थे। रमन साहब कहीं जाने के लिए तैयार हो रहे थे। तभी गोपाल आया, जो ऑफ़िस में साफ़-सफ़ाई का कार्य करता है। गोपाल मन ही मन बहुत डरा हुआ था; ऑफ़िस का समय समाप्त जो नहीं हुआ था। किन्तु अभी ही मिलना आवश्यक था; क्योंकि उसे अभी-अभी पता चला कि रमन साहब शाम को कहीं बहार निकल रहे हैं और कल सुबह 15 दिन के लिए विदेश जा रहे हैं।
रमन साहब तैयार होकर बरामदे में आए, तो गोपाल ने सकुचाते हुए अभिवादन किया-''गुड इवनिंग सर जी!''
घड़ी की तरफ़ देखते हुए रूखे स्वर में साहब ने पूछा- ''क्या बात है गोपाल, ऑफ़िस टाइम में क्यों आए हो?''
''सर जी, बहुत अर्जेन्ट था। बात यह है कि मेरी बेटी की शादी तय हो गई है, कुछ एडवांस मिल जाता तो...
बात बीच में काटते हुए थोड़े क्रोधित स्वर में साहब बोले- ''तुम्हें मालूम है न कि किसी को एडवांस नहीं दिया जाता है।''
दोनों हाथ जोड़कर गोपाल बोला- ''हाँ सर जी, जानते हैं। पर कहीं से कोई जुगाड़ नहीं हो पाया। अब आपका ही आसरा है सर जी। अच्छा लड़का मिल गया, तो शादी तय कर दिए। आप तो जानते ही हैं कि बेटी की शादी करना कितना मुश्किल होता है।''
साहब का क्रोध बहुत बढ़ गया- ''काम तो ढ़ंग से करता नहीं और एडवांस माँगने आ जाता है कामचोर कहीं का।''
कुछ सोचते हुए कड़क लहजे में पूछा- ''कितने पैसे चाहिए?''
''सर, एक लाख!'' सिर झुकाए हुए गोपाल धीमी आवाज़ में बोला।
''एक लाख! साले मेरे घर में पैसों का पेड़ उगा है। तू चुका पाएगा एक लाख।'' ''अपनी औक़ात नहीं देखता है और मुँह उठाए चला आया पैसा माँगने।'' साहब का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था।
''सर जी, एडवांस दे दीजिए। हर महीने जितना ज़्यादा होगा कटवा देंगे सैलरी से। पूरा क़र्ज़ा चुका देंगे सर जी।''
साहब ने मन में कुछ सोचा फिर अपनी पत्नी से कहा- ''पूनम! 50 हज़ार रूपया लेकर आओ और मारो साले के मुँह पर।''
पूनम ने 50 हज़ार लाकर गोपाल के हाथ में थमा दिया।
गोपाल अवाक्! लगा जैसे चक्कर खाकर वही गिर पड़ेगा। फिर हाथ जोड़कर बोला- ''सर जी, 50 हज़ार में नहीं हो पाएगा, एक लाख रुपया कम पड़ रहा है। आप ही कोई गुंजाइश कर सकते हैं सर जी। एक लाख दे दीजिए, हर महीने जितना चाहे आप काट लीजिएगा।''
''तेरे बाप की कमाई है, जो तुझे एक लाख दे दें।'' चिल्लाते हुए साहब ने कहा।
''सर जी, नहीं सर जी, आप मालिक हैं, आप ही से तो आस लगाएँगे न सर जी। हम पर भरोसा कीजिए सर जी। एक-एक पाई चुका देंगे सर जी।'' गोपाल की आँखों में आँसू भर आए।
साहब ने स्वर में नाटकीयता लाते हुए कहा- ''देख गोपाल! बेटी की शादी है, इसलिए हम यह पैसा दान में दे रहे हैं। मेरी तरफ़ से बेटी की शादी में लगा दे। तुझे लौटना नहीं है।''
गोपाल गिड़गिड़ाते हुए बोला- ''सर जी, हमको दान नहीं चाहिए, हमको क़र्ज़ा दे दीजिए। एक लाख कम पड़ रहा है, इतने से नहीं हो पाएगा सर जी।'' ''सर जी, हम पर दया कीजिए सर जी।''
''अबे साले, औक़ात नहीं थी, तो काहे बेटी ब्याहने चला है। एक तो 50 हज़ार दान में दे रहे हैं और उस पर से तुझको और चाहिए। चल भाग यहाँ से।'' ग़ुस्से से साहब थरथराने लगे। बहुत हिम्मत जुटाकर गोपाल बोला- ''सर जी, हम बेईमान नहीं हैं, इतने साल से आप हमको देख रहे हैं। ज़िन्दगी भर एहसान नहीं भूलेंगे।''
''चल भाग! भागता है कि नहीं यहाँ से, भाग साला।'' साहब इतनी ज़ोर से चिल्लाए कि गोपाल थर-थर काँपने लगा।
गोपाल की आँखों में आँसू और हाथ में 50 हज़ार। बरामदे से बाहर आकर मेन गेट पर धम्म से बैठ गया। आँखों में अँधेरा, निरुपाय, असहाय।
''आप भी क्या करते हैं, 50 हज़ार दान देने से क्या फ़ायदा? एक लाख एडवांस दे देते, तो उसकी बेटी की शादी भी हो जाती और पैसा भी चुका देता धीरे-धीरे।'' पूनम ने साहब को धीमी आवाज़ में समझाया।
''जितना तुम्हारा दिमाग़ है, उतना ही लगाया करो। हम जो करते हैं, सोच-समझकर करते हैं। ग़रीब की बेटी की शादी में 50 हज़ार दान दिए हैं, सोचती हो समाज में मेरा कितना नाम होगा।'' ''पिछले साल अपने गाँव की चार बेटी की शादी में पैसा दान में दिए थे। याद है तुमको, पेपर में यह ख़बर छपी थी। और हाँ, अनाथालय में एक लाख रूपया दान किए थे, सब अखबार में मेरा चर्चा था।'' ''अरे इन ग़रीबों को बड़ा दान देकर जीवनभर का कर्ज़दार बना दो, जब चाहो जो चाहो उनसे काम लो, और समाज में सम्मान मिलता है सो अलग।''
साहब ने घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा-
''अरे यार पूनम, जल्दी चलो, देर हो रही है। मंत्री जी की बेटी की शादी में जाना है। रास्ते से किसी ज्वेलर्स से उनके बेटी-दामाद के लिए हीरे की अँगूठी भी लेनी है।''
''पूनम, गिफ़्ट इस तरह से देना ताकि सभी लोग देखे सकें कि महँगा है। अरे उन सभी से काम पड़ता रहता है।''
इस बीच गोपाल निराश तथा थके क़दमों से अपनी औक़ात के लोगों के बीच चला गया।
-जेन्नी शबनम (1.5.2026)
___________________
मानव स्वभाव पर मन को झकझोरती कहानी
ReplyDeleteह्रदयस्पर्शी कहानी |
ReplyDeleteअच्छी कहानी
ReplyDeleteबहुत सुंदर लिखा जैन्नीजी। दिल को स्पर्श कर गया। बधाई आपको🌹
ReplyDeleteबहुत ही हृदयस्पर्शी कहानी ।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी कहानी।
ReplyDeleteसमाज के तथाकथित दानवीरों का असली रूप अक्सर यही होता है। एक अच्छी रचना के लिए बहुत बधाई। - प्रियंका
ReplyDelete