Tuesday, July 20, 2010

9. वे जो मेरे पिता थे

पापा
पापा और आचार्य विनोबा भावे

पापा के लिए मन बहुत उदास है उनको गुज़रे हुए आज 32 साल हो गए हैं। फिर भी यादों में, बातों में, जीवन के हर क्षण में उनकी कमी और ज़रूरत महसूस होती है जानती हूँ, मेरी उम्र और वक़्त का वह सभी पल बीत चुका है, जब उनकी निहायत ज़रूरत थी; क्योंकि अब हम सभी को उनके बिना जीने की आदत पड़ चुकी है और ज़िन्दगी का बहुत लम्बा सफ़र हम उनके बिना तय कर चुके हैं यों तो शाश्वत नियम है जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना, लेकिन असमय मृत्यु असह्य होती है।  
 
मेरे पिता प्रोफ़ेसर डा. कृष्ण मोहन प्रसाद का लम्बी बीमारी के बाद असामयिक निधन हुआ था आज के दिन 17.7.1978 की काली रात कहें या 18.7.1978 की भोर, 1 बजकर 45 मिनट पर पापा हम सभी से बहुत दूर चले गए भागलपुर विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में शिक्षक मेरे पिता गांधी के सिद्धांतों और विचारों से काफ़ी गहराई से जुड़े रहे इस विषय पर उनके व्याख्यान इतने सहज ग्राह्य होते थे कि उनके छात्र लगातार घंटों उनको सुनना चाहते थे गांधीवाद और मार्क्सवाद पर व्याख्यान देने के लिए उन्हें कई संस्थाओं द्वारा बुलाया जाता था  
 
मुझे याद है मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह तक अस्पताल में वे अचेत रहे पहले जॉन्डिस (पीलिया) बाद में उन्हें लीवर सिरोसिस हो गया एक साल तक वे बीमार रहे; लेकिन जिस दिन अचेत हुए उस दिन तक वे साइकिल से विश्वविद्यालय जाते रहे, जबकि डाक्टर ने उन्हें पूर्ण आराम (बेड रेस्ट) करने को कहा था विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. हरिद्वार राय ने कहा कि कुछ दिनों की छुट्टी ले लें; परन्तु उन्हें ख़ुद से ज़्यादा अपने छात्रों की चिन्ता थी उन्हें शायद यह मालूम हो गया था कि उनकी ज़िन्दगी अब ख़त्म होने वाली है, अतः उनके अधीन जो छात्र शोध-कार्य कर रहे थे उनको सारी रात बिठाकर वे पढ़ाते और उनके कार्य में संशोधन करते थे  
 
अपने छात्रों के बीच वे बहुत लोकप्रिय थे, क्योंकि वे जो पढ़ाते या कहते थे, वैसे ही जीते थे विचार और व्यवहार में समानता के कारण एक आदर्श शिक्षक और व्यक्ति के रूप में उन्हें प्रतिष्ठा मिलती थी मुझे याद है जब वे अचेत होकर अस्पताल में भर्ती हुए, उनके छात्रों ने दो-दो घन्टे के अन्तराल पर अपना-अपना समय तय कर वहाँ रहना निश्चित किया था; क्योंकि अचेतावस्था में जिस हाथ में पानी (स्लाइन) चढ़ रहा था वे खींच लेते थे, तो उस हाथ को पकड़े रहना होता था दिन और रात उनके कोई-न-कोई छात्र वहाँ होते थे शुरू के दो दिन मेरी मम्मी, रिश्ते के एक चाचा और वे छात्र वहाँ थे दो दिन के बाद दादी और भाई भी आ गए; भाई दादी के साथ गाँव रहता था बाद में मेरे मामा और ननिहाल के कुछ रिश्तेदार भी आ गए हम दोनों भाई-बहन छोटे थे, हमें समझ नहीं आया कि पापा ठीक नहीं होंगे या नहीं लौटेंगे  
 
जिस रात पापा की मृत्यु हुई, उस रात उनके सभी छात्र मेरी मम्मी के साथ वहाँ मौजूद थे सुबह जब अपनी मौसी और भाई के साथ मैं अस्पताल गई, तो गेट पर किसी ने मौसी को बता दिया कि पापा नहीं रहे, पर हम भाई-बहन को किसी ने नहीं बताया पापा के मित्र प्रोफ़ेसर डॉ. जवाहर पाण्डेय, जो कभी पापा के छात्र और मम्मी के सहपाठी थे, मुझे और भैया को अपने घर ले गए, नाश्ता कराया और ख़ुद अस्पताल चले गए बाद में हमें अस्पताल लाया गया रात में जैसे ही पापा की मृत्यु हुई सभी छात्र एकत्रित हो गए और दाह-संस्कार का सारा इंतिज़ाम कर लिया बड़े से ट्रक में पापा को रखा जा चुका था और उनके सभी छात्र ट्रक में खड़े थे मुझे तब भी समझ नहीं आया कि पापा की मृत्यु हो चुकी है और उन्हें उस ट्रक में जलाने ले जाया जाएगा, जबकि मैंने उस ट्रक को देखा और तैयारी करते छात्रों को भी; परन्तु किसी ने मुझे पापा को नहीं दिखाया अस्पताल से मौसी अपनी गाड़ी से मुझे, मम्मी और दादी को लेकर घर आ गईं भैया को लेकर वे लोग गंगा के बरारी घाट पर गए, जहाँ दाह-संस्कार व क्रिया-कर्म किया गया पापा के विचारों के ख़िलाफ़ उनको अग्नि से जलाया गया, जबकि विद्युत से जलाए जाने को वे सदैव उचित कहते थे; मृत्यु के बाद उनकी बात कौन सुनता या मानता  
 
पापा अपने छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ गए थे पापा का जन्म ग्रामीण परिवेष में हुआ, जहाँ धार्मिक मान्यताओं और प्रथा-परम्परा को बहुत महत्व दिया जाता है बचपन से वे रूढ़िवादी परम्पराओं के विरोधी थे तथा शिक्षा को बहुत महत्व देते थे अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे संयुक्त परिवार से थे पापा का अपने पिता से बहुत ज़्यादा वैचारिक मतभेद रहा; क्योंकि उनकी सोच, उनकी कार्य-शैली व जीवन-शैली सभी से अलग थी तीक्ष्ण बुद्धि और अपने प्रखर सोच के कारण वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सके उन्होंने इतिहास और राजनीति शास्त्र में एम.ए., बी.एल., गांधी-विचार में पी-एच.डी. किया उनके पी-एच.डी. की मौखिक परीक्षा (viva) में एक बाह्य परीक्षक (external) आचार्य कृपलानी भी थे जब कृपलानी जी ने गांधी जी के प्रति उनके विचारों को सुना तो अवाक् रह गए और उन्होंने बहुत प्रशंसा की; हालाँकि उनके थीसिस के कुछ विचारों से उन्हें आपत्ति थी और दोबारा लिखने को कहा था  
 
पापा का राजनीतिक जीवन कम उम्र से शुरू हो गया था वर्ष 1942 के आन्दोलन में वे सक्रिय रहे। अपने एक बड़े भाई के साथ रेल की पटरी उखाड़ने में कामयाब रहे और पकड़े नहीं गए उनकी विचारधारा उसी समय से सोशलिस्ट पार्टी की तरफ़ बढ़ गई थी बाद में उनका रुझान वामपंथ की ओर हो गया और वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता हो गए एक आम भारतीय परम्परावादी परिवार में जन्म लेने के बाद भी वे नास्तिक थे; उनकी ये नास्तिकता उनके अपने सोच से थी, न कि किसी को देखकर विचार बने या बदले थे वे हर उस अंधविश्वास और ग़लत रूढ़ियों के ख़िलाफ़ थे, जिससे प्रगति में बाधा हो जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा और किसी भी धार्मिक क्रिया-कलाप के विरोधी थे यहाँ तक की वे अपनी शादी में खादी का धोती-कुर्ता पहने और एक रुपया भी लेने से इनकार कर दिए वे इसी शर्त पर शादी करने को राज़ी हुए थे कि मम्मी अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी  
 
साम्यवादी, गांधीवादी, नास्तिक और शिक्षक होने के साथ वे प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास रखते थे और शुद्ध शाकाहारी थे अपने सभी सिद्धांत जो वे कहते थे या अपने भाषण में बोलते थे, पहले ख़ुद पर प्रयोग कर चुके होते थे मुझे याद है कि पापा के विचारों से प्रभावित होकर कई लोगों ने सिर्फ़ एक बच्चे में परिवार नियोजन करा लिया था गाँव में अपनी ज़मीन पर उन्होंने एक प्राथमिक विद्यालय खोला, जो बाद में सरकारी हो गया उस विद्यालय में पापा का नाम कहीं नहीं है; क्योंकि गाँव के महाजन ने पापा के द्वारा दान की गई विद्यालय की ज़मीन की अदला-बदली कर अपने नाम करा ली और विद्यालय को वहाँ से उठाकर अपने परिसर में ले गए, जहाँ मैं भी कुछ दिन पढ़ी हूँ पापा की मृत्यु के बाद वह विद्यालय पुनः उसी ज़मीन पर बना जिसे मेरे पापा ने दान किया था, लेकिन अब वह ज़मीन महाजन की चालाकी से महाजन के नाम है विद्यालय में जाने का रास्ता अब भी हमारे ज़मीन से होकर ही है पापा ने एक पुस्तकालय भी खोला, जो बाद में बंद हो गया  
 
मैं तब बहुत छोटी थी जब गाँव में बिजली नहीं आई थी मैं पापा के साथ सीतामढ़ी गई, जो उस समय मेरे गाँव का ज़िला हुआ करता था, वहाँ से बिजली विभाग में आवेदन देकर बहुत दौड़-धूप करके बिजली का पोल लेकर हम गाँव आए और फिर पूरे गाँव में बिजली आई  
 
अपने गाँव और आस-पास के इलाक़ों में वे 'कन्हैया जी' के नाम से मशहूर थे ख़ुद खादी पहनते और मम्मी को भी खादी पहनने को कहते थे ज़रूरत से ज़्यादा कोई सामान हमारे घर में नहीं था फोटो खींचने के वे बहुत शौक़ीन थे और ख़ुद फोटो साफ़ भी करते किसी से भी निर्धारित समय पर वे मिलते थे, जो छुट्टी का दिन छोड़कर हर दिन शाम को चार से छह का होता था; भले ही कोई रिश्तेदार हो या बहुत बड़े ओहदे वाला व्यक्ति। सिर्फ़ उनके अपने छात्रों के लिए वक़्त की कोई पाबन्दी न थी  
 
सम्भवतः उन्हें अपनी बीमारी के ठीक न होने का अनुमान था मृत्यु से पूर्व वे दिल्ली के एम्स में एक माह भर्ती रहे, तब डाक्टर ने बहुत आश्चर्य किया कि शाकाहारी व्यक्ति जो चाय भी न पीता हो उसे लीवर सिरोसिस कैसे हुआ; बीमारी उस समय अन्तिम स्थिति में थी हम सभी से अपनी बीमारी या बीमारी की गम्भीरता के बारे में वे कोई चर्चा नहीं करते थे अपनी मृत्यु से पूर्व एक माह के भीतर उन्होंने अपना सारा काम पूरा कर लिया; चाहे अध्यापन-विषय (सिलेबस) को पूर्ण करना हो या शोधार्थी छात्रों की थीसिस की अन्तिम जाँच हो परन्तु घर और परिवार का सारा कार्य वे अधूरा छोड़ गए उस समय मैं 8वीं की छात्रा थी और भैया 10वीं का एक महत्वपूर्ण काम उन्होंने हमारे लिए किया था, जो उनके बाद हमारे जीने में मददगार हुआ, वह था मेरी मम्मी का स्कूल में शिक्षिका होना तथा सामजिक कार्यों में आगे बढ़ाना जब पापा की शादी हुई मम्मी बी.ए. में पढ़ती थीं शादी के बाद मम्मी ने एम.ए., बी.एल., बी.एड. किया पापा की मृत्यु के काफ़ी सालों बाद मम्मी ने एम.एड. किया  
 
'गांधी शान्ति प्रतिष्ठान केन्द्र' की भागलपुर शाखा को पापा ने वर्ष 1967 में शुरू किया, जिसकी फाउंडर सेक्रेटरी (चीफ़ वर्कर) मेरी माँ श्रीमती प्रतिभा सिन्हा थीं बाद में मम्मी स्कूल में शिक्षिका बनी, साथ-साथ समाज सेवा में सक्रिय रहीं मम्मी 1974 में शिक्षिका बनी, 1988 में इन्टर स्कूल की प्राचार्य बनी और एक साल पूर्व अवकाश प्राप्त हुई हैं  
 
अपनी मृत्यु से कुछ पहले पापा ने अपने थीसिस को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए किसी प्रकाशक को दिया था। पुस्तक प्रकाशन से सम्बन्धित सारी बातें हो गईं, प्रूफ-रीडिंग कर चुके थे; परन्तु किताब छप न सकी, उनकी मृत्यु हो गई मेरे पापा के मित्र प्रोफ़ेसर डा. रामजी सिंह, जो सांसद भी रह चुके हैं, ने पापा की पुस्तक किसी दूसरे प्रकाशक से प्रकाशित करवाई उन्होंने किताब का शीर्षक बदलकर 'सर्वोदया ऑफ गांधी' कर दिया यों किताब तो छप गई, पर न आज तक रॉयल्टी मिली न किताब के और छपने की जानकारी  
 
पापा ने हम दोनों भाई-बहन को पढ़ने के लिए गाँव भेज दिया था दो साल बाद मैं वापस भागलपुर आ गई, भैया वहीं रह गया पापा का मानना था कि गाँव में रहकर भी अच्छी शिक्षा ली जा सकती है पापा की मृत्यु के बाद भाई को मम्मी वापस भगलपुर ले आईं मेरा भाई पढ़ाई में काफी तेज़ था, तो गाँव से उसके शिक्षक आकर उसे वापस ले गए कि वह गाँव में पढ़ेगा; यह वही स्कूल है जिसमें मेरे पिता भी पढ़े थे मेरे पापा की सोच सही साबित हुई मेरा भाई गाँव से मैट्रिक करने के बाद पटना साइंस कॉलेज से आई.एस.सी. फिर आई.आई.टी. कानपुर से एम.एस.सी. और छात्रवृति पाकर आगे की पढ़ाई करने ओहिओ स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका चला गया  
पुरुष के बिना जीना समाज में कितना मुश्किल होता है, उस समय यह अनुमान न था जब पापा की मृत्यु हुई मेरी मम्मी मात्र 33 वर्ष की थीं सामजिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक परेशानी को झेलते हुए मम्मी को मैं देखती रही उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आता था, शायद यह उस ज़माने का फ़र्क़ था जबकि आज के बच्चे 10-12 साल में ही बहुत समझदार हो जाते हैं  
 
यों मेरी दादी, मम्मी के सहकर्मी और मेरे ननिहाल के सभी लोग बहुत सहयोगी रहे हैं पापा के सभी मित्र, चाहे राजनीतिक जीवन से जुड़े हों या सामाजिक, सभी ने सदैव हमारा साथ दिया हर वह वक़्त जब मम्मी का सामाजिक बहिष्कार होता, किसी शुभ व धार्मिक आयोजन से मम्मी को दूर कर दिया जाता, या कोई बेचारी समझ हम पर तरस खाता, तो पापा की हर बार बहुत याद आती थी अब भी जब किसी बात से मन दुःखी होता है, पापा ही याद आते हैं हर बार पापा से सवाल करती हूँ ''क्यों गए तुम? जाना ही था, तो कम-से-कम थोड़ा रुककर हमारे होश आने तक ठहर जाते बहुत सी बातें हैं पापा, जो सिर्फ़ तुमसे ही कह सकती या सिर्फ़ तुम ही कर सकते, फिर... पापा, बताओ किससे कहें?'' 
 
32 साल बीत गए पर कभी-कभी लगता है जैसे अभी-अभी की तो बात है, तुम यूनिवर्सिटी से साइकिल से लौटोगे और साथ में अमरूद, गाजर और पेड़ा लाओगे और पुकारोगे- जेन्नी...!

-जेन्नी शबनम (18.7.2010)
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Saturday, May 8, 2010

8. ईश्वर के होने और न होने के बीच

चित्र- गूगल से साभार
''नास्तिकता सहज है, स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। आस्तिकता हम सिखाते हैं, जन्मजात कोई भी आस्तिक नहीं होता।'' आज सुबह मैंने अपना मेल-बॉक्स खोला, तो एक मित्र द्वारा 'नास्तिकों का एक ब्लॉग' पर एक लेख में यह पढ़ने को मिला पसन्द का विषय देख सारा काम छोड़ मैं पूरा लेख पढ़ गई, फिर लोगों की प्रतिक्रिया, उत्तर-प्रत्युत्तर भी पढ़ गई मुझे लगा इस बात पर विचार ज़रूर करना चाहिए कि कहीं हमारी आस्तिकता हमें ज़िन्दगी को पुरज़ोर तरीक़े से जीने में बाधा तो नहीं बन रही है

मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जिससे मेरी अपनी सोच विकसित हो सकी और मुझ पर कभी कोई विचार प्रभावी न हो सका मेरे विचार या सोच सही हैं या ग़लत, यह मैं नहीं जानती; लेकिन मेरे लिए यह उपयुक्त है और यह मेरी अपनी समझ से विकसित हुई है ऐसा नहीं कि मैं अपनी सोच के प्रति कट्टर हूँ; लेकिन किसी को आहत किए बिना अपनी सोच पर क़ायम रहती हूँ धर्म से जुड़े विषय पर सभी को पढ़ती और समझने का प्रयत्न करती हूँ, जहाँ जो विचार मेरे तर्क की कसौटी पर खरे लगे ख़ुद के जीवन में अपना लेती हूँहालाँकि इसे लेकर अक्सर मेरी आलोचना होती है तथा मुझे अपरिपक्व, अधार्मिक और ग़ैर-सामाजिक होने का ख़िताब भी मिलता है आलोचना हो या प्रशंसा मैं इस पर ज़्यादा नहीं सोचती; लेकिन यह उम्मीद ज़रूर रहती है कि कोई तर्क से मुझे समझाए कि मैं क्यों ग़लत हूँ सदैव लोगों के पास तर्क नहीं होते, महज़ परम्पराओं, प्रथाओं और तथाकथित आदर्श में गूँथे नियम-क़ानून होते हैं, जो कभी मुझे स्वीकार्य नहीं हुए  
 
मेरे बचपन की कुछ बातें हैं जो आज यह सब लिखते-लिखते याद आ गईं, जो शायद इस सन्दर्भ में लिखना उचित भी हो; क्योंकि मेरी सोच को परिष्कृत करने में ये सहायक रहे हैं मेरे बचपन की बातें जो बहुत हल्की-सी याद है और कुछ बातें बाद में मेरी माँ से मुझे पता चलींविजयवाड़ा के एक बहुत बड़े नास्तिक थे 'प्रोफ़ेसर गोरा' (गोपाराजू रामचन्द्र राव) जिनका पूरा नाम तब नहीं जानती थी, जिनकी एक पत्रिका निकलती थी 'atheist', मेरे पिता के वे बहुत घनिष्ट मित्र थे; यों वे उम्र में काफ़ी बड़े थे, पर सोच की समानता उनके घनिष्टता की वजह थी मैं एक वर्ष की थी, तब अपने माता-पिता के साथ विजयवाड़ा उनके घर 15 दिन रही थी मैं लगभग 2-3 साल की, तब वे भागलपुर (बिहार) मेरे घर आए थे मेरे पिता की मृत्यु 1978 में हो गई, फिर सभी से धीरे-धीरे सम्पर्क टूटता चला गया और एल्बम में सँजोए प्रोफ़ेसर गोरा और उनके परिवार की तस्वीरों से ही मैंने यह सब जाना और समझा  
 
मैं, मेरी मम्मी, मेरा भाई, प्रो. गोरा (भागलपुर)
मुझे याद है बचपन में विजयवाड़ा नाम मुझे अटपटा-सा लगता था मेरे भाई और मैंने जाने कहाँ से कहना सीख लिया था ''अट्टा-पट्टा विजय-वाड़ा'' और अक्सर हम यह कहते रहते और हाथ पटक-पटककर खेलते थे पापा अक्सर यह कहकर हमें चिढ़ाया करते थे  
 
अट्टा-पट्टा विजय-वाड़ा के साथ गोरा जी कब हमारे खेल से मेरे ज़ेहन में उतर गए, मुझे भी पता नहीं चला। मेरे पिता के विचार और जीवन जीने का तरीक़ा आम लोगों से अलग था जब कुछ समझने लायक हुई, तो न पिता रहे न गोरा जी और न उनसे सम्बन्धित कोई सम्पर्क ही रह गया लेकिन नास्तिकता-आस्तिकता की बात ज़रूर सोचने और समझने लगी  
 
मेरे पिता नास्तिक थे, तो घर में कोई भी धार्मिक क्रिया-कलाप नहीं होता था शायद मेरे ज़ेहन में भी नास्तिकता उन्हें देखकर बैठ गई हो पिता काफ़ी पहले चल बसे, तो मन में होता था कि कहीं वे नास्तिक थे इसलिए तो नहीं ऐसा हुआ जिन लोगों को हर वक़्त ईश्वर में लिप्त देखी, वे भी असामयिक मौत मरे, बहुत पीड़ा से गुज़रे, विपदाओं में घिरे जब मेरी अपनी समझ बढ़ी, तब भी ईश्वर के प्रति न मेरी आस्था जागी, न कोई रुझान  
 
अपने बचपन से अपनी दादी द्वारा धार्मिक ग्रंथों की कहानियाँ सुनती रही हूँ मेरी दादी नास्तिक नहीं थीं वे धार्मिक पुस्तकें बहुत पढ़ती थीं, ईश्वर में आस्था थी उनकी; लेकिन धार्मिक क्रिया-कलाप में उन्होंने कभी हिस्सा नहीं लिया दादी की मृत्यु 102 वर्ष की अवस्था में 2 साल पहले हुई है।  
 
मैं नहीं जानती कि कोई ईश्वर कहीं है या था; अगर कभी हुआ भी हो, तो अब तक तो ज़िन्दा न होगा सम्भव है कि कुछ पुराने वृक्ष की तरह सैकड़ों साल जिया हो, या मुमकिन है कि ऐसा कुछ न हुआ हो प्रकृति की हर बात में या जीवन के हर कार्य में जब हम तर्क ढूँढते हैं, तो ईश्वर के सम्बन्ध में तर्क ढूँढना भी जायज़ है  
 
अगर ईश्वर ने सब बनाया फिर उसे किसने बनाया? अगर ईश्वर ने ख़ुद को बना लिया फिर इस दुनिया की रचना की, तो इस दुनिया की रचना का औचित्य क्या? अगर कोई औचित्य हो जो ईश्वर ही जानता हो, तो दुनिया विनाश की तरफ़ क्यों बढ़ रही है? अगर सब ईश्वर की इच्छा से होता है तो दुनिया में इतना वर्ग-भेद, वर्ग-संघर्ष, क्लेश, अशांति क्यों? बहुत सारे प्रश्न हैं बहुत प्रश्न ऐसे भी हैं जो किसी के मन में न आए हों, पर कभी-न-कभी आएँगे ज़रूर  
 
मैं नास्तिक हूँ, लेकिन परिवार के साथ धार्मिक स्थल जाती हूँ वहाँ आस्था के माहौल में उपजी शान्ति देखती हूँ, लोगों का अंधविश्वास देखती हूँ, धर्म के नाम पर लोगों का पागलपन देखती हूँ, आस्था के नाम पर डर देखती हूँ लोग अपने सुख-समृधि के लिए अपनी हैसियत से ज़्यादा चढ़ावा चढ़ाते यानी कि ईश्वर को घूस देते हैं मन्नत माँगने कहाँ-कहाँ की ख़ाक नहीं छानते हैं। कभी भूखे रहकर, तो कभी व्रत-अनुष्ठान करके अपना कोई फ़ायदा (सुख) माँगते हैं कोई मुराद पूरी हो, तो उसके लिए चादर चढ़ाते हैं, फिर कोई नई कामना या मनौती तैयार हो जाती है ईश्वर से माँगने के लिए  
 
आख़िर ये ग़रीब और कट्टर धार्मिक लोग क्यों नहीं अपनी दशा सुधार पाते है, जबकि वे सारा समय ईश्वर का नाम और माला जपते रहते हैं हालाँकि इसका भी जवाब उनके पास है कि यह पिछले जन्म का फल है, जो इस जन्म में भुगत रहे हैं हर मनुष्य किसी-न-किसी धर्म (सम्प्रदाय) में विश्वास रखता है, फिर क्या वजह है कि 21वीं सदी तक भी पाप चल रहा है क्यों नहीं ग़रीबी दूर होती, क्यों समाज में आज भी जाति और वर्ग भेद है?  
 
आज सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद के अलग-अलग संगठन से तबाह है, जो किसी ख़ास धर्म या सम्प्रदाय के नुमाइन्दे हैं देश के भीतर सांप्रदायिक दंगा या फिर कोई क्रूरतम अपराध आख़िर क्यों है? क्यों नहीं इन आस्तिकों को ख़ौफ़ होता है?  
 
धर्म में पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का डर एक ऐसा मूल-मंत्र है, जो हर लोगों को डरा देता है साथ ही इससे पार पाने के उपाय भी किए गए हैं, ताकि लोग पाप करें और पुण्य के लिए हमारे पण्डित, पादरी, मुल्ला बैठे हैं, जो उनके पाप को पुण्य में बदलने के लिए ईश्वर तक पहुँच रखते हैं; जैसे दलाली या बिचौलिया का धंधा होता है सभी धार्मिक स्थल के बाहर भिखारियों की बड़ी जमात होती है, जो भीख माँगते हैं और ईश्वर-ईश्वर का जाप करते हैं लेकिन न जाने क्यों ईश्वर की कृपा-दृष्टि उनकी तरफ़ होती ही नहीं, न तो खाना-कपड़ा ही मुहैया होता है, घर और नौकरी तो दूर की बात है शायद इसलिए भी कि अगर ग़रीब न हो, तो फिर पुण्य पाने के लिए दान किसे किया जाएगा ईश्वर के नाम पर बिना मेहनत गुज़ारा हो जाता है, तो यह धंधा भी अच्छा है  
 
नास्तिकों के पास पाप करके पुण्य में बदलने का उपाय या विकल्प नहीं होता है; इसलिए वे इस एक जीवन को अपनी सोच और समझ से जीते हैं न पाप करते हैं, न पुण्य के लिए दर-दर की ख़ाक छानते हैं इंसानियत ही एक जाति और धर्म होता है, यही इनकी पहचान होती है अपवाद एक अलग बात है  
 
मैं न आस्तिकता को उचित मानती हूँ, न नास्तिकता को; क्योंकि 'कुछ है' तभी तो हम उसके पक्ष या विपक्ष में हैं या ख़ुद को नास्तिक या आस्तिक मान रहे हैं मेरा स्वभाव है कि मैं किसी भी लकीर पर नहीं चल सकती।बिना अपने अनुभव किसी के कहे को सत्य नहीं मानती हूँ। जो उचित लगता है वही करती हूँ; समाज की नज़र में पाप हो या पुण्य
 
नास्तिकता को एक नई परिभाषा की ज़रूरत है, जिसमें आस्तिकता के विपरीत न बहस हो न सोच बल्कि एक ऐसी वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण अकाट्य सोच हो, जिसमें किसी से तुलना या सार्थकता पर बहस न होकर सिर्फ़ इंसानियत की बात हो, प्रकृति की बात हो, उत्थान की बात हो, जीवन की बात हो, प्रेम की बात हो, और यही नास्तिकता की नई परिभाषा हो


-जेन्नी शबनम (8.5.2010)
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Thursday, April 1, 2010

7. हँसी-ठिठोली, बड़ा मज़ा आया!

चित्र- गूगल से साभार
आज पहली अप्रैल है यानी 'मूर्ख दिवस'।
यों तो सभी लोग आज के दिन अपने-अपने तरीक़े से अपने मित्रों व परिचितों को मूर्ख बनाने में लगे रहते हैं और ये मज़ाक का सिलसिला सारा दिन चलता है हर फ़ोन, हर खाना या किसी के कुछ भी कहने पर एक बार मन में ज़रूर आता है कि कहीं उसे अप्रैल फूल तो नहीं बनाया जा रहा है  
 
हँसी-मज़ाक के लिए समर्पित यह दिन, जिसका इंतिज़ार एक महीना पहले से हम सभी करते हैं और दूसरों को मूर्ख बनाने के नए-नए तरीक़े खोजते हैं बहुत मज़ा आता है जब कोई मूर्ख बनता है और हम ताली पीट-पीटकर हँस-हँसकर लोट-पोट हुआ करते हैं अपनी होशियारी पर और मूर्ख बना व्यक्ति जब अपनी मूर्खता पर शर्माता है, तब मस्ती देखते बनती है  
 
मुझे याद है बचपन में मैं अपने भाई के साथ मिलकर सबको ख़ूब अप्रैल फूल बनाया करती थी जो भी मेहमान हमारे घर आते, तो उनको नाश्ता और शरबत दिया जाता था नींबू-चीनी की शरबत बनती थी, जिसमें हमलोग ढेर सारा नमक मिला देते और बुद्धू-सा चेहरा बनाकर घर आए मेहमान को देते मेहमान शरबत मुँह में रखते ही थू-थू करने लगते। हम फिर बाद में अच्छा वाला शरबत देते, जिसे भी वे सन्देह के साथ मुँह में डालते और हम लोग ठहाका लगाते थे  
 
ठिठोली का एक मज़ेदार यंत्र बनाना हम भाई-बहन ने कहीं से सीख लिया। इस नए इज़ाद में बड़ा मज़ेदार तकनीक शामिल थाएक बटन को रबड़ में लगाकर चूड़ी में ख़ूब लपेटकर किसी काग़ज़ में अच्छे से बंद कर देते हैं। जिन्हें मूर्ख बनाना होता है उनका पता लिफ़ाफ़े पर लिखकर वह यंत्र वाला काग़ज़ उसमें डालकर लिफ़ाफ़ा बंद कर देते, फिर उन सज्जन को यह कहकर देते कि आपकी चिट्ठी आई है जैसे ही हाथ में लेकर लिफ़ाफ़ा फाड़ा कि ख़ूब ज़ोर से फर-फर की आवाज़ होती और वे सज्जन उछलकर उसे दूर फेंक देते, और हमलोग ताली बजा-बजाकर लोट-पोट  
 
मैं छोटी थी, मेरे रिश्ते की एक दीदी की शादी मेरे घर से हुई हर छुट्टी में या जब भी हमलोग गाँव जाते तो दीदी-जीजाजी मिलने आते थे हम दोनों भाई-बहन बहुत छोटे थे, पर जीजाजी को बहुत तंग करते थे। अप्रेल फूल बनाने के न जाने कितने तरीक़े हम उनपर प्रयोग करते थे हमलोग शाकाहारी थे, तो बहुत प्रकार के पकवान बनते, जिनमें हरी सब्जियों के तरह-तरह के पकौड़े मुख्य रूप से होते थे हम लोग घास या मिट्टी को बेसन में लपेटकर पकौड़े की तरह छानकर उनको खाने के लिए देते, जैसे पहला कौर मुँह में कि हमारा ठहाका और दादी की डाँट एक साथ घर के सब लोग हँस पड़ते, हम दोनों प्यार भरी डाँट भी सुनते; लेकिन फिर कुछ और नया तरीक़ा सोचते और शुरू हो जाता नया मज़ाक  
 
याद नहीं कि कोई भी वर्ष ऐसा बीता, जब किसी को अप्रैल फूल न बनाया हो चाय में नमक, शरबत में नमक, खीर में नमक, आटा का नमकीन हलवा, घास या मिट्टी के पकौड़े आदि तो खाने के द्वारा मज़ाक हुआकिसी को फ़ोनकर कह दिया कि माँ ने बुलाया है, माँ को कह दिया कि भाई का फ़ोन आया है, घंटी बजाकर माँ को कह दिया कि कोई मिलने आए हैं, ये सभी छोटा-छोटा मज़ाक हर साल करती रही और सबको मूर्ख बनाती रहीख़ुद अप्रैल फूल बहुत कम बन पाई; क्योंकि सारा दिन याद रहता था कि आज जो भी कुछ होगा सँभलकर... वर्ना अप्रैल फूल 
 
शादी के बाद पति के भाइयों और बहनों को हर साल ख़ूब अप्रैल फूल बनाती रही अब तो अपने बच्चों को भी ख़ूब अप्रैल फूल बनाती हूँ मेरी बेटी जब छोटी थी, तो मूर्ख बन जाने पर ख़ूब चिल्लाती थी कि हम मूर्ख नहीं हैं... हमको क्यों मूर्ख बनाई...! जब एक को हम लोग मूर्ख बनाते, तो बाक़ी सभी लोग एक पार्टी में हो जाते थे  
 
अब सोचती हूँ कि शायद हमारे समय में मनोरंजन के साधन ज़्यादा नहीं होते थे, इसलिए इस दिन को इतना याद रखते रहे अब तो वह उत्साह नहीं दिखता, सभी ख़ुद में इतने व्यस्त हो गए हैं कि शायद हँसी-मज़ाक भी भूल रहे हैं  
 
मशीनीकरण नें हमारे सहज स्वभाव को सरल नहीं रहने दिया है बहुत हुआ तो एस.एम.एस. के ज़रिए कोई चुटकुला या परिहास लिखकर भेज दिया, फिर हँसो भी तो अकेले में या बेतूका परिहास टेलीविजन पर देखकर हँस लिया; क्योंकि अब हँसने का बहाना भी खोजना पड़ता है अप्रैल फूल चाहे हमारी परम्परा में न हो, पर आज के व्यस्त दौर के लिए इसे परम्परा का हिस्सा बना ही लेना चाहिए  
 
हँसी-ठिठोली के साथ ठहाका... अप्रैल फूल बनाया... उनको ग़ुस्सा आया... बड़ा मज़ा आया!

-जेन्नी शबनम (1.4.2010)
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Monday, March 8, 2010

6. चहारदीवारियों में चोखेरबालियाँ

चित्र- गूगल से साभार
एक बार फिर महिला दिवस गुज़र गया अलग-अलग तरह के आयोजनों से लोगों ने महिलाओं को बताया कि यह ख़ास दिन आपके लिए है ये सच है कि सम्पूर्ण विश्व की महिलाओं के लिए यह एक ख़ास दिन उनके अस्तित्व, अस्मिता, आज़ादी, अधिकार और आसमान के लिए संघर्ष का प्रतीक बन सकता था, पर ऐसा वास्तविक धरातल पर नहीं हुआ कहने को महिलाओं के हक़ की बात सभी करते हैं; लेकिन आज 100 साल होने पर भी महिला की दास्तान औए दासता वैसी ही है जो स्त्रियाँ अपनी ख़ास पहचान बना सकी हैं, उनके लिए यह इतना सरल और सहज नहीं रहा होगा उन्होंने बहुत कुछ खोया होगा, जिसका हम सिर्फ़ काल्पनिक अंदाज़ा लगा सकते हैं, वास्तविक वस्तुस्थिति नहीं जान सकते।  
 
किसी भी युग की बात करें, विदुषी स्त्रियाँ भी रही हैं, धनोपार्जन करने वाली हाथ भी बनी हैं और सम्पत्ति की तरह उपभोग में लाई जाने वाली वस्तु भी बनी हैं अपनी स्थिति के प्रति असंतुष्टि की भावना स्त्रियों में समय और सभ्यता परिवर्तन के साथ ही बढ़ी समाज और परिवार की अवधारणा जब विकसित हुई, स्त्रियों की स्वतंत्रता और अधिकार पर पाबन्दी भी बढ़ती गईधीरे-धीरे परिवार तक सिमटी स्त्री पुरुष की भोग्या बनी, जो वंश चलाती है। वे धार्मिक कार्यकलापों में आवश्यक बना दी गईं, ताकि चेतन-स्वरूप में उन्हें अपनी उपस्थिति, उपयोगिता और उपभोगिता की निम्नता का भान न हो यह सब ऐसी मनोवैज्ञानिक और धार्मिक साज़िश थी कि स्त्रियाँ तो क्या शिक्षित पुरुष भी इसके शिकार से वंचित न रह सके  
 
समय परिवर्तन के साथ भारतीय स्त्रियों की स्थिति भी बदली है।मुग़लकालीन अवधि में स्त्रियों की स्थिति बेहद निम्न थी; क्योंकि इस काल में सभ्य समाज में भी बहु विवाह, पर्दा प्रथा, बाल विवाह इत्यादि शुरू हो गया था; भले ही इसके मूल में वजह स्त्रियों की सुरक्षा भावना रही हो। अंग्रेज़ी शासन काल में थोड़ा सुधार तो हुआ; लेकिन सांस्कृतिक ह्रास भी शुरू हो गया, जिसका परिणाम आज हम देख रहे हैं  
 
यह सच है कि हमारे संविधान द्वारा स्त्रियों को शिक्षा, संपत्ति और रोज़गार में समान अवसर तथा समानता का अधिकार दिया गया उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए कई और भी अधिनियम और क़ानून बने, 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए बीच-बीच में पूरज़ोर आवाज़ उठते रहे लेकिन इन सभी कानूनी और संवैधानिक अधिकार के मिलने के बाद भी आख़िर क्या वजह है कि स्त्रियाँ आज भी दूसरे दर्जे और हाशिये पर रह गईं कुछ अपवाद को छोड़ दें, तो कम-ज़्यादा सभी स्त्रियों की स्थिति आज भी एक-सी है चाहे वह शहरी समाज हो या ग्रामीण, भारतीय हो या विदेशीसामजिक और सांस्कृतिक भिन्नता के अनुसार स्थिति में भिन्नता है; लेकिन आधारीय स्थिति एक-सी दिखती है  
 
स्त्रियों की स्थिति के सुधार के लिए न सिर्फ़ कुछ स्त्रियाँ बल्कि पुरुष भी प्रतिबद्ध हुए, परिणामस्वरुप स्थिति में बहुत सुधार हुआ लेकिन सुधार की जो स्थिति है आज भी सही मायने में शोचनीय है शहरी क्षेत्र में तो फिर भी शिक्षा, रोज़गार और समानता के अधिकार मिले हैं; लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में स्त्रियों की स्थिति यथावत् है शिक्षा और सामाजिक चेतना से उन्हें महरूम रखा जाता है, यहाँ तक कि उन्हें संविधान से मिले अधिकार का भी पता नहीं है।  
 
गाँवों में आज भी बाल विवाह प्रचलित है लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए न कोई विशेष प्रयास होते हैं, न संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं सरकारी विद्यालय और अन्य योजनाएँ काग़ज़ पर गतिमान हैं अधिकांश ग्रामीण महिलाएँ और बालिका कुपोषण की शिकार हैं शिशु-जन्म के लिए प्रशिक्षित दाई का अभाव है, जिससे उपचार के अभाव में जच्चा-बच्चा दोनों मर जाते हैं  
 
शहरी क्षेत्र में आज सबसे बड़ी समस्या है बालक-बालिका का विषम अनुपात एक तरफ़ जनसंख्या बेतहाशा बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ़ तुलना में लड़कियाँ कम हो रही हैं कन्या भ्रूण-हत्या और दहेज उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है यह सब शिक्षित और शहरी समाज में ज़्यादा हो रहा है  
 
मैं अक्सर सोचती हूँ कि आख़िर वजह क्या है जो स्त्रियों को कमतर आँका जाता है, जबकि स्त्री के बिना दुनिया ख़त्म हो जाएगी वे जब इतनी महत्वपूर्ण हैं, तो क्या वजह है जो स्त्रियाँ अमानवीय जीवन जीने को विवश होती हैं यों इस विषय पर मेरा ये सब सोचना नया नहीं है, न तो इसका आधार नया है। स्त्रियों की शारीरिक क्षमता और आकृति पुरुष की तुलना में बिल्कुल अलग है, जो प्रकृति प्रदत्त है स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं ताकि संसार चलता रहे। फिर भी स्त्रियों की ऐसी स्थिति सचमुच दुःखद है
 
प्रकृति ने स्त्री की शारीरिक संरचना ऐसी बनाई है, जिससे संतति का काम सिर्फ़ स्त्री कर सकती है शायद यही सबसे अहम कारण है जिससे स्त्रियाँ प्रताड़ित होती हैं, चाहे वह शारीरिक उत्पीड़न हो या मानसिक या सामजिक यही वजह है कि किसी भी क्षेत्र में कमतर न होते हुए भी स्त्री कमज़ोर हो जाती है जन्मजात कन्या हो या 80 साल की वृद्ध महिला, कहीं भी सुरक्षित नहीं, न अपने घर में न समाज में, न अपनों के बीच न परायों के बीच कब किसका बलात्कार हो जाए, कब किसकी इज़्ज़त लूट ली जाए, कब धोखे से देह व्यापार में धकेल दी जाए, प्रेम का झाँसा देकर कोई न सिर्फ़ शारीर बल्कि मन से खेल जाए विक्षिप्त मानसिकता वाला पुरुष न उम्र देखता है न रिश्ता, उसके लिए मात्र एक देह बन जाती है स्त्री। यदि कोई स्त्री एक बार बलात्कार की शिकार हो जाती है, तो वह न सिर्फ़ घर-समाज की नफ़रत झेलती है, बल्कि उसे ख़ुद से भी नफ़रत हो जाती है जब ख़ुद से नफ़रत हो, तो जीवन की सभी सम्भावनाएँ ख़त्म हो जाती हैं कानून बने, मुज़रिम पकड़े जाएँ, सज़ा दी जाए; लेकिन जो स्त्री इस दंश को झेलती हैं, उनकी मानसिक दशा परिवर्तन के लिए कोई कानून नहीं बन सकता, न उस पीड़ा से उनको आजीवन नज़ात मिलती है  
 
एक आम धारणा और एकपक्षीय आरोप स्त्री पर लगाया जाता है कि जो स्त्री हक़ के लिए आवाज़ उठाती है या नारी के उत्थान के लिए कृतसंकल्प है, वह नारीवादी है और पुरुष समाज से नफ़रत करती है जो स्त्री समाज के तय नियम से कुछ अलग सोचती या करती है, उसके लिए ये सब करना बहुत मुश्किल होता है ऐसी स्त्री को या तो चरित्रहीन की संज्ञा दी जाती है या उसे सन्देह की नज़रों से देखा जाता है  
 
स्त्रियों की दशा में परिवर्तन तब तक नहीं हो सकता है, जब तक स्त्री और पुरुष को समाज में एक बराबर की इकाई न मानी जाए न सिर्फ़ शिक्षित समाज, बल्कि चेतनशील और चिन्तनशील समाज का होना भी ज़रूरी हैप्रगतिवादी सोच की स्त्री हो या पुरुष, कभी भी एक दूसरे को हीन नहीं समझते हैं न तो उनमें वैमनस्व की भावना होती है और न प्रतिस्पर्धा कीसोच और समझ का नज़रिया बदलना बेहद आवश्यक है पुरुष और स्त्री को एक दूसरे का सहयोगी और पूरक माना जाए न कि प्रतिद्वंदी।  
 
जब तक स्त्री और पुरुष को हर क्षेत्र में बराबर अधिकार और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक कितने भी कानून बने, सरकारी योजना बने, महिला दिवस मनाया जाए, कहीं कोई समूल सार्थक परिवर्तन नहीं होगा चोखेरबालियों की तलाश जारी रहेगी और अपनी आज़ादी के लिए वे संघर्षरत रहेंगी।  
 
महिला दिवस के 100 वर्ष पूरे होने पर स्त्रियों और पुरुषों की सजगता के आह्वान के साथ शुभकामनाएँ!

-जेन्नी शबनम (8.3.2010)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के 100 साल)
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